Hindi Kahani : पन्नों पर फैली पीड़ा

Hindi Kahani : रात थी कि बीतने का नाम ही नहीं ले रही थी. सफलता और असफलता की आशानिराशा के बीच सब के मन में एक तूफान चल रहा था. औपरेशन थिएटर का टिमटिम करता बल्ब कभी आशंकाओं को बढ़ा देता तो कभी दिलासा देता प्रतीत होता. नर्सों के पैरों की आहट दिल की धड़कनें तेज करने लगती. नवीन बेचैनी से इधर से उधर टहल रहा था. हौस्पिटल के इस तल पर सन्नाटा था. नवीन कुछ गंभीर मरीजों के रिश्तेदारों के उदास चेहरों पर नजर दौड़ाता, फिर सामने बैठी अपनी मां को ध्यान से देखता और अंदाजा लगाता कि क्या मां वास्तव में परेशान हैं.

अंदर आई.सी.यू. में नवीन की पत्नी सुजाता जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थी. नवीन पूरे यकीन के साथ सोच रहा था कि अभी डाक्टर आ कर कहेगा, सुजाता ठीक है.

कल कितनी चोटें आई थीं सुजाता को. नवीन, सुजाता और उन के दोनों बच्चे दिव्यांशु और दिव्या पिकनिक से लौट रहे थे. कार नवीन ही चला रहा था. सामने से आ रहे ट्रक ने सुजाता की तरफ की खिड़की में जोरदार टक्कर मारी. नवीन और पीछे बैठे बच्चे तो बच गए, लेकिन सुजाता को गंभीर चोटें आईं. उस का सिर भी फट गया था. कार भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी. नवीन किसी से लिफ्ट ले कर घायल सुजाता और बच्चों को ले कर यहां पहुंच गया था.

नवीन ने फोन पर अपने दोनों भाइयों विनय और नीरज को खबर दे दी थी. वे उस के यहां पहुंचने से पहले ही मां के साथ पहुंच चुके थे. विनय की यहां कुछ डाक्टरों से जानपहचान थी, इसलिए इलाज शुरू करने में कोई दिक्कत नहीं आई थी.

नवीन ने सुजाता के लिए अपने दोनों भाइयों की बेचैनी भी देखी. उसे लगा, बस मां को ही इतने सालों में सुजाता से लगाव नहीं हो पाया. वह अपनी जीवनसंगिनी को याद करते हुए थका सा जैसे ही कुरसी पर बैठा तो लगा जैसे सुजाता उस के सामने मुसकराती हुई साकार खड़ी हो गई है. झट से आंखें बंद कर लीं ताकि कहीं उस का चेहरा आंखों के आगे से गायब न हो जाए. नवीन ने आंखें बंद कीं तो पिछली स्मृतियां दृष्टिपटल पर उभर आईं…

20 साल पहले नवीन और सुजाता एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला. पढ़ाई खत्म करने के बाद जब दोनों की अच्छी नौकरी भी लग गई तो उन्होंने विवाह करने का फैसला किया.

सुजाता के मातापिता से मिल कर नवीन को बहुत अच्छा लगा था. वे इस विवाह के लिए तैयार थे, लेकिन असली समस्या नवीन को अपनी मां वसुधा से होने वाली थी. वह जानता था कि उस की पुरातनपंथी मां एक विजातीय लड़की से उस का विवाह कभी नहीं होने देंगी. उस के दोनों भाई सुजाता से मिल चुके थे और दोनों से सुजाता की अच्छी दोस्ती भी हो गई थी. जब नवीन ने घर में सुजाता के बारे में बताया तो वसुधा ने तूफान खड़ा कर दिया. नवीन के पिताजी नहीं थे.

वसुधा चिल्लाने लगीं, ‘क्या इतने मेहनत से तुम तीनों को पालपोस कर इसी दिन के लिए बड़ा किया है कि एक विजातीय लड़की बहू बन कर इस घर में आए? यह कभी नहीं हो सकता.’

कुछ दिनों तक घर में सन्नाटा छाया रहा. नवीन मां को मनाने की कोशिश करता रहा, लेकिन जब वे तैयार नहीं हुईं, तो उन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली.

नवीन को याद आ रहा था वह दिन जब वह पहली बार सुजाता को ले कर घर पहुंचा तो मां ने कितनी क्रोधित नजरों से उसे देखा था और अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया था. घंटों बाद निकली थीं और जब वे निकलीं, सुजाता अपने दोनों देवरों से पूछपूछ कर खाना तैयार कर चुकी थी. यह था ससुराल में सुजाता का पहला दिन.

नीरज ने जबरदस्ती वसुधा को खाना खिलाया था. नवीन मूकदर्शक बना रहा था. रात को सुजाता सोने आई तो उस के चेहरे पर अपमान और थकान के मिलेजुले भाव देख कर नवीन का दिल भर आया था और फिर उस ने उसे अपनी बांहों में समेट लिया था.

नवीन और सुजाता दोनों ने वसुधा के साथ समय बिताने के लिए औफिस से छुट्टियां ले ली थीं. वे दिन भर वसुधा का मूड ठीक करने की कोशिश करते, मगर कामयाब न हो पाते.

जब सुजाता गर्भवती हुई तो वसुधा ने एलान कर दिया, ‘मुझ से कोई उम्मीद न करना, नौकरी छोड़ो और अपनी घरगृहस्थी संभालो.’

यह सुजाता ही थी, जिस ने सिर्फ मां को खुश करने के लिए नौकरी छोड़ दी थी. माथे की त्योरियां कम तो हुईं, लेकिन खत्म नहीं.

दिव्यांशु का जन्म हुआ तो विनय की नौकरी भी लग गई. वसुधा दिनरात कहती, ‘इस बर अपनी जाति की बहू लाऊंगी तो मन को कुछ ठंडक मिलेगी.’

सुजाता अपमानित सा महसूस करती. नवीन देखता, सुजाता मां को एक भी अपशब्द न कहती. वसुधा ने खूब खोजबीन कर के अपने मन की नीता से विनय का विवाह कर दिया. नीता को वसुधा ने पहले दिन से ही सिर पर बैठा लिया. सुजाता शांत देखती रहती. नीता भी नौकरीपेशा थी. छुट्टियां खत्म होने पर वह औफिस के लिए तैयार होने लगी तो वसुधा ने उस की भरपूर मदद की. सुजाता इस भेदभाव को देख कर हैरान खड़ी रह जाती.

कुछ दिनों बाद नीरज ने भी नौकरी लगते ही सुधा से प्रेमविवाह कर लिया. लेकिन सुधा भी वसुधा की जातिधर्म की कसौटी पर खरी उतरती थी, इसलिए वे सुधा से भी खुश थीं. इतने सालों में नवीन ने कभी मां को सुजाता से ठीक तरह से बात करते नहीं देखा था.

दिव्या हुई तो नवीन ने सुजाता को यह सोच कर उस के मायके रहने भेज दिया कि कम से कम उसे वहां शांति और आराम तो मिलेगा. नवीन रोज औफिस से सुजाता और बच्चों को देखने चला जाता और डिनर कर के ही लौटता था.

घर आ कर देखता मां रसोई में व्यस्त होतीं. वसुधा जोड़ों के दर्द की मरीज थीं, काम अब उन से होता नहीं था. नीता और सुधा शाम को ही लौटती थीं, आ कर कहतीं, ‘सुजाता भाभी के बिना सब अस्तव्यस्त हो जाता है.’

सुन कर नवीन खुश हो जाता कि कोई तो उस की कद्र करता है.

फिर विनय और नीरज अलग अलग मकान ले लिए, क्योंकि यह मकान अब सब के बढ़ते परिवार के लिए छोटा पड़ने लगा था. वसुधा ने बहुत कहा कि दूसरी मंजिल बनवा लेते हैं, लेकिन सब अलग घर बसाना चाहते थे.

विनय और नीरज चले गए तो वसुधा कुछ दिन बहुत उदास रहीं. दिव्यांशु और दिव्या को वसुधा प्यार करतीं, लेकिन सुजाता से तब भी एक दूरी बनाए रखतीं. सुजाता उन से बात करने के सौ बहाने ढूंढ़ती, मगर वसुधा हां, हूं में ही जवाब देतीं.

बच्चे स्कूल चले जाते तो घर में सन्नाटा फैल जाता. बच्चों को स्कूल भेज कर पार्क में सुबह की सैर करना सुजाता का नियम बन गया. पदोन्नति के साथसाथ नवीन की व्यस्तता बढ़ गई थी. सुजाता को हमेशा ही पढ़नेलिखने का शौक रहा. फुरसत मिलते ही वह अपनी कल्पनाओं की दुनिया में व्यस्त रहने लगी. उस के विचार, उस के सपने उसे लेखन की दुनिया में ले आए और दुख में तो कल्पना ही इंसान के लिए मां की गोद है. सुबह की सैर करतेकरते वह पता नहीं क्याक्या सोच कर लेखन सामग्री जुटा लेती.

पार्क से लौटते हुए कितने विचार, कितने शब्द सुजाता के दिमाग में आते, लेकिन अकसर वह जिस तरह सोचती, एकाग्रता के अभाव में उस तरह लिख न पाती, पन्ने फाड़ती जाती, वसुधा कभी उस के कमरे में न झांकतीं, बस उन्हें कूड़े की टोकरी में फटे हुए पन्नों का ढेर दिखता तो शुरू हो जातीं, ‘पता नहीं, क्या बकवास किस्म का काम करती रहती है. बस, पन्ने फाड़ती रहती है, कोई ढंग का काम तो आता नहीं.’

सुजाता कोई तर्क नहीं दे पाती, मगर उस का लेखन कार्य चलता रहा.

अब सुजाता ने गंभीरता से लिखना शुरू कर दिया था. इस समय उस के सामने था, सालों से मिलता आ रहा वसुधा से तानों का सिलसिला, अविश्वास और टूटता हौसला, क्योंकि वह खेदसहित रचनाओं के लौटने का दौर था. लौटी हुई कहानी उसे बेचैन कर देती.

उस की लौटी हुई रचनाओं को देख कर वसुधा के ताने बढ़ जाते, ‘समय भी खराब किया और लो अब रख लो अपने पास, लिखने में नहीं, बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दो.’

सुजाता को रोना आ जाता. सोचती, अब वह नहीं लिखेगी, तभी दिल कहता कि न घबराना है, न हारना है. मेहनत का फल जरूर मिलता है और वह फिर लिखने बैठ जाती. धीरेधीरे उस की कहानियां छपने लगीं.

सुजाता को नवीन का पूरा सहयोग था. वह लिख रही होती तो नवीन कभी उसे डिस्टर्ब न करता, बच्चे भी शांति से अपना काम करते रहते. अब सुजाता को नाम, यश, महत्त्व, पैसा मिलने लगा. उसे कुछ पुरस्कार भी मिले, वह वसुधा के पैर छूती तो वे तुनक कर चली जातीं. सुजाता अपने शहर के लिए सम्मानित हस्ती हो चुकी थी. उसे कई शैक्षणिक, सांस्कृतिक समारोहों में विशेष अतिथि की हैसियत से बुलाया जाने लगा. वसुधा की सहेलियां, पड़ोसिनें सब उन से सुजाता के गुणों की वाहवाह करतीं.

‘‘नवीनजी, आप की पत्नी अब खतरे से बाहर हैं,’’ डाक्टर की आवाज नवीन को वर्तमान में खींच लाई.

वह खड़ा हो गया, ‘‘कैसी है सुजाता?’’

‘‘चोटें बहुत हैं, बहुत ध्यान रखना पड़ेगा, थोड़ी देर में उन्हें होश आ जाएगा, तब आप चाहें तो उन से मिल सकते हैं.’’

मां के साथ सुजाता को देखने नवीन आई.सी.यू. में गया. सुजाता अभी बेहोश थी. नवीन ने थोड़ी देर बाद मां से कहा, ‘‘मां, आप थक गई होंगी, घर जा कर थोड़ा आराम कर लो, बाद में जब नीरज घर आए तो उस के साथ आ जाना.’’

वसुधा घर आ गईं, नहाने के बाद सब के लिए खाना बनाया, बच्चे नीता के पास थे. वे सब हौस्पिटल आ गए. विनय और नीरज तो नवीन के पास ही थे. सारा काम हो गया तो वसुधा को खाली घर काटने को दौड़ने लगा. पहले वे इधरउधर देखती घूमती रहीं, फिर पता नहीं उन के मन में क्या आया कि ऊपर सुजाता के कमरे की सीढि़यां चढ़ने लगीं.

साफसुथरे कमरे में एक ओर सुजाता के पढ़नेलिखने की मेज पर रखे सामान को वे ध्यान से देखने लगीं. अब तक प्रकाशित 2 कहानी संग्रह, 4 उपन्यास और बहुत सारे लेख जैसे सुजाता के अस्तित्व का बखान कर रहे थे. सुजाता की डायरी के पन्ने पलटे तो बैड पर बैठ कर पढ़ती चली गईं.

एक जगह लिखा था, ‘‘मांजी के साथ 2 बातें करने के लिए तरस जाती हूं मैं. कोमल, कांतिमय देहयष्टि, मांजी के माथे पर चंदन का टीका बहुत अच्छा लगता है मुझे. मम्मीपापा तो अब रहे नहीं, मन करता है मांजी की गोद में सिर रख कर लेट जाऊं और वे मेरे सिर पर अपना हाथ रख दें, क्या ऐसा कभी होगा?’’

एक पन्ने पर लिखा था, ‘‘आज फिर कहानी वापस आ गई. नवीन और बच्चे तो व्यस्त रहते हैं, काश, मैं मांजी से अपने मन की उधेड़बुन बांट पाती, मांजी इस समय मेरे खत्म हो चले नैतिक बल को सहारा देतीं, मुझे उन के स्नेह के 2 बोलों की जरूरत है, लेकिन मिल रहे हैं ताने.’’

एक जगह लिखा था, ‘‘अगर मांजी समझ जातीं कि लेखन थोड़ा कठिन और विचित्र होता है, तो मेरे मन को थोड़ी शांति मिल जाती और मैं और अच्छा लिख पाती.’’

आगे लिखा था, ‘‘कभीकभी मेरा दिल मांजी के व्यंग्यबाणों की चोट सह नहीं पाता,

मैं घायल हो जाती हूं, जी में आता है उन से पूछूं, मेरा विजातीय होना क्यों खलता है कि मेरे द्वारा दिए गए आदरसम्मान व सेवा तक को नकार दिया जाता है? नवीन भी अपनी मां के स्वभाव से दुखी हो जाते हैं, पर कुछ कह नहीं सकते. उन का कहना है कि मां ने तीनों को बहुत मेहनत से पढ़ायालिखाया है, बहुत संघर्ष किया है पिताजी के बाद. कहते हैं, मां से कुछ नहीं कह सकता. बस तुम ही समझौता कर लो. मैं उन के स्वभाव पर सिर्फ शर्मिंदा हो सकता हूं, अपमान की पीड़ा का अथाह सागर कभीकभी मेरी आंखों के रास्ते आंसू बन कर बह निकलता है.’’

एक जगह लिखा था, ‘‘मेरी एक भी कहानी मांजी ने नहीं पढ़ी, कितना अच्छा होता जिस कहानी के लिए मुझे पहला पुरस्कार मिला, वह मांजी ने भी पढ़ी होती.’’

वसुधा के स्वभाव से दुखी सुजाता के इतने सालों के मन की व्यथा जैसे पन्नों पर बिखरी पड़ी थी.

वसुधा ने कुछ और पन्ने पलटे, लिखा था, ‘‘हर त्योहार पर नीता और सुधा के साथ मांजी का अलग व्यवहार होता है, मेरे साथ अलग, कई रस्मों में, कई आयोजनों में मैं कोने में खड़ी रह जाती हूं आज भी. मां की दृष्टि में तो क्षमा होती है और मन में वात्सल्य.’’

पढ़तेपढ़ते वसुधा की आंखें झमाझम बरसने लगीं, उन का मन आत्मग्लानि से भर उठा. फिर सोचने लगीं कि हम औरतें ही औरतों की दुश्मन क्यों बन जाती हैं? कैसे वे इतनी क्रूर और असंवेदनशील हो उठीं? यह क्या कर बैठीं वे? अपने बेटेबहू के जीवन में अशांति का कारण वे स्वयं बनीं? नहीं, वे अपनी बहू की प्रतिभा को बिखरने नहीं देंगी. आज यह मुकदमा उन के

मन की अदालत में आया और उन्हें फैसला सुनाना है. भूल जाएंगी वे जातपांत को, याद रखेंगी सिर्फ अपनी होनहार बहू के गुणों और मधुर स्वभाव को.

वसुधा के दिल में स्नेह, उदारता का सैलाब सा उमड़ पड़ा. बरसों से जमे जातिधर्म, के भेदभाव का कुहासा स्नेह की गरमी से छंटने लगा.

