Stories : तुम मेरे लिए बनी हो

Stories : ‘‘मैं   तुम से बेइंतहा प्यार करती हूं शेखर. तुम्हारे बगैर जी न सकूंगी,’’ मैं ने कल्पना को कभी इतना हताशनिराश नहीं देखा था. कहते हैं आंखें दिल का आईना होती हैं. मैं ने उस की पारदर्शी आंखों में झांक कर देखा तो कुछ देर के लिए मैं भी उदास हो गया.

‘‘आंसू पोंछ लो,’’ मैं ने उस की तरफ अपना रूमाल बढ़ाया. वह अपने बैग से रूमाल निकाल कर आंखों को पोछने लगी.

‘‘क्या फिर कुछ हुआ?’’ मैं ने क्षणांश चुप्पी के बाद भीगे स्वर में पूछा.

‘‘सुधीर ने मुझ पर हाथ उठाने की कोशिश की,’’ और कल्पना की आंखें पनीली हो गईं.

‘‘इतना गिर सकता है?’’ मैं ने ‘इतना’ पर जोर दिया.

‘‘कहता है मेरा चालचलन ठीक नहीं है. ठीक ही कहता है क्योंकि मैं तुम से मुहब्बत करती हूं. वह मेरी मुहब्बत के काबिल नहीं.’’

‘‘छोड दो उसे.’’

‘‘छोड़ कर जाऊंगी कहां?’’ कल्पना ने सही कहा. अकेले रहेगी तो हजार बेशर्म निगाहें पीछा करेंगी. खुद मेरा अधेड बौस कल्पना के रंगरूप पर मोहित है. कई बार कार से घर छोड़ने की पेशकश कर चुका है, जिसे कल्पना ने साफसाफ ठुकरा दिया.

तभी वेटर आया. कौफी के 2 मग रख कर चला गया. मैं ने खाने का और्डर देना चाहा मगर कल्पना ने मना कर दिया.

‘‘कल्पना, मैं अपने वादे से मुकरूंगा नहीं. बस पापा को मना लूं. सब ठीक हो जाएगा,’’ मेरे कथन से उसे तसल्ली हुई. रात 8 बजने को थे. हम दोनों जल्दीजल्दी कौफी खत्म कर के अपनेअपने फ्लैट की तरफ निकल पड़े.

मेरा मन कल्पना को ले कर उद्विग्न था. करवटें बदलते बारबार कल्पना का

बेबस चेहरा सामने आ जाता. मैं ने उस के पति सुधीर को कभी देखा नहीं था. इतना विश्वास था कि वह हीनभावना का शिकार है. ऐसे लोग बिना वजह अपनी बीवी पर शक करते है. कल्पना को वह शुरू से ही पसंद नहीं था. मजबूरी थी वरना जैसा वह बताती थी उस के व्यक्तित्व के बारे में उस हिसाब से तो वह बिलकुल उस के लिए फिट नहीं बैठता.

कल्पना मेरी औफिस कलीग थी. उसे देख कर कोई भी नहीं कह सकता कि वह एक बच्ची की मां है. मु?ा में ऐसी कौन सी कशिश थी जिस से प्रभावित हो कर कल्पना ने मेरी मदद करने की सोची. तब मैं नयानया था. काम को ले कर मन में संशय था. ऐसे में कल्पना बिना किसी लागलपेट के मेरे पास आई. अपना परिचय दिया, फिर मुसकराते हुए कहा, ‘‘निस्संकोच पूछ लीजिएगा. मैं आप को काम सम?ा दूंगी.’’

मु?ो तसल्ली हुई. इस बीच एक दिन मेरे लिए गाजर का हलवा ले कर आई. टिफिन देते हुए बोली, ‘‘खा कर बताइएगा कैसा बना है?’’

औफिस स्टाफ के बीच हमारा करीबीपन फुसफुसाहट का कारण बनने लगा. मैं ने इसे नजरअंदाज कर दिया. एक महीना गुजरा होगा जब उस ने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया.

रविवार का दिन था. मैं ने मम्मी से बता दिया कि कल्पना के घर लंच के

लिए जा रहा हूं. मम्मी को हंसी सूझी, ‘‘कुआरी तो नहीं है?’’

‘‘वह एक बच्ची की मां है,’’ मैं ने उसी लहजे में जवाब दिया तो हम दोनों हंसे बगैर न रह सके.

कल्पना बालकनी में खडी मेरा इंतजार कर रही थी. मु?ो देखते ही उस का चेहरा खिल गया. वह तेजी से नीचे उतरी. फाटक खोलते  हुए उस का उत्साह देखने लायक था. मकान पुराना था. मै ने चारों तरफ नहरें दौड़ाई. साफसुथरा कमरा था. सबकुछ व्यवस्थित तरीके से रखा था. मु?ो कल्पना का पति नहीं दिखा. तभी ट्रे ले कर कल्पना मेरी तरफ आई. मुसकराते हुए एकएक कर प्लेट और शरबत के गिलास रखने लगी.

‘‘इतनी औपचारिकता निभाने की क्या जरूरत है?’’ मु?ो संकोच हुआ.

‘‘अपने हाथों से बनाया हूं.’’

‘‘वह तो पता है. तुम बहुत स्वादिष्ठ खाना बनाती हो?’’ मैं ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारी कलाकृति देख रहा हूं. नौकरी न कर रही होती तो निश्चय ही एक बेहतरीन कलाकार होती.’’

इस कथन पर क्षणांश को उस का चेहरा बन गया मानो उसे अच्छा नहीं लगा, ‘‘जिंदगी में सब नहीं मिलता. कंप्रोमाइज करना ही पड़ता है.’’

मुझे लगा इस प्रसंग को यहीं खत्म करना होगा. एक पनीर का पकौड़ा मुंह में डालते  हुए बोला, ‘‘हूं टेस्टी है.’’

बाथरूम से निकल कर कल्पना का पति सुधीर गंजी और बरमूडा पहने ही मेरे सामने नमूदार हुआ. कल्पना ने परिचय कराया. बिना देर किए मैं ने अपनी जगह से खड़ा हो कर उस से हाथ मिलाया. उस ने अपनी तरफ से कोई पहल नहीं की जो मेरे लिए नागवार था. कम से कम मुझ से दो शब्द तो बोल सकता था. मगर नहीं उस ने तो और पकौड़े लेने तक को नहीं कहा. मेरी स्थिति बिनबुलाए मेहमान की तरह थी. क्या यही सब दिखाने के लिए कल्पना ने मुझे यहां बुलाया था ताकि मैं उस के पति के रवैए से वाकिफ हो सकूं. यदि ऐसा था तो निश्चय ही यह सब देख कर मुझे अफसोस हुआ. वह किसी भी तरह से कल्पना के लायक नहीं था. ठेले पर सब्जी बेचने लायक लगा उस का पति. न तहजीब न तमीज, न शक्लसूरत, न कदकाठी. बातचीत से साफ लगा कि वह उच्च शिक्षित भी नहीं है. मैं बहुत जल्दी उकता गया.

कल्पना ने भांप लिया. उस ने परिस्थिति संभालनी चाही पर मै रुका नहीं. उठ कर जाने लगा. वह खाने के लिए आग्रह करती रही, मगर मैं ने मना कर दिया.  बाहर तक छोड़ने आई कल्पना के चेहरे पर मायूसी की झलक साफ दिख रही थी. उस ने मुझ से माफी मांगी. माफी तो मुझे मांगनी चाहिए थी क्योंकि मैं ने उस की मेहमाननवाजी को ठुकरा दिया.

बाहर आ कर मैं ने सुकून की सांस ली. एक बार को लगा मैं ने थोड़ी जल्दी कर दी. इतनी जल्दी प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करनी चाहिए थी. थोड़ा इंतजार कर लेता. फिर देखता उस का पति आगे कैसा व्यवहार करता है. दरअसल, वह मुझे घटिया आदमी लगा. ऐसे आदमी को मैं एक पल बरदाश्त नहीं करता. पता नहीं कैसे कल्पना इस के साथ रहती है.

अगले दिन कल्पना औफिस में आई तो उस की नजरें ?ाकी हुई थीं. शायद

कल की घटना को ले कर शर्मिंदा थी. मेरे दिल में उस के लिए कोई मलाल नहीं था उलटे अफसोस था. नियति जो न करा दे.

शाम औफिस से लौटते समय कल्पना रुंधे कंठ से बोली, ‘‘शेखर, मैं ने तुम्हें बुला कर अपमानित किया?’’

‘‘छोड़ो यह सब चलता है. जरूरी नहीं कि जितना तुम्हारे लिए मैं अहमियत रखता हूं उतना तुम्हारे पति के भी रखता हो. पत्नी के संबंधों को बहुत कम पति अहमियत देते हैं. वहीं उन का कोई दोस्त आता तो वे भरसक यही कोशिश करतीं कि तुम उन की दोस्ती को दिल से स्वीकार करो. भले ही उन का दोस्त तुम्हें पसंद न आता हो? यह पुरुषों की ज्यादती है.’’

‘‘मैं यही ज्यादती 3 सालों से ढो रही हूं. जानते हो कल उस ने मुझसे खूब झगड़ा किया. कहने लगा बिना मेरी इजाजत तुम ने शेखर को क्यों बुलाया? मैं ने कहा मैं अपने पैरों पर खडी हूं क्या मेरा इतना भी हक नहीं कि अपने तरीके से  जी सकूं? वह मेरे औफिस का स्टाफ है. तुम दोस्ती निभा सकते हो तो मैं क्यों नहीं?’’

‘‘तुम्हारी दोस्ती और मेरी दोस्ती में फर्क है. तुम्हें दोस्ती ही करनी है तो किसी स्त्री से कर लो. पुरुष से दोस्ती का क्या मतलब?’’

‘‘क्यो? पुरुष इंसान नहीं होते? ऐसा है तो मु?ो घर पर बैठा दो. वहां तो काफी पुरुष हैं और तो और मेरा बौस भी पुरुष है. काम के सिलसिले में मैं उस के कैबिन में 10 दफा जाती हूं.’’

मेरे इस कथन पर उसने चुप्पी साध ली. वह समझ गया कि मुझे घर बैठाना आसान

नहीं. अच्छीखासी सैलरी पाती हूं. शेखर, इसे बिडंवना नहीं कहोगे कि कमाने के बावजूद एक स्त्री अपने तरीके से जिंदगी नहीं गुजार सकती उसे पलपल पुरुषों की निगाहों के चाबुक खाने पड़ते हैं,’’ कल्पना की आंखें आंसुओं से लबरेज थीं.

मेरा दिल भर आया.

‘‘मैं तभी तक आजाद हूं जब तक औफिस में हूं. घर पहुंचते ही मेरी हैसियत एक बाई से ज्यादा कुछ नहीं रहता. बच्ची संभालना. खाना बनाना. घर की साफसफाई करना. इस के बाद तैयार हो औफिस आना. यह सब इतना आसान नहीं है.’’

‘‘सुधीर तुम्हारी कोई मदद नहीं करता?’’

‘वह तो तुम कल देख ही चुके हो. जो आदमी ठीक से कपड़े तक नहीं पहन सकता वह मेरी क्या मदद करेगा?’’

‘‘उस ने तुम्हारी मजबूरी का भरपूर फायदा उठाया,’’ मेरे कथन पर उस की आंखें नम हो गई.

‘‘जिंदगी उतनी आसान नहीं होती जितना तुम सम?ाते होगे. जरूरी नहीं कि मैं बनसंवर कर औफिस आती हूं तो मेरी निजी जिंदगी भी उतनी ही खूबसूरत होगी? सुधीर मु?ो औफिस में भी अकेला नहीं छोड़ता. दसियों बार फोन कर के मेरा हाल लेता रहता है मानो मैं उसे छोड़ कर भाग रही हूं.’’

‘‘भाग भी जाओगी तो क्या कर लेगा?’’

‘‘कहना आसान है? भाग कर जाऊंगी कहां? स्त्री के पैरों में मर्यादा की जंजीरे जो डाल दी गई हैं,’’ क्षणांश रुकने के बाद कल्पना बोली, ‘‘सब समय का दोष है.’’

‘‘समय हम खुद बनाते हैं.’’

‘‘खाक बनाते हैं?’’ कल्पना चिढी, ‘‘क्या जरूरत थी मेरे पिता को मेरी मां को मं?ाधार में छोड़ कर दूसरी शादी करने की? तब मैं सिर्फ 5 साल की थी.’’

यह जान कर मु?ो तीव्र आघात लगा. इस के पहले उस ने इस का जिक्र कभी मु?ा से नहीं किया था. फिर आगे कहने लगी, ‘‘मां ने जैसेतैसे पाला. पैसों की घोर तंगी थी. मेरे पड़ोस में सुधीर रहता था. मां से घुलामिला था. जब भी मां उस से रुपयों की मांग करती वह बेहिचक दे देता. किसी तरह से मैं ने बीए की. एक दिन सुधीर ने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा. मैं ने इस का जिक्र मां से किया तो मां ने कोई एतराज नहीं जताया. जताती भी कैसे? इतने एहसान थे उस के हम पर. फिर वे मेरे लिए कहां रिश्ता ढूंढ़ने जातीं. पापा का कलंक उन के लिए अभिशाप जैसा था,’’ कल्पना ने उसांस ली.

कल्पना और सुधीर की जोड़ी हंस और कौए जैसी थी. कहां वह गोरीचिट्टी कहां वह कालाकलूटी. पढाईलिखाई भी कुछ खास नहीं थी. मेरे हिसाब से वह 10वीं से ज्यादा पढ़ा नहीं लगा.

कल्पना ने बताया कि उस के पिता चाय बेचते थे. वहीं सुधीर की गुमटी में बैग की दुकान थी. कुदरत के न्याय को क्या कहें?  बाप के अपराध का दंड  मांबेटी भुगत रही थीं. पिता बैंक में अधिकारी थे.

‘‘तुम्हारी मां अपने हक के लिए लड़ी नहीं?’’

‘‘तब मैं छोटी थी. ज्यादा कुछ सम?ाने लायक नहीं थी. पापा की बेवफाई से मां टूट चुकी थीं. कहने लगी कि ऐसे बेगैरत आदमी से कुछ हासिल नहीं होगा. बहुत होगा कभीकभार कुछ रुपए दे देगा. मां के लिए सब से बड़ा दुख का कारण था पापा का हमें छोड़ कर चले जाना.

जब वे उन के नहीं हुए तो उन के पीछे पड़ने का क्या औचित्य?’’

समय बड़ी तेजी से भाग रहा था. अब तक 3 बार सुधीर का फोन आ चुका था.

वह हर बार बहाने बना देती.

‘‘शेखर, हमें चलना चाहिए.’’

कल्पना ने  हड़बड़ी दिखाई तो मैं ने रोका नहीं.

मैं पूरे रास्ते कल्पना के बारे में ही सोचता रहा. सुधीर कहीं से नहीं लगा कि उस ने कल्पना पर कोई एहसान किया? उस की नजर शुरू से ही कल्पना पर रही होगी. उसी से वशीभूत हो कर उस ने कल्पना की आर्थिक मदद की. फिर जब समय आया तो शूद समेत वसूल लिया.

रात के 11 बजने को थे. मगर कल्पना की आंखों से नींद कोसो दूर थी. सुधीर उस से कुछ कहना चाह रहा था. वहीं कल्पना अपने भविष्य को ले कर चिंतित थी. शेखर में उसे अपनी जिंदगी दिखने लगी थी. वह किसी हाल में उस से दूर रह पाने की स्थिति में नहीं थी.

‘‘शेखर से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’’ सुधीर के कथन पर वह तनिक भी नहीं चौंकी. बेहद सामान्य तरीके से करवट बदल कर उस की तरफ मुखातिब हुई, ‘‘तुम कहना क्या चाहते हो?’’

‘‘वही जो तुम समझ रही हो?’’

कल्पना समझ गई कि उसे उस के और शेखर के संबंधों की भनक लगी है.

सुधीर ने आगे कहा, ‘‘रोजरोज रैस्टोरैंट में कौफी पीने जाती हो.’’

‘‘हां जाती हूं. वह मेरा कलीग है. उस

के साथ कुछ देर बैठ कर मुझे बेहद सुकून

मिलता है.’’

‘‘मेरे पास रहने से क्या मन भारी हो जाता है?’’ सुधीर ने तंज कसा.

‘‘ऐसा ही सम?ा लो. बेमेल रिश्ते मन पर बो?ा होते हैं.’’

‘‘इतने साल बाद? उस समय क्यों नहीं जब तुम लोगों को मेरी जरूरत थी?’’

‘‘इसी बात की तकलीफ है. न चाहते हुए भी मु?ो तुम से शादी करनी पड़ी.’’

‘‘क्या कमी है मुझ में?’’

‘‘तुम ने एहसान के बदले हम लोगों को बरगलाया. तुम्हारी नीयत ठीक नहीं थी.’’

‘‘बेवजह क्यों कोई तुम लोगों की मदद करेगा? उस समय मैं ने तुम लोगों की मदद न की  होती तब क्या करती?’’

शेखर के इस सवाल का कल्पना के पास कोई जवाब नहीं था. सुधीर उसे कभी

पसंद नहीं था. न शक्लसूरत, न पढ़ाईलिखाई. मजबूर थी वह. बेमेल रिश्ता था. व्यक्तित्व में जमीनआसमान का अंतर. उस पर उस की संकीर्ण मानसिकता. हर वक्त उस के चालचलन पर निगरानी. कहां जा रही है, किस से मिलती है. औफिस में रहो तो दसियों बार फोन कर के हाल लेते रहना. वह अंदर से डरा हुआ इंसान था. उसे डर था कि मैं खूबसूरत महिला किसी के साथ चक्कर न चला दूं. हुआ भी ऐसा ही. शेखर मेरी जिंदगी में आ ही गया. वह लाख निगरानी करता रहा मगर मुझे रोक नहीं पाया.

‘‘याद रखना मै तुम्हें आसानी से छोड़ने वाला नहीं?’’

‘‘धमकी दे  रहे हो?’’ कल्पना उखड़ी.

‘‘नहीं. नसीहत दे रहा हूं.’’

‘मैं भी देखती हूं तुम मेरा क्या बिगाड लोगे?’’ कह कर कल्पना ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया. नींद आने से रही. वह दोराहे पर खड़ी थी. अगर शेखर ने न अपनाया तो वह कहां जाएगी? सुधीर की नजरों से गिर ही चुकी थी. यहां रहने का मतलब जिल्लत की जिंदगी गुजारना. वह हमेशा मु?ो ताना मारेगा. इस से तो यही बेहतर होगा सुधीर से तलाक ले कर अपने मन की जिंदगी जी जाए. अगर शेखर उसे नहीं अपनाता है तब?

अगले दिन कल्पना ने रात में घटी सारी कहानी शेखर से कह दी. बोली, ‘‘शेखर, तुम ने मुझे नहीं अपनाओगे तब भी मैं सुधीर से तलाक ले कर अकेले रहने का फैसला कर चुकी हूं.’’

‘‘यह इतना आसान नहीं?’’

‘‘यह तुम कह रहे हो?’’ कल्पना को आश्चर्य हुआ, ‘‘क्या तुम मु?ा से मुहब्बत नहीं करते?’’

‘‘करता हूं. बेहद करता हूं मगर जिस तरीके से तुम ने हड़बड़ी में फैसला लिया है उस पर मुझे आपत्ति है.

‘‘मैं दोहरेपन में नहीं जीना चाहती. यदि हमारे और तुम्हारे संबंधों के बारे में सुधीर को पता चल गया है तो उसे छिपाना क्यों? साफसाफ बता कर मन हलका कर लिया. आगे तुम पर छोड़ती हूं. मेरी तरफ से तुम आजाद हो,’’ भरे मन से कल्पना बोली. उस के गालों पर ढुलके आंसुओं को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह अंदर से कितनी टूटी हुई है. मैं ने उस से माफी मांगी. बेमतलब दिल दुखाया.

2 दिन कल्पना औफिस नहीं आई. खबर भिजवाई कि उस के पति को कोरोना हो गया. सुन कर सभी सकते में आ गए. मैं चाह कर भी उस के लिए कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं था. औफिस से साफसाफ निर्देश मिला कि कोई कल्पना से संबंध न रखे. किसी को जरा भी शंका हो तुरंत डाक्टर से संपर्क कर के औफिस आना बंद कर दे. मैं ने फोन से कल्पना से संपर्क करना चाहा. मगर स्विच्ड औफ मिला.

अचानक एक रात कल्पना का फोन आया, ‘‘शेखर, सुधीर की हालत बिगड रही है. तुम मेरी मदद कर सकते हो?’’

मैं ने तुरंत एक हौस्पिटल से संपर्क किया. वहां बैड खाली था. तुरंत एक ऐंबुलैंस का इंतजाम करा के उस के पति को भरती कराया.

इस बीच मेरी उस से दूरी बनी रही. उस की बच्ची को उस की मां संभाल रही थीं. जान कर मुझे राहत मिली. मैं सोचने लगा जिस पति से कल्पना को कोई लगाव नहीं उस के लिए क्यों परेशान हो रही है. मर जाने देती. तलाकशुदा कहलाने से बेहतर है विधवा कहलाना.

‘‘शेखर, क्या सुधीर बच पाएगा?’’ रात फोन कर के कल्पना ने पूछा. वह अंदर से

सहमी थी.

‘‘क्यों नहीं बच जाएगा?’’

‘‘नहीं बचेगा तब क्या होगा? क्या तुम मुझ से शादी करोगे?’’

कल्पना का यह सवाल बचकाना लगा. यह वक्त ऐसे सवालों के लिए नहीं था. कल्पना कमरे में अकेली थी. उस के मन में अपने भविष्य को ले कर सवाल उठना लाजिम था.

शेखर को लगा वह द्वंद्व मे जी रही है. एक तरफ उस ने तलाक का मन बना लिया है वहीं दूसरी तरफ शादी भी करना चाहती है यानी किसी का साथ भी चाहिए. बेशक अकेले जिंदगी काटना आसान नहीं होता. द्वंद्व मे तो मैं भी जी रहा था. कल्पना को ले कर असमंजस में था. पापा हां कहेंगे तब शादी करूंगा. यह कैसी मुहब्बत थी? कभीकभी ऐसा लगाता कल्पना की वर्तमान स्थिति के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं. न मैं उस की जिदगी में आता न उसे विकल्प मिलता. फिर वह चाहे जो करती.

‘‘शेखर, मेरे दिल में सुधीर के लिए कोई जगह नहीं है. मैं इस रिश्ते को ढो रही हूं,’’ कल्पना ने फिर से वही वाक्य दोहराया.

‘‘मैं तुम्हारी जिंदगी में न आता तब भी?’’

कल्पना कुछ नहीं बोली.

माना कि सुधीर कल्पना के लायक नहीं था मगर विपरीत परिस्थितियों में उसी ने कल्पना को उबारा. कल्पना की मां पाईपाई की मुहताज थीं. तब वह उन के लिए संबल बन कर खड़ा हुआ. सुधीर ने उस से शादी कर ली अगर कोई दुराचारी होता तो कल्पना का शारीरिक शोषण करता शादी नहीं करता. तब क्या करती? मैं खुद को गुनहगार मानने लगा. न मैं कल्पना की जिंदगी में आता न ही उसे विकल्प मिलता. मैं ने खुद को मं?ाधार में फंसा हुआ पाया. न छोड़ सकता था न ही बंध सकता था. परंतु ऐसा कब तक चलेगा? एक न एक दिन या तो इस रिश्ते का खत्म करना पडे़गा या फिर कल्पना को अपनाना पड़ेगा. कल्पना को दुविधा में रखना कहीं से भी उचित नहीं था. फैसला तो लेना ही था मगर अभी नहीं. मैं ने उसांस ली.

सुधीर की हालत सुधरने का नाम नहीं ले रही थी. 5वें दिन अचानक वह चल

बसा. कल्पना के गालों पर आंसुओं की बूंदें लुढ़क आईं. यह क्षणिक भावनाओं का आवेग था. वरना उस ने तो खुद ही कहा था कि वह इस रिश्ते को ढो रही है. इस घटना ने मेरे मन पर भारी बोझ डाल दिया. कल्पना का मेरे सिवा कोई नहीं था. अभी किसी फैसले पर पहुंचता सुधीर चल बसा.

इस में कोई शक नहीं था कि मैं कल्पना से बेइंतहा मुहब्बत करता था. मगर परिस्थितियां इस कदर करवट लेगी इस का अंदाजा मुझे नहीं था. सुधीर असमय चल बसा. यह एक बहुत बड़ी त्रासदी थी जो भी हो वह उस का पति था.

काफी आत्ममंथन के बाद फैसला लिया कि जब भरोसा दिया है तो पीछे नहीं हटूंगा. फिर चाहे पापा से विद्रोह ही क्यों न करना पड़े.

पापा ने जाना तो आगबबूला हो गए. ऐसा स्वाभाविक भी था. कौन बाप अपनी औलाद की शादी ब्याहता से करेगा और वह भी एक बच्ची की मां से.

‘‘कुंआरी लड़कियां मर गई हैं जो 1 बच्ची की मां से शादी करेगा? कल जब उस की लड़की बड़ी होगी तब कैसे उसे समझ पाएगा? नहींनहीं यह हरगिज नहीं होगा,’’ पापा का गुस्सा चरम

पर था.

‘‘पापा, आप जैसा सोच रहे हैं वैसा है

नहीं. समय बदल चुका है. उस का पति कोरोना से चल बसा. एकाएक उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है.’’

‘‘उस के दुखों से तुम्हें क्या लेनादेना?’’

पापा के सवाल ने मुझे सत्य से अवगत करा देने के लिए विवश कर दिया. मैं कल

तक उस से मुहब्बत करता था मगर आज मु?ा पर इंसानियत हावी हो चुकी है. लिहाजा, पूरी बेबाकी से बोला, ‘‘कोरोना के चलते सैकड़ों बच्चे अनाथ हो गए. अनेक जवान स्त्रियां विधवा हो चुकी हैं. ऐसे में मैं उस का हाथ थाम रहा हूं तो क्या गलत कर रहा हूं. सोचिए अगर आप की बेटी के साथ भी ऐसा होता तब क्या करते?’’

बेटी का नाम सुनते ही पापा का गुस्सा हलका पड़ गया.  वे क्षणांश  जज्बाती हो कर सोफे पर बैठ गए. उन के माथे पर पड़ी चिंता की लकीरें बता रही थीं कि वे मेरे और कल्पना के भविष्य को ले कर चिंताकुल हैं. चिंता से उबरे तो बोले, ‘‘ठीक है तुम मु?ो उस से मिलाओ.’’

पापा के कथन से मेरे भीतर आत्मविश्वास का समंदर हिलोरें मारने लगा. कल्पना को तत्काल अवगत कराया तो उस की आंखें खुशी से चमक उठीं. वर्षों बाद उस के अधरों पर स्वाभाविक मुसकान देखने को मिली. मैं आह्लादित था.

‘‘तुम्हारे पिता का क्या नाम है?’’ कल्पना से पापा ने पूछा.

‘‘के. राघवन.’’

‘‘क्या करते थे? यहां कैसे आ गई?’’

‘‘वे बैंक में मैनेजर हैं. ट्रांस्फर हुआ तो चैन्नई से यहां आ गए.’’

के. राघवन से उन्हें याद आया. बोले, ‘‘विजया बैंक में तो नहीं थे?’’ पापा का उस बैंक में अपना अकाउंट था.

‘‘यस सर.’’

पापा को समझते देर न लगी कि कल्पना की यह दुर्गति कैसे हुई और कैसे एक मामूली से लड़के ने उसे बरगला कर अपनी जीवनसंगिनी बना लिया. एक बड़े परिवार की बेटी का ऐसा हश्र जान कर पापा को बेहद दुख हुआ. लिहाजा, इस रिश्ते के लिए हामी भरने में उन्होंने देर न लगाई.

क्रिकेट टीम कप्तान हरमन प्रीत कौर ने Mardaani 3 ट्रेलर को देख दीं प्रतिक्रिया

Mardaani 3 : भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर ने रानी मुखर्जी की फिल्म ‘मर्दानी 3’ के ट्रेलर की जमकर तारीफ की . सोशल मीडिया पर तहलका मचाने वाले इस ट्रेलर ने हरमनप्रीत को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर “त्वरित और उदाहरण पेश करने वाली सज़ा समय की मांग है” जैसी सशक्त प्रतिक्रिया दी है.

महिलाओं के खिलाफ अपराधों को केंद्र में रखने वाली इस चर्चित फ्रेंचाइज़ी का तीसरा भाग अब देशभर में कम आय वर्ग की 8–9 साल की बच्चियों के अपहरण जैसे बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दे को उजागर करता है. ट्रेलर में दिखाया गया है कि किस तरह एक खास मकसद के तहत मासूम बच्चियों को निशाना बनाया जाता है, जो दर्शकों को झकझोर कर रख देता है.

यश राज फिल्म्स द्वारा ‘मर्दानी 3’ का ट्रेलर रिलीज़ किए जाने के बाद से यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है. रानी मुखर्जी एक बार फिर अपनी बेहद लोकप्रिय भूमिका शिवानी शिवाजी रॉय में लौट रही हैं. समय के खिलाफ जंग लड़ते हुए 93 लापता बच्चियों को बचाने वाली एक निडर पुलिस अफसर के रूप में उनके अभिनय को हर ओर से जबरदस्त सराहना मिल रही है.

हरमनप्रीत कौर ने देश की पुलिस फोर्स का भी आभार जताया. जो हमेशा रक्षा के लिए तैनात रहती है .
हरमनप्रीत कौर भुल्लर भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ऑलराउंडर खिलाड़ी और कप्तान हैं.उनके नेतृत्व में भारत ने 2025 महिला क्रिकेट विश्व कप, 2012, 2016 और 2022 महिला एशिया कप और 2022 एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता है. इसके अलावा 2022 में इंग्लैंड के खिलाफ पहली विदेशी द्विपक्षीय वनडे सीरीज़ जीत, 2023 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहली टेस्ट जीत और 2025 में इंग्लैंड के खिलाफ पहली T20 सीरीज़ जीतने का गौरव भी टीम को उनके कप्तान रहते मिला.

अभिराज मिनावाला द्वारा निर्देशित और आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्मित ‘मर्दानी 3’ सामाजिक सरोकारों पर आधारित सशक्त सिनेमा की परंपरा को आगे बढ़ाता है. जहां ‘मर्दानी’ ने मानव तस्करी की भयावह सच्चाई को उजागर किया था, वहीं ‘मर्दानी 2’ ने सिस्टम को चुनौती देने वाले एक सीरियल रेपिस्ट की विकृत मानसिकता को दिखाया. अब ‘मर्दानी 3’ समाज की एक और अंधेरी और क्रूर सच्चाई पर रोशनी डालते हुए इस फ्रेंचाइज़ी की प्रभावशाली विरासत को और मजबूत करता है.

‘मर्दानी’ भारत की एकमात्र हिट महिला-केंद्रित और महिला पुलिस फ्रेंचाइज़ी है। ‘मर्दानी 3’ 30 जनवरी 2026 को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली है। इस फिल्म के साथ रानी मुखर्जी अपने शानदार करियर के 30 साल पूरे कर रही हैं, जो पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए गर्व और उत्सव का क्षण बन गया है.

Love Story : जब तुम मेरे न रहे

Love Story :  रसोई  की घड़ी ने रात के 11 बजाए तो जैसे पूरे घर की थकान एकसाथ जम्हाई ले उठी. प्रैशर कुकर अभी भी चूल्हे पर ठंडा पड़ा था, उस में बनी दाल अब भी गरम थी. सिंक में कुछ प्लेटें धुलने का इंतजार कर रही थीं.

टीवी वाले कमरे में नीलीपीली रोशनी झिलमिला रही थी पर आवाज बिलकुल धीमी थी.

आशा ने आंच बंद की और फिर हाथ पोंछते हुए टीवी वाले कमरे की ओर देखा.

राहुल सोफे पर आधी करवट लिए मोबाइल में डूबा था. उस की उंगलियां तेजी से स्क्रीन पर चल रही थीं, होंठों पर अनजानी सी मुसकान अठखेलियां कर रही थी.

‘‘खाना रख दूं प्लेट में?’’ आशा ने धीमे से पूछा.

‘‘हूं?’’ राहुल चौंका मानो किसी दूर दुनिया से वापस आया हो, ‘‘अरे नहीं, अभी भूख नहीं है. बाद में खा लूंगा, तुम सो जाओ.’’

‘‘ठंडा हो जाएगा,’’  आशा ने आदतन कहा.

‘‘माइक्रोवेव किसलिए है घर में?’’ राहुल ने बिना नजर उठाए जवाब दिया और फिर उसी मुसकान के साथ कुछ टाइप करने लगा.

आशा कुछ सैकंड उसे देखती रही. वह मुसकान उस ने बहुत बरस पहले देखी थी जब राहुल उस से छिपछिप कर बातें करता था, जब वह उस से मिलने के बहाने ढूंढ़ता था. आज वही मुसकान द्वारा उस के चेहरे पर खिल रही थी.

‘‘ठीक है,’’ उस ने बस इतना कहा और कमरे से लौट आई.

आशा और राहुल की शादी को 8 साल हो चुके थे. शहर के एक छोटे से 2 कमरे के फ्लैट

में उन का जीवन किसी साधारण टीवी सीरियल की तरह चलता रहा. ईएमआई, किराना, औफिस की मीटिंग्स, बिजली का बिल, वीकैंड पर सब्जी की मंडी और साल में एक बार कहीं घूमने की अधूरी प्लानिंग.

मध्यवर्गीय जीवन की यही तो परिभाषा थी. जरूरतों के बीच सपनों को समेट कर रख देना और समयसमय पर उन पर जमी धूल झाड़ कर बस देख लेना.

शुरू के सालों में सब ठीक था. दोनों नौकरी पर जाते, शाम को साथ चाय पीते, कभी सड़क वाले गोलगप्पे, कभी छोटे से रैस्टोरैंट में डोसा. पर धीरेधीरे जिंदगी ने अपने हिसाब से कटौती करनी शुरू की.

औफिस में प्रमोशन की दौड़, बढ़ती जिम्मेदारियां, मकान की ईएमआई, दोनों के थकते शरीर और चिड़चिड़ाते स्वभाव सब ने मिल कर उनके बीच बातचीत के पुल पर दीमक लगा दी. अब ज्यादातर औपचारिक बातचीत होती.

‘‘दूध लाना था, लाए?’’

‘‘अरे, भूल गया यार, सुबह ले आऊंगा, पक्का.’’

‘‘आजकल हर बात भूल जाते हो, जरा-सा ध्यान नहीं रहता तुम से.’’

तो कभी राहुल के देर से घर पहुंच पर आशा शिकायत करती, ‘‘आज इतनी देर से आए. 10 बज गए हैं राहुल.’’

‘‘ट्रैफिक था, मीटिंग भी लंबी चली, अब हर बात पर तकरार मत शुरू कर दिया करो आशा.’’

‘‘तकरार? मैं तकरार करती हूं? चलो रहने दो, कभी मेरी थकान दिखती है तुम्हें?’’

अब यह रोज का रूटीन बन गया था.

उन के बीच बातें दूध से शुरू हो या फिर रात को देर से घर पहुंचने पर इसी जुमले पर

खत्म होतीं कि तुम समझते ही नहीं हो मुझे.

राहुल की कंपनी में कुछ महीने पहले एक नई प्रोजैक्ट मैनेजर आई, नैना. खुल कर हंसने वाली, स्मार्ट, तेज, अपने काम में बेहद कुशल. वह मीटिंग्स में सब की बात ध्यान से सुनती और बीचबीच में राहुल के प्रेजैंटेशन पर सराहना कर देती.

‘‘राहुल, तुमने जो डेटा निकाला है न, कमाल है यार,’’ नैना ने एक दिन कौंफ्रैंस रूम से बाहर निकलते हुए कहा, ‘‘तुम हंसना नहीं जानते हो पर काम में जान डाल देते हो.’’

राहुल ने हलकी सी मुसकान के साथ कहा, ‘‘थैंक्यू, बस कोशिश करता हूं कि गलती कम से कम हो.’’

‘‘तुम्हारी यही आदत अच्छी लगी,’’ नैना हंसी, ‘‘ऐक्स्ट्रा केयरफुल.’’

उसी दिन से जैसे राहुल के भीतर एक जगह खुल गई, जिस में उसे अपना ‘कदरदान’ दिखने लगा. घर पर बातें कम हो गई थीं, पर औफिस में कोई था जो उस की बात पूरी सुनता था, उस की तारीफ करता था, उस की चुहल पर हंसता था.

धीरेधीरे वे लंच ब्रेक साथ बिताने लगे. मीटिंग के बाद की छोटीछोटी बातें व्हाट्सऐप तक पहुंच गईं. फिर रात में.

‘‘सो गए?’’

‘‘नहीं, नींद नहीं आ रही.’’

‘‘मुझे भी नहीं. वैसे फ्री टाइम में क्या करना पसंद है तुम्हें?’’

ऐसे ही मोबाइल की स्क्रीन के उजाले में 2 जिंदगियों के बीच एक तीसरी दुनिया बसती चली गई.

एक रात, जब राहुल नहाने के लिए गया हुआ था, उस का फोन अचानक टेबल से गिर पड़ा. स्क्रीन जल उठी. आशा ने अनायास ही उठाया, स्क्रीन पर आए नोटिफिकेशन से बस इतना पढ़ा, ‘‘काश, आज थोड़ी देर और साथ बैठ पाते. तुम्हारे साथ बातें करने में कितना सुकून मिलता है, राहुल. नैना.’’

आशा के हाथ जैसे जम गए. दिल ने एक पल के लिए धड़कन रोक दी, फिर तेजी से धड़कने लगा. उस ने न तो पासवर्ड डालने की कोशिश की और कुछ पढ़ने की. बस फोन वहीं रख दिया जहां था और कुरसी पर बैठ गई.

बाथरूम के दरवाजे के पीछे से पानी गिरने की आवाज आ रही थी. उस आवाज के साथ

8 साल की पूरी शादी उस की आंखों के सामने छलकने लगी. पहली बार घर सैट करना, सस्ती कुरसियां, पति के लिए पहली बार बनाई गई खराब चाय, उस पर भी राहुल ने मुसकरा कर कहा था, ‘‘दुनिया की बैस्ट चाय है.’’

बारिश में भीगते हुए लाई गई सब्जियां, बिजली कटने पर मोमबत्ती की रोशनी में खेला गया लूडो, छोटीछोटी सी लड़ाइयां, बड़ेबड़े सपने और फिर अचानक एक सवाल, ‘‘मुझ में क्या कमी रह गई?’’

बाथरूम का दरवाजा खुला, राहुल तौलिए से बाल पोंछते हुए बाहर

आया. बोला, ‘‘आशा, मेरी ग्रे शर्ट दिखी? कल की मीटिंग के लिए रखी थी. अरे, तुम ऐसे चुप क्यों बैठी हो?’’

आशा ने उसकी तरफ देखा. गला सूख गया था. पूछा, ‘‘नैना कौन है?’’

राहुल के हाथ से तौलिया लगभग छूट गया.

‘‘क… कौन नैना?’’ उस ने बेमानी सी हंसी के साथ पूछा.

‘‘वही, जिस के लिए तुम्हारे मोबाइल की स्क्रीन पर अभी दिल वाली इमोजी चमक रही थी,’’ आशा की आवाज बर्फ सी ठंडी थी, ‘‘मत बोलो कि गलत नंबर था या प्रोजैक्ट की कोई बात थी. बस सच बोलो, राहुल. मैं ?ाठ सुनने की ताकत खो चुकी हूं.’’

कमरे में कुछ सैकंड तक सन्नाटा रहा. राहुल तौलिया कुरसी पर रख धीरे से बैड

पर बैठ गया. बोला, ‘‘आशा. बात उतनी बड़ी नहीं है जितनी…’’

‘‘जितनी मैं सोच रही हूं,’’ आशा ने बीच में रोक दिया, ‘‘तो सोचती ही रहूंगी अगर तुम बोलोगे नहीं. तुम उस से प्यार करते हो?’’

राहुल ने आंखें झपका लीं. यह वही सवाल था जिस से वह खुद भी आंखें चुरा रहा था.

‘‘मैं… मैं बस उस के साथ सहज महसूस करता हूं. औफिस में बहुत स्ट्रैस होता है, तुम जानती हो. घर आ कर हम बस लड़ते हैं, शिकायतें करते हैं. वहां… उस से बात कर के हलका लगने लगा. पता नहीं कैसे… कब…’’

‘‘प्यार हो गया?’’ आशा की आंखें अब भी सूखी थीं पर आवाज में हलकी सी कंपन थी.

राहुल ने पहली बार सिर उठा कर आशा की ओर देखा. इन आंखों में उस ने पहले कभी खुद को इतना अजनबी नहीं महसूस किया था.

‘‘पता नहीं,’’ यह शब्द उस के होंठों से बमुश्किल निकला.

आशा के भीतर कुछ टूट कर बिखर गया, पर बाहर से वह स्थिर रही. थोड़ी देर बाद उस ने बहुत ही साधारण ढंग से पूछा, ‘‘वह जानती है कि तुम शादीशुदा हो?’’

‘‘हां. शुरू से,’’ राहुल ने धीरे से कहा, ‘‘मैं ने कभी छिपाया नहीं. हम दोनों भी नहीं चाहते थे कि किसी का घर टूटे. पर दिल पर किस का बस चलता है आशा?’’

आशा अचानक उठ खड़ी हुई. राहुल को लगा अब चीखपुकार होगी, आंसू होंगे, इलजाम होंगे पर आशा ने कुछ नहीं किया. वह खिड़की के पास गई, परदा थोड़ा सा हटा कर बाहर अंधेरे में ?ांकने लगी.

कुछ देर चुप रहने के बाद आशा बोली, ‘‘तुम्हारा दिल चला गया. और तुम्हें पता भी नहीं चला कब. मेरा दिल भी तो कभी तुम पर आया था, राहुल. तब हम ने कितना कुछ सोचा था न?’’

राहुल चुप रहा.

‘‘परिवार… बच्चे… थोड़ीथोड़ी बचत… तुम्हारी मां को खुश करने की कितनी कोशिश की थी मैं ने याद है?’’ उस के होंठों पर हलकी सी मुसकान थी जो आंखों तक नहीं पहुंची.

राहुल का गला भारी हो गया, ‘‘आशा, मैं… सौरी… मैं बहुत बड़ा गुनहगार हूं. अगर तुम चाहो तो मैं उस से बात बंद कर दूंगा, प्रोजैक्ट बदलवा लूंगा, ट्रांसफर ले लूंगा, जो तुम कहो.’’

आशा ने पहली बार सीधेसाफ शब्दों में कहा, ‘‘नहीं.’’

राहुल ने चौंक कर देखा, ‘‘नहीं?’’

‘‘जिस चीज को तुम्हारा दिल अपना घर बना चुका है उसे सिर्फ जिद से, डर से या सामाजिक दबाव से छोड़ने को कहोगे, तो क्या तुम कभी मेरे रह पाओगे?’’ आशा ने शांत स्वर में पूछा, ‘‘या फिर सिर्फ. मेरे साथ रह कर हमेशा मन ही मन उस के पास भागते रहोगे?’’

राहुल के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था.

अगले कुछ दिनों में घर का माहौल अजीब तरह से शांत हो गया. पहले जहां हर बात पर तकरार हो जाती थी अब वहां एक थका हुआ सा सौहार्द आ गया. आशा रोज की तरह औफिस जाती, काम करती, लौटती, खाना बनाती. बस अब वह राहुल के मोबाइल पर नजर नहीं डालती, न उस के देर से आने पर कुछ पूछती.

एक रात खाने के बाद आशा ने राहुल से कहा, ‘‘कल थोड़ा जल्दी घर आ सकते हो?’’

‘‘क्यों? सब ठीक तो है?’’  राहुल घबरा गया.

‘‘हां, सब ठीक है. बस… एक बात करनी है. वकील से मिलना है साथ में.’’

राहुल के हाथ से चम्मच गिरतेगिरते बचा, ‘‘वकील? मतलब…?’’

आशा ने राहुल की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘हां, मैं ने सब सोच लिया है. मैं तुम्हारे और नैना के बीच दीवार बन कर नहीं रहना चाहती.’’

‘‘दीवार?’’ राहुल लगभग फुसफुसाया.

‘‘जिस घर में दिल कहीं और चला जाए न, वहां पत्नी सिर्फ औपचारिक रिश्ता बन कर रह जाती है,’’ आशा ने सधी हुई आवाज में कहा, ‘‘और मैं औपचारिक नहीं रहना चाहती, न अपने लिए, न तुम्हारे लिए.’’

‘‘पर… इतना आसान नहीं होता सब, आशा,’’ राहुल ने बेबसी से कहा, ‘‘समाज, लोग, परिवार, तुम्हारे मांबाप, सब मुझे दोष देंगे. तुम मुझे माफ कर भी कैसे सकती हो? मैं तो…’’

आशा ने बीच में ही कहा, ‘‘देखो राहुल, गलती तुम्हारी है, मानती हूं, पर दिल किसी

पर जबरदस्ती तो नहीं उतरता, न किसी से जबरदस्ती उतारा जा सकता है. मैं तुम्हारी यह गलती पकड़े रख कर अपनी सारी जिंदगी जहर नहीं करना चाहती.’’

‘‘पर तुम?’’ राहुल की आवाज भर्रा गई, ‘‘तुम अकेली कैसे…?’’

आशा ने बहुत कमजोर मुसकान के साथ कहा, ‘‘जब तुम मेरे न रहे. तो मैं

तुम्हारी जिंदगी में बो?ा बन कर नहीं रह सकती, राहुल. मैं बिलकुल नहीं चाहती कि तुम्हारी मुसकान बस इसलिए न खो जाए कि तुम मेरे प्रति अपराधबोध ढोते रहो. मैं जिंदा रह कर तुम्हारे लिए मरी हुई औरत नहीं बनना चाहती. मैं चाहती हूं कि तुम्हारी अगली सुबहें साफ हों, किसी झूठी तसल्ली पर टिकी न रहें.’’

राहुल ने पहली बार देखा कि यह वही आशा है, जिस ने एक समय में उस के लिए नौकरी छोड़ने तक की जिद की थी, पर आज अपने लिए, उस की खुशी के लिए, अपने हिस्से का दुख चुन रही है.

वकील के औफिस की सीलन भरी गंध में कागजों की सरसराहट थी. एक पुरानी सी मेज पर रखे रजिस्टर में नाम लिखते हुए आशा के हाथ थोड़े कांपे पर उस ने खुद को संभाल लिया.

वकील ने औपचारिक सवाल किए. ‘‘आपसी सहमति से अलग हो रहे हो न आप दोनों?’’

दोनों ने एकसाथ सिर हिलाया.

‘‘कोई बच्चा नहीं है तो प्रक्रिया आसान होगी,’’ वकील ने कहा, जैसे कोई बिल बनाने की बात कर रहा हो, ‘‘कागज तैयार हो जाएंगे, फिर कोर्ट में 2 डेट्स में काम हो जाएगा.’’

आशा ने कलम उठाई, कागज पर अपने नाम के सामने हस्ताक्षर करने को ?ाकी. उस की आंखों के सामने अचानक शादी के समय साइन किए गए रजिस्टर की छवि उभरी, तब राहुल ने फुसफुसा कर कहा था, ‘‘देखो, अब ये साइन हमें एकदूसरे से जिंदगी भर बांधे रखेंगे.’’

आज दोबारा वही साइन उन्हें एकदूसरे से अलग कर रहे थे. हाथ कांपे, पर उसने साफसुथरे अक्षरों में अपना नाम लिख दिया, आशा.

राहुल की बारी आई. उस ने कलम उठाई पर कागज को घूरता रह गया. उंगलियां सख्त हो गईं.

‘‘आशा…’’ उस की आवाज में इतनी लाचारी थी कि वकील ने भी ऊपर देख लिया, ‘‘यह हम… सच में कर रहे हैं?’’

आशा ने बहुत धीरे से कहा, ‘‘हां, और यही तुम्हारी, मेरी और… और हमारे प्यार की ईमानदारी है.’’

राहुल की आंखों में आंसू तैरने लगे, ‘‘पर तुम इतने बड़े दिल से कैसे सोच

सकती हो? मुझे तो खुद से नफरत होने लगी है.’’

वकील हलका सा असहज हो कर कुरसी पर पसर गया, ‘‘पर्सनल बातें आप लोग बाहर भी…’’

आशा हलके से मुसकरा दी, ‘‘बस

2 मिनट सर.’’

वह कुरसी से उठी राहुल के पास आई. बोली, ‘‘राहुल, याद है शादी के पहले दिन तुम ने कहा था अगर कभी मैं गलती करूं तो मुझे छोड़ देना पर तुम बदल मत जाना.’’

राहुल ने आंसू पोंछते हुए सिर हिलाया, ‘‘हां… बेवकूफी की बातें थीं…’’

‘‘नहीं,’’ आशा ने धीरे से कहा, ‘‘तुम ने तब जो कहा था वह मैं आज कर रही हूं मैं तुम्हें छोड़ रही हूं पर खुद को बदल नहीं रही.’’

‘‘मतलब?’’ राहुल ने उल?ा कर पूछा.

‘‘मतलब यह कि मैं आज भी वही आशा हूं जो प्यार पर यकीन करती है. बस फर्क इतना है कि आज मेरा प्यार मेरा अपना दर्द भी सम?ाता है और तुम्हारी खुशी भी. मैं तुम्हें सजा दे कर अपने भीतर कड़वाहट नहीं पालना चाहती. जब मेरे न रहूं तुम्हारी जिंदगी में पत्नी बन कर तब तुम्हें हर सुबह यह तो महसूस हो कि कभी कोई थी, जिस ने बिना स्वार्थ के तुम्हारे लिए अच्छा सोचा था.’’

यह सुन कर राहुल का दिल तारतार हो चला. उस के हाथ से पैन फिसल कर मेज पर आ गिरा.

आशा ने खुद पैन उठाया उस के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘‘अब साइन कर दो राहुल वरना मैं पीछे हट जाऊंगी… और फिर तुम्हारी हर मुसकान पर तुम्हारा दिल खुद ही तुम्हें सजा देगा.’’

राहुल ने कांपते हाथ से अपने नाम के आगे हस्ताक्षर कर दिए. जैसे ही स्याही कागज पर सूखी, उन के रिश्ते की कानूनी डोर भी सूख कर टूटने लगी.

कुछ हफ्तों बाद की एक शाम आशा ने अपनी अलमारी के सामने खड़े हो कर

कपड़े छांटे. कुछ कपड़ों पर राहुल की पसंद की छाप थी, नीली साड़ी जो उस ने पहली करवाचौथ पर पहनने के लिए खरीदी थी, हलकी हरी कुरती, जिसे राहुल हमेशा कहता था कि इसे पहनो, इस में तुम कालेज गोइंग लड़की लगती हो.

आशा एकएक कपड़े को हाथ में ले कर देखती, मुसकरा कर वापस रख देती, फिर दूसरे शहर की नई नौकरी के लिए पैकिंग में लग गई. वह तय कर चुकी थी शहर बदलेगी, माहौल बदलेगा, शायद खुद को नए सिरे से ढूंढ़ना आसान हो जाए.

तभी दरवाजे की घंटी बजी. उस ने दरवाजा खोला, सामने राहुल खड़ा था.

‘‘अंदर आओ,’’ आशा ने सहजता से कहा.

राहुल ने कमरे के भीतर नजर दौड़ाई. बिखरा सामान, खुला बैग, किताबों के ढेर, किचन के बरतनों की पैकिंग.

‘‘तो सच में जा रही हो?’’ उस ने धीरे से पूछा.

‘‘हां,’’ आशा ने बैग की जिप बंद करते हुए कहा, ‘‘कंपनी की ब्रांच है इंदौर में, वही जौइन करूंगी.’’

कुछ पल दोनों बिना बोले खड़े रहे, फिर राहुल ने कुरियर से लाया हुआ एक छोटा सा लिफाफा उसे दिया, ‘‘यह… तुम्हारे लिए.’’

आशा ने खोला, अंदर बैंक की कुछ नई पासबुक, एफडी के पेपर और एक छोटा सा

कार्ड था जिस पर लिखा था, ‘‘अपना खयाल रखना, आशा.’’

आशा ने राहुल की ओर देखा, ‘‘ये सब

क्या है?’’

‘‘तुम्हारी बचतें हैं जो शादी के बाद मेरे अकाउंट में शिफ्ट हो गई थीं,’’ राहुल ने कहा, ‘‘मैं नहीं चाहता कि तुम्हें कभी लगे कि तुम ने सिर्फ खोया है. जो तुम्हारा है, वह तुम्हें ही मिले.’’

आशा की आंखें नम हो आईं, ‘‘जिंदगी सिर्फ पैसों से नहीं नापी जाती राहुल.’’

‘‘जानता हूं,’’ राहुल ने सिर ?ाका लिया, ‘‘फिर भी कुछ तो करूं तुम्हारे लिए, जिस के लिए खुद से नफरत कम हो जाए.’’

आशा ने राहुल की बात काटी, ‘‘खुद से नफरत बंद करो. बस इतना याद रखना कि किसी का भरोसा मत तोड़ना अब न अपना, न उस का जिस के साथ तुम आगे रहोगे.’’

राहुल ने संकोच से पूछा, ‘‘मैं… मैं ने नैना से बात की है. मैं ने उसे सब बता

दिया. हमारा तलाक, तुम्हारा फैसला. उसे बहुत बुरा लगा, बहुत रोई वह. बोली कि वह वजह नहीं बनना चाहती किसी रिश्ते के टूटने की.’’

‘‘वजह तो तुम्हारा मन बना था, राहुल,’’ आशा ने शांत स्वर में कहा, ‘‘कोई तीसरा कभी तब तक बीच में नहीं आता जब तक दोनों के बीच जगह खाली न पड़ जाए. उस जगह को हम ने मिल कर खाली किया है, हमारी शिकायतों, हमारी चुप्पियों ने.’’

राहुल चुप हो गया. थोड़ी देर बाद उस ने ?ि?ाकते हुए पूछा, ‘‘अगर… अगर मैं उसे शादी के लिए पूछूं तो क्या तुम… बहुत बुरा महसूस करोगी?’’

आशा ने गहरी सांस ली. यह वही सवाल था जिसे सुनने के लिए उस ने अपने दिल को तैयार किया था, पर जब शब्दों का आकार बना तो दर्द ने अपनी जगह फिर से मांग ली.

‘‘बुरा…?’’ उस ने क्षण भर सोचा, ‘‘हां, इंसान हूं, थोड़ा तो लगेगा पर अगर तुम दोनों सच में एकदूसरे के साथ खुश रह सकते हो तो शायद मेरी रुलाई से ज्यादा जरूरी है तुम्हारी हंसी.’’

राहुल की आंखें भर आईं, ‘‘तुम… तुम इंसान हो या…?’’

‘‘बहुत साधारण सी औरत हूं राहुल,’’ आशा ने हलके से हंसते हुए कहा, ‘‘बस इतना तय किया है कि जब मैं तुम्हारी जिंदगी में न रहूं तो मेरी याद तुम्हें बो?ा न लगे. कोई अच्छा सा खयाल बने कि एक दिन एक औरत थी, जिस ने जाने को चुना, मगर नफरत को नहीं चुना.’’

कमरे में अचानक जैसे कुछ भारी सा पिघलने लगा. दोनों के बीच जो गांठें थीं वे खुल तो नहीं रही थीं पर कम से कम अब उन्हें खींच कर दर्द बढ़ाने की जिद नहीं थी.

राहुल ने धीमे से पूछा, ‘‘एक… आखिरी बार तुम्हें गले लगा सकता हूं?’’

आशा कुछ पल चुप रही, फिर उस ने हलकी सी मुसकान के साथ कहा, ‘‘यह भी कोई पूछने की बात है?’’

राहुल ने आगे बढ़ कर आशा को गले लगा लिया. दोनों की आंखों से आंसू बह निकले. कभी के साथी, आज के पराए… पर फिर भी कहीं भीतर से जुड़े हुए.

उस आलिंगन में कोई पतिपत्नी नहीं थे, बस 2 इंसान थे जिन्होंने साथ चलतेचलते

रास्ते अलग किए थे.

प्लेटफौर्म पर खड़ी आशा ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया. लाउडस्पीकर पर ट्रेन के आने की घोषणा हो रही थी.

लोगों की भीड़, सामान का शोर, चाय वालों की आवाजें… हंगामे के बीच भी आशा के भीतर की दुनिया अजीब सी शांत थी.

तभी मोबाइल पर मैसेज आया, ‘टेक केयर, आशा. कभी भी कुछ भी लगे, बस एक मैसेज कर देना, राहुल.’

आशा ने जवाब लिखा, ‘अब मुझे खुद से बात करना सीखना है, राहुल. जब अपने साथ रहना सीख जाऊंगी, तब शायद किसी और की जरूरत कम महसूस होगी. तुम्हारा रास्ता साफ हो गया है, अब उस पर ईमानदारी से चलना. खुश रहो, आशा.’

मैसेज भेज कर उस ने मोबाइल बैग में रख दिया. ट्रेन आ चुकी थी. वह चढ़ने लगी, तभी पीछे से किसी ने आवाज दी, ‘‘दीदी.’’

आशा मुड़ी. एक छोटी सी लड़की अपनी मां का हाथ पकड़े खड़ी थी जो सीट नंबर पूछ रही थी. आशा ने उन की मदद की, सामान अंदर चढ़वाने में हाथ बंटाया. सीट ढूंढ़ कर देने के बाद लड़की ने मासूम सा सवाल किया, ‘‘दीदी, आप अकेली सफर कर रही हो?’’

आशा ने हलके से मुसकरा कर जवाब

दिया, ‘‘हां, अकेली…पर कभीकभी अकेले सफर करना जरूरी होता है न ताकि हम जान सकें कि हम हैं कहां.’’

लड़की कुछ सम?ा, कुछ नहीं. पर आशा को महसूस हुआ कि यह जवाब उस ने उस बच्ची को नहीं, खुद को दिया है.

ट्रेन चल पड़ी. स्टेशन पीछे छूटता गया. आशा ने आंखें बंद कीं. उसे लगा जैसे अपने दिल के किसी कोने से वह धीमे से फुसफुसा रही है.

‘‘जब तुम मेरे न रहे तो मैं तुम्हारी जिंदगी में बोझ बन कर नहीं रहना चाहती थी और अब शायद मैं खुद की जिंदगी में पहली बार पूरी तरह मौजूद रहूंगी,’’ और फिर उस के होंठों पर एक हलकी पर सच्ची मुसकान आ गई.

यह मुसकान किसी और के लिए नहीं, सिर्फ उस की अपने लिए थी और शायद यही उस की सब से बड़ी जीत थी.

Hindi Family Story : विरासत – अपराजिता को मिले उन खतों में ऐसा क्या लिखा था

Hindi Family Story : अपराजिता की 18वीं वर्षगांठ के अभी 2 महीने शेष थे कि वक्त ने करवट बदल ली. व्यावहारिक तौर पर तो उसे वयस्क होने में 2 महीने शेष थे, मगर बिन बुलाई त्रासदियों ने उसे वक्त से पहले ही वयस्क बना दिया था. मम्मी की मौत के बाद नानी ने उस की परवरिश का जिम्मा निभाया था और कोशिश की थी कि उसे मम्मी की कमी न खले. यह भी हकीकत है कि हर रिश्ते की अपनी अलग अहमियत होती है. लाचार लोग एक पैर से चल कर जीवन को पार लगा देते हैं. किंतु जीवन की जो रफ्तार दोनों पैरों के होने से होती है उस की बात ही अलग होती है. ठीक इसी तरह एक रिश्ता दूसरे रिश्ते के न होने की कमी को पूरा नहीं कर सकता.

वक्त के तकाजों ने अपराजिता को एक पार्सल में तब्दील कर दिया था. मम्मी की मौत के बाद उसे नानी के पास पहुंचा दिया गया और नानी के गुजरने के बाद इकलौती मौसी के यहां. मौसी के दोनों बच्चे उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में रहते थे. अतएव वह अपराजिता के आने से खुश जान पड़ती थीं. अपराजिता के बहुत सारे मित्रों के 18वें जन्मदिन धूमधाम से मनाए जा चुके थे. बाकी बच्चों के आने वाले महीनों में मनाए जाने वाले थे. वे सब मौका मिलते ही अपनाअपना बर्थडे सैलिब्रेशन प्लान करते थे. तब अपराजिता बस गुमसुम बैठी उन्हें सुनती रहती थी. उस ने भी बहुत बार कल्पनालोक में भांतिभांति विचरण किया था अपने जन्मदिन की पार्टी के सैलिब्रेशन को ले कर मगर अब बदले हालात में वह कुछ खास करने की न तो सोच सकती थी और न ही किसी से कोई उम्मीद लगा सकती थी.

2 महीने गुजरे और उस की खास सालगिरह का सूर्योदय भी हुआ. मगर नानी की हाल ही में हुई मौत के बादलों से घिरे माहौल में सालगिरह उमंग की ऊष्मा न बिखेर सकी. अपराजिता सुबह उठ कर रोज की तरह कालेज के लिए निकल गई. शाम को घर वापस आई तो देखा कि किचन टेबल पर एक भूरे रंग का लिफाफा रखा था. वह लिफाफा उठा कर दौड़ीदौड़ी मौसी के पास आई. लिफाफे पर भेजने वाले का नामपता नहीं था और न ही कोई पोस्टल मुहर लगी थी.

‘‘मौसी यह कहां से आया?’’ उस ने आंगन में कपड़े सुखाने डाल रहीं मौसी से पूछा. ‘‘उस पर तो तुम्हारा ही नाम लिखा है अप्पू… खोल कर क्यों नहीं देख लेतीं?’’

अपराजिता ने लिफाफा खोला तो उस के अंदर भी थोड़े छोटे आकार के कई सफेद रंग के लिफाफे थे. उन पर कोई नाम नहीं था. बस बड़ेबड़े अंकों में गहरीनीली स्याही से अलगअलग तारीखें लिखी थीं. तारीखों को गौर से देखने पर उसे पता चला कि ये तारीखें भविष्य में अलगअलग बरसों में पड़ने वाले उस के कुछ जन्मदिवस की हैं. खुशी की बात कि एक लिफाफे पर आज की तारीख भी थी. अपराजिता ने प्रश्नवाचक निगाहों से मौसी को निहारा तो वे मुसकरा भर दीं जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं. ‘प्लीज मौसी बताइए न ये सब क्या है. ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि आप को इस के बारे में कुछ खबर न हो… यह लिफाफा पोस्ट से तो आया नहीं है… कोई तो इसे दे कर गया है… आप सारा दिन घर में थीं और जब आप ने इसे ले कर रखा है तो आप को तो पता ही होना चाहिए कि आखिर यह किस का है?’’

‘‘मुझे कैसे पता चलता जब कोई बंद दरवाजे के बाहर इसे रख कर चला गया. तुम तो जानती हो कि दोपहर में कभीकभी मेरी आंख लग जाती है. शायद उसी वक्त कोई आया होगा. मैं ने तो सोचा था कि तुम्हारे किसी मित्र ने कुछ भेजा है. हस्तलिपि पहचानने की कोशिश करो शायद भेजने वाले का कोई सूत्र मिल जाए,’’ मौसी के चेहरे पर एक रहस्यपूर्ण मुस्कराहट फैली हुई थी. अपराजिता ने कई बार ध्यान से देखा, हस्तलिपि बिलकुल जानीपहचानी सी लग रही थी. बहुत देर तक दिमागी कसरत करने पर उसे समझ में आ गया कि यह हस्तलिपि तो उस की नानी की हस्तलिपि जैसी है. परंतु यह कैसे संभव है? उन्हें तो दुनिया को अलविदा किए 2 महीने गुजर गए हैं और आज अचानक ये लिफाफे… उसे कहीं कोई ओरछोर नहीं मिल रहा था.

‘‘मौसी यह हस्तलिपि तो नानी की लग रही है लेकिन…’’ ‘‘लेकिनवेकिन क्या? जब लग रही है तो उन्हीं की होगी.’’

‘‘यह असंभव है मौसी?’’ अपराजिता का स्वर द्रवित हो गया. ‘‘अभी तो संभव ही है अप्पू, मगर 2 महीने पहले तक तो नहीं था. जिस दिन से तुम्हारी नानी को पता चला कि उन का हृदयरोग बिगड़ता जा रहा है और उन के पास जीने के लिए अधिक समय नहीं है तो उन्होंने तुम्हारे लिए ये लैगसी लैटर्स लिखने शुरू कर दिए थे, साथ ही मुझे निर्देश किया था कि मैं यह लिफाफा तुम्हें तुम्हारे 18वें जन्मदिन वाले दिन उपहारस्वरूप दे दूं. अब इन खतों के माध्यम से तुम्हें क्या विरासत भेंट की गई है, यह तो मुझे भी नहीं मालूम. कम से कम जिस लिफाफे पर आज की तारीख अंकित है उसे तो खोल ही लो अब.’’

अपराजिता ने उस लिफाफे को उठा कर पहले दोनों आंखों से लगाया. फिर नजाकत के साथ लिफाफे को खोला तो उस में एक गुलाबी कागज मिला. कागज को आधाआधा कर के 2 मोड़ दे कर तह किया गया था. चंद पल अपराजिता की उंगलियां उस कागज पर यों ही फिसलती रहीं… नानी के स्पर्श के एहसास के लिए मचलती हुईं. जब भावनाओं का ज्वारभाटा कुछ थमा तो उस की निगाहें उस कागज पर लिखे शब्दों की स्कैनिंग करने लगीं:

डियर अप्पू

‘‘जीवन में नैतिक सद््गुणों का महत्त्व समझना बहुत जरूरी है. इन नैतिक सद्गुणों में सब से ऊंचा स्थान ‘क्षमा’ का है. माफ कर देना और माफी मांग लेना दोनों ही भावनात्मक चोटों पर मरहम का काम करते हैं. जख्मों पर माफी का लेप लग जाने से पीडि़त व्यक्ति शीघ्र सब भूल कर जीवनधारा के प्रवाह में बहने लगते हैं. वहीं माफ न कर के हताशा के बोझ में दबा व्यक्ति जीवनपर्यंत अवसाद से घिरा पुराने घावों को खुरचता हुआ पीड़ा का दामन थामे रहता है. जबकि वह जानता है कि वह इस मानअपमान की आग में जल कर दूसरे की गलती की सजा खुद को दे रहा है. ‘‘अप्पू मैं ने तुम्हें कई बार अपने मांबाप पर क्रोधित होते देखा है. तुम्हें गम रहा कि तुम्हारी परवरिश दूसरे सामान्य बच्चों जैसी नहीं हुई है. जहां बाप का जिंदगी में होना न होना बराबर था वही तुम्हारी मां ने जिंदगी के तूफानों से हार कर स्वयं अपनी जान ले ली और एक बार भी नहीं सोचा कि उस के बाद तुम्हारा क्या होगा… बेटा तुम्हारा कुढ़ना लाजिम है. तुम गलत नहीं हो. हां, अगर तुम इस क्रोध की ज्वाला में जल कर अपना मौजूदा और भावी जीवन बरबाद कर लेती हो तो गलती सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ही होगी. किसी दूसरे के किए की सजा खुद को देने में कहां की अक्लमंदी है?

‘‘मेरी बात को तसल्ली से बैठ कर समझने की चेष्टा करना और एकदम से न सही तो कम से कम अगले जन्मदिन तक धीरेधीरे उस पर अमल करने की कोशिश करना… बस यही तोहफा है मेरे पास तुम्हारे इस खास दिन पर तुम्हें देने के लिए. ‘‘ढेर सारा प्यार,’’

‘‘नानी.’’

वक्त तेजी से आगे बढ़ रहा था. अपराजिता अब इंजीनियरिंग के आखिरी साल में थी और अपनी इंटर्नशिप में मशगूल थी. वह जिस कंपनी में इंटर्नशिप कर रही थी, प्रतीक भी वहीं कार्यरत था. कम समय में ही दोनों में गहरी मित्रता हो गई.

बीते सालों में अपराजिता नानी से 18वें जन्मदिन पर मिले सौगाती खत को अनगिनत बार पढ़ा था. क्यों न पढ़ती. यह कोई मामूली खत नहीं था. भाववाहक था नानी का. अकसर सोचती कि काश नानी ने उस के हर दिन के लिए एक खत लिखा होता तो कुछ और ही मजा होता. नानी के लिखे 1-1 शब्द ने मन के जख्मों पर चंदन के लेप का काम किया था. उस आधे पन्ने के पत्र की अहमियत किसी ऐक्सपर्ट काउंसलर के साथ हुए 10 सैशन की काउंसलिंग के बराबर साबित हुई थी. अब अपराजिता के मस्तिष्क में बचपन में झेले सदमों के चलचित्रों की छवि धूमिल सी हो कर मिटने लगी थी. मम्मीपापा की बेमेल व कलहपूर्ण मैरिड लाइफ, पापा के जीवन में ‘वो’ की ऐंट्री और फिर रोजरोज की जिल्लत से खिन्न मम्मी का फांसी पर झूल कर जान दे देना… थरथर कांपती थी वह डरावने सपनों के चक्रवात में फंस कर. नानी के स्नेह की गरमी का लिहाफ उस की कंपकंपाहट को जरा भी कम नहीं कर पाया था.

नानी जब तक जिंदा रहीं लाख कोशिश करती रहीं उस की चेतना से गंभीर प्रतिबिंबों को मिटाने की, मगर जीतेजी उन्हें अपने प्रयासों में शिकस्त के अलावा कुछ हासिल न हुआ. शायद यही दुनिया का दस्तूर है कि हमें प्रियजनों के मशवरे की कीमत उन के जाने के बाद समझ में आती है.

प्रतीक और अपराजिता का परिचय अगले सोपान पर चढ़ने लगा था. बिना कुछ सोचे वह प्रतीक के रंग में रंग गई. कमाल की बात थी जहां इंटर्नशिप के दौरान प्रतीक उस के दिल में समाता जा रहा था तो दूसरी तरफ इंजीनियरिंग के पेशे से उस का दिल हटता जा रहा था. वह औफिस आती थी प्रतीक से मिलने की कामना में, अपने पेशे की पेचीदगियों में सिर खपाने के लिए नहीं. ट्रेनिंग बोझ लग रही थी उसे. अपने काम से इतनी ऊब होती थी कि वह औफिस आते ही लंचब्रेक का इंतजार करती और लंचब्रेक खत्म होने पर शाम के 5 बजने का. कुछ सहकर्मी तो उसे पीठ पीछे ‘क्लौक वाचर’ पुकारते थे.

जाहिर था कि अपराजिता ने प्रोफैशन चुनते समय अपने दिल की बात नहीं सुनी. मित्रों की देखादेखी एक भेड़चाल का हिस्सा बन गई. सब ने इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया तो उस ने भी ले लिया. उस ने जब अपनी उलझन प्रतीक से बयां की तो सपाट प्रतिक्रिया मिली, ‘‘अगर तुम्हें इस प्रोफैशन में दिलचस्पी नहीं अप्पू तो मुझे भी तुम में कोई रुचि नहीं.’’ ‘‘ऐसा न कहो प्रतीक… प्यार से कैसी शर्त?’’

‘‘शर्तें हर जगह लागू होती हैं अप्पू… कुदरत ने भी दिमाग का स्थान दिल से ऊपर रखा है. मुझे तो अपने लिए इंजीनियर जीवनसंगिनी ही चाहिए…’’ यह सुन कर अपराजिता होश खो बैठी थी. दिल आखिर दिल है, कहां तक खुद को संभाले… एक बार फिर किसी प्रियजन को खोने के कगार पर खड़ी थी. कैसे सहेगी वह ये सब? कैसे जूझेगी इन हालात से बिना कुछ गंवाए?

अगर वह प्रतीक की शर्त स्वीकार लेती है तो क्या उस कैरियर में जान डाल पाएगी जिस में उस का किंचित रुझान नहीं है? उस की एक तरफ कूआं तो दूसरी तरफ खाई थी, कूदना किस में है उसे पता न था.

अगले महीने फिर अपराजिता का खास जन्मदिन आने वाला था. खास इसलिए क्योंकि नानी ने अपने खत की सौगात छोड़ी थी इस दिन के लिए भी. बड़ी मुश्किल से दिन कट रहे थे… उस का धीरज छूट रहा था… जन्मदिन की सुबह का इंतजार करना भारी हो रहा था. बेसब्री उसे अपने आगोश में ले कर उस के चेतन पर हावी हो चुकी थी. अत: उस ने जन्मदिन की सुबह का इंतजार नहीं किया. जन्मदिन की पूर्वरात्रि पर जैसे ही घड़ी ने रात के 12 बजाए उस ने नानी के दूसरे नंबर के ‘लैगसी लैटर’ का लिफाफा खोल डाला.

लिखा था:

‘‘डियर अप्पू’’ ‘‘जल्दी तुम्हारी इंजीनियरिंग पूरी हो जाएगी. बहुत तमन्ना थी कि तुम्हें डिगरी लेते देखूं, मगर कुदरता को यह मंजूर न था. खैर, जो प्रारब्ध है, वह है… आओ कोई और बात करते हैं.’’

‘‘तुम ने कभी नहीं पूछा कि मैं ने तुम्हारा नाम अपराजिता क्यों रखा. जीतेजी मैं ने भी कभी बताने की जरूरत नहीं समझी. सोचती रही जब कोई बात चलेगी तो बता दूंगी. कमाल की बात है कि न कभी कोई जिक्र चला न ही मैं ने यह राज खोलने की जहमत उठाई. तुम्हारे 21वें जन्मदिन पर मैं यह राज खोलूंगी, आज के लिए इसी को मेरा तोहफा समझना. ‘‘हां, तो मैं कह रही थी कि मैं ने तुम्हें अपराजिता नाम क्यों दिया. असल में तुम्हारे पैदा होने के पहले मैं ने कई फीमेल नामों के बारे में सोचा, मगर उन में से ज्यादातर के अर्थ निकलते थे-कोमल, सुघड़, खूबसूरत वगैराहवगैराह. मैं नहीं चाहती थी कि तुम इन शब्दों का पर्याय बनो. ये पर्याय हम औरतों को कमजोर और बुजदिल बनाते हैं. कुछए की तरह एक कवच में सिमटने को मजबूर करते हैं. औरत एक शरीर के अलावा भी कुछ होती है.

‘‘तुम देवी बनने की कोशिश भी न करना और न ही किसी को ऐसा सोचने का हक देना. बस अपने सम्मान की रक्षा करते हुए इंसान बने रहने का हक न खोना. ‘‘मैं तुम्हें सुबह खिल कर शाम को बिखरते हुए नहीं देखना चाहती. मेरी आकांक्षा है कि तुम जीवन की हर परीक्षा में खरी उतरो. यही वजह थी कि मैं ने तुम्हें अपराजिता नाम दिया… अपराजिता अर्थात कभी न पराजित होने वाली. अपनी शिकस्त से सबक सीख कर आगे बढ़ो… शिकस्त को नासूर बना कर अनमोल जीवन को बरबाद मत करो. जिस काम के लिए मन गवाही न दे उसे कभी मत करो, वह कहते हैं न कि सांझ के मरे को कब तक रोएंगे.’’

‘‘बेटा, जीवन संघर्ष का ही दूसरा नाम है. मेरा विश्वास है तुम अपनी मां की तरह हौसला नहीं खोओगी. हार और जीत के बीच सिर्फ अंश भर का फासला होता है. तो फिर जिंदगी की हर जंग जीतने के लिए पूरा दम लगा कर क्यों न लड़ा जाएं.

‘‘बहुतबहुत प्यार’’ ‘‘नानी.’’

अपराजिता ने खत पढ़ कर वापस लिफाफे में रख दिया. रात का सन्नाटा गहराता जा रहा था, किंतु कुछ महीनों से जद्दोजहद का जो शिकंजा उस के दिलोदिमाग पर कसता जा रहा था उस की गिरफ्त अब ढीली होती जान पड़ रही थी. दूसरे दिन की सुबह बेहद दिलकश थी. रेशमी आसमान में बादलों के हाथीघोड़े से बनते प्रतीत हो रहे थे. चंद पल वह यों ही खिड़की से झांकती हुई आसमान में इन आकृतियों को बनतेबिगड़ते देखती रही. ऐसी ही आकृतियों को देखते हुए ही तो वह बचपन में मम्मी का हाथ पकड़ कर स्कूल से घर आती थी.

कल रात वाले लैगसी लैटर को पढ़ने के बाद से ही वह खुद में एक परिवर्तन महसूस कर रही थी… कहीं कोई मलाल न था कल रात से. वह जीवन को अपनी शर्तों पर जीने का निर्णय कर चुकी थी. औफिस जाने से पहले उस ने एक लंबा शावर लिया मानो कि अब तक के सभी गलत फैसलों व चिंताओं को पानी से धो कर मुक्ति पा लेना चाहती हो. प्रतीक के साथ औफिस कैंटीन में लंच लेते हुए उस ने अपना निर्णय उसे सुनाया, ‘‘प्रतीक मैं तुम्हें भुलाने का फैसला कर चुकी हूं, क्योंकि मेरी जिंदगी के रास्ते तुम से एकदम अलग हैं.’’

‘‘यह क्या पागलपन है? कौन से हैं तुम्हारे रास्ते… जरा मैं भी तो सुनूं?’’ प्रतीक कुछ बौखला सा गया. ‘‘लेखन, भाषा, साहित्य ये हैं मेरे शौक… किसी वजह से 4 साल पहले मैं ने गलत लाइन पकड़ ली, लेकिन इस का यह अर्थ कतई नहीं कि मैं इस गलती के साथ उम्र गुजार दूं या इस के बोझ से दब कर दूसरी गलती करूं… अगर मैं ने तुम से शादी की तो वह मेरी एक और भूल होगी क्योंकि सच्चा प्यार करने वाले सामने वाले को ज्यों का त्यों अपनाते हैं. उन्हें अपने सांचे में ढाल कर अपनी पसंद और अपने तरीके उन पर नहीं थोपते.’’

‘‘भेजा फिर गया है तुम्हारा… जो समझ में आए करो मेरी बला से.’’ तमतमाया प्रतीक लंच बीच में ही छोड़ कर तेजी से कैंटीन से बाहर निकल गया. अपराजिता ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. इत्मीनान से अपना लंच खत्म करने में मशगूल रही. अपराजिता हर संघर्ष से निबटने को तैयार थी. सच ही तो लिखा था नानी ने कि सांझ के

मरे को कब तक रोएंगे. गलत शादी, गलत कैरियर में फंस कर जिंदगी दारुण मोड़ पर ही चली जानी थी… वह इस अंधे मोड़ के पहले ही सतर्क हो गई. ‘‘अपराजिता नानी ने तुम्हारे लिए कुछ पैसा फिक्स डिपौजिट में रखवाया था. अब तक मैं इस पौलिसी को 2 बार रिन्यू करा चुकी हूं. पर सोचती हूं अब अपनी जिम्मेदारी तुम खुद उठाओ और यह रकम ले कर अपने तरीके से इनवैस्ट करो,’’ एक शाम मौसी ने कहा.

‘‘जैसा आप चाहो मौसी. अगर आप ऐसा चाहती हैं तो ठीक है.’’ अपराजिता अब काफी हद तक आत्मनिर्भर हो चुकी थी. अब तक उस के 2 उपन्यास छप चुके थे. एक पर उसे ‘बुकर प्राइज’ मिला था तो दूसरे उपन्यास ने भी इस साल सब से ज्यादा प्रतिलिपियां बिकने का कीर्तिमान स्थापित किया. अब उसे खुद के नीड़ की तलाश थी. मौसी के प्रति वह कृतज्ञ थी पर उम्रभर उन पर निर्भर रहने का उस का इरादा न था.

बहुत दिन हो चुके थे उसे लेखनसाधना में खोए हुए. कुछ सालों से वह सिर से पांव तक काम में इतना डूबी रही कि स्वयं को पूरी तरह नजरअंदाज कर बैठी थी. इस बार उस ने 21वें जन्मदिन पर खुद को ट्रीट देने का फैसला किया. तमाम टूअर पैकेजेस देखनेसमझने के बाद उसे कुल्लूमनाली का विकल्प पसंद आ गया. कुछ दिन बस खुद के लिए… कहीं बिलकुल अलग कोलाहल से दूर. साथ में होगा तो बस नानी का 21वें जन्मदिन के लिए लिखा गया सौगाती खत :

‘‘डियर अप्पू ‘‘अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा आंसुओं में डुबोने के बाद मैं ने जाना कि 2 प्रकार के व्यक्तियों से कोई संबंध न रखो- मूर्ख और दुष्ट. इस श्रेणी के लोगों को न तो कुछ समझाने की चेष्टा करो न ही उन से कोई तर्कवितर्क करो. मानो या न मानो तुम उन से कभी नहीं जीत पाओगी.

‘‘ऐसे आदमी से नाता न जोड़ो जिस की पहली, दूसरी, तीसरी और आखिरी प्राथमिकता वह खुद हो. ऐसे व्यक्तियों के जीवन के शब्दकोश में ‘मैं’ सर्वनाम के अतिरिक्त कोई दूसरा लफ्ज ही नहीं होता. अहं के अंकुर से अवसाद का वटवृक्ष पनपता है. अहं से मदहोश व्यक्ति अपने शब्द और अपनी सोच को अपने आसपास के लोगों पर एक कानून की तरह लागू करना चाहता है. ऐसों से नाता जुड़ने के बाद दूसरों को रोज बिखर कर खुद को रोज समेटना पड़ता है. तब कहीं जा कर जीवननैया किनारे लग पाती है उन की. ‘‘जोड़े तो ऊपर से बन कर आते हैं जमीं पर तो सिर्फ उन का मिलन होता है, यह निराधार थ्योरी गलत शादी में फंस के दिल को समझाने के लिए अच्छी है, किंतु मैं जानती हूं तुम्हारे जैसी बुद्धिजीवी कोरी मान्यताओं को बिना तार्किक सत्यता के स्वीकार नहीं कर सकती. न ही मैं तुम से ऐसी कोई उम्मीद करती हूं.

‘‘बेटा मेरी खुशी तो इस में होगी कि तुम वे बेडि़यां तोड़ने की हिम्मत रखो जिन का मंगलसूत्र पहन कर तुम्हारी मां की सांसें घुटती रहीं और आखिर में वही मंगलसूत्र उस के गले का फंदा बन कर उस की जान ले गया. ‘‘तुम्हारा बाप तुम्हारी मां की जिंदगी में था, मगर उस के अकेलेपन को बढ़ाने के लिए.

डियर अप्पू शादी का सीधा संबंध भावनात्मक जुड़ाव से होता है. जब यह भावनात्मक बंधन ही न हो तो वह शादी खुदबखुद अमान्य हो जाती है… ऐसी शादियां और कुछ भी नहीं बस सामाजिकता की मुहर लगा हुआ बलात्कार मात्र होती हैं. यह कैसा गठबंधन जहां सांसें भी दूसरों की मरजी से लेनी पड़ें? ‘‘अगर हालातवश ऐेसे रिश्तों में कभी फंस भी जाओ तो अपने आसपास उग आई अवांछित रिश्तों की नागफनियों को काटने का साहस भी रखो अन्यथा ये नागफनियां तुम्हारे पांव को लहूलुहान कर के तुम्हारी ऊंची कुलांचें लेने की शक्ति खत्म कर देंगी, साथ ही तुम्हें जीवन भर के लिए मानसिक तौर पर पंगू बना देंगी.

‘‘ढेर सा प्यार ‘‘तुम्हारी नानी.’’

कुल्लू की वादियों में झरने के किनारे एक चट्टान पर बैठी अपराजिता की आंखों से अचानक आंसू झरने लगे. जाने क्यों आज प्रतीक की याद आ रही थी. शायद यह इन शोख नजारों का असर था कि मन मचलने लगा था किसी के सान्निध्य के लिए. नामपैसा कमा कर भी वह कितनी अकेली थी… या फिर यह अकेलापन उस की सोच का खेल था? वह अकेली कहां थी. उस के साथ थे हजारोंलाखों प्रसंशक. क्यों याद कर रही है वह प्रतीक को… क्यों चाहिए था उसे किसी मर्द का संबल? ऐसा क्या था जो वह खुद नहीं कर पाई? क्या प्रतीक भी उस के बारे में सोचता होगा? ऐसा होता तो वह 10 साल पहले ही उसे ठोकर न मार गया होता. दोष क्या था उस का? सिर्फ इतना कि वह इंजीनियरिंग नहीं लेखन में आगे बढ़ना चाहती थी. ‘‘कौन जानता है प्रतीक को आज की तारीख में?

वहीं वह खुद लेखन के क्षेत्र का प्रमुख हस्ताक्षर बन कर शोहरत का पर्यात बन चुकी थी. बड़ा गुमान था प्रतीक को अपने काबिल इंजीनियर होने पर… लकीर का फकीर कहीं का. मध्यवर्गीय मानसिकता का शिकार… जिन्हें सिर्फ इंजीनियरिंग और कुछ दूसरे इसी तरह के प्रोफैशन ही समझ में आते हैं. लेखन, संगीत और आर्ट उन की सोच से परे की बातें होती हैं. नहीं चाहिए था उसे दिखावे का हीरो अपनी जिंदगी में. रही बात अकेलेपन की तो राहें और भी थी. उस ने निश्चित किया कि वह दिल्ली लौट कर किसी अनाथ बच्ची को अपना लेगी… गोद ले कर उसे अपना उत्तराधिकारी… अपने सूने आंगन की खुशबू बना लेगी.

खुशबू को अपराजिता के आंगन में महकते हुए करीब 10 साल हो गए थे. जिस दिन अपराजिता किसी बच्चे की तलाश में अनाथाश्रम पहुंची थी तो उस 4-5 साल की पोलियोग्रस्त बच्ची की याचक दृष्टि उस के दिल को भीतर तक भेद गई थी. उस रात आंखों से नींद की जंग चलती रही थी. सारी रात करवटें लेतेलेते बदन थक गया था. दूसरे दिन बिना विलंब किए अनाथाश्रम पहुंच गई अपराजिता जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए. अगले कुछ महीनों तक गंभीर कागजी कार्यवाही को पूरा करने के बाद वह कानूनी तौर पर खुशबू को अपनी बेटी का दर्जा देने में कामयाब हो गई. हैरान रह गई थी अपराजिता दुनिया का चलन देख कर तब. किसी ने छींटाकशी की कि उस का दिमाग खराब हो गया है जो वह यह फालतू का काम कर रही है.

किसी ने यहां तक कह दिया कि यदि वह एक संस्कारित, खानदानी परिवार का खून होती तो मर्यादा में रह कर शादी कर के अपने बालबच्चे पाल रही होती. कुछ और लोगों के ऐक्सपर्ट कमैंट थे कि वह शोहरत पाने की लालसा में यह सब कर रही है. मात्र उंगलियों पर गिनने लायक ही लोग थे, जिन्होंने उस के इस कदम की दिल से सराहना की थी.

