Domestic Violence : कानूनी अधिकार – पति की मार और आप का अधिकार

Domestic Violence : चाहे 2026 हो या कोई और हो पत्नी पर हाथ उठाने को किसी भी तरह से जस्टिफाई नहीं किया जा सकता. पति के द्वारा पत्नी पर हाथ उठाना घरेलू हिंसा के अंतर्गत आता है और घरेलू हिंसा को ले कर कड़े कानून हैं. लेकिन दुख इस बात का है पत्नियों को इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है और उन्हें लगता है अगर पति का घर छोड़ा तो हम कहां जाएंगी इसलिए वे पिटने को मजबूर होती हैं. उन्हें लगता है इस घर को छोड़ा तो उन का और कोई आसरा नहीं है.

आज हम यहीं बताने जा रहे हैं कि अगर पति हाथ उठा रहा है तो आप क्या करें? आप के क्या अधिकार हैं? कानून ने आप को इस के तहत सुरक्षा दी है. बस जरूरत है अपने उस अधिकार को जानने और उस का फायदा लेने की.

आइए, जानें क्या करें जब पति मारे:

पहली बार भी चुप न रहें

अगर आप के साथ मारपीट हो रही हो तो लोग क्या कहेंगे यह सोच कर चुप न बैठें बल्कि पहली बार में ही पति की हिम्मत तोड़ दें. इस के लिए परिवार के बड़ेबुजुर्गों, रिश्तेदारों या किसी ऐसे व्यक्ति को शामिल करें जिस की बात पति सुनता हो. उन्हें स्पष्ट शब्दों में बता दें कि आप इस तरह की चीजें कतई सहन नहीं करेंगी.

मैरिज काउंसलिंग लें

अगर पति गिल्टी फील कर रहा है तो भी तुरंत माफ न करें बल्कि दोनों को मिल कर किसी अच्छे काउंसलर से मिलना चाहिए. पेशेवर लोग ?ागड़े की जड़ तक पहुंचने में मदद करते हैं क्योंकि ऐसा हुआ है तो उस की कोई वजह तो होगी ही. इसलिए उस वजह की जड़ में जाएं और समस्या को दूर करें.

रिहैब की हैल्प लें

कई मामलों में नशा घरेलू हिंसा की वजह बनता है. नशे में पत्नी पर जानलेवा हमला करने के केस आए दिन सुनने को मिलते हैं. यदि पति शराब या किसी अन्य नशे की वजह से पीटता है तो परिवार या किसी करीबी की हैल्प ले कर उसे नशामुक्ति केंद्र ले जाना ही सब से बड़ा समाधान है.

ऐंगर मैनेजमैंट

पति को अपना गुस्सा नियंत्रित करने के लिए थेरैपी लेने की न केवल सलाह दें बल्कि आप उन के साथ जाएं या फिर परिवार के किसी सदस्य को बोलें कि इन की यह प्रौब्लम दूर कराएं तभी आप उन के साथ रहेंगी.

वार्निंग दें

पति को स्पष्ट रूप से बताएं कि उन का व्यवहार गलत है और यदि यह दोबारा हुआ तो आप कानूनी कदम उठाएंगी. कई बार कानूनी काररवाई का डर व्यवहार बदल देता है. मगर यह तभी हो सकता है जब आप अपने अधिकारों के बारे में जानती हों, इसलिए पहले यह जानें कि आप को कानूनन अधिकार क्या हैं?

क्या है कानूनी अधिकार

अकसर पत्नियों को ये डर रहता है कि कहीं शिकायत करने पर पति ने घर से बहार निकाल दिया तो वे कहां जाएंगी. इसी वजह से वे सहती रहती हैं. लेकिन हम आप को बता दें कि पति आप को घर से बाहर नहीं निकाल सकता, भले ही घर उस के नाम पर हो. अगर वह निकालता है तो कोर्ट उसे आप को वापस घर में रखने का आदेश दे सकता है.

दोबारा मारपीट नहीं कर सकता

कई पत्नियों को यह डर भी लगा रहता है कि अगर उन्होंने कंप्लेंट की तो वापस घर आने पर पति इस से भी ज्यादा बुरी तरह मारेगा तब वे क्या करेंगी? इस के लिए आप संरक्षण आदेश के तहत अदालत से आदेश ले सकती हैं कि पति दोबारा आप के साथ मारपीट न करे.

नुकसान का हरजाना पति से मांग सकती हैं

इस बात से भी डरने की जरूरत नहीं है कि कहीं चोट लग गई हो तो उस के इलाज के लिए अच्छे अस्पताल गए तो खर्चा कहां से आएगा. आप अपने और अपने बच्चों का खर्च, इलाज का खर्च और मारपीट के कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिए पैसे मांग सकती हैं.

कैसे कराएं एफआईआर

आप क्रिमिनल ऐक्शन भी ले सकती हैं. आप पति और प्रताडि़त करने वाले ससुराल वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) (पहले आईपीसी ४९८्न) के तहत मामला दर्ज करा सकती हैं. यह धारा किसी महिला के पति या उस के रिश्तेदारों द्वारा उस से क्रूरता करने (मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक) या दहेज की मांग पूरी करने के लिए उत्पीड़न करने से संबंधित है. इस के लिए आप अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन में शिकायत (एफआईआर) दर्ज करा सकती हैं, जिसमें सभी घटनाएं और सुबूत जैसे मैडिकल रिपोर्ट, मैसेज, गवाह हों.

मानसिक या शारीरिक क्रूरता के सुबूत जैसे चोटों की तसवीरें, डाक्टर के परचे या मानसिक उत्पीड़न के मैसेज/औडियो रिकौर्डिंग जुटाएं. एक वकील से सलाह लें जो आप को प्रक्रिया और आवश्यक दस्तावेजों के बारे में बता सके.

मैडिकल एमएलसी कराएं

मारपीट होने पर तुरंत अस्पताल जा कर ‘मैडिकल एमएलसी’ कराएं. यह चोट के निशान कानूनी सुबूत के तौर पर बहुत काम आते हैं. महिला हेल्पलाइन नंबर: 1091 या 181, पुलिस आपातकालीन नंबर: 112.

घरेलू हिंसा कानून

घरेलू हिंसा कानून के दायरे में महिलाओं के खिलाफ हर तरह की हिंसा आती है. इस के तहत महिला के साथ मारपीट, जोरजबरदस्ती या चोट पहुंचाने जैसी चीजें आती हैं. वैसे महिलाओं को ज्यादातर शारीरिक हिंसा जिस में थप्पड़ मारना, धक्का देना, गला दबाना और जलाना का सामना करना पड़ता है. इस के अलावा इन्हें भावनात्मक, यौन और आर्थिक हिंसा का सामना भी करना पड़ता है.

कानून के तहत सहायता पाने के लिए लोकल पुलिस स्टेशन जाने की जरूरत होती है. वहां घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया जा सकता है. घरेलू हिंसा कानून महिलाओं के साथसाथ 18 साल की उम्र तक के बच्चों को भी संरक्षण देता है.

हालांकि पुलिस अफसर पहले मामले की पड़ताल करता है. अगर उसे लगता है कि इस का कानूनी मामला बनता है तो वह इस की एफआईआर दर्ज करता है. पुलिस वाले पहले एफआईआर दर्ज नहीं करते हैं. पहले वे शिकायत दर्ज करते हैं. ज्यादातर मामलों में महिलाएं सिर्फ शिकायत दर्ज करा देती हैं, जिस से गंभीर मामलों में उचित काररवाई नहीं हो पाती. लेकिन अगर महिलाएं चाहे तो आईपीसी 498 (ए) यानी महिला उत्पीड़न कानून के तहत सीधे थाने में भी एफआईआर दर्ज करा सकती हैं.

एफआईआर के बाद मामला अदालत में जाता है. इस के बाद अदालत इस का संज्ञान लेती है. बहुत से मामलों में महिलाएं सीधे अदालत में जा कर संरक्षण की फरियाद करती हैं. अदालत ऐसे मामलों में संरक्षण दिए जाने के लिए कह सकती हैं या फिर पीडित को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दे सकती है.

महिलाएं घरेलू हिंसा का मामला कहीं से भी दर्ज करा सकती हैं. अगर वे पति की ज्यादती की शिकार होने के बाद पिता के पास आ कर रहने लगी हैं तो वहां से भी मामला दर्ज करा सकती हैं.

अगर महिलाएं आर्थिक रूप से पति पर आश्रित हैं तो वे अदालत में मैंटेनैंस दिए जाने के लिए भी निवेदन कर सकती हैं. इस के लिए अदालत अंतरिम आदेश में मैंटेनैंस दिए जाने का आदेश दे सकती है.

आजकल ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की तरफ से काउंसलर की नियुक्ति की जाती है. काउंसलर दोनों पक्षों की बात सुनता है और अगर मामला बातचीत से सुल?ा सकता हो तो वह दोनों पक्षों के बीच सम?ाता कराने का प्रयास करता है. कई बार मैंटेनैंस या दूसरे मामलों पर काउंसलर के स्तर पर ही मामले में सहमति बन जाती है और आगे की अदालती प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर काउंसलर अपनी रिपोर्ट में कहता है कि दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है तो कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है. इस के आलावा आप अदालत से आदेश भी ले सकती हैं कि पति दोबारा आप के साथ मारपीट न करे और न ही आप से संपर्क करे.

kahaniyan : कौन अपना कौन पराया

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कहानी- करुणा कोछर

घुटनों के असहनीय दर्द के चलते मेरे लिए खड़ा होना मुश्किल हो रहा था किंतु मजबूरी थी. इस अनजान जगह पर मुझे दूरदूर तक कोई सहारा नजर नहीं आ रहा था.

विराट को परसों जबरदस्त हार्ट अटैक पड़ा था और देहरादून में उचित व्यवस्था न होने के कारण वहां के डाक्टरों की सलाह से विराट को दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में लाना पड़ा. हालांकि विराट की तबीयत खराब होने की खबर बच्चों को कर दी थी लेकिन उन की सुध लेने कोई नहीं आया. यह सोच कर मेरी आंखें भर आईं कि क्या इसी दिन के लिए लोग औलाद चाहते हैं? दर्द असहनीय होता जा रहा था. चक्कर सा आने लगा कि अचानक किसी ने आ कर थाम लिया और अधिकार के साथ बोला, ‘‘आप हटिए यहां से, मैं पैसे जमा करवा दूंगा,’’ आवाज सुन कर मैं ने चौंक कर ऊपर देखा तो मेरी निगाहें जम सी गईं.

‘‘तुम…तुम यहां कैसे पहुंचे?’’ मैं ने कांपते स्वर में पूछा.

‘‘कैसे भी? पर आप ने तो नहीं बताया न. हमेशा की तरह मुझे गैर ही समझा न,’’ उस के स्वर में शिकायत थी, ‘‘खैर छोडि़ए, आप बाबा के पास जाइए, मैं पैसे जमा करवा कर और डाक्टर से बात कर के अभी आता हूं,’’ वह बोला.

मैं धीरेधीरे चलती हुई विराट के कमरे तक पहुंची. वह आंखें मूंदे लेटे थे. मैं धीरे से पास रखे स्टूल पर बैठ गई. बुद्धि शून्य हुई जा रही थी. थोड़ी देर में वह भी कमरे में आया और विराट के पैर छूने लगा. विराट ने जैसे ही आंखें खोलीं और उसे सामने देखा तो खिल उठे, और अपनी दोनों बांहें फैला दीं तो वह छोटे बच्चे की तरह सुबकता हुआ उन बांहों में सिमट गया. थोड़ी देर बाद सिर उठा कर बोला, ‘‘मैं आप से बहुत नाराज हूं बाबा, आप ने भी मुझे पराया कर दिया. 2 दिन से घर पर घंटी बज रही थी, कोई फोन नहीं उठा रहा था सो मुझ से रहा नहीं गया और मैं घर पहुंचा तो पड़ोसियों से पता चला कि आप बीमार हैं और मैं यहां चला आया.

‘‘बाबा, आप इतने बीमार रहे लेकिन मुझे कभी बताया तक नहीं. क्या मेरा इतना हक भी आप पर नहीं है. बोलो न, बाबा?’’

वह लगातार प्रश्न करता रहा और विराट मुसकराते रहे. उस ने कहा, ‘‘अब आप बिलकुल चिंता न करना बाबा, अब मैं सब संभाल लूंगा.’’

विराट काफी निश्चिंत लग रहे थे. मन ही मन मुझे भी उस के आने से काफी खुशी हो रही थी. फिर वह मेरी तरफ मुड़ा और बोला, ‘‘बाहर मेरा अर्दली खड़ा है. आप उस के साथ मेरे गेस्ट हाउस पर चली जाइए. आप भी थक गई होंगी. थोड़ा आराम कर लीजिए. बाबा की आप बिलकुल चिंता न करें. मैं इन का पूरा खयाल रखूंगा,’’ उस ने कहा और मैं ने शायद जीवन में पहली बार उस की किसी बात की अवहेलना नहीं की. सिर झुका कर अपनी मौन स्वीकृति दे दी.

बाहर आ कर उस ने अपने अर्दली को कुछ निर्देश दिए और मैं उस की जीप में चुपचाप बैठ कर उस के गेस्ट हाउस पहुंच गई. नहाधो कर जब मैं लौन में आ कर बैठी तो अर्दली चाय और बिस्कुट ले आया. चाय पी कर थोड़ी राहत महसूस हुई. अंदर आ कर मैं ने कमरा बंद किया और सोने का उपक्रम करने लगी किंतु नींद मेरी आंखों से कोसों दूर थी. बीता समय मानस पटल पर उजागर होने लगा.

जब मेरी शादी विराट से हुई थी तो वह वकालत में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे. वैसे मेरे ससुरजी एक कामयाब वकील थे. धीरेधीरे विराट भी वकालत के पेशे में पैर जमाने लगे और इन की भी गिनती नामी वकीलों में की जाने लगी. हमारे 2 बेटे हुए जिन्हें हम ने लाड़प्यार से पाला. कुछ समय बाद ससुरजी की मृत्यु हो गई तो उन के एक बहुत पुराने मुंशीजी को विराट ने अपने साथ रख लिया.

मुंशीजी की विश्वसनीयता और कर्मठता के कारण विराट उन पर बहुत निर्भर हो गए. एक दिन अचानक मुंशीजी घबराए हुए आए और एक हफ्ते की छुट्टी मांगने लगे. विराट के पूछने पर उन्होंने बताया कि उन का गांव भूकंप की चपेट में आ गया है और वह अपने परिवार के लिए चिंतित हैं. तब पहली बार मैं ने जाना कि मुंशीजी का अपना परिवार भी है.

करीब 10 दिन बाद मुंशीजी लौटे तो उन के साथ एक 12 साल का लड़का था. विराट को देखते ही मुंशीजी बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगे. रोतेरोते उन्होंने बताया कि भूकंप की चपेट में उन के दोनों बेटेबहुएं और पोतेपोतियों की मृत्यु हो गई है. केवल यही एक बच्चा बच पाया है. चूंकि गांव में अपना कोई बचा नहीं है इसलिए अपने इस छोटे पोते को साथ लेता आया हूं.

विराट एक नरमदिल इनसान हैं सो मुंशीजी को सांत्वना देते हुए बोले, ‘घबराइए मत मुंशीजी, होनी को तो कोई टाल नहीं सकता. हम सब आप के दुख में आप के साथ हैं,’ फिर बच्चे की ओर देख कर विराट बोले, ‘क्या नाम है बेटा?’

‘जी अमर… अमरदीप,’ वह बच्चा हकलाते हुए बोला.

‘अरे वाह, बड़ा अच्छा नाम है. पढ़ते हो?’

उस ने सिर हिला कर ‘हां’ कहा.

‘कौन सी क्लास में?’ विराट ने पूछा.

‘जी, 5वीं में,’ अमर बोला.

‘साहब, आप इस का दाखिला सेंट्रल स्कूल में करवा दीजिए. थोड़ा पढ़लिख जाएगा तो कमा खा लेगा. मेरा क्या भरोसा?’ मुंशीजी लाचारी से बोले.

‘क्यों नहीं, मुंशीजी, पर सेंट्रल स्कूल में क्यों, मैं इस का दाखिला वरुण के स्कूल में करवा दूंगा,’ विराट ने दरियादिली दिखाई, ‘और आप अमर की चिंता न करें, इस की पढ़ाई का सारा खर्चा मेरे जिम्मे होगा.’

हालांकि मुझे यह बात नागवार लगी किंतु मैं चुप रही. बाद में विरोध जताने पर विराट मुझे समझाते हुए बोले, ‘क्या फर्क पड़ता है सुमि, अनाथ बच्चा है, पढ़लिख जाएगा तो तुम्हें दुआ देगा.’

‘नहीं चाहिए मुझे दुआ,’ मैं खीज कर बोली, ‘आप इसे सरकारी स्कूल में ही भरती करवा दें. वहां किताबें और यूनीफार्म भी मुफ्त में मिल जाएगी.’

‘इस की फीस भर कर और साल में एक बार किताबकापियों और यूनीफार्म पर खर्च कर के तुम्हारा खजाना खाली हो जाएगा. है न,’ विराट व्यंग्यात्मक मुसकराहट से बोले तो मैं कुढ़ गई. मुझे यह कतई गवारा न था कि मेरे नौकर का बच्चा मेरे बच्चों की बराबरी में पढ़े.

विराट ने अपने मन की मानी और अमर का दाखिला मेरे बच्चों के स्कूल में ही हो गया और वह भी मेरे बच्चों के साथ गाड़ी में स्कूल आताजाता था.

मुंशीजी अपने परिवार के सदमे से टूट गए थे अत: 6 महीने के भीतर ही उन की भी मृत्यु हो गई. विराट अमर को घर ले आए. उस दिन मैं ने विराट से खूब लड़ाई की. किंतु वह यही तर्क देते रहे कि मुंशीजी उन के पुराने वफादार मुलाजिम थे अत: उन के पोते के प्रति उन का नैतिक कर्तव्य बनता था.

मेरे तर्कवितर्कों का विराट पर कोई असर नहीं पड़ा बल्कि अब वह अमर पर ज्यादा ध्यान देने लगे. उस की पढ़ाई, उस का खानापीना, उस के कपड़े आदि का खास ध्यान रखते.

हालांकि अमर अपनी पढ़ाई के साथसाथ मेरे कामों में भी मेरी मदद कराता. बाजार के भी काम कर देता. जिस समय मेरे बच्चे कंप्यूटर गेम खेल रहे होते वह उन का होमवर्क भी कर देता. फिर भी मेरी नाराजगी कम न होती. मेरे बच्चे भी जबतब उसे जलील करते रहते किंतु वह उफ तक नहीं करता.

मेरे बच्चों की देखादेखी एक बार मेरे लिए अमर के मुंह से ‘मम्मी’ निकला तो मैं ने उसे झिड़क दिया. फिर एक बार बाजार से आ कर सौदा सौंपते हुए उस ने मुझे ‘मांजी’ कहा तो मैं चिल्ला उठी, ‘खबरदार, मुझे मम्मी या मांजी कहा तो. कहना है तो मालकिन कहो.’

वह सहम गया. उस दिन के बाद से उस ने मुझे कोई भी संबोधन नहीं दिया.

अमर पढ़ाई में बहुत होशियार था. अपनी कक्षा में वह हमेशा प्रथम आता था. इस से विराट बहुत खुश होते थे. 12वीं की परीक्षा समाप्त होने पर एक दिन विराट बोले, ‘मैं सोचता हूं अमर को पी.एम.टी. की परीक्षा में बिठाऊं और…’

विराट अभी बात पूरी भी न कह पाए थे कि मेरे सब्र का बांध टूट गया और उस दिन मेरे क्रोध की भी सीमा न रही.

‘बस कीजिए, अब क्या इस ढोल को सारी जिंदगी मुझे बजाते रहना पड़ेगा. डाक्टरी की पढ़ाई 5-6 साल से कम नहीं और खर्चा बेतहाशा. मैं ने क्या इस का ठेका उठाया है जो अपने बच्चों के हिस्से का पैसा भी इस पर खर्च करूंगी. 12वीं तक पढ़ा दिया अब यह कोई छोटामोटा काम करे और हमारा पीछा छोड़े. मैं अब इसे और बरदाश्त नहीं करूंगी.’

मैं ने गुस्से में यह भी न सोचा कि कहीं अमर ने यह सब सुन लिया तो? और शायद उस ने मेरी बातें सुन ली थीं.

2 दिन बाद विराट के पास जा कर अमर धीरे से बोला, ‘बाबूजी, मैं डाक्टर या इंजीनियर नहीं बनना चाहता बल्कि मैं सैनिक बनना चाहता हूं. मैं एन.डी.ए. का फार्म लाया हूं. आप इस पर हस्ताक्षर कर दें.’

विराट ने न चाहते हुए भी उस पर दस्तखत कर दिए. और फिर एक दिन अमर को एन.डी.ए. की परीक्षा में शामिल होने का पत्र भी आ गया. 5 दिन की कड़ी परीक्षा दे कर जब वह देहरादून से लौटा तो उस का चेहरा खुशी से दमक रहा था. उस का चयन हो गया था. जिस दिन वह अपना सामान ले कर टे्रनिंग पर जा रहा था विराट की आंखों में आंसू थे.

‘बेटा, मैं तुम्हारे लिए ज्यादा कर नहीं पाया,’ अमर को गले लगाते हुए विराट बोले.

‘ऐसा न कहें बाबूजी, मैं आज जो भी हूं और भविष्य में जो भी बन पाऊंगा सिर्फ आप की वजह से. मेरा रोमरोम आप का सदा आभारी रहेगा,’ अमर रोते हुए बोला. जब वह मेरे चरणस्पर्श करने आया तो मैं ने बेरुखी से कहा, ‘ठीक है…ठीक है’ और वह चला गया. मैं ने भी चैन की सांस ली.

मेरे दोनों बच्चे इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. वरुण ने आई.आई.टी. मुंबई से एम.टेक. किया. उसे विदेश में नौकरी मिल गई. वहीं उस ने एक लड़की से शादी कर ली. उस दिन मैं बहुत रोई थी. छोटे बेटे शशांक को बोकारो, जमशेदपुर में नौकरी मिल गई. उस ने भी एक विजातीय लड़की से प्रेम विवाह किया जिस ने कभी हमें अपना नहीं माना.

अमर के पत्र लगातार विराट के पास आते रहते. टे्रनिंग पूरी कर के उस की लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति हुई. एक बार हम से मिलने के लिए अमर 2 दिन के लिए आया था. किंतु मेरा व्यवहार उस के प्रति रूखा ही रहा. हां, उन 2 दिनों में मैं ने विराट को कहकहे लगाते देखा था.

फिर विराट को पक्षाघात हुआ तो मैं ने दोनों बच्चों को खबर दी. वे आए भी लेकिन किसी ने भी हमें अपने साथ रखने की बात नहीं की और न ही कोई पैसे से मदद की. उलटे दोनों बेटे नसीहत देने लगे कि हम अपना बंगला बेच दें और एक छोटा सा फ्लैट ले लें. पहली बार मुझे अपनी कोख पर अफसोस हुआ और एक पल को अमर की याद भी आई किंतु मेरा अहम आड़े आ गया.

कभीकभी अमर का फोन आता तो मैं टाल देती. विराट की बीमारी पर काफी पैसा लगा. आमदनी रही नहीं, सिर्फ खर्चे ही खर्चे. रोजरोज पानी उलीचने से तो कुआं भी खाली हो जाता है तो हमारे बैंक में जमा पैसे का क्या. हार कर अपना बंगला मुझे बेचना पड़ा.

देहरादून में पुश्तैनी टूटाफूटा घर था. उसी की मरम्मत करवा कर हम वहां रहने के लिए आ गए. मैं ने गुस्से के मारे अपने बेटों को खबर भी नहीं दी. हां, विराट के बहुत आग्रह पर 2 लाइनें अमर को लिख दीं जिस में अपना नया पता व टेलीफोन नंबर था.

पत्र मिलते ही अमर देहरादून आया. अब वह कैप्टन बन चुका था. सारी बात पता चलने पर उस ने अपने साथ चलने के लिए बहुत जिद की लेकिन विराट ने उसे समझाबुझा कर वापस भेज दिया.

अमर नियमित रूप से पत्र भेजता रहता. हालांकि वह पैसे से भी मदद करना चाहता था लेकिन मेरे अहम को यह गवारा न था.

अमर की शादी का निमंत्रण आया तो मैं ने कार्ड छिपा दिया. किसी कर्नल की बेटी से उस की शादी हो रही थी. उस का फोन भी आया तो मैं ने विराट को नहीं बताया. फिर एक दिन वह अपनी पत्नी को ले कर ही देहरादून आ गया. हालांकि बड़ी प्यारी और संस्कारी लड़की थी लेकिन मैं उन लोगों से खिंचीखिंची ही रही. उन के जाने पर विराट ने मुझ से झगड़ा किया कि मैं ने शादी के बारे में क्यों नहीं बताया.

अब विराट कुछ चुपचुप से रहने लगे थे. एक तो अपनी अपंगता के कारण, दूसरे, बच्चों की बेरुखी से वह आशाहीन से हो गए थे. शायद इसी कारण उन्हें यह अटैक पड़ा था. मैं ने घबराहट में दोनों बच्चों को फोन पर सूचना दी तो दोनों ने ही आने में अपनी असमर्थता जाहिर की. इस बार चाहते हुए भी मैं अमर को मदद के लिए नहीं बुला पाई. हां, दिल्ली आते समय पड़ोसियों को अस्पताल का पता दे कर आई थी एक उम्मीद में और वही हुआ. आखिर अमर पहुंच ही गया.

अचानक दरवाजे पर हुई दस्तक से मेरी तंद्रा भंग हो गई. दरवाजा खोल कर देखा तो सामने नौकर खड़ा था.

‘‘मांजी, खाना तैयार है. आप खा लीजिए. अस्पताल का खाना भी मैं ने पैक कर लिया है. फिर हम अस्पताल चलेंगे.’’

मैं ने जल्दीजल्दी कुछ कौर निगले और उस अर्दली के साथ अस्पताल पहुंच गई. देखा तो विराट काफी खुश लग रहे थे. मुझे यह देख कर बहुत अच्छा लगा. अमर ने बताया 2 दिन बाद आपरेशन है.

आपरेशन कामयाब रहा. सारी भागदौड़ और खर्च अमर ने ही किया. इस बार मैं ने उसे नहीं रोका. जब विराट को अस्पताल से छुट्टी मिली तो अमर ने एक बार फिर अपने साथ उस के घर डलहौजी चलने का आग्रह किया. जब विराट ने प्रश्नसूचक नजरों से मेरी ओर देखा तो मैं ने मुसकराते हुए मौन स्वीकृति दे दी. अमर को तो जैसे कुबेर का खजाना मिल गया. उस ने फौरन फोन कर के अपनी पत्नी भावना को बता दिया.

हम जब डलहौजी में अमर के बंगले पर पहुंचे तो भावना बाहर खड़ी मिली. जीप से उतरते ही उस ने सिर पर आंचल डाल कर मेरे पैर छुए. अमर सहारा दे कर विराट को अंदर ले गया.

विराट काफी खुश नजर आ रहे थे. मुझे भी काफी सुकून सा महसूस हुआ. अपनी बहुओं का तो मैं ने सुख देखा नहीं. पहली बार सास बनने का एहसास हो रहा था.

रात का खाना अमर ने अपने हाथों से अपने बाबूजी को खिलाया. काफी देर तक दोनों गप्पें मारते रहे. भावना बारबार आ कर मेरी जरूरतों के बारे में पूछ जाती.

खाने के बाद जब मैं बिस्तर पर लेटी थी तो अचानक मुझे दरवाजे के बाहर अमर की आवाज सुनाई पड़ी. मैं ने ध्यान से सुना तो वह भावना को मेरे लिए कौफी बनाने को कह रहा था.

मेरा मन भीग गया. उसे अभी भी याद है कि मैं खाने के बाद कौफी पीती हूं. थोड़ी देर में भावना टे्र में कौफी का मग ले कर आई, ‘‘मांजी, आप की कौफी लाई हूं साथ में आप का मीठा पान भी है.’’

अमर को याद रहा कि मीठा पान मेरी कमजोरी है. विराट को मेरा पान खाना पसंद नहीं था सो मैं कभीकभी अमर से ही पान मंगवाया करती थी. मैं द्रवित हो उठी.

2-3 सप्ताह बाद जब विराट की तबीयत में काफी सुधार आ गया तो मैं ने अमर से अपने घर जाने की बात की. अमर उदास हो गया और कहने लगा, ‘‘क्या आप यहां खुश नहीं हैं? क्या आप को कोई तकलीफ है?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटा,’’ मेरे मुंह से अचानक निकल गया.

‘‘बेटा भी कह रही हैं और बेटे का हक भी नहीं दे रही हैं,’’ अमर भावुक हो कर बोला.

‘‘एक शर्त पर बेटे का हक दे सकती हूं, यदि तुम मुझे ‘मां’ कहो तो,’’ अपनी भावनाओं को मैं रोक नहीं पाई और अपनी दोनों बांहें पसार दीं. वह एक मासूम बच्चे की तरह मेरी गोद में समा गया और रोतेरोते बोला, ‘‘मां, अब मैं आप को और बाबूजी को कहीं नहीं जाने दूंगा. अब आप दोनों मेरे पास ही रहेंगे. बोलो मां, रहोगी न?’’ वह लगातार यह पूछता जा रहा था और मैं उस के बालों को सहलाते हुए बोली, ‘‘अपने बच्चों को छोड़ कर कौन मांबाप अकेले रहना चाहते हैं. हम यहीं रहेंगे, अपने बेटे के पास.’’

मैं भावुकता में बोले जा रही थी और मेरी आंखों से गंगायमुना बह रही थी. थोड़ी देर में तालियां बजने लगीं. मैं ने नजर उठा कर देखा तो विराट और भावना तालियां बजा रहे थे और हंस रहे थे.

उस रात मैं ने विराट से कहा, ‘‘अमर मेरी कोख से क्यों न हुआ?’’ तो वह बोले, ‘‘इस से क्या फर्क पड़ता है. है तो वह मेरा ही बेटा.’’

‘‘मेरा नहीं हमारा बेटा,’’ मैं तुरंत बोली और हम दोनों ठठा कर हंस पड़े.

Family Drama : रत्ना नहीं रुकेगी – क्या रत्ना अपमान बर्दाश्त कर पाई?

Family Drama :  रोली और रमण इतने बच्चे भी नहीं हैं कि उन्हें अपनी मां की तकलीफ दिखाई नहीं दे. जब एक नवजात भी संवेदनाओं और स्पर्श की भाषा को समझ सकता है तो ये दोनों तो किशोर बच्चे हैं. ये भला अपनी मां के रोज होने वाले अपमान और तिरस्कार को नहीं पहचानेंगे क्या? कड़वी गोली पर लगी मिठास भला कितनी देर तक उस की असलियत को छिपा सकती है? दादी और पापा भी तो मां को सब के सामने घर की लक्ष्मी कहते नहीं थकते लेकिन रोली और रमण जानते हैं कि उन के घर में इस लक्ष्मी का असली आसन क्या है.

दादी को पता नहीं मां से क्या परेशानी है. मां सुबह जल्दी नहीं उठे तो उन्हें आलसी और कामचोर का तमगा दे दिया जाता है और जल्दी उठ जाए तो नींद खराब करने का ताना दे कर कोसा जाता है. केवल दादी ही नहीं बल्कि पापा भी उनकी हां में हां मिलाते हुए मम्मी को नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देते. और जब पापा ऐसा करते हैं तो दादी के चेहरे पर एक संतुष्टि भरी दर्प वाली मुसकान आ जाती है. बहुत बार रोली का मन करता कि वह मां की ढाल बन कर खड़ी हो जाए और दादी को पलट कर जवाब दे लेकिन मां उसे आंखों के इशारे से ऐसा करने से रोक देती है. पता नहीं मां की ऐसी कौनसी मजबूरी है जो वह यह सब बिना प्रतिकार किए सहन करती रहती है.

‘‘मैं तो एक पल के लिए भी नहीं सहन करूं. आप क्यों कभी कुछ नहीं बोलती?’’

कहती हुई रोली अकसर अपनी मां रत्ना को विरोध करने के लिए उकसाती लेकिन रत्ना उस की बात केवल सुन कर रह जाती. कहती कुछ भी नहीं.

ऐसा नहीं है कि रत्ना अनपढ़ या बदसूरत है जिस ने अपनी किसी कमी को ले कर कोई हीनग्रंथि पाल रखी है बल्कि खूबसूरत रत्ना तो इंग्लिश में मास्टर्स के साथसाथ बैचलर इन ऐजुकेशन भी है और उस की इसी योग्यता के कारण ही दादी ने उसे अपने क्लर्क बेटे के लिए चुना था. यह अलग बात है कि रत्ना ने अपनी पढ़ाई का उपयोग अपने बच्चों को स्कूल का होमवर्क करवाने के अलावा कभी अन्यत्र नहीं किया. हां, कभीकभार बच्चों की पीटीएम में जरूर उसे उस के पढ़ेलिखे होने का विशेष सम्मान मिलता था लेकिन वह एक क्षणिक अनुभूति होती थी जो घर जाते ही घर की मुरगी दाल बराबर हो जाती थी.

रोली और रमण अब बड़े हो चुके हैं. दोनों ही हाई स्कूल के विद्यार्थी हैं. जब तक बच्चे थे तब तक उन्हें मां का डांट खाना अजीब नहीं लगता था क्योंकि वे सम?ाते थे कि जिस तरह गलतियां करने पर उन दोनों को डांट या सजा मिलती है, उसी तरह मां को भी उन की किसी गलती के कारण ही प्रताडि़त किया जा रहा होगा लेकिन जैसेजैसे उन की समझ बढ़ती गई वे दोनों सम?ाने लगे कि मां को पड़ने वाली डांट और तिरस्कार का कारण उन की कोई गलती नहीं है बल्कि दादी को ऐसा करने पर एक आत्मिक संतोष मिलता है.

‘‘पता नहीं मां दादी और पापा का विरोध क्यों नहीं कर पाती जबकि वह तो स्वयं बहुत सक्षम है,’’ एक दिन रोली ने रमण से कहा.

‘‘तुझे याद है, बचपन में दादी वह हनुमानजी के समुद्र लांघने वाली कहानी सुनाया करती थी? हनुमानजी को अपनी ताकत का अनुमान नहीं था तब जामवंतजी ने उन्हें याद दिलाया था कि वे चाहें तो क्याक्या कर सकते हैं. मां भी नहीं जानती कि वी क्या कर सकती है,’’ कहते हुए रमण थोड़ा उदास था.

‘‘हां, याद है मुझे भी. लगता है मां को भी उन की शक्ति याद दिलानी पड़ेगी,’’ रोली ने उसे सामान्य करने के लिहाज से हंसते हुए कहा. बढ़ते बच्चे सब समझते हैं. अपनी सामर्थ्य के अनुसार विरोध भी दर्ज करवाते हैं लेकिन छोटा होने के कारण उन के विरोध को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता और फिर रत्ना स्वयं भी तो अपने पक्ष में नहीं खड़ी होती.

पिछले दिनों पड़ोस में एक नया परिवार रहने आया है. परिवार में पति राघव, पत्नी रिया के अलावा 7 वर्ष की एक बच्ची मीनू है. आमनेसामने फ्लैट होने के कारण रत्ना का अकसर रिया से टकराव हो जाता है. साथसाथ सब्जीराशन लातेलाते दोनों में ठीकठाक जानपहचान हो गई. मीनू तो रत्ना के फ्लैट का दरवाजा खुला देखते ही दौड़ कर उन के घर में घुसा जाती थी और फिर जब तक रिया उसे खींच कर वापस नहीं ले जाए तब तक वहीं टिकी रहती थी. अकेले बच्चे भी तो साथ ढूंढ़ते ही हैं और जब नहीं मिलता तो धीरेधीरे अपने अकेलेपन को ही अपना साथी बना लेते हैं. फिर बड़ों को यह शिकायत रहती है कि आजकल के बच्चे सोशल नहीं हैं.

रिया इस जानपहचान को मित्रता में बदलना चाहती थी लेकिन रत्ना अपनी सास और पति की अनुमति के बिना दोस्त बनाने का साहस भी कहां जुटा पाती थी. शादी से पहले कितना बड़ा दोस्तों का सर्किल था उस का. कुछ दोस्त तो शहर छूटने के साथ ही छूट गए लेकिन कुछ ने संपर्क बनाए रखा था. पति का शक्की स्वभाव और सास का बातबात पर ताने देना रत्ना खुद के लिए तो सहन कर भी ले लेकिन दोस्तों की अकारण बेइज्जती वह नहीं देख सकती थी इसलिए न चाहते हुए भी उस ने खुद पर अंकुश लगा रखा था.

मीनू इन सब दुनियावी ?ामेलों से दूर रत्ना के आसपास ही बने रहने की कोशिश करती. धीरेधीरे रत्ना का मन उस के साथ रमने लगा. अब तो मीनू बहुत अधिकार के साथ रत्ना से खाना भी मांग कर खाने लगी थी. रत्ना के लिए भी यह मीनू के बचपन के साथ अपने बच्चों के बचपन को दोबारा जीने का अवसर था जिसे वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. हां, सास को मीनू का व्यवस्थित घर को बिखेरना पसंद नहीं आता था लेकिन रत्ना मीनू के लौटते ही बहुत तत्परता के साथ सब बिखरा हुआ सामान यथास्थान रख कर मीनू को उन की नाराजगी से बचा लेती थी.

‘‘मीनू , चलो होमवर्क कर लो,’’ यह लगभग हर रोज सुनाई देने वाला वाक्य था जिस के बाद का दृश्य रत्ना के परिवार में सब को याद हो गया.

‘‘अब आंटी इस का हाथ पकड़ कर खींचेंगी और इस का गाना शुरू हो जाएगा,’’ कहती हुई रोली अपने मुंह से ऊं…ऊं… की आवाज निकाल कर मीनू की नकल करने लगती और सभी खिलखिला उठते.

एक दिन जब यही दृश्य दोहराया गया तो रत्ना से रहा नहीं गया और उसने मीनू का दूसरा हाथ अपनी तरफ खींच लिया, ‘‘रहने दो रिया, मैं करवा दूंगी इसे होमवर्क’’ रत्ना ने कहा तो रिया आश्चर्य में पड़ गई.

‘‘अरे दीदी, यह पूरी शैतान की नानी है. आप को प्रश्न पूछपूछ कर परेशान कर देगी,’’ रिया उस के प्रस्ताव को सुन कर थोड़ी खिसिया गई थी क्योंकि रत्ना के घर बारबार आनेजाने के कारण इतना अंदाजा तो उसे भी हो ही गया था कि दादी को मीनू का आना एक सीमा तक ही पसंद आता है.

‘‘कोई बात नहीं मैं देख लूंगी. तुम चिंता मत करो,’’ रत्ना ने उसे भरोसा दिलाते हुए कहा तो रिया कुछ देर खड़ी रह कर अपने घर चली गई.

रत्ना मीनू को ले कर बैठ गई और उसे होमवर्क कराने लगी. बीचबीच में रत्ना कोई मजेदार बात सुनाती तो पूरा घर मीनू की खिलखिलाहट से गूंज जाता.

रोली अपनी मां के इस नए रूप से आज पहली बार ही परिचित हो रही थी.

ऐसा नहीं है कि रत्ना ने उन्हें कभी होमवर्क नहीं कराया था लेकिन तब वह उसे केवल मां लगती थी वहीं आज रत्ना उसे एक प्रशिक्षित अध्यापिका लग रही थी.

कुछ ही देर में मीनू ने होमवर्क निबटा कर अपना बैग पैक कर लिया तो रत्ना उसे कल

आने का न्योता दे कर उस के घर के दरवाजे तक छोड़ आई.

‘‘अरे वाह मां. आप तो छिपी रुस्तम निकलीं. हमें तो पता ही नहीं था कि आप इतनी अच्छी तरह पढ़ा सकती है,’’ रमण ने रत्ना की तरफ गर्व से देखते हुए कहा.

‘‘पता क्यों नहीं है? क्या तुम लोगों को बचपन में होमवर्क कोई दूसरा कराता था?’’ रत्ना ने तारीफ को दरकिनार करते हुए कहा.

‘‘तब हम कहां ये सब जानते थे. तब तो किसी तरह काम निबटाओ और खेलने भागो… इतना ही सम?ा में आता था,’’ कहती हुई रोली भी बातों में शामिल हो गई.

‘‘मां, आप बच्चों को ट्यूशन क्यों नहीं पढ़ातीं? जिस समय मीनू को पढ़ाया उस समय तो रोज आप खाली ही रहती हो,’’ रमण भी उत्साह से भरा हुआ था. शायद भीतर कहीं न कहीं अपनी मां को आत्मनिर्भर देखने की चाह सिर उठाने लगी थी.

‘‘नहीं रे. एक दिन की बात अलग है और रोज की बात अलग. मुझे कहां इतनी फुरसत रोज मिलने वाली है,’’ कहते हुए रत्ना ने रमण के आग्रह को अनसुना कर दिया.

मीनू रोज तय समय पर आती और रत्ना के साथ मस्ती करते हुए अपना होमवर्क करती.

एक दिन मीनू ने बताया कि 2 दिन बाद उस के मिड टर्म ऐग्जाम हैं और उसे 5 फलों और सब्जियों के नाम याद कर के ले जाने हैं. बहुत कोशिश करने के बाद भी याद नहीं हो रहे. कभी कोई भूल जाती है तो कभी कोई.

‘‘बस, इतनी सी बात. लो, आप को याद करने का बहुत ही आसान सा तरीका बताते हैं. हम ऐल्फाबेट से शुरू करते हैं. जैसे ऐ फार ऐप्पल, ऐप्रीकाट, बी फार बनाना, सी फार चीकू, चेरी और कोकोनट. ये लो, 3 ऐल्फाबेट में ही सिक्स फू्रट याद हो गए,’’ रत्ना ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अरे वाह आंटी. यह तो बहुत मजेदार है. ऐसे तो मैं सब्जियों के नाम भी याद कर सकती हूं और कलर्स के भी,’’ मीनू खुशी से उछलने लगी.

रोली को भी मां की यह ट्रिक बहुत अच्छी लगी. उसे याद आया कि बचपन में मां द्वारा सिखाई गई इसी तरह की ट्रिक्स के कारण दोनों भाईबहन को कभी पहाड़े और फौर्मूले याद करने में दिक्कत नहीं आई थी.

मीनू बहुत खुश थी और रिया भी. इस बार मीनू  को हर बार से अधिक मार्क्स मिले थे और वे भी बिना किसी मानसिक दबाव के. 2 दिन बाद जब मीनू रत्ना के घर आई तब उस के साथ उस की एक सहेली वन्या भी थी.

‘‘आंटी, आज ये भी मेरे साथ टेबल्स लर्न करेगी,’’ मीनू के स्वर में थोड़ा आग्रह भी था.

रत्ना ने मुसकरा कर इजाजत दे दी. रत्ना ने पहले दोनों बच्चियों से थ्री की टेबल सुनाने के लिए कहा जिसे दोनों ने ही अटकअटक कर सुनाया. अब रत्ना ने उसी पहाड़े को कविता की तरह लय में गा कर सुनाया. 1-2 बार के अभ्यास के बाद मीनू और वन्या ने बहुत आसानी के साथ पहाड़ा याद कर लिया. दोनों के चेहरों पर जीत की खुशी जैसा उजास था.

रात को रत्ना ने सुना, दादी भी धीरेधीरे उसी लय के साथ तीन का पहाड़ा गुनगुना रही थी. रत्ना के होठों पर मुस्कराहट तैर गई.

धीरेधीरे मीनू के दोस्तों की संख्या बढ़ने लगी. अब तो दोपहर बाद 4 बजे मीनू सहित 5 बच्चे रत्ना के पास आ जाते हैं. सब की मम्मियों की जिद के बाद नानुकुर करते हुए रत्ना ने सब से नाममात्र की फीस लेनी शुरू  कर दी. पहली बार जब रिया ने सब बच्चों की फीस के रूप में दस हजार रुपए रत्ना के हाथ में थमाए तो उस के हाथ कांपने लगे. यों तो हर महीने पति उसे घर खर्च के लिए रुपए देते ही हैं लेकिन अपनी कमाई की खुशी क्या होती है यह उसे आज पहली बार महसूस हुआ. रत्ना ने खीर बना कर खुशी सब के साथ साझा की.

‘‘पूरे महीने दिमाग खपा कर यह कमाई की है क्या?’’ सास ने ताना कसा. पति ने भी कोई खास खुशी जाहिर नहीं की. रत्ना उदास होती इस से पहले ही रोली और रमण ने उसे फूलों का एक गुलदस्ता भेंट कर के उस की मुसकराहट को जाया होने से बचा लिया.

रत्ना ने अब विधिवत अपने घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. देखते ही देखते उस के पास आसपास के बहुत से बच्चे आने लगे. शाम के समय बच्चे अधिक होने के कारण उस ने घर के काम में मदद के लिए एक सहायिका को रख लिया. सास ने कुछ दिन तो मुंह चढ़ाए रखा लेकिन जब देखा कि रत्ना अब रुकने वाली नहीं है तो उन्होंने भी समय के साथ समझौता कर लिया.

सबकुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन रत्ना की सहेली माया उस से मिलने आई. माया की उदास रंगत देख कर रत्ना ने पहचान लिया कि अवश्य कोई गंभीर मसला है. चायपानी के साथ थोड़ा कुरेदने के बाद माया ने जो बताया वह वाकई चिंताजनक था.

‘‘2 साल पहले बेटी की शादी की थी. बेचारी तुम्हारी तरह पूरा दिन घर में खटती है लेकिन उस के किए को जस नहीं. सास तो सास, पति भी खुश नहीं रहता. बिलकुल तेरी सी ही कहानी है,’’ कहते हुए माया ने ठंडी सांस भरी.

‘‘जब कहानी की शुरुआत मेरी जैसी ही है तो घबरा क्यों रही है? इस कहानी का अंत भी मेरे जैसा ही करते हैं न,’’ रत्ना ने मुसकुरा कर कहा.

माया कुछ समझ नहीं. वह उस का चेहरा पढ़ने की कोशिश करने लगी.

‘‘जैसे मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई, वैसे ही उसे भी करते हैं न. तू उसे मेरे पास भेज देना. बहुत से बच्चे आते हैं मेरे पास. बहुतों को मना करना पड़ता था. अब नहीं करना पड़ेगा. बिटिया के हाथ को काम मिल जाएगा और मुझे थोड़ी राहत. आत्मनिर्भर बनेगी तो आत्मविश्वास भी आएगा और तब वह अपने हक में कोई भी कठोर निर्णय ले सकती है. अपने पैरों पर खड़ी स्त्री खुद के लिए भी आदर्श होती है. समझ?’’ रत्ना ने माया को सम?ाया तो माया के चेहरे पर भी भविष्य को ले कर उम्मीद की रोशनी चमकने लगी. रत्ना ने देखा उस की सास उन की बातें सुन रही थीं.

‘‘सही कह रही है रत्ना. भले ही मैं बोल कर नहीं कहती लेकिन जबसे यह अपने पैरों पर खड़ी हुई है, मुझे भी अच्छा लगता है. मेरे मन में इस के लिए इज्जत बढ़ गई है. पहले तो लगता था कि यह मेरे बेटे की कमाई पर पल रही है इसलिए मैं भी इसे 2 बातें सुना दिया करती थी. जानती थी कि बुरा मान भी लेगी तो जाएगी कहां? रहना तो इसे इसी घर में पड़ेगा लेकिन अब तो मैं भी इसे कुछ कहने से पहले 4 बार सोचती हूं. अपने पैरों पर खड़ी है, कहीं गुस्से में आ कर घर छोड़ दिया तो? न बाबा न. बुढ़ापे में मैं अब कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती,’’ सास ने झिझकते हुए अपनी सचाई को स्वीकार किया.

रत्ना उन के इस रूप को आश्चर्य से देख रही थी. तभी मीनू अपने दोस्तों के साथ 7 की टेबल को कविता की तरह गाते हुए अंदर घुसी. बच्चों को इस तरह खेलखेल में पढ़ाई करते हुए देखकर तीनों महिलाएं मुसकरा दीं.

रोली और रमण को आज रत्ना वैसी ही लग रही थी जैसी वे उसे बरसों से देखना चाहते थे.

Hindi Story : दाग का सच – क्या था ललिया के कपड़ों में दाग का सच

Hindi Story :  पूरे एक हफ्ते बाद आज शाम को सुनील घर लौटा. डरतेडरते डोरबैल बजाई. बीवी ललिया ने दरवाजा खोला और पूछा, ‘‘हो गई फुरसत तुम्हें?’’

‘‘हां… मुझे दूसरे राज्य में जाना पड़ा था न, सो…’’ ‘‘चलिए, मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

ललिया के रसोईघर में जाते ही सुनील ने चैन की सांस ली. पहले तो जब सुनील को लौटने में कुछ दिन लग जाते थे तो ललिया का गुस्सा देखने लायक होता था मानो कोई समझ ही नहीं कि आखिर ट्रांसपोर्टर का काम ही ऐसा. वह किसी ड्राइवर को रख तो ले, पर क्या भरोसा कि वह कैसे चलाएगा? क्या करेगा?

और कौन सा सुनील बाकी ट्रक वालों की तरह बाहर जा कर धंधे वालियों के अड्डे पर मुंह मारता है. चाहे जितने दिन हो जाएं, घर से ललिया के होंठों का रस पी कर जो निकलता तो दोबारा फिर घर में ही आ कर रसपान करता, लेकिन कौन समझाए ललिया को. वह तो इधर 2-4 बार से इस की आदत कुछकुछ सुधरी हुई है. तुनकती तो है, लेकिन प्यार दिखाते हुए.

चाय पीते समय भी सुनील को घबराहट हो रही थी. क्या पता, कब माथा सनक उठे. माहौल को हलका बनाने के लिए सुनील ने पूछा, ‘‘आज खाने में क्या बना रही हो?’’

‘‘लिट्टीचोखा.’’ ‘‘अरे वाह, लिट्टीचोखा… बहुत बढि़या तब तो…’’

‘‘हां, तुम्हारा मनपसंद जो है…’’ ‘‘अरे हां, लेकिन इस से भी ज्यादा मनपसंद तो…’’ सुनील ने शरारत से ललिया को आंख मारी.

‘‘हांहां, वह तो मेरा भी,’’ ललिया ने भी इठलाते हुए कहा और रसोईघर में चली गई. खाना खाते समय भी बारबार सुनील की नजर ललिया की छाती पर चली जाती. रहरह कर ललिया के हिस्से से जूठी लिट्टी के टुकड़े उठा लेता जबकि दोनों एक ही थाली में खा रहे थे.

‘‘अरे, तुम्हारी तरफ इतना सारा रखा हुआ है तो मेरा वाला क्यों ले रहे हो?’’ ‘‘तुम ने दांतों से काट कर इस को और चटपटा जो बना दिया है.’’

‘‘हटो, खाना खाओ पहले अपना ठीक से. बहुत मेहनत करनी है आगे,’’ ललिया भी पूरे जोश में थी. दोनों ने भरपेट खाना खाया. ललिया बरतन रखने चली गई और सुनील पिछवाड़े जा कर टहलने लगा. तभी उस ने देखा कि किसी की चप्पलें पड़ी हुई थीं.

‘‘ये कुत्ते भी क्याक्या उठा कर ले आते हैं,’’ सुनील ने झल्ला कर उन्हें लात मार कर दूर किया और घर में घुस कर दरवाजा बंद कर लिया. सुनील बैडरूम में पहुंचा तो ललिया टैलीविजन देखती मिली. वह मच्छरदानी लगाने लगा.

‘‘दूध पीएंगे?’’ ललिया ने पूछा. ‘‘तो और क्या बिना पीए ही रह जाएंगे,’’ सुनील भी तपाक से बोला.

ललिया ने सुनील का भाव समझ कर उसे एक चपत लगाई और बोली, ‘‘मैं भैंस के दूध की बात कर रही हूं.’’

‘‘न… न, वह नहीं. मेरा पेट लिट्टीचोखा से ही भर गया है,’’ सुनील ने कहा. ‘‘चलो तो फिर सोया जाए.’’

ललिया टैलीविजन बंद कर मच्छरदानी में आ गई. बत्ती तक बुझाने का किसी को होश नहीं रहा. कमरे का दरवाजा भी खुला रह गया जैसे उन को देखदेख कर शरमा रहा था. वैसे भी घर में उन दोनों के अलावा कोई रहता नहीं था.

सुबह 7 बजे सुनील की आंखें खुलीं तो देखा कि ललिया बिस्तर के पास खड़ी कपड़े पहन रही थी. ‘‘एक बार गले तो लग जाओ,’’ सुनील ने नींद भरी आवाज में कहा.

‘‘बाद में लग लेना, जरा जल्दी है मुझे बाथरूम जाने की…’’ कहते हुए ललिया जैसेतैसे अपने बालों का जूड़ा बांधते हुए वहां से भाग गई. सुनील ने करवट बदली तो ललिया के अंदरूनी कपड़ों पर हाथ पड़ गया.

ललिया के अंदरूनी कपड़ों की महक सुनील को मदमस्त कर रही थी.

सुनील ललिया के लौटने का इंतजार करने लगा, तभी उस की नजर ललिया की पैंटी पर बने किसी दाग पर गई. उस का माथा अचानक से ठनक उठा. ‘‘यह दाग तो…’’

सुनील की सारी नींद झटके में गायब हो चुकी थी. वह हड़बड़ा कर उठा और ध्यान से देखने लगा. पूरी पैंटी पर कई जगह वैसे निशान थे. ब्रा का मुआयना किया तो उस का भी वही हाल था. ‘‘कल रात तो मैं ने इन का कोई इस्तेमाल नहीं किया. जो भी करना था सब तौलिए से… फिर ये…’’

सुनील का मन खट्टा होने लगा. क्या उस के पीछे ललिया के पास कोई…? क्या यही वजह है कि अब ललिया उस के कई दिनों बाद घर आने पर झगड़ा नहीं करती? नहींनहीं, ऐसे ही अपनी प्यारी बीवी पर शक करना सही नहीं है. पहले जांच करा ली जाए कि ये दाग हैं किस चीज के. सुनील ने पैंटी को अपने बैग में छिपा दिया, तभी ललिया आ गई, ‘‘आप उठ गए… मुझे देर लग गई थोड़ी.’’

‘‘कोई बात नहीं,’’ कह कर सुनील बाथरूम में चला गया. जब वह लौटा तो देखा कि ललिया कुछ ढूंढ़ रही थी.

‘‘क्या देख रही हो?’’ ‘‘मेरी पैंटी न जाने कहां गायब हो गईं. ब्रा तो पहन ली है मैं ने.’’

‘‘चूहा ले गया होगा. चलो, नाश्ता बनाओ. मुझे आज जल्दी जाना है,’’ सुनील ने उस को टालने के अंदाज में कहा. ललिया भी मुसकरा उठी. नाश्ता कर सुनील सीधा अपने दोस्त मुकेश के पास पहुंचा. उस की पैथोलौजी की लैब थी.

सुनील ने मुकेश को सारी बात बताई. उस की सांसें घबराहट के मारे तेज होती जा रही थीं. ‘‘अरे, अपना हार्टफेल करा के अब तू मर मत… मैं चैक करता हूं.’’

सुनील ने मुकेश को पैंटी दे दी. ‘‘शाम को आना. बता दूंगा कि दाग किस चीज का है,’’ मुकेश ने कहा.

सुनील ने रजामंदी में सिर हिलाया और वहां से निकल गया. दिनभर पागलों की तरह घूमतेघूमते शाम हो गई. न खाने का होश, न पीने का. वह धड़कते दिल से मुकेश के पास पहुंचा.

‘‘क्या रिपोर्ट आई?’’ मुकेश ने भरे मन से जवाब दिया, ‘‘यार, दाग तो वही है जो तू सोच रहा है, लेकिन… अब इस से किसी फैसले पर तो…’’

सुनील जस का तस खड़ा रह गया. मुकेश उसे समझाने के लिए कुछकुछ बोले जा रहा था, लेकिन उस का माथा तो जैसे सुन्न हो चुका था. सुनील घर पहुंचा तो ललिया दरवाजे पर ही खड़ी मिली.

‘‘कहां गायब थे दिनभर?’’ ललिया परेशान होते हुए बोली. ‘‘किसी से कुछ काम था,’’ कहता हुआ सुनील सिर पकड़ कर पलंग पर बैठ गया.

‘‘तबीयत तो ठीक है न आप की?’’ ललिया ने सुनील के पास बैठ कर उस के कंधे पर हाथ रखा. ‘‘सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है.’’

‘‘बैठिए, मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ कहते हुए ललिया रसोईघर में चली गई. सुनील ने ललिया की पैंटी को गद्दे के नीचे दबा दिया.

चाय पी कर वह बिस्तर पर लेट गया. रात को ललिया खाना ले कर आई और बोली, ‘‘अजी, अब आप मुझे भी मार देंगे. बताओ तो सही, क्या हुआ? ज्यादा दिक्कत है, तो चलो डाक्टर के पास ले चलती हूं.’’

‘‘कुछ बात नहीं, बस एक बहुत बड़े नुकसान का डर सता रहा है,’’ कह कर सुनील खाना खाने लगा. ‘‘अपना खयाल रखो,’’ कहते हुए ललिया सुनील के पास आ कर बैठ गई.

सुनील सोच रहा था कि ललिया का जो रूप अभी उस के सामने है, वह उस की सचाई या जो आज पता चली वह है. खाना खत्म कर वह छत पर चला गया. ललिया नीचे खाना खाते हुए आंगन में बैठी उस को ही देख रही थी.

सुनील का ध्यान अब कल रात पिछवाड़े में पड़ी चप्पलों पर जा रहा था. वह सोचने लगा, ‘लगता है वे चप्पलें भी इसी के यार की… नहीं, बिलकुल नहीं. ललिया ऐसी नहीं है…’ रात को सुनील ने नींद की एक गोली खा ली, पर नींद की गोली भी कम ताकत वाली निकली.

सुनील को खीज सी होने लगी. पास में देखा तो ललिया सोई हुई थी. यह देख कर सुनील को गुस्सा आने लगा, ‘मैं जान देदे कर इस के सुख के लिए पागलों की तरह मेहनत करता हूं और यह अपना जिस्म किसी और को…’ कह कर वह उस पर चढ़ गया.

ललिया की नींद तब खुली जब उस को अपने बदन के निचले हिस्से पर जोर महसूस होने लगा. ‘‘अरे, जगा देते मुझे,’’ ललिया ने उठते ही उस को सहयोग करना शुरू किया, लेकिन सुनील तो अपनी ही धुन में था. कुछ ही देर में दोनों एकदूसरे के बगल में बेसुध लेटे हुए थे.

ललिया ने अपनी समीज उठा कर ओढ़ ली. सुनील ने जैसे ही उस को ऐसा करते देखा मानो उस पर भूत सा सवार हो गया. वह झटके से उठा और समीज को खींच कर बिस्तर के नीचे फेंक दिया और फिर से उस के ऊपर आ गया.

‘‘ओहहो, सारी टैंशन मुझ पर ही उतारेंगे क्या?’’ ललिया आहें भरते हुए बोली. सुनील के मन में पल रही नाइंसाफी की भावना ने गुस्से का रूप ले लिया था.

ललिया को छुटकारा तब मिला जब सुनील थक कर चूर हो गया. गला तो ललिया का भी सूखने लगा था, लेकिन वह जानती थी कि उस का पति किसी बात से परेशान है.

ललिया ने अपनेआप को संभाला और उठ कर थोड़ा पानी पीने के बाद उसी की चिंता करतेकरते कब उस को दोबारा नींद आ गई, कुछ पता न चला. ऐसे ही कुछ दिन गुजर गए. हंसनेहंसाने वाला सुनील अब बहुत गुमसुम रहने लगा था और रात को तो ललिया की एक न सुनना मानो उस की आदत बनती जा रही थी.

ललिया का दिल किसी अनहोनी बात से कांपने लगा था. वह सोचने लगी थी कि इन के मांपिताजी को बुला लेती हूं. वे ही समझा सकते हैं कुछ. एक दिन ललिया बाजार गई हुई थी. सुनील छत पर टहल रहा था. शाम होने को थी. बादल घिर आए थे. मन में आया कि फोन लगा कर ललिया से कहे कि जल्दी घर लौट आए, लेकिन फिर मन उचट गया.

थोड़ी देर बाद ही सुनील ने सोचा, ‘कपड़े ही ले आता हूं छत से. सूख गए होंगे.’ सुनील छत पर गया ही था कि देखा पड़ोसी बीरबल बाबू के किराएदार का लड़का रंगवा जो कि 18-19 साल का होगा, दबे पैर उस की छत से ललिया के अंदरूनी कपड़े ले कर अपनी छत पर कूद गया. शायद उसे पता नहीं था कि घर में कोई है, क्योंकि ललिया उस के सामने बाहर गई थी.

यह देख कर सुनील चौंक गया. उस ने पूरी बात का पता लगाने का निश्चय किया. वह भी धीरे से उस की छत पर उतरा और सीढि़यों से नीचे आया. नीचे आते ही उस को एक कमरे से कुछ आवाजें सुनाई दीं.

सुनील ने झांक कर देखा तो रंगवा अपने हमउम्र ही किसी गुंडे से दिखने वाले लड़के से कुछ बातें कर रहा था. ‘‘अबे रंगवा, तेरी पड़ोसन तो बहुत अच्छा माल है रे…’’

‘‘हां, तभी तो उस की ब्रापैंटी के लिए भटकता हूं,’’ कह कर वह हंसने लगा. इस के बाद सुनील ने जो कुछ देखा, उसे देख कर उस की आंखें फटी रह गईं. दोनों ने ललिया के अंदरूनी कपड़ों पर अपना जोश निकाला और रंगवा बोला, ‘‘अब मैं वापस उस की छत पर रख आता हूं… वह लौटने वाली होगी.’’

‘‘अबे, कब तक ऐसे ही करते रहेंगे? कभी असली में उस को…’’ ‘‘मिलेगीमिलेगी, लेकिन उस पर तो पतिव्रता होने का फुतूर है. वह किसी से बात तक नहीं करती. पति के बाहर जाते ही घर में झाड़ू भी लगाने का होश नहीं रहता उसे, न ही बाल संवारती है वह. कभी दबोचेंगे रात में उसे,’’ रंगवा कहते हुए कमरे के बाहर आने लगा.

सुनील जल्दी से वापस भागा और अपनी छत पर कूद के छिप गया. रंगवा भी पीछे से आया और उन गंदे किए कपड़ों को वापस तार पर डाल कर भाग गया.

सुनील को अब सारा मामला समझ आ गया था. रंगवा इलाके में आएदिन अपनी घटिया हरकतों के चलते थाने में अंदरबाहर होता रहता था. उस के बुरे संग से उस के मांबाप भी परेशान थे. सुनील को ऐसा लग रहा था जैसे कोई अंदर से उस के सिर पर बर्फ रगड़ रहा है. उस का मन तेजी से पिछली चिंता से तो हटने लगा, लेकिन ललिया की हिफाजत की नई चुनौती ने फिर से उस के माथे पर बल ला दिया. उस ने तत्काल यह जगह छोड़ने का निश्चय कर लिया.

ललिया भी तब तक लौट आई. आते ही वह बोली, ‘‘सुनिए, आप की मां को फोन कर देती हूं. वे समझाएंगी अब आप को.’’ सुनील ने उस को सीने से कस कर चिपका लिया, ‘‘तुम साथ हो न, सब ठीक है और रहेगा…’’

‘‘अरे, लेकिन आप की यह उदासी मुझ से देखी नहीं जाती है अब…’’ ‘‘आज के बाद यह उदासी नहीं दिखेगी… खुश?’’

‘‘मेरी जान ले कर ही मानेंगे आप,’’ बोलतेबोलते ललिया को रोना आ गया.

यह देख कर सुनील की आंखों से भी आंसू छलकने लगे थे. वह सिसकते हुए बोला, ‘‘अब मैं ड्राइवर रख लूंगा और खुद तुम्हारे पास ज्यादा से ज्यादा समय…’’ प्यार उन के चारों ओर मानो नाच करता फिर से मुसकराने लगा था.

सूनी आंखें: जब महामारी ने कर दिया पति पत्नी को अलग

सुबह के समय अरुण ने पत्नी सीमा से कहा,”आज मुझे दफ्तर जरा जल्दी जाना है. मैं जब तक तैयार होता हूं तुम तब तक लंच बना दो ब्रेकफास्ट भी तैयार कर दो, खा कर जाऊंगा.”

बिस्तर छोड़ते हुए सीमा तुनक कर बोली,”आरर… आज ऐसा कौन सा काम है जो इतनी जल्दी मचा रहे हैं.”अरुण ने कहा,”आज सुबह 11 बजे  जरूरी मीटिंग है. सभी को समय पर बुलाया है.”

“ठीक है जी, तुम तैयार हो जाओ. मैं किचन देखती हूं,” सीमा मुस्कान बिखेरते हुए बोली.अरुण नहाधो कर तैयार हो गया और ब्रेकफास्ट मांगने लगा, क्योंकि उस के दफ्तर जाने का समय हो चुका था, इसलिए वह जल्दबाजी कर रहा था.

गैराज से कार निकाली और सड़क पर फर्राटा भर अरुण  समय पर दफ्तर पहुंच गया. दफ्तर के कामों से फुरसत पा कर अरुण आराम से कुरसी पर बैठा था, तभी दफ्तर के दरवाजे पर एक अनजान औरत खड़ी अजीब नजरों से चारों ओर देख रही थी.

चपरासी दीपू के पूछने पर उस औरत ने बताया कि वह अरुण साहब से मिलना चाहती है. उस औरत को वहां रखे सोफे पर बिठा कर चपरासी दीपू अरुण को बताने चला गया.

‘‘साहब, दरवाजे पर एक औरत खड़ी है, जो आप से मिलना चाहती है,’’ दीपू ने अरुण से कहा.‘‘कौन है?’’ अरुण ने पूछा.‘‘मैं नहीं जानता साहब,’’ दीपू ने जवाब दिया.

‘‘बुला लो. देखें, किस काम से आई है?’’ अरुण ने कहा.चपरासी दीपू उस औरत को अरुण के केबिन तक ले गया.केबिन खोलने के साथ ही उस अजनबी औरत ने अंदर आने की इजाजत मांगी.

अरुण के हां कहने पर वह औरत अरुण के सामने खड़ी हो गई. अरुण ने उस औरत को बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘बताइए, मैं आप के लिए क्या कर सकता हूं?”

“सर, मेरा नाम संगीता है. मेरे पति सुरेश आप के दफ्तर में काम करते हैं.” अरुण बोला,”जी, ऑफिस के बहुत से काम वे देखते हैं. उन के बिना कई काम रुके हुए हैं.”

अरुण ने चपरासी दीपू को बुला कर चाय लाने को कहा.चपरासी दीपू टेबल पर पानी रख गया और चाय लेने चला गया.कुछ देर बाद ही चपरासी दीपू चाय ले आया.

चाय की चुस्की लेते हुए अरुण पूछने लगा, ” कहो, कैसे आना हुआ?’’‘‘मैं बताने आई थी कि मेरे पति सुरेश की तबीयत आजकल ठीक नहीं रहती है, इसलिए वे कुछ दिनों के लिए दफ्तर नहीं आ सकेंगे.”

“क्या हुआ सुरेश को,” हैरान होते हुए अरुण बोला”डाक्टर उन्हें अजीब सी बीमारी बता रहे हैं. अस्पताल से उन्हें आने ही नहीं दे रहे,”संगीता रोने वाले अंदाज में बोली.

संगीता को रोता हुआ देख कर अरुण बोला, “रोइए नहीं. पूरी बात बताइए कि उन को यह बीमारी कैसे लगी?””कुछ दिनों से ये लगातार गले में दर्द बता रहे थे, फिर तेज बुखार आया. पहले तो पास के डाक्टर से इलाज कराया, पर जब कोई फायदा न हुआ तो सरकारी अस्पताल चले गए.

“सरकारी अस्पताल में डाक्टर को दिखाया तो देखते ही उन्हें भर्ती कर लिया गया. “ये तो समझ ही नहींपाए कि इन के साथ हो क्या गया है?””जब अस्पताल से इन का फोन आया तो मैं भी सुन कर हैरान रह गई,” संगीता ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा.

“अभी वे अस्पताल में ही हैं,” संगीता से अरुण ने पूछा.”जी,” संगीता ने जवाब दिया.अरुण यह सुन कर परेशान हो गया. सुरेश का काम किसी और को देने के लिए चपरासी दीपू से कहा.

अरुण ने सुरेश की पत्नी संगीता को समझाते हुए कहा कि तुम अब बिलकुल चिंता न करो. घर जाओ और बेफिक्र रहो, उन्हें कुछ नहीं होगा.संगीता अरुण से आश्वस्त हो कर घर आ गई और उसे भी घर आने के लिए कहा. अरुण ने भी जल्द समय निकाल कर घर आने के लिए कहा.

“सर, कुछ कहना चाहती हूं,” कुर्सी से उठते समय संगीता ने झिझकते हुए पूछा.”हां, हां, कहिए, क्या कहना चाहती हैं आप,” अरुण ने संगीता की ओर देखते हुए कहा.”जी, मुझे कुछ पैसों की जरूरत है. इन की तनख्वाह मिलने पर काट लेना,” संगीता ने सकुचाते हुए कहा.

“बताइए, कितने पैसे चाहिए?” अरुण ने पूछा.”जी, 20 हजार रुपए चाहिए थे…” संगीता संकोच करते हुए बोली.”अभी तो इतने पैसे नहीं है, आप कलपरसों में आ कर ले जाना,” अरुण ने कहा. “ठीक है,” यह सुन कर संगीता का   उदास चेहरा हो गया.

“आप जरा भी परेशान न होइए. मैं आप को पैसे दे दूंगा,” संगीता के उदास चेहरे को देख कर कहा.अरुण के दफ्तर से निकलने का समय हो चुका था, इसलिए संगीता भी अपने घर लौट आई.

अगले दिन दफ्तर के काम जल्द निबटा कर अरुण कुछ सोच में डूबा था, तभी उस के मन में अचानक ही सुरेश की पत्नी संगीता की पैसों वाली बात याद आ गई.2 दिन बाद ही संगीता अरुण के दफ्तर पहुंची. चपरासी दीपू ने चायपानी ला कर दी.

अरुण ने सुरेश की तबीयत के बारे में जानना चाहा. संगीता आंखों में आंसू लाते हुए बोली,”वहां तो अभी वे ठीक नहीं हैं. मैं अस्पताल गई थी, पर वहां किसी को मिलने नहीं दे रहे.”

“क्या…” अरुण हैरानी से बोला.”अस्पताल वाले कहते हैं, जब वे ठीक हो जाएंगे तो खुद ही घर आ जाएंगे.”यह जान कर अरुण हैरान हो गया कि अस्पताल वाले किसी से मिलने नहीं दे रहे. वह आज शाम को उस से मिलने जाने वाला था.

अरुण ने संगीता को 20 हजार के बजाय 30 हजार रुपए दिए और कहा कि और भी पैसे की जरूरत हो तो बताना.संगीता पैसे ले कर घर लौट आई. 21 मार्च की शाम जब अरुण हाथपैर धो कर बिस्तर पर बैठा, तभी उस की पत्नी सीमा चाय ले आई और बताने लगी कि रात 8 बजे रास्ट्र के नाम संदेश आएगा.

अरुण टीवी खोल कर तय समय पर बैठ गया. मोदी का संदेश सुनने के बाद अरुण ने पत्नी सीमा को अगले दिन रविवार को जनता कर्फ्यू के बारे में बताया कि घर से किसी को बाहर नहीं निकलना है. साथ ही, यह भी बताया कि शाम 5 बजे अपनेअपने घरों से बाहर निकल कर थाली या बरतन, कुछ भी बजाएं.

उस दिन शाम को जब पड़ोसी ने घर से बाहर निकल थाली बजाई तो अरुण भी शोर सुन कर बाहर आया. पत्नी सीमा भी खुश होते हुए थाली हाथ में लिए बाहर जोरजोर से बजाने लगी. उसे देख अरुण भी खुश हुआ.

सोमवार 23 मार्च को अरुण किसी जरूरी काम के निकल आने की वजह से ऑफिस नहीं गया.उसी दिनशाम को फिर से रास्ट्र के नाम संदेश आया. 21 दिनों के लॉक डाउन की खबर से वह भी हैरत में पड़ गया.

अगले दिन किसी तरह अरुण ऑफिस गया और जल्दी से सारे काम निबटा कर घर आ गया.घर पर अरुण ने सीमा को ऑफिस में साथ काम करने वाले सुरेश के बारे में बताया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है.

अगले दिन सड़क पर सख्ती होने से अरुण दफ्तर न जा सका. लॉक डाउन होने की वजह से अरुण घर में रहने को विवश था.इधर जब सुरेश को कोरोना होने की तसदीक हो गई तो संगीता के घर को क्वारन्टीन कर दिया. अब वह घर से जरा भी बाहर नहीं निकल सकती थी.

उधर क्वारन्टीन होने के कुछ दिन बाद ही अस्पताल से सुरेश के मरने की खबर आई तो क्वारन्टीन होने की वजह से वह घर से निकल नहीं सकती थी.

संगीता को अस्पताल वालों ने फोन पर ही सुरेश की लाश न देने की वजह बताई. वजह यह कि ऐसे मरीजों को वही लोग जलाते हैं ताकि किसी और को यह बीमारी न लगे.

यह सुन कर संगीता घर में ही दहाड़े मारते हुए गश खा कर गिर पड़ी. ऑफिस में भी सुरेश के मरने की खबर भिजवाई गई, पर ऑफिस बंद होने से किसी ने फोन नहीं उठाया.जब लॉक डाउन हटा तो अरुण यों ही संगीता के दिए पते पर घर पहुंच गया.

अरुण ने सुरेश के घर का दरवाजा खटखटाया तो संगीता ने ही खोला.संगीता को देख अरुण मुस्कुराते हुए बोला, “कैसे हैं सुरेश? उस की तबीयत पूछने चला आया.”संगीता ने अंदर आने के लिए कहा, तो वह संगीता के पीछेपीछे चल दिया.

कमरे में अरुण को बिठा कर संगीता चाय बनाने किचन में चली गई. कमरे का नजारा देख अरुण  हैरत में पड़ गया क्योंकि सुरेश की तसवीर पर फूल चढ़े हुए थे, अरुण समझ गया कि सुरेश अब नहीं रहा.

संगीता जब चाय लाई तो अरुण ने हैरानी से संगीता से पूछा तो उस ने रोते हुए बताया कि ये तो 30 मार्च को ही चल बसे थे. अस्पताल से खबर आई थी. मुझे तो क्वारन्टीन कर दिया गया. फोन पर ही अस्पताल वालों ने लाश देने से मना कर दिया.

क्या करती,घर में फूटफूट कर रोने के सिवा.अरुण ने गौर किया कि सुरेश की फोटो के पास ही पैसे रखे थे, जो उस ने संगीता को दिए थे.संगीता ने उन पैसों की ओर देखा और अरुण ने संगीता की इन सूनी आंखों में  देखा. थके कदमों से अरुण वहां से लौट आया.इन सूनी आंखों में अरुण को जाते देख  संगीता की आंखों में आंसू आ गए.

Family Drama : बहूबेटी – क्यों बदल गए सपना की मां के तेवर

Family Drama : जब से वे सपना की शादी कर के मुक्त हुईं तब से हर समय प्रसन्नचित्त दिखाई देती थीं. उन के चेहरे से हमेशा उल्लास टपकता रहता था. महरी से कोई गलती हो जाए, दूध वाला दूध में पानी अधिक मिला कर लाए अथवा झाड़ पोंछे वाली देर से आए, सब माफ था. अब वे पहले की तरह उन पर बरसती नहीं थीं. जो भी घर में आता, उत्साह से उसे सुनाने बैठ जातीं कि उन्होंने कैसे सपना की शादी की, कितने अच्छे लोग मिल गए, लड़का बड़ा अफसर है, देखने में राजकुमार जैसा. फिर भी एक पैसा दहेज का नहीं लिया. ससुर तो कहते थे कि आप की बेटी ही लक्ष्मी है और क्या चाहिए हमें. आप की दया से घर में सब कुछ तो है, किसी बात की कमी नहीं. बस, सुंदर, सुसंस्कृत व सुशील बहू मिल गई, हमारे सारे अरमान पूरे हो गए. शादी के बाद पहली बार जब बेटी ससुराल से आई तो कैसे हवा में उड़ी जा रही थी. वहां के सब हालचाल अपने घर वालों को सुनाती, कैसे उस की सास ने इतने दिनों पलंग से नीचे पांव ही नहीं धरने दिया. वह तो रानियों सी रही वहां. घर के कामों में हाथ लगाना तो दूर, वहां तो कभी मेहमान अधिक आ जाते तो सास दुलार से उसे भीतर भेजती हुई कहती, ‘‘बेचारी सुबह से पांव लगतेलगते थक गई, नातेरिश्तेदार क्या भागे जा रहे हैं कहीं. जा, बैठ कर आराम कर ले थोड़ी देर.’’

और उस की ननद अपनी भाभी को सहारा दे कर पलंग पर बैठा आती. यह सब जब उन्होंने सुना तो फूली नहीं समाईं. कलेजा गज भर का हो गया. दिन भर चाव से रस लेले कर वे बेटी की ससुराल की बातें पड़ोसिनों को सुनाने से भी नहीं चूकतीं. उन की बातें सुन कर पड़ोसिन को ईर्ष्या होती. वे सपना की ससुराल वालों को लक्ष्य कर कहतीं, ‘‘कैसे लोग फंस गए इन के चक्कर में. एक पैसा भी दहेज नहीं देना पड़ा बेटी के विवाह में और ऐसा शानदार रोबीला वर मिल गया. ऊपर से ससुराल में इतना लाड़प्यार.’’

उस दिन अरुणा मिलने आईं तो वे उसी उत्साह से सब सुना रही थीं, ‘‘लो, जी, सपना को तो एम.ए. बीच में छोड़ने तक का अफसोस नहीं रहा. बहुत पढ़ालिखा खानदान है. कहते हैं, एम.ए. क्या, बाद में यहीं की यूनिवर्सिटी में पीएच.डी. भी करवा देंगे. पढ़नेलिखने में तो सपना हमेशा ही आगे रही है. अब ससुराल भी कद्र करने वाला मिल गया.’’ ‘‘फिर क्या, सपना नौकरी करेगी, जो इतना पढ़ा रहे हैं?’’ अरुणा ने उन के उत्साह को थोड़ा कसने की कोशिश की.

‘‘नहीं जी, भला उन्हें क्या कमी है जो नौकरी करवाएंगे. घर की कोठी है. हजारों रुपए कमाते हैं हमारे दामादजी,’’ उन्होंने सफाई दी. ‘‘तो सपना इतना पढ़लिख कर क्या करेगी?’’

‘‘बस, शौक. वे लोग आधुनिक विचारों के हैं न, इसलिए पता है आप को, सपना बताती है कि सासससुर और बहू एक टेबल पर बैठ कर खाना खाते हैं. रसोई में खटने के लिए तो नौकरचाकर हैं. और खानेपहनाने के ऐसे शौकीन हैं कि परदा तो दूर की बात है, मेरी सपना तो सिर भी नहीं ढकती ससुराल में.’’ ‘‘अच्छा,’’ अरुणा ने आश्चर्य से कहा.

मगर शादी के महीने भर बाद लड़की ससुराल में सिर तक न ढके, यह बात उन के गले नहीं उतरी. ‘‘शादी के समय सपना तो कहती थी कि मेरे पास इतने ढेर सारे कपड़े हैं, तरहतरह के सलवार सूट, मैक्सी और गाउन, सब धरे रह जाएंगे. शादी के बाद तो साड़ी में गठरी बन कर रहना होगा. पर संयोग से ऐसे घर में गई है कि शादी से पहले बने सारे कपड़े काम में आ रहे हैं. उस के सासससुर को तो यह भी एतराज नहीं कि बाहर घूमने जाते समय भी चाहे…’’

‘‘लेकिन बहनजी, ये बातें क्या सासससुर कहेंगे. यह तो पढ़ीलिखी लड़की खुद सोचे कि आखिर कुंआरी और विवाहिता में कुछ तो फर्क है ही,’’ श्रीमती अरुणा से नहीं रहा गया. उन्होंने सोचा कि शायद श्रीमती अरुणा को उन की पुत्री के सुख से जलन हो रही है, इसीलिए उन्होंने और रस ले कर कहना शुरू किया, ‘‘मैं तो डरती थी. मेरी सपना को शुरू से ही सुबह देर से उठने की आदत है, पराए घर में कैसे निभेगी. पर वहां तो वह सुबह बिस्तर पर ही चाय ले कर आराम से उठती है. फिर उठे भी किस लिए. स्वयं को कुछ काम तो करना नहीं पड़ता.’’

‘‘अब चलूंगी, बहनजी,’’ श्रीमती अरुणा उठतेउठते बोलीं, ‘‘अब तो आप अनुराग की भी शादी कर डालिए. डाक्टर हो ही गया है. फिर आप ने बेटी विदा कर दी. अब आप की सेवाटहल के लिए बहू आनी चाहिए. इस घर में भी तो कुछ रौनक होनी ही चाहिए,’’ कहतेकहते श्रीमती अरुणा के होंठों की मुसकान कुछ ज्यादा ही तीखी हो गई.

कुछ दिनों बाद सपना के पिता ने अपनी पत्नी को एक फोटो दिखाते हुए कहा, ‘‘देखोजी, कैसी है यह लड़की अपने अनुराग के लिए? एम.ए. पास है, रंग भी साफ है.’’ ‘‘घरबार कैसा है?’’ उन्होंने लपक कर फोटो हाथ में लेते हुए पूछा.

‘‘घरबार से क्या करना है? खानदानी लोग हैं. और दहेज वगैरा हमें एक पैसे का नहीं चाहिए, यह मैं ने लिख दिया है उन्हें.’’ ‘‘यह क्या बात हुई जी. आप ने अपनी तरफ से क्यों लिख दिया? हम ने क्या उसे डाक्टर बनाने में कुछ खर्च नहीं किया? और फिर वे जो देंगे, उन्हीं की बेटी की गृहस्थी के काम आएगा.’’

अनुराग भी आ कर बैठ गया था और अपने विवाह की बातों को मजे ले कर सुन रहा था. बोला, ‘‘मां, मुझे तो लड़की ऐसी चाहिए जो सोसाइटी में मेरे साथ इधरउधर जा सके. ससुराल की दौलत का क्या करना है?’’

‘‘बेशर्म, मांबाप के सामने ऐसी बातें करते तुझे शर्म नहीं आती. तुझे अपनी ही पड़ी है, हमारा क्या कुछ रिश्ता नहीं होगा उस से? हमें भी तो बहू चाहिए.’’ ‘‘ठीक है, तो मैं लिख दूं उन्हें कि सगाई के लिए कोई दिन तय कर लें. लड़की दिल्ली में भैयाभाभी ने देख ही ली है और सब को बहुत पसंद आई है. फिर शक्लसूरत से ज्यादा तो पढ़ाई- लिखाई माने रखती है. वह अर्थशास्त्र में एम.ए. है.’’

उधर लड़की वालों को स्वीकृति भेजी गई. इधर वे शादी की तैयारी में जुट गईं. सामान की लिस्टें बनने लगीं. अनुराग जो सपना के ससुराल की तारीफ के पुल बांधती अपनी मां की बातों से खीज जाता था, आज उन्हें सुनाने के लिए कहता, ‘‘देखो, मां, बेकार में इतनी सारी साडि़यां लाने की कोई जरूरत नहीं है, आखिर लड़की के पास शादी के पहले के कपड़े होंगे ही, वे बेकार में पड़े बक्सों में सड़ते रहें तो इस से क्या फायदा.’’

‘‘तो तू क्या अपनी बहू को कुंआरी छोकरियों के से कपड़े यहां पहनाएगा?’’ वह चिल्ला सी पड़ीं. ‘‘क्यों, जब जीजाजी सपना को पहना सकते हैं तो मैं नहीं पहना सकता?’’

वे मन मसोस कर रह गईं. इतने चाव से साडि़यां खरीद कर लाई थीं. सोचा था, सगाई पर ही लड़की वालों पर अच्छा प्रभाव पड़ गया तो वे बाद में अपनेआप थोड़ा ध्यान रखेंगे और हमारी हैसियत व मानसम्मान ऊंचा समझ कर ही सबकुछ करेंगे. मगर यहां तो बेटे ने सारी उम्मीदों पर ही पानी फेर दिया. रात को सोने के लिए बिस्तर पर लेटीं तो कुछ उदास थीं. उन्हें करवटें बदलते देख कर पति बोले, ‘‘सुनोजी, अब घर के काम के लिए एक नौकर रख लो.’’

‘‘क्यों?’’ वह एकाएक चौंकीं. ‘‘हां, क्या पता, तुम्हारी बहू को भी सुबह 8 बजे बिस्तर पर चाय पी कर उठने की आदत हो तो घर का काम कौन करेगा?’’

वे सकपका गईं. सुबह उठीं तो बेहद शांत और संतुष्ट थीं. पति से बोलीं, ‘‘तुम ने अच्छी तरह लिख दिया है न, जी, जैसी उन की बेटी वैसी ही हमारी. दानदहेज में एक पैसा भी देने की जरूरत नहीं है, यहां किस बात की कमी है, मैं तो आते ही घर की चाबियां उसे सौंप कर अब आराम करूंगी.’’ ‘‘पर मां, जरा यह तो सोचो, वह अच्छी श्रेणी में एम.ए. पास है, क्या पता आगे शोधकार्य आदि करना चाहे. फिर ऐसे में तुम घर की जिम्मेदारी उस पर छोड़ दोगी तो वह आगे पढ़ कैसे सकेगी?’’ यह अनुराग का स्वर था.

उन की समझ में नहीं आया कि एकाएक क्या जवाब दें. कुछ दिन बाद जब सपना ससुराल से आई तो वे उसे बातबात पर टोक देतीं, ‘‘क्यों री, तू ससुराल में भी ऐसे ही सिर उघाड़े डोलती रहती है क्या? वहां तो ठीक से रहा कर बहुओं की तरह और अपने पुराने कपड़ों का बक्सा यहीं छोड़ कर जाना. शादीशुदा लड़कियों को ऐसे ढंग नहीं सुहाते.’’

सपना ने जब बताया कि वह यूनिवर्सिटी में दाखिला ले रही है तो वे बरस ही पड़ीं, ‘‘अब क्या उम्र भर पढ़ती ही रहेगी? थोड़े दिन सासससुर की सेवा कर. कौन बेचारे सारी उम्र बैठे रहेंगे तेरे पास.’’ आश्चर्यचकित सपना देख रही थी कि मां को हो क्या गया है?

Short Story : शरशय्या – त्याग और धोखे के बीच फंसी एक अनाम रिश्ते की कहानी

लेखक- ज्योत्स्ना प्रवाह

स्त्रियां अधिक यथार्थवादी होती हैं. जमीन व आसमान के संबंध में सब के विचार भिन्नभिन्न होते हैं परंतु इस संदर्भ में पुरुषों के और स्त्रियों के विचार में बड़ा अंतर होता है. जब कुछ नहीं सूझता तो किसी सशक्त और धैर्य देने वाले विचार को पाने के लिए पुरुष नीले आकाश की ओर देखता है, परंतु ऐसे समय में स्त्रियां सिर झुका कर धरती की ओर देखती हैं, विचारों में यह मूल अंतर है. पुरुष सदैव अव्यक्त की ओर, स्त्री सदैव व्यक्त की ओर आकर्षित होती है. पुरुष का आदर्श है आकाश, स्त्री का धरती. शायद इला को भी यथार्थ का बोध हो गया था. जीवन में जब जीवन को देखने या जीवन को समझने के लिए कुछ भी न बचा हो और जीवन की सांसें चल रही हों, ऐसे व्यक्ति की वेदना कितनी असह्य होगी, महज यह अनुमान लगाया जा सकता है. शायद इसीलिए उस ने आग और इलाज कराने से साफ मना कर दिया था. कैंसर की आखिरी स्टेज थी.

‘‘नहीं, अब और नहीं, मुझे यहीं घर पर तुम सब के बीच चैन से मरने दो. इतनी तकलीफें झेल कर अब मैं इस शरीर की और छीछालेदर नहीं कराना चाहती,’’ इला ने अपना निर्णय सुना दिया. जिद्दी तो वह थी ही, मेरी तो वैसे भी उस के सामने कभी नहीं चली. अब तो शिबू की भी उस ने नहीं सुनी. ‘‘नहीं बेटा, अब मुझे इसी घर में अपने बिस्तर पर ही पड़ा रहने दो. जीवन जैसेतैसे कट गया, अब आराम से मरने दो बेटा. सब सुख देख लिया, नातीपोता, तुम सब का पारिवारिक सुख…बस, अब तो यही इच्छा है कि सब भरापूरा देखतेदेखते आंखें मूंद लूं,’’ इला ने शिबू का गाल सहलाते हुए कहा और मुसकरा दी. कहीं कोई शिकायत, कोई क्षोभ नहीं. पूर्णत्वबोध भरे आनंदित क्षण को नापा नहीं जा सकता. वह परमाणु सा हो कर भी अनंत विस्तारवान है. पूरी तरह संतुष्टि और पारदर्शिता झलक रही थी उस के कथन में. मौत सिरहाने खड़ी हो तो इंसान बहुत उदार दिलवाला हो जाता है क्या? क्या चलाचली की बेला में वह सब को माफ करता जाता है? पता नहीं. शिखा भी पिछले एक हफ्ते से मां को मनाने की बहुत कोशिश करती रही, फिर हार कर वापस पति व बच्चों के पास कानपुर लौट गई. शिबू की छुट्टियां खत्म हो रही थीं. आंखों में आंसू लिए वह भी मां का माथा चूम कर वापस जाने लगा.

‘‘बस बेटा, पापा का फोन जाए तो फौरन आ जाना. मैं तुम्हारे और पापा के कंधों पर ही श्मशान जाना चाहती हूं.’’ एअरपोर्ट के रास्ते में शिबू बेहद खामोश रहा. उस की आंखें बारबार भर आती थीं. वह मां का दुलारा था. शिखा से 5 साल छोटा. मां की जरूरत से ज्यादा देखभाल और लाड़प्यार ने उसे बेहद नाजुक और भावनात्मक रूप से कमजोर बना दिया था. शिखा जितनी मुखर और आत्मविश्वासी थी वह उतना ही दब्बू और मासूम था. जब भी इला से कोई बात मनवानी होती थी, तो मैं शिबू को ही हथियार बनाता. वह कहीं न कहीं इस बात से भी आहत था कि मां ने उस की भी बात नहीं मानी या शायद मां के दूर होने का गम उसे ज्यादा साल रहा था.

आजकल के बच्चे काफी संवेदनशील हो चुके हैं, इस सामान्य सोच से मैं भी इत्तफाक रखता था. हमारी पीढ़ी ज्यादा भावुक थी लेकिन अपने बच्चों को देख कर लगता है कि शायद मैं गलत हूं. ऐसा नहीं कि उम्र के साथ परिपक्व हो कर भी मैं पक्का घाघ हो गया हूं. जब अम्मा खत्म हुई थीं तो शायद मैं भी शिबू की ही उम्र का रहा होऊंगा. मैं तो उन की मृत्यु के 2 दिन बाद ही घर पहुंच पाया था. घर में बाबूजी व बड़े भैया ने सब संभाल लिया था. दोनों बहनें भी पहुंच गई थीं. सिर्फ मैं ही अम्मा को कंधा न दे सका. पर इतने संवेदनशील मुद्दे को भी मैं ने बहुत सहज और सामान्य रूप से लिया. बस, रात में ट्रेन की बर्थ पर लेटे हुए अम्मा के साथ बिताए तमाम पल छनछन कर दिमाग में घुमड़ते रहे. आंखें छलछला जाती थीं, इस से ज्यादा कुछ नहीं. फिर भी आज बच्चों की अपनी मां के प्रति इतनी तड़प और दर्द देख कर मैं अपनी प्रतिक्रियाओं को अपने तरीके से सही ठहरा कर लेता हूं. असल में अम्मा के 4 बच्चों में से मेरे हिस्से में उन के प्यार व परवरिश का चौथा हिस्सा ही तो आया होगा. इसी अनुपात में मेरा भी उन के प्रति प्यार व परवा का अनुपात एकचौथाई रहा होगा, और क्या. लगभग एक हफ्ते से मैं शिबू को बराबर देख रहा था. वह पूरे समय इला के आसपास ही बना रहता था. यही तो इला जीवनभर चाहती रही थी. शिबू की पत्नी सीमा जब सालभर के बच्चे से परेशान हो कर उस की गोद में उसे डालना चाहती तो वह खीझ उठता, ‘प्लीज सीमा, इसे अभी संभालो, मां को दवा देनी है, उन की कीमो की रिपोर्ट पर डाक्टर से बात करनी है.’

वाकई इला है बहुत अच्छी. वह अकसर फूलती भी रहती, ‘मैं तो राजरानी हूं. राजयोग ले कर जन्मी हूं.’ मैं उस के बचकानेपन पर हंसता. अगर मैं उस की दबंगई और दादागीरी इतनी शराफत और शालीनता से बरदाश्त न करता तो उस का राजयोग जाता पानी भरने. जैसे वही एक प्रज्ञावती है, बाकी सारी दुनिया तो घास खाती है. ठीक है कि घरपरिवार और बच्चों की जिम्मेदारी उस ने बहुत ईमानदारी और मेहनत से निभाई है, ससुराल में भी सब से अच्छा व्यवहार रखा लेकिन इन सब के पीछे यदि मेरा मौरल सपोर्ट न होता तो क्या कुछ खाक कर पाती वह? मौरल सपोर्ट शायद उपयुक्त शब्द नहीं है. फिर भी अगर मैं हमेशा उस की तानाशाही के आगे समर्पण न करता रहता और दूसरे पतियों की तरह उस पर हुक्म गांठता, उसे सताता तो निकल गई होती उस की सारी हेकड़ी. लगभग 45 वर्ष के वैवाहिक जीवन में ऐसे कई मौके आए जब वह महीनों बिसूरती रही, ‘मेरा तो भविष्य बरबाद हो गया जो तुम्हारे पल्ले बांध दी गई, कभी विचार नहीं मिले, कोई सुख नहीं मिला, बच्चों की खातिर घर में पड़ी हूं वरना कब का जहर खा लेती.’ बीच में तो वह 3-4 बार महीनों के लिए गहरे अवसाद में जा चुकी है. हालांकि इधर जब से उस ने कीमोथैरेपी न कराने का निश्चय कर लिया था, और आराम से घर पर रह कर मृत्यु का स्वागत करना तय किया था, तब से वह मुझे बेहद फिट दिखाई दे रही थी. उस की  की धाकड़ काया जरूर सिकुड़ के बच्चों जैसी हो गई थी लेकिन उस के दिमाग और जबान में उतनी ही तेजी थी. उस की याददाश्त तो वैसे भी गजब की थी, इस समय वह कुछ ज्यादा ही अतीतजीवी हो गई थी. उम्र और समय की भारीभरकम शिलाओं को ढकेलती अपनी यादों के तहखाने में से वह न जाने कौनकौन सी तसवीरें निकाल कर अकसर बच्चों को दिखलाने लगती थी.

उस की नींद बहुत कम हो गई थी, उस के सिर पर हाथ रखा तो उस ने झट से पलकें खोल दीं. दोनों कोरों से दो बूंद आंसू छलक पड़े.

‘‘शिबू के लिए काजू की बरफी खरीदी थी?’’

‘‘हां भई, मठरियां भी रखवा दी थीं.’’ मैं ने उस का सिर सहलाते हुए कहा तो वह आश्वस्त हो गई.

‘‘नर्स के आने में अभी काफी समय है न?’’ उस की नजरें मुझ पर ठहरी थीं.

‘‘हां, क्यों? कोई जरूरत हो तो मुझे बताओ, मैं हूं न.’’

‘‘नहीं, जरूरत नहीं है. बस, जरा दरवाजा बंद कर के तुम मेरे सिरहाने आ कर बैठो,’’ उस ने मेरा हाथ अपने सिर पर रख लिया, ‘‘मरने वाले के सिर पर हाथ रख कर झूठ नहीं बोलते. सच बताओ, रानी भाभी से तुम्हारे संबंध कहां तक थे?’’ मुझे करंट लगा. सिर से हाथ खींच लिया. सोते हुए ज्वालामुखी में प्रवेश करने से पहले उस के ताप को नापने और उस की विनाशक शक्ति का अंदाज लगाने की सही प्रतिभा हर किसी में नहीं होती, ‘‘पागल हो गई हो क्या? अब इस समय तुम्हें ये सब क्या सूझ रहा है?’’

‘‘जब नाखून बढ़ जाते हैं तो नाखून ही काटे जाते हैं, उंगलियां नहीं. सो, अगर रिश्ते में दरार आए तो दरार को मिटाओ, न कि रिश्ते को. यही सोच कर चुप थी अभी तक, पर अब सच जानना चाहती हूं. सूझ तो बरसों से रहा है बल्कि सुलग रहा है, लेकिन अभी तक मैं ने खुद को भ्रम का हवाला दे कर बहलाए रखा. बस, अब जातेजाते सच जानना चाहती हूं.’’

‘‘जब अभी तक बहलाया है तो थोड़े दिन और बहलाओ. वहां ऊपर पहुंच कर सब सचझूठ का हिसाब कर लेना,’’ मैं ने छत की तरफ उंगली दिखा कर कहा. मेरी खीज का उस पर कोई असर नहीं था.

‘‘और वह विभा, जिसे तुम ने कथित रूप से घर के नीचे वाले कमरे में शरण दी थी, उस से क्या तुम्हारा देह का भी रिश्ता था?’’

‘‘छि:, तुम सठिया गई हो क्या? ये क्या अनापशनाप बक रही हो? कोई जरूरत हो तो बताओ वरना मैं चला.’’ मैं उन आंखों का सामना नहीं करना चाहता था. क्षोभ और अपमान से तिलमिला कर मैं अपने कमरे में आ गया. शिबू ने जातेजाते कहा था, मां को एक पल के लिए भी अकेला मत छोडि़एगा. ऐसा नहीं है कि ये सब बातें मैं ने पहली बार उस की जबान से सुनी हैं, पहले भी ऐसा सुना है. मुझे लगा था कि वह अब सब भूलभाल गई होगी. इतने लंबे अंतराल में बेहद संजीदगी से घरगृहस्थी के प्रति समर्पित इला ने कभी इशारे से भी कुछ जाहिर नहीं किया. हद हो गई, ऐसी बीमारी और तकलीफ में भी खुराफाती दिमाग कितना तेज काम कर रहा था. मेरे मन के सघन आकाश से विगत जीवन की स्मृतियों की वर्षा अनेक धाराओं में होने लगी. कभीकभी तो ये ऐसी मूसलाधार होती हैं कि उस के निरंतर आघातों से मेरा शरीर कहीं छलनीछलनी न हो जाए, ऐसा संदेह मुझ को होने लगता है. परंतु मन विचित्र होता है, उसे जितना बांधने का प्रयत्न किया जाए वह उतना ही स्वच्छंद होता जाता है. जो वक्त बीत गया वह मुंह से निकले हुए शब्द की तरह कभी लौट कर वापस नहीं आता लेकिन उस की स्मृतियां मन पर ज्यों की त्यों अंकित रह जाती हैं.

रानी भाभी की नाजोअदा का जादू मेरे ही सिर चढ़ा था. 17-18 की अल्हड़ और नाजुक उम्र में मैं उन के रूप का गुलाम बन गया था. भैया की अनुपस्थिति में भाभी के दिल लगाए रखने का जिम्मा मेरा था. बड़े घर की लड़की के लिए इस घर में एक मैं ही था जिस से वे अपने दिल का हाल कहतीं. भाभी थीं त्रियाचरित्र की खूब मंजी खिलाड़ी, अम्मा तो कई बार भाभी पर खूब नाराज भी हुई थीं, मुझे भी कस कर लताड़ा तो मैं भी अपराधबोध से भर उठा था. कालेज में ऐडमिशन लेने के बाद तो मैं पक्का ढीठ हो गया. अकसर भाभी के साथ रिश्ते का फायदा उठाते हुए पिक्चर और घूमना चलता रहा. इला जब ब्याह कर घर आई तो पासपड़ोस की तमाम महिलाओं ने उसे गुपचुप कुछ खबरदार कर दिया था. साधारण रूपरंग वाली इला भाभी के भड़कीले सौंदर्य पर भड़की थी या सुनीसुनाई बातों पर, काफी दिन तो मुझे अपनी कैफियत देते ही बीते, फिर वह आश्चर्यजनक रूप से बड़ी आसानी से आश्वस्त हो गई थी. वह अपने वैवाहिक जीवन का शुभारंभ बड़ी सकारात्मक सोच के साथ करना चाहती थी या कोई और वजह थी, पता नहीं.

भाभी जब भी घर आतीं तो इला एकदम चौकन्नी रहती. उम्र की ढलान पर पहुंच रही भाभी के लटकेझटके अभी भी एकदम यौवन जैसे ही थे. रंभाउर्वशी के जींस ले कर अवतरित हुई थीं वे या उन के तलवों में साक्षात पद्मिनी के लक्षण थे, पता नहीं? उन की मत्स्यगंधा देह में एक ऐसा नशा था जो किसी भी योगी का तप भंग कर सकता था. फिर मैं तो कुछ ज्यादा ही अदना सा इंसान था. दूसरे दिन नर्स के जाते ही वह फिर आहऊह कर के बैठने की कोशिश करने लगी. मैं ने तकिया पीछे लगा दिया.

‘‘कोई तुम्हारी पसंद की सीडी लगा दूं? अच्छा लगेगा,’’ मैं सीडी निकालने लगा.

‘‘रहने दो, अब तो कुछ दिनों के बाद सब अच्छा और शांति ही शांति है, परम शांति. तुम यहां आओ, मेरे पास आ कर बैठो,’’ वह फिर से मुझे कठघरे में खड़ा होने का शाही फरमान सुना रही थी.

‘‘ठीक है, मैं यहीं बैठा हूं. बोलो, कुछ चाहिए?’’

‘‘हां, सचसच बताओ, जब तुम विभा को दुखियारी समझ कर घर ले कर आए थे और नीचे बेसमैंट में उस के रहनेखाने की व्यवस्था की थी, उस से तुम्हारा संबंध कब बन गया था और कहां तक था?’’

‘‘फिर वही बात? आखिरी समय में इंसान बीती बातों को भूल जाता है और तुम.’’

‘‘मैं ने तो पूरी जिंदगी भुलाने में ही बिताई है,’’ वह आंखें बंद कर के हांफने लगी. फिर वह जैसे खुद से ही बात करने लगी थी, ‘‘समझौता. कितना मामूली शब्द है मगर कितना बड़ा तीर है जो जीवन को चुभ जाता है तो फांस का अनदेखा घाव सा टीसता है. अब थक चुकी हूं जीवन जीने से और जीवन जीने के समझौते से भी. जिन रिश्तों में सब से ज्यादा गहराई होती है वही रिश्ते मुझे सतही मिले. जिस तरह समुद्र की अथाह गहराई में तमाम रत्न छिपे होते हैं, साथ में कई जीवजंतु भी रहते हैं, उसी तरह मेरे भीतर भी भावनाओं के बेशकीमती मोती थे तो कुछ बुराइयों जैसे जीवजंतु भी. कोई ऐसा गोताखोर नहीं था जो उन जीवजंतुओं से लड़ता, बचताबचाता उन मोतियों को देखता, उन की कद्र करता. सब से गहरा रिश्ता मांबाप का होता है. मां अपने बच्चे के दिल की गहराइयों में उतर कर सब देख लेती है लेकिन मेरे पास में तो वह मां भी नहीं थी जो मुझे थोड़ा भी समझ पाती.

‘‘दूसरा रिश्ता पति का था, वह भी सतही. जब अपना दिल खोल कर तुम्हारे सामने रखना चाहती तो तुम भी नहीं समझते थे क्योंकि शायद तुम गहरे में उतरने से डरते थे क्योंकि मेरे दिल के आईने में तुम्हें अपना ही अक्स नजर आता जो तुम देखना नहीं चाहते थे और मुझे समझने में भूल करते रहे…’’

‘‘देखो, तुम्हारी सांस फूल रही है. तुम आराम करो, इला.’’

‘‘वह नवंबर का महीना था शायद, रात को मेरी नींद खुली तो तुम बिस्तर पर नहीं थे, सारे घर में तुम्हें देखा. नीचे से धीमीधीमी बात करने की आवाज सुनाई दी. मैं ने आवाज भी दी मगर तब फुसफुसाहट बंद हो गई. मैं वापस बैडरूम में आई तो तुम बिस्तर पर थे. मेरे पूछने पर तुम ने बहाना बनाया कि नीचे लाइट बंद करने गया था.’’ ‘‘अच्छा अब बहुत हो गया. तुम इतनी बीमार हो, इसीलिए मैं तुम्हें कुछ कहना नहीं चाहता. वैसे, कह तो मैं पूरी जिंदगी कुछ नहीं पाया. लेकिन प्लीज, अब तो मुझे बख्श दो,’’ खीज और बेबसी से मेरा गला भर आया. उस के अंतिम दिनों को ले कर मैं दुखी हूं और यह है कि न जाने कहांकहां के गड़े मुर्दे उखाड़ रही है. उस घटना को ले कर भी उस ने कम जांचपड़ताल नहीं की थी. विभा ने भी सफाई दी थी कि वह अपने नन्हे शिशु को दुलार रही थी लेकिन उस की किसी दलील का इला पर कोई असर नहीं हुआ. उसे निकाल बाहर किया, पता नहीं वह कैसे सच सूंघ लेती थी.

‘‘उस दिन मैं कपड़े धो रही थी, तुम मेरे पीछे बैठे थे और वह मुझ से छिपा कर तुम्हें कोई इशारा कर रही थी. और जब मैं ने उसे ध्यान से देखा तो वह वहां से खिसक ली थी. मैं ने पहली नजर में ही समझ लिया था कि यह औरत खूब खेलीखाई है, पचास बार तो पल्ला ढलकता है इस का, तुम को तो खैर दुनिया की कोई भी औरत अपने पल्लू में बांध सकती है. याद है, मैं ने तुम से पूछा भी था पर तुम ने कोई जवाब नहीं दिया था, बल्कि मुझे यकीन दिलाना चाहते थे कि वह तुम से डरती है, तुम्हारी इज्जत करती है.’’

तब शिखा ने टोका भी था, ‘मां, तुम्हारा ध्यान बस इन्हीं चीजों की तरफ जाता है, मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं दिखता.’

मां की इन ठेठ औरताना बातों से शिखा चिढ़ जाती थी, ‘कौन कहेगा कि मेरी मां इतने खुले विचारों वाली है, पढ़ीलिखी है?’ उन दिनों मेरे दफ्तर की सहकर्मी चित्रा को ले कर जब उस ने कोसना शुरू किया तो भी शिखा बहुत चिढ़ गई थी, ‘मेरे पापा हैं ही इतने डीसैंट और स्मार्ट कि कोई भी महिला उन से बात करना चाहेगी और कोई बात करेगा तो मुसकरा कर, चेहरे की तरफ देख कर ही करेगा न?’ बेटी ने मेरी तरफदारी तो की लेकिन उस के सामने इला की कोसने वाली बातें सुन कर मेरा खून खौलने लगा था. मुझे इला के सामने जाने से भी डर लगने लगा था. मन हुआ कि शिखा को एक बार फिर वापस बुला लूं, लेकिन उस की भी नौकरी, पति, बच्चे सब मैनेज करना कितना मुश्किल है. दोपहर में खाना खिला कर इला को लिटाया तो उस ने फिर मेरा हाथ थाम लिया, ‘‘तुम ने मुझे बताया नहीं. देखो, अब तो मेरा आखिरी समय आ गया है, अब तो मुझे धोखे में मत रखो, सचसच बता दो.’’

‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है, पूरी जिंदगी बीत गई है. अब तक तो तुम ने इतनी जिरह नहीं की, इतना दबाव नहीं डाला मुझ पर, अब क्यों?’’

‘‘इसलिए कि मैं स्वयं को धोखे में रखना चाहती थी. अगर तुम ने दबाव में आ कर कभी स्वीकार कर लिया होता तो मुझे तुम से नफरत हो जाती. लेकिन मैं तुम्हें प्रेम करना चाहती थी, तुम्हें खोना नहीं चाहती थी. मैं तुम्हारे बच्चों की मां थी, तुम्हारे साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताना चाहती थी. तुम्हारे गुस्से को, तुम्हारी अवहेलना को मैं ने अपने प्रेम का हिस्सा बना लिया था, इसीलिए मैं ने कभी सच जानने के लिए इतना दबाव नहीं डाला.

‘‘फिर यह भी समझ गई कि प्रेम यदि किसी से होता है तो सदा के लिए होता है, वरना नहीं होता. लेकिन अब तो मेरी सारी इच्छाएं पूरी हो गई हैं, कोई ख्वाहिश बाकी नहीं रही. फिर सीने पर धोखे का यह बोझ ले कर क्यों जाऊं? मरना है तो हलकी हो कर मरूं. तुम्हें मुक्त कर के जा रही हूं तो मुझे भी तो शांति मिलनी चाहिए न? अभी तो मैं तुम्हें माफ भी कर सकती हूं, जो शायद पहले बिलकुल न कर पाती.’’ ओफ्फ, राहत का एक लंबा गहरा उच्छ्वास…तो इन सब के लिए अब ये मुझे माफ कर सकती है. वह अकसर गर्व से कहती थी कि उस की छठी इंद्रिय बहुत शक्तिशाली है. खोजी कुत्ते की तरह वह अपराधी का पता लगा ही लेती है. लेकिन ढलती उम्र और बीमारी की वजह से उस ने अपनी छठी इंद्रिय को आस्था और विश्वास का एनेस्थिसिया दे कर बेहोश कर दिया था या कहीं बूढ़े शेर को घास खाते हुए देख लिया होगा. इसी से मैं आज बच गया

सच और विश्वास की रेशमी चादर में इत्मीनान से लिपटी जब वह अपने बच्चों की दुनिया में मां और नानी की भूमिका में आकंठ डूबी हुई थी, उन्हीं दिनों मेरी जिंदगी के कई राज ऐसे थे जिन के बारे में उसे कुछ भी पता नहीं. अब इस मुकाम पर मैं उस से कैसे कहता कि मुझे लगता है यह दुनिया 2 हिस्सों में बंटी हुई है. एक, त्याग की दुनिया है और दूसरी धोखे की. जितनी देर किसी में हिम्मत होती है वह धोखा दिए जाता है और धोखा खाए जाता है और जब हिम्मत चुक जाती है तो वह सबकुछ त्याग कर एक तरफ हट कर खड़ा हो जाता है. मिलता उस तरफ भी कुछ नहीं है, मिलता इस तरफ भी कुछ नहीं है. मेरी स्थिति ठीक उसी बरगद की तरह थी जो अपनी अनेक जड़ों से जमीन से जुड़ा रहता है, अपनी जगह अटल, अचल. कैसे कभीकभी एक अनाम रिश्ता इतना धारदार हो जाता है कि वह बरसों से पल रहे नामधारी रिश्ते को लहूलुहान कर जाता है. यह बात मेरी समझ से परे थी.

मुझे बेकर्स सिस्ट की समस्या है, जानना चाहती हूं कि इस के इलाज की प्रक्रिया क्या है?

सवाल

मेरी उम्र 45 साल है. कुछ समय से मेरे बाएं घुटने में दर्द हो रहा है, जिस की जांच कराने पर पता चला कि मुझे बेकर्स सिस्ट की समस्या है. उन्होंने कहा कि समस्या गंभीर नहीं है और जल्दी ठीक हो जाएगी. यदि ऐसा नहीं होता है तो उस के बाद हम इलाज की प्रक्रिया शुरू करेंगे. मैं जानना चाहती हूं कि इस के इलाज की प्रक्रिया क्या है?

जवाब

आमतौर पर इस गांठ का इलाज करने की जरूरत नहीं पड़ती है, क्योंकि कुछ समय में यह खुद ही ठीक हो जाती है. लेकिन कई बार यह लगातार बढ़ती जाती है और मरीज को बहुत ज्यादा परेशान करने लगती है. ऐसे में इलाज कराना जरूरी हो जाता है. आप की गांठ और लक्षणों की गंभीरता को देखते हुए डाक्टर इलाज के निम्नलिखित विकल्पों की सलाद दे सकता है:

द्रव निकालना: डाक्टर आप की गांठ में इंजैक्शन डाल कर द्रव को बाहर निकालेगा. इस प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी न हो और इंजैक्शन सही जगह पर लगाया गया है, यह सुनिश्चित करने के लिए वह अल्ट्रासाउंड की मदद ले सकता है. द्रव को बाहर निकालने पर गांठ सूख कर ठीक हो जाती है.

फिजिकल थेरैपी: डाक्टर आप को कुछ व्यायामों और थेरैपी की सलाह देगा. व्यायाम की मदद से गांठ में राहत के साथसाथ जकड़न और दर्द में भी राहत मिलती है. व्यायाम घुटने को लचीला बनाते हैं, जिस से आप को मूवमैंट में आसानी होगी.

सवाल

मेरी उम्र 48 साल है. कुछ दिनों से मेरे घुटने में दर्द हो रहा है और हलकी सूजन भी है, जबकि मुझे कोई चोट भी नहीं लगी है. क्या यह आर्थ्राइटिस है या कोई और कारण है?

जवाब

असल समस्या की पहचान के लिए जांच आवश्यक है क्योंकि इस के कई कारण हो सकते हैं. हालांकि इसे आर्थ्राइटिस का नाम देना सही नहीं होगा. आमतौर पर घुटने में चोट के कारण आसपास की संरचना क्षतिग्रस्त हो जाती है तो वहां बहुत अधिक मात्रा में द्रव बनने लगता है. यह द्रव गांठ का रूप ले लेता है. लेकिन घबराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह कोई बड़ा रोग नहीं है और जल्दी ठीक हो जाता है. लापरवाही दिखाना सही नहीं है जल्दी जांच अवश्य कराएं.

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बेगानी शादी में लैला दीवानी

Unnecessary Involvement : पूजा और निशा बैस्ट फ्रैंड थी. दोनों का उठानाबैठना, खानापीना, मौजमस्ती सब साथ होता था. इसलिए जब निशा की शादी नजदीक आई तो पूजा ने उस की शादी की शौपिंग की सारी जिम्मेदारी उठा ली. पूजा की शादी हो चुकी थी इसलिए अपने ऐक्सपीरियंस के बेस पर उस ने निशा की शौपिंग की लिस्ट तैयार कर ली और हर खरीदारी में निशा के साथ जाती. मगर पूजा की मदद धीरेधीरे निशा के जी का जंजाल बन गई.

‘यह मत ले, यह दुकान नहीं वह दुकान, मेरी बात मान मु?ो ऐक्सपीरियंस है’, सुनसुन कर निशा के कान पक चुके थे. हद तो तब हुई जब पूजा निशा की वैडिंग ड्रैस से मिलतीजुलती ड्रैस ले आई. अब तो निशा के सब्र का बांध टूट गया और वह चिढ़ कर बोली, ‘‘बस कर पूजा. शादी मेरी है तेरी नहीं, इसलिए दुलहन मु?ो ही दिखने दे.’’

यारीदोस्ती के चक्कर में हम कभीकभी अपनापन जताने के चलते अपनी राय देने की जगह अपनी पसंद थोपने लगते हैं. हम यह भूल ही जाते कि हम मदद करने के लिए आगे बढ़े हैं न कि मनमानी करने के लिए. जैसे अकसर देखा जाता है कि शादीब्याह में खास सहेलियां एकदूसरे की शौपिंग साथ मिल कर करती हैं. दुलहन अपनी किसी न किसी खास सहेली के साथ खरीदारी करते दिखती है.

आखिर जब आम शौपिंग सहेली के साथ खास हो जाती है तो स्पैशल इवेंट की शौपिंग में सहेली का होना कितना खास होता होगा, इसलिए अपनी सहेली की खास शौपिंग में उस का जी भर के साथ दें लेकिन इन बातों का ध्यान भी रहे:

आप की पसंद उस की पसंद नहीं है : भले आप दोनों के शौक एकजैसे हो, फेवरिट कलर भी एक हों लेकिन जरूरी नहीं हर पसंद एक ही जैसी हो या जो आप को पसंद आए, वही आप की सहेली को भी. इसलिए अपनी पसंद के कपड़े, गहने, जूतेचप्पल या कुछ भी उस की पसंद का न बनाएं बल्कि उसे क्या पसंद है क्या नहीं इस पर ध्यान दें.

अपने ऐक्सपीरियंस उस पर न थोपें: माना आप की शादी हो चुकी है, इसलिए आप को शादी से जुड़ी शौपिंग का अच्छाखासा ऐक्सपीरियंस है लेकिन इस ऐक्सपीरियंस को एक सलाह के रूप में ही शेयर करे न कि एक और्डर की तरह थोपें.

उस के बजट पर कोई टिप्पणी न दें: आम शौपिंग हो या खास, उस के लिए हर किसी का बजट एकजैसा नहीं होता. जैसे कोई 100 रुपए की चप्पल खरीदता तो कोई 300 की. उसी तरह कोई अपनी शादी में 2 हजार की साड़ी लेगा और कोई 5 हजार की. आप की शौपिंग आप के बजट के अनुसार होती है. इसलिए

किसी के बजट को ले कर कोई टिप्पणी न करे. न ही कोई खेद या शिकायत जताए या दिखाए. चाहे वह आप की बैस्टी की शौपिंग ही क्यों न हो.

हैल्पिंग हैंड बनें न कि कमांडिंग: याद रहे कि आप हैल्प करने गई हैं, इसलिए उन्हें आगे रहने दें न कि खुद आगे हो कर फैसले करे या शौपिंग की कमांड संभालें. बेहतर यही है कि उन्हें आगे बढ़ कर अपनी खरीदारी करने दें. मगर हां अनावश्यक खर्चों पर उन्हें टोकें जरूर और इस बात का भी ध्यान रखें कि खुद भी फुजूल की खरीदारी न कराएं.

दुलहन से मैचिंग न करें: कई बार अपनी बैस्टी की शादी में लड़कियां अपना प्यार और बौंडिंग दिखाने के लिए दुलहन से मिलतीजुलती ड्रैस ले लेती हैं या अपनी शादी का लहंगा ही पहन आती हैं जो ठीक नहीं. शादी का दिन दुलहन का ही स्पैशल डे होता है, इसलिए उस दिन को केवल उस का दिन ही रहने दें.

शादी के दिन को अपने सेमसेम या मैचिंगमैचिंग थीम में न बदलें नहीं तो दुलहन का स्पैशल दिन पूरी तरह से खराब हो जाएगा. आप खुद सोचिए कि अगर कोई आप की शादी में आप की ड्रैस से मिलती ड्रैस पहन आ जाए तो आप को कैसा लगता? भला एक शादी में

2 दुलहनें क्या अच्छी दिखतीं और क्या ऐसा करना अच्छा होता? इसलिए अपनी बैस्टी से मैचिंग को किनारे करें और दुलहन का स्पैशल डे स्पौइल न करें.

फीलिंग का ध्यान रखें: रोजमर्रा के दिनों हम एकदूसरे को हंसीमजाक या परेशानी में कुछ भी ऊंचानीचा बोल देते हैं और उसे भूल भी जाते हैं लेकिन अगर कोई बात खास दिनों में हो जाए तो जीवनभर याद रहती है. आप अपनी बैस्टी को आम शौपिंग पर किसी ड्रैस में देख बोले देते हैं कि हाय कितनी मोटी लग रही है तू, ‘तु?ा पर तो कोई रंग अच्छा नहीं लग रहा,’ ‘तेरा चेहरा इतना डल हो गया की कुछ नहीं जम रहा,’ देखना तूने मेरी पसंद का लहंगा नहीं लिया तो तू बेकार ही दिखेगी, तेरे फोटो गंदे आएंगे वगैरहवगैरह. इसलिए ध्यान रखे कि शादी की शौपिंग करते वक्त मुंह से ऐसा कुछ निकल न जाए जो दिल दुखाने का काम कर जाए. आप की कैट फाइट आम दिनों में तो अच्छी लगती है लेकिन शादी जैसे खास पलों में नहीं.

राइट सजैशन ऐंड रिव्यू: शौपिंग लिस्ट वैसे ही लंबी होती है, इसलिए उसे और लंबी न करें. किसी ऐसी चीज को जो जरूरी न हो उसे शौपिंग लिस्ट में न जोड़ें, न खरीदने की सलाह दें और अगर दुलहन किसी चीज को ले कर कन्फ्यूज है, आप की राय जानना चाहती है तो उसे सही रिव्यु ही दें न कि यह सोचें कि मु?ो यह चीज पसंद नहीं इसलिए यह बेकार है. दुलहन के लिए क्या सही है, क्या नहीं उस पर राय दें.

ये तो रही वे बातें जिन का आप को अपनी सहेली के साथ ध्यान रखना चाहिए. अब कुछ उन बातों पर भी गौर करें जो आप के अपने और आप के अपनों के लिए जरूरी हैं जैसे:

पूरा समय केवल सहेली के नाम न करें: शादी की खरीदारी में कई दुकानें, कई जगहों पर बारबार जाना पड़ता है, जिस में काफी समय लगता है और यह समय एक दिन में पूरा नहीं होता. हर दिन इतना ही समय देना पड़ता है. लेकिन इस समय में अपने ही परिवार के लिए समय न रहे तो गृहस्थी में खलल पड़ सकता है. इसलिए अपनी सहेली की शौपिंग में इतना समय न लगाए कि अपने परिवार के लिए ही समय न बच पाए.

अपने काम और जिम्मेदारी से न भटकें: सहेली के साथ इतना व्यस्त न हो जाए कि अपने कामों से भटक जाएं. अपने प्रोफैशन और उस से जुड़ी जिम्मेदारी की अनदेखी न करें. अपने काम के महत्त्व को सम?ों और उस के अनुसार ही अपनी दिनचर्या बनाएं क्योंकि आप की सहेली के साथ आप की जगह कोई और शौपिंग चला जाए तो चेलगा लेकिन आप की नौकरी पर कोई और चला गया तो आप को बड़ी मुश्किल होगी.

खुद की फुजूलखर्ची से बचें: मना आप की सहेली की शादी है तो आप को भी खास तो जरूर दिखना चाहिए लेकिन इस खास दिखने के चलते इतनी फुजूलखर्ची न कर बैठें कि बाद में आप को अपना बिल और बजट महीनों तक देखते रहना पड़ जाए.

-रजनी प्रसाद 

शादी Personal Choice होनी चाहिए, न कि कोई सामाजिक मजबूरी

Marriage : सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें एक मां अपनी डॉक्टर (MBBS/MD) बेटी के लिए दूल्हा न मिल पाने की शिकायत कर रही हैं. मां का कहना है कि उनकी बेटी 30-32 साल की है और पूरी तरह फिट है, लेकिन जब वे उसके लिए अपनी बिरादरी में लड़के देखती हैं, तो 32-34 साल के लड़के ‘अंकल’ जैसे नजर आते हैं. उन्होंने कहा कि इस उम्र के ज्यादातर लड़के या तो गंजे हो गए हैं या काफी मोटे हैं.

इस वीडियो पर इंटरनेट यूजर्स की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है और लोग दो गुटों में बंट गए हैं. कई लोगों ने मां को ट्रोल करते हुए सवाल उठाया कि अगर 34 का लड़का ‘अंकल’ है, तो 34 की लड़की ‘आंटी’ क्यों नहीं? यूजर्स का कहना है कि आजकल डॉक्टर बनने और करियर बनाने में 30-32 साल लग जाते हैं, और काम के तनाव के कारण लुक्स पर असर पड़ना स्वाभाविक है. कुछ यूजर्स ने इसे मां की अवास्तविक उम्मीदें (unrealistic expectations) करार दिया है.

दरअसल, जब हम बिरादरी, डिग्री और लुक्स को प्राथमिकता देते हैं, तो शादी एक रिश्ता कम और ‘बिजनेस डील’ ज्यादा लगने लगती है. अगर उस डॉक्टर बेटी को एक ऐसा साथी मिले जो उसे समझे, उसके काम का सम्मान करे, तो क्या उसका ‘गंजापन’ या ‘मोटापा’ वाकई मायने रखेगा?

दूसरे, अगर मनपसंद लड़का नहीं मिल रहा, आपका मन नहीं मान रहा तो शादी करने की जरुरत ही क्या है? अगर दिल कर रहा है, तो कर लो शादी अगर दिल नहीं कर रहा तो मत करो शादी. ये जो समाज में हिसाब बैठा है कि शादी तो करनी ही पड़ेगी ये गलत है. शादी करना जरुरी नहीं है ये तो बस आपकी अपनी आवशयकता है. आपकी आवश्यकता होती तो आप 20 साल में शादी कर लेते आवशकता नहीं है तो नहीं कर रहें. इसमें दिक्कत और मुसीबत क्या है?

शादी जरुरत से जयादा सामाजिक दबाव है

अगर आप बिना शादी के ही खुश है और आपको किसी साथी की जरुरत महसूस नहीं होती तो सिर्फ ‘लोग क्या कहेंगे’ की वजह से शादी करना ठीक नहीं है. ये आपका व्यक्तिगत फैसला होना चाहिए. जबकि पढाई ख़तम होते ही जैसे ही नौकरी लग जाती है समाज शादी का दबाव बनाना शुरू कर देता है. जब मन तैयार हो और सही व्यक्ति मिले, तभी यह कदम उठाना समझदारी है.

शादी करने की कोई उम्र नहीं होती

आपको शादी करनी है, तो भी कोई बुराई नहीं है और शादी की कोई उम्र नहीं है. लेकिन यह आपकी इच्छा पर निर्भर करता है इसके लिए आपको सामाजिक दबाव लेने की जरुरत  नहीं है. अगर शादी करने का फैसला लेने में आपको देर हो गई है, तो कोई बात नहीं. समाज ने ये टैबू भी बना दिया है कि 25 – 26 की उम्र तक शादी करना सही है उसके बाद बुढ़ापे में क्या शादी होगी. यह अपने आप में ही गलत सोच है. शादी काने की कोई उम्र नहीं होती. अगर पहले आपने शादी नहीं की और 35 साल की उम्र में आपको कोई पसंद आ जाता हटो उसमे बुरा ही क्या है जब आप मन से तैयार हो तभी शादी करें.

बढ़ती उम्र में शादी ‘सही साथी’ से हो ‘लुक्स’ से नहीं

अगर आप 32 की हो गई हो और आपको बड़ी उम्र का  लड़का अच्छा लग रहा है तो न तो आप उसके मोटे पेट पर जाओ और ना ही उसके उड़ते हुए बालों पर जाओं. अगर उसका व्यवहार, बातचीत का तरीका सही लग रहा है तो आगे बढ़ जाओं. आपने 22 साल की उम्र में उस लड़के से शादी की होती तो 34 साल की उम्र में आज भी वो पके हुए बालों में आपको अच्छा ही लगता.

22 की उम्र में वो 25 का होता और आपने उससे शादी की होती तो 10 साल बाद आज वो वैसा ही लगता जैसा लड़का आप आज 32 की उम्र में देख रही है. लेकिन क्या शादी के इतने सालों बाद उसके मोटापे के कारण आप उसे छोड़ देती, नहीं न. फिर आज ये क्यूँ  सोचना कि ये लड़का बड़ा लग रहा है.

30 या 32 की उम्र में शादी करने का एक फायदा यह भी है कि इंसान दिमागी तौर पर ज्यादा परिपक्व (Mature) होता है. उसे पता होता है कि उसे जीवन से क्या चाहिए. ऐसे में किसी के “मोटे पेट” या “उड़ते बालों” के बजाय उसके बातचीत के तरीके और व्यवहार को देखना ज्यादा मायने रखता है, क्योंकि अंत में साथ उसी के साथ निभाना है.

जुड़ाव व्यवहार और सोच से होना चाहिए, न कि केवल लुक्स से “सुंदर चेहरा उम्र के साथ ढल जाता है, लेकिन सुंदर स्वभाव उम्र के साथ और भी कीमती हो जाता है.”आप दिन के 24 घंटे किसी के चेहरे को देखकर नहीं बिता सकते. आपको बातें करनी होती हैं, फैसले लेने होते हैं और एक-दूसरे के विचारों को समझना होता है. अगर सोच नहीं मिलती, तो दुनिया का सबसे सुंदर व्यक्ति भी आपको सबसे ज्यादा मानसिक तनाव दे सकता है. जब जीवन में चुनौतियाँ आती हैं—जैसे बीमारी, आर्थिक मंदी या भावनात्मक उतार-चढ़ाव—तब साथी का “गुड लुक्स” आपके काम नहीं आता. उस वक्त काम आता है उसका धैर्य, उसकी सहानुभूति, उसकी समस्याओं को सुलझाने की समझ,

उम्र के साथ शरीर बदलता ही है. जो व्यक्ति आज 25 का फिट नौजवान है, वह 40 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते शारीरिक रूप से बदलेगा ही. अगर आप किसी के साथ 10 साल बिता चुके होते, तो आप उसके बढ़ते वजन या कम होते बालों की वजह से उसे छोड़ते नहीं. यही नजरिया शादी की शुरुआत में भी होना चाहिए. इसलिए जुड़ाव व्यवहार और सोच से होना चाहिए, न कि केवल लुक्स से.

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