Married Life : मेरे सासससुर पुराने ख्यालात वाले हैं, जिससे मैं पति से ढंग से बात भी नहीं कर पाती हूं…

Married Life 

सवाल

मैं 26 साल की हूं. विवाह को डेढ़ साल हुए हैं. परिवार संयुक्त और बड़ा है. यों तो सभी एकदूसरे का खयाल रखते हैं पर बड़ी समस्या वैवाहिक जीवन जीने को ले कर है. सासससुर पुराने खयालात वाले हैं, जिस वजह से घर में इतना परदा है कि 9-10 दिन में पति से सिर्फ हांहूं में भी बात हो जाए तो काफी है. रात को भी हम खुल कर सैक्स का आनंद नहीं उठा पाते. कभीकभी मन बहुत बेचैन हो जाता है. दूसरी जगह घर भी नहीं ले सकते. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

सैक्स संबंध हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है. स्वस्थ व जोशीली सैक्स लाइफ हमारे संबंधों को मजबूत बनाती है एवं जीवन को खुशियों से भरती है. संयुक्त परिवारों में जानबूझ कर औरतों को दबाने के लिए उन्हें पति से दूर रखा जाता है और वे पति के साथ खुल कर सैक्स ऐंजौय नहीं कर पातीं. इस के लिए आप को पति से खुल कर बात करनी होगी. सिर्फ आप ही नहीं आप के पति भी आप की चाह रखते होंगे.

बेहतर होगा कि इस के लिए कभी किसी रिश्तेदार के या कभी मायके जाने के बहाने पति के साथ बाहर घूमने जाएं. इस तरह के संबंधों को तो झेलना ही होता है. कोई उपाय नहीं मिलता.

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 सवाल

मैं 23 वर्षीय अविवाहित युवक हूं. 2-3 महिलाओं से बगैर कंडोम लगाए शारीरिक संबंध बना चुका हूं. अब कुछ दिनों से एक समस्या से जूझ रहा हूं. सैक्स संबंध के बाद मेरे प्राइवेट पार्ट में जलन होने लगती है. अंदर की त्वचा लाल हो जाती है और कभीकभी खुजली भी होती है. बताएं मैं क्या करूं?

 जवाब

आज के लाइफस्टाइल में सुरक्षित सैक्स संबंध बनाना बेहद जरूरी है और इस का सरल और सस्ता विकल्प है कंडोम. कंडोम लगा कर सैक्स संबंध बनाने से संक्रमण की संभावना न के बराबर रहती है. जैसाकि आप ने बताया कि आप की 2-3 महिलाओं से रिलेशनशिप रही है तो जाहिर है कि इस से आप को प्रौस्टेटिक संक्रमण या किसी तरह का फंगल इन्फैक्शन हो गया हो.

आप को जल्द ही किसी यूरोलौजिस्ट से मिल कर सलाह लेने की जरूरत है. और हां, आगे से सैक्स संबंध बनाते समय कंडोम का इस्तेमाल करना न भूलें. कंडोम न सिर्फ संक्रमण से बचाने का, बल्कि गर्भनिरोध का भी बेहतर विकल्प है.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर 8588843415 पर  भेजें. 

या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Family Story : देर आए दुरुस्त आए

Family Story : रात का 1 बज रहा था. स्नेहा अभी तक घर नहीं लौटी थी. सविता घर के अंदर बाहर बेचैनी से घूम रही थी. उन के पति विनय अपने स्टडीरूम में कुछ काम कर रहे थे, पर ध्यान सविता की बेचैनी पर ही था. विनय एक बड़ी कंपनी में सीए थे. वे उठ कर बाहर आए. सविता के चिंतित चेहरे पर नजर डाली. कहा, ‘‘तुम सो जाओ, मैं जाग रहा हूं, मैं देख लूंगा.’’

‘‘कहां नींद आती है ऐसे. समझासमझा कर थक गई हूं. स्नेहा के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. क्या करूं?’’

तभी कार रुकने की आवाज सुनाई दी. स्नेहा कार से निकली. ड्राइविंग सीट पर जो लड़का बैठा था, उसे झुक कर कुछ कहा, खिलखिलाई और अंदर आ गई. सविता और विनय को देखते ही बोली, ‘‘ओह, मौम, डैड, आप लोग फिर जाग रहे हैं?’’

‘‘तुम्हारे जैसी बेटी हो तो माता पिता ऐसे ही जागते हैं, स्नेहा. तुम्हें हमारी हैल्थ की भी परवाह नहीं है.’’

‘‘तो क्या मैं लाइफ ऐंजौय करना छोड़ दूं? मौम, आप लोग जमाने के साथ क्यों नहीं चलते? अब शाम को 5 बजे घर आने का जमाना नहीं है.’’

‘‘जानती हूं, जमाना रात के 1 बजे घर आने का भी नहीं है.’’

‘‘मुझे तो लगता है पेरैंट्स को चिंता करने का शौक होता है. अब गुडनाइट, आप का लैक्चर तो रोज चलता है,’’ कहते हुए स्नेहा गुनगुनाती हुई अपने बैडरूम की तरफ बढ़ गई.

सविता और विनय ने एकदूसरे को चिंतित और उदास नजरों से देखा. विनय ने कहा, ‘‘चलो, बहुत रात हो गई. मैं भी काम बंद कर के आता हूं, सोते हैं.’’

सविता की आंखों में नींद नहीं थी. आंसू भी बहने लगे थे, क्या करे, इकलौती लाडली बेटी को कैसे समझाए, हर तरह से समझा कर देख लिया था. सविता ठाणे की खुद एक मशहूर वकील थीं.

उन के ससुर सुरेश रिटायर्ड सरकारी अधिकारी थे. घर में 4 लोग थे. स्नेहा को घर में हमेशा लाड़प्यार ही मिला था. अच्छी बातें ही सिखाई गई थीं पर समय के साथ स्नेहा का लाइफस्टाइल चिंताजनक होता गया था. रिश्तों की उसे कोई कद्र नहीं थी. बस लाइफ ऐंजौय करते हुए तेजी से आगे बढ़ते जाना ही उस की आदत थी. कई लड़कों से उस के संबंध रह चुके थे. एक से ब्रेकअप होता, तो दूसरे से अफेयर शुरू हो जाता. उस से नहीं बनती तो तीसरे से दोस्ती हो जाती. खूब पार्टियों में जाना, डांसमस्ती करना, सैक्स में भी पीछे न हटने वाली स्नेहा को जबजब सविता समझाने बैठीं दोनों में जम कर बहस हुई. सुरेश स्नेहा पर जान छिड़कते थे. उन्होंने ही लंदन बिजनैस स्कूल औफ कौमर्स से उसे शिक्षा दिलवाई. अब वह एक लौ फर्म में ऐनालिस्ट थी. सविता और विनय के अच्छे पारिवारिक मित्र अभय और नीता भी सीए थे और उन का इकलौता बेटा राहुल एक वकील.

एक जैसा व्यवसाय, शौक और स्वभाव ने दोनों परिवारों में बहुत अच्छे संबंध स्थापित कर दिए थे. राहुल बहुत ही अच्छा इनसान था. वह मन ही मन स्नेहा को बहुत प्यार करता था पर स्नेहा को राहुल की याद तभी आती थी जब उसे कोई काम होता था या उसे कोई परेशानी खड़ी हो जाती थी. स्नेहा के एक फोन पर सब काम छोड़ कर राहुल उस के पास होता था.

सविता और विनय की दिली इच्छा थी कि स्नेहा और राहुल का विवाह हो जाए पर अपनी बेटी की ये हरकतें देख कर उन की कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि वे इस बारे में राहुल से बात भी करें, क्योंकि स्नेहा के रंगढंग राहुल से छिपे नहीं थे. पर वह स्नेहा को इतना प्यार करता था कि उस की हर गलती को मन ही मन माफ करता रहता था. उस के लिए प्यार, केयर, मानवीय संवेदनाएं बहुत महत्त्व रखती थीं पर स्नेहा तो इन शब्दों का अर्थ भी नहीं जानती थी.

समय अपनी रफ्तार से चल रहा था. स्नेहा अपनी मरजी से ही घर आतीजाती.  विनय और सविता के समझाने का उस पर कोई असर नहीं था. जब भी दोनों कुछ डांटते, सुरेश स्नेहा को लाड़प्यार कर बच्ची है समझ जाएगी कह कर बात खत्म करवा देते. वे अब बीमार चल रहे थे. स्नेहा में उन की जान अटकी रहती थी. अपना अंतिम समय निकट जान उन्होंने अपना अच्छा खासा बैंक बैलेंस सब स्नेहा के नाम कर दिया.

एक रात सुरेश सोए तो फिर नहीं जागे. तीनों बहुत रोए, बहुत उदास हुए, कई दिनों तक रिश्तेदारों और परिचितों का आनाजाना लगा रहा. फिर धीरेधीरे सब का जीवन सामान्य होता गया. स्नेहा अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई. वैसे भी किसी भी बात को, किसी भी रिश्ते को गंभीरतापूर्वक लेने का उस का स्वभाव था ही नहीं. अब तो वह दादा के मोटे बैंक बैलेंस की मालकिन थी. इतना खुला पैसा हाथ में आते ही अब वह और आसमान में उड़ रही थी. सब से पहले उस ने मातापिता को बिना बताए एक कार खरीद ली.

सविता ने कहा, ‘‘अभी से क्यों खरीद ली? हमें बताया भी नहीं?’’

‘‘मौम, मुझे मेरी मरजी से जीने दो. मैं लाइफ ऐंजौय करना चाहती हूं. रात में मुझे कभी कोई छोड़ता है, कभी कोई. अब मैं किसी पर डिपैंड नहीं करूंगी. दादाजी मेरे लिए इतना पैसा छोड़ गए हैं, मैं क्यों अपनी मरजी से न जीऊं?’’

विनय ने कहा, ‘‘बेटा, अभी तुम्हें ड्राइविंग सीखने में टाइम लगेगा, पहले मेरे साथ कुछ प्रैक्टिस कर लेती.’’

‘‘अब खरीद भी ली है तो प्रैक्टिस भी हो जाएगी. ड्राइविंग लाइसैंस भी बन गया है. आप लोग रिलैक्स करना सीख लें, प्लीज.’’

अब तो रात में लौटने का स्नेहा का टाइम ही नहीं था. कभी भी आती, कभी भी जाती. सविता ने देखा था वह गाड़ी बहुत तेज चलाती है. उसे टोका, ‘‘गाड़ी की स्पीड कम रखा करो. मुंबई का ट्रैफिक और तुम्हारी स्पीड… बहुत ध्यान रखना चाहिए.’’

‘‘मौम, आई लव स्पीड, मैं यंग हूं, तेजी से आगे बढ़ने में मुझे मजा आता है.’’

‘‘पर तुम मना करने के बाद भी पार्टीज में ड्रिंक करने लगी हो, मैं तुम्हें समझा कर थक चुकी हूं, ड्रिंक कर के ड्राइविंग करना कहां की समझदारी है? किसी दिन…’’

‘‘मौम, मैं भी थक गई हूं आप की बातें सुनतेसुनते, जब कुछ होगा, देखा जाएगा,’’ पैर पटकते हुए स्नेहा कार की चाबी उठा कर घर से निकल गई.

सविता सिर पकड़ कर बैठ गईं. बेटी की हरकतें देख वे बहुत तनाव में रहने लगी थीं. समझ नहीं आ रहा था बेटी को कैसे सही रास्ते पर लाएं.

एक दिन फिर स्नेहा ने किसी पार्टी में खूब शराब पी. अपने नए बौयफ्रैंड विक्की के साथ खूब डांस किया, फिर विक्की को उस के घर छोड़ने के लिए लड़खड़ाते हुए ड्राइविंग सीट पर बैठी तो विक्की ने पूछा, ‘‘तुम कार चला पाओगी या मैं चलाऊं?’’

‘‘डोंट वरी, मुझे आदत है,’’ स्नेहा नशे में डूबी गाड़ी भगाने लगी, न कोई चिंता, न कोई डर.

अचानक उस ने गाड़ी गलत दिशा में मोड़ ली और सामने से आती कार को भयंकर टक्कर मार दी. तेज चीखों के साथ दोनों कारें रुकीं. दूसरी कार में पति ड्राइविंग सीट पर था, पत्नी बराबर में और बच्चा पीछे. चोटें स्नेहा को भी लगी थीं. विक्की हकबकाया सा कार से नीचे उतरा. उस ने स्नेहा को सहारा दे कर उतारा. स्नेहा के सिर से खून बह रहा था. दोनों किसी तरह दूसरी कार के पास पहुंचे तो स्नेहा की चीख से वातावरण गूंज उठा. विक्की ने भी ध्यान से देखा तो तीनों खून से लथपथ थे. पुरुष शायद जीवित ही नहीं था.

विक्की चिल्लाया, ‘‘स्नेहा, शायद कोई नहीं बचा है. उफ, पुलिस केस हो जाएगा.’’

स्नेहा का सारा नशा उतर चुका था. रोने लगी, ‘‘विक्की, प्लीज, हैल्प मी, क्या करें?’’

‘‘सौरी स्नेहा, मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा. प्लीज, कोशिश करना मेरा नाम ही न आए. मेरे डैड बहुत नाराज होंगे, सौरी, मैं जा रहा हूं.’’

‘‘क्या?’’ स्नेहा को जैसे तेज झटका लगा, ‘‘तुम रात में इस तरह मुझे छोड़ कर जा रहे हो?’’

विक्की बिना जवाब दिए एक ओर भागता चला गया. सुनसान रात में अकेली, घायल खड़ी स्नेहा को हमेशा की तरह एक ही नाम याद आया, राहुल. उस ने फौरन राहुत को फोन मिलाया. हमेशा की तरह राहुल कुछ ही देर में उस के पास था. स्नेहा राहुल को देखते ही जोरजोर से रो पड़ी. स्नेहा डरी हुई, घबराई हुई चुप ही नहीं हो रही थी.

राहुल ने उसे गले लगा कर तसल्ली दी, ‘‘मैं कुछ करता हूं, मैं हूं न, तुम पहले हौस्पिटल चलो, तुम्हें काफी चोट लगी है, लेकिन उस से पहले भी कुछ जरूरी फोन कर लूं,’’ कह उस ने अपने एक पुलिस इंस्पैक्टर दोस्त राजीव और एक डाक्टर दोस्त अनिल को फोन कर तुरंत आने के लिए कहा.

अनिल ने आकर उन 3 लोगों का मुआयना किया. तीनों की मृत्यु हो चुकी थी. सब सिर पकड़ कर बैठ गए. स्नेहा सदमें में थी. उस पर केस तो दर्ज हो ही चुका था. उसे काफी चोटें थीं तो पहले तो उसे ऐडमिट किया गया.

सरिता और विनय भी पहुंच चुके थे. स्नेहा मातापिता से नजरें ही नहीं मिला पा रही थी. कई दिन पुलिस, कोर्टकचहरी, मानसिक और शारीरिक तनाव से स्नेहा बिलकुल टूट चुकी थी. उस की जिंदगी जैसे एक पल में ही बदल गई थी. हर समय सोच में डूबी रहती. उस के लाइफस्टाइल के कारण 3 लोग असमय ही दुनिया से जा चुके थे. वह शर्मिंदगी और अपराधबोध की शिकार थी. 1-1 गलती याद कर, बारबार अपने मातापिता और राहुल से माफी मांग रही थी. राहुल और सविता ने ही उस का केस लड़ा. रातदिन एक कर दिया. भारी जुर्माने के साथ स्नेहा को थोड़ी आजादी की सांस लेने की आशा दिखाई दी. रातदिन मानसिक दबाव के कारण स्नेहा की तबीयत बहुत खराब हो गई. उसे हौस्पिटल में ऐडमिट किया गया. अभी तो ऐक्सिडैंट की चोटें भी ठीक नहीं हुई थीं. उस की जौब भी छूट चुकी थी. पार्टियों के सब संगीसाथी गायब थे. बस राहुल रातदिन साए की तरह साथ था. हौस्पिटल के बैड पर लेटेलेटे स्नेहा अपने बिखरे जीवन के बारे में सोचती रहती. कार में 3 मृत लोगों का खयाल उसे नींद में भी घबराहट से भर देता. कोर्टकचहरी से भले ही सविता और राहुल ने उसे जल्दी बचा लिया था पर अपने मन की अदालत से वह अपने गुनाहों से मुक्त नहीं हो पा रही थी.

विनय, सविता, राहुल और उस के मम्मीपापा अभय और नीता भी अपने स्नेह से उसे सामान्य जीवन की तरफ लाने की कोशिश कर रहे थे. अब उसे सहीगलत का, अच्छेबुरे रिश्तों का, भावनाओं का, अपने मातापिता के स्नेह का, राहुल की दोस्ती और प्यार का एहसास हो चुका था.

एक दिन जब विनय, सविता, अभय और नीता चारों उस के पास थे, बहुत सोचसमझ कर उस ने अचानक सविता से अपना फोन मांग कर राहुल को फोन किया और आने के लिए कहा.

हमेशा की तरह राहुल कुछ ही देर में उस के पास था. स्नेहा ने उठ कर बैठते हुए राहुल का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘इस बार तुम्हें किसी काम से नहीं, सब के सामने बस इतना कहने के लिए बुलाया है, आई एम सौरी फौर ऐवरीथिंग, आप सब मुझे माफ कर दें और राहुल, तुम कितने अच्छे हो,’’ कह कर रोतेरोते स्नेहा ने राहुल के गले में बांहें डाल दीं तो राहुल वहां उपस्थित चारों लोगों को देख कर पहले तो शरमा गया, फिर हंस कर स्नेहा को अपनी बांहों के सुरक्षित घेरे में ले कर अपने मातापिता, फिर विनय और सविता को देखा तो बहुत दिनों बाद सब के चेहरे पर एक मुसकान दिखाई दी, सब की आंखों में अपनी इच्छा पूरी होने की खुशी साफसाफ दिखाई दे रही थी.

Social Story : तूफान की वह रात

Social Story : जैसी कि उम्मीद थी, शाम को पटना एयरपोर्ट पर एयरबस के उतरते ही उस ने चैन की सांस ली. मगर अभी तो बस शुरुआत थी. आगे के झंझावातों को भी तो उसे झेलना था. पंकज शर्मा की डेड बौडी भी इसी फ्लाइट से आई थी. और उसी के साथ उसे भी गांव  जाना था. पहली बार वह विमान पर चढ़ा था. मगर पहली बार फ्लाइट पर जाने का उसे कोई रोमांच या खुशी नहीं थी.

पंकज एक शिपिंग कंपनी में मैरीन इंजीनियर थे और उन की अच्छीभली स्थायी नौकरी और तनख्वाह थी. फिर उन के परिवार वाले संपन्न किसान भी थे. उन्होंने ही अपने खर्च पर पंकज शर्मा के शव को यहां मंगवाया था कि उन का दाह संस्कार अपने ही गांव में हो. और इसी बहाने वह भी साथ आ गया था.

पंकज शर्मा के बड़े भाई और उन के दो भतीजे भी साथ थे. संभवतः वे वहीं समस्तीपुर से ही एम्बुलेंस की व्यवस्था कर पटना एयरपोर्ट आए थे.

कोरोना के चक्कर में इस समय औक्सीजन और दवाओं के साथ अस्पतालों में बेड व एम्बुलेंस के लिए भी तो मारामारी थी.

कोरोना की जांच और दूसरी सुरक्षा जांच संबंधी औपचारिकताओं को पूरा करने में ही एक घंटा खर्च हो गया था. फिर बाहर निकलते ही पंकज शर्मा की डेड बौडी को एम्बुलेंस की छत पर रख कर बांधा जाने लगा. वह चुपचाप सारी गतिविधियां देखता रहा. उन का 16 साल का बेटा अनूप  अभी भी फूटफूट कर रो रहा था. उन के बड़े भाई नारायण की भी आंखें नम थीं.

पंकज शर्मा का भतीजा आलोक उसी की हमउम्र था और सभी कामों में काफी तत्परता दिखा रहा था.

वैसे तो आलोक मैट्रिक तक उसी का क्लासमेट था. वह उस के स्वभाव को जानता था कि वह कितना कामचोर और आलसी है. मगर आज उस की काम के प्रति तेजी देखते ही बनती थी. सच है, समय व्यक्ति को किस तरह बदल कर रख देता है.

“अब खड़े क्या हो राजन, आगे जा कर बैठ जाओ,” आलोक बोला, “हम अभी चलेंगे तो शाम के 7 बजे तक समस्तीपुर पहुंच
पाएंगे. फिर वहां से अपने गांव गणेशी पहुंचने में कितनी देर लगेगी.”

वह चुपचाप ड्राइवर की बगल वाली सीट पर जा कर बैठ गया.

एम्बुलेंस अपने गंतव्य की ओर दौड़ चली थी.

लौकडाउन की वजह से सड़कें शांत थीं. पटना के हर प्रमुख चौराहे पर गश्ती पुलिस का पहरा था. वहां यह बताते ही कि वह एयरपोर्ट से आ रहे हैं, कोई कुछ कहता नहीं था. गंगा सेतु पार करते ही एम्बुलेंस पूरी रफ्तार में आ गई थी.

6 बजे तक वह समस्तीपुर में थे. वहां भी हर गलीचौराहे पर लौकडाउन की वजह से पुलिस का पहरा था. साढ़े 6 बजे तक वह अब अपने गणेशी गांव में थे और अब एम्बुलेंस ‘शर्मा भवन’ के आगे खड़ी थी.

एम्बुलेंस देखते ही पंकज शर्मा की पत्नी चित्कार मार बाहर निकली और उस के आगे पछाड़ खा कर गिर पड़ी. मां और बहन अलग दहाड़ें मार कर रो रहे थे.

सबकुछ जैसे तैयार ही था. दरवाजे पर घंटेभर के लिए शव को रखा गया था और लोग मुंह पर मास्क लगाए अंतिम दर्शनों के लिए आजा रहे थे. वह चुपचाप अपना बैग संभाले खड़ा रहा. छोटा भाई माखन आया और उस का बैग लेते हुए बोला, “अब घर चलिए भैया. मां इंतजार कर रही हैं तुम्हारा.”

“अंत्येष्टि पूरी होने के बाद घर जाते हुए,” उस ने जैसे खुद से कहा, “गांव तो आ ही गया हूं. थोड़ी देर और सही…”

“अभी यहां की औपचारिकताएं पूरी होने में देर तो लगेगी ही,” आलोक उस के असमंजस और कशमकश को देखते हुए बोला, “नहीं राजन, तुम घर हो आओ. तुम भी काफी थक गए हो. मैं समझ सकता हूं. जब हम मुक्तिधाम को चलेंगे, उसी समय आ जाना.”

उसे देखते ही मां उस से चिपट कर रोने लगी, “मैं तो समझी कि सारा खेल खत्म हो गया. यह मेरे किसी पुण्य का प्रताप है कि तुम बच कर आ गए राजू. मेरा पुनर्जन्म हुआ है. सालभर पहले ही तुम्हारे पिता का देहांत हुआ था. कितनी मुश्किल से खुद को सम्हाला है मैं ने.”

“अब बीती बातों को छोड़ो मां,” उस की भी आंख भर आई थी, “क्या करता, बाबूजी के जाने के बाद घर में एक चवन्नी तक नहीं थी. उलटे उन के श्राद्धकर्म के नाम पर बिरादरी वालों ने कर्ज का पहाड़ चढ़ा दिया था. उसे उतारने के लिए ही तो मुझे मुंबई जाना पड़ गया.”

“मगर, लौटे तो किस हालत में…” मां रोते हुए कह रही थी, “अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो मैं तो जीतेजी मर जाती.”

“अब ये बातें छोड़ो मां,” वह बोला, “पंकज शर्मा की अंत्येष्टि के लिए मुझे जाना ही होगा. यह उन का ही अहसान है कि मैं कुछ कमाने लायक बन पाया हूं.”

माखन ने बाहर ही एक बालटी पानी और मग रख ला कर दिया था. वह वहीं अपने कपड़े उतार कर हाथमुंह धोने लगा था.

“भैया, आप नहा लीजिए. दिनभर से आप दौड़धूप कर रहे होगे. नहाने से थोड़ी थकान मिट जाएगी. गरमी बहुत है. मैं एक बालटी पानी और ला देता हूं.”

उस ने लगे हाथ नहा लेना ही ठीक समझा. मई का मौसम वैसे ही गरमी का है. थोड़ी तो राहत मिलेगी.

बाहर ही चौकी रखी थी. गरमियों में आमतौर पर बिहार में चौकीखाट वगैरह रात में पुरुषोंबच्चों के सोने के लिए निकाल दिए जाते हैं. वह वहीं आराम से बैठ गया. मां उस पर ताड़ के पत्तों से पंखे की तरह झलने लगी.

नहाने के बाद मां ने उसे चाय का गिलास और घर के बने नमकीन की तश्तरी उस के आगे धर दी थी. दोनों छोटे भाईबहन भी वहीं आ कर बैठ गए थे. उस ने जल्दीजल्दी चाय पी और नमकीन खत्म कर बोला, “शर्माजी के घर हो कर आता हूं. तुम इंतजार करना. जल्दी ही लौट आऊंगा.”

रात लगभग 9 बजे अर्थी उठी और वह भी सभी के साथ श्मशान घाट तक गया. दाह संस्कार के बीच वह जैसे शून्य में खोया सा था कि तभी आलोक आ कर उस से बोला, “राजू भाई, यह अचानक क्या हो गया?”

“क्या कहूं आलोक,” वह फफकफफक कर रो पड़ा, “मृत्यु नजदीक थी. कुछ को मुक्ति मिल गई. कुछ हमारे जैसे लोग भारतीय नौसेना की वजह से बच गए.”

“अब जो होना था, हो ही गया,” आलोक उसे सांत्वना देते हुए कहने लगा, “कुछकुछ जानकारी हमें भी हुई है. तुम बहुत थके हो और परेशान भी रहे. अब घर लौट जाओ. यहां हम कई लोग हैं देखने के लिए.”

उस के मन में वापस लौटने की इच्छा थी, मगर वह संकोचवश उठ नहीं रहा था. भारी मन लिए वह वहां से उठा और घर चला आया.

एक बार पुनः स्नान कर वह ताजातरीन हुआ और बेमन से खाना वगैरह खा कर बाहर बिछी चौकी पर लेट गया. छोटा भाई आ कर पैर दबाने लगा. उस ने उसे मना किया, तो वह मनुहार भरे स्वर में बोला, “इसी बहाने तुम्हारे पास हूं भैया. यहां मां और दीदी कितना रोती हैं.”

“क्योंक्यों, क्या बात हुई?” वह उठ कर बैठ गया, “फिर तुम तो घर पर ही हो.”

“मगर, मैं क्या कर सकता हूं. मैं तो बहुत छोटा हूं,” वह सुबकता हुआ बोला, “एक तो तुम इतनी दूर चले गए. उस पर ये तूफान वाला हादसा हुआ तो हम बहुत डर गए.”

“डरने की कोई बात नहीं. मैं हूं ना. अब बाहर नहीं जाता तो घर के खर्चे कैसे चलते?” वह उसे समझाते हुए बोला, “अब तुम जाओ. रात बहुत हो गई है इसलिए जा कर सो जाओ. मुझे भी नींद आ रही है. कल ढेर सारी बातें करूंगा.”

“नहीं, मैं तुम्हारे साथ ही सोऊंगा.”

“ठीक है, सो जा,” उस ने उसे अपने बगल में सुलाते हुए कहा.

अब वह सोने का प्रयास करने लगा था, मगर नींद अब आंखों से कोसों दूर थी. ऊपर आसमान तारों से सजा था, जिसे वह निहार रहा था. वह उन में कहीं पंकज शर्मा को खोज रहा था शायद, कि उसे अपने दिवंगत पिता की याद आ गई.

विगत वर्ष जब उस के पिता का देहांत हुआ था तो इसी प्रकार के भयावह शून्य को देख कर घबराया था. उन के अंतिम क्रिया संपन्न होने के बाद समस्या यह थी कि अब रोजमर्रा के खर्चे कैसे चलेंगे. तिस पर बिरादरी वालों ने श्राद्ध के नाम से अलग शाहीखर्च करा उस के घर को कर्ज में डुबा गए थे. उस की भी उसे भरपाई करनी थी. थोड़ी सी खेती थी. दरअसल, उसी पर सभी की दृष्टि लगी थी. मगर मां उसे किसी भी कीमत पर बेचने को तैयार नहीं थी. बहुत

उस ने भागदौड़ की. उस ने 3 साल पहले ही आईटीआई से वेल्डर का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया था. मगर सरकारी तो दूर, कोई प्राइवेट नौकरी भी उसे नहीं मिल रही थी. वह वहीं समस्तीपुर में एक ग्रिल बनाने वाली दुकान में बतौर वेल्डर लग गया था कि घर बैठने से अच्छा है कि कुछ किया जाए. इस से काम में हाथ भी साफ रहता और परिपक्वता भी आती.

उन्हीं दिनों पंकज शर्मा छठ त्योहार के अवसर पर घर आए थे. वह मुंबई में किसी शिपिंग कंपनी में मैरीन इंजीनियर के अच्छे पद परथे. एक दिन वह किसी काम के सिलसिले में उन के छोटे भाई आलोक से मिलने गया, तो उस से भेंट हो गई. वह उस के घर का हालचाल पूछने लगे, तो जैसे दिल का दर्द बाहर उमड़ आया, “आप से कुछ छुपा तो है नहीं. दानेदाने तक के लिए मोहताज थे हम. तभी मैं समस्तीपुर में उस ग्रिल बनाने वाली दुकान पर जाने लगा. इस लौकडाउन में तो हमारी क्या, सभी की हालत खराब रही. वे बस कुछ खानेपीने भर को दे देते हैं. छोटे भाई को अगले साल बारहवीं की परीक्षा देनी है. पता नहीं, वह पैसों के चलते फार्म भर पाएगा कि नहीं. वह इसीलिए विक्षिप्त सा हो रहा है. छोटी बहन को भी दसवीं की परीक्षा देनी है. उस की पढ़ाई में कुछ खर्च तो होता नहीं, मगर भोजनपानी तो चाहिए ही चाहिए ना. उधर हमारी थोड़ी सी बची जमीन पर गिद्धदृष्टि लगाए बैठे हैं. वो कैसे बचेगी, और बड़ी बात यह कि हम कैसे बचें, समझ नहीं पाता हूं.

“आप तो मुंबई में अच्छे पद पर हैं. वहां कुछ जुगाड़ हो पाता मेरा तो बहुत अच्छा रहता. मुमकिन हो तो आप अपनी शिपिंग कंपनी में  ही मुझे रखवा लें.”

“अरे, मैं भी तो उस कंपनी में मुलाजिम ही हूं,” कहते हुए वह जोरों से हंसे थे, “मैं वहां क्या कर सकता हूं…?”

थोड़ी देर ठहर कर कुछ याद करते हुए से वह बोले, “तुम ने वेल्डिंग ट्रेड से आईटीआई पास किया है ना. कैसा काम है तुम्हारा?”

“अब मैं अपने मुंह से अपनी प्रशंसा क्या करूं. मैं जिस दुकान में काम करता हूं, उन्हीं से पूछ लीजिएगा. इस फिनिशिंग से काम करता हूं कि सभी मेरी वेल्डिंग की प्रशंसा करते हैं.”

“मैं जिस जहाज पर काम करता हूं, उस के कैप्टन ने मुझ से किसी अच्छे वेल्डर के बारे में बात की थी. मगर भाई, सागर में जहाज की नौकरी रहेगी. पता नहीं, तुम्हें पसंद आए या नहीं? वैसे, पैसे अच्छे मिलेंगे. संभवतः 20,000 रुपए महीने के दें.”

उस ने उन के पैर पकड़ लिए थे, “मुझे मंजूर है, समुद्र के जहाज पर रहना. कम से कम मेरी मां तो ठीक से रहेगी. भाईबहन थोड़ी पढ़ाई तो कर पाएंगे. आप मुझे साथ ले चलिए.”

और इस प्रकार वह पंकज शर्मा के साथ मुंबई आ गया था. वहां पहले उसे शिपिंग कंपनी के तकनीकी विभाग में रखा गया. फिर वह जहाजों पर ही काम करने लगा था. कैसा नीरस जीवन था यहां का. समुद्र तट से सैकड़ों मील दूर स्थित जहाजों में टूटफूट होती रहती थी और उस के साथ ही मरम्मत का काम भी चलता था. चूंकि जहाज लोहेइस्पात के ही बने  होते हैं. और इस के लिए कुशल तकनीशियनों की जरूरत पड़ती ही थी. शीघ्र ही उस ने अपने काम से सभी का दिल जीत लिया था.

पंकज शर्मा का जीवन तो समुद्र में खड़े जहाजों के बीच ही गुजरता था. फिर भी उन्होंने मुंबई के उपनगर अंधेरी में एक कमरा ले रखा था. वेतन मिलते ही वह वहां जाते और कुछ आवश्यक खरीदारी के साथ घर पैसा भेज देते थे. अगले माह जब वेतन मिला, तो वह उसे भी साथ ले गए.

वह तो अपने वेतन के 20,000 रुपयों को एकसाथ घर भेजने पर उतारू था. उन्होंने उसे समझाया कि अब तो उसे यहीं रहना है. इसलिए जरूरी सामान और कपड़े खरीद लो. और इस प्रकार उसे जूतेकपड़े आदि के साथ ब्रशमंजन से ले कर शेविंगकिट्स तक की खरीदारी कराई, जिस में उस के 8,000 रुपए निकल गए थे.

वह उस से हंस कर बोले, “यह मुंबई पैसों की नगरी है. यहां सारा खेल पैसों का ही है. अभी अपने पास 2,000 रुपए रखो और बाकी 10,000 रुपए घर भेज दो.”

शर्माजी के एकाउंट की मारफत वह मां के पास 10,000 रुपए भिजवा कर निश्चिंत हो पाया था. लगे हाथ उन्होंने उस का वहीं उसी बैंक में एकाउंट भी खुलवा दिया था.

नवंबर में वह यहां मुंबई आया था. जहाज का यह समुद्री जीवन अजीब था. चारो तरफ समुद्र की ठाठें मारती खारे पानी की लहरें और बजरे का बंद जीवन. दिनभर किसी जहाज में काम करो और फिर शाम को बजरे में बंद हो जाओ. हजारोंलाखों लोगों का जीवन इसी समुद्र के भरोसे चलता है. विशालकाय व्यापारिक जहाजों से ले कर सैकड़ों छोटीबड़ी नौकाएं अपने मछुआरों के संग जाल या महाजाल बिछाए मछली पकड़ती व्यस्त रहती हैं. ऐसे में वह कोई अनोखा तो नहीं, जो यहां रह नहीं पाए. उसे अभी मौजमस्ती की क्या जरूरत. उसे तो अभी अपने परिवार के अभावों के जाल काटना है. यहां खानेपीने की समस्या नहीं. ठेकेदार की तरफ से सभी के लिए यहां निःशुल्क भोजन की भी व्यवस्था है. पंकज शर्मा ने उसे अपना छोटा मोबाइल दे दिया था, जिस से वक्तजरूरत मां या भाईबहन से बात कर लिया करता था.

Love Story In Hindi : खुशबू तो ऐसा ख्वाब थी जिस के लिए क्या कहें

Love Story In Hindi : दिल्ली से बैंगलुरु का सफर लंबा तो था ही, लेकिन जयंत की बेसब्री भी हद पार कर रही थी. 3 साल बाद खुशबू से मिलने का वक्त जो नजदीक आ रहा था. मुहब्बत में अगर कामयाबी मिल जाए तो इनसान को दुनिया जीत लेने का अहसास होने लगता है.

ट्रेन सरपट भाग रही थी लेकिन जयंत को उस की रफ्तार बैलगाड़ी सी धीमी लग रही थी. रात के 9 बज रहे थे. उस ने एक पत्रिका निकाल कर अपना ध्यान उस में बांटना चाहा लेकिन बेजान काले हर्फ और कागज खुशबू की कल्पना की क्या बराबरी करते?

खुशबू तो ऐसा ख्वाब थी, जिसे पूरा करने में जयंत ने खुद को झोंक दिया था. उस की हर शर्त, हर हिदायत को आज उस ने पूरा कर दिया था. अब फैसला खुशबू का था.

जयंत ने मोबाइल फोन निकाला. खुशबू का नंबर डायल किया लेकिन फिर अचानक फोन काट दिया. उसे याद आया कि खुशबू ने यही तो कहा था, ‘जब सच में कुछ बन जाओ तब मुहब्बत को पाने की बात करना. उस से पहले नहीं. मैं तब तक तुम्हारा इंतजार करूंगी.’

मोबाइल फोन वापस जेब के हवाले कर जयंत अपनी बर्थ पर लेट गया. सुख के इन लमहों को वह खुशबू की यादों में जीना चाहता था.

5 साल पहले जब जयंत दिल्ली आया था तो वह कुछ बनने के सपने साथ लाया था लेकिन दिल्ली की फिजाओं में उसे खुशबू क्या मिली, जिंदगी की दशा और दिशा ही बदल गई.

जयंत ने मुखर्जी नगर, दिल्ली के एक नामी इंस्टीट्यूट में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए दाखिला लिया तो वहां पढ़ाने वाली मैडम खुशबू का जादू पहली नजर में ही प्यार में बदल गया.

भरापूरा बदन और बेहद खूबसूरत. झील सी आंखें. घुंघराले लंबे बाल. बदन का हर अंग ऐसा कि सामने वाला देखता ही रह जाए.

जयंत ने खुशबू से बातचीत शुरू करने की कोशिश की. क्लास में वह अकसर मुश्किल सवाल रखता पर खुशबू की सब्जैक्ट पर गजब की पकड़ थी. जयंत उसे कभी अटका नहीं पाया. लेकिन उस में भी बहुत खूबियां थीं इसलिए खुशबू उसे स्पैशल समझने लगी.

उस दिन क्लास जल्दी खत्म हो गई. खुशबू ने जयंत को रुकने का इशारा किया. थोड़ी देर बाद वे दोनों एक कौफी हाउस में थे और वहां कहीअनकही बहुत सी बातें हो गईं. नजदीकियां बढ़ने लगीं तो समय पंख लगा कर उड़ने लगा.

एक दिन मौका देख कर जयंत ने खुशबू को प्रपोज भी कर दिया, लेकिन खुशबू ने वैसा जवाब नहीं दिया जैसी जयंत को उम्मीद थी.

खुशबू की बहन की शादी थी. उस ने जयंत को न्योता दिया तो जयंत भला ऐसा मौका क्यों छोड़ता? काफी अच्छा आयोजन था लेकिन जयंत को इस सब में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी.

दकियानूसी रस्में रातभर चलने वाली थीं, इसलिए जयंत मेहमानों के रुकने वाले हाल में जा कर सो गया. लोगों की आवाजें वहां भी आ रही थीं. सब बाहर मंडप में थे.

रात में अचानक किसी की छुअन की गरमाहट से जयंत की नींद खुली. हाल की लाइट बंद थी, लेकिन अपनी चादर में लड़की की छुअन वह अंधेरे में भी पहचान गया था.

खुशबू इस तरह उस के साथ… ऐसा सोचना भी मुश्किल था. लेकिन अपने प्यार को इतना करीब पा कर कौन मर्द अपनेआप पर कंट्रोल रख सकता है?

चंद लमहों में वे दोनों एकदूसरे में समा जाने को बेताब होने लगे. खुशबू के चुंबनों ने जयंत को मदहोश कर दिया. अपने करीब खुशबू को पा कर उसे जैसे जन्नत मिल गई.

तूफान थमा तो खुशबू वापस शादी की रस्मों में शामिल हो गई और जयंत उस की खुशबू में डूबा रहा.

कुछ दिन बाद ऐसा ही एक और वाकिआ हुआ. तेज बारिश थी. मंडी हाउस से गुजरते समय जयंत ने खुशबू को रोड पर खड़ा पाया.

जयंत ने फौरन उस के नजदीक पहुंच कर अपनी मोटरसाइकिल रोकी. दोनों उस पर सवार हो इंडिया गेट की ओर निकल गए.

खुशबू को रोमांचक जिंदगी पसंद थी इसलिए वह इस मौके का लुत्फ उठाना चाहती थी. बारिश का मजा रोमांच में बदल रहा था. प्यार में सराबोर वे घंटों सड़कों पर घूमते रहे.

जयंत और खुशबू की कहानी ऐसे ही आगे बढ़ती रही कि तभी अचानक इस कहानी में एक मोड़ आया. खुशबू ने जयंत को ग्रैंड होटल में बुलाया. डिनर की यह पार्टी अब तक की सब पार्टियों से अलग थी. खुशबू की खूबसूरती आज जानलेवा महसूस हो रही थी.

‘आज तुम्हारे लिए स्पैशल ट्रीट जयंत,’ मुसकरा कर खुशबू ने कहा.

‘किस खुशी में?’ जयंत ने पूछा.

‘मुझे नई नौकरी मिल गई… बैंगलुरु में असिस्टैंट प्रोफैसर की.’

जयंत का दिल टूट गया था. खुशबू को सरकारी नौकरी मिल गई थी, इस का मतलब उस की जुदाई भी था.

जयंत ने दुखी लहजे में खुशबू को उस की जुदाई का दर्द कह सुनाया.

खुशबू ने मुसकराते हुए कहा, ‘वादा करो तुम पहले कंपीटिशन पास करोगे, नौकरी मिलने के बाद ही मुझ से मिलने आओगे… उस से पहले नहीं… न मुझे फोन करोगे और न ही चैट…

‘मैं तुम्हारी टीचर रही हूं इसलिए मुझे यह गिफ्ट दोगे. फिर हम शादी करेंगे… एक नई जिंदगी… एक नई प्रेम कहानी… मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.

‘3 साल का समय… बस, तुम्हारी यादों के सहारे निकालूंगी.’

अचानक से सबकुछ खत्म हो गया. धीरेधीरे समय बीतने लगा. जयंत ने अपना वादा तोड़ खुशबू को फोन भी किए लेकिन उस ने मीठी झिड़की से उसे पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा.

जयंत को भी यह बात चुभ गई. अब पूरा समय वह अपनी पढ़ाई पर देने लगा. प्यार में बड़ी ताकत होती है इसलिए मुहब्बत की कशिश इनसान से कोई भी काम करा लेती है.

जयंत को भारतीय सर्वेक्षण विभाग में अच्छी नौकरी मिल गई. अब खुशबू को पाने में कोई रुकावट नहीं बची थी. जयंत ने अपना वादा पूरा कर लिया था.

अचानक ट्रेन रुकी तो जयंत की नींद खुली. सुबह होने को थी. बैंगलुरु अभी दूर था. जयंत दोबारा आंखें मूंदे हसीन सपनों में खो गया.

टे्रन जब बैंगलुरु पहुंची, तब तक शाम हो चुकी थी. जयंत ने खुशबू को फोन मिलाया लेकिन फोन किसी अनजान ने उठाया. वह नंबर खुशबू का नहीं था. उस का नंबर अब बदल चुका था. दूसरे दिन वह मालूम करता हुआ खुशबू के कालेज पहुंचा.

लाल गुलाब और खुशबू के लिए गिफ्ट से भरे बैग जयंत के हाथों में लदे थे. वैसे भी जयंत को खुशबू को उपहार देने में बड़ा सुकून मिलता था. अपनी पौकेटमनी बचाबचा कर वह उस के लिए छोटेछोटे गिफ्ट लाता था जिन्हें पा कर खुशबू बहुत खुश होती थी.

खुशी से लबरेज जयंत कालेज गया. खुशबू के रूम में पहुंचा तो जयंत को देख वह उछल पड़ी. मिठाई का डब्बा आगे कर जयंत ने उसे खुशखबरी सुनाई.

खुशबू ने एक टुकड़ा मुंह में रखा और जयंत को शुभकामनाएं दीं.

जयंत में सब्र कहां था. उस ने आगे बढ़ उस का हाथ थामा और चुंबन रसीद कर दिया.

‘‘प्लीज जयंत… यह सब नहीं… प्लीज रुक जाओ,’’ अचानक खुशबू ने सख्त लहजे में जयंत को टोकते हुए रोका.

‘‘लेकिन यार, अब तो मैं ने अपना वादा पूरा कर दिया… तुम से मेरी शादी…’’ निराश जयंत ने पूछा.

‘‘सौरी जयंत… प्लीज… मैं ने शादी कर ली है. अब वे सब बातें तुम भूल जाओ..’’

‘‘क्या? भूल जाऊं… मतलब?’’ जयंत उसे घूरते हुए बोला.

‘‘हां, मुझे भूलना होगा,’’ मुसकराते हुए खुशबू बोली, ‘‘वे सब मजाक की बातें थीं… 3 साल पहले कही गई

बातें… क्या अब इतने दिन बाद… तुम्हें तो मुझ से भी अच्छी लड़कियां मिलेंगी…’’ मुसकराते हुए खुशबू बोली.

जयंत उलटे पैर लौट पड़ा. लाल गुलाब उस के भारी कदमों के नीचे कुचल रहे थे. मजाक की बातें शायद 3 साल में खत्म हो जाती हैं… माने खो देती हैं… जयंत समझने की नाकाम कोशिश करने लगा.

Tourist : पर्यटक को बैन करना नहीं, आपको मैनेज करना आना चाहिए

Tourist : हिमाचल के लाहौल में स्थित मशहूर पर्यटन स्थल सिस्सू 40 दिनों तक पर्यटकों के लिए बंद रहेगा. पंचायत ने धार्मिक कारणों से यहां पर्यटकों की एंट्री पर पूरी तरह रोक लगाई है. कहा जा रहा है उनका देवी-देवताओं के पूजन, अनुष्ठानों और पारंपरिक रीतिरिवाजों की पवित्रता बनाए रखने के उद्देश्य से सिस्सू में 40 दिनों के लिए पर्यटन गतिविधियों पर रोक लगाने का निर्णय लिया है.  इस दौरान किसी भी बाहरी व्यक्ति को पर्यटन स्थल सिस्सू में एंट्री की अनुमति नहीं होगी. यह प्रतिबंध 20 जनवरी से 28 फरवरी जारी रहेगा.

ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्यूंकि टूरिस्ट वहां बहुत गंदगी फैलते है, भीड़ करते है और बहुत तेज म्यूजिक चलते है जिससे वहां के लोगों को परेशानी होती है.

माना ऐसा होता होगा लेकिन क्या इसमें सारा दोष टूरिस्ट का है. अगर कुछ टूरिस्ट लाउड म्यूजिक बजाते हैं, तो आप उन्हें गिरफ्तार क्योंनहीं कर सकते?

आप बोर्ड लगाएं कि यहां लाउड म्यूजिक अलाउड नहीं है. वहां के लोगों को बोले कि आप अपने नियम कायदे बनायें ताकि टूरिस्ट उसे पालन करने पर मजबूर हो जाएँ. उनसे पैसे लीजिए फाइन लगाइये. गलती आपके एडमिनिस्ट्रेशन में भी है. आपने 40 कमरों का होटल बनाने दिया. लेकिन आपने 40 गाड़ियों की जगह नहीं रखी ,तो यह किसकी गलती है?

पर्यटक की या आपकी?

आप टूरिस्ट को क्यों दोष दे रहें हो? टूरिस्ट को पता चला यहाँ होटल मिल रहा है. मैं रात को रह सकता हूं, तो वो आकर रह गया. बाहर छोले भठूरे की दूकान है जिसने सड़क घेर कर ठेला लगा रखा है. अब वहां बैठकर टूरिस्ट ने खाना खा लिया, तो उसकी क्या गलती है. अब दूकान वाले के कूड़े को डंप करने की जिम्मेवारी तो प्रशासन की है. अगर आपने होटल खोलने दिया है, तो उसके कूड़े के निपटारे का आप ख्याल रखों न. इसमें टूरिस्ट क्या करें?

आपने सारी  जिम्मेदारी पर्यटक पर डाल दी है. अगर डस्टबीन है और उन्हें साफ़ करें और कूड़े को सही तरीके से डंप किया जाएँ, तो फिर किसी को कोई परेशानी नहीं होगी? जब पैसे कमाने होते है, तो आप इन होटल्स और होम स्टे वालों को लाइसेंस दे देते है. अगर वहां टूरिस्ट के आने से इतनी ही दिक्कत थी,तो आपने होटल का लाइसेंस क्यूँ दिया? जब एक आम आदमी टूरिस्ट प्लेस पर इन्वेस्ट कर चूका है अब आप कह रहें हो हम पर्यटक को नहीं आने देंगे. आप आसान रास्ता ढूंढ रहें हो.

दरअसल, ये वो लोग हल्ला मचा रहें है जिनकी अपनी प्रॉपर्टी नहीं है. या जिनको लगता है कि इनको बिजनस नहीं मिल रहा. ये वो लोग कर रहें है जिनके घर बने हुए है. जिनका धंधा पर्यटन से चल नहीं रहा. जिनको सरकारी या कोई और नौकरी है, वो कहते है हमे तो पर्यटन से कुछ मिल नहीं रहा. ये टूरिस्ट बेकार ही हमारी आफत कर रहे हैं. लेकिन ये आफत आपकी टूरिस्ट नहीं वहां का प्रशासन कर रहा है. अगर आपने 40 हजार कमरे बनने दिए, तो किसी न किसी दिन तो वे पूरे भरेंगे ही और तब भीड़ का बढ़ना स्वाभाविक है. फिर पहले ही उससे निपटने के पूरे इंतजाम क्यूँ नहीं किये गएँ?

पर्यटन स्थल पर गंदगी और कूड़ा होना प्रशासन की विफलता है, पर्यटकों की नहीं

कई नगर पालिकाओं के पास आज भी 20 साल पुराना कचरा उठाने का सिस्टम है. वे सिर्फ कचरा एक जगह से उठाकर दूसरी जगह फेंक देते हैं, उसे Process नहीं करते.

इसके आलावा बजट और स्टाफ की कमी भी होती है जो गंदगी बढाती है जैसे पर्यटन सीजन में आबादी 10 गुना बढ़ जाती है, लेकिन सफाई कर्मचारी और कचरा ढोने वाली गाड़ियां उतनी ही रहती हैं जितनी स्थानीय आबादी के लिए थीं.

अक्सर पर्यटन विभाग और नगर निगम के बीच तालमेल नहीं होता. काम ‘ठेके’ पर दे दिया जाता है और ठेकेदार केवल खानापूर्ति करते हैं.

पहाड़ों या संकरी गलियों में बड़ी कचरा गाड़ियां नहीं जा पातीं, जिससे कचरा जमा होता रहता है.

हद तो यह है कि ये लोग खुद सही से काम नहीं करते और दोष सारा पर्यटकों के मथे मड देते है. जोकि गलत है. मसूरी शिमला में हर थोड़ी दूरी में ढलान में कचरा मिलेगा.

टूरिस्ट प्लेस की मुन्सिपल कारपोरेशन क्या कर रही है?

बैन करने के बजाएं आप उन्हें कंट्रोल क्यूँ नहीं कर सकते.?

अगर कचरा टूरिस्ट फेक कर जा रहें है, तो उसे उठाया क्यूँ नहीं जा सकता?

क्या कचरा उठाना मुश्किल है?

अगर फलों और सब्जितयों के ट्रक शहर में आ सकते है, तो क्या उनका कूड़ा बहार फेक नहीं सकतें. इस पर एडमिनिस्ट्रेशन क्या कर रहा है? वो साफ़ क्यूँ  नहीं कर सकता?

प्रशासन क्या करें-

अगर साफ़ सफाई का काम रात में होगा तो सुबह सारी सड़के साफ़ मिलेंगी. दिन में केवल Maintenance होना चाहिए.

कचरा शहर से बाहर ले जाने के बजाय, उसे वहीं छोटे-छोटे प्लांट्स में खत्म करना चाहिए.

Black Soldier Fly (BSF) तकनीक: गीले कचरे को खाद बनाने के लिए.

Plastic Shredders: प्लास्टिक को सड़क बनाने या ईंट बनाने के काम में लाना.

टूरिस्ट से पर्यावरण शुल्क इसके लिए लिया जा सकता है और उसे इसी काम की व्यवस्था में लगाना चाहिए.

डिजिटल मॉनिटरिंग (Command & Control Center)

GPS Tracking: कचरा उठाने वाली हर गाड़ी पर GPS हो.

Smart Bins: ऐसे कूड़ेदान जो भरते ही प्रशासन को मैसेज भेज दें कि “मुझे खाली करो”.

CCTV चालान: गंदगी फैलाने वालों को ढूंढकर उनके घर या होटल के पते पर चालान भेजना.

स्थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए एक ऐप हो जहाँ वे गंदगी की फोटो डालें और 24 घंटे के अंदर सफाई न होने पर संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई हो.

पर्यटन स्थलों के बीच सफाई की रैंकिंग हो, जिससे प्रशासन में बेहतर काम करने की प्रतिस्पर्धा (Competition) पैदा हो.

भीड़ नियंत्रण (Crowd Control) के लिए नियम बनायें

 

पर्यटकों के आने का Time Management करना

पर्यटकों को ऑफ-सीज़न या दिन के अलग-अलग समय पर आने के लिए प्रोत्साहित करें. अगर ज्यादा भीड़ हो जाएँ तो प्रवेश को रोक दिया जाना चाहिए. इसके आलावा प्रवेश के लिए सुबह, दोपहर और शाम के स्लॉट तय करना. इससे एक ही समय पर हजारों लोग इकट्ठा नहीं होते.

ऑफ सीजन को प्रमोट करना

इसका मतलब है जब ऑफ सीजन हो और पर्यटकों की भीड़ कम हो तब डिस्काउंट के ऑफर  लगाएं जाएँ ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा उस समय में आ सकें और जब पीक सीजन हो तो भीड़ थोड़ी कम हो सकें.

सैटेलाइट डेस्टिनेशन Satellite Destinations

मुख्य पर्यटन स्थल के 20-30 किलोमीटर के दायरे में नए छोटे केंद्र विकसित करना. उदाहरण के लिए, यदि शिमला में भीड़ है, तो पर्यटकों को नारकंडा या मशोबरा की ओर प्रेरित करना.

सर्किट टूरिज्म Circuit Tourism

जब पर्यटकों की भीड़ एक ही जगह पर बढ़ उसे संभालना मुश्किल हो जाता है इसलिए पर्यटकों को एक ही जगह रुकने के बजाय एक ‘रूट’ देना चाहिए . इससे वे अलग-अलग गांवों और कस्बों में रुकते हैं, जिससे आर्थिक लाभ भी बंटता है. जैसे अगर आप शिमला घूमने आये तो रुकने के लिए कसौल चुने. यह शिमला से सिर्फ 45 मिनट  है और आप दिन में शिमला घूम कर रात को कसौल के अपने होटल जाकर रुक सकते है इससे शिमला में भीड़ थोड़ी कम होगी.

सड़कों पर डिजिटल बोर्ड लगाना

इससे यह पता चलता रहेगा कि इस समय यहाँ कितनी भीड़ है? और पार्किंग है या नहीं? यह देख लोग खुद ही यहाँ आने से कतराएंगे.

आसपास की जगह में भी अच्छी सुविधा दें

अगर मेन अट्रैक्शन से थोड़ी दूर भी थोड़ी अच्छी सुविधा होगी तो लोग वहां रुकने में हिचकिचाएंगे नहीं. इसलिए अच्छे होटल्स, कैफे और शौचालय केवल मुख्य केंद्र में न होकर दूर-दराज के इलाकों में भी होने चाहिए.

ऑनलाइन बुकिंग को अनिवार्य करना

किसी भी पर्यटन स्थल पर आने के लिए पहले से स्लॉट बुक करने को अगर अनिवार्य कर दिया जाएँ तो पता चल जायेगा कि वहां कितनी भीड़ है और जाया जा सकता है या नहीं. जैसे कि जिम कॉर्बेट घूमने जाने पर जंगल सफारी के स्लॉट पहले ही बुक हो जाते है और उसी के आधार पर लोग वाहन जाते हाँ इसलिए वहां ज्यादा भीड़ नहीं होती है.

 

‘इको-टैक्स’ लेना

संवेदनशील इलाकों में प्रवेश के लिए ‘इको-टैक्स’ लेना, जिसका उपयोग उसी जगह के संरक्षण में किया जाए.

प्लास्टिक बैन का सख्ती से पालन

सिर्फ बोर्ड लगाने से काम नहीं चलता, ग्राउंड लेवल पर चेकिंग और विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है.

नियमों का सख्ती से पालन Strict Enforcement

जुर्माना (Fines)

सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने, गंदगी फैलाने या अशोभनीय व्यवहार पर भारी जुर्माना लगाएं. इससे गंदगी भी कम होगी.

स्पॉट फाइन (Spot Fine): अधिकारियों (मार्शल या टूरिज्म पुलिस) को मौके पर ही रसीद काटने और जुर्माना वसूलने की शक्ति मिलनी चाहिए.

बढ़ता हुआ जुर्माना: पहली बार गलती पर ₹500, दूसरी बार पर ₹5000 और तीसरी बार पर उस पर्यटन स्थल से बाहर करना या बैन करना.

तेज म्यूजिक बजने पर होटल पर लगे जुर्माना टूरिस्ट पर नहीं

कई बार होटल में पर्यटक आकर पार्टी करते है और पूरी रात हुड़दंग मचाते है लेकिन उसमें जितनी गलती पर्यटकों की है उससे ज्यादा होटल वालों की जिसने ये alow किया. अगर कोई देर रात तेज म्यूजिक चलता है, तो उस होटल पर जुरमाना लगना चाहिए ताकि वह अपने गेस्ट को समझा सकें और अगली बार अपने होटल में ये सब alow ना करें.

धयान दें-

पर्यटन स्थलों पर कूड़ा प्रबंधन (Waste Management) और सुविधाओं (Public Amenities) में सुधार केवल डस्टबिन रखने से नहीं, बल्कि एक पूरी ‘इको-सिस्टम’ बनाने से होगा. जब सुविधाएं विश्वस्तरीय और आसान होती हैं, तो पर्यटक भी नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित होते हैं. जुर्माने से मिलने वाली राशि को उसी जगह के विकास और सफाई कर्मचारियों के कल्याण पर खर्च किया जाना चाहिए, जिससे स्थानीय लोगों का भी समर्थन मिले.

Relationship Tips : रिश्ते ख़राब हो जाएं तो न करें प्यार को बदनाम

Relationship Tips : परंपरागत शादियों के टूटने पर सारा दोश परिवार पर मढ दिया जाता है. माँ बाप की पसंद से की थी इसलिए शादी चल नहीं पाई, लव मैरिज की होती तो शादी कभी नहीं टूटती. परिवार की मर्जी से की जानी वाली शादियों में तलाक की नौबत आने पर लोग ऐसी ही बातें करते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं की अरेंज मैरिज के मुकाबले लव मेरिज ज्यादा टिकाऊ होती हैँ क्युकी इसमें दोनों एक दूसरे की पसंद होते हैँ लेकिन मनपसंद शादी का मतलब यह नहीं है कि यह कभी नहीं टूट सकती.

अपर्णा यादव और प्रतीक यादव के बीच ताजा मामला काफी सुर्खियों में है. यह मुलायम सिंह यादव के परिवार का निजी मामला है जो अब पब्लिक हो गया है. मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे और अखिलेश यादव के सौतेले भाई प्रतीक यादव ने 19 जनवरी 2026 को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपनी पत्नी अपर्णा यादव के खिलाफ गंभीर आरोप लगाये और तलाक की बात की. अपर्णा यादव भाजपा नेत्री हैं और यूपी राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन हैं.

इंस्टाग्राम अकॉउंट पर प्रतीक ने अपर्णा पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा कि अपर्णा बहुत स्वार्थी महिला हैं. उन्होंने उनके परिवार के रिश्तों को बर्बाद कर दिया. मां से रिश्ता तोड़ दिया, पिता से रिश्ता तोड़ा, भाई से रिश्ता तोड़ा. अपर्णा ने यह सब सिर्फ मशहूर होने की चाहत में किया. प्रतीक यादव ने अपर्णा को परिवार नाशक, सबसे बड़ा झूठा इंसान और खुदगर्ज़ इंसान बताया. उन्होंने अपनी मानसिक स्थिति खराब होने की भी बात कही. प्रतीक ने बच्चे की कसम खाकर ये आरोप लगाए. उन्होंने अपर्णा की एक तस्वीर शेयर की और लिखा कि जल्द से जल्द उनसे तलाक ले लेंगे.

यह पोस्ट काफी वायरल हुई और इसकी मीडिया में खूब चर्चा हुई. हालांकि अपर्णा यादव ने इसे साजिश बताया और कहा कि उनके और प्रतीक के रिश्ते ठीक हैं और कुछ लोग रिश्ते तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. प्रतीक ने बाद में इसे पर्सनल मामला बताया और इसपर ज्यादा बात करने से इनकार कर दिया.

प्रतीक यादव और अपर्णा बिष्ट ने साल 2011 में लव मैरिज की थी. दोनों की मुलाकात किसी शादी फंक्शन में हुई थी. प्रतीक, अपर्णा की आवाज पर फिदा हो गए थे और दोनों के बीच प्यार का इजहार ईमेल के जरिए हुआ. दोनों ने साल 2011 में लव मैरिज कर ली और उस वक़्त यह शादी सैफई में बहुत धूमधाम से हुई थी. पंद्रह साल बाद दोनों के प्यार के “दी एन्ड” होने की खबरें हैँ वह भी संगीन आरोपों के साथ.

अपर्णा और प्रतीक ने लव मैरिज की थी और उसकी परिणती कुछ इस तरह हुई की दुनिया में ढिंढोरा पीट दिया गया. सिर्फ लव मैरिज के मामले में ही ऐसा नहीं होता अरेंज मैरिज तो इस मामले में ज्यादा बदनाम है. प्यार खत्म होने पर रिश्ते इतने ख़राब हो जाएँ की घर की लड़ाई सड़कों पर आ जाये. लव हो या अरेंज रिश्ते ख़राब हो जाएँ तो अक्सर ऐसा ही होता है.

पवन सिंह और ज्योति सिंह की लड़ाई क्यों सड़कों पर उतर आई?

भोजपुरी के मशहूर अभिनेता और गायक पवन सिंह पर उनकी पत्नी ज्योति सिंह ने मीडिया के सामने घरेलू हिंसा, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न, गर्भपात कराने के लिए दवाएं देने और बेवफाई जैसे संगीन आरोप लगाए. ज्योति सिंह ने अप्रैल 2022 में तलाक की अर्जी दाखिल की थी, जिसमें उन्होंने पवन सिंह पर आरोप लगाया कि उन्होंने उन्हें दो बार गर्भपात कराने के लिए मजबूर किया. उन्हें यातनाएं दीं जिसकी वजह से एक बार उन्होंने 25 नींद की गोलियां लेकर आत्महत्या की कोशिश की. 2025 में ज्योति ने तलाक के लिए 30 करोड़ रुपये की गुजारा भत्ता की मांग की है. मामला अदालत में है.

पवन सिंह और ज्योति सिंह की 2018 में अरेंज मैरिज हुई थी. ज्योति सिंह ने खुद यह खुलासा किया कि शादी उनकी मर्जी से नहीं हुई थी और शादी से पहले उन्होंने पवन से कभी बात तक नहीं की थी.

अपर्णा और प्रतीक का मामला हो या पवन सिंह और ज्योति सिंह का मामला दोनों केसों में घर की लड़ाई सड़कों पर आ गई. विवाद को सुलझाया जा सकता था या शांति से अलग हुआ जा सकता था लेकिन दोनों मामलों में ऐसा नहीं हुआ. प्यार खत्म तो नफ़रत शुरू और ऐसी नफ़रत की वो पार्टनर जिसके साथ बंद कमरों में खूब प्यार हुआ वही दुनिया के सामने सबसे बुरा इंसान बना दिया गया.

आमिर खान और किरण राव से सीखना चाहिए

जब रिश्ते बोझ बन जाएँ तो एक दूसरे के सम्मान को बनाये रखते हुए भी तलाक लिया जा सकता है इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण किरण राव और आमिर खान ने दुनिया के सामने पेश किया.

आमिर खान की पिछली दोनों शादियाँ लव मैरिज थीं.
पहली पत्नी रीना दत्ता बचपन की दोस्त और पड़ोसन थीं. दोनों के प्यार में दोनों का धर्म आड़े आ रहा था. दोनों का परिवार इस शादी के खिलाफ था. दोनों ने 18 अप्रैल 1986 में भागकर शादी कर ली. यह क्लासिक लव मैरिज का केस था. बिलकुल फिल्मों जैसा. लेकिन उन्नीस साल बाद आमिर को फिर से प्यार हो गया. इस बार किरन राव से.

आमिर और किरण साथ में लगान और दूसरे कई प्रोजेक्ट्स में काम कर चुके थे. दोनों की शुरुआती मुलाकातें काम के सिलसिले में हुई थी. पहली बीबी रीना दत्ता को अपने पति के इस नए प्यार के बारे में जब पता चला तब तक देर हो चुकी थी. प्यार गहरा हो चुका था. इतना गहरा की रीना दत्ता और आमिर खान अलग हो गये और 2005 में आमिर ने किरण राव से लव मैरिज कर ली.

सोलह साल के प्यार के बाद आमिर खान और किरण राव ने 3 जुलाई 2021 को एक साझा बयान जारी कर प्यार खत्म होने का ऐलान कर दिया. किरण राव ने इंटरव्यू में बताया कि वे अपना खुद का स्पेस चाहती थीं इसलिए आमिर के साथ शादी के रिश्ते से अलग हो रहीं हैँ लेकिन भविष्य में दोनों एक-दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त बने रहेंगे.

आमिर खान ने भी कहा कि रिश्ता पति-पत्नी के रूप में नहीं चल पा रहा था फिर भी वे दोनों परिवार की तरह साथ रहना चाहते थे. तलाक के बाद भी वे एक-दूसरे के साथ अच्छे संबंध रखेंगे. आज दोनों के बीच तलाक हो चुका है फिर भी दोनों परिवार की तरह साथ समय बिताते हैं, काम करते हैं और एक-दूसरे का सपोर्ट करते हैं. दोनों के बीच यह एक म्यूचुअल अलगाव था. एक दूसरे पर लांछन लगाये बिना और आज 5 साल भी दोनों अच्छे दोस्त की तरह एक दूसरे के साथ खड़े हैँ.

तलाक को सेलिब्रेट करें.

तलाक जीवन का अंत नहीं, बल्कि इसे जीवन की नई शुरुआत की तरह देखना चाहिए. पश्चिमी देशों में लोग तलाक के बाद पार्टी आयोजित करते हैं, केक काटते हैँ, दोस्तों को इनवाइट करते हैं और पुरानी यादों को अलविदा कहकर नई जिंदगी की शुरुआत का जश्न मनाते हैं. कुछ लोग तो मेहंदी लगाते हैं, डिवोर्स रिंग पहनते हैं या ट्रैवल करके खुद को आजाद महसूस करते हैं.

अरेंज हो या लव भारत में शादी को ऐसा पवित्र बंधन समझा जाता जिसे जीवन भर निभाना जरुरी हो यह मानसिकता ही गलत है. शादी दो लोगों की म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग से साथ रहने और परिवार बनाने का एक जरिया है. यह तभी तक सही है जब तक दोनों के बीच के प्यार में ब्रेक न लगे. किसी भी कारण से जब प्यार बाकी न रहे तो अलग होने के लिए भी दोनों के बीच फिर से म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग की जरूरत होगी. तमाशा बनाने की जरूरत नहीं है. लांछन लगाए बिना भी तलाक हो सकता है.

तलाक खुद को महत्व देने का रास्ता है. आजादी के एहसास करने का जरिया है. शादी में प्यार की जगह दर्द ने ले ली है तो दर्द को खुशी में बदलने का माध्यम है तलाक.

Best Hindi Story : मुझे माफ कर दो

Best Hindi Story : ‘नीरा मेरी छुट्टी मंजूर हो गई है. हम लोग अपनी ऐनिवर्सरी अमृतसर में मनाएंगे. कब से स्वर्ण मंदिर देखने की इच्छा थी, वह अब जा कर तुम्हारे साथ पूरी होगी. तुम अपनी पैकिंग शुरू कर दो. मैं ने होटल में बुकिंग करवा ली है. वहां दोनों ‘जलियांवाला बाग’ देखेंगे और वाघा बौर्डर की परेड. सुना है बहुत अच्छी होती है,’’ पति सजल ने पत्नी नीरा को अपनी बांहों के घेरे में समेट कर उस पर चुंबनों की बौछार कर दी.

दोनों पतिपत्नी बांहों में बांहें डाल कर 2 दिनों तक प्यार से अपनी ऐनिवर्सरी को ऐजौय करते रहे.

सजल ने नीरा को अमृतसर के बाजार से खूब सारी शौपिंग भी करवाई. स्वर्ण मंदिर की खूबसूरती और वाघा बौर्डर की परेड ने दोनों

की इस यात्रा को यादगार बना दिया. आज शाम को राजधानी से लोगों को दिल्ली के लिए निकलना था.

‘‘नीरा डियर, तुम सब पैकिंग कर लेना,’’ कहते हुए सजल अपनी औफिस की कौल में बिजी हो गए.

‘‘सब पैकिंग हो गई?’’

‘‘यस डियर.’’

‘‘चलो, नीचे लंच कर के निकलेंगे. टैक्सी आती ही होगी.’’

सजल मैनेजर के पास बिल पेमैंट कर रहे थे. नीरा टैक्सी को देखते ही जल्दबाजी से उस में जा कर बैठ गई.

जब सजल को आने में देर हुई तो वह बाहर आई और बोली, ‘‘कितनी देर लगाएंगे आप लोग. मेरा सारा समय बेकार हो रहा है.’’

‘‘मैनेजर 5 मिनट रुकने को बोल रहे हैं. रूम चैक कर रहे हैं. कोई सामान तो नहीं छूटा है? मेरा चार्जर रख लिया था?’’

‘‘हां… हां. मैं ने सबकुछ रख लिया है.

कुछ भी नहीं छूटा है, बस अब यहां से जल्दी चलिए.’’

‘‘इतनी परेशान और बेचैन क्यों हो रही हो? वे लोग रूम चैक कर के आ ही रहे होंगे.’’

एक वैरा मैनेजर को धीरेधीरे कुछ बता रहा था, फिर उस ने एक कागज मैनेजर के हाथों में पकड़ाया. सजल कुछ सम?ा नहीं पा रहे थे कि आखिर मामला क्या है.

मैनेजर ने जल्दीजल्दी बिल बना कर तैयार किया और उन के हाथ में देते हुए कहा, ‘‘सर, यह ऐक्स्ट्रा पेमैंट आप को देनी होगी.’’

सजल ने बिल को गौर से पढ़ना शुरू किया.

‘‘तौलिया, आइरन, हेयर ड्रायर, बाथगाउन, हैंड टौवेल, सर, आप के रूम में ये चीजें मिसिंग हैं. चाहे तो आप ये चीजें लौटा दें या फिर इन की पेमैंट कर दें.’’

नीरा नाराज हो कर बोली, ‘‘हमें आप ने चोर समझ है क्या जो आप की चीजें हम ने

चुरा ली?’’

‘‘मुझे आप के बैग की तलाशी लेनी होगी.’’

सजल पत्नी की इस आदत से अनजान थे. उन्होंने धीरे से कहा, ‘‘कोई बात नहीं, यदि सामान तुम ने रख भी लिया है तो निकाल कर दे दो बात खत्म हो जाएगी.’’

‘‘मैं सच कह रही हूं मैं ने कोई सामान

नहीं लिया है… ये वैरों ने ही इधरउधर किया

होगा और हम लोगों पर इलजाम लगा रहे हैं,’’ और वह जोरजोर से नाटक कर के आंसू बहाने लगी.

सजल पत्नी की ड्रामेबाजी देख कर नाराज हो कर बोले, ‘‘क्या शोर मचा रखा है… चाबी कहां है निकाल कर दो. इन लोगों को बैग खोल कर देखने दो.’’

नीरा बैग पकड़ कर खड़ी हो गई, ‘‘मेरा बैग कोई नहीं खोलेगा.’’

नीरा मन ही मन भगवान का जाप करने लगी कि हे भगवान सत्यनारायण भगवान की कथा करवाऊंगी, 16 सोमवार का व्रत करूंगी. हे भगवान तुम तो सर्वशक्तिमान हो, बैग से सारा सामान गायब कर दो.’’

पत्नी की बेवकूफी भरा व्यवहार सजल की सम?ा से बाहर हो रहा था. उन्होंने पत्नी के हाथ से पर्स ?ापट कर खींच लिया और उस में से चाबी निकाल कर बैग खोल दिया.

नीरा तेजी से बैग पकड़ कर बोली, ‘‘ठहरो,’’ मेरे बैग को कोई हाथ नहीं लगाएगा,

मैं दिखा रही हूं,’’ और वह अपने सामान से होटल के सामान को छिपाती हुई होशियारी से सामान दिखाने लगी. मगर होटल के मैनेजर की अनुभवी निगाहों से कुछ भी नहीं छिपा सका क्योंकि उन्हें तो ऐसे कस्टमर से जबतब निबटना पड़ता था.

पोल खुलती देख नीरा मुंह छिपा कर

टैक्सी में जा कर बैठ गई, परंतु सजल के लिए बेइज्जती सहन करना मुश्किल हो रहा था. उन

का चेहरा अपमान की कालिमा से बेरौनक हो गया था.

नीरा अपनी आंखें मूंद कर पति से बचने का प्रयास कर रही थी. सजल का चेहरा क्रोध से लाल हो रहा था. ड्राइवर की उपस्थिति के कारण वे बिलकुल मौन थे.

नीरा पुन: मन ही मन सारे देवीदेवताओं को मना रही थी कि हे हनुमानजी, मेरी इज्जत बचा लो, मैं तुम्हें क्व501 का प्रसाद चढ़ाऊंगी.

जब सजल अपने क्रोध को संयत कर चुके तो पत्नी से बोले, ‘‘तुम ?ाठ पर ?ाठ क्यों बोलती जा रही थी. तुम्हें आज वादा करना होगा कि इस तरह कभी किसी की चीज नहीं उठाओगी.’’

नीरा ने धीरे से अपना सिर हिला दिया. वह अपने बचपन में खो गई थी…

नीरा को अपनी सहेली विभा की पैंसिल उन्हें बहुत आकर्षित करती थी. बस मौका देख कर एक दिन पैंसिल चुरा ली. जब मां ने उस के पैंसिल बौक्स में नई पैंसिल देखी तो उस का कान पकड़ कर भगवान के सामने माफी मांगने को कहा.

नीरा को तो यह बड़ा सरल सा उपाय लगा. बस वह इस तरह से अकसर स्कूल से कुछ न कुछ उठा लाती और भगवान के सामने कान पकड़ कर माफी मांग लेती. अपराध क्षमा हो गया.

मां ने एक  बार माला जपने को भी कहा तो वह माला के दानों को झटपट अपनी उंगलियों से सरकाती, बस सब माफ.

धीरेधीरे दूसरों का सामान चुराना नीरा की आदत बन गई. वह जहां भी जाती मौका देखकर चुपचाप सामान उठा कर अपने बैग के हवाले कर लेती. अपने चेहरे के भोलेपन और होशियारी के चलते, कोई उस पर शक भी नहीं करता. मगर एक बार जब वह कक्षा 8 में थी, रश्मि के हाथ में 100-100 के करारे नोटों को देख कर उस की आंखें चमक उठीं. वह स्कूल ट्रिप में जाने के लिए रुपए जमा कराने के लिए लाई थी.

अब नीरा इस जुगत में लग गई कि वह उस के बैग से रुपए कैसे पार करे. रश्मि ने रुपए चोरी से बचाने के लिए पौकेट में रख लिए थे. अब तो उस के लिए रुपए गायब करना बाएं हाथ का खेल था. उस ने उस की जेब से ?ांकते रुपए चुरा लिए और अपनी किताब के कवर के अंदर रख कर निश्चिंत हो गई.

मगर उस दिन रश्मि को उस पर संदेह हो गया. उस ने टीचर से उस की शिकायत कर दी और फिर टीचर ने उस के बैग की तलाशी ली, तो कवर में छिपाए रुपए चमक उठे. उस दिन उस की बहुत बेइज्जती हुई क्योंकि मैडम ने उस की पीठ पर एक कागज में बड़ेबड़े अक्षरों से लिख कर ‘मैं चोर हूं’ टांग दिया. उस दिन वह बहुत जलील हुई और सिसकसिसक कर खूब रोई थी. उस दिन उस ने मन ही मन निश्चय किया कि अब कभी ऐसा नहीं करेगी, परंतु घर आतेआते उस की सोच बदल चुकी थी. घर में उस ने मां से बताया कि रश्मि ने उसे ?ाठमूठ फंसाया. पहले तो उन्होंने रश्मि को खूब खरीखोटी कहा और फिर से मंदिर में ले जा कर कान पकड़ कर पुजारी के सामने माफी मांगने को कहा और उन्हें दक्षिणा में रुपए दिलवा कर बोली, ‘‘भगवान उस की गलती को माफ कर दें.’’

अब तो उस का हौसला पहले से अधिक बढ़ गया था. पाप के प्रायश्चित्त का बड़ा ही सरल सा तरीका था. उस ने रोधो कर दूसरे स्कूल में ऐडमिशन ले लिया था और अपनी चोरी के काम से लोगों को शिकार बनाती रही.

कुछ दिनों तक सजल उस से नाराज रहे. उसे डांटतेफटकारते, ताने देते और आंखें तरेरते. फिर धीरेधीरे नौर्मल हो गए.

दूसरों का सामान उठाना नीरा की आदत में शुमार हो गया था. वह जहां भी जाती मौका मिलते ही चुपचाप कुछ भी उठा कर अपने पर्स के हवाले कर लेती.

नीरा को अपने गलत काम का एहसास था, पर वह इतना ही जानती थी कि वह पाप कर रही है इसलिए इस के निवारण के लिए व्रत, उपवास, कीर्तन, सुंदरकांड का पाठ आदि कर के अपने पाप और अपराध के लिए क्षमायाचना कर के पापमोचन कर लेती थी.

नीरा ने धार्मिक गुरुओं के प्रवचनों और धार्मिक पुस्तकों में पढ़ा और सुना था कि किस सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने से व्यक्ति के सारे पाप धुल हो जाते हैं. इसी कारण उस के घर मे धार्मिक आयोजन जैसे

कथा, कीर्तन, सुंदरकांड जबतब आयोजित होते ही रहते थे.

किसी शौप से सेल्समैन की निगाह बचा कर नीरा कई बार साड़ी जैसी चीज भी अपने बैग में रख कर ले आई थी. कौस्मैटिक तो वह अधिकतर चुरा कर ही ले आया करती. दूसरों की ड्रैसिंगटेबल से छोटी सी आइटम उठाने में उसे जरा भी देर नहीं लगती. होटल से चम्मच, नैपकिन और टौवेल चुराना तो वह जैसे अपना अधिकार ही सम?ाती थी.

एक दिन होटल के चम्मच देखते ही सजल पहचान कर उन पर चिल्ला पड़े, ‘‘तुम्हारी चोरी की आदत नहीं छूटेगी. किसी दिन खुद भी मुसीबत में फंसेगी और मु?ो भी फंसाएंगी. खबरदार आइंदा मैं ने घर में इस तरह की चोरी की कोई चीज देखी तो बहुत बुरा परिणाम तुम्हें भुगतना पड़ेगा.’’

जल्दीजल्दी पति का ट्रांसफर नीरा के लिए सोने में सुहागा जैसा ही था. उस के द्वारा आयोजित धार्मिक आयोजनों के कारण वह सब की निगाहों में सीधीसादी पूजापाठ करने वाली धार्मिक महिला ही सम?ा जाती थी. वैसे तो वह पढ़ीलिखी फैशनेबल स्मार्ट महिला थी. किसी तरह का कोई भी अभाव नहीं था. पति अफसर थे और वह स्वयं भी खुशमिजाज और मिलनसार महिला थी. मंदिर जाना, घंटों पूजापाठ करना, माला जपना आदि के कारण उस के कंधों पर धार्मिक आवरण पड़ा हुआ था.

नीरा के धार्मिक चोले के कारण उस के कुकृत्य पर धर्म का परदा पड़ा हुआ था. शादी का उत्सव जैसे आयोजनों में वह जाने के लिए बहुत उत्सुक रहा करती थी क्योंकि वहां भीड़भाड़ में अपने मकसद में वह आसानी से कामयाब हो जाती थी. वह अपनी जेठानी के माइके में उस के भाई की शादी में गई हुई थी. वहां पर बाथरूम में किसी की सोने की चेन रखी हुई मिली. इतनी आसानी से इतनी भारी चेन पा कर उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. लेकिन मन ही मन घबरा भी रही थी.

चेन खो जाने पर घर में खूब हंगामा मचा, सब के साथ यहांवहां वह भी तलाशने का दिखावा करने का नाटक करती रही थी. फिर वह मौका देख कर वहां से निकल पड़ी थी.

जब नीरा घर पहुंची तो घबराहट के मारे पसीनापसीना हो रही थी. घर के अंदर घुसते ही पहले अपना पर्स अलमारी के अंदर रखा, फिर जल्दीजल्दी अपने पूजाघर में भगवान के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई.

सजल ने नीरा के घबराए चेहरे को देख कर पूछा, ‘‘इतनी नर्वस क्यों दिखाई पड़ रही हो? कुछ गड़बड़ कर के आई हो क्या.’’

‘‘आप तो हर समय मेरे पीछे ही पड़े रहते हैं,’’ कह नीरा ने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और एक सांस में पूरी खाली कर दी.

नीरा मन ही मन भगवान को मना रही थी कि हे भगवान मुझे माफ कर देना. वह 101 का प्रसाद मंदिर में चढ़ाएगी. फिर भी उस के मन को तसल्ली नहीं हो पा रही थी. आखिर इतना लंबा हाथ जो मारा था. मन ही मन निश्चय किया कि इस संडे को पंडितजी को बुला कर ग्रहशांति की पूजा करवा देगी.

सजल ने नीरा को पूजा की तैयारी करते देखा, तो नाराज हो कर बोले, ‘‘एक दिन छुट्टी का होता है, तो यह तुम्हारा कोई न कोई पूजापाठ का स्वांग शुरू हो जाता है. मैं तो तंग हो गया हूं, तुम्हारी इस फालतू की ढोंगबाजी से. घर मे चैन से बैठना मुश्किल कर दिया है

तुम ने.’’

नीरा पति को भला अपनी करतूत कैसे बता सकती थी. वह कैसे कहती कि इस बार उस ने बहुत बड़ा हाथ मारा है इसलिए पंडितजी को दक्षिणा भी बड़ी देनी होगी. वह मन ही मन विजयी मुद्रा में अपने पापमोचन के लिए शांति पाठ की तैयारियों में जुट गई थी.

सजल पत्नी की इस हेराफेरी और चोरी की आदत से अनजान था क्योंकि वे पिछली घटना को भूल चुके थे.

सजल के ट्रांसफर के और्डर आने वाले थे, यह बात वे पत्नी को बता चुके थे. उन्हें बुलंदशहर पसंद नहीं था, इसलिए वे ट्रांसफर रुकवाने की कोशिश में लगे थे, जबकि नीरा

पति से जल्दी से जल्दी नई जगह जौइन करने के लिए कहती.

एक दिन शाम को 6 बजे थे. सजल अपने ड्राइंगरूम में बैठ कर न्यूज की हैडलाइन देख रहे थे. तभी उन की कौलबैल बज उठी. उन्होंने दरवाजा खोला तो स्मार्ट से सज्जन व्यक्ति दरवाजे पर खड़े थे.

‘‘क्या यह नीराजी का घर है?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘हां… हां…’’ आप बैठिए, मैं उन्हें अभी अंदर से बुलाता हूं.

‘‘क्षमा कीजिएगा… आप…’’

‘‘मैं सजल, नीरा का पति.’’

‘‘ओके.’’

उच्च मध्य परिवारों की तरह संपन्न सा ड्राइंगरूम में बिछा मोटा कालीन, दीवार पर शोभा बढ़ातीं आकर्षक पेंटिंग्स, काफी कीमती सोफा, साइड टेबल पर कलात्मक राधाकष्ण की सुंदर चमचमाती पीतल की मूर्ति, वहां पर रहने वालों की सुरुचि और संपन्नता को दशा रही थी.

चारों ओर नजरें घुमाकर देखने के बाद श्री ज्वैलर्स के यहां से आया मैनेजर रजत थोड़ा सकपका सा उठा परंतु अपनी ड्यूटी के कारण मजबूर था.

‘‘सर, मैं श्री ज्वैलर्स के यहां से आया हूं,’’ कुछ भी बोलने में उस की जबान तालू से चिपकी सी जा रही थी.

सजल ने गिलास में पानी दे कर कहा, ‘‘बिना संकोच बोलिए, वैसे शायद आप गलत जगह आ गए हैं. मेरी गोल्ड या सिल्वर में इन्वैस्टमैंट की रुचि नहीं है. सर, आप की पत्नी नीराजी 3 नवंबर को मेरे शोरूम में एक महिला के संग आई थीं और गलती से शायद डायमंड की रिंग अपनी उंगली में पहन कर आ गई हैं. सर, सीसीटीवी में हम लोगों ने रिकौर्डिंग देखने के बाद आधार कार्ड से आप का पता निकाला, तब मैं यहां आ पाया हूं. सर मेरे यहां तो एक लाख के ऊपर की चीजों पर तुरंत थाने में एफआईआर की जाती है, लेकिन इस केस में हम लोगों ने पहले एक बार कोशिश कर लेने के विचार से आप के घर आए हैं.’’

सजल पत्नी नीरा की छोटीछोटी चीजों की चोरी कर लेने की आदत से परिचित थे, इस वजह से वे कई बार उन्हें खूब अच्छी तरह डांटफटकार और लताड़ भी चुके थे, परंतु इतनी बड़ी चीज इसलिए उन का चेहरा तमतमा उठा था.

मैनेजर ने नीरा का उंगली में अंगूठी पहन कर दुकान से बाहर हाथ छिपा कर निकलने वाला वीडियो उन के फोन पर फौरवर्ड कर दिया. सामने प्रूफ देख कर सजल का सिर पत्नी की करतूत के कारण शर्म से ?ाक गया.

‘‘तुम श्री ज्वैलर्स के यहां गई थी?’’

‘‘एक दिन रश्मि मुझे ले गईर् थी.’’

‘‘वहां से डायमंड रिंग पहन कर आ गई थी तो लौटाने क्यों

नहीं गई.’’

‘‘मैं ने रश्मि

को लौटाने के लिए दे दी थी.’’

‘तुम सरासर झूठ बोल रही हो. तुम ने अंगूठी वहां से चुराई है.’’

‘‘आप की निगाहों में तो मैं हमेशा से चोर हूं,’’ यह कहते हुए अपने आखिरी अस्त्र का इस्तेमाल करते हुए नीरा ने जोरजोर से रोनाधोना शुरू कर दिया.

मगर आज सजल इस समय अपने

अपमान की ज्वाला से सुलग रहे थे. आंसू देख कर भी उन का दिल तिल भर भी नहीं पिघला. तड़प कर चीख पड़े, ‘‘बदतमीज, कमीनी औरत चोरी और सीना जोरी, तुम मेरी आंखों में धूल ?ोंकती रही और मैं तेरे पूजापाठ वाले नाटक पर विश्वास करता रहा. धार्मिक कर्मकांड की आड़ में तुम्हारा शातिर दिमाग चोरी जैसे घिनौने काम में लगा हुआ था. अब भुगतो अपने बुरे कर्म का बुरा नतीजा.’’

‘‘सच मानिए, मैं अंगूठी गलती से पहन कर आ गई थी, फिर रश्मि को दे दी थी.’’

‘‘फिर ?ाठ बोल रही हो. यह देख ले, कैसे हाथ छिपा कर चुपके से बाहर निकल रही है,’’ उन्होंने गुस्से में अपना मोबाइल नीरा की तरफ फेंक दिया और फिर तमक कर उठे और सामान को इधरउधर फेंकते हुए उस की अलमारी का लौकर खोल कर उस में से 1-1 सामान निकाल कर फेंकने लगे.

‘‘यह मोटी चेन तुम्हारे पास कहां से आई? बताओ कहां से चुरा कर लाई और ये चमकी तो मैं ने खरीद कर नहीं दिए थे आदिआदि…’’

तभी उन्हें पीछे की तरफ एक डब्बी दिखाई पड़ी. उस को खोलते ही चीख पड़े,

‘‘देख ?ाठी औरत यह रही वह अंगूठी, जिसे तुम बारबार रश्मि को दे दी थी, कह रही थी,’’ सजल गुस्से में अपना आपा खो बैठे थे. वे क्रोध के मारे थरथर कांप रहे थे.

सजल अंगूठी ले कर गिरतेपड़ते से मैनेजर के पास पहुंचे और बोले, ‘‘यह रही आप की अंगूठी… मेरी बीवी चोर है… अब आप जाए…’’ वे अपना होश खो बैठे थे, अपमान और शर्म के कारण समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्या कर रहे हैं.

‘मैं ने तुम्हारी हर ख्वाहिश को पूरी करने के लिए कोशिश करता रहा लेकिन तुम्हारी नजर और निशाना तो कहीं और था. अब मैं तुम्हें एक क्षण भी बरदाश्त नहीं कर सकता.’’

नीरा अपनी चोरी पकड़े जाने के कारण सहम उठी थी. वह सिसकती हुई उठी, ‘‘मुझे माफ कर दो,’’ कहते हुए पति के पैरों को पकड़ लिया.

मगर आज सजल ने मन ही मन एक कड़ा फैसला ले लिया. उन्होंने पत्नी के बढ़े हाथों को जोर से ?ाटक दिया और अपने फैसले पर अडिग रहते हुए सीधे तलाक के लिए वकील से मिलने के लिए चल पड़े थे.

वह जानते थे कि तलाक लेने में वर्षों लग जाएंगे पर एक चोर वाली पत्नी के साथ रहने से यह अच्छा ही है.

क्रौंम्प्टन का नया एमियो एयर फ्रायर

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Short Hindi Story : आंगन का बिरवा

Short Hindi Story : पलकें मूंदे मैं आराम की मुद्रा में लेटी थी तभी सौम्या की आवाज कानों में गूंजी, ‘‘मां, शलभजी आए हैं.’’

उस का यह शलभजी संबोधन मुझे चौंका गया. मैं भीतर तक हिल गई परंतु मैं ने अपने हृदय के भावों को चेहरे पर प्रकट नहीं होने दिया, सहज भाव से सौम्या की तरफ देख कर कहा, ‘‘ड्राइंगरूम में बिठाओ. अभी आ रही हूं.’’

उस के जाने के बाद मैं गहरी चिंता में डूब गई कि कहां चूक हुई मुझ से? यह ‘शलभ अंकल’ से शलभजी के बीच का अंतराल अपने भीतर कितना कुछ रहस्य समेटे हुए है. व्यग्र हो उठी मैं. सच में युवा बेटी की मां होना भी कितना बड़ा उत्तरदायित्व है. जरा सा ध्यान न दीजिए तो बीच चौराहे पर इज्जत नीलाम होते देर नहीं लगती. मुझे धैर्य से काम लेना होगा, शीघ्रता अच्छी नहीं.

प्रारंभ से ही मैं यह समझती आई हूं कि बच्चे अपनी मां की सुघड़ता और फूहड़ता का जीताजागता प्रमाण होते हैं. फिर मैं तो शुरू से ही इस विषय में बहुत सजग, सतर्क रही हूं. मैं ने संदीप और सौम्या के व्यक्तित्व की कमी को दूर कर बड़े सलीके से संवारा है, तभी तो सभी मुक्त कंठ से मेरे बच्चों को सराहते हैं, साथ में मुझे भी, परंतु फिर यह सौम्या…नहीं, इस में सौम्या का भी कोई दोष नहीं. उम्र ही ऐसी है उस की. नहीं, मैं अपने आंगन की सुंदर, सुकोमल बेल को एक बूढ़े, जर्जर, जीर्णशीर्ण दरख्त का सहारा ले, असमय मुरझाने नहीं दूंगी.

अब तक मैं अपने बच्चों के लिए जो करती आई हूं वह तो लगभग अपनी क्षमता और लगन के अनुसार सभी मांएं करती हैं. मेरी परख तो तब होगी जब मैं इस अग्निपरीक्षा में खरी उतरूंगी. मुझे इस कार्य में किसी का सहारा नहीं लेना है, न मायके का और न ससुराल का. मुंह से निकली बात पराई होते देर ही कितनी लगती है. हवा में उड़ती हैं ऐसी बातें. नहीं, किसी पर भरोसा नहीं करना है मुझे,  सिर्फ अपने स्तर पर लड़नी है यह लड़ाई.

बाहर के कमरे से सौम्या और शलभ की सम्मिलित हंसी की गूंज मुझे चौंका गई. मैं धीमे से उठ कर बाहर के कमरे की तरफ चल पड़ी.

‘‘नमस्ते, भाभीजी,’’ शलभ मुसकराए.

‘‘नमस्ते, नमस्ते,’’ मेरे चेहरे पर सहज मीठी मुसकान थी परंतु अंतर में ज्वालामुखी धधक रहा था.

‘‘कैसी तबीयत है आप की,’’ उन्होंने कहा.

‘‘अब ठीक हूं भाईसाहब. बस, आप लोगों की मेहरबानी से उठ खड़ी हुई हूं,’’ कह कर मैं ने सौम्या को कौफी बना लाने के लिए कहा.

‘‘मेहरबानी कैसी भाभीजी. आप जल्दी ठीक न होतीं तो अपने दोस्त को क्या मुंह दिखाता मैं?’’

मुझे वितृष्णा हो रही थी इस दोमुंहे सांप से. थोड़ी देर बाद मैं ने उन्हें विदा किया. मन की उदासी जब वातावरण को बोझिल बनाने लगी तब मैं उठ कर धीमे कदमों से बाहर बरामदे में आ बैठी. कुछ खराब स्वास्थ्य और कुछ इन का दूर होना मुझे बेचैन कर जाता था, विशेषकर शाम के समय. ऊपर  से इस नई चिंता ने तो मुझे जीतेजी अधमरा कर दिया था. मैं ने नहीं सोचा था कि इन के जाने के बाद मैं कई तरह की परेशानियों से घिर जाऊंगी.

उस समय तो सबकुछ सुचारु रूप से चल रहा था, जब इन के लिए अमेरिका के एक विश्वविद्यालय ने उन की कृषि से संबंधित विशेष शोध और विशेष योग्यताओं को देखते हुए, अपने यहां के छात्रों को लाभान्वित करने के लिए 1 साल हेतु आमंत्रित किया था. ये जाने के विषय में तत्काल निर्णय नहीं ले पाए थे. 1 साल का समय कुछ कम नहीं होता. फिर मैं और सौम्या  यहां अकेली पड़ जाएंगी, इस की चिंता भी इन्हें थी.

संदीप का अभियांत्रिकी में चौथा साल था. वह होस्टल में था. ससुराल और पीहर दोनों इतनी दूर थे कि हमेशा किसी की देखरेख संभव नहीं थी. तब मैं ने ही इन्हें पूरी तरह आश्वस्त कर जाने को प्रेरित किया था. ये चिंतित थे, ‘कैसे संभाल पाओगी तुम यह सब अकेले, इतने दिन?’

‘आप को मेरे ऊपर विश्वास नहीं है क्या?’ मैं बोली थी.

‘विश्वास तो पूरा है नेहा. मैं जानता हूं कि तुम घर के लिए पूरी तरह समर्पित पत्नी, मां और सफल शिक्षिका हो. कर्मठ हो, बुद्धिमान हो लेकिन फिर भी…’

‘सब हो जाएगा, इतना अच्छा अवसर आप हाथ से मत जाने दीजिए, बड़ी मुश्किल से मिलता है ऐसा स्वर्णिम अवसर. आप तो ऐसे डर रहे हैं जैसे मैं गांव से पहली बार शहर आई हूं,’ मैं ने हंसते हुए कहा था.

‘तुम जानती हो नेहा, तुम व बच्चे मेरी कमजोरी हो,’ ये भावुक हो उठे थे, ‘मेरे लिए 1 साल तुम सब के बिना काटना किसी सजा जैसा ही होगा.’

फिर इन्होंने मुझे अपने से चिपका लिया था. इन के सीने से लगी मैं भी 1 साल की दूरी की कल्पना से थोड़ी देर के लिए विचलित हो उठी थी, परंतु फिर बरबस अपने ऊपर काबू पा लिया था कि यदि मैं ही कमजोर पड़ गई तो ये जाने से साफ इनकार कर देंगे.

‘नहीं, नहीं, पति के उज्ज्वल भविष्य व नाम के लिए मुझे स्वयं को दृढ़ करना होगा,’ यह सोच मैं ने भर आई आंखों के आंसुओं को भीतर ही सोख लिया और मुसकराते हुए इन की तरफ देख कर कहा, ‘1 साल होता ही कितना है? चुटकियों में बीत जाएगा. फिर यह भी तो सोचिए कि यह 1 साल आप के भविष्य को एक नया आयाम देगा और फिर, कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है न?’

‘पर यह कीमत कुछ ज्यादा नहीं है?’ इन्होंने सीधे मेरी आंखों में झांकते हुए कहा था.

वैसे इन का विचलित होना स्वाभाविक ही था. जहां इन के मित्रगण विश्वविद्यालय के बाद का समय राजनीति और बैठकबाजी में बिताते थे, वहीं ये काम के बाद का अधिकांश समय घर में परिवार के साथ बिताते थे. जहां भी जाना होता, हम दोनों साथ ही जाते थे. आखिरकार सोचसमझ कर ये जाने की तैयारी में लग गए थे. सभी मित्रोंपरिचितों ने भी इन्हें आश्वस्त कर जाने को प्रेरित किया था.

इन के जाने के बाद मैं और सौम्या अकेली रह गई थीं. इन के जाने से घर में अजीब सा सूनापन घिर आया था. मैं अपने विद्यालय चली जाती और सौम्या अपने कालेज. सौम्या का इस साल बीए अंतिम वर्ष था. जब कभी उस की सहेलियां आतीं तो घर की उदासी उन की खिलखिलाहटों से कुछ देर को दूर हो जाती थी.

समय जैसेतैसे कट रहा था. इधर, सौम्या कुछ अनमनी सी रहने लगी थी. पिता की दूरी उसे कुछ ज्यादा ही खल रही थी. हां, इस बीच इन के मित्र कभी अकेले, कभी परिवार सहित आ कर हालचाल पूछ लिया करते थे.

मेरी सहयोगी शिक्षिकाएं भी बहुधा आती रहतीं, विशेषकर इन के मित्र शलभजी और मेरी सखी मीरा. शलभ इन के परममित्रों में से थे. इन के विभाग में ही रीडर थे एवं अभी तक कुंआरे ही थे. बड़ा मिलनसार स्वभाव था और बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व. आते तो घंटों बातें करते. सौम्या भी उन से काफी हिलमिल गई थी.

मीरा मेरी सहयोगी प्राध्यापिका और घनिष्ठ मित्र थी. हम दोनों के विचारों में अद्भुत साम्य अंतरंगता स्थापित करने में सहायक हुआ था. मन की बातें, उलझनें, दुखसुख आपस में बता कर हम हलकी हो लेती थीं. उस के पति डाक्टर थे तथा 2 बेटे थे अक्षय और अभय. अक्षय का इसी साल पीसीएस में चयन हुआ था.

सत्र की समाप्ति के बाद संदीप भी आ गया था. उस के आने से घर की रौनक जाग उठी थी. दोनों भाईबहन नितनए कार्यक्रम बनाते और मुझे भी उन का साथ देना ही पड़ता. दोनों के दोस्तों और सहेलियों से घर भर उठता. बच्चों के बीच में मैं भी हंसबोल लेती, पर मन का कोई कोना खालीखाली, उदास रहता. इन की यादों की कसक टीस देती रहती थी.

वैसे भी उम्र के इस तीसरे प्रहर में साथी की दूरी कुछ ज्यादा ही तकलीफदेह होती है. पतिपत्नी एकदूसरे की आदत में शामिल हो जाते हैं. इन के लंबेलंबे पत्र आते. वहां कैसे रहते हैं, क्या करते हैं, सारी बातें लिखी रहतीं. जिस दिन पत्र मिलता, मैं और सौम्या बारबार पढ़ते, कई दिन तक मन तरोताजा, खुश रहता. फिर दूसरे पत्र का इंतजार शुरू हो जाता.

एक दिन विद्यालय में कक्षा लेते समय एकाएक जोर का चक्कर आ जाने से मैं गिर पड़ी. छात्राओं तथा मेरे अन्य सहयोगियों ने मिल कर मुझे तुरंत अस्पताल पहुंचाया. डाक्टर ने उच्च रक्तचाप बतलाया और कम से कम 1 महीना आराम करने की सलाह दी.

इस बीच, सौम्या बिलकुल अकेली पड़ गई. घर, अपना विद्यालय और फिर मुझे तीनों को संभालना उस अकेली के लिए बड़ा मुश्किल हो रहा था. तब शलभजी और मीरा ने काफी सहारा दिया.

मेरी तो तबीयत खराब थी, इसलिए जो भी आता उस की सौम्या से ही बातें होतीं. हां, मीरा आती तो विद्यालय के समाचार मिलते रहते. शलभजी भी मुझ से हाल पूछ सौम्या से ही अधिकतर बातें करते रहते.

इधर, शलभजी और सौम्या में काफी पटने लगी. आश्चर्य तब होता जब मेरे सामने आते ही दोनों असहज होने लगते. बस, इसी बात ने मुझे चौकन्ना किया.

शलभजी और सौम्या? बापबेटी का सा अंतर, इन से बस 2-4 साल ही छोटे होंगे वे, कनपटियों पर से सफेद होते बाल, इकहरा शरीर, चुस्तदुरुस्त पोशाक और बातें करने का अपना एक विशिष्ट आकर्षक अंदाज, सब मिला कर मर्दाना खूबसूरती का प्रतीक.

मुझे आश्चर्य होता कि मेरा हाल पूछने आए शलभ, मेरा हाल पूछना भूल, खड़ेखड़े ही सौम्या को आवाज लगाते कि सौम्या, आओ, तुम्हें बाहर घुमा लाऊं, बोर हो रही होगी और सौम्या भी ‘अभी आई’ कह कर झट अपनी खूबसूरत पोशाक पहन, सैंडिल खटखटाती बाहर निकल जाती.

सौम्या तो खैर अभी कच्ची उम्र की नासमझ लड़की थी, पर इस परिपक्व प्रौढ़ की बेहयाई देख मैं दंग थी. सोचती, क्या दैहिक भूख इतनी प्रबल हो उठी है कि सारे समीकरण, सारी परिभाषाएं इस तृष्णा के बीच अपनी पहचान खो, बौनी हो जाती हैं, नैतिकता अतृप्ति की अंधी अंतहीन गलियों में कहीं गुम हो जाती है. शायद, हां. तभी तो जिस वर्जित फल का शलभ अपनी जवानी के दिनों में रसास्वादन न कर सके थे,

इस पकी उम्र में उस के लोभ से स्वयं को बचा पाना उन के लिए कठिन हो रहा था. वैसे भी बुढ़ापे में अगर मन विचलित हो जाए तो उस पर नियंत्रण करना कठिन ही होता है. तिस पर सुकोमल, कमनीय, सुंदर सौम्या. दिग्भ्रमित हो उठे थे शलभजी.

वे आए दिन उस के लिए उपहार लाने लगे थे. कभी सलवारकुरता, कभी स्कर्टब्लाउज तो कभी नाइटी. सौम्या भी उन्हें सहर्ष ग्रहण कर लेती. मैं ने 2-3 बार शलभजी से कहा, ‘भाईसाहब, आप इस की आदत खराब कर रहे हैं, कितनी सारी पोशाकें तो हैं इस के पास.’

‘क्यों, क्या मैं इस को कुछ नहीं दे सकता? इतना अधिकार भी नहीं है मुझे? बहुत स्नेह है मुझे इस से,’ कह कर वे प्यारभरी नजरों से सौम्या की तरफ देखते. उस दृष्टि में किसी बुजुर्ग का निश्छल स्नेह नहीं झलकता था, बल्कि वह किसी उच्छृंखल प्रेमी की वासनामय काकदृष्टि थी.

मुझे लगता कि कपटी पुरुष स्नेह का मुखौटा लगा, सौम्या की इस नादानी और भोलेपन का लाभ उठा, उस का जीवन बरबाद कर सकता है. मेरे सामने यह समस्या एक चुनौती के रूप में सामने खड़ी थी. इन के वापस आने में 7 महीने बाकी थे. संदीप का यह अंतिम वर्ष था. उस से कुछ कहना भी उचित नहीं था.

प्रश्नों और संदेहों के चक्रव्यूह में उलझी मैं इस समस्या के घेरे से निकलने के लिए बुरी तरह से हाथपैर मार रही थी. तभी निराशा के गहन अंधकार में दीपशिखा की ज्योति से चमके थे मीरा के ये शब्द, ‘नेहा, सौम्या को तू मुझे सौंप दे, अक्षय के लिए. तुझे लड़का ढूंढ़ना नहीं पड़ेगा और मुझे सुघड़ बहू.’

‘सोच ले, यह लड़की तेरी खटिया खड़ी कर देगी, फिर बाद में मत कहना कि मैं ने बताया नहीं था.’

‘वह तू मुझ पर छोड़ दे,’ और फिर हम दोनों खुल कर हंस पड़ीं.

मीरा के कहे इन शब्दों ने मुझे डूबते को तिनके का सहारा दिया. मैं ने तुरंत उसे फोन किया, ‘‘मीरा, आज तू सपरिवार मेरे घर खाने पर आ जा. अक्षय, अभय से मिले भी बहुत दिन हो गए. रात का खाना साथ ही खाएंगे.’’

‘‘क्यों, एकाएक तुझे ज्यादा शक्ति आ गई क्या? कहे तो 10-20 लोगों को और अपने साथ ले आऊं?’’ उस ने हंसते हुए कहा.

‘‘नहींनहीं, आज मन बहुत ऊब रहा है. सोचा, घर में थोड़ी रौनक हो जाए.’’

‘‘अच्छा जी, तो अब हम नौटंकी के कलाकार हो गए. ठीक है भई, आ जाएंगे सरकार का मनोरंजन करने.’’

मनमस्तिष्क पर छाया तनाव का कुहरा काफी हद तक छंट चुका था और मैं नए उत्साह से शाम की तैयारी में जुट गई. रमिया को निर्देश दे मैं ने कई चीजें बनवा ली थीं. सौम्या ने सारी तैयारियां देख कर कहा था, ‘‘मां, क्या बात है? आज आप बहुत मूड में हैं और यह इतना सारा खाना क्यों बन रहा है?’’

‘‘बस यों…अब तबीयत एकदम ठीक है और शाम को मीरा, अक्षय, अभय और डाक्टर साहब भी आ रहे हैं. खाना यहीं खाएंगे. अक्षय नौकरी मिलने के बाद से पहली बार घर आया है न, मैं ने सोचा एक बार तो खाने पर बुलाना ही चाहिए. हां, तू भी घर पर ही रहना,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर मां, मेरा तो शलभजी के साथ फिल्म देखने का कार्यक्रम था?’’

‘‘देख बेटी, फिल्म तो कल भी देखी जा सकती है, आंटी सब के साथ आ रही हैं. मेरे सिवा एक तू ही तो है घर में. तू भी चली जाएगी तो कितना बुरा लगेगा उन्हें. ऐसा कर, तू शलभ अंकल को फोन कर के बता दे कि तू नहीं जा पाएगी,’’ मैं ने भीतर की चिढ़ को दबाते हुए प्यार से कहा.

‘‘ठीक है, मां,’’ सौम्या ने अनमने ढंगसे कहा. शाम को मीरा, डाक्टर साहब, अक्षय, अभय सभी आ गए. विनोदी स्वभाव के डाक्टर साहब ने आते ही कहा, ‘‘बीमारी से उठने के बाद तो आप और भी तरोताजा व खूबसूरत लग रही हैं, नेहाजी.’’

‘‘क्यों मेरी सहेली पर नीयत खराब करते हो इस बुढ़ापे में?’’ मीरा ने पति को टोका.

‘‘लो, सारी जवानी तो तुम ने दाएंबाएं देखने नहीं दिया, अब इस बुढ़ापे में तो बख्श दो.’’

उन की इस बात पर जोर का ठहाका लगा.

सौम्या ने भी बड़ी तत्परता और उत्साह से उन सब का स्वागत किया. कौफी, नाश्ता के बाद वह अक्षय और अभय से बातें करने लगी.

मैं ने अक्षय की ओर दृष्टि घुमाई, ‘ऊंचा, लंबा अक्षय, चेहरे पर शालीन मुसकराहट, दंभ का नामोनिशान नहीं, हंसमुख, मिलनसार स्वभाव. सच, सौम्या के साथ कितनी सटीक जोड़ी रहेगी,’ मैं सोचने लगी. डाक्टर साहब और मीरा के साथ बातें करते हुए भी मेरे मन का चोर अक्षय और सौम्या की गतिविधियों पर दृष्टि जमाए बैठा रहा. मैं ने अक्षय की आंखों में सौम्या के लिए प्रशंसा के भाव तैरते देख लिए. मन थोड़ा आश्वस्त तो हुआ, परंतु अभी सौम्या की प्रतिक्रिया देखनी बाकी थी.

बातों के बीच ही सौम्या ने कुशलता से खाना मेज पर लगा दिया. डाक्टर साहब और मीरा तो सौम्या के सलीके से परिचित थे ही, सौम्या के मोहक रूप और दक्षता ने अक्षय पर भी काफी प्रभाव डाला. खुशगवार माहौल में खाना खत्म हुआ तो अक्षय ने कहा, ‘‘आंटी, आप से मिले और आप के हाथ का स्वादिष्ठ खाना खाए बहुत दिन हो गए थे, आज की यह शाम बहुत दिनों तक याद रहेगी.’’

विदा होने तक अक्षय की मुग्ध दृष्टि सौम्या पर टिकी रही. और सौम्या हंसतीबोलती भी बीचबीच में कुछ सोचने सी लगी, मानो बड़ी असमंजस में हो.

चलतेचलते डाक्टर साहब ने मीरा को छेड़ा, ‘‘मैडम, आप सिर्फ खाना ही जानती हैं या खिलाना भी?’’

मीरा ने उन्हें प्यारभरी आंखों से घूरा और झट से मुझे और सौम्या को दूसरे दिन रात के खाने का न्योता दे डाला.

मेरे लिए तो यह मुंहमांगी मुराद थी, अक्षय और सौम्या को समीप करने के लिए. दूसरे दिन जब शलभजी आए तो सौम्या ने कुछ ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया. फिल्म के लिए जब उन्होंने पूछा तो उस ने कहा, ‘‘आज मीरा आंटी के यहां जाना है, मां के साथ…इसलिए…’’ उस ने बात अधूरी छोड़ दी.

वे थोड़ी देर बैठने के बाद चले गए. मैं भीतर ही भीतर पुलकित हो उठी. मुझे लगा कि प्रकृति शायद स्वयं सौम्या को समझा रही है और यही मैं चाहती भी थी.

दूसरे दिन शाम को मीरा के यहां जाने के लिए तैयार होने से पहले मैं ने सौम्या से कहा, ‘‘सौम्या, आज तू गुलाबी साड़ी पहन ले.’’

‘‘कौन सी? वह जार्जेट की जरीकिनारे वाली?’’

‘‘हांहां, वही.’’

इस साड़ी के लिए हमेशा ‘नानुकुर’ करने वाली सौम्या ने आज चुपचाप वही साड़ी पहन ली. यह मेरे लिए बहुत आश्चर्य की बात थी. गुलाबी साड़ी में खूबसूरत सौम्या का रूप और भी निखर आया.

न चाहते हुए भी एक बार फिर मेरी दृष्टि उस के ऊपर चली गई. अपलक, ठगी सी कुछ क्षण तक मैं अपनी मोहक, सलोनी बेटी का अप्रतिम, अनुपम, निर्दोष सौंदर्य देखती रह गई.

‘‘चलिए न मां, क्या सोचने लगीं?’’

सौम्या ने ही उबारा था इस स्थिति से मुझे.

मीरा के घर पहुंचतेपहुंचते हलकी सांझ घिर आई थी. डाक्टर साहब, मीरा, अक्षय सभी लौन में ही बैठे थे. अभय शायद अपने किसी दोस्त से मिलने गया था. हम दोनों जब उन के समीप पहुंचे तो सभी की दृष्टि कुछ पल को सौम्या पर स्थिर हो गई.

मैं ने अक्षय की ओर देखा तो पाया कि यंत्रविद्ध सी सम्मोहित उस की आंखें पलक झपकना भूल सौम्या को एकटक निहारे जा रही थीं.

‘‘अरे भई, इन्हें बिठाओगे भी तुम लोग कि खड़ेखड़े ही विदा कर देने का इरादा है?’’ डाक्टर साहब ने सम्मोहन भंग किया.

‘‘अरे हांहां, बैठो नेहा,’’ मीरा ने कहा और फिर हाथ पकड़ अपने पास ही सौम्या को बिठाते हुए मुझ से बोली, ‘‘नेहा, आज मेरी नजर सौम्या को जरूर लगेगी, बहुत ही प्यारी लग रही है.’’

‘‘मेरी भी,’’ डाक्टर साहब ने जोड़ा.

सौम्या शरमा उठी, ‘‘अंकल, क्यों मेरी खिंचाई कर रहे हैं?’’

‘‘इसलिए कि तू और लंबी हो जाए,’’ उन्होंने पट से कहा और जोर से हंस पड़े.

कुछ देर इधरउधर की बातों के बाद मीरा कौफी बनाने उठी थी, पर सौम्या ने तुरंत उन्हें बिठा दिया, ‘‘कौफी मैं बनाती हूं आंटी, आप लोग बातें कीजिए.’’

‘‘हांहां, मैं भी यही चाह रहा था बेटी. इन के हाथ का काढ़ा पीने से बेहतर है, ठंडा पानी पी कर संतोष कर लिया जाए,’’ डाक्टर साहब ने मीरा को तिरछी दृष्टि से देख कर कहा तो हम सभी हंस पड़े. सौम्या उठी तो अक्षय ने तुरंत कहा, ‘‘चलिए, मैं आप की मदद करता हूं.’’

दोनों को साथसाथ जाते देख डाक्टर साहब बोले, ‘‘वाह, कितनी सुंदर जोड़ी है.’’

‘‘सच,’’ मीरा ने समर्थन किया. फिर मुझ से बोली, ‘‘नेहा, सौम्या मुझे और इन्हें बेहद पसंद है और मुझे ऐसा लग रहा है कि अक्षय भी उस से प्रभावित है क्योंकि अभी तक तो शादी के नाम पर छत्तीस बहाने करता था, परंतु कल जब मैं ने सौम्या के लिए पूछा तो मुसकरा कर रह गया. अब अच्छी नौकरी में भी तो आ गया है…मुझे उस की शादी करनी ही है. नेहा, अगर कहे तो अभी मंगनी कर देते हैं. शादी भाईसाहब के आने पर कर देंगे. वैसे तू सौम्या से पूछ ले.’’

हर्ष के अतिरेक से मेरी आंखें भर आईं. मीरा ने मुझे किस मनोस्थिति से उबारा था, इस का रंचमात्र भी आभास नहीं था. भरे गले से मैं उस से बोली, ‘‘मेरी बेटी को इतना अच्छा लड़का मिलेगा मीरा, मैं नहीं जानती थी. उस से क्या पूछूं. अक्षय जैसा लड़का, ऐसे सासससुर और इतना अच्छा परिवार, सच, मुझे तो घरबैठे हीरा मिल गया.’’

‘‘मैं ने भी नहीं सोचा था कि इस बुद्धू अक्षय के हिस्से में ऐसा चांद का टुकड़ा आएगा,’’ मीरा बोली थी.

‘‘और मैं ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे इतनी हसीन समधिन मिलेगी,’’ डाक्टर साहब ने हंसते हुए कहा तो हम सब एक बार फिर से हंस पड़े.

तभी एकाएक चौंक पड़े थे डाक्टर साहब, ‘‘अरे भई, यह कबूतरों की जोड़ी कौफी उगा रही है

क्या अंदर?’’

तब मैं और मीरा रसोई की तरफ चलीं पर द्वार पर ही ठिठक कर रुक जाना पड़ा. मीरा ने मेरा हाथ धीरे से दबा कर अंदर की ओर इशारा किया तो मैं ने देखा, अंदर गैस पर रखी हुई कौफी उबलउबल कर गिर रही है और सामने अक्षय सौम्या का हाथ थामे हुए धीमे स्वर में कुछ कह रहा है.

सौम्या की बड़ीबड़ी हिरनी की सी आंखें शर्म से झुकी हुई थीं और उस के पतले गुलाबी होंठों पर मीठी प्यारी सी मुसकान थी.

मैं और मीरा धीमे कदमों से बाहर चली आईं. उफनती नदी का चंचल बहाव प्रकृति ने सही दिशा की ओर मोड़ दिया था.

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