खैर, कोई बात नहीं. नेकी और बदी की जंग का दस्तूर जहां में सदियों पुराना है. बरसों के लंबे इलाज और फिजियोथेरैपी सैशंस के बाद खुशबू काफी हद तक स्वस्थ हो गई थी. गजब का आत्मविश्वास था उस में. उस की हर पेंटिंग में जीवन रमता था. वह हर समय इंद्रधनुषी रंग कैनवस पर बिखेरती हुई उमंगों से भरपूर खूबसूरत चित्र बनाती. शरीर की विकलांगता, अनाथाश्रम में बीता कोमल बचपन दोनों उस की उमंगों के वेग को बांध न सके थे.

खुशबू के प्रयासों की महक से अपराजिता की जीत का मान बढ़ता ही चला गया. अपनी शर्तों पर नेकी के साथ जिंदगी जीते हुए दोनों जहां की खुशियां पा ली थीं अपराजिता ने और अपने नाम को सार्थक कर दिखाया था. आज रात वह अपना 50वां जन्मदिन मनाने वाली थी नानी के आखिरी ‘सौगाती खत’ को खोल कर.

‘‘डियर अप्पू

तुम अब तक उम्र के 50 वसंत देख चुकी होगी और अपने रिटायरमैंट में स्थिर होने की सोच रही होगी. यह वह उम्र है जिसे जीने का मौका तुम्हारी मां को कुदरत ने नहीं दिया था. इसलिए मुबारक हो… बेटा वक्त तुम पर हमेशा मेहरबान रहे. ‘‘तुम्हारे मन में शायद अध्यात्म और तीर्थ के ख्याल भी आते होंगे. ऐसे ख्याल कई बार स्वेच्छा अनुसार आते हैं और कई बार इस दिशा में दूसरों के दबाव में भी सोचना पड़ता है. विशेषतौर पर महिलाओं से इस तरह की अपेक्षा जरूर की जाती है कि उन का आचरण पूर्णतया धार्मिक हो. यों तो धर्म एक बहुत ही व्यक्तिगत मामला है फिर भी धर्म में रुचि न रखने वाली स्त्रियों पर असंस्कारित होने की मुहर लगा दी जाती है.

‘‘मैं तुम से कहूंगी कि ये सब बकवास है. मैं ने अपने जीवन में अनेक ऐसे महात्मा, मुल्ला और पादरियों के बारे में पढ़ा और सुना है जो धर्म की आड़ में हर तरह के घृणित कृत्य करते हैं और दूसरों के बूते पर ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं. ‘‘ज्यादा दूर क्यों जाए मैं ने तो स्वयं तुम्हारे नाना को ये सब पाखंड करते देखा है. उन्होंने हवन, जप, मंत्र करने में पूरी उम्र तो बिताई पर उस के सार के एक अंश को कभी जीवन में नहीं उतारा. दूसरों को प्रताड़ना देना ही उन के जीवन का एकमात्र उद्देश्य और उपलब्धि था. अब तुम ही बताओ यह कैसा पूजापाठ और कर्मकांड जिस में आडंबर करने वाले के स्वयं के कर्म और कांड ही सही नहीं हैं.

‘‘तो डियर अप्पू कहने का सार मेरा यह है कि धर्म, पूजापाठ कभी भी मन की शुद्धता के प्रमाण नहीं होते. मन की शुद्धता होती है अच्छे कर्मों में, अपने से कमजोर का संबल बनने में, बाकी सब तो तुम्हारे अपने ऊपर है, पर एक वचन मैं भी तुम से लेना चाहूंगी और मुझे पूरा भरोसा है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी. ‘‘बेटी यह शरीर नश्वर है, जो भी दुनिया में आया है उसे जाना ही है. इस शरीर का महत्त्व तभी तक है जब तक इस में जान है. जान निकलने के बाद खूबसूरत से खूबसूरत जिस्म भी इतना वीभत्स लगता है कि मृतक के परिजन भी उसे छूने से डरते हैं. जीतेजी हम दुनिया के फेर में इस कदर फंसे होते हैं कि कई बार चाह कर भी कुछ अच्छा नहीं कर पाते. मौत में हम सारी बंदिशों से आजाद हो जाते हैं, तो फिर क्यों न कुछ इंसानियत का काम कर जाएं और दूसरों को भी इंसान बनने का हुनर सिखा जाएं?

‘‘डियर अप्पू, संक्षेप में मेरी बात का अर्थ है कि जैसे मैं ने किया था वैसे ही तुम भी मेरी तरह मृत्यु के बाद अंगदान की औपचारिकताएं पूरी कर देना. मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे 50वें जन्मदिन को मनाने का इस से श्रेष्ठतर तरीका कोई और हो सकता है. ‘‘बस आज के लिए इतना ही अप्पू… तबीयत आज कुछ ज्यादा ही नासाज है. ज्यादा लिखने की हिम्मत नहीं हो रही… लगता है अब जान निकलने ही वाली है. कोशिश करूंगी, मगर फिलहाल तो ऐसा ही महसूस हो रहा है कि यह मेरा आखिरी खत होगा तुम्हारे लिए.

‘‘सदा सुखी रहो मेरी बच्ची. ‘‘नानी.’’

अपराजिता ने पत्र को सहेज कर सुनहरे रंग के कार्डबोर्ड बौक्स में नानी के अन्य पत्रों के साथ रख दिया. इन सभी पत्रों को आबद्ध करा के वह खुशबू के अठारवें जन्मदिन पर भेंट करेगी. अपराजिता अब तक एक बहुत ही सफल लेखिका थी. उस के लिखे उपन्यासों पर कई दूरदर्शन चैनल धारावाहिक बना चुके थे. ट्राफी और अवार्ड्स से उस के ड्राइंगरूम का शोकेस पूरी तरह भर चुका था. रेडियो, टेलीविजन पर उस के कितने ही इंटरव्यू प्रसारित हो चुके थे. देशभर की पत्रपत्रिकाएं भी उस के इंटरव्यू छापने का गौरव ले चुकी थीं.

इन सभी साक्षात्कारों में एक प्रश्न हमेशा पूछा गया कि अपनी लिखी किताबों में उस की पसंदीदा किताब कौन सी है और इस सवाल का एक ही जवाब उस ने हमेशा दिया था, ‘‘मेरी नानी के लिखे ‘विरासती खत’ ही मेरे जीवन की पसंदीदा किताब है और मेरी इच्छा है कि मैं अपनी बेटी के लिए भी ऐसी ही विरासत छोड़ कर जाऊं जो कमजोर पलों में उस का उत्साहवर्द्धन कर उस का जीवनपथ सुगम बनाए. वह लकीर की फकीर न बन कर अपनी एक स्वतंत्र सोच का विकास करे.’’

Story In Hindi : काश, मेरी बेटी होती

Story In Hindi : ‘‘यार तू बड़ी खुशनसीब है, तेरी बेटी है,’’ शोभा बोली, ‘‘बेटियां मातापिता का दुखदर्द हृदय से महसूस करती हैं.’’‘‘नहीं यार, मत पूछ, आजकल की बेटियों के हाल. वे हमारे समय की बेटियां होती थीं जो मातापिता, विशेषकर मां, का दुखदर्द शिद्दत से महसूस करती थीं. आजकल की बेटियां तो मातापिता का सिरदर्द बन कर बेटों से होड़ लेती प्रतीत होती हैं. तेरी बेटी नहीं है न, इसलिए कह रही है ऐसा,’’ एक बेटी की मां जयंति बोली, ‘‘बेटी से अच्छी आजकल बहू होती है. बेटी तो हर बात पर मुंहतोड़ जवाब देती है, पर बहू दिल ही दिल में भले ही बड़बड़ाए, पर सामने फिर भी लिहाज करती है, कहना सुन लेती है.’’

‘‘आजकल की बहुओं से लिहाज की उम्मीद करना… तौबातौबा. मुंह से कुछ नहीं बोलेंगी, पर हावभाव व आंखों से बहुतकुछ जता देंगी, रक्षा ने जयंति का प्रतिवाद करते हुए कहा, ‘‘जिन बेटियों का तू अभीअभी गुणगान कर रही थी, आखिर वही तो बहुएं बनती हैं, ऊपर से थोड़े ही न उतर आती हैं. ऐसा नाकों चने चबवाती हैं आजकल की बहुएं, बस, अंदर ही अंदर दिल मसोस कर रह जाओ. बेटे पर ज्यादा हक नहीं जता सकते, वरना बहू उसे ‘मां का लाड़ला’ कहने से नहीं चूकेगी.’’

शोभा दोनों की बातें मुसकराती हुई सुन रही थी. एक लंबा निश्वास छोड़ती हुई बोली, ‘‘अब मैं क्या जानूं कि बेटियां कैसी होती हैं और बहू कैसी. न मेरी बेटी, न बहू. पता नहीं मेरा नखरेबाज बेटा कब शादी के लिए हां बोलेगा, कब मैं लड़की खोजूंगी, कब शादी होगी और कब मेरी बहू होगी. अभी तो कोई सूरत नजर नहीं आती मेरे सास बनने की.’’

‘‘जब तक नहीं आती तब तक मस्ती मार,’’ रक्षा और जयंति हंसती हुई बोलीं, ‘‘गोल्डन टाइम चल रहा है तेरा. सुना नहीं, पुरानी कहावत है, पहन ले जब तक बेटी नहीं हुई, खा ले जब तक बहू नहीं आई. इसलिए हमारा खानापहनना तो छूट गया. पर तेरा अभी समय है बेटा. डांस पर चांस मार ले, मस्ती कर, पति के साथ घूमने जा, पिक्चरें देख, कैंडिललाइट डिनर कर, वगैरहवगैरह. बाद में नातीपोते खिलाने पड़ेंगे और बच्चों से कहना पड़ेगा, ‘जाओ घूम आओ, हम तो बहुत घूमे अपने जमाने में’ तो दिल तो दुखेगा न,’’ कह कर तीनों सहेलियां व पड़ोसिनें खिलखिला कर हंस पड़ीं और शोभा के घर से उन की सभा बरखास्त हो गई.

रक्षा, जयंति व शोभा तीनों पड़ोसिनें व अभिन्न सहेलियां थीं. उम्र थोड़ाबहुत ऊपरनीचे होने पर भी तीनों का आपसी तारतम्य बहुत अच्छा था. हर सुखदुख में एकदूसरे के काम आतीं. होली पर गुजिया बनाने से ले कर दीवाली की खरीदारी तक तीनों साथ करतीं. तीनों एकदूसरे की राजदार भी थीं और लगभग 15 वर्षों पहले जब उन के बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे थे. थोड़ा आगेपीछे तीनों के घर इस कालोनी में बने थे.

तीनों ही अच्छी शिक्षित महिलाएं थीं और इस समय अपने फिफ्टीज के दौर से गुजर रही थीं. जिस के पास जो था उस से असंतुष्ट और जो नहीं था उस के लिए मनभावन कल्पनाओं का पिटारा उन के दिमाग में अकसर खुला रहता.

लेकिन जो है उस से संतुष्ट रहने की तीनों ही नहीं सोचतीं. नहीं सोच पातीं जो उन्हें नियति ने दिया है कि उसे किस तरह से खूबसूरत बनाया जाए.

जयंति की एक बेटी थी जो कालेज के फाइनल ईयर में थी. रक्षा ने एक साल पहले बेटे का विवाह किया था और शोभा का बेटा इंजीनियर व प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत एक नखरेबाज युवा था. वह मां के मुंह से विवाह का नाम सुन कर नाकभौं सिकोड़ता और ऐसा दिखाता जैसे विवाह करना व बच्चे पैदा करना सब से निकृष्ठ कार्य एवं प्राचीन विचारधारा है और उस के जीवन के सब से आखिरी पायदान पर है. एक तरह से जब सब निबट जाएगा तो यह कार्य भी कर लेगा.

जयंति को अपनी युवा बेटी से ढेरों शिकायतें थीं, ‘घर के कामकाज को तो हाथ भी नहीं लगाती यह लड़की. कुछ बोलो तो काट खाने को दौड़ती है. कल को शादीब्याह होगा, तो क्या सास बना कर इसे खिलाएगी.’ जयंति पति के सामने बड़बड़ा रही होती. अपनी किताबों पर नजरें गड़ाए बेटी मां के ताने सुन कर बिफर जाती, ‘फिक्र मत करो, मु झे खाना बना कर कोई भी खिलाए. आप को तंग करने नहीं आऊंगी.’

बेटी तक आवाज पहुंच रही थी. बेवक्त  झगड़े की आशंका से जयंति हड़बड़ा कर चुप हो जाती. पर बेटी का पारा दिल ही दिल में आसमां छू जाता. वह जब टाइट जीन्स और टाइट टीशर्ट डाल कर कालेज या कोचिंग के लिए निकलती तो जयंति का दिल करता कि जीन्स के ऊपर भी उस के गले में दुपट्टा लपेट दे. पर मन मसोस कर रह जाती. घर में जब बेटी शौर्ट्स पहन कर पापा के सामने मजे से सोफे पर अधलेटी हो टीवी के चैनल बदलने लगती तो जयंति का दिमाग भन्ना जाता, ‘आग लगा दे इस लड़की के कपड़ों की अलमारी को’ और उस के दोस्त लड़के जब घर आते तो वह एकएक का चेहरा बड़े ध्यान से पढ़ती. न जाने इन में से कल कौन उस का दामाद बनने का दावा ठोक बैठे.

रोजरोज घर को सिर पर उठा मां से  झगड़ा करने वाली बेटी ने जब एक दिन प्यार से मां के गले में बांहें डालीं तो किसी अनहोनी की आशंका से जयंति का हृदय कांप गया. जरूर कोई कठिन मांग पूरी करने का वक्त आ गया है.

‘‘मम्मी, मेरे कुछ फ्रैंड्स कल लंच पर आना चाह रहे हैं. मैं ने उन्हें बताया है कि आप चाइनीज खाना कितना अच्छा बनाती हैं. बुला लूं न सब को?’’ वह मासूमियत से बोली. बेटी की भोलीभाली शक्ल देख कर जयंति का सारा लाड़दुलार छलक आया.

‘‘हांहां, बुला ले अपनी सहेलियों को. बना दूंगी मैं, कितनी हैं?’’‘‘मु झे मिला कर 8 दोस्त हो जाएंगे मम्मी. वे सारा दिन यहीं बिताने वाले हैं…’’ बेटी आने वालों के लिए गोलमाल जैंडर शब्द का इस्तेमाल करती हुई बोली. ‘‘ठीक है…’’

दूसरे दिन जयंति सुबह से बेटी की फरमाइश पूरी करने में लग गई. घर भी ठीक कर दिया. बेटी ने बाकी घर पर ध्यान भी नहीं दिया. सिर्फ अपना कमरा ठीक किया. ठीक 11 बजे घंटी बजी. दरवाजा खोला तो जयंति गिरतेगिरते बची. आगंतुकों में 4 लड़के थे और 3 लड़कियां. जिन लड़कों को वह थोड़ी देर भी नहीं पचा पाती थी, उन्हें उस दिन उस ने पूरा दिन  झेला और वह भी बेटी के कमरे में. आठों बच्चों ने वहीं खायापिया, वहीं हंगामा किया और खापी कर बरतन बाहर खिसका दिए. जयंति थक कर पस्त हो गई.

बेटी फोन पर जब खिलखिला कर चमकती आंखों से लंबीलंबी बातें करती तो जयंति का दिल करता उस के हाथ से फोन छीन कर जमीन पर पटक दे. फोन से तो उसे सख्त नफरत हो गई थी. मोबाइल फोन के आविष्कारक मार्टिन कूपर को तो वह सपने में न जाने कितनी बार गोली मार चुकी थी. सारे  झगड़े की जड़ है यह मोबाइल फोन.

बेटी कभी अपने दोस्तों के साथ पिकनिक पर जाती तो कभी लौंगड्राइव पर. हां, इन मस्तियों के साथ एक बात जो उन सभी युवाओं में वह स्पष्ट रूप से देखती, वह थी अपने भविष्य के प्रति सजगता. लड़के तो थे ही, पर लड़कियां उन से अधिक थीं. अपना कैरियर बनाने के लिए उन्मुख उन लड़कियों के सामने उन की मंजिल स्पष्ट थी और वे उस के लिए प्रयासरत थीं. घरगृहस्थी के काम, विवाह आदि के बारे में तो वे बात भी न करतीं, न उन्हें कोई दिलचस्पी थी.

जयंति जब इन युवा लड़कियों की तुलना अपने समय की लड़कियों से करती तो पसोपेश में पड़ जाती. उस का जमाना भी तो कोई बहुत अधिक पुराना नहीं था पर कितना बदल गया है. लड़कियों की जिंदगी का उद्देश्य ही बदल गया. कभी लगता उस का खुद का जमाना ठीक था, कभी लगता इन का जमाना अधिक सही है. लड़केलड़कियों की सहज दोस्ती के कारण इस उम्र में आए स्वाभाविक संवेगआवेग इसी उम्र में खत्म हो जाते हैं और बच्चे उन की पीढ़ी की अपेक्षा अधिक प्रैक्टिकल हो जाते हैं.

पर फिर दिमागधारा दूसरी तरफ मुड़ जाती और वह शोभा व रक्षा के सामने अपनी बेटी को ले कर अपना रोना रोती रहती, उस के भविष्य को ले कर निराधार काल्पनिक आशंकाएं जताती रहती.

उधर, रक्षा की बहू भी तो कोई पुरानी फिल्मों की नायिका न थी. आखिर जयंति की बेटी जैसी ही एक लड़की रक्षा की बहू बन कर घर आ गई थी. अभी एक ही साल हुआ था विवाह हुए, इसलिए गृहस्थी के कार्य में वह बिलकुल अनगढ़ थी. हां, बेटाबहू दोनों एकदूसरे के प्यार में डूबे रहते. सुबह देर से उठते. बेटा भागदौड़ कर तैयार होता, मां का बनाया नाश्ता करता और औफिस की तरफ दौड़ लगा देता. थोड़ी देर बाद बहू भी चेहरे पर मीठी मुसकान लिए तैयार हो कर बाहर आती और रक्षा उसे भी नाश्ते की प्लेट पकड़ा देती. बहू के चेहरे पर दूरदूर तक कोई अपराधबोध न होता कि उसे थोड़ा जल्दी उठ कर काम में सास का हाथ बंटाना चाहिए था. इतना तो उस के दिमाग में भी न आता.

रक्षा सोचती, ‘‘चलो सुबह न सही, अब लंच और डिनर में बहू कुछ मदद कर देगी. पर नाश्ते के बाद बहू आराम से लैपटौप सामने खींचती और डाइनिंग टेबल पर बैठ कर नैट पर अपने लिए नौकरी ढूंढ़ने में व्यस्त हो जाती. वह अपनी लगीलगाई नौकरी छोड़ कर आई थी, इसलिए अब यहां पर नौकरी ढूंढ़ रही थी.

पायल छनकाती बहू का ख्वाब देखने वाली रक्षा का वह सपना तो ढेर हो चुका था. बहू के वैस्टर्न कपड़े पचाने बहुत भारी पड़ते थे. शुरूशुरू में आसपड़ोस की चिंता रहती थी, पर किसी ने कुछ न कहा. सभी अधेड़ तो इस दौर से गुजर रहे थे. वे इस नई पीढ़ी को अपनी पुरानी नजरों से देखपरख रहे थे. बेटा शाम को औफिस से आता तो रक्षा सोचती कि बहू उन के लिए न सही, अपने पति के लिए ही चाय बना दे. पर बेटा जो कमरे में घुसता, तो गायब हो जाता. कभी दोनों तैयार हो कर बाहर आते, ‘मम्मी, हम बाहर जा रहे हैं. खाना खा कर आएंगे.’ उस के उत्तर का इंतजार किए बिना वे निकल जाते और रक्षा इतनी देर से मेहनत कर बनाए खाने को घूरती रह जाती, ‘पहले नहीं बता सकते थे.’’

बेटे के विवाह के बाद उस का काम बहुत बढ़ गया था. आई तो एक बहू ही थी पर उस के साथ एक नया रिश्ता आया था, रिश्तेदार आए थे. जिन को सहेजने में उस की ऐसी की तैसी हो जाती थी. बेटेबहू के अनियमित व अचानक बने प्रोग्रामों की वजह से उस की खुद की दिनचर्या अनियमित हो रही थी. अच्छी मां व सास बनने के चक्कर में वह पिस रही थी. बच्चों की हमेशा बेसिरपैर की दिनचर्या देख कर उस ने बच्चों को घर की एक चाबी ही पकड़ा दी कि वे जब भी कहीं जाएं तो चाबी साथ ले कर जाएं. क्योंकि उन की वजह से वे दोनों कहीं नहीं जा पाते. रसोई में मदद के लिए एक कामवाली का इंतजाम किया. तब जा कर थोड़ी समस्या सुल झी. अब बहू को नौकरी मिल गई थी. सो, वह भी बेटे के साथ घर से निकल जाती और उस से थोड़ी देर पहले ही घर आती व सीधे अपने कमरे में घुस कर आराम करती.

रक्षा सोचती, ‘मजे हैं आजकल की लड़कियों के. शादी से पहले भी अपनी मरजी की जिंदगी जीती हैं और बाद में भी. एक उस की पीढ़ी थी, पहले मांबाप का डर, बाद में सासससुर और पति का डर और अब बेटेबहू का डर. आखिर अपनी जिंदगी कब जी हमारी पीढ़ी ने?’ रक्षा की सोच भी जयंति की तरह नईपुरानी पीढ़ी के बीच  झूलती रहती. कभी अपनी पीढ़ी सही लगती, कभी आज की.

उन की खुद की पीढ़ी ने तो विवाह से पहले मातापिता की भी मौका पड़ने पर जरूरत पूरी की. संस्कारी बहू रही तो ससुराल में सासससुर के अलावा बाकी परिवार की भी साजसंभाल की और अब बहूबेटों के लिए भी कर रहे हैं. कल इन के बच्चे भी पालने पड़ेंगे.

शिक्षित रक्षा सोचती, आखिर महिला सशक्तीकरण का युग इसी पीढ़ी के हिस्से आया है. पर उन की पीढ़ी की महिलाएं कब इस सशक्तीकरण का हिस्सा बनेंगी जिन पर पति नाम के जीव ने भी पूरा शासन किया, रुपए भी गिन कर दिए, जबकि, खुद ने अच्छाखासा कमा लाने लायक शिक्षा अर्जित की थी.

‘‘कैसा महिला सशक्तीकरण?’’ वह आश्चर्य से कहती और जयंति व शोभा के आगे बड़बड़ा कर अपनी भड़ास निकालती. उस की यह विचारधारा उन दोनों शिक्षित महिलाओं को भी प्रभावित करती, पर बाहरी तौर पर. क्योंकि, वे सीधीतौर पर तीसरी पीढ़ी से अभी प्रभावित नहीं हो रही थीं. पर शोभा उन दोनों के अनुभव सुनसुन कर बहू के बारे में तरहतरह के पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो बैठी थी.

पहले तो बेटा ही इतना नखरेबाज था, ऊपर से बहू न जाने कैसी हो. बहू की मनभावन काल्पनिक तसवीर उस ने अपने मस्तिष्क के कैनवास से पूरी तरह मिटा दी थी. रक्षा ठीक कहती है, आजकल की ऐसी बिगड़ैल बेटियां ही तो बहुएं बन रही हैं. आखिर, ऊपर से थोड़े ही न उतरेंगी. उस का वर्षों का मासूम सा सपना भी दिल ही दिल में दम तोड़ चुका था. जब वह सोचा करती थी कि काश, उस की भी बेटी होती. बेटी तो नहीं हुई पर बड़े होते बेटे को देख कर वह नन्हा सा ख्वाब पालने लगी थी कि उस की प्यारी सी बहू आएगी और उस का वर्षों का बेटी का सपना पूरा हो जाएगा. पर रक्षा की बातों से उस ने यह उम्मीद भी छोड़ दी थी.

अब वह मन ही मन हर आने वाले संकट के लिए तैयार हो गई थी. वह उम्र में उन दोनों से थोड़ी छोटी थी. पति की अच्छी आय के चलते उस का घर भी उन दोनों से बड़ा था. उस ने सोच लिया था कि बहू के साथ ज्यादा मुश्किल हुई तो बेटेबहू को ऊपर के पोर्शन में शिफ्ट कर देगी. रक्षा सही कहती है हमारे लिए महिला सशक्तीकरण के माने कब आकार लेगा.

बेटे ने 31वें साल में कदम रख दिया था. अब वह भी चाह रही थी कि बेटे का विवाह कर वह अपनी जिम्मेदारियों से निवृत्त हो जाए. शोभा के पति सुकेश भी सोचते थे कि उन के रिटायरमैंट से पहले बेटे का विवाह निबट जाए तो अच्छा है. पर जैसे ही बेटे से विवाह की बात छेड़ते, बेटा बहाने बना कर उठ खड़ा होता. जब भी किसी रिश्ते के बारे में बात चलती, बेटा हवा में उड़ा देता. जब भी किसी लड़की की तसवीर दिखाई जाती तो परे खिसका देता. यह देखतेदेखते एक दिन वह उखड़ ही गई, ‘‘ऐसा कब तक चलेगा ऋषभ? कब तक शादी नहीं करेगा तू?’’

‘‘अभी जल्दी क्या है मम्मी? आप तो, बस, शादी के पीछे ही पड़ जाते हो,’’ वह उठते हुए बोला. ‘‘मैं तु झे आज उठने नहीं दूंगी. 30 साल का हो गया, अभी शादी की उम्र नहीं हुई, तो कब होगी?’’

‘‘मम्मी. यह आप की ढूंढ़ी लड़कियां आखिर मु झे क्या पता कि ये कैसी हैं. एकदो मुलाकातों में किसी के बारे में कुछ पता थोड़े ही न चलता है.’’ ‘‘तो फिर कैसे देखेगा तू लड़की?’’

‘‘मैं जब तक लड़की को 2-4 साल देखपरख न लूं, हां नहीं बोल सकता.’’ ‘‘क्या मतलब?’’ शोभा आश्चर्यचकित हो बोली. ‘‘मतलब साफ है, मैं अरैंज्ड मैरिज नहीं करूंगा.’’

‘‘तो क्या तू ने कोई लड़की पसंद की हुई है?’’ ऋषभ बिना जवाब दिए अपने कमरे में चला गया. शोभा उस के पीछेपीछे दौड़ी, ‘‘बोल ऋषभ, तू ने कोई लड़की पसंद की हुई है?’’

‘‘हां.’’ ‘‘तो फिर बताता क्यों नहीं, इतने दिनों से हमें बेवकूफ बना रहा है.’’ ‘‘बेवकूफ नहीं बना रहा हूं. बता इसलिए नहीं रहा था कि मेरी पसंद को आप लोग पसंद कर पाओगे या नहीं.’’

‘‘तेरी पसंद अच्छी होगी तो क्यों नहीं पसंद करेंगे. पर तू विस्तार से बताएगा उस के बारे में.’’ ‘‘क्या सुनना है आप को? लड़की सुंदर है, शिक्षित है. मेरी तरह इंजीनियर है. ठीकठाक सा परिवार है पर…’’‘‘पर क्या?’’

‘‘अगर आप के शब्दों में कहूं तो वह छोटी जाति की है. उसी जाति की जिन जातियों के आरक्षण का मुद्दा हमेशा चर्चा का विषय बना रहता है और जिन जातियों पर देश की राजनीति हमेशा गरम रहती है और पापा का ब्राह्मणवाद… वह तो घर के नौकरचाकरों तक पर हावी रहता है. वे तो चाहते हैं कि घर में नौकर भी हो तो ब्राह्मण हो. ऐसी स्थिति में…? और मैं कहीं दूसरी जगह शादी कर नहीं सकता. इसलिए आप मेरी शादी की बात तो भूल ही जाओ.’’

शोभा का मुंह खुला का खुला रह गया. उस की स्थिति देख कर ऋषभ परिहास सा करता हुआ बोला, ‘‘इसीलिए कहता हूं मु झे ही बेटा व बहू दोनों सम झ लो और मस्त रहो,’’ कह कर वह कमरे से बाहर चला गया.

शोभा जड़ खड़ी रह गई. रक्षा और जयंति के बच्चों ने तो उन का सुखचैन ही छीना था पर उस के बेटे ने तो उसे जीतेजी ही मार दिया. घर से भी साधारण और जाति से भी छोटी. जिस लड़की के आने से पहले ही दिल में फांस चुभ गई हो, दिलों में दीवार खड़ी होने की पूरी संभावना पैदा हो गई. उस के घर में आने पर क्या होगा, सोचा जा सकता है. बेटा तो फिर से अपनी दिनचर्या में मस्त और व्यस्त हो गया पर उसे ज्वालामुखी के शिखर पर बैठा गया. उसे पता था, बेटे के हाथ पीले करने हैं तो बात तो माननी ही पड़ेगी. वह पति से बात करने की कूटनीति तैयार करने लगी. बहुत मुश्किल था सुकेश के ब्राह्मणवाद से लड़ना. कई बार तो उस की खुद की भी बहस हो जाती थी इस बात पर सुकेश से. पर उसे नहीं पता था कि ऋषभ उसे इस नैतिक दुविधा में डाल देगा.

खैर डरतेघबराते जब उस ने सुकेश को बताया तो घर कुरुक्षेत्र का मैदान बन गया. युद्ध का आगाज हो जाने के कारण वह बिना किसी जतन के बेटे के पाले में फेंक दी गई. और सुकेश अपने पाले में अकेले रह गए. नित तोपगोले दागे जाते. दोनों पक्ष व्यंग्यबाणों से एकदूसरे को घायल करने में कोताही न बरतते. कई तरह के तर्कवितर्क होते पर महिला सशक्तीकरण का भूत कुछकुछ शोभा के दिमाग को वशीभूत कर चुका था, इसलिए वह डटी रही. आखिर सुकेश को अपने तीरतरकश जमीन पर रखने ही पड़े. असहाय शत्रु की तरह वे शरण में आ गए इस शर्त पर कि विवाह के बाद बेटेबहू ऊपर के पोर्शन में रहेंगे. इस बात को ऋषभ व शोभा दोनों मान गए और दोनों पक्षों की सफल वार्त्ता के बाद विवाह विधिविधान से संपन्न हो गया.

 

ऋषभ ने अपने कपड़ों की अटैची उठाई और दान में मिले पलंग व 4 बरतनों के साथ एक गैस का चूल्हा खरीदा और ऊपर के पोर्शन में अपनी गृहस्थी बसा ली. शोभा तो बहू को ले कर पहले ही कई तरह के पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थी, ऊपर से छोटी जाति की लड़की. हालांकि वह बहुत ज्यादा जातिवाद नहीं मानती थी पर फिर भी इस स्तर की जाति तक जाना, रुढ़ीवादिता से ग्रसित उस का मन भी बहुत खुल कर बहू को अपना नहीं पा रहा था.  इसलिए उस ने भी पति सुकेश को मनाने की कोशिश नहीं की. बहूबेटे विवाह के अगले दिन 10 दिन के हनीमून ट्रिप पर निकल गए. उस ने भी विवाह के बाद के कार्य, रिश्तेदारों में मिठाईकपड़े वगैरह का लेनदेन निबटाया. अपने निकट रिश्तेदारों का इस विवाह में मूड जो उखड़ा था, उखड़ा ही रहा. वे कर भी क्या सकते थे. ‘बेटे की मरजी थी’ कह कर उन्होंने हाथ  झाड़ दिए थे. बच्चों के वापस आने का दिन पास आ रहा था. इसी बीच सुकेश औफिस की तरफ से एक हफ्ते की ट्रेनिंग के लिए चेन्नई चले गए. उस के अगले दिन बेटेबहू हनीमून से वापस आ गए.

सुबह शोभा की देर से नींद खुली. उठ कर वह बाथरूम में फ्रैश होने चली गई. मुंह धो कर वह तौलिए से पोंछती हुई बाहर आ रही थी कि सुबहसुबह कोयल सी कुहुक कानों में मधुर संगीत घोल गई.

‘‘मां, चाय लाई हूं आप के लिए,’’ मुखड़े पर मीठी मुसकान की चाशनी घोले माधवी ट्रे लिए खड़ी थी. सुबहसुबह की धूप से उज्ज्वल मुखड़े पर स्निग्ध चांदनी छिटकी हुई थी.

‘‘पर तुम क्यों लाईं चाय, मैं खुद ही बना लेती,’’ शोभा को एकाएक सम झ नहीं आया, क्या बोले.

‘‘वो, ऋषभ ने कहा कि पापा नहीं हैं तो… आप पी लेंगी. नहीं पीना चाहती हैं तो कोई बात नहीं. मैं वापस ले जाती हूं.’’ मुखड़े की चांदनी जैसे मलिन हो गई. शोभा का हृदय द्रवित हो गया.

‘‘नहींनहीं, रख दो, मैं पी लूंगी.’’ खुश हो माधवी ने ट्रे साइड टेबल पर रख दी. मुखड़ा फिर से लकदक करने लगा. शोभा का दिल किया, बहू को खींच कर छाती से लगा ले पर नहीं, उंगली पकड़ कर उस की गृहस्थी में उस का अनाधिकार प्रवेश? सुकेश कभी भी बरदाश्त नहीं करेंगे. वह 2 मिनट खड़ी रही, फिर चली गई.

शोभा सुबह उठती और चाय की ट्रे ले कर माधवी उस के पास खड़ी हो जाती. न जयंति की बेटी सुबह उठती है न रक्षा की बहू. माधवी भी इंजीनियर है पर यह कैसे? अगले दिन रविवार था. लंच के समय माधवी कढ़ी का कटोरा लिए हाजिर हो गई. ‘‘मां, मैं ने कढ़ी बनाई है आज. खा कर देखिए, कैसी बनी है?’’

कढ़ी खाते हुए शोभा सोच रही थी, ‘इतनी स्वादिष्ठ कढ़ी? इंजीनियरिंग करतेकरते यह लड़की कब गृहस्थी के काम सीख गई. रात को भी माधवी कमल ककड़ी के कोफ्ते रख गई. उस की सुघढ़ता देख कर शोभा के दिल में सुनीसुनाई आजकल की बिगड़ैल बेटीबहुओं की छवि गड्डमड्ड हो रही थी. लड़की माधवी जैसी भी होती है. पर उसे ज्यादा भाव नहीं देना चाह रही थी क्योंकि सुकेश का ब्राह्मणवाद उस के समूचे प्यार व सपनों पर हावी हो रहा था.

दूसरे दिन कामवाली ने छुट्टी ले ली यह कह कर कि उसे अपने भाई के घर जाना है, शाम तक आ जाएगी. ऊपर भी वही काम करती थी. सुबह माधवी चाय रख गई. अभी शोभा चाय पी ही रही थी कि उसे किचन में बरतनों की खटरपटर की आवाज सुनाई दी. वह किचन में गई तो देखा, माधवी जल्दीजल्दी रात के बरतन धो रही है. यह क्या कर रही हो माधवी?

‘‘मां, आज कामवाली दीदी ने छुट्टी की है न, इसलिए बरतन धो रही हूं. ऊपर के तो मैं ने उठते ही धो लिए थे.’’

शोभा आश्चर्य व ममता से माधवी को निहारने लगी, तु झे औफिस के लिए देर नहीं हो रही?

‘‘नहीं, अभी तो टाइम है. बस, तैयार हो जाऊंगी जल्दी से,’’ बरतन रख कर, सिंक धो कर वह उस की तरफ पलटती हुई बोली.

जयंति और रक्षा को तो कितनी शिकायतें हैं अपनी बेटी और बहू से. पर माधवी, कितनी अलग है. उस की खुद की बेटी होती तो क्या ऐसी ही होती या उन के जैसी होती. दिल फिर किया, बहू को छाती से लगा ले, मनभर कर दुलार कर ले. पर सुकेश की बड़ीबड़ी गुस्सैल आंखें याद आ गईं. ‘नहींनहीं, शादी करा दी किसी तरह. बस, दोनों खुश रह लें आपस में. अब नहीं उल झना उसे.’

Social Story : सावधानी हटी दुर्घटना घटी

Social Story : ‘‘सौजन्या तुम अब तक यहीं बैठी हो? घर नहीं गईं?’’ रीमा सौजन्या को अपने कक्ष में लैपटौप में व्यस्त देख चौंक गई. ‘‘आओ रीमा बैठो. घर जाने का मन नहीं कर रहा था. इसीलिए समाचार आदि देखने लगी. यह इंटरनैट भी कमाल की चीज है. समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता,’’ सौजन्या बोली.

‘‘हां, वह भी जब तुम विवाह डौट कौम पर व्यस्त हो,’’ रीमा हंसी. ‘‘तुम भी उपहास करने लगीं. विवाह

डौट कौम मेरा शौक नहीं मजबूरी है. सोचती हूं कोई ठीकठाक सा प्राणी मिल जाए तो समझो मैं चैन से जी सकूंगी,’’ सौजन्या बड़े दयनीय ढंग से मुसकराई.

‘‘समझ में नहीं आता तुम्हें कैसे समझाऊं… एक बार नवीन से मिल तो लो. वह भी तुम्हारी तरह हालात का मारा है. पत्नी ने 3 माह की मासूम बच्ची को छोड़ कर आत्महत्या कर ली. बेचारा कोर्टकचहरी के चक्कर में फंस कर बुरी तरह टूट चुका है,’’ रीमा ने पुन: अपनी बात दोहराई. ‘‘तुम भी रीमा… मैं तो सोचती थी तुम मेरी परम मित्र हो. मुझे और मेरी मजबूरी को भली प्रकार समझती हो. मैं तो स्वयं अपने तलाक के केस में उलझ कर रह गई थी. जीवन में कड़वाहट के अलावा कुछ बचा ही नहीं था. 10 साल लग गए उस मकड़जाल से निकलने में. सोचा था तलाक के बाद खुली हवा में सांस ले पाऊंगी, पर अब शुभचिंतक पीछे पड़े हैं. एक तुम्हारे नवीन का ही प्रस्ताव नहीं है मेरे सामने. दूरपास के संबंधियों को अचानक मेरी इतनी चिंता सताने लगी है कि मेरे लिए विवाह के प्रस्तावों की वर्षा होने लगी है,’’ सौजन्या एक ही सांस में बोल गई.

‘‘तो इस में बुराई ही क्या है? अब तो तुम्हारा तलाक भी हो गया है. कब तक यों ही अकेली रहोगी? अपनी नहीं तो अपने मातापिता की सोचो. तुम्हारी चिंता में घुल रहे हैं… तुम तो स्वयं समझदार हो. तुम्हारे भाईबहन अपनी ही दुनिया में इतने व्यस्त हैं कि तुम्हारी खोजखबर तक नहीं लेते,’’ रीमा भी कब चुप रहने वाली थी. ‘‘मैं ने कब मना किया है. मैं तो स्वयं अपने जीवन से ऊब गई हूं. पर समस्या यह है कि सभी प्रस्ताव तुम्हारे कजिन नवीन जैसे ही हैं. मैं ने अपनी मुक्ति के लिए इतनी लंबी लड़ाई लड़ी है कि मैं किसी और के घावों पर मरहम लगाने की हालत में नहीं हूं. मुझे तो कोई ऐसा चाहिए जो मेरे घावों पर मरहम लगा सके.’’

‘‘ठीक है, जैसा तू ठीक समझे. मैं तो तुझे खुश देखना चाहती हूं. मन को मन से राह होती है. पर जब तुम्हें कोई मनचाहा साथी मिल जाए तो बताना जरूर. अकेले ही कोई निर्णय मत ले लेना. इस बार तो हम खूब ठोकबजा कर देखेंगे ताकि बाद में पछताना न पड़े.’’ ‘‘वही तो. मैं तो ऐसा जीवनसाथी चाहती हूं, जो मेरी नौकरी और मोटे वेतन के लालच में नहीं, मैं जैसी हूं मुझे वैसी स्वीकार कर ले,’’ सौजन्या भीगे स्वर में बोली तो रीमा का मन भी भर आया.

दोनों बचपन की सहेलियां थीं और एकदूसरी पर जान छिड़कती थीं. रीमा अपने 2 बच्चों और पति के साथ अपने घरसंसार में सुखी थी, तो सौजन्या अपने नारकीय वैवाहिक जीवन से मुक्त होने के संघर्ष में टूट चुकी थी. 10 सालों के लंबे संघर्ष के बाद उसे पीड़ा से मुक्ति तो मिल गई पर इन 10 सालों के अपमान, तिरस्कार और कड़वाहट को भूल पाना सरल नहीं था. उस पर शुभचिंतकों द्वारा लाए गए नितनए विवाह के प्रस्ताव उस का जीना दूभर कर रहे थे. अत: उस ने अपने जीवन की बागडोर दृढ़ता से अपने हाथों में थामने का निर्णय ले लिया. दूसरा विवाह वह करेगी पर अपनी शर्तों पर. अपने भावी वर का चुनाव वह स्वयं करेगी. वह नहीं चाहती थी कि कोई उस पर तरस खा कर विवाह करे या उस की नौकरी और ऊंचे वेतन के लालच में विवाह के बंधन में बंधे और उस का जीवन नर्क बना दे. अंतर्मुखी सौजन्या को इन हालात में ‘इंटरनैट’ देवदूत की भांति लगा था और वह उसी में अपने सपनों के राजकुमार की खोज में जुट गई थी. 1 सप्ताह पहले जब रीमा अचानक उस के कक्ष में चली आई थी तो वह विभिन्न इंटरनैट पटलों पर भावी वरों के जीवनविवरण देखने में व्यस्त थी.

आशीष कुमार नाम के एक युवक का फोटो और जीवनविवरण उसे

इतना भा गया कि वह देर तक उस फोटो को हर कोण से देख कर मंत्रमुग्ध होती रही. जीवनविवरण का हर शब्द उस ने कई बार पढ़ा और पंक्तियों के बीच छिपे अर्थ को ढूंढ़ने का प्रयत्न करती रही. पहली बार उसे लगा कि आशीष को कुदरत ने उसी के लिए बनाया है. चेहरे का हर भाव उसे दीवाना सा किए जा रहा था. फिर तो सौजन्या मौका मिलते ही अपना लैपटौप खोल कर बैठ जाती और मंत्रमुग्ध सी अपने प्रिय को निहारती रहती.

सौजन्या को लगता कि अब उसे छिप कर रोमांस करने की जरूरत नहीं है. अब तो वह डंके की चोट पर अपने प्यार का इजहार करेगी. आशीष भी उस के प्रति अपना प्रेम प्रकट करने में पीछे नहीं रहता था. उस का फोटो देख कर ही वह इतना मंत्रमुग्ध हो गया था कि उस से मिलने की प्रबल इच्छा प्रकट करता रहता था. पर न जाने क्यों सौजन्या ही उस से मिलने का साहस नहीं जुटा पा रही थी. वह एक ही तर्क देती, पहले एकदूसरे को जान लें, समझ लें तब मिलने की सोचेंगे. सौजन्या के मन में अजीब सी जड़ता ने घर कर लिया था. कहीं मिल कर निराशा हाथ लगी तो? कभी सोचती कि उस के जीवन में जो कुछ घट रहा है कहीं मात्र स्वप्न तो नहीं? कहीं आंखें खोलते ही सबकुछ विलुप्त तो नहीं हो जाएगा? क्यों न इस स्वप्न को यों ही चलने दे और उस का रसास्वादन करती रहे.

उधर आशीष का उस से मिलने का हठ बढ़ता ही जा रहा था. सौजन्या का एक ही उत्तर होता कि पहले हम एकदूसरे को भली प्रकार समझ तो लें. ‘‘हमारा परिचय हुए 3 माह से अधिक हो गए हैं. अधिक समझने के लिए एकदूसरे से मिलना भी तो जरूरी है,’’ एक दिन आशीष अनमने स्वर में बोला.

‘‘अभी नहीं, मैं जब मानसिकरूप से तुम से मिलने को तैयार हो जाऊंगी तो स्वयं तुम्हें सूचित कर दूंगी,’’ सौजन्या ने दोटूक उत्तर दिया. अब सौजन्या को रीमा की याद आई, ‘‘रीमा, आज शाम को घर आना. कुछ जरूरी बातें करनी हैं,’’ उस ने रीमा को फोन कर कहा.

‘‘ऐसी क्या जरूरी बातें हैं, जो तुम औफिस में नहीं कर सकतीं?’’ रीमा ने उत्सुक स्वर में पूछा. ‘‘यह तो घर आ कर ही पता चलेगा,’’ सौजन्या ने टाल दिया.

सौजन्या घर पहुंची ही थी कि रीमा आ पहुंची. उस का सामना पहले सौजन्या की मां से हुआ. ‘‘नमस्ते आंटी,’’ रीमा उन्हें देखते ही बोली.

‘‘नमस्ते, तुम तो ईद का चांद हो गई हो बेटी. कभीकभी हम से भी मिलने आ जाया करो,’’ वे बोलीं. ‘‘2 माह पहले ही तो आई थी आंटी,’’

रीमा बोली. ‘‘हां, और मैं ने तुम से कुछ कहा था पर उस का कोई नतीजा तो सामने आया नहीं. विवाह का नाम सुनते ही सौजन्या बेलगाम सांड़ की तरह भड़क उठती है.’’

सौजन्या की मां रीमा से बातें कर ही रही थीं कि सौजन्या अपने कमरे के बाहर की बालकनी में प्रकट हुई, ‘‘अरे रीमा, वहां क्या कर रही हो? ऊपर आओ न.’’ ‘‘जाओ बेटी, हम वृद्धों के पास तुम्हारा

क्या काम?’’ ‘‘क्या मां, छोटी सी बात पर भड़क उठती हो. थोड़ी देर में हम दोनों नीचे आती हैं,’’ सौजन्या बोली.

‘‘जाओ रीमा बेटी, लैपटौप खोल कर बैठी होगी. आजकल वही इस का सबकुछ है. अपने परिवार या समाज की तो इसे चिंता ही नहीं है.’’ ‘‘आंटी, अपना गुस्सा मुझ पर उतार रही थीं. वे शायद समझती नहीं कि सहेली हूं तो क्या हुआ? औफिस में तो तू मेरी बौस है. मेरी बात भला क्यों मानने लगी,’’ रीमा सौजन्या के कक्ष में पहुंचते ही आहत स्वर में बोली.

‘‘अब दूंगी एक, पर छोड़ ये सब, यह देख,’’ सौजन्या ने विवाह डौट कौम पर आशीष का फोटो और जीवनविवरण निकाल लिया, ‘‘देख तो कैसा है?’’ ‘‘वाऊ, यह तो किसी फिल्मी हीरो की तरह लग रहा है. कब से चल रहा है ये सब?’’ रीमा आशीष का विवरण पढ़ते हुए बोली.

‘‘3 माह पहले मिले थे हम दोनों.’’ ‘‘कहां?’’

‘‘यहीं इंटरनैट पर और कहां.’’ ‘‘तो अभी मेलमुलाकात भी नहीं हुई? विवाह भी इंटरनैट पर ही करोगी क्या?’’ रीमा हंस दी.

‘‘आशीष तो बहुत दिनों से मिलने की रट लगाए हैं. मेरी ही हिम्मत नहीं होती. तुम चलोगी मेरे साथ?’’ ‘‘मैं क्यों कबाब में हड्डी बनने लगी? अब तुम छोटी बच्ची नहीं हो. अपने निर्णय स्वयं लेने सीखो. औफिस में तो लाखों के वारेन्यारे करती हो और यहां किसी से मिलने से कतरा रही हो?’’ रीमा ने समझाना चाहा.

‘‘यही पूछना था तुम से. तुम ने कहा था न कि कोई पसंद आए तो बताना. तो सब से पहले तुम्हें ही बता रही हूं.’’ ‘‘ओह हो, तुम अभी से शरमा रही हो. चेहरे पर भी लाली छा रही है. चल अभी इस से मिलने का दिन और तिथि तय कर लो.’’

‘‘रविवार कैसा रहेगा?’’ ‘‘बहुत बढि़या, छुट्टी का दिन है. दोनों पूरा दिन साथ बिता सकते हो. एकदूसरे को जाननेसमझने में मदद मिलेगी.’’ तुरंत सौजन्या और आशीष के बीच संदेशों का आदानप्रदान हुआ और रविवार के दिन मिलने की बात तय हो गई.

‘‘आंटी, अब मत डांटना मुझे. आप की इच्छा पूरी होने जा रही है. बैंडबाजा बजने में अधिक देर नहीं है अब,’’ रीमा जातेजाते सौजन्या की मां से बोली. ‘‘तुम्हारे मुंह में घीशक्कर, पर पूरी बात तो बताती जाओ,’’ वे बोलीं.

‘‘वह तो आप सौजन्या से ही पूछना. मुझे देर हो रही है. घर में सब इंतजार कर रहे होंगे,’’ कह रीमा सरपट भागी. मगर दूसरे दिन कुछ अप्रत्याशित सा घट गया. सौजन्या एक मीटिंग में व्यस्त थी कि उस के सहायक ने एक चिट ला कर दी. चिट पर आशीष कुमार का नाम देखते ही उस के होश उड़ गए. वह बाहर की ओर लपकी.

आशीष लौबी में बैठा उस का इंतजार कर रहा था. ‘‘आप यहां? इस समय?’’ सौजन्या के मुंह से किसी प्रकार निकला.

‘‘रहा नहीं गया. इसीलिए मिलने चला आया. मैं रविवार तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता. चलो छुट्टी ले लो कहीं घूमनेफिरने चलते हैं,’’ आशीष बोला. ‘‘यह क्या पागलपन है. मेरी एक जरूरी मीटिंग चल रही है. मैं छुट्टी नहीं ले सकती… इस तरह यहां क्यों चले आए? देखो सब की निगाहें हम दोनों पर ही टिकी हैं,’’ सौजन्या झेंप गई थी पर आशीष अपनी ही जिद पर अड़ा था.

बड़ी मुश्किल से सौजन्या ने आशीष को समझाबुझा कर भेजा और रविवार को मिलने की बात दोहराई. लंच के समय रीमा ने सौजन्या की खूब खिंचाई की, ‘‘लगता है आशीष बाबू से अब यह दूरी सहन नहीं हो रही.’’

‘‘पर इस तरह औफिस में आ धमकना? मुझे तो अच्छा नहीं लगा.’’ ‘‘चलता है सब चलता है. प्रेम और जंग में सब जायज है,’’ रीमा हंस दी.

शुक्रवार को सौजन्या घर पहुंची ही थी कि रीमा आ पहुंची. ‘‘क्या हुआ? आज औफिस क्यों नहीं आईं और अब इस तरह अचानक?’’ सौजन्या चौंक गई.

‘‘इतने प्रश्न मत किया करो. अपने कमरे में चलो. जरूरी बात करनी है,’’ रीमा बोली और फिर दोनों सहेलियां सौजन्या के कमरे में जा बैठीं. रीमा ने चटपट ‘विवाहविच्छेद डौट कौम’ नाम की साइट खोली और एक फोटो और जीवनविवरण ढूंढ़ निकाला.

‘‘यह देखो, पहचाना?’’ रीमा बोली. ‘‘यह तो आशीष है.’’

‘‘नहीं, नीचे पढ़ो. यह रूबीन है. यहां इस का नाम, काम, धाम सब बदला हुआ है. यहां ये महोदय सरकारी अफसर नहीं चिकित्सक हैं. अविवाहित नहीं तलाकशुदा हैं. पर फोन नंबर वही है. जाति, धर्म भी बदल गए हैं.’’ ‘‘उफ, ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?’’ सौजन्या ने सिर पकड़ लिया.

‘‘स्वयं पर तरस खाना छोड़ दो सौजन्या. ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है. चलो नवीन से मिलने चलते हैं.’’ ‘‘मैं किसी से मिलने की स्थिति में नहीं हूं.’’

‘‘मैं तुम्हें उस से मिलवाने नहीं ले जा रही. हम उस से इन आशीष उर्फ रूबीन महोदय के विरुद्ध सहायता मांगेंगी. इस धोखेबाज को दंड दिलाए बिना मुझे चैन नहीं मिलने वाला. नवीन साइबर अपराध शाखा में कार्यरत है,’’ रीमा नवीन को फोन मिलाते हुए बोली. कुछ ही देर में दोनों सहेलियां नवीन के सामने बैठी सौजन्या की आपबीती सुना रही थीं.

‘‘मैं ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि औनलाइन भी इस तरह की धोखाधड़ी होती है. मैं तो सोचती थी कि ये डौट कौम कंपनियां सबकुछ पता लगा कर ही किसी का विवरण पंजीकृत करती हैं.’’ ‘‘धोखाधड़ी कहां नहीं होती सौजन्याजी. हमारे अपने भी हमें धोखा दे देते हैं. हमें सावधानी से काम लेना चाहिए. यों समझ लीजिए कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी,’’ नवीन बोला और फिर देर तक फोन करने में व्यस्त रहा.

‘‘कुछ देर तक यह आशीष उर्फ रूबीन मुझ से बात करता रहा. पर जब मैं ने पूछताछ शुरू की तो फोन काट दिया. पर आप चिंता न करें. आप चाहें तो अपनी जानकारी गुप्त रखते हुए इस व्यक्ति के विरुद्ध रपट लिखवा सकती हैं.’’ ‘‘नहीं, मैं किसी चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. वैसे भी मैं तो बालबाल बच गई… रीमा ने बचा लिया मुझे नहीं तो पता नहीं क्या होता. मैं बहुत डर गई हूं… अब कभी इस झंझट में नहीं पड़ने वाली.’’

‘‘वही तो मैं समझा रहा हूं. उस ने मानसिक संताप दिया है आप को. इस के लिए उसे 3 साल की सजा भी हो सकती है,’’ नवीन ने समझाया. ‘‘मैं कुछ समय चाहती हूं,’’ सौजन्या ने हथियार डाल दिए थे.

धीरेधीरे जीवन अपने ही ढर्रे पर चलने लगा था. न सौजन्या ने आशीष वाली घटना का कभी जिक्र किया न रीमा ने पूछा. रीमा को लगा कि उस घटना को किसी बुरे सपने की तरह भूल जाना ही ठीक था. अचानक एक दिन नवीन रीमा के घर आ धमका. ‘‘मैं तो खुद तुम से मिल कर धन्यवाद देना चाहती थी. तुम ने उस प्रकरण को कितनी कुशलता से संभाला वरना तो पता नहीं मेरी सहेली सौजन्या का क्या हाल होता,’’ रीमा ने आभार व्यक्त किया.

‘‘रीमा, आभार तो मुझे तुम्हारा व्यक्त करना चाहिए. सौजन्या मेरे जीवन में सुगंधित पवन के झोंके की तरह आई है. शाम की प्रतीक्षा में दिन कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता.’’ ‘‘क्या? फिर से कहो, सुगंधित पवन का झोंका और न जाने क्या? लगता है आजकल सौजन्या तुम्हें घास डालने लगी है,’’ रीमा मुसकराई.

‘‘घास तो फिलहाल हम ही डाल रहे हैं, पर जीवन में कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो पहले कभी नहीं हुआ था.’’ ‘‘मैं सौजन्या से बात करूंगी,’’ रीमा ने कहा.

‘‘नहीं, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी. उसे भनक भी लग गई कि मैं उस पर डोरे डाल रहा हूं तो भड़क उठेगी. यह समस्या मेरी है. इसे सुलझाने का भार भी मेरे ही कंधों पर है,’’ कह नवीन कहीं खो सा गया. मगर रीमा उस की आंखों में लहराते प्रेम के अथाह सागर को साफ देख पा रही थी. पहली बार रीमा को लगा कि अपने करीबी लोगों को भी कितना कम जानते हैं हम. पर वह खुश थी सौजन्या के लिए और नवीन के लिए भी जो अनजाने ही निशांत की ओर बढ़े जा रहे थे.

Short Hindi Story : जलकुंड

एक   के बाद एक लगातार मैसेज फोन पर फ्लैश हो रहे हैं, ‘‘पहुंच गई? जल्दी आना… वेटिंग फौर यू.’’

मैं जवाब नहीं देना चाहती या शायद मेरे पास जवाब है ही नहीं. कैब में बैठ आंखें बंद कर लीं. दिल्ली की सड़कें रोशनी से नहाई हैं लेकिन मेरे भीतर गहरा अंधेरा है, आंखों के खुलने या बंद होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. मुझे चारों तरफ अंधेरा ही नजर आ रहा है. एक बार फिर मैसेज की बीप, ‘‘लव यू जान.’’

एक गहरी सांस ले मैं ने फोन साइलैंट कर दिया. आधा घंटा कब बीत गया, पता ही नहीं चला. दरवाजे की घंटी बजाते हुए नजर नेमप्लेट पर ठहर गई. ‘दिशा कुटीर’ कितनी संपूर्णता थी इस एक शब्द में.

‘‘कब से फोन मिला रही हूं…’’ गले लगती दिशा ने शिकायत की तो ध्यान आया कि मेरा फोन अभी तक साइलैंट है.

‘‘फोन साइलेंट था,’’ मैं ने कहा.

‘‘चल कोई नहीं. जल्दी से फ्रैश हो जा…डिनर रैडी है. रोहन भी पहुंचने वाले हैं,’’

‘‘हम्म…’’

‘‘क्या बात है मेघा? अपसैट लग रही है, सब ठीक है न?’’ दिशा ने अपने हाथों से मेरी हथेली पकड़ ली. शायद मेरी आंखों को पढ़ चुकी थी.

‘‘अमोल के साथ ?ागड़ा हुआ है?’’

‘‘नहीं, कोई ?ागड़ा नहीं हुआ.’’

‘‘फिर? फिर क्या हुआ है?’’ मानो दिशा ने मेरी हथेली छू कर सब जान लिया था.

‘‘बताऊंगी…’’

रोहन के आने के बाद हम तीनों ने साथ डिनर किया. रोहन, अमोल के बारे में पूछता रहा और मैं हांहूं में जवाब देती रही. खाने के बाद मैं बालकनी में जा खड़ी हुई. दिसंबर के महीने में दिल्ली की हवाओं में सर्दी घुल जाती है यह बात मु?ो एअरपोर्ट पर ही याद आ गई थी. पिछले 4 सालों में बैंगलुरु से बाहर निकली ही कहां थी जो कहीं और का मौसम याद रहता.

कंधे पर गरमाई महसूस हुई तो पलट कर देखा. दिशा मु?ो शाल से ढक रही थी. वाकई में मुझे गरमाहट की जरूरत है. मैं ने हाथ से शाल को सहलाते हुए देखा, ‘‘बिलकुल ऐसी शाल तो मां के पास है… मेरा मतलब था. सर्दियों में शाल में लिपटी मां एक के बाद एक सारे काम यंत्रवत निबटाती रहती थीं.’’

‘‘मिलने का मन नहीं करता?’’

‘‘बहुत करता है. बहुत याद आती है लेकिन घर से निकलते वक्त जानती थी कि दोबारा इस दहलीज को नहीं देख पाऊंगी. वह घर नहीं था दिशा, जलकुंड था, जिस के दायरे सीमित थे. मैं ऐसे परिवार में पलीबढ़ी हूं जहां प्यारमुहब्बत सिर्फ किस्सेकहानियों और फिल्मों का हिस्सा थी. असल जिंदगी में प्रेमीप्रेमिका नहीं, पतिपत्नी होते थे. पति को सारे अधिकार मिलते और पत्नी को कर्तव्य. वह पत्नी मेरी दादी, मां, चाची और भाभी सब थीं. घर की चारदीवारी के अंदर सिमटे अपने छोटे से जलकुंड में तैरती मछली सी औरतें. बिना वजूद, बिना सपनों की औरतें. जिन की सिसकियां गूंगी थीं और आंसू उस जलकुंड का पानी बन जाते.

अपने ही घर में मेरा दम घुटता था. उन औरतों पर तरस आता लेकिन इतनी हिम्मत नहीं थी कि उन के लिए कुछ कर पाती. उस माहौल में रहते हुए मु?ो शादी शब्द से डर लगने लगा. मेरे लिए शादी का मतलब ही जलकुंड में कैद हो जाना था.

एक लंबी सांस ले मैं रुक गई. महसूस हुआ कि मेरा चेहरा आंसुओं से तर

हो चुका है. दिशा खामोश थी. शायद मु?ो सांत्वना देने के लिए शब्द ढूंढ रही थी या सोच रही थी कि 4 साल की गहरी दोस्ती के बावजूद मैं ने उसे ये सब क्यों नहीं बताया.

‘‘कौफी?’’

‘‘मैं बनाती हूं. अमोल कहता है कि…’’ मेरे शब्द वहीं रुक गए. मेरी हर बात में अमोल है. वह मेरी आदत बन चुका है.

‘‘क्या कहता है?’’

‘‘यही कि मैं बैस्ट कौफी बनाती हूं.’’

‘‘हां याद है, लेट नाइट कौफी हमेशा तू ही बनाती थी. क्या दिन थे यार… हर वीकैंड हम चारों घूमने निकल जाते. शौपिंग, मूवी, आउटिंग… ग्रेट डेज… 6 महीने हो गए हमें दिल्ली शिफ्ट हुए. तुम जैसे साथी नहीं मिले.’’

कौफी के मग हाथों में थामे हम दोनों फिर से बालकनी में आ बैठे. ठंडी हवा, गरम कौफी और दोस्त. इस से अच्छा क्या हो सकता है मन खोल कर रख देने के लिए.

‘‘तू सच में यहीं जौइन करने वाली है?’’

‘‘तुझे क्या लगा कि मैं इतनी दूर सिर्फ तुम दोनों से मिलने आई हूं?’’

‘‘अमोल तैयार है?’’

‘‘नहीं, और मैं तो यह भी नहीं जानती कि मैं खुद कितनी तैयार हूं. अच्छा औफर था, ऐक्सैप्ट कर लिया. जौइन करने के बाद देखूंगी क्या करना है.’’

‘‘यार मेघा, तुम दोनों कैसे मैनेज करोगे अपनी रिलेशनशिप इतनर दूर रह कर?’’

‘‘जानती है दिशा, घर की बेटी होने का इतना एडवांटेज जरूर मिला कि मैं कालेज जा सकी. वहीं मेरी मुलाकात अमोल से हुई. पता ही नहीं चला कब यह जानपहचान दोस्ती और दोस्ती प्यार में बदल गई.

अमोल के परिवार में उस के तलाकशुदा पिता थे. मां और पिता के अलगाव के बाद अमोल अपने पिता के साथ ही रहा. बचपन में कभीकभी मां से मिलने जाता था, फिर मां की दूसरी शादी हो गई और अमोल ने उन से मिलना बंद कर दिया. परिवार का साथ व सुख न मिलने के कारण अमोल का रिश्तों पर बिलकुल विश्वास नहीं था. उस के लिए शादी सिर्फ एक सामाजिक दिखावा थी.

मैं जानती थी कि मेरा परिवार किसी भी कीमत पर मेरे और अमोल के रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगा. यहां तक कि परिवार की औरतें भी नहीं. मैं वह कर बैठी थी जिस की उस परिवार में कल्पना करना तक गुनाह था.

मैं अमोल से बेहद प्यार करती थी और वह मुझ से. कालेज के बाद हम दोनों को बैंगलुरु में अच्छी जौब मिल गई. घर में जब मेरी नौकरी का पता लगा तो बवाल मच गया.

‘‘तुम्हारा पढ़ने का मन था… पढ़ा दिया. अब यह नौकरी की बात कहां से आ गई? हमारे घर में कौन सी कमी है जो तुम्हें नौकरी करनी पड़ रही है? जल्द ही अच्छा खानदान देख तुम्हारी शादी करा देंगे फिर तुम भी अपनी मां और भाभी की तरह राज करना.’’

पापा की बात सुनती मैं उन ‘राज’ करने वाली औरतों को देख रही थी जिन के कपड़े महंगे थे और वजूद सस्ता. मन कर रहा था चीख कर कह दूं कि नहीं करना मुझे ऐसा राज. मुझे किसी दूसरे की शर्तों पर नहीं जीना. मुझे अथाह समंदर चाहिए जलकुंड नहीं लेकिन होंठ फड़फड़ा कर रह गए.

उस रात मां के पास लेटी मैं उन्हें अमोल के बारे में बता रही थी. यह भी बता रही थी कि कल मैं पापा को बिना बताए अमोल के साथ बैंगलुरु जा रही हूं. हम दोनों बिना शादी किए एकसाथ रहेंगे. वे चुपचाप सुनती रहीं. हम दोनों की आंखों से आंसू बहते रहे. उन्होंने मुझे कस कर खुद से लिपटा लिया. वे हमेशा की तरह चुप थीं. बस उस रात के हमारे आखिरी साथ को महसूस कर रही थीं.

अगले दिन मैं अमोल के साथ बैंगलुरु आ गई अपनी नई दुनिया शुरू करने. हम दोनों ने आपसी सहमति से लिव इन में रहने का निर्णय लिया था. हम खुश थे… बहुत खुश. अच्छा कमा रहे थे. हर पल को जी रहे थे. एकदूसरे की मुहब्बत में पूरी तरह डूबे हम 7वें आसमान पर थे. हालांकि समाज हमारे रिश्ते को सम्मान की नजर से नहीं देखता, इस बात की हम ने कभी परवाह नहीं की. अमोल का साथ मुझे पूर्णता दे रहा था. हमारे रिश्ते में कोई बंधन, अधिकार, कर्तव्य कुछ भी नहीं था. था तो बस प्यार… एकदूसरे का साथ. अमोल मुझ पर जान छिड़कता था. आज भी छिड़कता है. मेरे फोन में उस का ‘लव यू जान.’ मैसेज हर दिन आता है. आज शाम भी आया है.

बताते वक्त न जाने कब मेरी आवाज भर्रा गई.

‘‘मेघा, मैं बस इतना चाहती हूं कि तुम दोनों जैसे अब तक साथ रह रहे थे वैसे ही रहते रहो. कितने परफैक्ट लगते हो तुम दोनों साथ में. अमोल तो तुम्हें बेपनाह मुहब्बत करता है न, फिर तुम ने दिल्ली आने का फैसला क्यों लिया?’’

‘‘दिशा तूने मुझे कभी ब्लैक ड्रैस में देखा? नहीं देखा होगा क्योंकि अमोल को ब्लैक कपड़े पसंद नहीं. उस ने मुझे कभी नहीं पहनने दिए. एक बार किसी पार्टी में जाते समय मैं ने अपनी पसंद से खरीदी बहुत खूबसूरत सी ब्लैक ड्रैस पहन ली थी. जानती हो, अमोल बहुत चिल्लाया था. उस के बाद वह ड्रैस कहां गई, मुझे नहीं पता. मुझे चाइनीज का बेहद शौक था. लास्ट 4 साल पहले खाया था क्योंकि अमोल को नहीं पसंद. अमोल को महत्त्व देतेदेते कब मैं खुद को इग्नोर करने लगी पता ही नहीं चला.’’

‘‘होता है ऐसा मेघा. रिलेशनशिप में हम औरतें पार्टनर को खुद से पहले रखने लगती हैं. इस का मतलब यह तो नहीं कि पार्टनर से दूर हो जाएं.’’

‘‘4 साल में इतना समझ सकी हूं कि अमोल कुंठाग्रस्त है. उसे लगता है कि अगर उस के पापा ने मम्मी को ठीक से कंट्रोल किया होता तो उस का बचपन एक स्वस्थ परिवार में बीतता. उस की मम्मी उस से दूर नहीं जातीं. इसी कुंठा के चलते वह न जाने कब में मुझे कंट्रोल करने लगा और वक्त के साथ ये कंट्रोल बढ़ने लगा है. नो डाउट वह मुझे बहुत चाहता है लेकिन उस की कुंठा मेरे वजूद को निगलने लगी है.’’

‘‘कभी अमोल ने तुम पर हाथ उठाया है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘धोखा दिया है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘फिर भी तुम दिल्ली आ रही हो. शादीशुदा जोड़ा अगर दूर भी रहे तब भी उस के पास रिश्ता निभाने के लिए बंधन और कारण दोनों होते हैं. तुम दोनों तो वैसे भी लिवइन में हो. समाज के, परिवार के खिलाफ जा कर तुम ने एकदूसरे को अपनाया है. ऐसे में रिश्ते से वापसी क्या आसान होगी? अमोल के अलावा तुम्हारे पास है ही कौन?’’

सिर बहुत भारी हो रहा था. अचानक अपने बदन पर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ… सांप? नहीं यह सांप नहीं है. बारीक रस्सी जैसा कुछ है. एक नहीं, बहुत सारी रस्सियों से बना जाल जो मुझे जकड़ता जा रहा है. जकड़न बढ़ने के साथ मेरे शरीर पर रस्सियों का दबाव भी बढ़ रहा है. लगातार कोशिश कर रही हूं आजाद होने की लेकिन मेरा शरीर बिलकुल साथ नहीं दे रहा. जख्मी हो रही हूं. खून रिसने लगा और धीरेधीरे फर्श पर फैल गया. कमरा खून के तालाब में बदल गया. जाल की चुभन, जकड़न महसूस कर पा रही हूं. कमरे में अंधेरा है लेकिन फिर भी मैं देख पा रही हूं, मेरा शरीर मछली के शरीर में तबदील हो गया और वह मु?ो जाल के साथ खींच कर ले जा रहा है. मैं लहूलुहान तड़पती चली जा रही हूं. मेरे चारों तरफ वही मछली सी औरतें तैर रही हैं, जिन के जैसा बनना मु?ो मंजूर नहीं था. सांसें रुकने से पहले एक बार उसे देखना चाहती हूं जो मेरी यह गत कर रहा है.

तभी जाल की जकड़ ढीली हो गई. किसी की हथेली ने मेरे बालों को पकड़ मुट्ठी में भींच खींच लिया. मैं कराह रही थी.

अब उस का चेहरा मेरे चेहरे के ठीक सामने था. मेरी पलकों पर खून ठहरा हुआ था… ठीक से कुछ दिख नहीं रहा. वह हंसा. मैं उस की हंसी पहचानती थी. एक आवाज गूंजती है,

‘‘लव यू जान.’’

‘‘अमोल? तुम अमोल हो?’’ और मेरी पलकों पर जमा खून पिघल गया. साफ दिख रहा था कि वह मु?ो जलकुंड की ओर खींच कर ले जा रहा है.

हड़बड़ा कर आंखें खुल गईं. धड़कनें बेकाबू हो गईं और शरीर खून की जगह पसीने से लथपथ हो गया. कमरे में अब भी अंधेरा था.

किसी तरह हिम्मत बटोर खड़ी तो हो गई हूं.  मगर 2 कदम चलते ही डगमगाती मैं खुद को बेहद असहाय महसूस करने लगी. उंगली के दबाव से लाइट का स्विच औन होते ही पूरा कमरा रोशनी से भर गया. बहुत हद तक मेरे भीतर का अंधेरा भी छंटने लगा. अब सब साफसाफ देख पा रही थी.

‘‘मैं वापस नहीं आ रही,’’ टाइप करती मेरी उंगलियां कांप नहीं रहीं. अमोल को अपने फोन और जिंदगी से ब्लौक कर एक आखिरी काम निबटा दिया.

Eyebrow की देखभाल कैसे करें

Eyebrow: अकसर हम अपने चेहरे को चमकाने के लिए पार्लर जाते है और उसकी देखभाल और खूबसूरती में कोई कमी नहीं आने देना चाहते यह सही भी है. लेकिन ऐसा करते समय हम आईब्रो को टोटल इग्नोर करते है और उसकी देखभाल के लिए कुछ ख़ास एफर्ट नहीं लगाते है. इसका नतीजा होता है चेहरे को लाख चमकाने पर भी कोई कमी सी रह जाती है और वो कमी है आईब्रो को इग्नोर करने की. इसलिए आइये जाने अपनी आईब्रो की देखभाल कैसे करें ताकि आपका पूरा चेहरा दमक उठे.

आईब्रो डैंड्रफ

आईब्रो में डैंड्रफ (जिसे ‘सेबोरिक डर्मेटाइटिस’ भी कहते हैं) काफी असहज हो सकता है, लेकिन सही देखभाल की जाएं तो इस समस्या से बचा जा सकता है. आइये जानें कैसे-

सही सामग्री वाला शैम्पू चुनें

बाजार में मिलने वाले हर शैम्पू के पीछे ‘Ingredients’ लिखे होते हैं. आईब्रो के लिए इनमें से कोई एक तत्व वाला शैम्पू सबसे अच्छा होता है:

Ketoconazole: यह फंगस को जड़ से खत्म करता है.

Zinc Pyrithione: यह डैंड्रफ और खुजली को कम करता है.

Selenium Sulfide: यह त्वचा की कोशिकाओं के तेजी से झड़ने (Flaking) को रोकता है

सही मॉइस्चराइजर और हाइड्रेशन का धयान भी रखें

कभी-कभी चेहरा धोने के बाद हम आईब्रो को मॉइस्चराइज करना भूल जाते हैं, जिससे वहां की खाल निकलने लगती है. चेहरा धोने के बाद अच्छी क्वालिटी का मॉइस्चराइजर आईब्रो पर भी लगाएं और खूब पानी पिएं.

आईब्रो की त्वचा संवेदनशील होती है, इसलिए भारी या बहुत अधिक खुशबू वाले लोशन से बचें.
हयालूरोनिक एसिड (Hyaluronic Acid): यह त्वचा में नमी को लॉक करता है.

सेरामाइड्स (Ceramides): अगर आपकी त्वचा बहुत ज्यादा ड्राई और पपड़ीदार है, तो सेरामाइड्स वाली क्रीम स्किन बैरियर को रिपेयर करती है.

पेट्रोलियम जेली (Vaseline): रात को सोने से पहले हल्की सी वैसलीन लगाना नमी को बाहर निकलने से रोकता है.

आईब्रो जेल लगायें

आईब्रो जेल वास्तव में आईब्रो के लिए हेयर स्प्रे की तरह होते हैं. जहां यह आपके थिन आइब्रो को थिक दिखाने में मदद करते हैं, क्योंकि यह आपकी आईब्रो को हल्का कलर देते हैं. वहीं, दूसरी ओर, यह थिक आईब्रो को एक परफेक्ट शेप देने में मददगार होते हैं.

इन्हें आप अन्य प्रॉडक्ट्स अप्लाई करने के बाद एक फाइनल टच देने के लिए भी इस्तेमाल कर सकती हैं, क्योंकि यह ब्रो हेयर की शेप को लॉन्ग लास्टिंग बनाने में मदद करते हैं.

आईब्रो टैटू बनवाने के बाद उसकी देखभाल कैसे करें

आईब्रो टैटू (जैसे माइक्रोब्लेडिंग या ओम्ब्रे पाउडर ब्राउज) के बाद के 10-14 दिन बहुत नाजुक होते हैं. इस समय आपकी त्वचा एक जख्म” की तरह होती है, जिसे इन्फेक्शन से बचाना और पिगमेंट (रंग) को सेट होने देना जरूरी है.

. “Dry Heal” या “Ointment” लगाएं

यहाँ पर सबसे जरुरी है कि आप अपने टैटू आर्टिस्ट से पहले ही बात करके समझ लें कि अब आपको किन बातों का धयान रखना हैं. जैसे कि Dry Healing में टैटू को बिल्कुल सूखा रखा जाता है. और Ointment Healing में आर्टिस्ट की दी हुई क्रीम (जैसे Aftercare Balm या Vaseline) की बहुत पतली परत लगानी होती है.

शुरुआती 10 से 15 दिनों तक अपनी आईब्रो को पानी के सीधे संपर्क में न आने दें.

नहाते समय भी कोशिश करें कि आपके चेहरे स्पेशली आईब्रो पर पानी ना आएं. चेहरा साफ करने के लिए ‘फेस वाइप्स’ या गीले कपड़े का इस्तेमाल करें, लेकिन आईब्रो को बचाकर.

कम से कम 1 -2 हफ्ते तक भारी एक्सरसाइज न करें. पसीना (Sweat) नमक की तरह काम करता है और टैटू के रंग को फीका कर सकता है या उसे त्वचा से बाहर निकाल सकता है.

टैटू होने के 3-5 दिन बाद आईब्रो पर पपड़ी जमने लगेगी और खुजली होगी. इसे कभी न खुरचें और न ही पपड़ी उतारें. अगर आप पपड़ी खींचते हैं, तो उसके साथ टैटू का रंग भी निकल जाएगा और वहां ‘पैच’ (खाली जगह) बन जाएगा.

इन पर भी धयान दें-

आई ब्रो करने के बाद उस पर बार बार गंदे हाथ ना लगाएं. इससे वहां इन्फेक्शन होने का डर बना रहता है क्यूंकि हाथों के जमस आईब्रो पर जाते है. इसलिए उसे बार बार न छुएं.

कहीं से आने के बाद आईब्रो पेंसिल और जेल की क्लीन करके सोएं ताकि वहां साफ़ सफाई हो सकें.

आईब्रो के बालों को जल्दी जल्दी चिमटी से ना निकालें इससे वहां के बाल हार्ड हो जायेंगे.

आईब्रो पर जयादा मेकअप लगाना भी सही नहीं है. इससे आईब्रो के बाल कमजोर हो जाते है.

आईब्रो के आसपास की त्वचा को एक्सफॉलिएट जरूर करें. इससे मृत कोशिकाएं साफ़ होंगी और ब्लड सर्कुलेशन सही होगा.

दिन में 8-10 गिलास पानी पिएं. यह त्वचा की लोच (elasticity) बनाए रखता है और डेड स्किन को बनने से रोकता है.

ओमेगा-3 फैटी एसिड को अपनी डाइट में अखरोट, अलसी के बीज (Flax seeds) या चिया सीड्स शामिल करें. ये प्राकृतिक रूप से त्वचा को हाइड्रेटेड रखते हैं.

Extramarital Affair : मेरे पति की गर्लफ्रैंड है, क्या उनके साथ रहना सही है?

Extramarital Affair

सवाल

मेरी शादी को 10 साल हो गए हैं, हमारा एक बेटा भी है. मेरे पति कार्पोरेट फील्ड में है, वह सुबह 10 बजे निकलते हैं और रात में 11 बजे वापस आते हैं. उनके पास हमारे लिए समय ही नहीं रहता. वो कहते हैं कि मैं बहुत थक गया हूं और खाना खाकर सो जाते हैं. फिर सुबह औफिस चले जाते हैं.

एक दिन मेरे बेटे ने उनका फोन ले लिया और गेम देखने लगा, गलती से उसने Whatsapp खोल लिया था. इसके लिए मेरे पति ने बेटे को बहुत डांटा हालांकि अभी वह 4 साल का है, तो वह मैसेज भी नहीं पढ़ सकता, लेकिन फिर भी पति ने बहुत फटकार लगाई. मुझे बुरा लगा मैं अपने बच्चे को कमरे में लेकर चली गई. हालांकि बाद में उन्होंने सौरी बोला.

Romantic couple out together at the ferris wheel in the park

मैं एक दिन सोच रही थी, जो पति मुझसे और बच्चे से इतना प्यार करता था उसमें कुछ दिनों से क्यों बदलाव आ रहे हैं. फिर मैंने सोचा कि काम के प्रेशर की वजह से पति का बिहेव बदलता जा रहा है. अब तो वह हर रविवार को बाहर जाने लगे थे. उन्होंने बताया था कि औफिस के काम की वजह से उन्हें रविवार को छुट्टी नहीं मिल रही है. मैं बहुत ही अकेला महसूस करने लगी थी फिर सोचती थी कि अच्छी लाइफ के लिए पैसे भी जरूरी है, कोई बात नहीं मेरे पति मुझे टाइम नहीं दे रहे हैं, लेकिन उस दिन मेरा शक सच में बदल गया.

जब वो फोन पर किसी लड़की से बात कर रहे थे और उससे ये कह रहे थे कि मुझे फोन मत करना मैं अपने बीवी और बच्चे के साथ हूं, तो मैं सन्न रह गई और मुझे पता चल गया कि मेरे पति को कोई गर्लफ्रेंड है. उस दिन मैं चुप रही, लेकिन दो दिन बाद फिर मैंने उन्हें उस लड़की से बात करते हुए सुन लिया. उस दिन मैंने उनसे कहा, आपके लाइफ में कोई लड़की है, मैं ये सच जानती हूं. वो सरप्राइज हो गए और उन्होंने सफाई देने के लिए न जाने कितने झूठ बोल दिए. हालांकि मैं इन चीजों से थक चुकी थी, मैं कमरे में आकर सो गई. अब मेरे पति और मेरे बीच सिर्फ काम के लिए बात होती है. समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूं?

Closeup of an Indian couple sitting down looking scared and worried while on a phone call

जवाब

देखिए आपने बताया कि आपका एक बेटा भी है. कई मामलों में देखा गया है कि बच्चे होने के बाद जब पति का एक्सट्रा मैरिटल अफेयर होता है, तो पत्नियां सिर्फ बच्चे की भविष्य के लिए चुप हो जाती है और पति अपनी मनमानी करता है.

Indian woman in long evening blue dress spinding romantic time together with lover handsome boyfriend europe urban downtown city.

बेहतर है कि पहले आप अपने पति को समझाएं कि हमारा एक बेटा भी है, जब वो बड़ा होगा और उसे अपने पापा की सच्चाई पता चलेगी तो उस पर क्या असर पड़ेगा. आप उन्हें एहसास कराएं कि पहले आपदोनों एकदूसरे से कितना प्यार करते थे. कैसे आपदोनों पहली बार मिले थे. प्यार की बातों से उन्हें रिझाएं. आप मौडर्न ड्रैसेज भी पहनें.  अगर वो फिर पहले की तरह अपना रिश्ता कायम रखने की कोशिश करते हैं और आपसे अपनी गलती की माफी मांगते हैं, तो आप अपने रिश्ते को एक मौका जरूर दें.

लेकिन अगर आपके पति में कोई सुधार नहीं होता है, तो भलाई इसी में है कि आप उनसे अलग हो जाए, रही बात बच्चे को पढ़ाने और खर्च की तो आप खुद इंडिपेंडेंट बनें और बेटा सिर्फ आपका नहीं है, उसके पढ़ाई का खर्च आप अपने पति से भी लें. ऐसे पतियों को सबक जरूर सिखाना चाहिए. जो शादी के बाहर रिश्ते रखते हैं घर में आकर अच्छे पति होने का दिखावा करते हैं.

Traditional Weaving : बुनाई की बदलती पहचान

Traditional Weaving : जब हाथ काम में होते हैं, तब मन सब से ज्यादा मुक्त होता है. तेज रफ्तार जिंदगी, डिजिटल स्क्रीन और अनवरत तनाव के दौर में कुछ कलाएं ऐसी हैं जो हमें धीमा होना सिखाती हैं. बुनाई उन्हीं में से एक है. कभी सर्दियों की आवश्यकता मानी जाने वाली यह कला आज सुकून, अभिव्यक्ति और आत्मनिर्भरता का पर्याय बन चुकी है. ऊन और सलाइयों के संग जन्म लेती यह प्रक्रिया आज आधुनिक समाज में नई पहचान गढ़ रही है.

परंपरा से वर्तमान तक

बुनाई का इतिहास मानव सभ्यता जितना ही पुराना है. जब कपड़े मशीनों से नहीं बनते थे, तब हाथों से बुने वस्त्र ही जीवन की आधारशिला थे. भारत में कश्मीर की पश्मीना शाल, हिमालयी क्षेत्रों के ऊनी वस्त्र और राजस्थान की पारंपरिक बुनाई आज भी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जीवित है. दादीनानी द्वारा बुने स्वैटर आज भी भावनात्मक स्मृतियों में सुरक्षित हैं. वे केवल वस्त्र नहीं, प्रेम की गरमाहट होते थे.

बुनाई: एक रचनात्मक संवाद

बुनाई केवल तकनीक नहीं, एक संवाद है. अपनेआप से हर फंदा एक विचार है, हर डिजाइन एक भावना. रंगों का चयन, पैटर्न की योजना और सलाइयों की लय व्यक्ति को एकाग्रता की अवस्था में ले जाती है. यही कारण है कि बुनाई करने वाला व्यक्ति समय का बोध खो देता है और रचनात्मकता के प्रवाह में बहने लगता है.

तनाव से मुक्ति की थेरैपी

आज विश्वभर में बुनाई को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ कर देखा जा रहा है. निटिंग थेरैपी शब्द अब केवल किताबों तक सीमित नहीं है. नियमित बुनाई करने से चिंता कम होती है, अवसाद में राहत मिलती है और मन स्थिर होता है. स्क्रीन आधारित जीवन से थकी आंखों और मन के लिए यह एक सुकून भरा विराम है.

महिलाओं के हाथों में आत्मनिर्भरता

बुनाई ने भारत में महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाई है. स्वयं सहायता समूहों से ले कर व्यक्तिगत उद्यम तक, हजारों महिलाएं घर बैठे अपनी कला को आजीविका में बदल रही हैं. बेबी स्वैटर, मोजे, शाल, टोपी और होम डैकोर आइटम्स आज औनलाइन प्लेटफौर्म पर लोकप्रिय उत्पाद बन चुके हैं. यह कला महिलाओं को आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता प्रदान करती है.

फैशन इंडस्ट्री में हस्तनिर्मित आकर्षण

मशीनी उत्पादन से ऊब चुकी फैशन इंडस्ट्री अब फिर से हस्तनिर्मित वस्त्रों की ओर लौट रही है. हैंड, निटेड कार्डिगन, क्रोशिया ड्रैसेज, डिजाइनर शौल और एक्सैसरीज लग्जरी फैशन का हिस्सा बन चुकी हैं.

पीढि़यों को जोड़ने वाला धागा

बुनाई केवल एक कला नहीं, पीढि़यों को जोड़ने वाला भावनात्मक धागा भी है. जब एक मां अपनी बेटी को पहला फंदा डालना सिखाती हैं तो वे केवल तकनीक नहीं सिखा रही होतीं. वे धैर्य, निरंतरता और सृजन का संस्कार दे रही होती हैं. यह संवाद शब्दों से परे होता है.

सीखना आसान, अपनाना सुखद

बुनाई की सब से सुंदर बात यह है कि इसे सीखना सरल है. आज डिजिटल युग में यूट्यूब, औनलाइन कोर्स और वर्कशौप्स ने इसे हर उम्र के व्यक्ति के लिए सुलभ बना दिया है. थोड़े अभ्यास से यह कला जीवन का हिस्सा बन जाती है.

पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार कला

हैंडमेड बुनाई पर्यावरण के अनुकूल है. कम ऊर्जा, सीमित संसाधन और प्राकृतिक ऊन का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है. जब हम हाथ से बुना वस्त्र पहनते हैं तो हम प्रकृति के प्रति भी एक जिम्मेदार कदम उठाते हैं.

निष्कर्ष

बुनाई आज केवल ऊन और सलाइयों की कहानी नहीं है. यह सुकून की तलाश, आत्मनिर्भरता की राह और रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बन चुकी है. बदलते समय में भी इस की प्रासंगिकता बनी हुई है. इसीलिए क्योंकि इंसान को आज भी कुछ ऐसा चाहिए जो उसे खुद से जोड़ सके.

-संगीता सेठी 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें