Kahaniyan : खारा पानी

Kahaniyan : मुंबई की चाल में पैदा हुई शालिनी, बबलू मास्टर की देखरेख में शालिनी से डांसर शालू और फिर फिल्म स्टार बन गई. विदेशी डेविड को समीप से देखने का मौका मिला तो शालू उस की नीली आंखों में ऐसा खोई कि अपना सबकुछ भूल गई. शालू को क्या पता था कि जिसे वह अपना समझ रही है वह उसे नहीं उस की शोहरत और दौलत को चाहता है…

शालू को पता नहीं क्या हो गया था. 50वीं बार उस ने जिगनेश से किलक कर कहा, ‘‘अमेरिका जा कर सब से पहले डिजनीलैंड देखूंगी.’’

जिगनेश ने जवाब नहीं दिया. इस से पहले वे कई बार कह चुके थे, ‘‘हां, जरूर, उसी के लिए तो हम अमेरिका जा रहे हैं.’’

लेकिन शालू की अमेरिका जाने की वजह कुछ और थी. वह सालों बाद अपने बेटे बौबी और उस के परिवार से मिलने जा रही थी. पिछली बार कब मिली थी बौबी से? वह दिमाग पर जोर डाल कर सोचने लगी. शायद 8 साल पहले. बौबी अकेला ही मुंबई उस से मिलने आया था. बौबी के आने की वजह थी कि वह अमेरिका में एक घर खरीदना चाहता था और उस के पास पैसे नहीं थे. शालू ने अपने लाड़ले बेटे का माथा चूमते हुए तब कहा था, ‘तो क्या हुआ बौबी, मैं हूं न. एकदो धारावाहिक में ज्यादा काम कर लूंगी. तू अपने लिए घर ले, पैसे मैं दूंगी.’

बौबी खुश हो कर 2 दिन बाद ही वापस चला गया था. जिंदगी यों ही बीतती गई. महीने में एकाध बार मांबेटे से बात हो जाती, बस. महीना भर पहले जब शालू ने जिगनेश से शादी करने का निश्चय किया, तब फोन किया था बौबी को. उसे पता था कि उस के निर्णय से बौबी जरूर खुश होगा. बौबी ने उस का संघर्ष और अकेलापन देखा है.

बौबी ने उस से सिर्फ एक सवाल किया, ‘‘मां, तुम सोचसमझ कर शादी कर रही हो ना?’’

‘‘हां, बेटे, जिगनेश ने और मैं ने 3 धारावाहिकों में एकसाथ काम किया है. बहुत अच्छे आदमी हैं. खुले दिल के, हंसते रहते हैं और मेरा बहुत खयाल रखते हैं,’’ शालू उत्साह से बोली थी.

‘‘वह तो ठीक है मां, पर इस उम्र में? वे तुम से क्या चाहते हैं?’’

शालू हंसी थी, ‘‘अरे, पागल, वे मुझ से उम्र में 3 साल छोटे हैं. मुझ से क्या चाहेंगे? बस, हम दोनों एकदूसरे को चाहते हैं, साथ रहना चाहते हैं, बस.’’

उस समय शालू को यह कतई नहीं लगा था कि बौबी उस की शादी से नाखुश है. जब उस ने बताया कि वे दोनों उस से मिलने अमेरिका आ रहे हैं तो वह चौंका.

शालू प्यार से बोली, ‘‘बौबी, मैं ने तेरी बेटी को नहीं देखा. बहू से भी नहीं मिली. वहां आऊंगी तो सब से मिलना भी हो जाएगा और मेरा डिजनीलैंड देखने का सपना भी पूरा हो जाएगा. तू चिंता मत कर. मैं वीजा वगैरह यहीं से बनवा रही हूं. टिकट भी बुक करवा लिया है. बस, तुझे आने की तारीख और फ्लाइट के बारे में बता दूंगी. मैं तो पागल हो रही हूं तुझ से मिलने के लिए. तुझे यहां से क्याक्या चाहिए, बता दे. मैं सब ले आऊंगी.’’

और उत्साह से निकल पड़ी थी शालू अपने बेटे से मिलने अमेरिका.

शालू जब एअर इंडिया के विमान में पति जिगनेश की बगल में बैठी, तो उस की निगाह अपनेआप लगातार उसे घूरते हुए एक अधेड़ व्यक्ति पर पड़ गई. शालू ने निगाह बचानी चाही…बेवजह जिगनेश से बात करने की कोशिश करने लगी कि वह आदमी उठ कर उस के सामने ही आ गया.

उस ने विनीत भाव से कहना शुरू किया, ‘‘क्षमा कीजिए, आप शालू हैं न, फिल्म हीरोइन?’’

शालू नहीं चाहती थी कि उस की इस यात्रा में उसे कोई भी पहचाने, पर अब जवाब तो देना ही था. वह जरा सी हंसी और बोली, ‘‘काहे की हीरोइन? वह जमाना तो गया.’’

‘‘अरे, नहीं, आप क्या कहती हैं शालूजी? आप के कैबरे देखदेख कर तो हम जवां हुए हैं.’’

उस ने सीधे शालू के मर्म पर चोट कर दी. शालू चुप लगा गई. पर उस ने यह भी देख लिया था कि उस के 50 साल के पति जिगनेश को यह सुन कर अच्छा नहीं लगा.

‘‘मैं तो फिल्मों और टीवी में मां और दादी का रोल करती हूं. आप यह कहां की पुरानी बात ले बैठे. अच्छा, आप अपनी जगह जा कर बैठिए. एअर होस्टेस इशारा कर रही है.’’

वह आदमी बेमन से अपनी जगह चला गया. शालू ने नजरें फेर लीं और सोचने लगी कि क्या वाकई उस आदमी की नजरों ने 35 साल पहले की शालू को पहचान लिया था. शालू यानी शालिनी. साथ में कोई नाम नहीं. मुंबई की एक चाल में पैदा हुई थी शालिनी और उस की बहन कामिनी. दोनों गरीबी और अभावों में पलीं. पिता स्टेशन पर कुली का काम करते थे. शालिनी जब 7 साल की थी तो पिता चल बसे थे. मां के बस की बात नहीं थी कि 2 लड़कियों को अपने दम पर पालतीं. वे दोनों बच्चियों को ले कर अपने भाई के घर चली आईं.

बस, वहां पेट भरने लायक खाना मिल जाता था. स्कूल जाने का तो कभी सवाल ही नहीं उठा. 12 साल की शालिनी को मामा फिल्मों में ग्रुप डांस करवाने वाले बबलू मास्टर के पास ले कर गए. बबलू मास्टर 40 साल के अनुभवी व्यक्ति थे. डरीसहमी शालिनी में न जाने उन्होंने क्या देखा कि मामा को कह दिया, ‘इसे कल से मेरे पास भेज दो, कुछ बन जाएगी.’

बबलू मास्टर के पास शालिनी कथक सीखने लगी और साल भर बाद मास्टरजी उसे हीरोइन के पीछे खड़ा कर नचवाने लगे. शालिनी अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों के मुकाबले लंबी थी. सलोना चेहरा. हमेशा चुप रहती. धीरेधीरे वह बबलू मास्टर की प्रिय शिष्या बन गई. जब हाथ में थोड़ा पैसा आने लगा तो उस ने अपनी छोटी बहन कामिनी को पढ़ने स्कूल भेज दिया. उसी के साथ बैठ कर थोड़ा पढ़ना भी सीख लिया.

शालिनी ने कभी नहीं सोचा था कि ग्रुप डांस करतेकरते एक दिन वह एक नायिका बन जाएगी. हालांकि उस के सामने ही ऐक्स्ट्रा की भूमिका निभाने वाली मुमताज नायिका बनी थीं लेकिन अपने लिए उस ने इतना सबकुछ सोचा ही नहीं था.

वह दूर से देखती थी चमचमाती गाडि़यों में सितारों को स्टूडियो आतेजाते. सेट पर उन के आते ही भगदड़ मच जाती थी. निर्मातानिर्देशक जोर से चिल्ला उठते, ‘अरे, कोई है? ठंडा लाओ, कुरसी लाओ.’

शालिनी को अच्छा लगता था दूर से यह सबकुछ देखना. बबलू मास्टर अकसर उसे नसीहतें देते, ‘बेटी, फिल्मी चकाचौंध से जितना दूर रहोगी उतना ही खुश रहोगी. यह कभी मत सोचना कि उन के पास सबकुछ है, तुम्हारे पास कुछ नहीं.’

शालिनी के साथ काम करने वाली दूसरी ग्रुप डांसर कभी किसी जूनियर आर्टिस्ट के साथ घूमने चल देती, तो कभी आगे बढ़ कर किसी हीरो से बात करने की कोशिश करती. बबलू मास्टर उसे समझाते कि इन सब से कुछ नहीं होगा. फिल्मी दुनिया में लड़कियों को संभल कर रहना चाहिए.

2 साल बतौर ग्रुप डांसर काम करने के बाद अचानक एक दिन उस की किस्मत ने पलटा खाया. एक नामी निर्माता की फिल्म में बबलू मास्टर डांस डायरेक्टर थे. फिल्म में एक कैबरे था जो बिंदु को करना था, लेकिन ऐनवक्त पर बिंदु बीमार पड़ गई. सैट लग चुका था, सारी तैयारी हो चुकी थी. निर्माता मुरली भाई परेशान हो उठे और उन्होंने बबलू मास्टर से कहा, ‘मास्टरजी, कुछ करो. बेशक किसी नई लड़की को ले आओ पर मुझे समय पर शूटिंग करनी है, नहीं तो बहुत नुकसान हो जाएगा.’

बबलू मास्टर ने रातोंरात शालिनी को इस कैबरे के लिए तैयार कर लिया. तब शालिनी 16 साल की नहीं हुई थी, लेकिन देहयष्टि कमनीय थी. चेहरा सुंदर था और नाचने में उस का कोई सानी नहीं था. मेकअप आदि के बाद जब मास्टरजी ने शालिनी को कैबरे की पोशाक दी तो छोटी पोशाक देख कर उस का चेहरा सन्न रह गया.

मास्टरजी ने जैसे उस के दिल की बात समझ ली, ‘बेटी, इस से अच्छा मौका तुझे नहीं मिलेगा. पोशाक में क्या रखा है? दिल साफ होना चाहिए.’

शालिनी ने सुनहरे रंग की पोशाक पहन ली. बालों पर सुनहरा ताज, पैरों में सुनहरी जूती. जब मुरली भाई ने उसे देखा तो एकदम से खुश हो गए, ‘वाह, यह लड़की तो गजब ढा देगी. पर इस का नाम ठीक नहीं है, बहुत बड़ा है. हम इसे शालू कहेंगे.’

उस दिन शालिनी से वह शालू बन गई. बबलू मास्टर के नृत्यनिर्देशन में किए गए उस के कैबरे बहुत लोकप्रिय हुए. इस के बाद उसे न जाने कितनी फिल्मों में कैबरे और डांस करने का मौका मिला. जब वह कमर लचकाती, तो लाखों दिल हिल जाते. देखतेदेखते उस की तसवीर फिल्मी पत्रिकाओं में छपने लगी, उस के पोस्टर बिकने लगे.

कभीकभी तो खुद को इस रूप में देख उसे शर्म आती पर धीरेधीरे वह आदी हो गई और उसे अपने काम में मजा आने लगा. बबलू मास्टर हर कदम पर उस के साथ थे. उन से पूछे बिना वह कोई फिल्म साइन नहीं करती थी. चाल से निकल कर वह फ्लैट में आई, छोटी सी गाड़ी भी ली. मामा और मामी भी उस के साथ रहने आ गए.

शालू को पहले तो एक हौरर फिल्म में हीरोइन की भूमिका करने को मिली. बबलू मास्टर नहीं चाहते थे, पर मामा की ख्वाहिश थी कि वह सिर्फ एक डांसर बन कर न रहे. अब मामा ही उस के रुपएपैसे का हिसाब देखने लगे थे. पहली 2-3 फिल्में उस की बी ग्रेड की थीं. एक में वह दस्यु सुंदरी बनी थी, दूसरी में तांत्रिक की बेटी और तीसरी में सरकस की कलाकार. इसी समय उस का परिचय कामेडियन नजाकत अली से हुआ.

नजाकत नामी हास्य अभिनेता थे और एक कामेडी फिल्म बना रहे थे. नायक के लिए उन्होंने एक नए चेहरे बृजेश को चुन लिया था. जब उन्होंने शालू को नायिका बनने का प्रस्ताव दिया तो उसे विश्वास नहीं हुआ. फिल्म बड़े बजट की थी. भूमिका भी अच्छी थी. पहली बार उसे फिल्म में साड़ी पहनने का मौका मिला. शालू ने दिल लगा कर काम किया. फिल्म खूब चली और शालू बन गई एक सफल नायिका. बृजेश के साथ उस की कई फिल्में आईं. उन दोनों की जोड़ी हिट मानी जाने लगी.

शालू को याद नहीं कि वे दिन इतनी जल्दी और कहां उड़ गए. खूब पैसा कमाती थी वह और हमेशा शूटिंग में व्यस्त रहती थी. मुंबई के बांद्रा इलाके में बड़ा सा फ्लैट ले लिया. मामा के लिए एक गाड़ी, कामिनी के लिए दूसरी. खुद वह इंपाला में आतीजाती. बबलू मास्टर से जब कभी मुलाकात होती, वे कहते, ‘बेटी, जरा धीरे चलो. इतना तेज भागोगी तो गिर जाओगी.’

शालू हंस देती, ‘दादा, अब गिरने से डर नहीं लगता.’

लेकिन गिर ही तो गई थी शालू. कहते हैं न, सिर पर जब इश्क का जनून सवार हो जाता है तो आदमी को फिर कुछ नजर नहीं आता. ऐसा ही कुछ हुआ शालू के साथ. डेविड स्वीडन से मुंबई आया था. यहां मायानगरी पर वह एक डाक्यूमैंट्री फिल्म बना रहा था. बबलू मास्टर के यहां ही डेविड से पहली बार मिली थी शालू. उसे देखते ही डेविड अपनी कुरसी से उठ खड़ा हुआ, ‘ओह, सो यू आर द ग्रेट डांसिंग क्वीन.’

शालू सकुचा गई. बबलू मास्टर के कहने पर उस ने डेविड की एक फिल्म में डांस कर लिया.

वह पहली मुलाकात ऐसी थी कि शालू की आंखों की नींद उड़ गई. उस ने जिंदगी में पहली बार किसी विदेशी पुरुष को इतने समीप से देखा था. उस की सांसों की गरमाहट, बात करने का बेतकल्लुफ अंदाज और लहीमशहीम कदकाठी… शालू उस की ओर खिंचती चली गई. डेविड ने न जाने क्या जादू कर दिया उस के ऊपर.

दूसरी मुलाकात के बाद डेविड ने प्रस्ताव रखा कि शालू उसे आगरा ले जाए. वह संसार का 7वां आश्चर्य शालू के संगसाथ खड़ा हो कर देखना चाहता है. शालू आगरा पहले भी जा चुकी थी. ताजमहल के ठीक सामने उस ने एक मुजरा किया था, लेकिन डेविड के साथ ताजमहल देखने का रोमांच वह छोड़ नहीं पाई.

मुंबई से दिल्ली तक विमान से और फिर वहां से टैक्सी ले कर दोनों आगरा पहुंचे थे. शालू डेविड के प्यार में डूब चुकी थी. डेविड का उसे प्यार से बेबी कह कर पुकारना, उस की हर जरूरत का खयाल रखना और सब से जरूरी उस का अतीत जानने के बाद भी उस का साथ देना, उसे भा गया.

आगरा मेें वे दोनों फाइव स्टार होटल में ठहरे. डेविड ने अपने दोनों के लिए अलगअलग कमरे बुक किए थे, लेकिन वहां वे दोनों रुके एक ही कमरे में और उसी दिन यह तय कर लिया कि मुंबई जाते ही दोनों कोर्ट में शादी कर लेंगे. डेविड को उस के फिल्मों में काम करने से आपत्ति नहीं थी बल्कि वह खुद भी मुंबई में ही रह कर कुछ काम करना चाहता था.

ताजमहल जहां प्रेम का आगाज होता है और परवान चढ़ता है. शालू ने मुग्ध भाव से सफेद संगमरमर की इमारत को रात के अंधेरे में चांदनी बन चमकते देखा. ‘वाह’, डेविड ने उस का हाथ पकड़ कर कहा था, ‘अमेजिंग.’

शालू को मतलब समझ में नहीं आया, लेकिन इतना एहसास हुआ कि वह ताजमहल की तारीफ कर रहा था. उस रात दोनों देर तक ताज के सामने बैठे रहे और डेविड बारबार उसे जतलाता रहा कि वह उस से कितनी मोहब्बत करता है.

शालू ने मुंबई लौटने के बाद जैसे ही मामा को बताया कि वह डेविड से शादी करने जा रही है, वे एकदम फट पड़े, ‘तेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया, शालिनी? एक गोरे से शादी कर रही है, वह भी कैरियर के इस मोड़ पर? शादीशुदा हीरोइनों को फिल्म लाइन में कोई नहीं पूछता. इस समय तुझे पूरा ध्यान फिल्मों में लगाना चाहिए. मैं नहीं करने दूंगा तुझे शादी.’

मां, मामी और कामिनी ने भी उसे काफी कुछ सुनाया. शालू एकदम से सकते में आ गई. इतने बरस तक उस ने जो कुछ किया कमाया, घरवालों के हाथ में रखा. कभी अपने पैसे का हिसाब नहीं पूछा और आज जब वह अपनी गृहस्थी बसाने की सोच रही है, कोई उसे उस की जिंदगी नहीं जीने देना चाहता. रात भर बिस्तर पर पड़ीपड़ी रोती रही शालू.

सुबह हुई. दर्द से आंखों के पपोटे दुखने लगे थे. मन हुआ कि एक कप चाय पी ले. उस ने अपने कमरे का दरवाजा खोलने की कोशिश की लेकिन वह तो बाहर से बंद था.

वह अपने ही घर में कैद कर ली गई थी. शालू के दिमाग ने जैसे सोचना- समझना बंद कर दिया. 10 बजे मां कमरे में आईं, चाय और नाश्ता ले कर और सीधे स्वर में बोलीं, ‘देख शालिनी, तुम्हारे मामा बहुत गुस्से में हैं, वह तो तुम पर उन का हाथ उठ जाता, पर मैं ने ही रोक लिया कि…’

शालू धीरे से बुदबुदाई, ‘सोने का अंडा देने वाली मुरगी को कैसे मारेंगे,  अम्मां?’

दोपहर को मामा उसे स्टूडियो छोड़ने आए. आज उसे एक गंभीर सीन करना था पर शालू हर बार गड़बड़ा जाती. एक बार तो सीन करतेकरते वह गिर पड़ी. उस का हाल देख कर शूटिंग कैंसिल कर दी गई. शालू कपडे़ बदलने के बहाने स्टूडियो के पिछले रास्ते से बाहर निकल एक आटो पकड़ कर सीधे डेविड के होटल पहुंच गई.

डेविड को जैसे उस का ही इंतजार था. तुरंत वे दोनों वहां से एक टैक्सी ले कर लोनावाला के लिए निकल गए. अगले दिन लोनावाला के एक मंदिर में माला बदल शादी कर ली और शालू ने एक पत्रकार को अपनी शादी की खबर बता दी.

अगले दिन सभी अखबारों में शालू की शादी की खबर छप गई. शादी के पहले कुछ दिन अच्छे गुजरे. 2 महीने बीततेबीतते डेविड ने उस पर दबाव डालना शुरू कर दिया कि वह मामा और मां से अपने पैसों का हिसाब ले. अपना घर होते हुए भी वह किराए के घर में क्यों रहती है? इस बीच शालू को एहसास हो गया कि वह मां बनने वाली है. उस के हाथ जो बचीखुची फिल्में थीं, वे भी निकलती चली गईं.

इधर डेविड के रोज के तानों से वह आजिज आती चली गई. शादी से पहले जिस व्यक्ति की रोमांटिक बातें, रूपरंग उसे लुभाते थे, अब उसी व्यक्ति का यह रूप उसे डराने लगा. हर समय वह पैसे की बात करता. डेविड ने मामा को कानूनी नोटिस भेज दिया कि वह शालू के पैसे और घर वापस करें, लेकिन मामा ने कुछ भी शालू के नाम नहीं किया था. घर उन के नाम था और सेविंग परिवार के दूसरे सदस्यों के नाम. ज्यादातर तो कामिनी और मामा के ही नाम पर था.

डेविड के हाथ कुछ न लगा. वह बौखला गया और शालू पर दबाव बनाने लगा कि वह गर्भपात करवा ले, जिस से उसे फिल्मों में काम मिल सके.

शालू के लिए बहुत मुश्किल भरे दिन थे. बस, एक अंतिम फिल्म थी उस के हाथ ‘जादूगरनी.’ इस में वह नायिका थी. सुबह उठने का जी नहीं करता. वह उलटियां करती हुई शूटिंग करने जाती. सूखा चेहरा, हाथपांवों में थकान और मन में उदासी. डेविड ने अल्टीमेटम दे दिया था कि वह इस सप्ताह गर्भपात करवा ले.

शालू की आंखों में हर समय तूफान भरा रहता. क्या इस दिन के लिए उस ने अपने परिवार वालों से लड़झगड़ कर शादी की थी? अपना कैरियर दांव पर लगाया था? जिस प्यार के लिए जिंदगी भर तरसी उस का यह हश्र?

यह तो उस के दुखों की शुरुआत भर थी. जैसे ही शालू ने गर्भपात कराने से इनकार किया, डेविड का व्यवहार ही बदल गया. अब शालू के सामने था एक क्रूर और स्वार्थी इनसान, जिसे मतलब था तो सिर्फ शालू की कमाई से. शालू दिन भर शूटिंग में उलझी रहती, शाम को थकीहारी घर आती. डेविड शराब के नशे में चूर उसे दुत्कारता, गालियां सुनाता. जिस दिन शालू ‘जादूगरनी’ की शूटिंग पूरी कर के घर आई, डेविड ने उसे यहां तक कह दिया कि वह कहीं से भी उसे कमा कर दे, अगर फिल्मों से नहीं कमाती तो अपना शरीर बेचे…

शालू ने अपने कानों पर हाथ रख लिया. अंदर तक छलनी कर दिया था डेविड ने उसे. मामा और परिवार के दूसरे सदस्यों के मुकाबले कहीं अधिक स्वार्थी निकला था उस का डेविड. उस रात बाथरूम में अपने को बंद कर रोती रही थी शालू. सुबह हुई तो उठ नहीं पाई. शरीर गरम तवे सा जल रहा था. लग रहा था मानो उस के अंदर एक ज्वालामुखी भर गया हो, जो किसी भी वक्त फट पड़ेगा. डेविड की चिल्लाने की आवाज लगातार आती रही पर इस समय शालू को न उस की आवाज से डर लग रहा था न उस के होने की दहशत.

शालू उठी, धीरे से दरवाजा खोला. दरवाजे के सामने ही डेविड बदहवास सोया पड़ा था. किसी तरह उस के शरीर को लांघ कर शालू बाहर सड़क पर आ गई और आटो पकड़ सीधे वह बबलू मास्टर के घर पहुंची.

दादर में एक पुरानी इमारत में दूसरे माले पर बबलू मास्टर रहते थे. लकड़ी की सीढि़यां पार कर शालू उन के घर के सामने खड़ी हुई. अंदर से बबलू मास्टर के खांसने की आवाज आ रही थी. दरवाजा खुला था. शालू को देख बबलू मास्टर की बहू ने पूछा, ‘कौन? क्या मांगता है?’

शालू किसी तरह दरवाजे की टेक लगाए इतना ही बोल पाई, ‘मैं, शालू.’

अस्तव्यस्त कपड़े, बिखरे बाल और बुखार से तपता शरीर, इस समय शालू एक फिल्म की तारिका नहीं, बल्कि किस्मत की मारी दुखियारी लग रही थी.

बबलू मास्टर के सामने शालू फूटफूट कर रो पड़ी. उन्होंने उस के सिर पर हाथ रख कर सिर्फ इतना ही कहा, ‘इस बूढ़े, बीमार आदमी की बात मान जाती बेटी तो…’

शालू बिलखने लगी, ‘दादा, मुझे बचा लो. वह आदमी मेरे बच्चे को मार डालेगा.’

बबलू मास्टर को धीरेधीरे शालू ने पूरी बात बताई. यह तो वे भी जानते थे कि शालू के हाथ कोई फिल्म नहीं रही. वैसे भी शादीशुदा नायिकाओं को कोई अपनी फिल्म में लेना पसंद नहीं करता है, वह भी ग्लैमरयुक्त भूमिकाओं में.

बबलू मास्टर की एक मौसी रत्नागिरी में रहती थीं. तय हुआ कि शाम की बस से उन की पत्नी और बहू के साथ शालू रत्नागिरी जाएगी और बच्चा होने तक वहीं रहेगी.

बबलू मास्टर ने शालू को समझाते हुए कहा, ‘देख बेटी, शूटिंग पूरी होने के बाद डबिंग होने में काफी समय लगता है. तब तक तो तू लौट आएगी. इस के बाद देखते हैं क्या करना है.’

शालू के पास इस के अलावा कोई रास्ता नहीं था. बस, इतना भर याद रहा कि रत्नागिरी पहुंचतेपहुंचते उस के तन में ताकत रही न मन में जीने की आशा. बबलू मास्टर की बहू तारा उस का खूब खयाल रखती. बच्चे की दुहाई दे कर खिलातीपिलाती. शालू का दिमाग कुंद पड़ता जा रहा था. अपने बच्चे को बचाने की खातिर वह सब से भाग कर यहां तो आ गई, पर आगे क्या करेगी? मुंबई में न उस का घर रहा न कोई काम, जिस के भरोसे बच्चे को पाल सके. फिर डेविड क्या उसे इतनी आसानी से छोड़ देगा? डेविड की याद आते ही पूरे शरीर में झुरझुरी सी आ जाती. कई बार उस का मन किया कि मां को फोन करे, कामिनी से बात करे पर वह रुक जाती. इन में से किसी ने उस का तब साथ नहीं दिया था जब वह डेविड से शादी करने जा रही थी. सब उसे बांध कर रखना चाहते थे, ताकि वह पैसा कमा कर उन्हें देती रहे. क्या अब उस का साथ देंगे? कहीं वे भी उस के बच्चे के पीछे तो नहीं पड़ जाएंगे?

दिन भर बिस्तर पर पड़ीपड़ी यही सब सोचती रहती शालू. शाम को तारा उसे जबरदस्ती बाहर अपने साथ घुमाने ले जाती. शालू ने यहां आने के बाद अपने हाथ और कानों का सोना बेच अपने लिए कुछ कपड़े खरीदे और बाकी पैसे बबलू मास्टर की पत्नी के हाथ में रख दिए. इस के अलावा उस के पास देने के लिए था ही क्या?

आखिर 5 महीने बाद शालू के मन की मुराद पूरी हुई. उसे बेटा हुआ, अपने बाप की तरह गोराचिट्टा, नीली आंखों वाला. उसे देखते ही शालू अपने सारे गम भूल गई.

तारा ने ही उस का नाम बौबी रखा. अपनी गोद में बच्चे को ले कर तारा चहकते हुए बोली, ‘देखो, शालू दीदी, यह बिलकुल बौबी फिल्म के हीरो ऋषि कपूर की तरह लगता है. इतना सुंदर बच्चा मैं ने कभी नहीं देखा. इस का नाम बौबी रखो, दीदी.’

शालू को बौबी का कोई काम नहीं करना पड़ा. दिनभर तारा उस की देखभाल करती. बबलू मास्टर की पत्नी उस की मालिश करती, नहलातीधुलाती.

बौबी 1 महीने का हुआ. अब मुंबई वापस जाने का समय आ गया था. इस कल्पना से ही शालू को दहशत होने लगी.

लौट कर सब बबलू मास्टर के ही घर आए. इस बीच बबलू मास्टर ने ‘जादूगरनी’ के निर्माता को बता दिया कि शालू बच्चे के जन्म के लिए बाहर गई है, लेकिन डेविड ने खूब तमाशा किया, कहांकहां नहीं ढूंढ़ा उसे. शालू के बारे में उसे कहीं से कोई खबर नहीं मिली.

बबलू मास्टर के घर एक दिन रुक कर अगले दिन शालू बौबी को ले कर अपने मामा के घर गई. वह घर, जिसे उस ने तिनकातिनका जोड़ कर संवारा था. मां उसे देखते ही रो पड़ीं, भाग कर बौबी को गोद में उठा लिया लेकिन मामा और कामिनी का बरताव बेहद रूखा था.

कामिनी की शादी होने वाली थी और मामा नहीं चाहते थे कि उस समय शालू वहां रहे भी. ‘तुम्हारी शादी की वजह से वैसे भी बहुत बदनामी हो चुकी है हमारी. तुम्हारा पति आएदिन यहां आ कर शोर मचाता रहता है. इस समय हमें कोई झमेला नहीं चाहिए,’ मामा इतना बोल कर चले गए थे.

शालू की आंखें भर आईं. उस से यह भी कहते नहीं बना कि ये शानोशौकत और घर उस की कमाई के हैं. वह अपने बच्चे को गोद में उठाए चलने को हुई, मां ने उस की बांह पकड़ ली, ‘शालू, कहां जा रही है? मैं भी चलूंगी तेरे साथ.’

शालू अपनी मां के साथ घर से बाहर निकल आई. इस के बाद शुरू हुआ संघर्ष का लंबा दौर. इस बीच डेविड न जाने कहां निकल गया था. किराए के घर में अपने दुधमुंहे बच्चे को मां के पास छोड़ कर शालू निर्मातानिर्देशकों के पास काम मांगने जाती लेकिन हर तरफ से निराशा मिलती. चंद महीने पहले की कामयाब और चर्चित नायिका को पूछने वाला कोई न था. उस की फिल्म ‘जादूगरनी’ भी बीच में ही अटक गई थी. कई निर्माताओं ने तो उस पर कटाक्ष भी कर दिया कि अब वह पहले की तरह सैक्सी नहीं दिखती. मां बन गई है तो मां की ही भूमिकाएं मिलेंगी उसे.

2 महीने बाद उसे एक फिल्म में छोटी सी भूमिका मिली. जिस नायक के साथ साल भर पहले वह मुख्य नायिका थी, आज उस की भाभी का किरदार कर रही थी शालू. लेकिन काम तो करना ही था. घर का किराया, बच्चे का खर्च इन सब की जिम्मेदारी उठानी थी उसे. 22 साल की उम्र में भाभी और बहन की भूमिकाएं निभाने के बाद वह मां की भी भूमिका निभाने लगी. काम वह दिल लगा कर करती, लेकिन जैसे हंसना ही भूल गई थी शालू. अपना काम निबटा कर घर आने की जल्दी होती उसे. बौबी बड़ा हो रहा था और अब तुतला कर बोलने लगा था.

हर समय उसे एक ही आशंका बनी रहती कि अगर किसी दिन डेविड लौट आया तो?

एक दिन उस की आशंका सही निकली. जिंदगी पटरी पर चलने लगी थी. वह फिल्मों में छोटीमोटी भूमिकाएं करने लगी. भूल चली थी कि एक समय वह इसी फिल्म इंडस्ट्री में नायिका हुआ करती थी. पुराने सारे तार काट डाले. मुश्किल था उस के लिए यह सब करना. अभी वह युवा थी, एक बच्चे की मां, और वह भी अकेली औरत. रोज ही उस के सामने लुभावने प्रस्ताव आते, कई निर्माता- निर्देशक तो साफ कहते कि अगर वह बेहतर रोल और पैसा चाहती है तो उसे समझौता करना होगा.

शालू का चेहरा कठोर हो चला था. वह बेहद विनम्रता से उन की बात ठुकरा देती. उसे कम पैसों में एक बार फिर जिंदगी चलाना आ गया.

इस बीच, मां बीमार रहने लगीं, बौबी की जरूरतें बढ़ने लगीं और एक दिन…

शाम की शिफ्ट थी. महबूब स्टूडियो में वह हीरो की मां का रोल कर रही थी. बालों में सफेद विग, सफेद साड़ी पहने और पूरी बांह का ब्लाउज. उस से उम्र में बस 1 साल छोटी निकिता फिल्म की नायिका थी. हाथ में चाय का गिलास लिए छोटीछोटी चुस्कियां भर रही थी शालू कि अचानक सामने डेविड नजर आ गया.

और शालू के हाथ से चाय का गिलास फिसल कर साड़ी पर बिखर गया. दिल जोरों से धड़कने लगा. हां, पूरे 4 साल बाद उसे देख कर उस की तरफ चला आया डेविड.

शालू को काटो तो खून नहीं. इतने में स्पौट बौय उस के पास आ कर उस की साड़ी साफ करने लगा.

डेविड आ कर सीधे उस के कदमों में बैठ गया. पहले से कहीं दुबलापतला, अधमरा, बढ़ी दाढ़ी, पिचके गाल और खिचड़ी बाल. जैसे ही उस ने शालू के कदमों पर अपना सिर रखा, वह चिहुंक कर उठ खड़ी हुई.

डेविड कुछ लरजता सा बोला, ‘शालू डार्लिंग, मुझे माफ कर दो. मैं ने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया है. तुम्हारी जिंदगी तबाह कर दी. प्लीज…मुझे अपना लो.’

शालू इस के लिए तैयार नहीं थी. उस ने हमेशा डेविड को गरजते, झगड़ते ही देखा था. डेविड का यह नया रूप था लेकिन उस की आंखें वही थीं. संशय से भरी आंखें. शालू ने धीरे से कहा, ‘मेरा पीछा छोड़ दो. मेरे पास अब तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है.’

डेविड चिरौरी करने लगा, रोने लगा, ‘शालू, मैं ने बहुत धक्के खाए हैं. अब कभी मैं तुम्हें तंग नहीं करूंगा. मुझे घर ले चलो.’

‘कौन सा घर?’ शालू के होंठों पर विद्रूप मुसकान तैर आई, ‘तुम ने मेरे लिए कुछ छोड़ा ही नहीं.’

वह उठी और लंबे डग भरती वहां से चली गई. शौट खत्म कर जब वह आई तो मन में हलचल मची थी कि कहीं डेविड बाहर उस का इंतजार तो नहीं कर रहा? किसी तरह उस ने मेकअप आर्टिस्ट लतिका को अपने साथ चलने के लिए राजी किया. स्टूडियो के बाहर से वह रोज घर जाने के लिए आटो लेती थी. उस ने लतिका से कहा कि वह आटो वाले को बुलाए, सिर पर आंचल रख कर शालू वहां से निकली और सीधे आटो में बैठ गई.

Relationship : जैनरेशन ऐक्स टू नैक्स्ट

Relationship : दोस्तो, यह महिलाओं का युग है. वे अब नौकरी और पढ़ाई की तरह प्रेम संबंधों में भी पुरुषों पर हावी होना चाहती है. आधुनिक महिलाएं अब प्रेम संबंधों के लिए अपने से युवा साथियों को खोजने लगी हैं क्योंकि उन पर रोब जमाने और अपने अनुसार चलाने में उन्हें आसानी होती है. 60% महिलाएं युवा लड़कों के साथ डेट करना चाहती हैं. 63% महिलाएं प्यार में उम्र की परवाह नहीं करतीं. आज ज्यादातर महिलाएं खुद से कम उम्र के युवाओं के साथ डेट करने के लिए तैयार हैं. 35% महिलाएं रिश्ते में सैक्स के साथ इमोशनल इंटिमेसी को भी महत्त्वपूर्ण मानती हैं जिस के लिए वे अपने से 10 से 15 साल छोटे पुरुष को ज्यादा सुरक्षित मानती हैं.

ये कुछ बातें हैं जो डेटिंग ऐप के नए सर्वे में सामने आई हैं. दुनियाभर के 27 हजार से ज्यादा सिंगल्स और कपल्स पर हुई इस रिसर्च में इस तरह की कई नई रोचक जानकारी सामने आई है.

रिश्ते की दुनिया में क्या कुछ चल रहा है, रिश्ते के बारे में महिलाओं की सोच में क्या परिवर्तन आया है? रिश्ते के बाजार में नया ट्रेंड क्या है? पौपुलर डेटिंग ऐप की यह रिसर्च नए रिश्ते गांठने और पुरानों को धार देने में मददगार साबित हो सकती है.

इतिहास में ऐसी कई शक्तिशाली और प्रभावशाली महिलाएं हुई हैं, जिन्होंने अपने से कम उम्र के पुरुषों के साथ संबंध बनाए. इन संबंधों को अकसर समाज के नियमों के विरुद्ध माना जाता था लेकिन इन महिलाओं ने सामाजिक अपेक्षाओं की परवाह नहीं की.

यहां कुछ ऐसी महान महिलाओं के बारे में जानकारी दी जा रही है, जिन्होंने युवा पुरुषों के साथ संबंध रखा था:

क्लियोपेट्रा और मार्क एंटनी की जोड़ी विश्वप्रसिद्ध है. मिस्र की रानी अपनी बुद्धि, आकर्षण और राजनीतिक कौशल के लिए जानी जाती थीं. उन का सब से प्रसिद्ध प्रेम प्रसंग रोमन जनरल मार्क एंटनी के साथ था. जब वे मिले, तब क्लियोपेट्रा की उम्र एंटनी से 10 साल ज्यादा थी. दोनों के बीच एक गहरा प्यार और राजनीतिक गठबंधन था, जिस ने रोमन साम्राज्य को भी प्रभावित किया.

दूसरा प्रसिद्ध नाम है कैथरीन द ग्रेट और ग्रिगोरी पोटेमकिन रूस की महारानी कैथरीन द ग्रेट. वे इतिहास की सब से शक्तिशाली शासकों में से एक थीं. उन के कई प्रेमी थे, जिन में से ज्यादातर उन से छोटे थे. उन के सब से करीबी और भरोसेमंद प्रेमी ग्रिगोरी पोटेमकिन थे जो उन से लगभग 10 साल छोटे थे. उन का संबंध केवल शारीरिक नहीं था बल्कि एक गहरा भावनात्मक और राजनीतिक गठबंधन भी था.

तीसरा प्रसिद्ध नाम मैरी क्यूरी और पाल लैंग्विन. महान वैज्ञानिक मैरी क्यूरी, जिन्होंने 2 बार नोबेल पुरस्कार जीता, अपने पति पियरे क्यूरी की मृत्यु के बाद एक और वैज्ञानिक पौल लैंग्विन के साथ रिश्ते में आईं. पौल लैंग्विन उन से 5 साल छोटे थे. उस समय पौल लैंग्विन शादीशुदा थे, जिस कारण यह रिश्ता सार्वजनिक तौर पर एक बड़ा विवाद बन गया था. इस के बावजूद यह रिश्ता विज्ञान और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन की एक मिसाल पेश करता है.

भारतीय संदर्भ में सब से प्रसिद्ध उदाहरण राधा और कृष्ण का है. राधा और कृष्ण का प्रेम संबंध हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति में एक पवित्र, आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक प्रेम की मिसाल है. यह संबंध भक्ति, प्रेम और आत्मिक एकता का प्रतीक माना जाता है जो भौतिक सीमाओं से परे है. राधाकृष्ण का प्रेम मुख्य रूप से भक्ति साहित्य जैसे गीत गोविंद, भागवत पुराण और अन्य पुराणों में वर्णित है.

राधाकृष्ण की प्रेम लीलाएं मुख्य रूप से वृंदावन, बरसाना और गोकुल में हुईं. रासलीला, जिस में राधा और गोपियों के साथ कृष्ण का नृत्य और प्रेम भरा व्यवहार वर्णित है, उन की आत्मिक निकटता को दर्शाता है. राधा को कृष्ण की प्रिय सखी और प्रेमिका माना जाता है. कुछ ग्रंथों में उन्हें श्रीकृष्ण की पत्नी के रूप में भी देखा जाता है लेकिन अधिकांश परंपराओं में वे अविवाहित रह कर कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति को दर्शाती हैं.

राधा और कृष्ण की उम्र के अंतर के बारे में विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में अलगअलग उल्लेख मिलते हैं. हालांकि, यह अंतर सटीक रूप से निर्धारित नहीं है क्योंकि उन की लीलाएं आध्यात्मिक और अलौकिक संदर्भ में देखी जाती हैं. राधा कृष्ण से लगभग 4 साल बड़ी थीं, यह उम्र का अंतर उन की प्रेम लीलाओं में महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता क्योंकि उन का संबंध शारीरिक उम्र से परे था.

इन महिलाओं के जीवन से यह पता चलता है कि प्यार और रिश्ते सिर्फ उम्र से तय नहीं होते बल्कि आपसी समझ, सम्मान और भावनाओं से बनते हैं.

अपने से 10-15 साल छोटे पुरुषों के साथ प्रेम संबंध रखने के लाभ व्यक्तिगत परिस्थितियों, जीवनशैली और अपेक्षाओं पर निर्भर करते हैं.

यह एक संवेदनशील विषय है और हमें इसे सामान्य, सम्मानजनक और तटस्थ दृष्टिकोण से संबोधित करना चाहिए. यहां कुछ संभावित लाभ दिए गए हैं जो सामान्य सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं. कृपया ध्यान दें कि ये लाभ हर व्यक्ति या स्थिति पर लागू नहीं हो सकते:

ऊर्जा और उत्साह: छोटी उम्र के पुरुष अकसर अधिक ऊर्जावान और जीवन के प्रति उत्साही हो सकते हैं. ये रिश्ते में नई ताजगी और रोमांच ला सकते हैं, जिस से जीवन में नई गतिविधियों और अनुभवों का आनंद लिया जा सकता है.

नया दृष्टिकोण: छोटी उम्र के लोग अकसर आधुनिक विचारों, तकनीक और रु?ानों से अधिक जुड़े होते हैं. यह रिश्ते में नई सोच और दृष्टिकोण ला सकता है जो दोनों पक्षों के लिए सीखने का अवसर हो सकता है.

जीवन में रोमांच: उम्र के अंतर के कारण रिश्ता अधिक गतिशील और रोमांचक हो सकता है. अलगअलग पीढि़यों के अनुभवों का मिश्रण रिश्ते को अनोखा बना सकता है.

आत्मविश्वास में वृद्धि : अपने से छोटे व्यक्ति के साथ प्रेम संबंध में होना कुछ लोगों के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला हो सकता है क्योंकि यह उन की आकर्षण शक्ति और व्यक्तित्व की पुष्टि करता है.

स्वतंत्रता और लचीलापन : छोटी उम्र के पुरुष कभीकभी कम पारंपरिक या बंधनकारी दृष्टिकोण रखते हैं, जिस से रिश्ते में अधिक स्वतंत्रता और लचीलापन हो सकता है. हालांकि यह भी महत्त्वपूर्ण है कि प्रेम संबंधों में आपसी सहमति, सम्मान और भावनात्मक परिपक्वता सर्वोपरि होनी चाहिए. उम्र के अंतर के साथ आने वाली चुनौतियां जैसे सामाजिक दृष्टिकोण, जीवन के लक्ष्यों में भिन्नता या पारिवारिक स्वीकृति को भी ध्यान में रखना चाहिए.

जैनरेशन ऐक्स, वाई तथा जेड

यदि प्रेम संबंध अगली पीढ़ी के व्यक्ति से किया जा रहा है तो नई तरह की चुनौतियों और समस्याओं का सामना करना पड़ता है. जैनरेशन  ऐक्स उन लोगों को कहा जाता है जो सामान्यत: 1965 से 1980 के बीच जन्मे हैं. यह शब्द समाजशास्त्र और जनसांख्यिकी में उपयोग होता है जो उस पीढ़ी को दर्शाता है जो बेबी बूमर्स (1946-1964) और मिलेनियल्स (1981-1996) के बीच आती है.

जैनरेशन ऐक्स की खास विशेषताएं उन्हें अपनी अगली पीढि़यों से उत्कृष्ट बनाती हैं. ये हर तरह के तकनीकी बदलाव के साक्षी हैं. यह पीढ़ी एनालाग से डिजिटल युग की ओर बदलाव की गवाह रही है. इस ने पर्सनल कंप्यूटर, इंटरनैट और मोबाइल फोन के शुरुआती विकास को देखा.

ऐक्स जैनरेशन आज स्वतंत्र और आत्मनिर्भर है, ये लोग ऐसे समय में बड़े हुए जब मातापिता दोनों कामकाजी थे, जिस कारण इन्हें ‘लैचकी किड्स’ भी कहा गया. यह पीढ़ी पौप संस्कृति जैसे ग्रंज संगीत, एमटीवी, और वैकल्पिक फैशन से प्रभावित है. जैनरेशन ऐक्स को काम और निजी जीवन में संतुलन की चाह रखने वाली पहली पीढ़ी माना जाता है. ये लोग सामाजिक और आर्थिक बदलावों जैसे वैश्वीकरण और आर्थिक अनिश्चितता, के बीच बड़े हुए, जिस ने इन्हें अनुकूलनीय और व्यावहारिक बनाया. भारत में जैनरेशन ऐक्स ने आर्थिक उदारीकरण (1991) के दौर को देखा, जिस ने उन के कैरियर और जीवनशैली को प्रभावित किया. यह पीढ़ी अकसर परंपराओं और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाती दिखती है.

इस के बाद की पीढ़ी को जैनरेशन वाई या मिलेनियल्स कहा जाता है, जिन का जन्म 1981 से 1996 के बीच हुआ. मिलेनियल्स वह पहली पीढ़ी हैं जिस ने इंटरनैट, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के व्यापक उपयोग को अपने जीवन में देखा. ये लोग उच्च शिक्षा और कैरियर की विविधता को महत्त्व देते हैं लेकिन अकसर आर्थिक अनिश्चितता (जैसे 2008 की मंदी) का सामना इन्होंने किया. मिलेनियल्स सामाजिक न्याय, पर्यावरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देते हैं. वर्कलाइफ को बैलेंस करने में इन्हें माहिर माना जाता है. ये लोग नौकरी में लचीलापन और अर्थपूर्ण काम को प्राथमिकता देते हैं.

इस के बाद की पीढ़ी को जैनरेशन जेड कहा जाता है, जिस का जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ. जैनरेशन जेड की मुख्य विशेषता यह है कि यह पूर्ण डिजिटल नेटिव्स है. इसे स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक के साथ बड़ी होने वाली पहली पीढ़ी माना जाता है. ये लोग वैश्विक मुद्दों जैसे जलवायु परिवर्तन और सामाजिक समानता के प्रति जागरूक हैं. जैनरेशन जेड में स्वरोजगार, स्टार्टअप और फ्रीलांसिंग की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है. ये लोग मानसिक स्वास्थ्य और आत्म देखभाल को महत्त्व देते हैं.

भारत में मिलेनियल्स और जैनरेशन जेड ने डिजिटल क्रांति (जैसे जियो और सस्ते स्मार्टफोन) और स्टार्टअप संस्कृति को अपनाया. मिलेनियल्स अकसर परंपराओं और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाते हैं, जबकि जैनरेशन जेड  अधिक वैश्विक और स्वतंत्र दृष्टिकोण रखती है.

सुपीरियोरिटी औफ जेन ऐक्स

भले जेन जेड को बहुत ही आकर्षक और ऊर्जावान माना जाता है लेकिन जेन ऐक्स के पास सुपर नेचुरल पावर है. यह पीढ़ी तकनीकी परिवर्तन की गवाह है. जेन वाई जहां आरामतलब और सुविधा पसंद है वही जेन वाई ने न सिर्फ तकनीकी परिवर्तन को देखा है बल्कि उस के अनुरूप परिवर्तन भी किए हैं. यह वह पीढ़ी है जिस ने स्कूल की गंदी टंकी का पानी पीने के बाद अब बोतल बंद पानी पीना शुरू किया. इसे कबूतर से संदेश भेज कर प्रेम कहानी को आगे बढ़ाने तक के तजरबे हैं तो मैं आप को यह बताना चाहती हूं कि फ्लर्ट करना आप के डीएनए में है. फ्लर्ट करना एक जैविक प्रवृत्ति है जो हमारी प्रजनन की मानवीय इच्छा से जुड़ी है तो आप का फ्लर्टिंग गेम कहीं न कहीं मौजूद है, आप को बस यह जानना है कि इस का इस्तेमाल कैसे करें और इसे कैसे उजागर करें.

जब आप किसी ऐसे लड़के के साथ फ्लर्ट करने के बारे में सोच रही हैं जो आप से छोटा है तो कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. आत्मविश्वास के साथ फ्लर्ट करें और दिखाएं कि आप कौन हैं. यहां कुछ सु?ाव प्रस्तुत हैं जो आप की मदद कर सकते हैं:

आत्मविश्वास और सहजता

फ्लर्ट करने का सब से अच्छा तरीका है कि आप खुद सहज रहें. जब आप सहज होती हैं तो सामने वाला भी आप के साथ सहज महसूस करता है. सब से जरूरी है कि आप सम्मान और सीमाओं का ध्यान रखें. अगर आप को कोई चीज पसंद नहीं है तो सीधे और विनम्रता से बताएं.

आई कौंटैक्ट

आंखों की भाषा को जैनरेशन के अलावा और कौन हथियार की तरह इस्तेमाल करता है. जब आप बात कर रही हों तो उस की आंखों में देखें. यह दिखाता है कि आप आत्मविश्वास से भरपूर हैं. आंखों की भाषा में बात करने से आप किसी असहज स्थिति से आसानी से बच सकती हैं.

मुसकराएं

मुसकराना सब से सरल और प्रभावी तरीका है. इस की ताकत का नई जैनरेशन कभी प्रयोग ही नहीं करती. एक सच्ची मुसकान आप के फ्लर्ट को और भी आकर्षक बनाती है.

बातचीत की शुरुआत

अगली पीढ़ी के पुरुष से बातचीत शुरू करने के लिए आप को ऊपर सु?ाए गए उन के पसंदीदा टौपिक से प्रारंभ करना चाहिए, सामान्य और सहज विषयों का इस्तेमाल करें.

उन की रुचियों के बारे में पूछें

नई पीढ़ी बहुत कम इन बातों का ध्यान करती है. उन से उन के पसंदीदा खेल, फिल्मों या शौक के बारे में पूछें. इस से उन्हें लगेगा कि आप उन में रुचि ले रही हैं.

मजेदार और हलकीफुलकी बातें करें

अपने से बड़ों को बोरिंग समझना युवाओं के दूर भागने की सब से बड़ी वजह होती है. तनावपूर्ण या गंभीर विषयों से बचें. हलकीफुलकी और मजेदार बातचीत से रिश्ता मजबूत होता है. पर साथ ही उन की व्यक्तिगत जगह का सम्मान करें और उन की सीमाओं को पार न करें.

उम्र के अंतर को स्वीकार करें

उम्र का अंतर कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन इसे स्वीकार करना और मजाक में लेना दोनों के लिए सहज हो सकता है. आप कह सकती हैं कि तुम मु?ा से छोटे हो पर मु?ा से ज्यादा सम?ादार लगते हो. इसे ज्यादा गंभीरता से न लें बल्कि एकदूसरे की उम्र को एक मजेदार पहलू के रूप में देखें.

याद रखें, फ्लर्ट करने का मतलब है कि आप दोनों को मजा आना चाहिए तो मजा करें और खुल कर बात करें. आपसी सहमति और सम्मान सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं.

अगर आप अपने से छोटे लड़के के साथ सैक्स के बारे में सोच रही हैं तो सब से पहले उस से खुल कर बात करें, साफ और सीधी बातचीत करें. अपनी इच्छाओं को साफसाफ बताएं लेकिन यह भी जानें कि वह क्या चाहता है और कैसा महसूस करता है. सैक्सुअल रिलेशनशिप में कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है खासकर जब उम्र का फासला हो. उम्र के अंतर से ज्यादा जरूरी है कि दोनों पार्टनर परिपक्व हों और हर कदम सहमति के साथ उठाएं. इस संदर्भ में निम्नलिखित बातें महत्त्वपूर्ण हैं:

सहमति का सम्मान करें

अगर वह अभी इस के लिए तैयार नहीं है या मना करता है तो उस के फैसले का सम्मान करें. नहीं का मतलब नहीं होता है. किसी भी तरह का दबाव न डालें. यह सम?ाना महत्त्वपूर्ण है कि किसी भी रिश्ते में आपसी सहमति सब से ज्यादा जरूरी है. यह सुनिश्चित करें कि आप दोनों सहज और सुरक्षित महसूस करें, और कोई भी निर्णय लेने से पहले आप दोनों इस पर पूरी तरह सहमत हों. दोनों की पूर्ण और स्पष्ट सहमति होनी आवश्यक है. रिश्ते में पारदर्शिता बनाए रखें. एकदूसरे के प्रति ईमानदार रहें.

जल्दबाजी न करें

किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए समय लगता है. अगर आप दोनों को लगता है कि अभी सही समय नहीं है तो जल्दबाजी न करें. जब दोनों तैयार हों तभी आगे बढ़ें. यह सुनिश्चित करें कि आप के पार्टनर की उम्र 18 साल से ज्यादा हो क्योंकि भारत में 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाना कानूनी तौर पर अपराध है भले ही उस की सहमति हो. हर कदम पर यह सुनिश्चित करें कि आप का पार्टनर सहज महसूस कर रहा है और किसी भी तरह का दबाव नहीं है.

यौन स्वास्थ्य और सुरक्षा

सुरक्षित सैक्स हर उम्र के लिए जरूरी है. यौन संचारित संक्रमण (स्ञ्जढ्ढ) और अनचाहे गर्भ से बचने के लिए हमेशा कंडोम का उपयोग करें. यह सब से प्रभावी तरीका है. अगर आप को या आप के पार्टनर को किसी भी तरह का संदेह हो तो डाक्टर से सलाह लें और जांच करवाएं. यौन संबंध बनाने से पहले और बाद में व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना जरूरी है ताकि संक्रमण का खतरा न रहे.

भावनात्मक परिपक्वता

उम्र का फासला होने पर भावनात्मक परिपक्वता भी अलग हो सकती है. इस के लिए अपने पार्टनर से खुल कर बात करें. अपनी पसंद, नापसंद और सीमाओं के बारे में बताएं. उस का सम्मान करें, अपने पार्टनर के शरीर और भावनाओं का सम्मान करें. यह सुनिश्चित करें कि आप दोनों एकदूसरे की इच्छाओं और सीमाओं को सम?ाते हैं. किसी भी रिश्ते का आधार विश्वास और सम्मान होता है. शारीरिक संबंध के साथसाथ भावनात्मक संबंध भी मजबूत होना चाहिए. एकदूसरे की भावनाओं को सम?ों और उन का समर्थन करें. यह याद रखना जरूरी है कि स्वस्थ यौन संबंध तभी संभव है जब दोनों लोग शारीरिक और भावनात्मक रूप से तैयार हों और हर कदम पर आपसी सहमति हो.

यह भी जानें

आज के बदलते युग में और टैक्नोलौजी के कारण कल्चर में भी बदलाव देखने को मिल रहा है. इस वजह से जेन जेड के बीच डेटिंग की दुनिया में भी बहुत सारे बदलाव आए हैं.

आइए जानते हैं कि वे किसकिस तरह डेटिंग करना पसंद करते हैं:

सिचुएशनशिप

आज के समय में तेजी से टैक्नोलौजी और कल्चर में बदलाव देखने को मिल रहा है. इस वजह से जेन जेड के बीच डेटिंग की दुनिया में भी बहुत सारे बदलाव आए हैं. जहां पहले जमाने में लोग सच्चा प्यार ढूंढ़ते थे और एक ही इंसान से जिंदगीभर प्यार करते थे, वहीं अब लोग हर हर हफ्ते अपना पार्टनर बदलते हैं. आज के डिजिटल युग में प्यार भी सोशल मीडिया पर होने लगा है और डेटिंग भी ऐप्स के जरीए होने लगी है. मिलेनियल्स के लिए जब एक लड़कालड़की एकदूसरे से प्यार करते हैं तो उसे डेट कहा जाता है, लेकिन इन जेन जेड ने डेटिंग को भी कई तरह के लेबल्स दिए हैं.

सिचुएशनशिप एक ऐसा रिलेशनशिप टर्म है जो जेन जेड के बीच दोस्ती और कमिटेड रोमांटिक पार्टनरशिप के बीच एक ग्रे एरिया में मौजूद रिलेशनशिप को बताता है. इस में बिना इमोशंस के फिजिकल इंटीमेसी हो जाती है. सिचुएशनशिप में आप किसी रिश्ते में बंधे नहीं होते हैं और न ही डेट कर रहे होते हैं. इस में अकसर एकसाथ समय बिताना, बातें करना और अन्य चीजें शामिल होती हैं.

ब्रैडक्रंबिंग

ब्रैडक्रंबिंग एक ऐसा शब्द है जिस का मतलब यह है कि किसी इंसान के साथ थोड़ाथोड़ा कम्यूनिकेशन कर के उसे बांध कर रखना, लेकिन कभी भी किसी रिलेशनशिप के लिए पूरी तरह से कमिटमैंट नहीं देना. अगर कोई इंसान आप के सोशल मीडिया पोस्ट पर कमैंट या मीम भेजता है लेकिन वह कभी आपसे मिलने या सीरियस रिलेशनशिप की प्लानिंग नहीं करता है तो उसे ब्रैडकंबिंग कहा जा सकता है.

बैंचिंग

बैंचिंग का मतलब होता है जब कोई इंसान अपनी रिलेशनशिप को किनारे रख कर दूसरे औप्शन की तलाश करता है. वह कभीकभी आप को मैसेज या कौल कर लेता है और आप जब उस से मिलने की बात करते हैं तो वह कोई बहाना बना कर आप को टाल देता है. वह आप के साथ कमिटेड नहीं है. आप को बैकअप के रूप में रखता है ताकि जब उस का ब्रेकअप हो तो आप के साथ अपना रिलेशनशिप शुरू कर सके.

-पूर्णिमा अतुल गोयल 

Social Story : बबूल का माली – क्यों उस लड़के को देख चुप थी मालकिन

Social Story : लड़का अपने शहर रायपुर को छोड़ कर भिलाई पहुंच गया, वहां के बारे में वह बहुत कुछ सुन चुका था. वह किसी घरेलू नौकरी की तलाश में था ताकि उसे पढ़नेलिखने की सुविधा भी मिल सके. ऐसा ही एक परिवार था, जहां से दोचार दिन में ही नौकरनौकरानियां काम छोड़ कर चल देते, क्योंकि उस घर की मालकिन के कर्कश स्वभाव से तंग आ कर वे टिक ही नहीं पाते थे. एक दिन लड़का उसी बंगले के सामने जा खड़ा हुआ और उस मालकिन से नौकरी देने का आग्रह करने लगा.

पहले तो उस ने लड़के की बातों पर कोई गौर नहीं किया, लेकिन फिर बोली, ‘‘लड़के, तुम क्याक्या काम कर सकते हो ’’ लड़के का आग्रह सुन कर मालकिन को लगा कि जरूर वह पहले कहीं काम कर चुका है. वह उस से बोली, ‘‘ठीक है, आज और अभी से मैं तुम्हें काम पर रखती हूं.’’

‘‘मालकिन, एक शर्त मेरी भी है,’’ लड़के ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘बताइए, क्या है तुम्हारी शर्त ’’

‘‘मैं काम के बदले पैसा नहीं लूंगा बल्कि आप मुझे खाना, कपड़ा और मेरी पढ़ाईलिखाई की व्यवस्था कर दें,’’ लड़के ने दयनीय स्वर में कहा. पहले तो यह सुन कर मालकिन हड़बड़ा गई लेकिन अपनी मजबूरी को देखते हुए उस ने कह दिया, ‘‘ठीक है, लेकिन पढ़ाई-लिखाई के कारण घर का काम प्रभावित नहीं होना चाहिए.’’ लड़के को उस घर में काम मिल गया. वह सब से आखिर में सोता और सवेरे सब से पहले उठ कर काम शुरू कर देता. फिर काम निबटा कर स्कूल जाता. लड़का इस घर, नौकरी और पढ़ाईलिखाई, सभी से बड़ा खुश था. वह अपना काम भी पूरी ईमानदारी, लगन और मेहनत से करता. मालकिन को घरेलू नौकरचाकरों पर रोब झाड़ने की बुरी आदत थी, लेकिन उसे भी लड़के में जरा भी खोट दिखाई नहीं दिया. वह उस के काम से खुश थी.

घर वालों से प्यार और अपनापन मिलने के बावजूद लड़का इस बात का बराबर खयाल रखता कि वह एक नौकर है और उसे पढ़लिख कर एक दिन अच्छा आदमी बनना है. अपनी विधवा मां और भाईबहनों का सहारा बनना है. इधर इतना अच्छा और गुणी नौकर आज तक इस परिवार को नहीं मिला था. घर के बच्चों और खुद मालिक को दिनरात इसी बात का खटका लगा रहता था कि कहीं मालकिन इसे भी निकाल न दे. उधर आदत से मजबूर मालकिन उस लड़के से लड़ने का बहाना ढूंढ़ रही थी. एक दिन वह सोचने लगी कि यह दो कौड़ी का छोकरा इस घर में इतना घुलमिल कैसे गया  न काम में सुस्ती, न अपनी पढ़ाईलिखाई में आलस और खाने के नाम पर बचाखुचा जो कुछ भी मिल जाए खा कर वह इतना खुश रहता है. एक दिन मालकिन ने सब की उपस्थिति में लड़के से कहा, ‘‘देखो, अब से तुम हर महीने अपना वेतन ले लिया करना, ताकि तुम अपने खानेपीने, रहने और पढ़नेलिखने का अलग से इंतजाम कर सको.’’

लड़का आश्चर्य से मालकिन की ओर देखने लगा. उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. उस ने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘‘मालकिन, मुझे मौका दो मैं अपना काम और अच्छी तरह से करूंगा.’’ लड़के की बातों से ऐसा लगा जैसे मातापिता की सेवा करने वाले इकलौते और गरीब श्रवणकुमार को किसी राजा ने अपना शिकार समझ कर आहत कर दिया हो और बाकी लोग राजा के डर से मात्र मूकदर्शक बने बैठे हों. मालकिन को अपने पति और बच्चों की चुप्पी से ठेस लगी. वह भीतर ही भीतर तिलमिला कर रह गई, लेकिन कुछ नहीं बोली. अब तक ऐसे मौकों पर सभी उस का साथ दिया करते थे, लेकिन इस बार घर के सब से छोटे बच्चे ने ही टोक दिया, ‘‘मां, इस तरह इस बेचारे को अलग करना ठीक नहीं.’’

यह सुन कर मालकिन आगबबूला हो गई और चिढ़ कर बोली, ‘‘यह छोटा सा चूहा भी अच्छेबुरे की पहचान करने लगा है और मैं अकेली ही इस घर में अंधी हूं.’’वहां पर कुछ देर के लिए अदालत जैसा दृश्य उपस्थित हो गया. न्यायाधीश की मुद्रा में साहब ने कहा,  ‘‘किसी नौकर को निकालने या रखने के नाम से ही घर वाले आपस में लड़ने लगें तो नौकर समझ जाएगा कि इस घर में राज किया जा सकता है.’’

‘‘क्या मतलब ’’ मालकिन की आवाज में कड़कपन था.

‘‘मतलब साफ है, नौकर से मुकाबला करने के लिए हमें आपसी एकता मजबूत कर लेनी चाहिए,’’ साहब ने शांत स्वर में कहा. मालकिन अपनी गलती स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थी. बुरा सा मुंह बनाते हुए वह भीतर कमरे में चली गई. साहब ने बाहर जाते हुए लड़के को समझा दिया कि वह उन की बातों का बुरा न माने और भीतर कमरे में सब को समझाते हुए कहा कि लड़के पर कड़ी नजर रखी जाए. जहां तक हो सके उसे रंगेहाथों पकड़ा जाना चाहिए, ताकि उसे भी तो लगे कि उस ने गलती की है, चोरी की है और उस से अपराध हुआ है.

वह दिन भी आ गया, जब लड़के को निकालने के बारे में अंतिम निर्णय लिया जाना था. लड़का उस समय रसोई साफ कर रहा था. घर के सभी सदस्य एक कमरे में बैठ गए. साहब ने पूछा, ‘‘अच्छा, किसी को कोई ऐसा कारण मिला है, जिस से लड़के को काम से अलग किया जा सके ’’ मालकिन चुप थी. उसे अपनेआप पर ही गुस्सा आ रहा था कि वह भी कैसी मालकिन है, जो एक गरीब नौकर में छोटी सी खोट भी नहीं निकाल सकी. मालकिन की गंभीरता और चुप्पी को देख कर साहब ने मजाक में ही कह दिया, ‘‘मुझे नहीं लगता कि बबूल में भी गुलाब खिल सकते हैं.’’

‘‘जिस माली की सेवा में दम हो, वह बबूल और नागफनी में भी गुलाब खिला सकता है,’’ मालकिन के मुंह से ऐसी बात सुन कर, दोनों बच्चों और साहब का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया. जब बात बनने के लक्षण दिखने लगे तो साहब ने कहा, ‘‘देखो भाई, जो भी कहना है, साफसाफ कह दो. बेचारे लड़के का मन दुविधा में क्यों डाल रहे हो ’’ तब मालकिन ने चिल्ला कर उस लड़के को बुलाया. लड़का आया तो मालकिन ऐसे चुप हो गई, जैसे उस ने लड़के को पुकारा ही न हो. वह ऐसे मुंह फुला कर बैठ गई, जैसे लड़के की कोई बड़ी गलती उस ने पकड़ ली हो.

अभीअभी बबूल, नागफनी, गुलाब और माली की बातें करने वाली मालकिन को फिर यह कैसी चाल सूझी  यह सोच कर साहब ने कहा, ‘‘जो कहना है साफसाफ कह दो, बेचारा कहीं और काम कर लेगा.’’

‘‘मुझे साफसाफ कहने के लिए समय चाहिए,’’ मालकिन बोली और वैसे ही मुंह फुला कर बैठी रही.

‘‘और कब तक इस बेचारे को अधर में लटका कर रखोगी, जो कहना है अभी कह दो,’’ साहब ने कहा, इस बार साहब और बच्चों ने भी तय कर लिया था कि मालकिन की इस तरह बारबार नौकर बदलने की आदत को सुधार कर ही दम लेंगे. मालकिन ने ताव खा कर कहा, ‘‘तो सुनो, जब तक यह लड़का अपने पांव पर खड़ा नहीं हो जाता, तब तक इसी घर में रहेगा, समझे.’’ एकाएक मालकिन में हुए इस परिवर्तन से सभी को आश्चर्य तथा अपार खुशी हुई. वैसे बबूल, नागफनी, गुलाब और माली वाली बातों का खयाल आते ही, सब को लगा कि मालकिन लड़के को पहले से ही अच्छी तरह परख चुकी थी और उस की जिंदगी संवारने के लिए मन ही मन अंतिम निर्णय भी ले चुकी थी.

लेखक- नारायण शांत

Family Drama : एक नई शुरुआत – स्वाति का मन क्यों भर गया?

Family Drama : बिखरे पड़े घर को समेट, बच्चों को स्कूल भेज कर भागभाग कर स्वाति को घर की सफाई करनी होती है, फिर खाना बनाना होता है. चंदर को काम पर जो जाना होता है. स्वाति को फिर अपने डे केयर सैंटर को भी तो खोलना होता है. साफसफाई करानी होती है. साढ़े 8 बजे से बच्चे आने शुरू हो जाते हैं.

घर से कुछ दूरी पर ही स्वाति का डे केयर सैंटर है, जहां जौब पर जाने वाले मातापिता अपने छोटे बच्चों को छोड़ जाते हैं.

इतना सब होने पर भी स्वाति को आजकल तनाव नहीं रहता. खुशखुश, मुसकराते-मुसकराते वह सब काम निबटाती है. उसे सहज, खुश देख चंदर के सीने पर सांप लोटते हैं, पर स्वाति को इस से कोई लेनादेना नहीं है. चंदर और उस की मां के कटु शब्द बाण अब उस का दिल नहीं दुखाते. उन पराए से हो चुके लोगों से उस का बस औपचारिकता का रिश्ता रह गया है, जिसे निभाने की औपचारिकता कर वह उड़ कर वहां पहुंच जाती है, जहां उस का मन बसता है.

‘‘मैम आज आप बहुत सुंदर लग रही हैं,‘‘ नैना ने कहा, तो स्वाति मुसकरा दी. नैना डे केयर की आया थी, जो सैंटर चलाने में उस की मदद करती थी.

‘‘अमोल नहीं आया अभी,‘‘ स्वाति की आंखें उसे ढूंढ़ रही थीं.

याद आया उसे जब एडमिशन के पश्चात पहले दिन अमोल अपने पापा रंजन वर्मा के साथ उस के डे केयर सैंटर आया था.

अपने पापा की उंगली पकड़े एक 4 साल का बच्चा उस के सैंटर आया, जिस का नाम अमोल वर्मा और पिता का नाम रंजन वर्मा था. रंजन ही उस का नाम लिखा कर गए थे. उन के सुदर्शन व्यक्तित्व से स्वाति प्रभावित हुई थी.

‘‘पति-पत्नी दोनों जौब करते होंगे, इसलिए बच्चे को यहां दाखिला करा कर जा रहे हैं,‘‘ स्वाति ने उस वक्त सोचा था.

रंजन ने उस से हलके से नमस्कार किया.

‘‘कैसे हो अमोल? बहुत अच्छे लग रहे हो आप तो… किस ने तैयार किया?‘‘ स्वाति ने कई सारे सवाल बंदूक की गोली जैसे बेचारे अमोल पर एकसाथ दाग दिए.

‘‘पापा ने,‘‘ भोलेपन के साथ अमोल ने कहा, तो स्वाति की दृष्टि रंजन की ओर गई.

‘‘जी, इस की मां तो है नहीं, तो मुझे ही तैयार करना होता है,‘‘ रंजन ने कहा, तो स्वाति का चौंकना स्वाभाविक ही था.

‘‘4 साल के बच्चे की मां नहीं है,‘‘ यह सुन कर उसे धक्का सा लगा. सौम्य, सुदर्शन रंजन को देख कर अनुमान भी लगाना मुश्किल था कि उन की पत्नी नहीं होंगी.

‘‘कैसे?‘‘ अकस्मात स्वाति के मुंह से निकला.

‘‘जी, उसे कैंसर हो गया था. 6 महीने के भीतर ही कैंसर की वजह से उस की जान चली गई,‘‘ रंजन की कंपकंपाती सी आवाज उस के दिल को छू सी गई. खुद को संयत करते हुए उस ने रंजन को आश्वस्त करने की कोशिश की, ‘‘आप जरा भी परेशान न हों, अमोल का यहां पूरापूरा ध्यान रखा जाएगा.‘‘

रंजन कुछ न बोला. वहां से बस चला गया. स्वाति का दिल भर आया इतने छोटे से बच्चे को बिन मां के देख. बिन मां के इस बच्चे के कठोर बचपन के बारे में सोचसोच कर उस का दिल भारी हो उठा था. उस दिन से अमोल से उस का कुछ अतिरिक्त ही लगाव हो गया था.

रंजन जब अमोल को छोड़ने आते तो स्वाति आग्रह के साथ उसे लेती. रंजन से भी एक अनजानी सी आत्मीयता बन गई थी, जो बिन कहे ही आपस में बात कर लेती थी. रंजन की उम्र लगभग 40 साल के आसपास की होगी.

‘‘जरूर शादी देर से हुई होगी, तभी तो बच्चा इतना छोटा है,’’ स्वाति ने सोचा.

रंजन अत्यंत सभ्य, शालीन व्यक्ति थे. स्त्रियों के प्रति उन का शालीन नजरिया स्वाति को प्रभावित कर गया था, वरना उस ने तो अपने आसपास ऐसे ही लोग देखे थे, जिन की नजरों में स्त्री का अस्तित्व बस पुरुष की जरूरतें पूरी करना, घर में मशीन की तरह जुटे रहने से ज्यादा कुछ नहीं था.

स्वाति का जीवन भी एक कहानी की तरह ही रहा. मातापिता दोनों की असमय मृत्यु हो जाने से उसे भैयाभाभी ने एक बोझ को हटाने की तरह चंदर के गले बांध दिया.

शराब पीने का आदी चंदर अपनी मां पार्वती का लाड़ला बेटा था, जिस की हर बुराई को वे ऐसे प्यार से पेश करती थीं, जैसे चंदर ही संसार में इकलौता सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति है.

चंदर एक फैक्टरी में सुपरवाइजर के पद पर काम करता था और अपनी तनख्वाह का ज्यादातर हिस्सा यारीदोस्ती और दारूबाजी में उड़ा देता. मांबेटा मिल कर पलपल स्वाति के स्वाभिमान को तारतार करते रहते.

‘‘चल दी महारानी सज कर दूसरों के बच्चों की पौटी साफ करने,‘‘ स्वाति जब भी अपने सैंटर पर जाने को होती, पार्वती अपने व्यंग्यबाण छोड़ना न भूलतीं.

‘‘जाने दे मां, इस बहाने अपने यारदोस्तों से भी मिल लेती है,‘‘ चंदर के मुंह से निकलने वाली प्रत्येक बात उस के चरित्र की तरह ही छिछली होती.

स्वाति एक कान से सुन दूसरे कान से निकाल कर अपने काम पर निकल लेती.

‘‘उस की कमाई से ही घर में आराम और सुविधाएं बनी हुई थीं. शायद इसीलिए वे दोनों उसे झेल भी रहे थे, वरना क्या पता कहीं ठिकाने लगा कर उस का क्रियाकर्म भी कर देते,‘‘ स्वाति अकसर सोचती.

नीच प्रकृति के लोग बस अपने स्वार्थवश ही किसी को झेलते या सहन करते हैं. जरूरत न होने पर दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं… स्वाति अपने पति और सास की रगरग से वाकिफ थी और कहीं न कहीं भीतर ही भीतर उन से सजग और सावधान भी रहती थी.

स्वाति ने अपना ‘डे केयर सैंटर‘ घर से कुछ दूर ‘निराला नगर‘ नामक पौश कालोनी में एक खाली मकान में खोल रखा था. घर की मालकिन मिसेज बत्रा का शू बिजनैस था और ज्यादातर समय वे कनाडा में ही रहती थीं. शहर में ऐसे उन के कई मकान पड़े थे. स्वाति से उन्हें किराए का भी लालच नहीं था. बस घर की देखभाल होती रहे और घर सुरक्षित रहे, यही उन के लिए बहुत था. साल में 1-2 बार जब वे इंडिया आतीं, तो स्वाति से मिल कर जातीं. अपने घर को सहीसलामत हाथों में देख कर उन्हें संतुष्टि होती.

मिसेज बत्रा से स्वाति की मुलाकात यों ही अचानक एक शू प्रदर्शनी के दौरान हुई थी. स्वाति का मिलनसार स्वभाव, उस की सज्जनता और अपने से बड़ों को आदर देने की उस की भावना लोगों को सहज ही उस से प्रभावित कर देती थी. वह जहां भी जाती, उस के परिचितों और शुभचिंतकों की तादाद में इजाफा हो जाता.

बातों ही बातों में मिसेज बत्रा ने जिक्र किया था कि उन का यह मकान खाली पड़ा है, जिसे वे किसी विश्वसनीय को सौंपना चाहती हैं जो उस की देखभाल भी कर सके और खुद भी रह सके.

स्वाति उस समय अपने वजूद को तलाश रही थी. उस के पास न कोई बहुत भारी रकम थी और न कोई उच्च या स्पैशल शैक्षिक प्रशिक्षण था. ऐसे में उसे डे केयर सैंटर चलाने का विचार सूझा.

स्वाति ने मिसेज बत्रा से बात की. उन्होंने सहर्ष सहमति दे दी. स्वाति ने घर वालों की हर असहमति को दरकिनार कर अपने इस सैंटर की शुरुआत कर दी.

सुबह से शाम तक स्वाति थक कर चूर हो जाती. उस के काम के कारण बच्चे उपेक्षित होते थे, वह जानती थी. पर क्या करे.

शादी के बाद जब इस घर में आई तो कितने सपने सजे थे उस की आंखों में. फिर एकएक, सब किर्चकिर्च होने लगे. चंदर पक्का मातृभक्त था और मां शासन प्रिय. परिवार का प्रत्येक व्यक्ति उन के दबाव में रहता. ससुर भी सास के आगे चूं न करते. हां, उन के धूर्त कामों में साथ देने को हमेशा तैयार रहते. चंदर जो भी कमाता या तो मां के हाथ में देता या दारू पर उड़ा देता.

स्वाति से उस का सिर्फ दैहिक रिश्ता बना, स्वाति का मन कभी उस से नहीं जुड़ा. उस ने कोशिश भी की, तो हमेशा चंदर के विचारों, कामों और आचरण से वह हमेशा उस से और दूर ही होती गई.

‘‘देखो तुम्हारी मां तुम्हारा ध्यान नहीं रख सकतीं और दूसरों के बच्चों की सूसूपौटी साफ करती है,” सास उस के दोनों बच्चों को भड़काती रहतीं.

राहुल 7 साल का था और प्रिया 5 साल की होने वाली थी. दोनों कच्ची मिट्टी के समान थे. स्वाति बाहर रहती और दादी जैसा मां के विरुद्ध उन्हें भड़काती रहती. उस से बच्चों के मन में मां की नकारात्मक छवि बनती जाती. यहां तक कि दोनों स्वाति की हर बात को काटते.

‘‘आप तो जाओ अपने सैंटर के बच्चों को देखो, वही आप के अपने हैं, हम तो पराए हैं. हमारे साथ तो दादी हैं. आप जाओ.‘‘

प्रिया और राहुल को आभास भी न होता होगा कि उन की बातों से स्वाति का दिल कितना दुखता था. ऊपर से चंदर, उसे खाना, चाय, जूतेमोजे, कच्छाबनियान सब मुंह से आवाज निकलते ही हाजिर चाहिए थे.

बिस्तर से उठते ही यदि चप्पल सामने न मिले तो हल्ला मचा देता. स्वाति को बेवकूफ, गंवार सब तरह की संज्ञाओं से नवाजता और खुद रोज शाम को बदबू मारता, नशे में लड़खड़ाता हुआ घर आता.

यही जिंदगी थी स्वाति की घर में. अपनी छोटीछोटी जरूरतों के लिए भी मोहताज थी वह. ऐसे में आत्मसम्मान किस चिड़िया का नाम होता है, ये उजड्ड लोग जानते ही न थे. तब स्वाति को मिसेज बत्रा मिलीं और उसे आशा की एक किरण दिखाई दी.

इन्हीं आपाधापियों में उस के ‘डे केयर‘ की शुरुआत हो गई. अब तो बच्चे भी बहुत हो गए हैं, जिन में अमोल से उसे कुछ विशेष लगाव हो गया था. उस के पिता रंजन वर्मा से भी. उस का एक आत्मीय रिश्ता बन गया था. जब से उसे पता चला था कि रंजन की पत्नी की कैंसर से मृत्यु हो चुकी है और अमोल एक बिन मां का बच्चा है, तब से अमोल और रंजन दोनों के ही प्रति उस के दिल में खासा लगाव पैदा हो गया था.

हालांकि रंजन के प्रति अपनी मनोभावनाओं को उस ने अपने दिल में ही छुपा रखा था, कभी बाहर नहीं आने दिया था.

अपनी सीमाओं की जानकारी उसे थी. यहां व्यक्ति का चरित्र आंकने का बस यही तो एक पैमाना है. मन की इच्छाओं को दबाते रहना. जो हो वह नहीं दिखना चाहिए बस एक पाकसाफ, आदर्श छवि बनी रहे तो कम से कम इस दोहरे मानदंडों वाले समाज में सिर उठा कर जी तो सकते हैं वरना तो लोग आप को जीतेजी ही मार डालेंगे.

शर्म, ग्लानि और अपराध बोध बस उन के लिए है, जो स्वाभिमानी हैं और अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए सम्मान से जीना चाहते हैं और चंदर जैसे दुर्गुणी, नशेबाज के लिए कोई मानमर्यादा नहीं है.

चंदर के मातापिता जैसे चालाक और धूर्तों के लिए भी कोई नैतिकता के नियम नहीं हैं. उन की बुजुर्गियत की आड़ में सब छुप जाता है.

पर हां, अगर स्वाति किसी भावनात्मक सहारे के लिए तनिक भी अपने रास्ते से डगमग हो गई तो भूचाल आ जाएगा और उस का सारा संघर्ष और मेहनत बेमानी हो जाएगी, यह स्वाति अच्छी तरह जानती और समझती थी. इसीलिए उस ने रंजन के प्रति अपनी अनुरक्ति को केवल अपने मन की परतों में ही दबा रखा था. पर यह भी उसे अच्छा लगता था. चंदर और उस के स्वार्थी परिवार से उस का यह मौन विद्रोह ही था, जो उसे परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति देता था और उस का मनोबल बढ़ाता था.

राहुल और प्रिया का टिफिन तैयार कर उन्हें स्कूल के लिए छोड़ कर, घर के सब काम निबटा कर जैसे ही स्वाति घर से निकलने को हुई, सास की कर्कश आवाज आई, ‘‘चल दी गुलछर्रे उड़ाने महारानी… हम लोगों के साथ इसे अच्छा ही कहां लगता है.‘‘ चंदर भी मां का साथ देता.

आखिर स्वाति कितना और कब तक सुनती. दबा हुआ आक्रोश फूट पड़ा स्वाति का, ‘‘जाती हूं तो क्या… कमा कर तो तुम्हारे घर में ही लाती हूं. कहीं और तो ले जाती नहीं हूं.‘‘

‘‘अच्छा, अब हम से जबान भी लड़ाती है…’’ गाली देते हुए चंदर उस पर टूट पड़ा. सासससुर भी साथ हो लिए.

पलभर के लिए हैरान रह गई स्वाति… उसे लगा कि ये लोग तो उसे मार ही डालेंगे. उस के कुछ दिमाग में न आया, तो जल्दीजल्दी रंजन को फोन लगा दिया और खुद भी अपने सैंटर की ओर भाग ली.

‘‘अब इस घर में मुझे नहीं रहना है,‘‘ उस ने मन ही मन सोच लिया, ‘‘कैसे भी हो, अपने बच्चों को भी यहां से निकाल लेगी. सैंटर पर कमरा तो है ही. कैसे भी वहीं रह लेगी. मिसेज बत्रा को सबकुछ बता देगी. वे नाराज नहीं होंगी.‘‘

स्वाति के दिमाग में तरहतरह के खयाल उमड़घुमड़ रहे थे. सबकुछ अव्यवस्थित हो गया था. समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा…

सैंटर पहुंच कर कुछ देर में स्वाति ने खुद को व्यवस्थित कर लिया. उस के फोन लगा देने पर रंजन भी वहां आ गया था.

रंजन के आत्मीयतापूर्ण व्यवहार का आसरा पा कर वह कुछ छुपा न पाई और सबकुछ बता दिया…अपने हालात… परिस्थितयां, बच्चे… सब.

पहलेपहल तो रंजन को कुछ समझ ही न आया कि क्या कहे. एक शादीशुदा स्त्री की निजी जिंदगी में इस तरह दखल देना सही भी होगा या नहीं… फिर भी स्वाति की मनोस्थिति देख कर रंजन ने कहा, ‘‘कोई परेशानी या जरूरत हो तो वह उसे याद कर ले और अगर उस की जान को खतरा है, तो वह उस घर में वापस न जाए.‘‘

रंजन का संबल पा कर स्वाति का मनोबल बढ़ गया और उस ने सोच लिया कि अब वह वापस नहीं जाएगी. रहने का ठिकाना तो उस का यहां है ही. यहीं से रह कर अपना सैंटर चलाएगी. कुछ दिन नैना को यहीं रोक लगी अपने पास.

उस दिन स्वाति घर नहीं गई. उस का कुछ विशेष था भी नहीं घर में. जरूरत भर का सामान, थोड़ेबहुत कपड़े बाजार से ले लेगी. पक्का निश्चय कर लिया था उस ने. बस अपनेआप को काम में झोंक दिया स्वाति ने.

अपने डे केयर को प्ले स्कूल में और बढ़ाने का सोच लिया उस ने और कैसे अपने काम का विस्तार करे, बस इसी योजना में उस का दिमाग काम कर रहा था.

स्वाति के चले जाने से घर की सारी व्यवस्था ठप हो गई थी. स्वाति तो सोने का अंडा देने वाली मुरगी थी. वह ऐसा जोर का झटका देगी, ऐसी उम्मीद न थी. चंदर और उस की मां तो उसे गूंगी गुड़िया ही समझते थे, जिस का उन के घर के सिवा कोई ठौरठिकाना न था. आखिर जाएगी कहां? अब खिसियाए से दोनों क्या उपाय करें कि उन की अकड़ भी बनी रहे और स्वाति भी वापस आ जाए, यही जुगाड़ लगाने में लगे थे.

मां के चले जाने पर बच्चे राहुल और प्रिया को भी घर में उस की अहमियत पता चल रही थी. जो दादी दिनरात उन्हें मां के खिलाफ भड़काती रहती थी, उन्होंने एक दिन भी उन का टिफिन नहीं बनाया. 2 दिन तो स्कूल मिस भी हो गया.

स्कूल से आने पर न कोई होमवर्क को पूछने वाला और न कोई कराने वाला. बस चैबीस घंटे स्वाति की बुराई पुराण चालू रहता. उन से हजम नहीं हो रहा था कि स्वाति इस तरह उन सब को छोड़ कर भी जा सकती है. ऊपर से सारा घर अव्यवस्थित पड़ा रहता था.

स्वाति को गए एक हफ्ता भी न हुआ था कि दोनों बच्चों के सामने उन सब की सारी असलियत खुल कर सामने आ गई. उन का मन हो रहा था कि उड़ कर मां के पास पहुंच जाएं, पर दादादादी और पिता के डर से सहमे हुए बच्चे कुछ कहनेकरने की स्थिति में नहीं थे.

एक दिन दोनों स्कूल गए तो लौट कर आए ही नहीं, बल्कि स्कूल से सीधे अपनी मां के पास ही पहुंच गए. सैंटर तो उन्होंने देख ही रखा था. स्वाति को तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई. उस के कलेजे के टुकड़े उस के सामने थे. कैसे छाती पर पत्थर रख कर उन्हें छोड़ कर आई थी, यह वह ही जानती थी.

चंदर और स्वाति के सासससुर बदले की आग में झुलस रहे थे. सोने का अंडा देने वाली मुरगी और घर का काम करने वाली उन्हें पलभर में ठेंगा दिखा कर चली जो गई थी.

बेइज्जती की आग में जल रहे थे तीनों. चंदर किसी भी कीमत पर स्वाति को घर वापस लाना चाहता था. शहर के कुछ संगठन जो स्त्रियों के चरित्र का ठेका लिए रहते थे और वेलेंटाइन डे पर लड़केलड़कियों को मिलने से रोकते फिरते थे, उन में चंदर भी शामिल था. वास्तव में तो इन छद्म नैतिकतावादियों से स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व ही बरदाश्त नहीं होता और यदि खोजा जाए तो उन सभी के घरों में औरत की स्थिति स्वाति से बेहतर न मिलती.

स्वाति के चरित्र पर भद्दे आरोप लगाता हुआ अपने ‘स्त्री अस्मिता रक्षा संघ‘ के नुमाइंदों को ले कर चंदर स्वाति के डे केयर सैंटर पहुंच गया.

यह देख स्वाति घबरा गई. उस ने रंजन को, अपने सभी मित्रों, बच्चों के मातापिता को जल्दीजल्दी फोन किए. सैंटर के बाहर दोनों गुट जमा हो गए. रंजन भी पुलिस ले कर आ गया था. दोनों पक्षों की बातें सुनी गईं.

स्वाति ने अपने ऊपर हो रहे उत्पीड़न को बताते हुए ‘महिला उत्पीड़न‘ और ‘घरेलू हिंसा‘ के तहत रिपोर्ट लिखवा दी. रंजन, उस के दोस्त और बच्चों के मातापिता सभी स्वाति के साथ थे.

पुलिस ने चंदर को आगे से स्वाति को तंग न करने की चेतावनी दे दी और आगे ‘कुछ अवांछित करने पर हवालात की धमकी भी.‘ चंदर और उस के मातापिता अपना से मुंह ले कर चलते बने.

स्वाति ने सोच लिया था कि अब वह चंदर के साथ नहीं रहेगी. अपने जीवन के उस अध्याय को बंद कर अब वह एक नई शुरुआत करेगी.

शाम का धुंधलका छा रहा था. स्वाति अकेले खड़ी डूबते हुए सूरज को देख रही थी. सामने रंजन आ रहा था, अमोल का हाथ पकड़े.

अमोल ने आ कर अचानक स्वाति का एक हाथ थाम लिया और एक रंजन ने. राहुल और प्रिया भी वहीं आ गए थे. अब वे सब साथ थे एक परिवार के रूप में मजबूती से एकदूसरे का हाथ थामे हुए, ‘एक नई शुरुआत के लिए और हर आने वाली समस्या का सामना करने को तैयार.

Best Story : जिंदगी का फलसफा

Best Story :  ‘‘जिंदगी का फलसफा भी कितना अजीब है, शामें कटती नहीं और साल गुजरते चले जा रहे है,’’ टेबल पर रखी पत्रिका के पहले पन्ने पर बोल्ड अक्षरों में लिखी हुई यह पंक्ति पढ़ कर प्रतिभा ने एक ठंडी सांस ली और बालकनी में आ गई. शायद उस के साथ भी कुछ ऐसा ही चल रहा था.

प्रतिभा आज थोड़ा जल्दी उठ गई थी. हलकी ठंड शुरू हो चुकी थी. अक्तूबर का महीना था और सुबह 6  बजे भी थोड़ा अंधेरा सा ही था. काफी देर तक बालकनी में खड़े रहने के बाद भी जब उस का दिल हलका नहीं हुआ तो वह नीचे उतरी और गेट खोल कर बाहर निकल आई. वह लोधी रोड के रिहायशी इलाके में एक बड़े से बंगले में रहती थी. यह दिल्ली का एक पौश इलाका है और यहां की सुबह बहुत खूबसूरत होती है. बस इसे ही महसूस करने के लिए वह बाहर निकल कर सड़क पर टहलने लगी. लोधी गार्डन भी पास ही था. कभीकभी वह गार्डन तक भी चली जाती है और अकेली वहां किसी कोने में बैठी कुछ सोचती रहती है.

आज वह केवल सड़क पर टहल कर ही लौट पड़ी. अब तक सुबह का उजाला हो चुका था. पक्षी अपने खाने की तलाश में निकल चुके थे. दूर कोने में नुक्कड़ पर बजाज भाई अपनी दुकान के बाहर सफाई कर रहे थे. उन की दूध, चाय और नमकीन की शौप थी. प्रतिभा के घर के पास ही रहने वाली प्रिया स्कूटी से कंप्यूटर क्लास के लिए निकल गई थी और प्रतिभा की पड़ोसिन नेहा भी सुबहसुबह औफिस जा रही थी.

सड़क पर और बहुत से लोग किसी न किसी काम के लिए निकले थे. प्रतिभा यह सोच कर मायूस हो गई कि उसे तो कुछ नहीं करना. कहीं नहीं जाना. जिंदगी में उस का अब कोई मकसद नहीं और कोई काम भी नहीं है. बेवजह गुजरते जिंदगी के लमहे और उस बेबसी में महसूस होती घुटन के साथ जीने की कोशिश में लगी रहती है. इस सोच ने उस के दिल को भारी कर दिया. धीमे कदमों से चलते हुए वह अपने घर के गेट तक आ पहुंची. सीढि़यां चढ़ती हुई अपने कमरे में आई और ठंडी सांस ले कर सोफे पर बैठ गई.

प्रतिभा को आया हुआ देख कर रसोइया उस के लिए चाय और नमकीन ले आया. उस ने चाय पी और टेबल पर रखा ताजा अखबार उठा लिया. आज के समय में कहां कोई अखबार पढ़ता है पर उसे बहुत शौक है. शौक क्या है कुछ करने के लिए है नहीं शायद इसलिए अखबार पलट लेती है. न्यूज तो पुराने ही होते हैं और इसी वजह से कई बार पहला पेज पढ़ कर रख देती है.

प्रतिभा ने अपनी कामवाली से पूछा, ‘‘नेहा कहां है?’’

‘‘बेबी चली गई औफिस.’’

‘‘और कौस्तुभ?’’

‘‘कौस्तुभ भैया के कालेज में आज फंक्शन है न सो वे तैयार हो रहे हैं और बस निकलने ही वाले है.’’

‘‘अब बचे मेरे हस्बैंडजी और आज उन का कोई टूर था तो वे कल रात आए ही नहीं. औफिस से ही निकल गए होंगे. है न?’’

‘‘हांजी दीदी आप भी तैयार हो जाओ. मैं कपड़े निकाल देती हूं. पानी हलका गरम कर के रख दिया है. आप के कपड़े भी वाशरूम में रख देती हूं. आप फ्रैश हो जाओ फिर मैं आप के लिए नाश्ता लगा देती हूं,’’ हाउस हैल्प ने चाय का कप उठाते हुए कहा.

प्रतिभा नहाने चली गई. नहा कर निकली तो उस के लिए नाश्ता तैयार था. नाश्ता कर के उस ने टीवी खोल लिया मगर टीवी में वही सब देख कर उस का दिल नहीं लगा. उस ने टीवी बंद कर दिया. थोड़ी देर मोबाइल निकाल कर सोशल मीडिया के चक्कर लगाए. मगर वहां भी वही सब बातें, वही दिमाग पकाने वाली चीजें. उस ने मोबाइल भी रख दिया. फिर दिल में आया चलो किसी से फोन पर बात कर के मन लगाया जाए.

मगर किस से दिमाग में यह सवाल कौंध गया. उस ने फिर से फोन किनारे रख दिया. उस का आजकल किसी से बात करने का भी दिल नहीं करता. बात करे भी तो क्या?

फिर उस ने सोचा चलो आज किसी पुरानी सहेली को फोन लगाया जाए. पर ऐसा करने को भी उस का मन तैयार नहीं हुआ. जिस से भी बात करो कुछ न कुछ ऐसा बोल देती है कि मन ही खराब हो जाता है और बात भी क्या की जाए. वही बोरिंग बातें होती हैं.

प्र्तिभा की सब से गहरी दोस्त अंकिता है. मगर उस से बात कर के कभी प्रतिभा को खुशी नहीं मिलती क्योंकि अंकिता की जिंदगी काफी सैटल है और वह इस का ढिंढोरा पीटती रहती है. अंकिता जब बात करती है तो अपने पति की तारीफों के पुल बांधे जाती है. मसलन, ‘मेरा पति मुझे इतने सरप्राइज देता है,’ ‘मुझे बहुत प्यार करता है,’ ‘मेरे लिए खाना बनाता है,’ ‘हर संडे हम लोग बाहर डिनर करने जाते हैं,’ ‘वह मेरे लिए जान भी दे सकता है’ वगैरहवगैरह.

अंकिता बोलती रहती है और प्रतिभा सुनती रहती है क्योंकि उस के पास इस विषय में कहने को कुछ नहीं होता. वह क्या कहे उस का पति तो सुबह चला जाता है और रात ढले घर लौटता है. ठीक से उस की तरफ देखता भी नहीं. आते ही अगले दिन की तैयारी में लग जाता है या फोन और कंप्यूटर के आगे बैठा रहता है. पता नहीं मोबाइल पर किस से घंटों बातें करता रहता है. फिर सुबहसुबह निकल जाता है. ऐसा लगता है जैसे उसे घर काटने को दौड़ता है या फिर खुद को हमेशा व्यस्त दिखाता है.

एक सैटरडे और संडे ही है जिन का प्रतिभा बेसब्री से इंतजार करती है क्योंकि ये 2 दिन उस के हस्बैंड और बच्चों की छुट्टी रहती है. मगर इन 2 दिनों में भी उस का हस्बैंड कोई न कोई मीटिंग या टूर और्गेनाइज कर लेता है और प्रतिभा बेचारी फिर अगले सैटरडे का इंतजार करने लग जाती है.

प्रतिभा ने अपना माथा झटका. फिर सोचा शालू से बहुत दिनों से बात नहीं हुई है. मगर शालू का नंबर डायल करतेकरते वह रुक गई. उसे याद आया पिछली दफा शालू से बात करने के बाद वह 1 घंटा डिप्रैशन में रही थी क्योंकि शालू ने उस की कमजोर नस को पकड़ा था और टोंट मारा था, ‘‘क्या यार इतने रुपए होने के बावजूद तेरे जीवन में कोई खुशी नहीं, कोई उत्साह कोई उमंग नहीं. कैसे जी लेती है?’’

‘‘तो क्या करूं जिंदगी को खत्म कर दूं?’’ प्रतिभा ने चिढ़ कर उलटा सवाल किया था.

शालू व्यंग्य से मुसकराती हुई बोली, ‘‘यह सब तेरे हाथ में थोड़े ही है. जिंदगी तो जीनी ही पड़ेगी तुझे. मुझे देख मैं ने शादी नहीं की. बंगलागाड़ी भी नहीं मगर मैं तो खुश हूं. मुझे किसी से कोई अपेक्षा नहीं है. अपनी मस्ती में जीती हूं. दोस्तों के साथ जब दिल करे कौफी पीती हूं. जहां और जब दिल करे घूमती हूं. कोई लफड़ा नहीं, कोई टैंशन नहीं. घर वालों की परवाह नहीं है. रात में औफिस से आती हूं फिर बिस्तर पर पैर पसार कर सो जाती हूं. किसी से रुपए नहीं मांगने पड़ते. खुद कमाती हूं और खुद खर्च करती हूं. मगर तेरी जैसी हाउसवाइफ तो बस पति के आसरे रहती है. पति कहे तो उठो पति कहे तो सोओ. पति जहां कहे वहां जाओ, वह जो कहे वही करो और मना करे तो मत करो. उफ, कैसे जीते हो तुम लोग?’’

शालू की सोच के आगे प्रतिभा को कुछ समझ नहीं आया था. खुशी क्या शादी करने या न करने की मुहताज है? ठीक है शालू अकेली है, इंडिपैंडैंट है पर प्रतिभा का सपना तो एक खुशहाल परिवार का था न. उसे तो पति चाहिए था. बच्चे चाहिए थे, जिन के साथ मस्ती से अपनी जिंदगी खुशी से बिताए. मगर क्या सचमुच ऐसा हुआ? कहने को उस का बेटा भी है, पति भी है और बेटी भी है, सासससुर सब हैं पर उस के पास कौन है? कोई भी नहीं. सासससुर दूसरे शहर में रहते हैं. बच्चे अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं. बेटा कालेज जाता है. बेटी जौब ट्रेनिंग के लिए चली जाती है. पति औफिस चले जाते हैं. वह रह जाती है पूरे घर में अकेली. पर ठीक है न. उस के पास सब है. सारी सुविधाएं हैं. नौकरचाकर है. बंगलागाड़ी है. वह चाहे तो अभी गाड़ी उठा कर कहीं दूर चली जाए घूमने. पर अकेले घूमने में आनंद कहां आता है.

किसी सहेली को ले कर जाए तो क्या मजा आएगा? उसे याद आया पिछली दफा क्या हुआ था. कालेज टाइम की चारों सहेलियां ने प्लान बनाया कि चलो हम मिल कर कहीं पार्टी करते हैं. पार्टी क्या थी चारों अपनेअपने फोन में लगे रहे थे. नेहा के पास फोन में बिजी होने की बात नहीं थी तो उस के पास बोलने के लिए भी कुछ नहीं था.

प्रीति के पास एक ही बात थी और वह थी अपनी तारीफ करना, ‘‘यार यह देख मेरी साड़ी कितनी प्रिटी है न और ये सैंडल मैं ने साउथएक्स से लिए हैं. यह ड्रैस जबरदस्त है न बट यार थोड़ी सी बौडी और स्लिम होती तो मजा आ जाता. सच कहूं तो मेरे जैसी कोई है नहीं इस दुनिया में.’’

यह सब सुनना प्रतिभा को पसंद नहीं आ रहा था. नीता और निभा फोन में लगी रहीं. वह वहां से उठ कर जा भी नहीं सकती थी. बहुत देर तक सभी सहेलियां साथ बैठी रहीं. प्रतिभा को सम?ा ही नहीं आ रहा था कि वह यहां आई क्यों थी. वही रैस्टोरैंट, वही खानापीना, वही सहेलियां तभी तो उस का बिलकुल मन नहीं करता सहेलियों के साथ कहीं बाहर जाने का.

प्रतिभा ने घड़ी की तरफ देखा. अभी 11 बज रहे थे. तारीख और दिन देखा. आज थर्सडे ही था. अभी तो 2 दिन और थे बीच में. आज का पूरा दिन और फिर फ्राइडे का पूरा दिन. इस के बाद आएगा सैटरडे. शायद बेटी घर में रहे वरना वह कई बार सैटरडे को अपनी सहेलियों के साथ निकल जाती है. बेटे की तो दुनिया ही अलग है. वह छुट्टी के दिन अपने कमरे में कैद रहता है फोन और लैपटौप के साथ. हस्बैंड से थोड़ी उम्मीद रहती है पर वे भी खुद को काम में बिजी दिखाते हैं. बस सैटरडे को एक आस भर रहती है कि शायद घर वालों का साथ मिल जाए.

प्रतिभा थोड़ी देर के लिए लेट गई. नींद आंखों में है कहां? पूरी रात तो

सोती है. सुबह 6 बजे उठती है. उस के बाद

और कितना सोए. बस करवट बदलती रही. विचारों की शृंखलाएं दिमाग में घूमती रहीं. फिर उठ कर गार्डन में आ गई. फूलों की तरफ देखने लगी. ये फूल कितने खुश हैं. मस्ती से ठंडी हवाओं से लिपट रहे हैं. उस ने अपने गार्डन में हरसिंगार के पेड़ लगाए हैं. उसे हरसिंगार के फूल बहुत पसंद हैं. बचपन में उस के दादू गार्डनिंग करते थे और उन्होंने हरसिंगार के बहुत से पेड़ लगाए थे.

एक दिन प्रतिभा ने पूछा, ‘‘दादू, इन फूलों की खासीयत क्या है? ये कितने सुंदर हैं. इस पेड़ का क्या नाम है?

तब दादू ने उसे सम?ाया, ‘‘ये हरसिंगार के पौधे हैं और इन की पहचान इन के सफेद फूलों से होती है. इन सफेद फूलों के बीच में नारंगी रंग की डिजाइनें बनी होती हैं. अपनी खुरदरी, दांतेदार और लंबी पत्तियों तथा रात में खिलने और सुबह गिरने वाले फूलों की वजह से भी ये पौधे दूसरों से अलग नजर आते हैं. यह पौधा 2 से 10 मीटर तक ऊंचा हो सकता है और इस के फूलों की सुगंध बहुत मनमोहक होती है. इसे पारिजात, शैफाली या नाइट जैस्मिन के नाम से भी जाना जाता है. इस के फूलों से प्राकृतिक रंग निकाला जाता है जिसे कपड़ों और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. एक खास बात और बताऊं?’’ दादाजी ने पूछा था, ‘‘बताओ न दादू,’’ प्रतिभा ने मचल कर पूछा.

‘‘पारिजात वृक्ष को कभीकभी ‘दुख का वृक्ष’ भी कहा जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस के फूल कभी जमीन को नहीं छूते. ये रात में खिलते हैं और सुबहसुबह गिर जाते हैं जिस से आंसुओं का आभास होता है.’’

यही वजह है कि प्रतिभा हरसिंगार के फूलों से एक कनैक्शन महसूस करती थी. उस के मन में भी दुख कहीं पसरा हुआ था. उस के सपने भी यथार्थ की धरती को नहीं छूते थे. उस ने उन फूलों को चूमा और हवा में बिखरी उन की खुशबू को बांहों में समेटने की कोशिश करने लगी. मगर ऐसा भी क्या कभी हो सकता है?

प्रतिभा बाहर सड़क की तरफ देखने लगी. जुनेजाजी का पूरा परिवार कहीं जा रहा था.  जुनेजा की पत्नी उस की तरफ देख कर मुसकराती हुई निकल गई. प्रतिभा ने भी जवाब में मुसकरा दिया. फिर चुपचाप अपने कमरे में चली आई और दरवाजा बंद कर लिया. वह अपनी सोच को भी बंद करना चाहती थी. मगर एक के बाद एक विचार आते ही रहते.

आज प्रतिभा की वैडिंग ऐनिवर्सरी थी. उस के लिए खुशी का और यादगार दिन था. पर जरूरी तो नहीं कि उस के हस्बैंड या बच्चों के लिए भी इस दिन की कोई अहमियत हो.

1 साल पहले वैडिंग ऐनिवर्सरी के दिन प्रतिभा उत्साहित थी क्योंकि उस दिन उस ने हस्बैंड के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बनाया था. प्रतिभा शाम से ही तैयार हो कर बैठी थी. उस ने अपने हसबैंड की गिफ्ट की गई पिंक साड़ी पहनी थी और बालों को खुला छोड़ दिया था. हलकी ज्वैलरी भी पहनी थी जो उस के हस्बैंड को पसंद थी. ज्यादा ज्वैलरी पहनने पर उस के हस्बैंड मुंह बनाते थे. गोल्डन वाच भी पहन रखी थी. प्रतिभा ने पति का पसंदीदा परफ्यूम भी लगाया था. बस उन के आने का इंतजार कर रही थी. तभी उस के हस्बैंड के साथ काम करने वाले सुमित खन्ना की पत्नी की कौल आई. पूछा, ‘‘आप हस्बैंड के साथ आज कनिका के सरप्राइज बर्थडे फीस्ट में जा रहे हो?’’

‘‘बर्थडे?’’ प्रतिभा ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘हां, तो क्या आप के हस्बैंड ने आप को यह बात बताई भी नहीं कि वे सब क्या प्लान कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं तो…’ प्रतिभा कुछ कह नहीं सकी. आज सुबह ही तो उस ने हस्बैंड से कन्फर्म किया था कि ऐनिवर्सरी मनाने कहीं बाहर जाएंगे. घूमेंगे, खाएंगे, पीएंगे और फिर क्वालिटी टाइम संग बिताएंगे. तब भी उन्होंने कुछ नहीं कहा था. अब किसी गैर से सचाई सुनने को मिल रही है. उस का मन किया कि वह कौल कर के हस्बैंड से पूछे मगर फिर रुक गई और तय किया कि पहले हस्बैंड के आने का इंतजार करती है.

रात गहरी होती गई और फिर 12 भी बज गए. सोफे पर इंतजार करती प्रतिभा को कब

नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला. रात 2 बजे के करीब खटपट से उस की नींद खुली. हस्बैंड घर में दाखिल हो चुके थे. थोड़ा शराब का नशा और थोड़ा जश्न का खुमार उन के चेहरे से साफ ?ालक रहा था. प्रतिभा को सजधज कर इंतजार करते देख उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ.

‘‘हैप्पी ऐनिवर्सरी जान,’’ कह कर गले से लगाया और फिर कमरे में जाते हुए कहा, ‘‘यार आज काम बहुत था. फौरेन डैलीगेट्स की मीटिंग भी थी. निकल ही नहीं सका. किसी और दिन चले जाएंगे.’’

प्रतिभा के दिल का एक कोना फिर से टूट गया. उसे इस बात का ज्यादा गम नहीं था कि वे कहीं बाहर गए नहीं बल्कि इस बात का गम ज्यादा था कि उस के पति ने उस से ?ाठ कहा.

प्रतिभा अंदर से दुखी थी. फ्रेडरिक नीत्शे की यह पंक्ति उस के जेहन में घूम रही थी, ‘‘मैं इसलिए दुखी नहीं हूं कि तुम ने मु?ा से ?ाठ बोला, मैं इसलिए दुखी हूं कि अब मैं तुम पर यकीन नहीं कर सकता.’’

उस दिन के बाद प्रतिभा को कभी अपने पति की बातों पर यकीन नहीं हुआ. आज भी उस की ऐनिवर्सरी थी मगर उस ने आज हस्बैंड को इस बात की याद ही नहीं दिलाई. उसे डर था कि हस्बैंड फिर उस का दिल तोड़ेंगे. इस डर का कोई इलाज नहीं था. डेल कार्नेगी के शब्दों में, ‘‘डर और कहीं नहीं बल्कि आप के दिमाग में होता है.’’

अब प्रतिभा ने हस्बैंड से कोई उम्मीद रखनी ही छोड़ दी थी. सिर्फ हस्बैंड से ही नहीं अपने बच्चों से भी उसे कोई उम्मीद नहीं थी. अपनी जिंदगी से भी कोई उम्मीद नहीं बची थी. अब दिल या दिमाग में कोई सपना, कोई तमन्ना, कोई आरजू नहीं थी. वह सिर्फ जी रही थी क्योंकि अपनी जिंदगी खत्म करने की भी उस में हिम्मत नहीं थी.

Story In Hindi : रिश्ते की धूल – आखिर खुले मिजाज की सीमा के साथ क्या हुआ ?

Story In Hindi  : प्रियांक  औफिस के लिए घर से बाहर निकल रहा था कि पीछे से सीमा ने आवाज लगाई, ‘‘प्रियांक, 1 मिनट रुक जाओ मैं भी तुम्हारे साथ चल रही हूं.’’

‘‘मुझे देर हो रही है सीमा.’’

‘‘प्लीज 1 मिनट की तो बात है.’’

‘‘तुम्हारे पास अपनी गाड़ी है तुम उस से चली जाना.’’

‘‘मैं तुम्हें बताना भूल गई. मेरी गाड़ी सर्विसिंग के लिए वर्कशौप गई है और मुझे 10 बजे किट्टी पार्टी में पहुंचना है. प्लीज, मुझे रिच होटल में ड्रौप कर देना. वहीं से तुम औफिस चले जाना. होटल तुम्हारे औफिस के रास्ते में ही तो पड़ता है.’’

सीमा की बात पर प्रियांक झुंझला गए और बड़बड़ाया, ‘‘जब देखो इसे किट्टी पार्टी की ही पड़ी रहती है. इधर मैं औफिस निकला और उधर यह यह भी अपनी किट्टी पार्टी में गई.’’

प्रियांक बारबार घड़ी देख रहा था. तभी सीमा तैयार हो कर आ गई और बोली, ‘‘थैंक्यू प्रियांक मैं तो भूल गई थी कि मेरी गाड़ी वर्कशौप गई है.’’

प्रियांक ने सीमा की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया. उसे औफिस पहुंचने की जल्दी थी. आज उस की एक जरूरी मीटिंग थी. वह तेज गाड़ी चला रहा था ताकि समय से औफिस पहुंच जाए. उस ने जल्दी से सीमा को होटल के बाहर छोड़ा और औफिस के लिए आगे बढ़ गया.

सीमा समय से होटल पहुंच कर पार्टी में अपनी सहेलियों के साथ मग्न हो गई थी. 12 बजे उसे याद आया कि उस के पास गाड़ी नहीं है. उस ने वर्कशौप फोन कर के अपनी गाड़ी होटल ही मंगवा ली. उस के बाद अपनी सहेलियों के साथ लंच कर के वह घर चली आई. यही उस की लगभग रोज की दिनचर्या थी.

सीमा एक पढ़ीलिखी, आधुनिक विचारों वाली महिला थी. उसे सजनेसंवरने और पार्टी वगैरह में शामिल होने का बहुत शौक था. उस ने कभी नौकरी करने के बारे में सोचा तक नहीं. वह एक बंधीबंधाई, घिसीपिटी जिंदगी नहीं जीना चाहती थी. वह तो खुल कर जीना चाहती थी. उस के 2 बच्चे होस्टल में पढ़ते थे. सीमा ने अपनेआप को इतने अच्छे तरीके से रखा हुआ था कि उसे देख कर कोई भी उस की उम्र का पता नहीं लगा सकता था.

प्रियांक और सीमा अपनी गृहस्थी में बहुत खुश थे. शाम को प्रियांक के औफिस से घर आने पर वे अकसर क्लब या किसी कपल पार्टी में चले जाते. आज भी वे दोनों शाम को क्लब के लिए निकले थे. उन की अपने अधिकांश दोस्तों से यहीं पर मुलाकात हो जाती.

आज बहुत दिनों बाद उन की मुलाकात सौरभ से हो गई सौरभ ने हाथ उठा कर

अभिवादन किया तो प्रियांक बोला, ‘‘हैलो सौरभ, यहां कब आए?’’

‘‘1 हफ्ता पहले आया था. मेरा ट्रांसफर इसी शहर में हो गया है.’’

‘‘सीमा यह है सौरभ. पहले यह और मैं

एक ही कंपनी में काम करते थे. मैं तो प्रमोट हो कर पहले यहां आ गया था. अब यह भी इसी शहर में आ गया है और हां सौरभ यह है मेरी पत्नी सीमा.’’

दोनों ने औपचारिकतावश हाथ जोड़ दिए. उस के बाद प्रियांक और सौरभ आपस में बातें कर लगे.

तभी अचानक सौरभ ने पूछा, ‘‘आप बोर तो नहीं हो रहीं?’’

‘‘नहीं आप दोनों की बातें सुन रही हूं.’’

‘‘आप के सामने तारीफ कर रहा हूं कि आप बहुत स्मार्ट लग रही हैं.’’

सौरभ ने उस की तारीफ की तो सीमा ने मुस्करा कहा, ‘‘थैंक्यू.’’

‘‘कब तक खड़ेखड़े बातें करेंगे? बैठो आज हमारे साथ डिनर कर लो. खाने के साथ बातें करने का अच्छा मौका मिल जाएगा,’’ प्रियांक बोला तो सौरभ उन के साथ ही बैठ गया. वे खाते हुए बड़ी देर तक आपस में बातें करते रहे. बारबार सौरभ की नजर सीमा के आकर्षक व्यक्तित्व की ओर उठ रही थी. उसे यकीन नहीं हो पा रहा था इतनी सुंदर, स्मार्ट औरत के 10 और 8 साल के 2 बच्चे भी हो सकते हैं.

काफी रात बीत गई थी. वे जल्दी मिलने की बात कह कर अपनेअपने घर चले गए. लेकिन सौरभ के दिमाग में सीमा का सुंदर रूप और दिलकश अदाएं ही घूम रही थीं. उस दिन के बाद से वह प्रियांक से मिलने के बहाने तलाशने लगा. कभी उन के घर आ कर तो कभी उन के साथ क्लब में बैठ कर.

प्रियांक कम बोलने वाला सौम्य स्वभाव का व्यक्ति था. उस के मुकाबले सीमा खूब बोलनेचालने वाली थी. अकसर सौरभ उस के साथ बातें करता और प्रियांक उन की बातें सुनता रहता. सौरभ के मन में क्या चल रहा है सीमा इस से बिलकुल अनजान थी.

एक दिन दोपहर के समय सौरभ उन के घर पहुंच गया. सीमा तभी किट्टी पार्टी से घर लौटी थी. इस समय सौरभ को वहां देख कर सीमा चौंक गई, ‘‘आप इस समय यहां?’’

‘‘मैं पास के मौल में गया था. वहां काउंटर पर मेरा क्रैडिट कार्ड काम नहीं कर रहा था. मैं ने सोचा आप से मदद ले लूं. क्या मुझे 5 हजार रुपए उधार मिल सकते हैं?’’

‘‘क्यों नहीं मैं अभी लाती हूं.’’

‘‘कोई जल्दबाजी नहीं है. आप के रुपए देने से पहले मैं आप के साथ 1 कप चाय तो पी ही सकता हूं,’’ सौरभ बोला तो सीमा झेंप गई.

‘‘सौरी मैं तो आप से पूछना भूल गई. मैं अभी ले कर आती हूं,’’ इतना कह कर सीमा

2 कप चाय बना कर ले आई. दोनों साथ बैठकर बातें करने लगे.

‘‘आप को देख कर कोई नहीं कह सकता आप 2 बच्चों की मां हैं.’’

‘‘हरकोई मुझे देख कर ऐसा ही कहता है.’’

‘‘आप इतनी स्मार्ट हैं. आप को किसी अच्छी कंपनी में जौब करनी चाहिए.’’

‘‘जौब मेरे बस का नहीं है. मैं तो जीवन को खुल कर जीने में विश्वास रखती हूं. प्रियांक हैं न कमाने के लिए. इस से ज्यादा क्या चाहिए? हमारी सारी जरूरतें उस से पूरी हो जाती हैं,’’ सीमा हंस कर बोली.

‘‘आप का जिंदगी जीने का नजरिया औरों से एकदम हट कर है.’’

‘‘घिसीपिटी जिंदगी जीने से क्या फायदा? मुझे तो लोगों से मिलनाजुलना, बातें करना, सैरसपाटा करना बहुत अच्छा लगता है,’’ कह कर सीमा रुपए ले कर आ गई और बोली, ‘‘ये लीजिए. आप को औफिस को भी देर हो रही होगी.’’

‘‘आप ने ठीक कहा. मुझे औफिस जल्दी पहुंचना था. मैं चलता हूं,’’ सौरभ बोला. उस का मन अभी बातें कर के भरा नहीं था. वह वहां से जाना नहीं चाहता था लेकिन सीमा की बात को भी काट कर इस समय अपनी कद्र कम नहीं कर सकता था. वहां से उठ कर वह बाहर आ गया और सीधे औफिस की ओर बढ़ गया. उस ने सीमा के साथ कुछ वक्त बिताने के लिए उस से झूठ बोला था कि वह मौल में खरीदारी करने आया था.

अगले दिन शाम को फिर सौरभ की मुलाकात प्रियांक और सीमा से क्लब में हो गई. हमेशा की तरह प्रियांक ने उसे अपने साथ डिनर करने के लिए कहा तो वह बोला, ‘‘मेरी भी एक शर्त है कि आज के डिनर की पेमैंट मैं करूंगा.’’

‘‘हम दोनों ने भी तो डिनर करना है.’’

‘‘तो क्या हुआ आज का डिनर मेरी ओर

से रहेगा.’’

‘‘जैसे तुम्हारी मरजी,’’ प्रियांक बोला.

सीमा ने डिनर पहले ही और्डर कर दिया था. थोड़ी देर तक वे तीनों साथ बैठ कर डिनर के साथ बातें भी करते रहे. सौरभ महसूस कर रहा था कि सीमा को सभी विषयों की बड़ी अच्छी जानकारी थीं. वह हर विषय पर अपनी बेबाक राय दे रही थी. सौरभ को यह सब अच्छा लग रहा था. घर पहुंच कर भी उस के ऊपर सीमा का ही जादू छाया रहा. बहुत कोशिश कर के भी वह उस से अपने विचारों को हटा न सका. उस का मन हमेशा उस से बातें करने का करता. उसे सम?ा नहीं आ रहा था कि वह अपनी भावनाएं सीमा के सामने कैसे व्यक्त करे? उसे इस के लिए एक उचित अवसर की तलाश थी.

एक दिन उस ने बातों ही बातों में सीमा से उस का हफ्ते भर का कार्यक्रम पूछ लिया. सौरभ को पता चल गया था कि वह हर बुधवार को खरीदारी के लिए स्टार मौल जाती है. वह उस दिन सुबह से सीमा की गतिविधियों पर नजर रखे हुए था.

सीमा दोपहर में मौल पहुंची तो सौरभ

उस के पीछेपीछे वहां आ गया. उसे देखते ही अनजान बनते हुए बोला, ‘‘हाय सीमा इस समय तुम यहां?’’

‘‘यह बात तो मुझे पूछनी थी. इस समय आप औफिस के बजाय यहां क्या कर रहे हैं?’’

‘‘आप से मिलना था इसीलिए कुदरत ने मुझे इस समय यहां भेज दिया.’’

‘‘आप बातें बहुत अच्छी बनाते हैं.’’

‘‘मैं इंसान भी बहुत अच्छा हूं. एक बार मौका तो दीजिए.’’

उस की बात सुन कर सीमा झेंप गई.

सौरभ ने घड़ी पर नजर डाली और बोला, ‘‘दोपहर का समय है क्यों न हम साथ लंच करें?’’

‘‘लेकिन…’’

‘‘कोई बहाना नहीं चलेगा. आप खरीदारी कर लीजिए. मैं भी अपना काम निबटा लेता हूं. उस के बाद इत्मीनान से सामने होटल में साथ बैठ कर लंच करेंगे,’’ सौरभ ने बहुत आग्रह किया तो सीमा इनकार न कर सकी.

सौरभ को यहां कोई खास काम तो था नहीं. वह लगातार सीमा को ही देख रहा था. कुछ देर में सीमा खरीदारी कर के आ गई. सौरभ ने उस के हाथ से पैकेट ले लिए और वे दोनों होटल में आ गए.

सौरभ बहुत खुश था. उसे अपने दिल की बात कहने का आखिरकार मौका मिल गया. वह बोला, ‘‘प्लीज आप अपनी पसंद का खाना और्डर कर लीजिए.’’

सीमा ने हलका खाना और्डर किया. उस के सर्व होने में अभी थोड़ा समय था. सौरभ ने बात शुरू की, ‘‘आप बहुत स्मार्ट और बहुत खुले विचारों की हैं. मुझे ऐसी लेडीज बहुत अच्छी लगती हैं.’’

‘‘यह बात आप कई बार कह चुके हैं.’’

‘‘इस से आप को अंदाजा लगा लेना चाहिए कि मैं आप का कितना बड़ा फैन हूं.’’

‘‘थैंक्यू. सौरभ आप ने कभी अपने परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया?’’ सीमा बात बदल कर बोली.

‘‘आप ने कभी पूछा ही नहीं. खैर, बता देता हूं. परिवार के नाम पर बस मम्मी और एक बहन है. उस की शादी हो गई है और वह अमेरिका में रहती है. मम्मी लखनऊ में हैं. कभीकभी उन से मिलने चला जाता हूं.’’

बातें चल ही रही थीं कि टेबल पर खाना आ गया और वे बातें करते हुए लंच करने लगे.

सौरभ अपने दिल की बात कहने के लिए उचित मौके की तलाश में था. लंच खत्म हुआ और सीमा ने आइसक्रीम और्डर कर दी. उस के सर्व होने से पहले सौरभ उस के हाथ पर बड़े प्यार से हाथ रख कर बोला, ‘‘आप मु?ो बहुत अच्छी लगती हैं. क्या आप भी मुझे उतना ही पसंद करती हैं जितना मैं आप को चाहता हूं?’’

मौके की नजाकत को देखते हुए सीमा ने धीमे से अपना हाथ खींच कर अलग किया और बोली, ‘‘यह कैसी बात पूछ रहे हैं? आप प्रियांक के दोस्त और सहकर्मी हैं इसी वजह से मैं आप की इज्जत करती हूं, आप से खुल कर बात करती हूं. इस का मतलब आप ने कुछ और समझ लिया.’’

‘‘मैं तो आप को पहले दिन से जब से आप को देखा तभी से पसंद करने लगा हूं. मैं दिल के हाथों मजबूर हो कर आज आप से यह सब कहने की हिम्मत कर रहा हूं. मुझे लगता है आप भी मुझे पसंद करती हैं.’’

‘‘अपनी भावनाओं को काबू में रखिए अन्यथा आगे चल कर यह आप के लिए भी और मेरे परिवार के लिए भी मुसीबत खड़ी कर सकती हैं.’’

‘‘मैं आप से कुछ नहीं चाहता बस कुछ समय आप के साथ बिताना चाहता हूं,’’ सौरभ बोला.

तभी आइसक्रीम आ गई. सीमा बड़ी तलखी से बोली, ‘‘अब मुझे चलना चाहिए.’’

‘‘प्लीज पहले इसे खत्म कर लो.’’

सीमा ने उस के आग्रह पर धीरेधीरे आइसक्रीम खानी शुरू की लेकिन अब उस की इस में कोई रुचि नहीं रह गई थी. किसी तरह से सौरभ से विदा ले कर वह घर चली आई. सौरभ की बातों से वह आज बहुत आहत हो गई थी. वह समझ गई  कि सौरभ ने उस के मौडर्न होने का गलत अर्थ समझ लिया .वह उसे एक रंगीन तितली समझने की भूल कर रहा जो सुंदर पंखों के साथ उड़ कर इधरउधर फूलों पर मंडराती रहती है.

सीमा इस समस्या का तोड़ ढूंढ़ रही थी जो अचानक उस के सामने आ खड़ी हुई थी और कभी भी उस के जीवन में तूफान खड़ा कर सकती है. वह जानती थी  इस बारे में प्रियांक से कुछ कहना बेकार है. अगर वह उसे कुछ बताएगी तो वह उलटा उसे ही दोष देने लगेगा, ‘‘जरूर तुम ने उसे बढ़ावा दिया होगा. तभी उस की इतना सब कहने की हिम्मत हुई है.’’

1-2 बार पहले भी जब किसी ने उस से कोई बेहूदा मजाक किया तो प्रियांक की यही प्रतिक्रिया रही थी. उसे सम?ा नहीं आ रहा था वह सौरभ की इन हरकतों को कैसे रोके? बहुत सोचसम?ा कर उस ने अपनी छोटी बहन रीमा को फोन मिलाया. वह भी सीमा की तरह पढ़ीलिखी और मौडर्न लड़की थी. उस ने अभी तक शादी नहीं की थी क्योंकि उसे अपनी पसंद का लड़का नहीं मिल पाया था. मम्मीपापा उस के लिए परेशान जरूर थे लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी हुई थी कि वह शादी उसी से करेगी जो उसे पसंद होगा.

दोपहर में सीमा का फोन देख कर उसने पूछा, ‘‘दी, आज जल्दी फोन करने की फुरसत कैसे लग गई? कोई पार्टी नहीं थी

इस समय?’’

‘‘नहीं आज कोई पार्टी नहीं थी. मैं अभी मौल से आ रही हूं. तू बता तेरे कैसे हाल हैं कोई मिस्टर परफेक्ट मिला या नहीं?’’

‘‘अभी तक तो नहीं मिला.’’

‘‘मेरी नजर में ऐसा एक इंसान है.’’

‘‘कौन है?’’

‘‘प्रियांक के साथ कंपनी में काम करता है. तुम चाहो तो उसे परख सकती हो.’’

‘‘तुम्हें ठीक लगा तो हो सकता है मु?ो भी पसंद आ जाए.’’ रीमा हंस कर बोली.

‘‘ठीक है तुम 1-2 दिन में यहां आ जाओ. पहले अपने दिल में उस के लिए जगह तो बनाओ. बाकी बातें तो बाद में होती रहेंगी.’’

‘‘सही कहा दी. परखने में क्या जाता है. कुछ ही दिन में उस का मिजाज सम?ा में आ जाएगा कि वह मेरे लायक है कि नहीं.’’

सीमा अपनी बहन रीमा से काफी देर तक बातें करती रही. उस से बात कर के उस का मन बड़ा हलका हो गया था और काफी हद तक उस की समस्या भी कम हो गई थी. दूसरे दिन रीमा वहां पहुंच गई. प्रियांक ने उसे देखा तो चौंक गया, ‘‘रीमा, तुम अचानक यहां?’’

‘‘दी की याद आ रही थी. बस उस से मिलने चली आई. आप को बुरा तो नहीं लगा?’’ रीमा बोली.

‘‘कैसी बात करती हो? तुम्हारे आने से तो घर में रौनक आ जाती है.’’

सौरभ सीमा की प्रतिक्रिया की परवाह किए बगैर अपने मन की बात कह कर आज अपने को बहुत हलका महसूस कर रहा था. उसे सीमा के उत्तर का इंतजार था. 2 दिन हो गए थे. सीमा ने उस से फिर इस बारे में कोई बात नहीं की.

सौरभ से न रहा गया तो शाम के समय वह सीमा के घर पहुंच गया. ड्राइंगरूम में रीमा बैठी थी. उसी ने दरवाजा खोला. सामने सौरभ को देख कर वह सम?ा गई कि दी ने इसी के बारे में उस से बात की थी.

‘‘नमस्ते,’’ रीमा बोली तो सौरभ ने भी औपचारिकतावश हाथ उठा दिए. उसे इस घर में देख कर वह चौंक गया.

रीमा ने अजनबी नजरों से उस की ओर देखा. बोली, ‘‘अगर मेरा अनुमान सही है तो आप सौरभजी हैं.’’

‘‘आप को कैसा पता चला?’’

‘‘दी आप की बहुत तारीफ करती हैं. उन के बताए अनुसार मुझे लगा आप सौरभजी ही होंगे.’’

उस के मुंह से सीमा की कही बात सुन कर सौरभ को बड़ा अच्छा लगा.

‘‘बैठिए न आप खड़े क्यों हैं?’’

रीमा के आग्रह पर सौरभ वहीं सोफे पर

बैठ गया.

‘‘मैं प्रियांक से  मिलने आया था. इसी बहाने आप से भी मुलाकात हो गई.’’

‘‘मेरा नाम रीमा है. मैं सीमा दी की छोटी बहन हूं.’’

‘‘मेरा परिचय तो आप जान ही  गई हैं.’’

‘‘दी ने जितना बताया था आप तो उस से भी कहीं अधिक स्मार्ट हैं.’’

लगातार रीमा के मुंह से सीमा की उस के बारे में राय जान कर सौरभ का मनोबल ऊंचा हो गया. उस लगा कि सीमा भी उसे पसंद करती है लेकिन लोक लाज के कारण कुछ कह नहीं पा रही है.

‘‘आप की दी कहीं दिखाई नहीं दे रहीं.’’

‘‘वे काम में व्यस्त हैं. उन्हें शायद आप के आने का पता नहीं चला. अभी बुलाती हूं,’’ कह कर रीमा दी को बुलाने चली गई.

कुछ देर में सीमा आ गई. उस ने मुसकरा कर हैलो कहा तो सौरभ का दिल अंदर ही अंदर खुशी से उछल गया. उसे पक्का विश्वास हो गया था कि सीमा को भी वह पसंद है. उसे उस की बात का जवाब मिल गया था. उस ने पूछा, ‘‘प्रियांक अभी तक नहीं आया?’’

‘‘आते होंगे. आप दोनों बात कीजिए मैं चाय का इंतजाम करवा कर आती हूं,’’ कह कर सीमा वहां से हट गई.

‘‘कुछ समय पहले कभी दी से आप का जिक्र नहीं सुना. शायद आप को यहां आए ज्यादा समय नहीं हुआ है?’’

‘‘ मैं अभी कुछ दिन पहले ट्रांसफर हो कर यहां आया हूं.’’

‘‘आप की फैमिली?’’

‘‘मैं सिंगल हूं. मेरी अभी शादी नहीं हुई.’’

‘‘लगता है आप को भी अभी अपना मनपसंद साथी नहीं मिला.’’

‘‘आप ठीक कहती हैं. कुछ को ही अच्छे साथी मिलते हैं.’’

‘‘आप अच्छेखासे हैंडसम और स्मार्ट हैं. आप को लड़कियों की क्या कमी है?’’

बातों का सिलसिला चल पड़ा और वे आपस में बातें करने लगे. रीमा सौरभ को

बहुत ध्यान से देख रही थी. सौरभ की आंखें लगातार सीमा को खोज रही थीं लेकिन वह

बहुत देर तक बाहर उन के बीच नहीं आई. रीमा भी शक्लसूरत व कदकाठी में अपनी बहन की तरह थी. बस उन के स्वभाव में थोड़ा अंतर लग रहा था.

कुछ देर बाद प्रियांक भी आ गया. सौरभ को देख कर चौंक गया और फिर उस के साथ बातों में शामिल हो गया. प्रियांक बोली, ‘‘आप हमारी सालीजी से मिल लिए होंगे. अभी तक इन को अपनी पसंद का कोई साथी नहीं मिला है.’’

‘‘मैं ने सोचा ये भी अपनी बहन की तरह होंगी जिन्हें देख कर कोई नहीं कह सकता कि वे शादीशुदा हैं.’’

‘‘अभी मेरी शादी नहीं हुई है. अभी खोज जारी है.’’

प्रियंका के आने पर सीमा थोड़ी देर के लिए सौरभ के सामने आई और फिर प्रियांक के पीछे कमरे में चली आई. वह रीमा और सौरभ को बात करने का अधिक से अधिक मौका देना चाहती थी. बातोंबातों में रीमा ने सौरभ से उस का फोन नंबर भी ले लिया था.सौरभ को लगा सीमा आज उस के सामने आने में ?ि?ाक रही है और उस के सामने अपने दिल का हाल बयां नहीं कर पा रही है. कुछ देर वहां पर रहने के बाद सौरभ अपने घर लौट आया.

प्रियांक ने आग्रह किया था कि खाना खा कर जाए लेकिन आज सीमा की स्थिति को देखते हुए उस ने वहां पर रुकना ठीक नहीं सम?ा और वापस चला आया.

रीमा ने अगले दिन दोपहर में सौरभ को फोन किया, ‘‘आज आप शाम को क्या कर रहे हैं?’’

‘‘कुछ खास नहीं.’’

‘‘शाम को घर आ जाइएगा. हम सब को अच्छा लगेगा.’’

‘‘क्या इस तरह किसी के घर रोज आना ठीक रहेगा?’’

‘‘दी चाहती थीं कि मैं आप को शाम को घर बुला लूं.’’

‘‘कहते हैं रोजरोज किसी के घर बिना बुलाए नहीं जाना चाहिए. जब आप लोग चाहते हैं तो मैं जरूर आऊंगा,’’ सौरभ बोला. उसे लगा जैसे उस के अरमानों ने मूर्त रूप ले लिया है और उसे मन की मुराद मिल गई. वह औफिस के बाद सीधे सीमा के घर चला आया.

रीमा उस का इंतजार कर रही थी. उसे देखते ही बोली, ‘‘थैंक्यू आप ने हमारी बात मान ली.’’

‘‘आप हमें बुलाएं और हम न आएं ऐसा कभी हो सकता है?’’

आज भी उस की आशा के विपरीत

उसे सीमा कहीं दिखाई नहीं दे रही थी. थोड़ी देर बाद वह 3 कप चाय और नाश्ता ले कर

आ गई.

‘‘आप को पता चल गया कि मैं आ रहा हूं?’’

‘‘रीमा ने बताया था इसलिए मैं ने चाय और स्नैक्स की तैयारी पहले ही कर ली थी,’’ सीमा मुसकरा कर बोली.

सौरभ सीमा के बदले हुए रूप से अंचभित था. कल तक उस के सामने मौडर्न दिखने और बेझिझक बोलने वाली सीमा उस की रोमांटिक बातें सुनने के बाद से एकदम छुईमुई सी हो गई थी. वह अब उस की हर बात में नजर का लेती थी. उस का इस तरह शरमाना सौरभ को बहुत अच्छा लग रहा था. वह समझ गया कि वह भी उसे उतना ही पसंद करती है लेकिन खुल कर स्वीकार करने में झिझक उन के बीच आ रही है.

अब सौरभ के सामने एक ही समस्या थी वह कि वह सीमा की झिझक को कैसे दूर करे? उसे तो वही खूब बोलने वाली मौडर्न सीमा पसंद थी. मुश्किल यह थी कि रीमा की उपस्थिति में उसे सीमा से मिल कर उस की झिझक दूर करने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था. वह चाहता था कि वह सीमा से ढेर सारी बातें करे पर वह उस के सामने ही बहुत कम आ रही थी.

सौरभ रीमा के साथ बहुत देर तक बातें करता रहा. तभी प्रियांक आ गया. उन दोनों को बातें करते देख कर वह बड़ा आश्वस्त लगा.

रात हो गई थी.सौरभ जैसे ही जाने लगे रीमा बोली, ‘‘डिनर तैयार हो रहा है. आज खाना खा कर ही जाइएगा.’’

‘‘आप बनाएंगी तो जरूर खाऊंगा.’’

‘‘ऐसी बात है तो मैं किसी दिन बना दूंगी. वैसे भी दी ने पहले से ही खाने की तैयारी कर ली होगी.’’

‘‘अगर आप दोनों बहनों का इरादा मुझे खाना खिलाने का है तो मैं मना कैसे कर सकता हूं?’’

रीमा वहां से उठ कर किचन में आ गई. प्रियांक सौरभ से बातें करने लगा. सीमा की मदद के लिए रीमा उस का हाथ बंटाने लगी. अब सौरभ को जाने की कोई जल्दी न थी. यहां पर सीमा की उपस्थिति का एहसास ही उस के लिए बहुत था. वैसे उसे अब रीमा की बातें भी अच्छी लगने लगी थीं. एकजैसे संस्कारों में पलीबढ़ी दोनों बहनों में काफी समानताएं थीं.

रीमा ने डाइनिंगटेबल पर खाना बड़े करीने से लगा दिया. सब खाना खाने लगे. सौरभ बीचबीच में चोर नजरों से सीमा को देख रहा था. वह  सिर झुकाए चुपचाप

खाना खा रही थी. गलती से कभी नजरें

टकरा जातीं तो सौरभ से निगाहें मिलते ही

वह झट से अपनी नजरें नीची कर लेती.

सौरभ को उस का यह अंदाज अंदर तक रोमांचित कर जाता.

रीमा को यहां आए हफ्ताभर हो गया

था. वह अब सौरभ से खुल कर बात करने लगी थी.

‘‘आज सुबहसुबह रीमा ने सौरभ को फोन किया, ‘‘आज शाम आप फ्री हो?’’

‘‘कोई खास काम था?’’

‘‘हम सब आज पिक्चर देखने का प्रोगाम बन रहे हैं. आप भी चलिए हमारे साथ.’’

‘‘नेकी और पूछपूछ मैं जरूर आऊंगा.’’

‘‘तो ठीक है आप सीधे सिटी मौल में ठीक 5 बजे पहुंच जाइए. हम आप को वहीं मिल जाएंगे.’’

सौरभ की मानो मन की मुराद पूरी हो गई थी. वह समय से पहले ही मौल पहुंच

गया. तभी उस ने देखा कि रीमा अकेली ही

आ रही है.

‘‘ प्रियांक और सीमा कहां रह गए?’’

‘‘अचानक जीजू की तबीयत कुछ खराब हो गई. इसी वजह से वे दोनों नहीं आ रहे और मैं अकेले चली आई. मु?ो लगा प्रोग्राम कैंसिल करना ठीक नहीं.आप वहां पर हमारा इंतजार कर रहे होंगे.’’

‘‘इस में क्या था? बता देतीं तो प्रोग्राम कैंसिल कर किसी दूसरे दिन पिक्चर देख लेते.’’

‘‘हम दोनों तो हैं. आज हम ही पिक्चर का मजा ले लेते हैं,’’ रीमा बोली.

सौरभ का मन थोड़ा उदास सा हो गया लेकिन वह रीमा को यह सब नहीं जताना चाहता था. वह ऊपर से खुशी दिखाते हुए बोला, ‘‘इस से अच्छा मौका हमें और कहां मिलेगा साथ वक्त बिताने का.’’

‘‘आप ठीक कहते हैं,’’ कह कर वे सिनेमाहौल में आ गए. वहां सौरभ को सीमा की कमी खल रही थी लेकिन वह यह भी जानता था कि सीमा प्रियांक की पत्नी है. उस का फर्ज बनता है वह अपने पति की परेशानी में उस के साथ रहे. यही सोच कर उस से सब्र कर लिया और रीमा के साथ आराम से पिक्चर देखने लगा.

समय कैसे बीत गय पता ही नहीं चला. पिक्चर खत्म हो गई थी. सौरभ रीमा को

छोड़ने सीमा के घर आ गया. सामने प्रियांक दिखाई दे गया.

‘‘क्या बात है आप दोनों पिक्चर देखने

नहीं आए?’’

‘‘अचानक मेरे सिर मे बहुत दर्द हो गया था. अच्छा महसूस नहीं हो रहा था. इसीलिए नहीं आ सके. फिर कभी चलेंगे. तुम बताओ कैसी रही मूवी?’’

‘‘बहुत अच्छी. आप लोग साथ में होते तो और अच्छा लगता,’’ सौरभ बोला. उस ने चारों और अपनी नजरें दौड़ाईं पर उसे सीमा कहीं दिखाई नहीं दी. वह रीमा को छोड़ कर वहीं से वापस हो गया.

अब तो यह रोज की बात हो गई थी. रीमा सौरभ के साथ देर तक फोन पर बातें करती रहती और जबतब उसे घर बुला लेती. वे कभीकभी घूमने का प्रोग्राम भी बना लेते.

इतने दिनों में रीमा की सौरभ से अच्छी दोस्ती हो गई थी और सौरभ के सिर से भी सीमा का भूत उतरने लगा था.

एक दिन सीमा ने रीमा को कुरेदा, ‘‘तुम्हें सौरभ कैसा लगा रीमा?’’

‘‘इंसान तो अच्छा है.’’

‘‘तुम उस के बारे में सीरियस हो तो बात आगे बढ़ाई जाए?’’

‘‘दी अभी कुछ कह नहीं सकती. मुझे कुछ और समय चाहिए. मर्दों का कोई भरोसा नहीं होता. ऊपर से कुछ दिखते हैं और अंदर से कुछ और होते हैं.’’

‘‘कह तो तुम ठीक रही है. तुम उसे अच्छे से जांचपरख लेना तब कोई कदम आगे बढ़ाना. जहां तुम ने इतने साल इंतजार कर लिया है वहां कुछ महीने और सही,’’ सीमा हंस कर बोली.

रीमा को दी की सलाह अच्छी लगी.

1 महीना बीत गया था. सौरभ और रीमा एकदूसरे के काफी करीब आ गए थे. अब सीमा उस के दिमाग और दिल दोनों से उतरती चली जा रही थी और उस की जगह रीमा लेने लगी थी.

सीमा ने भी इस बीच सौरभ से कोई बात नहीं की और न ही वह उस के आसपास ज्यादा देर तक नजर आती. सौरभ को भी रीमा अच्छी लगने लगी. उस की बातें में बड़ी परिपक्वता थी और अदाओं में शोखी.

एक दिन उस ने रीमा के सामने अपने दिल की बात कह दी, ‘‘रीमा तुम मुझे अच्छी लगती हो मेरे बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’

‘‘इंसान तो तुम भी भले हो लेकिन मर्दों पर इतनी जल्दी यकीन नहीं करना चाहिए?’’

रीमा बोली तो सौरभ थोड़ा घबरा गया. उसे लगा कहीं सीमा ने तो उस के बारे में कुछ नहीं कह दिया.

‘‘ऐसा क्यों कह रही हो? मुझसे कोई गलती हो गई है क्या?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. इतने लंबे समय तक तुम ने भी शादी नहीं की हैं. तुम भी आज तक अपनी होने वाली जीवनसाथी में कुछ खास बात ढूंढ़ रहे होंगे.’’

‘‘पता नहीं क्यों आज से पहले कभी कोई जंची ही नहीं. तुम्हारे साथ वक्त बिताने का मौका मिला तो लगा तुम ही वह औरत हो जिस के साथ मैं अपना जीवन खुशी से बिता सकता हूं. इसीलिए मैंने अपने दिल की बात कह दी.’’

सौरभ की बात सुन कर रीमा चुप हो गई. फिर बोली, ‘‘इस के बारे में मुझे अपने दी और जीजू से बात करनी पड़ेगी.’’

‘‘मुझे कोई जल्दबाजी नहीं है. तुम चाहो जितना समय ले सकती हो,’’ सौरभ बोला.

थोड़ी देर बाद रीमा घर लौट आई. उस के चेहरे से खुशी साफ ?ालक रही थी. उसे देखते ही सीमा ने पूछा, ‘‘क्या बात है आज बहुत खुश दिख रही हो?’’

‘‘बात ही कुछ ऐसी है. आज मुझे सौरभ ने प्रपोज किया.’’

‘‘तुम ने क्या कहा?’’

‘‘मैं ने कहा मुझे अभी थोड़ा समय दो. मैं मम्मीपापा, दीदीजीजू से बात कर के बताऊंगी.’’

उस की बात सुन कर सीमा को बहुत तसल्ली हुई. आज सौरभ ने एक नहीं 2 घर बरबाद होने से बचा लिए थे. उसे लगा भावनाओं में बह कर कभी इंसान से भूल हो जाती है तो इस का मतलब यह नहीं कि उस की सजा वह जीवन भर भुगतता रहे.

रीमा जैसे ही अपने कमरे में आराम करने के लिए गयी सीमा ने पहली बार सौरभ को फोन मिलाया.

सीमा का फोन देख कर सौरभ चौंक गया. उस ने किसी तरह अपने को संयत

किया और बोला, ‘‘हैलो सीमा कैसी हो?’’

‘‘मैं बहुत खुश हूं. तुम ने आज रीमा को प्रपोज कर के मेरे दिल का बो?ा हलका कर दिया. सौरभ कभीकभी हम से अनजाने में कोई भूल हो जाती है तो उस का समय रहते सुधार कर लेना चाहिए.’’

‘‘सच में मेरे दिल में भी डर था कि मैं ने रीमा को प्रपोज कर तो दिया लेकिन इस पर आप की प्रतिक्रिया क्या होगी?

‘‘मैं एक आधुनिक महिला हूं. मेरे विचार संकीर्ण नहीं हैं. मेरे व्यवहार के खुलेपन का आप ने गलत मतलब निकाल लिया था. आज तुम ने अपनी गलती सुधार कर 2 परिवारों की इज्जत रख ली.’’

‘‘आप ने भी मेरे दिल से बड़ा बोझ उतार दिया. यह सब आप की समझदारी के कारण ही संभव हो सका है. मैं तो पता नहीं भावनाओं में बह कर आप से क्या कुछ कह गया? मैं ने आप की चुप्पी के भी गलत माने निकाल लिए थे.’’

‘‘सौरभ इस बात का जिक्र कभी भी रीमा से न करना और इस मजाक को यहीं खत्म कर देना.’’

‘‘मजाक,’’ सौरभ ने चौंक कर पूछा.

‘‘हां मजाक, अब आप मेरे बहनोई बनने वाले हो. इतने से मजाक का हक तो आप का भी बनता है,’’ सीमा बोली तो सौरभ जोर से हंस पड़ा. उस की हंसी में उन के बीच के रिश्ते पर पड़ी धूल भी छंट गई.

लेखक- डा. के.  रानी

ऐक्टिंग की फील्ड महिलाओं के लिए बेहद डिफिकल्ट और डिमांडिंग है : दीक्षा जोशी

Diksha Joshi : गुजराती फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाने और ‘जयेशभाई जोरदार,’ ‘कौशलजी वर्सेस कौशल’ और ‘धड़क 2’ जैसी फिल्मों के साथ बौलीवुड में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के बाद दीक्षा जोशी अब सोनी सब के लोकप्रिय शो ‘पुष्पा इंपौसिबल’ में ‘दीप्ति’ के किरदार को परदे पर उतार रही हैं और टैलीविजन के दर्शकों का दिल जीत रही हैं.

इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई के बाद ऐक्टिंग की फील्ड में मुकाम बनाने वाली दीक्षा का जन्म नवाबों के शहर लखनऊ में हुआ था. बाद में उन का परिवार अहमदाबाद चला गया. उन के पापा हेम जोशी साइंटिस्ट थे और अब वे रिटायरमैंट के बाद यंगस्टर्स को पीएचडी की तैयारी के लिए गाइड करते हैं. उन की मम्मी रश्मि जोशी सोशल वर्कर थीं और अभी वे होममेकर हैं. स्कूली पढ़ाई पूरी कर उन्होंने सेंट जेवियर्स कालेज, अहमदाबाद से इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की. फिलहाल वे मुंबई में रह कर अपने सपने पूरे कर रही हैं. वे बचपन से ही स्कूल में थिएटर और नाटक करती थीं. उन के मातापिता अपनी इकलौती बेटी का पूरा साथ देते थे.

दीक्षा जोशी ने करीब 10 के ऊपर गुजराती फिल्म की हैं. उन्होंने 3 हिंदी फिल्में भी की हैं. अभी वे अपना पहला हिंदी सीरियल ‘पुष्पा इंपौसिबल’ कर रही हैं. दीक्षा जोशी ने 2017 में फिल्म ‘शुभ आरंभ’ से अपनी शुरुआत की. उसी वर्ष उन्होंने 2 अन्य फिल्मों में काम किया.  2018 में ‘शरतो लागु’ में अपनी भूमिका के लिए उन्हें ‘जीआईएफए बैस्ट ऐक्ट्रैस’ का अवार्ड मिला. उन की अगली फिल्म ‘धुनकी’ थी, जिस में उन्होंने प्रतीक गांधी के साथ काम किया. 2020 में दीक्षा को ‘धुनकी’ के लिए ‘क्रिटिक्स चौइस फिल्म अवार्ड्स बैस्ट ऐक्ट्रैस (गुजराती)’ का पुरस्कार मिला. दीक्षा ने 2020 में रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘लव नी लव स्टोरीज’ में मुख्य भूमिका निभाई. उन्होंने 2022 में रणवीर सिंंह के साथ ‘जयेशभाई जोरदार’ से बौलीवुड में ऐंट्री ली. दीक्षा जोशी को 2023 में दादा साहब फाल्के फिल्म फाउंडेशन अवार्ड से सम्मानित किया गया था जो उन्हें एक फिल्म के लिए मिला था.

आइए, जानते हैं उन के बारे में विस्तार से:

गुजराती सिनेमा से हिंदी फिल्मों तक

मैं नौनगुजराती हूं पर मुझे गुजराती फिल्में करने में लैंग्वेज की इतनी प्रौब्लम नहीं हुई. दरअसल, कालेज के बाद जब मैं गुजराती फिल्म कर रही थी तो मैं ने प्रौपर गुजराती सीखी. इसलिए गुजराती फिल्मों के लिए बहुत से औडिशन भी दिए. रही बात हिंदी की तो हिंदी मेरी मदर टंग है. बचपन से हिंदी बोलती थी इसलिए हिंदी फिल्मों या सीरियल्स में वैसे ही मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई.

इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई और थिएटर

आई थिंक मेरा मेजर जो ऐक्टिंग को ले कर प्यार है वह इंग्लिश लिटरेचर की वजह से ही है. बचपन से ही मैं इंग्लिश प्लेज बगैरा बहुत पढ़ती थी. मुझे कहानियां बहुत पसंद थीं और कहानियों के उन किरदारों में अकसर मैं खुद को पाती थी. इसलिए मैं कहूंगी कि लिटरेचर ने ऐक्ट्रैस बनने के मेरे विजन में मेरी हैल्प की है. जितनी ज्यादा मैं पढ़ती हूं उतनी ही ज्यादा क्यूरियस ऐक्टर बन जाती हूं.

चरित्र की गहराई को अहमियत

मैं स्क्रिप्ट्स इस तरह से चुनती हूं कि अगर पहले मैं ने ऐसा कुछ काम नहीं किया है और कुछ अलग रोल है जो थोड़ा सा चैलेंजिंग भी है तो वह मैं जरूर चुनती हूं क्योंकि मुझे अलगअलग लोगों से ऐंपेथाइज करना अच्छा लगता है. मैं नहीं मानती कि इस दुनिया में कोई भी पूरी तरह से विलेन है या हीरो. ऐसा नहीं होता है. हर इंसान में पौजिटिव और नैगेटिव दोनों क्वालिटीज होती हैं. मुझे लगता है कि मुझे ऐक्टिंग भी इसलिए पसंद है क्योंकि यह बहुत हिम्मत वाली जौब है. आप किसी तीसरे काल्पनिक व्यक्ति के जीवन की चीजों को ऐक्सैस करने जा रहे हैं, उस की पौजिटिव और नैगेटिव हर चीज से फैमिलियर होने जा रहे हैं. फिर आप अपने थ्रू उसे व्यक्त करने वाले हैं. इसलिए स्क्रिप्ट चुनते समय कुछ नया किरदार मेरे लिए आता है जो मैं ने कभी नहीं किया है तो उसे जरूर करने की सोचती हूं.

फिल्मों में और सीरियल्स में पहला ब्रेक

मैं थिएटर भी करती थी और फिल्म्स के लिए औडिशंस भी दे रही थी. ऐसे ही एक औडिशन के जरीए मेरा सलैक्शन एक फिल्म में हो गया और फिर अन्य फिल्मों की मौके भी मिलते गए. सीरियल में भी ऐसा ही कुछ हुआ. जेडी भाई के साथ मैं ने एक वैब सीरीज गुजराती में की है जो कि अभी तक रिलीज नहीं हुई. पर वे मुझे जानते थे. मैं ने दीप्ति के कैरेक्टर हेतु ‘पुष्पा इंपौसिबल’ के लिए औडिशन दिया था जहां मेरा सलैक्शन हो गया. मैं अभी ‘पुष्पा पौसिबल’ मैं काम कर रही हूं, जिस में मैं दीप्ति पटेल का किरदार निभा रही हूं. दीप्ति पुष्पा की पहली बहू यानी बड़ी बहू है. इस सीरियल में मुझे बहुत अच्छा ऐक्सपीरियंस हो रहा है.

पुष्पा इंपौसिबल टीवी सीरियल में दीक्षा जोशी
पुष्पा इंपौसिबल टीवी सीरियल में दीक्षा जोशी

आज की औरत अपनी खोज खुद करे

मैं सच में चाहूंगी कि आज की औरत अपनी खोज खुद ही करे. कोई उसे बताने वाला नहीं होना चाहिए कि आप को ऐसा होना चाहिए या ऐसा करना चाहिए. मु?ो लगता है कि एक औरत अपनी खोज खुद ही करती है और खुद अपनी जर्नी में, अपनी लाइफ में जब वह प्रोटागोनिस्ट बनती है तो अपनेआप सुंदर तरीके से बाहर निकलती है. उस की पहचान बहुत

सुंदर होती है. उस समय वह भले ही कम बोलने वाली है या ज्यादा बोलने वाली या फिर बोल्ड है, नहीं है इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता. मुझे लगता है कि आज की औरत को अपनेआप से मिलना, खुद को पहचानना आना चाहिए और

यह अपनेआप में बहुत बड़ी विक्ट्री है. मैं यही चाहूंगी कि हर औरत अपनी जिंदगी का सफर अपने हिसाब से तय करे. कोई और बताए तो भी न सुने.

जीवन का प्रेरणास्रोत

मुझे बचपन से ही रिवौल्यूशनरीज ने बहुत ज्यादा इंस्पायर किया है. बचपन से ही मैं ने मार्टिन लूथर किंग के बारे में पढ़ा था. उन के अलावा डाइसकू इकेडा जो एक मैंटर हैं, उन की लाइफ के बारे में पढ़ा. ऐसे लोग जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के बैटरमैंट के लिए काम करते हैं मु?ो बहुत इंस्पायर करते हैं. मैं आगे जा कर खुद ऐसा ही कुछ करना चाहती हूं.

ऐक्टिंग की फील्ड में महिलाएं

ऐक्टिंग की फील्ड महिलाओं के लिए आसान नहीं है. यह फील्ड बहुत डिफिकल्ट और बहुत ज्यादा डिमांडिंग है. डिमांडिंग इस तरह से कि आप का मैंटली, फिजिकली हर तरीके से बहुत ज्यादा फिट होना जरूरी है ताकि आप धैर्य के साथ वेटिंग गेम खेल पाएं. मुझे लगता है कि इस दुनिया में सब से ज्यादा डिफिकल्ट अगर मिलिटरी के बाद कोई काम है तो वह यही है.

पहली बात यह है कि यहां महिलाओं को ज्यादा अच्छे मौके नहीं मिलते. जरूरी है कि महिलाओं के लिए ऐसे किरदार लिखे जाएं जिन में काफी शेड्स हों न कि केवल लव इंटरैस्ट. अगर ऐसे किरदार लिखे जाएंगे तो महिलाओं को काम कर के अच्छा लगेगा वरना वे एक सा ही किरदार निभा कर चली जाएंगी और उन्हें भूलना बहुत आसान हो जाएगा. भले ही वे टैलेंटेड हूं मगर उन का पोटैंशियल ही बाहर निकल कर नहीं आ पाएगा क्योंकि अकसर स्टोरीज ऐसी ही होती हैं. मैं खुश हूं कि मुझे इस तरह की कहानियां मिली हैं जोकि इंटरैस्टिंग वूमन कैरेक्टर रहे हैं.

दूसरी प्रौब्लम महिलाओं को जनरली यह आती है कि किस तरह से अपना रास्ता बनाएं. इस फील्ड में कास्टिंग काउच करने वाले लोग भी मिलते हैं. मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है क्योंकि मैं जब बांबे आई थी तो एक फिल्म के साथ ही आई थी और एक हलकी सी बैकिंग मेरा गुजराती फिल्म की हमेशा से रही है. गुजरात में कास्टिंग काउच जैसा मुझे कभी भी फेस नहीं करना पड़ा और न ही वहां ऐसा कुछ होते हुए मैं ने सुना है. मुझे लगता है कि हर महिला को कहीं न कहीं इस फील्ड में आते समय एक डर रहता है. वैसे यह डर आदमियों को भी रहता है क्योंकि कास्टिंग काउच उन के साथ भी होता है. मगर एक औरत का तो बाई डिफाल्ट यह सिस्टम में ही आ जाता है कि ऐसे लोग मिलेंगे ही. उन्हें हटाते हुए कैसे आगे बढ़ना है और सिर्फ मेहनत से हमें जज किया जाए इस स्थिति तक कैसे पहुंचना है यह समझना जरूरी है. इस इंडस्ट्री में सही लोगों तक पहुंचना एक बहुत बड़ा स्ट्रगल हो जाता है.

तीसरी प्रौब्लम है कि औरतों को तुरंत ही लुक्स पर जज किया जाता है. ऐसे में जरूरी है कि वे अपनेआप के साथ कंफर्टेबल हो जाएं और किसी के कुछ बोलने का जिक्र न करें. मैं ऐसी दिखती हूं और मैं बहुत खुश हूं क्योंकि मेरे अंदर कुछ तो खास बात होगी. इस सोच के साथ अपनी ऐक्टिंग पर काम करते रहना और ऐक्टिंग को नींव बना लेना जरूरी है क्योंकि अगर लुक्स से खुद को भी जज करने लग गए और बाकियों से भी जज होते रहे तो मुझे लगता है एक टाइम के बाद लुक्स की नींव जो हम ने बनाई है वह तो क्रैश होने ही वाली है लेकिन अगर हम ऐक्टिंग को अपनी नींव बना लें तो मुझे लगता है आगे जाते हुए आप ग्रो ही होते रहेंगे. आप बूढ़ी हो जाए, आप के रिंकल्स आ जाए, आप के पूरे बाल सफेद हो जाएं, आप कैसी भी दिखें पर आप की ऐक्टिंग, लर्निंग और ऐक्सपीरियंस आप से कोई नहीं छीन सकता. आप के लुक्स तो डैफिनेटली आज नहीं तो कल चेंज होने ही वाले हैं. उस चेंज के साथ आप को कंफर्टेबल होना होगा. यह मेरे खुद के लिए भी एक चैलेंज रहा है.

महिलाओं की स्थिति पर राय

मैं तो बस यही कहना चाहूंगी कि इन जनरल महिलाएं बहुत सारा ट्रामा ले कर चल रही हैं. हमारे समाज में महिलाओं का ट्रामा बहुत पुराना है. सदियों पुराना. शायद पहली जो कम्युनिटी आई होगी धरती पर मु?ो लगता है यह ट्रामा उतना ही पुराना है. आज के समय पर भी ऐसा नहीं है कि महिलाओं की सिचुएशन कुछ बहुत ज्यादा चेंज हो गई है और भयंकर इक्वैलिटी आ गई है. हां अवेयरनैस डैफिनिटेली पहले से बहुत ज्यादा है. सोशल मीडिया की वजह से और जो रिसर्च हो रही हैं उन की वजह से. अब सोशल मीडिया की वजह से एक महिला अगर कुछ बहुत बेहतरीन करती है तो 5 लाख लोगों को तुरंत पता चल जाता है. दूसरी महिलाएं भी इस से प्रेरणा लेती हैं. अवेयरनैस फैली है. पहले के मुकाबले महिलाएं थोड़ी कौन्फिडैंट भी हुई हैं. मगर अड़चनें अभी भी हैं. अलग तरीके की हैं. ऐसा नहीं है कि आज की औरतों को कोई प्रौब्लम नहीं फेस करनी पड़ रही है या हम बहुत आगे आ गए हैं. प्रौब्लम्स तो हैं बस अलग तरीके की प्रौब्लम्स हैं. गुड थिंग इज अवेयरनैस फैल रही है. इस अवेयरनैस को लेना न लेना सोसाइटी के ऊपर है.

ऐक्टिंग के साथ पर्सनल लाइफ

अभी मैं सीरियल में बिजी रहती हूं फिर भी यह कोशिश जरूर करती हूं कि जिस दिन मैं फ्री हूं उस दिन अपने फैमिली मैंबर्स और फ्रैंड्स को समय दूं और उन से कनैक्ट करूं. ऐसे दिनों में मैं अपनेआप को भी समय देने की पूरी कोशिश करती हूं. मैं अपनी हीलिंग पर काम करती हूं. अपनी मैंटल और फिजिकल हीलिंग पर काम करती हूं, साथ ही प्रयास करती हूं कि स्लो डाउन होने पर भी काम करूं क्योंकि मुंबई का जीवन खासकर इस इंडस्ट्री में ओवरऔल एक रिदम है जोकि बहुत फास्ट है. इसलिए छुट्टी वाले दिन मैं स्लो डाउन होने पर काम करती हूं और इस तरह लाइफ में एक बैलेंस बनाने की कोशिश करती हूं.

आगे और क्या करने का सपना

मेरा पीएचडी करने का बहुत मन है और मु?ो लगता है मैं करूंगी. एक ऐक्टर की आइडैंटिटी में ही पूरी लाइफ रहने का थौट ही मेरे अंदर अनइजीनैस पैदा करता है. हमेशा से मु?ो लगता था कि मैं सिर्फ ऐक्टर नहीं हूं. बहुत कुछ है मेरे अंदर. मु?ो ऐसा लगता है मैं शायद टीचर बहुत अच्छी बन पाऊंगी. शायद मैं आगे जा कर रिसर्च पेपर्स लिखूं और फिल्में भी बनाऊं. डाइरैक्शन में भी इंटरैस्ट है. सिर्फ एक इंडस्ट्री ऐक्टर की तरह अपनी पूरी लाइफ को मैं इमेजिन भी नहीं कर सकती हूं. शायद इसलिए क्योंकि मेरी एक बैकग्राउंड लिटरेचर की रही है. मैं ने 5 साल दिए हैं उस सब्जैक्ट को. मेरे ट्वैंटीज में आप मु?ा से पूछतीं तो शायद मैं आप को कहती कि हां मुझे बेहतरीन से बेहतरीन कैरेक्टर्स करने हैं और पूरा जीवन ऐक्टिंग ही करनी है. पर अब मेरा नजरिया थोड़ा बदल चुका है. मुझे सिर्फ ऐक्टिंग ही नहीं करनी है. शौकिया ऐक्टिंग शायद करती रहूं मगर मैं समाज के लिए कुछ करना चाहती हूं. मेरी फैमिली की मुझे हमेशा से सपोर्ट रही ही है. मुझे ज्यादा लाइमलाइट भी पसंद नहीं. काम करती रहूं मगर कुछ शांत जीवन ज्यादा पसंद है.

जिंदगी का इमोशनल पल

मैं तो इंसान ही बड़ी इमोशनल हूं. किसी के भी साथ कुछ भी किसी भी तरीके का अन्याय जब देखती हूं तो बड़ा बुरा लगता है. अंदर से बौडी रिएक्टिव हो जाती है. अच्छा नहीं लगता है. रोना आता है बहुत ज्यादा. इनजस्टिस एक ऐसी चीज है जिसे मैं सह नहीं पाती हूं. दूसरी चीज है कहीं न कहीं पैट्रियार्की जो मुझे बहुत गुस्सा दिलाती है. पैट्रियार्की की बहुत सी चीजें हैं जो मुझे समझ नहीं आती हैं. जब से थोड़ा दिमाग खुला है, थोड़े राइटर को पढ़ा है और जो हमारे कालेज में भी जैंडर और लिटरेचर पढ़ाते थे. जब आप वे चीजें अपनी ट्वैंटीज में पढ़ते हैं तो बात आप को इतनी गहराई से समझ नहीं आती है. वे चीजें अब अपने थर्टीज में समझ आ रही हैं. जितना मैं औथेंटिक होना चाह रही हूं अपने जीवन में और बनना चाह रही हूं उतना ही मुझे पैट्रियार्की देख कर और ज्यादा गुस्सा आ रहा है.

जीवन की चुनौतियां और संघर्ष

मेरी जो चुनौतियां रही हैं मुख्य रूप से हैल्थ से ही रिलेटेड प्रौब्लम्स रही हैं जो बड़ी अड़चनें बन कर आई हैं क्योंकि कहीं न कहीं मुझे पता है कि मेरे अंदर आगे बढ़ने का पोटैंशियल बहुत है. मुझे दूसरों को भी आगे ले कर चलने की आदत है. मेरे अंदर स्वार्थ नहीं है. दूसरों को भी आगे ले कर चलने वाली भावना है. इसलिए अड़चनें भी उतनी ही तेजी से आती हैं.

मुझे लगता है मेरे जीवन का बिगैस्ट स्ट्रगल रहा है कि हाउ टू बिकम ए स्ट्रौंग पर्सन फिजिकली, मैंटली ऐंड इमोशनली. मुझे लगता है कि जब मैं यह ओवरकम कर लूंगी और एक स्ट्रौंग इंडिविजुअल बन जाऊंगी तब पूरी औथेंटिसिटी के साथ अपने रास्ते पर चल सकूंगी. अभी तो मैं समझने वाली स्टेज पर हूं. उस समझ को प्रैक्टिस में लाना है.

जीवन का मकसद

मेरे जीवन का मकसद यही है कि जो भी 20 से 40 साल तक की लड़कियां हैं वे जब मेरी फिल्म देखें, मेरी बातें सुनें या मेरे साथ कभी बैठें तो उन्हें यह फील न हो कि उन के मन में जो एक गुस्सा है सोसाइटी के प्रति वह इनवैलिड है. मैं वह इंसान बनना चाहती हूं जो उन की फीलिंग्स को वैलिडेट करे.

मेरे भाईबहन नहीं हैं. मां का नाम रश्मि जोशी और पिता का नाम हेम जोशी है. इस फील्ड में मेरा आना इसलिए संभव हुआ क्योंकि मैं औडिशन वगैरह देती रहती थी. थिएटर तो कर ही रही थी और साथ में अहमदाबाद में औडिशन भी दे रही थी. एकाध शौर्ट फिल्म भी की. उस के बाद इस फील्ड में आ गई. मैं लखनऊ में पैदा हुई थी और बड़ी हुई गांधीनगर और अहमदाबाद में और अभी मुंबई में रहती हूं. आगे कहां जाऊंगी यह नहीं पता मगर जिंदगी में हमेशा कुछ नया करते रहना चाहती हूं.

Health Issue : कुरसी से गिरने के कारण मेरे बाएं घुटने में चोट लग गई थी, क्या करूं?

Health Issue :

सवाल

कुछ दिनों पहले कुरसी से गिरने के कारण मेरे बाएं घुटने में चोट लग गई थी. 1-2 दिन कोई खास समस्या नहीं थी, लेकिन उस के बाद घुटने में सूजन आ गई. बर्फ से सिंकाई की, लेकिन कोई फायदा नहीं मिला. अब दर्द बहुत ज्यादा हो रहा है. डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने एमआरआई और ऐक्सरे की सलाह दी है. इस का कारण मुझे समझ नहीं आया. कृपया मेरी शंका दूर करें?

जवाब

आप की समस्या और जांचों से पता चलता है कि आप को बेकर्स सिस्ट की समस्या है. ऐसे में डाक्टर आप के घुटने को छू कर गांठ की गंभीरता को महसूस करता है. यदि गांठ लगातार बड़ी हो रही है और गंभीर दर्द के साथ बुखार का कारण भी बन रही है तो डाक्टर आप को नानइनवेसिव इमेजिंग टेस्ट की सलाह देता है. इस में एमआरआई या अल्ट्रासाउंड शामिल है. एमआरआई की मदद से डाक्टर सिस्ट को अच्छी तरह देख पाता है, जिस से वह उचित इलाज बताने में समर्थ रहता है. ऐक्सरे पर गांठ का पता लगना संभव नहीं है, लेकिन डाक्टर अन्य समस्याओं जैसेकि गठिया आदि की पहचान के लिए इस की सलाह दे सकती हैं. इसलिए घबराएं नहीं, यह जांच सिर्फ समस्या की सही पहचान के लिए है.

सवाल

मेरी उम्र 38 साल है. कुछ दिनों  से मेरे दाएं घुटने में दर्द हो रहा है. सूजन भी हो गई है. कृपया इस के होने का कारण और समाधान बताएं?

जवाब

इस का कारण चोट, गठिया या कोई अन्य कारण जैसेकि बेकर्स सिस्ट हो सकता है. बेकर्स सिस्ट सीनोवियल द्रव से भरी एक नर्म गांठ है, जो घुटनों के पीछे की ओर विकसित हो जाती है. इसे पोप्लिटीयल सिस्ट के नाम से जाना जाता है. गांठ दर्ददायक होती है. इस के आसपास सूजन आ जाती है. ऐसे में घुटने को मोड़ना मुश्किल हो जाता है.

यदि असल समस्या यही है तो लापरवाही दिखाना आप पर भारी पड़ सकता है. इसलिए जल्द से जल्द इस की जांच कराएं. समस्या हलकी होगी तो यह खुद ठीक हो जाएगी और डाक्टर आप को केवल आराम और हलकी दवाइयों की सलाह देगा. समस्या गंभीर होने पर आप को अन्य विकल्पों की सलाह दी जाएगी.

सवाल

मेरी उम्र 37 साल है. मुझे गठिया की समस्या है, जिस की वजह से मुझे अकसर दर्द होता रहता है, लेकिन कुछ दिनों से घुटनों में ज्यादा दर्द और सूजन हो गई है. छूने पर गांठ जैसा महसूस होता है. ऐसा क्यों?

जवाब

जब किसी को गठिया की समस्या होती है तो घुटने में बहुत अधिक तरल पदार्थ पैदा होता है, जो बेकर्स सिस्ट का निर्माण कर देता है. इलाज के बाद यह समस्या ठीक हो सकती है. इस से कोई बीमारी लंबे समय तक नहीं होती है. चूंकि आप की उम्र भी ज्यादा है, इसलिए इस उम्र में ऐसा होना आम बात है. घबराएं नहीं, लेकिन समय पर जांच कराना आवश्यक है.

Skin Care Tips : स्किन की रंगत निखारती है नाइट क्रीम, जानें चेहरे पर लगाने के तरीके

Skin Care Tips : सुंदरता भला किसकी आंखों को नहीं भाती और कौन है जो भला सुन्दर नहीं दिखना चाहता. हम सब जानते हैं कि सौंदर्य की पहली शर्त है- स्वस्थ और चमकदार त्वचा.

सुंदर, मखमली, पारदर्शी त्वचा अनचाहे ही हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है. लेकिन ठण्ड के मौसम में हमारी कोमल त्वचा और उसकी रंगत कहीं खो जाती है.

त्वचा रूखी और बेजान नजर आने लगती है. इस मौसम में त्वचा को खास नमी देने की आवश्यकता होती है. इसलिए इस मौसम में हमें त्वचा को स्निग्ध और खूबसूरत बनाए रखने के लिए उसकी उचित देखभाल करनी पड़ती है.

किसी पार्टी में जाने के लिए तो आप खूब मेकअप करके चमक उठती है. दिन में कही भी जाना हो तो आप अच्छी तरह बन-संवर जाती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रात में जब आप आराम कर रही होती है, तब आपकी त्वचा का ख्याल कौन रखता है? रात के समय सोने से पूरे शरीर को ही नहीं, त्वचा को भी आराम मिलता है. यह वह समय होता है जब उसे दिन भर के प्रदूषण से छुटकारा मिलता है, इसलिए त्वचा को पोषण देने के लिए सही मायने में यही उपयुक्त समय होता है.

सोते समय त्वचा कि उचित देखभाल करने से त्वचा की मृत कोशिकाएं हट जाती है और नई कोशिकाओं का निर्माण तेजी से होता है. त्वचा के निखार, रूखेपन और उसे असमय झुर्रियों से बचाने के लिए यह बहुत जरूरी है कि रात में इसकी उचित देखभाल की जाए, क्योकि जितनी तेजी से नई कोशिकाओं का निर्माण होता है, उतनी ही तेजी से त्वचा की रंगत में निखार आता है.

दिन में इस्तेमाल की जानेवाली क्रीम त्वचा का आवरण बनकर बाहरी प्रभावों से उसे बचाती है, जबकि नाइट क्रीम त्वचा को पुनर्जीवन देती है. चूंकि रात में त्वचा को नमी, ताप या हवा का सामना नहीं करना पड़ता, इसलिए यह एकसमान अवस्था में रहती है. ऐसी स्थिति में यह पोषक तत्वो को आसानी से ग्रहण कर पाती है. नाइट क्रीम मूल रूप से नरिशिंग क्रीम है  जो सामान्य व शुष्क त्वचा के लिए बेहद उपयोगी होती है और इससे त्वचा की कोमलता बरकरार रहती है.

कैसे लगाए नाइट क्रीम

रात को सोने से पहले अपने चेहरे पर फेशवाश करें, फिर इस पर नाइट क्रीम लगाए.

थोड़ा-सा पानी लेकर क्रीम से चेहरे पर मसाज करे. मसाज हमेशा सर्कुलर मोशन और नीचे से ऊपर की ओर करे. उंगलियों को हल्के-हल्के घुमाएं, जल्दबाजी में मसाज न करे.

3-4 मिनट मसाज करने के बाद भीगे हुए रुई से क्रीम हटा ले. आंखो के आसपास मसाज न करे. आंखो के लिए आई क्रीम का इस्तेमाल करें.

Relationship : ऐसे सहेजें रिश्ते

Relationship : रिश्ते बनाना आसान है पर उन्हें निभाना एक कला है. हर दिन, हर पल दिल से निभाया गया रिश्ता समय के साथ और गहरा होता जाता है लेकिन अगर रिश्ते को ईमानदारी और समझदारी के साथ न निभाया जाए तो उस की डोर कमजोर होने लगती है, जिसे हम तोड़ तो सकते हैं लेकिन दोबारा कभी जोड़ नहीं सकते. इसलिए अपने सच्चे रिश्ते को सहेज कर रखें क्योंकि जहां अपना कहने में झिझक न हो, माफ कर देने में अहंकार न हो, जो आप की कमी में भी आप की तारीफ करे, जो आप की गैरमौजूदगी में भी आप के लिए दुआ करे, ऐसे रिश्ते बड़ी मुश्किल से मिलते हैं, इसलिए अगर साथी में थोड़ीबहुत कमी है भी तो कोई नहीं उसे झेल लीजिए. हजार अच्छाइयां भी तो हैं इसलिए उन पर फोकस करें और कमियों के साथ एडजस्ट करें और रिश्ता तोड़ने के बजाय बीच का कोई रास्ता निकालकर उसे निभाने की सोचें. यह आप दोनों के लिए अच्छा रहेगा.

आइए, जानें कैसे निभाएं अपने साथी से रिश्ता:

की औफ कम्यूनिकेशन

ज्यादातर रिश्ते इसलिए नहीं चल पाते क्योंकि कोई बात बुरी लगने पर हम उसे सौल्व नहीं करते बल्कि उस बात के बारे में बात करना ही बंद कर देते हैं, जिस का नतीजा होता है एक दिन वह बात इतनी बड़ी हो जाती हैं कि रिश्ते में दूरियां आ जाती हैं. इसलिए अपनी शिकायतें और शिकवे मन में रखने के बजाय उन पर बात करें ताकि कम्यूनिकेशन गैप न आने पाएं.

सैट बाउंड्री

एकदूसरे की पसंदनापसंद और सीमाओं का सम्मान करना रिश्ते को मजबूत बनाता है. जो बातें या चीजें पार्टनर को पसंद नहीं हैं उन्हें करना जरूरी नहीं है. कुछ बातों में आप उन का खयाल रखें कुछ बातों में वे आप का खयाल रखें. इसी में रिश्तों की  खूबसूरती है. अगर पार्टनर को आप का घंटों फोन पर बातें करना पसंद नहीं है तो जरूरी तो नहीं कि आप उन के सामने बात करें. जब वे न हों आप तब भी बात कर सकती हैं. अगर वाइफ को आप का ड्रिंक करना पसंद नहीं है तो कम से कम एक बार उन की बात मान कर छोड़ने की कोशिश तो करें. वे आप के ऐसा करने पर ऐप्रिशिएट ही करेंगी.

फौरगिवनैस

हम सभी से कभी न कभी कोई न कोई गलती होती ही है. अगर पार्टनर से भी कोई बड़ी गलती हो गए है और वे अपनी हरकत के लिए  गिल्ट हैं तो उन्हें एक मौका जरूर दें. यह आप के रिश्ते के लिए अच्छा रहेगा. दूसरे, आम जिंदगी में भी छोटीबड़ी बातों को ले कर इशू न बनाएं बल्कि कुछ बातों को माफ कर इगनोर कर के आगे बढ़ने में ही सम?ादारी है.

क्वालिटी टाइम

माना आप दोनों अपने काम में बहुत बिजी हैं लेकिन फिर भी वीकैंड में ही सही एकदूसरे के लिए टाइम जरूर निकालें. वह टाइम आप दोनों का ही होना चाहिए. वैसे भी बीचबीच में एकदूसरे को रोमांटिक मैसेज करना, अपने प्यार का एहसास दिलाना बहुत जरूरी होता है. इस से समय की कमी भी नहीं खलती और दोनों एकदूसरे से जुड़े भी रहते हैं.

ट्रस्ट इज मस्ट

यह तो आप ने सुना ही कि रिश्ता बिना प्यार के रह सकता है लेकिन बिना भरोसे के कभी नहीं. इसलिए रिश्ते में जितना कम सस्पैंस होगा, भरोसा उतना ही ज्यादा होगा. जब आप अपनी बातें, अपनी भावनाएं और अपनी परिस्थितियां साझा करते हैं तो संदेह की गुंजाइश खत्म हो जाती है. भरोसा किसी भी रिश्ते की वह अदृश्य नींव है, जिस के बिना बड़े से बड़ा रिश्ता ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है. इसलिए एकदूसरे से कुछ न छिपाएं.

नो शोऔफ

जब आप बारबार यह याद दिलाते हैं कि आप ने किसी के लिए क्या किया है तो वह प्यार या मदद नहीं रह जाती बल्कि एक एहसान बन जाता है. सामने वाले को अपनापन महसूस होने के बजाय यह लगने लगता है कि वह आप का कर्जदार है. अगर आप जताएंगे नहीं और सामने वाला खुद उस बात को याद रखता है तो वह उस का आप के प्रति सच्चा सम्मान है. मगर अगर आप खुद ही ढोल पीटेंगे तो आप उस की नजरों में अपना कद छोटा कर लेंगे.

माइंड योर वर्ड्स

हम सभी की अपने साथी से कभी न कभी किसी न किसी बात को ले कर कोई न कोई बहस हो ही जाती है. लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि लड़ाई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो शब्दों का इस्तेमाल चाबियों की तरह करें. ये किसी का दिल खोल भी सकते हैं और किसी का मुंह बंद भी कर सकते हैं. वैसे भी दिमाग में आने वाला हर विचार सही नहीं होता. कभीकभी हम गुस्से, जलन या कुंठा में कुछ ऐसा सोच लेते हैं जो अस्थाई होता है. अगर उसे उसी पल बोल दिया जाए तो वह सामने वाले के दिल पर ऐसा घाव कर सकता है जो कभी नहीं भरता.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें