Stories : ‘‘मैं तुम से बेइंतहा प्यार करती हूं शेखर. तुम्हारे बगैर जी न सकूंगी,’’ मैं ने कल्पना को कभी इतना हताशनिराश नहीं देखा था. कहते हैं आंखें दिल का आईना होती हैं. मैं ने उस की पारदर्शी आंखों में झांक कर देखा तो कुछ देर के लिए मैं भी उदास हो गया.
‘‘आंसू पोंछ लो,’’ मैं ने उस की तरफ अपना रूमाल बढ़ाया. वह अपने बैग से रूमाल निकाल कर आंखों को पोछने लगी.
‘‘क्या फिर कुछ हुआ?’’ मैं ने क्षणांश चुप्पी के बाद भीगे स्वर में पूछा.
‘‘सुधीर ने मुझ पर हाथ उठाने की कोशिश की,’’ और कल्पना की आंखें पनीली हो गईं.
‘‘इतना गिर सकता है?’’ मैं ने ‘इतना’ पर जोर दिया.
‘‘कहता है मेरा चालचलन ठीक नहीं है. ठीक ही कहता है क्योंकि मैं तुम से मुहब्बत करती हूं. वह मेरी मुहब्बत के काबिल नहीं.’’
‘‘छोड दो उसे.’’
‘‘छोड़ कर जाऊंगी कहां?’’ कल्पना ने सही कहा. अकेले रहेगी तो हजार बेशर्म निगाहें पीछा करेंगी. खुद मेरा अधेड बौस कल्पना के रंगरूप पर मोहित है. कई बार कार से घर छोड़ने की पेशकश कर चुका है, जिसे कल्पना ने साफसाफ ठुकरा दिया.
तभी वेटर आया. कौफी के 2 मग रख कर चला गया. मैं ने खाने का और्डर देना चाहा मगर कल्पना ने मना कर दिया.
‘‘कल्पना, मैं अपने वादे से मुकरूंगा नहीं. बस पापा को मना लूं. सब ठीक हो जाएगा,’’ मेरे कथन से उसे तसल्ली हुई. रात 8 बजने को थे. हम दोनों जल्दीजल्दी कौफी खत्म कर के अपनेअपने फ्लैट की तरफ निकल पड़े.
मेरा मन कल्पना को ले कर उद्विग्न था. करवटें बदलते बारबार कल्पना का
बेबस चेहरा सामने आ जाता. मैं ने उस के पति सुधीर को कभी देखा नहीं था. इतना विश्वास था कि वह हीनभावना का शिकार है. ऐसे लोग बिना वजह अपनी बीवी पर शक करते है. कल्पना को वह शुरू से ही पसंद नहीं था. मजबूरी थी वरना जैसा वह बताती थी उस के व्यक्तित्व के बारे में उस हिसाब से तो वह बिलकुल उस के लिए फिट नहीं बैठता.
कल्पना मेरी औफिस कलीग थी. उसे देख कर कोई भी नहीं कह सकता कि वह एक बच्ची की मां है. मु?ा में ऐसी कौन सी कशिश थी जिस से प्रभावित हो कर कल्पना ने मेरी मदद करने की सोची. तब मैं नयानया था. काम को ले कर मन में संशय था. ऐसे में कल्पना बिना किसी लागलपेट के मेरे पास आई. अपना परिचय दिया, फिर मुसकराते हुए कहा, ‘‘निस्संकोच पूछ लीजिएगा. मैं आप को काम सम?ा दूंगी.’’
मु?ो तसल्ली हुई. इस बीच एक दिन मेरे लिए गाजर का हलवा ले कर आई. टिफिन देते हुए बोली, ‘‘खा कर बताइएगा कैसा बना है?’’
औफिस स्टाफ के बीच हमारा करीबीपन फुसफुसाहट का कारण बनने लगा. मैं ने इसे नजरअंदाज कर दिया. एक महीना गुजरा होगा जब उस ने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया.
रविवार का दिन था. मैं ने मम्मी से बता दिया कि कल्पना के घर लंच के
लिए जा रहा हूं. मम्मी को हंसी सूझी, ‘‘कुआरी तो नहीं है?’’
‘‘वह एक बच्ची की मां है,’’ मैं ने उसी लहजे में जवाब दिया तो हम दोनों हंसे बगैर न रह सके.
कल्पना बालकनी में खडी मेरा इंतजार कर रही थी. मु?ो देखते ही उस का चेहरा खिल गया. वह तेजी से नीचे उतरी. फाटक खोलते हुए उस का उत्साह देखने लायक था. मकान पुराना था. मै ने चारों तरफ नहरें दौड़ाई. साफसुथरा कमरा था. सबकुछ व्यवस्थित तरीके से रखा था. मु?ो कल्पना का पति नहीं दिखा. तभी ट्रे ले कर कल्पना मेरी तरफ आई. मुसकराते हुए एकएक कर प्लेट और शरबत के गिलास रखने लगी.
‘‘इतनी औपचारिकता निभाने की क्या जरूरत है?’’ मु?ो संकोच हुआ.
‘‘अपने हाथों से बनाया हूं.’’
‘‘वह तो पता है. तुम बहुत स्वादिष्ठ खाना बनाती हो?’’ मैं ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारी कलाकृति देख रहा हूं. नौकरी न कर रही होती तो निश्चय ही एक बेहतरीन कलाकार होती.’’
इस कथन पर क्षणांश को उस का चेहरा बन गया मानो उसे अच्छा नहीं लगा, ‘‘जिंदगी में सब नहीं मिलता. कंप्रोमाइज करना ही पड़ता है.’’
मुझे लगा इस प्रसंग को यहीं खत्म करना होगा. एक पनीर का पकौड़ा मुंह में डालते हुए बोला, ‘‘हूं टेस्टी है.’’
बाथरूम से निकल कर कल्पना का पति सुधीर गंजी और बरमूडा पहने ही मेरे सामने नमूदार हुआ. कल्पना ने परिचय कराया. बिना देर किए मैं ने अपनी जगह से खड़ा हो कर उस से हाथ मिलाया. उस ने अपनी तरफ से कोई पहल नहीं की जो मेरे लिए नागवार था. कम से कम मुझ से दो शब्द तो बोल सकता था. मगर नहीं उस ने तो और पकौड़े लेने तक को नहीं कहा. मेरी स्थिति बिनबुलाए मेहमान की तरह थी. क्या यही सब दिखाने के लिए कल्पना ने मुझे यहां बुलाया था ताकि मैं उस के पति के रवैए से वाकिफ हो सकूं. यदि ऐसा था तो निश्चय ही यह सब देख कर मुझे अफसोस हुआ. वह किसी भी तरह से कल्पना के लायक नहीं था. ठेले पर सब्जी बेचने लायक लगा उस का पति. न तहजीब न तमीज, न शक्लसूरत, न कदकाठी. बातचीत से साफ लगा कि वह उच्च शिक्षित भी नहीं है. मैं बहुत जल्दी उकता गया.
कल्पना ने भांप लिया. उस ने परिस्थिति संभालनी चाही पर मै रुका नहीं. उठ कर जाने लगा. वह खाने के लिए आग्रह करती रही, मगर मैं ने मना कर दिया. बाहर तक छोड़ने आई कल्पना के चेहरे पर मायूसी की झलक साफ दिख रही थी. उस ने मुझ से माफी मांगी. माफी तो मुझे मांगनी चाहिए थी क्योंकि मैं ने उस की मेहमाननवाजी को ठुकरा दिया.
बाहर आ कर मैं ने सुकून की सांस ली. एक बार को लगा मैं ने थोड़ी जल्दी कर दी. इतनी जल्दी प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करनी चाहिए थी. थोड़ा इंतजार कर लेता. फिर देखता उस का पति आगे कैसा व्यवहार करता है. दरअसल, वह मुझे घटिया आदमी लगा. ऐसे आदमी को मैं एक पल बरदाश्त नहीं करता. पता नहीं कैसे कल्पना इस के साथ रहती है.
अगले दिन कल्पना औफिस में आई तो उस की नजरें ?ाकी हुई थीं. शायद
कल की घटना को ले कर शर्मिंदा थी. मेरे दिल में उस के लिए कोई मलाल नहीं था उलटे अफसोस था. नियति जो न करा दे.
शाम औफिस से लौटते समय कल्पना रुंधे कंठ से बोली, ‘‘शेखर, मैं ने तुम्हें बुला कर अपमानित किया?’’
‘‘छोड़ो यह सब चलता है. जरूरी नहीं कि जितना तुम्हारे लिए मैं अहमियत रखता हूं उतना तुम्हारे पति के भी रखता हो. पत्नी के संबंधों को बहुत कम पति अहमियत देते हैं. वहीं उन का कोई दोस्त आता तो वे भरसक यही कोशिश करतीं कि तुम उन की दोस्ती को दिल से स्वीकार करो. भले ही उन का दोस्त तुम्हें पसंद न आता हो? यह पुरुषों की ज्यादती है.’’
‘‘मैं यही ज्यादती 3 सालों से ढो रही हूं. जानते हो कल उस ने मुझसे खूब झगड़ा किया. कहने लगा बिना मेरी इजाजत तुम ने शेखर को क्यों बुलाया? मैं ने कहा मैं अपने पैरों पर खडी हूं क्या मेरा इतना भी हक नहीं कि अपने तरीके से जी सकूं? वह मेरे औफिस का स्टाफ है. तुम दोस्ती निभा सकते हो तो मैं क्यों नहीं?’’
‘‘तुम्हारी दोस्ती और मेरी दोस्ती में फर्क है. तुम्हें दोस्ती ही करनी है तो किसी स्त्री से कर लो. पुरुष से दोस्ती का क्या मतलब?’’
‘‘क्यो? पुरुष इंसान नहीं होते? ऐसा है तो मु?ो घर पर बैठा दो. वहां तो काफी पुरुष हैं और तो और मेरा बौस भी पुरुष है. काम के सिलसिले में मैं उस के कैबिन में 10 दफा जाती हूं.’’
मेरे इस कथन पर उसने चुप्पी साध ली. वह समझ गया कि मुझे घर बैठाना आसान
नहीं. अच्छीखासी सैलरी पाती हूं. शेखर, इसे बिडंवना नहीं कहोगे कि कमाने के बावजूद एक स्त्री अपने तरीके से जिंदगी नहीं गुजार सकती उसे पलपल पुरुषों की निगाहों के चाबुक खाने पड़ते हैं,’’ कल्पना की आंखें आंसुओं से लबरेज थीं.
मेरा दिल भर आया.
‘‘मैं तभी तक आजाद हूं जब तक औफिस में हूं. घर पहुंचते ही मेरी हैसियत एक बाई से ज्यादा कुछ नहीं रहता. बच्ची संभालना. खाना बनाना. घर की साफसफाई करना. इस के बाद तैयार हो औफिस आना. यह सब इतना आसान नहीं है.’’
‘‘सुधीर तुम्हारी कोई मदद नहीं करता?’’
‘वह तो तुम कल देख ही चुके हो. जो आदमी ठीक से कपड़े तक नहीं पहन सकता वह मेरी क्या मदद करेगा?’’
‘‘उस ने तुम्हारी मजबूरी का भरपूर फायदा उठाया,’’ मेरे कथन पर उस की आंखें नम हो गई.
‘‘जिंदगी उतनी आसान नहीं होती जितना तुम सम?ाते होगे. जरूरी नहीं कि मैं बनसंवर कर औफिस आती हूं तो मेरी निजी जिंदगी भी उतनी ही खूबसूरत होगी? सुधीर मु?ो औफिस में भी अकेला नहीं छोड़ता. दसियों बार फोन कर के मेरा हाल लेता रहता है मानो मैं उसे छोड़ कर भाग रही हूं.’’
‘‘भाग भी जाओगी तो क्या कर लेगा?’’
‘‘कहना आसान है? भाग कर जाऊंगी कहां? स्त्री के पैरों में मर्यादा की जंजीरे जो डाल दी गई हैं,’’ क्षणांश रुकने के बाद कल्पना बोली, ‘‘सब समय का दोष है.’’
‘‘समय हम खुद बनाते हैं.’’
‘‘खाक बनाते हैं?’’ कल्पना चिढी, ‘‘क्या जरूरत थी मेरे पिता को मेरी मां को मं?ाधार में छोड़ कर दूसरी शादी करने की? तब मैं सिर्फ 5 साल की थी.’’
यह जान कर मु?ो तीव्र आघात लगा. इस के पहले उस ने इस का जिक्र कभी मु?ा से नहीं किया था. फिर आगे कहने लगी, ‘‘मां ने जैसेतैसे पाला. पैसों की घोर तंगी थी. मेरे पड़ोस में सुधीर रहता था. मां से घुलामिला था. जब भी मां उस से रुपयों की मांग करती वह बेहिचक दे देता. किसी तरह से मैं ने बीए की. एक दिन सुधीर ने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा. मैं ने इस का जिक्र मां से किया तो मां ने कोई एतराज नहीं जताया. जताती भी कैसे? इतने एहसान थे उस के हम पर. फिर वे मेरे लिए कहां रिश्ता ढूंढ़ने जातीं. पापा का कलंक उन के लिए अभिशाप जैसा था,’’ कल्पना ने उसांस ली.
कल्पना और सुधीर की जोड़ी हंस और कौए जैसी थी. कहां वह गोरीचिट्टी कहां वह कालाकलूटी. पढाईलिखाई भी कुछ खास नहीं थी. मेरे हिसाब से वह 10वीं से ज्यादा पढ़ा नहीं लगा.
कल्पना ने बताया कि उस के पिता चाय बेचते थे. वहीं सुधीर की गुमटी में बैग की दुकान थी. कुदरत के न्याय को क्या कहें? बाप के अपराध का दंड मांबेटी भुगत रही थीं. पिता बैंक में अधिकारी थे.
‘‘तुम्हारी मां अपने हक के लिए लड़ी नहीं?’’
‘‘तब मैं छोटी थी. ज्यादा कुछ सम?ाने लायक नहीं थी. पापा की बेवफाई से मां टूट चुकी थीं. कहने लगी कि ऐसे बेगैरत आदमी से कुछ हासिल नहीं होगा. बहुत होगा कभीकभार कुछ रुपए दे देगा. मां के लिए सब से बड़ा दुख का कारण था पापा का हमें छोड़ कर चले जाना.
जब वे उन के नहीं हुए तो उन के पीछे पड़ने का क्या औचित्य?’’
समय बड़ी तेजी से भाग रहा था. अब तक 3 बार सुधीर का फोन आ चुका था.
वह हर बार बहाने बना देती.
‘‘शेखर, हमें चलना चाहिए.’’
कल्पना ने हड़बड़ी दिखाई तो मैं ने रोका नहीं.
मैं पूरे रास्ते कल्पना के बारे में ही सोचता रहा. सुधीर कहीं से नहीं लगा कि उस ने कल्पना पर कोई एहसान किया? उस की नजर शुरू से ही कल्पना पर रही होगी. उसी से वशीभूत हो कर उस ने कल्पना की आर्थिक मदद की. फिर जब समय आया तो शूद समेत वसूल लिया.
रात के 11 बजने को थे. मगर कल्पना की आंखों से नींद कोसो दूर थी. सुधीर उस से कुछ कहना चाह रहा था. वहीं कल्पना अपने भविष्य को ले कर चिंतित थी. शेखर में उसे अपनी जिंदगी दिखने लगी थी. वह किसी हाल में उस से दूर रह पाने की स्थिति में नहीं थी.
‘‘शेखर से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’’ सुधीर के कथन पर वह तनिक भी नहीं चौंकी. बेहद सामान्य तरीके से करवट बदल कर उस की तरफ मुखातिब हुई, ‘‘तुम कहना क्या चाहते हो?’’
‘‘वही जो तुम समझ रही हो?’’
कल्पना समझ गई कि उसे उस के और शेखर के संबंधों की भनक लगी है.
सुधीर ने आगे कहा, ‘‘रोजरोज रैस्टोरैंट में कौफी पीने जाती हो.’’
‘‘हां जाती हूं. वह मेरा कलीग है. उस
के साथ कुछ देर बैठ कर मुझे बेहद सुकून
मिलता है.’’
‘‘मेरे पास रहने से क्या मन भारी हो जाता है?’’ सुधीर ने तंज कसा.
‘‘ऐसा ही सम?ा लो. बेमेल रिश्ते मन पर बो?ा होते हैं.’’
‘‘इतने साल बाद? उस समय क्यों नहीं जब तुम लोगों को मेरी जरूरत थी?’’
‘‘इसी बात की तकलीफ है. न चाहते हुए भी मु?ो तुम से शादी करनी पड़ी.’’
‘‘क्या कमी है मुझ में?’’
‘‘तुम ने एहसान के बदले हम लोगों को बरगलाया. तुम्हारी नीयत ठीक नहीं थी.’’
‘‘बेवजह क्यों कोई तुम लोगों की मदद करेगा? उस समय मैं ने तुम लोगों की मदद न की होती तब क्या करती?’’
शेखर के इस सवाल का कल्पना के पास कोई जवाब नहीं था. सुधीर उसे कभी
पसंद नहीं था. न शक्लसूरत, न पढ़ाईलिखाई. मजबूर थी वह. बेमेल रिश्ता था. व्यक्तित्व में जमीनआसमान का अंतर. उस पर उस की संकीर्ण मानसिकता. हर वक्त उस के चालचलन पर निगरानी. कहां जा रही है, किस से मिलती है. औफिस में रहो तो दसियों बार फोन कर के हाल लेते रहना. वह अंदर से डरा हुआ इंसान था. उसे डर था कि मैं खूबसूरत महिला किसी के साथ चक्कर न चला दूं. हुआ भी ऐसा ही. शेखर मेरी जिंदगी में आ ही गया. वह लाख निगरानी करता रहा मगर मुझे रोक नहीं पाया.
‘‘याद रखना मै तुम्हें आसानी से छोड़ने वाला नहीं?’’
‘‘धमकी दे रहे हो?’’ कल्पना उखड़ी.
‘‘नहीं. नसीहत दे रहा हूं.’’
‘मैं भी देखती हूं तुम मेरा क्या बिगाड लोगे?’’ कह कर कल्पना ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया. नींद आने से रही. वह दोराहे पर खड़ी थी. अगर शेखर ने न अपनाया तो वह कहां जाएगी? सुधीर की नजरों से गिर ही चुकी थी. यहां रहने का मतलब जिल्लत की जिंदगी गुजारना. वह हमेशा मु?ो ताना मारेगा. इस से तो यही बेहतर होगा सुधीर से तलाक ले कर अपने मन की जिंदगी जी जाए. अगर शेखर उसे नहीं अपनाता है तब?
अगले दिन कल्पना ने रात में घटी सारी कहानी शेखर से कह दी. बोली, ‘‘शेखर, तुम ने मुझे नहीं अपनाओगे तब भी मैं सुधीर से तलाक ले कर अकेले रहने का फैसला कर चुकी हूं.’’
‘‘यह इतना आसान नहीं?’’
‘‘यह तुम कह रहे हो?’’ कल्पना को आश्चर्य हुआ, ‘‘क्या तुम मु?ा से मुहब्बत नहीं करते?’’
‘‘करता हूं. बेहद करता हूं मगर जिस तरीके से तुम ने हड़बड़ी में फैसला लिया है उस पर मुझे आपत्ति है.
‘‘मैं दोहरेपन में नहीं जीना चाहती. यदि हमारे और तुम्हारे संबंधों के बारे में सुधीर को पता चल गया है तो उसे छिपाना क्यों? साफसाफ बता कर मन हलका कर लिया. आगे तुम पर छोड़ती हूं. मेरी तरफ से तुम आजाद हो,’’ भरे मन से कल्पना बोली. उस के गालों पर ढुलके आंसुओं को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह अंदर से कितनी टूटी हुई है. मैं ने उस से माफी मांगी. बेमतलब दिल दुखाया.
2 दिन कल्पना औफिस नहीं आई. खबर भिजवाई कि उस के पति को कोरोना हो गया. सुन कर सभी सकते में आ गए. मैं चाह कर भी उस के लिए कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं था. औफिस से साफसाफ निर्देश मिला कि कोई कल्पना से संबंध न रखे. किसी को जरा भी शंका हो तुरंत डाक्टर से संपर्क कर के औफिस आना बंद कर दे. मैं ने फोन से कल्पना से संपर्क करना चाहा. मगर स्विच्ड औफ मिला.
अचानक एक रात कल्पना का फोन आया, ‘‘शेखर, सुधीर की हालत बिगड रही है. तुम मेरी मदद कर सकते हो?’’
मैं ने तुरंत एक हौस्पिटल से संपर्क किया. वहां बैड खाली था. तुरंत एक ऐंबुलैंस का इंतजाम करा के उस के पति को भरती कराया.
इस बीच मेरी उस से दूरी बनी रही. उस की बच्ची को उस की मां संभाल रही थीं. जान कर मुझे राहत मिली. मैं सोचने लगा जिस पति से कल्पना को कोई लगाव नहीं उस के लिए क्यों परेशान हो रही है. मर जाने देती. तलाकशुदा कहलाने से बेहतर है विधवा कहलाना.
‘‘शेखर, क्या सुधीर बच पाएगा?’’ रात फोन कर के कल्पना ने पूछा. वह अंदर से
सहमी थी.
‘‘क्यों नहीं बच जाएगा?’’
‘‘नहीं बचेगा तब क्या होगा? क्या तुम मुझ से शादी करोगे?’’
कल्पना का यह सवाल बचकाना लगा. यह वक्त ऐसे सवालों के लिए नहीं था. कल्पना कमरे में अकेली थी. उस के मन में अपने भविष्य को ले कर सवाल उठना लाजिम था.
शेखर को लगा वह द्वंद्व मे जी रही है. एक तरफ उस ने तलाक का मन बना लिया है वहीं दूसरी तरफ शादी भी करना चाहती है यानी किसी का साथ भी चाहिए. बेशक अकेले जिंदगी काटना आसान नहीं होता. द्वंद्व मे तो मैं भी जी रहा था. कल्पना को ले कर असमंजस में था. पापा हां कहेंगे तब शादी करूंगा. यह कैसी मुहब्बत थी? कभीकभी ऐसा लगाता कल्पना की वर्तमान स्थिति के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं. न मैं उस की जिदगी में आता न उसे विकल्प मिलता. फिर वह चाहे जो करती.
‘‘शेखर, मेरे दिल में सुधीर के लिए कोई जगह नहीं है. मैं इस रिश्ते को ढो रही हूं,’’ कल्पना ने फिर से वही वाक्य दोहराया.
‘‘मैं तुम्हारी जिंदगी में न आता तब भी?’’
कल्पना कुछ नहीं बोली.
माना कि सुधीर कल्पना के लायक नहीं था मगर विपरीत परिस्थितियों में उसी ने कल्पना को उबारा. कल्पना की मां पाईपाई की मुहताज थीं. तब वह उन के लिए संबल बन कर खड़ा हुआ. सुधीर ने उस से शादी कर ली अगर कोई दुराचारी होता तो कल्पना का शारीरिक शोषण करता शादी नहीं करता. तब क्या करती? मैं खुद को गुनहगार मानने लगा. न मैं कल्पना की जिंदगी में आता न ही उसे विकल्प मिलता. मैं ने खुद को मं?ाधार में फंसा हुआ पाया. न छोड़ सकता था न ही बंध सकता था. परंतु ऐसा कब तक चलेगा? एक न एक दिन या तो इस रिश्ते का खत्म करना पडे़गा या फिर कल्पना को अपनाना पड़ेगा. कल्पना को दुविधा में रखना कहीं से भी उचित नहीं था. फैसला तो लेना ही था मगर अभी नहीं. मैं ने उसांस ली.
सुधीर की हालत सुधरने का नाम नहीं ले रही थी. 5वें दिन अचानक वह चल
बसा. कल्पना के गालों पर आंसुओं की बूंदें लुढ़क आईं. यह क्षणिक भावनाओं का आवेग था. वरना उस ने तो खुद ही कहा था कि वह इस रिश्ते को ढो रही है. इस घटना ने मेरे मन पर भारी बोझ डाल दिया. कल्पना का मेरे सिवा कोई नहीं था. अभी किसी फैसले पर पहुंचता सुधीर चल बसा.
इस में कोई शक नहीं था कि मैं कल्पना से बेइंतहा मुहब्बत करता था. मगर परिस्थितियां इस कदर करवट लेगी इस का अंदाजा मुझे नहीं था. सुधीर असमय चल बसा. यह एक बहुत बड़ी त्रासदी थी जो भी हो वह उस का पति था.
काफी आत्ममंथन के बाद फैसला लिया कि जब भरोसा दिया है तो पीछे नहीं हटूंगा. फिर चाहे पापा से विद्रोह ही क्यों न करना पड़े.
पापा ने जाना तो आगबबूला हो गए. ऐसा स्वाभाविक भी था. कौन बाप अपनी औलाद की शादी ब्याहता से करेगा और वह भी एक बच्ची की मां से.
‘‘कुंआरी लड़कियां मर गई हैं जो 1 बच्ची की मां से शादी करेगा? कल जब उस की लड़की बड़ी होगी तब कैसे उसे समझ पाएगा? नहींनहीं यह हरगिज नहीं होगा,’’ पापा का गुस्सा चरम
पर था.
‘‘पापा, आप जैसा सोच रहे हैं वैसा है
नहीं. समय बदल चुका है. उस का पति कोरोना से चल बसा. एकाएक उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है.’’
‘‘उस के दुखों से तुम्हें क्या लेनादेना?’’
पापा के सवाल ने मुझे सत्य से अवगत करा देने के लिए विवश कर दिया. मैं कल
तक उस से मुहब्बत करता था मगर आज मु?ा पर इंसानियत हावी हो चुकी है. लिहाजा, पूरी बेबाकी से बोला, ‘‘कोरोना के चलते सैकड़ों बच्चे अनाथ हो गए. अनेक जवान स्त्रियां विधवा हो चुकी हैं. ऐसे में मैं उस का हाथ थाम रहा हूं तो क्या गलत कर रहा हूं. सोचिए अगर आप की बेटी के साथ भी ऐसा होता तब क्या करते?’’
बेटी का नाम सुनते ही पापा का गुस्सा हलका पड़ गया. वे क्षणांश जज्बाती हो कर सोफे पर बैठ गए. उन के माथे पर पड़ी चिंता की लकीरें बता रही थीं कि वे मेरे और कल्पना के भविष्य को ले कर चिंताकुल हैं. चिंता से उबरे तो बोले, ‘‘ठीक है तुम मु?ो उस से मिलाओ.’’
पापा के कथन से मेरे भीतर आत्मविश्वास का समंदर हिलोरें मारने लगा. कल्पना को तत्काल अवगत कराया तो उस की आंखें खुशी से चमक उठीं. वर्षों बाद उस के अधरों पर स्वाभाविक मुसकान देखने को मिली. मैं आह्लादित था.
‘‘तुम्हारे पिता का क्या नाम है?’’ कल्पना से पापा ने पूछा.
‘‘के. राघवन.’’
‘‘क्या करते थे? यहां कैसे आ गई?’’
‘‘वे बैंक में मैनेजर हैं. ट्रांस्फर हुआ तो चैन्नई से यहां आ गए.’’
के. राघवन से उन्हें याद आया. बोले, ‘‘विजया बैंक में तो नहीं थे?’’ पापा का उस बैंक में अपना अकाउंट था.
‘‘यस सर.’’
पापा को समझते देर न लगी कि कल्पना की यह दुर्गति कैसे हुई और कैसे एक मामूली से लड़के ने उसे बरगला कर अपनी जीवनसंगिनी बना लिया. एक बड़े परिवार की बेटी का ऐसा हश्र जान कर पापा को बेहद दुख हुआ. लिहाजा, इस रिश्ते के लिए हामी भरने में उन्होंने देर न लगाई.


