तबादला: उसे कौनसा दंश सहना पड़ा

‘‘इन से मिलिए, यह मेरे विभाग के वरिष्ठ अफसर राजकुमारजी हैं. जब से यह आए हैं स्वास्थ्य विभाग का कामकाज बहुत तेजी से हो रहा है. किसी भी फाइल को 24 घंटे के अंदर निबटा देते हैं,’’ स्वास्थ्य मंत्री मोहनलाल ने राजकुमार का परिचय अपनी पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ मंत्री रामचंद्रजी से कराया.

रामचंद्र ने एक उड़ती नजर राजकुमार पर डाली और बोले, ‘‘आप के विभाग में मेरे इलाके के कई डाक्टर हैं जिन के बारे में मुझे आप से बात करनी है. मैं अपने सचिव को बता दूंगा. वह आप से मिल लेगा. आप जरा उन पर ध्यान दीजिएगा.’’

राजकुमार का अधिकारी वर्ग में अच्छा नाम था. वह केवल कार्यकुशल ही नहीं थे बल्कि फैसले भी समझदारी के साथ लेते थे. फाइलों को दबा कर रखना उन के उसूल के खिलाफ था. फैसला किस के हक में हो रहा है, इस बात पर वह ज्यादा माथापच्ची नहीं करते थे. हां, किसी के साथ पक्षपात नहीं करते थे चूंकि दबंग व्यक्तित्व के थे. इसलिए राजनीतिक दखल को सहन नहीं करते थे. आम व्यक्ति उन की कार्य प्रणाली से संतुष्ट था.

मोहनलाल पहली बार मंत्री बने थे. उन्हें राजकुमार की कार्यशैली का अनुभव नहीं था. उन्होंने जो फाइलों में देखा या दूसरे अधिकारियों व आम लोगों से सुना, उसी के आधार पर मंत्रीजी राजकुमार से बेहद प्रभावित थे. यह और बात है कि मंत्री आमतौर पर जो चाहते हैं वही करवाने की अपने अधिकारियों से उम्मीद करते हैं, चाहे वह नियम के खिलाफ ही क्यों न हो.

मंत्री रामचंद्र के सचिव मुरली मनोहर ने राजकुमार से फोन पर संपर्क किया और बोले, ‘‘कहो भाई, कैसा चल रहा है तुम्हारे विभाग का काम? मेरे विभाग के मंत्री रामचंद्र तुम्हारी बड़ी तारीफ कर रहे थे. उन के इलाके के कुछ डाक्टर 4-5 साल पहले दुबई नौकरी करने चले गए थे. लगता है जाने से पहले उन्होंने सरकार से कोई मंजूरी नहीं ली थी और वहां नौकरी कर ली थी. अब वे पैसा कमा कर भारत लौट आए हैं. वह इस गैरहाजिरी के समय को छुट्टी मनवा कर वापस नौकरी पर आना चाहते हैं. उन सब की फाइलें तुम्हारे पास हैं, क्या विचार है? मैं मंत्रीजी से क्या कहूं?’’

राजकुमार ने शांति से मगर दृढ़तापूर्वक कहा, ‘‘ऐसे डाक्टरों की तादाद बहुत ज्यादा है और इस बात को उन्होंने मौखिक रूप से स्वीकार भी किया है, लेकिन अपने लिखित पत्र में मातापिता की लंबी बीमारी या उन के देहांत का बहाना बना कर छुट्टी मंजूर करने की प्रार्थना की है. समस्या यह है कि उन की गैरहाजिरी के दौरान स्वास्थ्य विभाग ने दूसरे डाक्टरों की नियुक्ति कर दी थी. अब उन्हें हटा कर इन्हें वापस लेने का कोई औचित्य नहीं है. ऐसे डाक्टरों पर विभागीय जांच भी चल रही है. ऐसे में इन्हें वापस नौकरी पर लेना मुमकिन नहीं है. मेरी स्वास्थ्य मंत्री से इस बारे में बात हुई है. आप अपने मंत्री को हमारी इस बातचीत से अवगत करा सकते हैं.’’

स्वास्थ्य मंत्री मोहनलाल को जब इस बात का पता चला तो वह तिलमिला उठे. फौरन राजकुमार को बुला कर कहने लगे, ‘‘आप मंत्री रामचंद्रजी के बारे में कुछ जानते भी हैं. वह मेरे आराध्य हैं. उन्हीं की मदद से मैं मंत्री बन पाया हूं. यदि उन का यह छोटा सा काम नहीं हुआ तो वह मुझ से नाराज हो जाएंगे. हो सकता है कि वह मुख्यमंत्री तक इस विषय को ले जाएं और मुझे मंत्री पद से भी हाथ धोना पड़ जाए. आप इतनी सख्ती न करें तो अच्छा होगा.’’

राजकुमार गंभीर हो कर बोले, ‘‘आप इस विभाग के मंत्री हैं. हालात की गंभीरता को समझने की कोशिश करें. हमारे दिमाग को कुछ डाक्टर समझते हैं कि वह कैसा भी अनैतिक कार्य क्यों न करें, उन पर कोई काररवाई नहीं हो सकती क्योंकि उन्हें राजनीतिक समर्थन प्राप्त है.

‘‘अंधेरगर्दी मची हुई है. कई डाक्टर अस्पताल से गायब रह कर अपनी निजी प्रैक्टिस करते हैं तो कुछ बिना अनुमति लिए विदेशों में नौकरी करते हैं. और फिर अचानक वापस आ कर अपनी बहाली की बात धड़ल्ले से करते हैं. मैं इस विषय पर एक नोट तैयार कर देता हूं. आप उसे कैबिनेट में चर्चा के लिए रख दीजिए. मुख्यमंत्रीजी जो फैसला करेंगे उसे हम लागू कर देंगे. मेरे विचार में यही इस समस्या का सही हल होगा.’’

इस के बाद मंत्रीजी चुप्पी साध गए.

कुछ ही दिनों में मुख्यमंत्री का फैसला फाइल पर आ गया. वह राजकुमार के तर्क से सहमत थे. स्वास्थ्य मंत्री ने भी इस समस्या को आगे न खींचने में ही अपनी भलाई समझी.

विभाग में डाक्टरों के 1 हजार खाली पड़े पदों को भरने का सरकारी आदेश आया. मंत्रीजी का पी.ए. बड़ा घाघ था. उस ने उन्हें समझाया, ‘‘सर, अपने आराध्य रामचंद्रजी तथा दूसरे मंत्रिगण को खुश करने का यह बड़ा अच्छा मौका है. आप एक कमेटी का निर्माण कर के सचिव राजकुमार को उस का चेयरमैन बना दीजिए तथा सभी मंत्रिगण की सिफारिश पर डाक्टरों की भरती कीजिए. ऐसा पहले भी किया जा चुका है.’’

पी.ए. के सुझाव पर मंत्रीजी बेहद खुश हुए. उन्होंने फौरन राजकुमार से बातचीत करते हुए कहा, ‘‘आप ने डाक्टरों की भरती के लिए आया सरकारी आदेश जरूर देखा होगा. मैं चाहता हूं कि एक कमेटी बना कर आप को उस का चेयरमैन बनाया जाए. मैं ने सभी कैबिनेट स्तर के मंत्रियों के लिए 30-30 डाक्टरों का कोटा तय किया है. आप उन की सिफारिश पर उन्हें बतौर दैनिक वेतन पर नियुक्त करें तो सभी मंत्री संतुष्ट हो जाएंगे. कुछ भरतियां विरोधी पक्ष के नेताओं की सिफारिश पर भी की जा सकती हैं ताकि वे सदन में हंगामा खड़ा न करें. आशा है कि इस बार आप मेरे इस सुझाव के अनुसार ही कार्य करेंगे.’’

राजकुमार थोड़ी देर सोचते रहे. फिर बोले, ‘‘मान्यवर, आप का सुझाव सरकारी नियमों के खिलाफ है. कमेटी की रचना तथा मुझे चेयरमैन बनाने का कानून में कोई प्रावधान नहीं है. सरकार के लिखित आदेश मौजूद हैं जिस के तहत डाक्टरों की दैनिक वेतन पर भरती नहीं की जा सकती. डाक्टरों की भरती का अधिकार केवल लोकसेवा आयोग को है. मेरे पास सरकारी आदेश उपलब्ध हैं. मैं आप को फाइल भेज दूंगा. आप कृपया पढ़ लीजिएगा.’’

मंत्रीजी बहुत निराश हुए. उन्होंने सभी बड़े मंत्रियों को उन के सुझाए डाक्टरों की नियुक्ति का वादा कर दिया था. अब क्या होगा? यह सवाल उन के सामने खड़ा था और इसी के साथ जुड़ा था उन की इज्जत का सवाल.

पी.ए. ने एक बार फिर उन्हें बहकाया और कहा, ‘‘सर, आप की आज्ञा सरकारी आदेशों के ऊपर है. आप सार्वजनिक हित में कोई भी आदेश दे सकते हैं. सचिव को उस का पालन करना ही पड़ेगा. आप इतना निराश न हों. आप फाइल पर आदेश दे दीजिए. मैं एक नोट तैयार कर देता हूं.’’

मंत्रीजी ने वैसा ही किया. राजकुमार ने अपने सेवाकाल में ऐसे कई आदेश देखे थे. वह पी.ए. की शरारत को समझ गए और मंत्रीजी से मिल कर उन्हें सुझाया, ‘‘सर, इस फाइल को मैं अपनी टिप्पणी सहित कानून विभाग को भेज देता हूं. उन की सलाह पर ही आगे की काररवाई करना उचित होगा.’’

यह पहली बार था कि राजकुमार चाहते हुए भी फाइल का निबटारा जल्दी नहीं कर पा रहे थे. कुछ अरसे बाद कानून विभाग के सचिव की टिप्पणी सहित फाइल वापस आ गई. राजकुमार के तर्क से उन्होंने सहमति जाहिर की थी. एक बार फिर वह अपने मंत्री से मिले. उन्हें फाइल दिखाई और सुझाव दिया, ‘‘कानून विभाग के सचिव ने अपनी टिप्पणी फाइल पर लिखित रूप में दी है. इस के खिलाफ कार्य करने पर विधानसभा में हंगामा खड़ा हो सकता है. विरोधी पक्ष वाले इस तरह के नियम के विरुद्ध काररवाई की भनक पड़ते ही आप के लिए बहुत बड़ी परेशानी खड़ी कर सकते हैं. मेरा सुझाव है कि नियमों के दायरे में ही डाक्टरों की भरती करें तो अच्छा होगा.’’

मंत्रीजी नाराज थे, वह बोले, ‘‘आप इस फाइल को कुछ दिनों के लिए रोक लें. मैं मुख्यमंत्री से बात कर के आप को बताऊंगा कि क्या करना है.’’

एक माह से ज्यादा समय बीत गया पर मंत्रीजी ने न तो मुख्यमंत्री से कोई बात की और न ही अपने सचिव को कोई आदेश दिया. राजकुमार के याद दिलाने पर कि भरती का सूचनापत्र सरकारी आदेश के अनुसार अगले एक माह के अंदर निकलना चाहिए वरना समय बढ़ाने के लिए फिर सरकार को भेजना पड़ेगा. विरोधी पक्ष इस तरह की अनियमितताओं की खोजखबर रखता है. अच्छा होगा कि हम अगली काररवाई समयावली के मुताबिक कर लें. मंत्रीजी कुछ नहीं बोले.

राजकुमार मुख्य सचिव से मिलने गए. पूरी बात सुनने पर वह बोले, ‘‘कानून विभाग के सचिव की टिप्पणी फाइल पर है. आप के पास भरती करने के पूरे अधिकार हैं. मंत्रीजी के आदेश की कोई जरूरत नहीं है. यह सरकार का आदेश है और इस पर आप के मंत्री की भी परोक्ष रूप से सहमति कैबिनेट में ली जा चुकी है. वह इसे लटका नहीं सकते. आप आगे की काररवाई कीजिए.’’

लोकसेवा आयोग का डाक्टरों की भरती के लिए सूचनापत्र गजट में छप गया. पी.ए. ने मंत्रीजी को अवगत कराया, ‘‘सर, आप की मंजूरी के बिना सचिव ने लोकसेवा आयोग को भरती का निर्देश जारी कर दिया है. यह आप के सम्मान का सवाल है.’’

मंत्रीजी गुस्से से लालपीले हो गए. अपने पी.ए. को फाइल लाने को कहा. राजकुमार ने मंत्रीजी से फोन पर पूछा, ‘‘क्या मैं आ कर आप को पूरी स्थिति से अवगत कराऊं?’’

मंत्री मोहनलाल तो गुस्से से फड़फड़ा रहे थे. वह रूखे स्वर में बोले, ‘‘कोई जरूरत नहीं है. मैं स्वयं देख लूंगा…’’ उन्होंने अपने वरिष्ठ मंत्रियों से सलाह ली. मालूम नहीं उन्होंने क्या सुझाव दिया पर 2 दिन के बाद फाइल वापस राजकुमार की मेज पर थी. उस पर मंत्रीजी ने अपनी सहमतिस्वरूप हस्ताक्षर कर दिए थे.

मंत्री मोहनलाल मुख्यमंत्री से जा कर मिले. अगले ही दिन राजकुमार अपने पद का कार्यभार एक दूसरे अफसर को दे रहे थे. यह उन की 30 साल के सेवाकाल का 27वां तबादला था.

मेरा बाबू: क्या हुआ था फरजाना के साथ

जून, 1993 की बात है. मुंबई में बंगलादेशियों की धरपकड़ जारी  थी. पुलिस उन्हें पकड़पकड़ कर ट्रेनों में ठूंस रही थी. कुछ तो चले गए, कुछ कल्याण स्टेशन से वापस मुड़ गए. किसी का बाप पकड़ा गया और टे्रेन में बुक कर दिया गया तो बीवीबच्चे छूट गए. किसी की मां पकड़ी गई तो छोटेछोटे बच्चे इधर ही भीख मांगने के लिए छूट गए. पुलिस को किसी का फैमिली डिटेल मालूम नहीं था, बस, जो मिला, धर दबोचा और किसी भी ट्रेन में चढ़ा दिया. सब के चेहरे आंसुओं से भीग गए थे.

यह धरपकड़ करवाने वाले दलाल इन्हीं में से बंगाली मुसलमान थे. रात के अंधेरे में सोए हुए लोगों पर पुलिस का कहर नाजिल होता था, क्योंकि इन्हें दिन में पकड़ना मुश्किल था. कभी तो कोई मामला लेदे कर बराबर हो जाता और कभी किसी को जबरदस्ती ट्रेन में ठूंस दिया जाता. इन की सुरक्षा के लिए कोई आगे नहीं आया, न ही बंगलादेश की सरकार और न ही मानवाधिकार आयोग.

उन दिनों मेरे पास कुछ औरतों का काम था. सब की सब सफाई पर लगा दी गई थीं. कुछ को मैं ने कब्रिस्तान में घास की सफाई पर लगा रखा था. ज्यादातर औरतें बच्चों के साथ थीं. उन के साथ जो मर्द थे, उन के पति थे या भाई, मालूम नहीं. ये भेड़बकरियों की तरह झुंड बना कर निकलती थीं और झुंड ही की शक्ल में रोड के ब्रिज के नीचे अपने प्लास्टिक के झोपड़ों में लौट जाती थीं.

उन्हीं में एक थी फरजाना. देखने में लगता था कि वह 17 या 18 साल की होगी. मुझे तब ज्यादा आश्चर्य हुआ जब उस ने बताया कि वह विधवा है और एक बच्चे की मां है. उस का 2 साल का बच्चा जमालपुर (बंगलादेश) में है.

इस धरपकड़ के दौरान एक दिन वह मेरे पास आई और बोली, ‘‘साहब, मैं यहां से वापस बंगलादेश नहीं जाना चाहती.’’

‘‘क्यों? चली जाओ. यहां अकेले क्या करोगी?’’

‘‘साहब, मेरा मर्द एक्सीडेंट में मर गया. मेरा एक लड़का है जावेद, मेरा बाबू, मैं अपनी भाभी और भाई के पास उसे छोड़ कर आई हूं. मैं अपने बाबू के लिए ढेर सारा पैसा कमाना चाहती हूं ताकि उसे अच्छे स्कूल में अच्छी शिक्षा दिला सकूं और बड़ा आदमी बना सकूं.’’

फरजाना को पुकारते समय मैं उसे ‘बेटा’ कहता था और इसी एक शब्द की गहराई ने उस को मेरे बहुत करीब कर दिया था. न जाने क्यों, जब वह मेरे पास आती तो मेरे इतने करीब आ जाती जैसे किसी बाप के पास बेटी आती है. वह मुझे ‘रे रोड’ के प्लास्टिक के झोंपड़ों की सारी दास्तान सुनाती.

उस की कई बार इज्जत खतरे में पड़ी, लेकिन वह भाग कर या तो रे रोड के रेलवे स्टेशन पर आ गई या रोड पर आ कर चिल्लाने लगी. ये इज्जत लूटने वाले या उन्हें जिस्मफरोशी के बाजार में बेचने वाले बंगलादेशी ही थे. पहले वह यहां के दलालों से मिलते थे. रात के समय औरतों को दिखाते थे और फिर सौदा पक्का हो जाता था. कितनी ही औरतें फकलैंड रोड, पीली कोठी और कमाठीपुरा में धंधा करने लगीं और कुछ तंग आ कर मुंबई से भाग गईं.

फरजाना ने एक दिन मुझे बताया कि वह बंगाली नहीं है. बंटवारे के समय उस के पिता याकूब खां जिला गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) से पूर्वी पाकिस्तान गए थे. उस के बाद 1971 के गृहयुद्ध में वह मुक्ति वाहिनी के हाथों मारे गए. इस के बाद उस के भाई ने उस की शादी कर दी. उस का पति एक्सीडेंट में मर गया. जब उस का पति मरा तो वह पेट से थी. अब यह खानदान पूरी तरह उजड़ गया था. बंगलादेश से जब बिहारी मुसलमानों  ने उर्दू भाषी पाकिस्तान की तरफ कूच करना शुरू किया तो वहां की सरकार ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया. इधर बंगलादेश सरकार भी उन्हें अपने पास रखना नहीं चाहती थी, क्योंकि इस गृहयुद्ध में इन की सारी वफादारी पाकिस्तान के साथ थी. यहां तक कि इन्होंने मुक्ति वाहिनी से लड़ने के लिए अपनी रजाकार सेना बनाई थी.

जबपाकिस्तान हार गया और एक नए देश, बंगलादेश, का जन्म हो गया तो ये सारे लोग बीच में लटक गए. न बंगलादेश के रहे न पाकिस्तान के. फरजाना उन्हीं में से एक थी. वह भोजपुरी के साथ बहुत साफ बंगला बोलती थी. एक दिन तो हद हो गई, जब वह टूटेफूटे बरतनों में मेरे लिए मछली और चावल पका कर लाई.

मैं ने अपने दिल के अंदर कई बार झांक कर देखा कि फरजाना कहां है? हर बार वही हुआ. फरजाना ठीक मेरी लड़की की तरह मेरे दिल में रही. अब वह मुझे बाबा कह कर पुकारती थी. दिल यही कहता था कि उसे इन सारे झमेलों से उठा कर क्यों न अपने घर ले जाऊं, ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि मेरी 3 के बजाय 4 लड़कियां हो जाएंगी. लेकिन उस के बाबू जावेद का क्या होगा, जिस को वह जमालपुर (बंगलादेश) में छोड़ कर आई थी और फिर मैं ने उसे इधरउधर के काम से हटा कर अपने पास, अपने दफ्तर में रख लिया. काम क्या था, बस, दफ्तर की सफाई, मुझे बारबार चाय पिलाना और कफन के कपड़ों की सफाई.

मुंबई एक ऐसा शहर है जहां ढेर सारे ट्रस्ट, खैराती महकमे हैं, बुरे लोगों से ज्यादा अच्छे लोग भी हैं और जिस विभाग का मैं मैनेजर था वह भी एक चैरेटी विभाग था. मसजिदों की सफाई, इमामों, मोअज्जिनों की भरती, पैसों का हिसाब- किताब लेकिन इस के अलावा सब से बड़ा काम था लावारिस मुर्दों को कब्रिस्तान में दफन करना. जो भी मुसलिम लाशें अस्पताल से मिलती थीं, उन का वारिस हमारा महकमा था. हमारा काम था कि उन को नहला कर नए कपड़ों में लपेट कर उन्हें कब्रिस्तान में सुला दिया जाए.

मुंबई में कब्रिस्तानों का तो यह आलम है कि चाहे जहां भी किसी के लिए कब्र खोदी जाए, वहां 2-4 मुर्दों की हड्डियां जरूर मिलती हैं. मतलब इस से पहले यहां कई और लोग दफन हो चुके हैं, और फिर इन हड्डियों को इकट्ठा कर के वहीं दफन कर दिया जाता है. यहां कब्रिस्तानों में कब्र के लिए जमीन बिकती है और यह दो गज जमीन का टुकड़ा वही खरीद पाते हैं जिन के वारिस होते हैं.

सोनापुर के इलाके में ज्यादातर कब्रें इसलिए पुख्ता कर दी गई हैं ताकि दोबारा यहां कोई और मुर्दा दफन न हो सके. मुंबई में मुर्दों की भी भीड़ है, इन के लिए दो गज जमीन का टुकड़ा कौन खरीदे? इसलिए हमारा विभाग यह काम करता है. हमारे विभाग ने लावारिस लाशों के लिए एक जगह मुकर्रर कर रखी है. यह संस्था कफनदफन का सारा खर्च बरदाश्त करती है. बाकायदा एक मौलाना और कुछ मुसलमान इस काम पर लगा दिए गए हैें कि जब कोई लावारिस लाश आए उसे नहलाएं, कफन पहनाएं और नमाजेजनाजा पढ़ कर कब्र में उतारें. शायद ऐसा विभाग हिंदुस्तान के किसी शहर में नहीं है, लेकिन मुंबई में है और यह चैरेटी इस काम को खुशीखुशी करती है. वैसे इस दफ्तर का मुंबई की भाषा में एक दूसरा नाम भी है, ‘कफन आफिस.’

एक दिन फरजाना ने आ कर मुझे एक मुड़ीतुड़ी तसवीर दिखाई, ‘‘बाबा, यह मेरा बाबू है, ठीक अपने बाप पर गया है,’’ और फिर उस ने किसी कीमती चीज की तरह उसे अपने ब्लाउज में रख लिया. बच्चे की तसवीर बड़ी प्यारी थी. बड़ीबड़ी आंखें, उस में ढेर सारा काजल, माथे पर काजल का टीका, बाबासूट पहने फरजाना की गोद में बैठा हुआ है. मैं ने पूछा, ‘‘फरजाना, यह छोटा बच्चा तुम्हारे बगैर कैसे रहता होगा?’’

‘‘मैं वहां उसे भैयाभाभी के पास छोड़ कर आई हूं. उन के अपने 2 बच्चे हैं. यह तीसरा मेरा है. बड़े आराम से रह रहा होगा बाबा. आखिर, इस का बाप नहीं, दादा नहीं, चाचा नहीं, फिर इस के लिए कौन कमाएगा? इस को कौन बड़ा आदमी बनाएगा? मैं अपने सीने पर पत्थर रख कर आई हूं. जब किसी का बच्चा रोता है तो मेरा बाबू याद आता है. मैं अकेले में चुपके- चुपके रोती हूं. लेकिन मैं चाहती हूं, थोड़ा- बहुत पैसा कमा लूं तो वहां जाऊं, अपनेबाबू का अच्छे स्कूल में नाम लिखाऊं और फिर बड़ा हो कर मेरा बाबू कुछ बन जाए.’’

कुछ दिनों के बाद पुलिस ने इन की धरपकड़ बंद कर दी. लेकिन मैं ने उन सारी औरतों को काम से हटा दिया. वह कहां गईं, किधर से आईं, किधर चली गईं, मैं इस फिक्र से आजाद हो गया क्योंकि इन में कुछ रेडलाइट एरिया का चक्कर भी काटती थीं. मैं अपनेआप को इन तमाम झंझटों से दूर रखना चाहता था.

एक दिन जब दफ्तर की सफाई करते समय एक थैला मिला. खोल कर देखा तो उस में छोटे बच्चे के लिए नएनए कपड़े थे. मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि यह सारे कपड़े फरजाना ने अपने बाबू के लिए खरीदे होंगे और जल्दबाजी या पुलिस की धरपकड़ के दौरान वह इन्हें भूल गई होगी. अब ऐसे खानाबदोश लोगों का न घर है न टेलीफोन नंबर. फिर इन कपड़ों का क्या किया जाए?

मैं ने एकएक कपड़े को गौर से देखा. बाबासूट, जींस की पैंट, जूता, मोजा और एक छोटी सी टोपी. मैं ने भी उन्हें वहीं संभाल कर रख दिया. शहर में फरजाना को तलाश करना मुश्किल था.

एक दिन अखबार पर सरसरी निगाह डालते हुए मैं ने देखा कि कुछ औरतें सोनापुर (भानडूप) के रेडलाइट एरिया से पकड़ी गई हैं और पुलिस की हिरासत में हैं. इन में फरजाना का भी नाम था. इन सारी औरतों को कमरे के नीचे तहखाने में रखा गया था. दिन में केवल एक बार खाना दिया जाता था और जबरदस्ती उन से देह व्यापार का धंधा कराया जाता था.

उस का नाम पढ़ते ही मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगा. उस का बारबार मुझे बाबा कह के पुकारना याद आने लगा. दिल नहीं माना और मैं उस की तलाश में निकल पड़़ा.

उसे ढूंढ़ने में अधिक परेशानी नहीं हुई. वह भांडूप पुलिस स्टेशन में थी और वहां की पुलिस उसे बंगलादेश भेज रही थी. मैं थोड़ी देर के लिए उस से मिला लेकिन अब वह बिलकुल बदल चुकी थी. वह मुझे टकटकी लगा कर देख रही थी. उस के चेहरे की सारी मुसकराहट गुम हो चुकी थी. मुझे मालूम था कि उस की इज्जत भी लुट चुकी है. औरत की जब इज्जत लुट जाती है तो उस का चेहरा हारे हुए जुआरी की तरह हो जाता है, जो अपना सबकुछ गंवा चुका होता है. मैं ने वह प्लास्टिक का थैला उस के हाथ में दे दिया. उस ने उसे देखा और रोते हुए बोली, ‘‘बाबा, अब इस की जरूरत नहीं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बाबा, मेरा बाबू मर गया.’’

‘‘क्या बात कर रही हो. यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘बाबा, वह मर गया. मैं अपने भाई और भाभी को पैसा भेजती रही और वह मेरे बाबू की मौत मुझ से छिपाए रहे. वह  उसे कमरे के बाहर सुला देते थे. रात भर वह नन्हा फरिश्ता बारिश और ठंड में पड़ा रहता था. उसे सर्दी लगी और वह मर गया. भाभी और भाई ने उस की मौत को मुझ से छिपाए रखा ताकि उन को हमेशा पैसा भेजती रहूं. वह तो एक औरत वहां से आई थी और उस ने रोरो कर मेरे बाबू की दास्तान सुनाई. अब मेरा जिस्म बाकी है. अब मुझे जिंदगी से कोई दिलचस्पी नहीं.’’

फिर वह दहाड़ मार कर रोने लगी.

उस के इस तरह रोने से पुलिस स्टेशन में हड़बड़ी मच गई. सभी अपना काम छोड़ कर उस की तरफ दौड़ पड़े. उसे पानी वगैरह पिला कर चुप कराया गया. पुलिस अपनी काररवाई कर रही थी लेकिन मुझे यकीन था कि अब वह बंगलादेश नहीं जाएगी, अलीगंज या किशनगंज से दोबारा भाग आएगी. अब वहां उस का था भी कौन? एक बच्चा था वह भी मर गया. मैं उसे पुलिस स्टेशन में छोड़ कर आ गया और अपने कफन आफिस के कामों में लग गया. रोज एक नया मुर्दा और उस का कफनदफन.

एक दिन अस्पताल से फोन आने पर वहां गया. एक लाश की पहचान नहीं हो पा रही थी. लाश लोकल ट्रेन से कट गई थी. दोनों जांघों की हड्डियां कट गई थीं. पेट की आंतें बाहर थीं. यह एक औरतकी लाश थी. ब्लाउज के अंदर एक छोटे बच्चे की तसवीर खून में डूबी हुई थी. तसवीरको पानी से साफ किया. अब सबकुछ साफ था. यह फरजाना की लाश थी. उस का बाबू अपनी तसवीर में हंस रहा था. न जाने अपनी मौत पर, या अपनी मां की मौत पर या फिर इस मुल्क के बंटवारे पर. मैं उस लाश को उठा कर ले आया और तसवीर के साथ उसे कब्र में दफन कर दिया.

सपना-भाग 3: कैसा था नेहा का सफर

नेहा की मुसकराहट गायब हो चुकी थी. उस ने आकाश में चांद को देखा. न जाने उस ने कितनी रातें चांद से यह कहते हुए बिताई थीं कि तुम देखना चांद, वह रात भी आएगी जब वह अकेली नहीं होगी. इन तमाम सूनी रातों की कसम… वह रात जरूर आएगी जब उस का चांद उस के साथ होगा. तुम देखना चांद, वह आएगा… जरूर आएगा…

‘अरे, कहां खो गई? बस चली जाएगी,’ आकाश उस के कानों के पास फुसफुसाते हुए बोला. वह चुपचाप बस के भीतर चली आई. आकाश बहुत खुश था. इन चंद घंटों में वह नेहा को न जाने क्याक्या बता चुका था. पढ़ाई के लिए अमेरिका जाना और जाने से पहले पिता की जिद पूरी करने के लिए शादी करना उस की विवशता थी. अचानक मातापिता की एक कार ऐक्सिडैंट में मृत्यु हो गई. उसे वापस इंडिया लौटना पड़ा, लेकिन अपनी पत्नी को किसी और के साथ प्रेमालाप करते देख उस ने उसे तलाक दे दिया और मुक्त हो गया.

रात्रि धीरेधीरे खत्म हो रही थी. सुबह के साढ़े 3 बज रहे थे. नेहा ने समय देखा और दोबारा अपनी अमूर्त दुनिया में खो गई. जिंदगी भी कितनी अजीब है. पलपल खत्म होती जाती है. न हम समय को रोक पाते हैं और न ही जिंदगी को, खासकर तब जब सब निरर्थक सा हो जाए. बस, अब अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए आधे घंटे का सफर और था. बस की सवारियां अपनी मंजिल तक पहुंचेंगी या नहीं यह तो कहना आसान नहीं था, लेकिन आकाश की फ्लाइट है, वह वापस अमेरिका चला जाएगा और वह अपनी सहेली के घर शादी अटैंड कर 2 दिन बाद लौट जाएगी, अपने घर. फिर से वही… पुरानी एकाकी जिंदगी.

‘‘क्यों सोच रही हो?’’ आकाश ने ‘क्या’ के बजाय ‘क्यों’ कहा तो उस ने सिर उठा कर आकाश की तरफ देखा. उस की आंखों में प्रकाश की नई उम्मीद बिखरी नजर आ रही थी.

‘तुम जानते हो आकाश, दिल्ली बाईपास पर राधाकृष्ण की बड़ी सी मूर्ति हाल ही में स्थापित हुई है, रजत के कृष्ण और ताम्र की राधा.’

‘क्या कहना चाहती हो?’ आकाश ने असमंजस भाव से पूछा.

‘बस, यही कि कई बार कुछ चीजें दूर से कितनी सुंदर लगती हैं, पर करीब से… आकाश छूने की इच्छा धरती के हर कण की होती है लेकिन हवा के सहारे ताम्र रंजित धूल आकाश की तरफ उड़ती हुई प्रतीत तो होती है, पर कभी आकाश तक पहुंच नहीं पाती. उस की नियति यथार्थ की धरा पर गिरना और वहीं दम तोड़ना है वह कभी…’

‘राधा और कृष्ण कभी अलग नहीं हुए,’ आकाश ने भारी स्वर में कहा.

‘हां, लेकिन मरने के बाद,’ नेहा की आवाज में निराशा झलक रही थी.

‘ऐसा नहीं है नेहा, असल में राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम को समझना सहज नहीं,’ आकाश गंभीर स्वर में बोला.

‘क्या?’ नेहा पूछने लगी, ‘राधा और कान्हा को देख कर तुम यह सोचती हो?’ आकाश की आवाज की खनक शायद नेहा को समझ नहीं आ रही थी. वह मौन बैठी रही. आकाश पुन: बोला, ‘ऐसा नहीं है नेहा, प्रेम की अनुभूति यथार्थ है, प्रेम की तार्किकता नहीं.’

‘क्या कह रहे हो आकाश? मुझे सिर्फ प्रेम चाहिए, शाब्दिक जाल नहीं,’ नेहा जैसे अपनी नियति प्रकट कर उठी.

‘वही तो नेहा, मेरा प्यार सिर्फ नेहा के लिए है, शाश्वत प्रेम जो जन्मजन्मांतरों से है, न तुम मुझ से कभी दूर थीं और न कभी होंगी.’

‘आकाश प्लीज, मुझे बहलाओ मत, मैं इंसान हूं, मुझे इंसानी प्यार की जरूरत है तुम्हारे सहारे की, जिस में खो कर मैं अपूर्ण से पूर्ण हो जाऊं.’’

‘‘तुम्हें पता है नेहा, एक बार राधा ने कृष्ण से पूछा मैं कहां हूं? कृष्ण ने मुसकरा कर कहा, ‘सब जगह, मेरे मनमस्तिष्क, तन के रोमरोम में,’ फिर राधा ने दूसरा प्रश्न किया, ‘मैं कहां नहीं हूं?’ कृष्ण ने फिर से मुसकरा कर कहा, ‘मेरी नियति में,’ राधा पुन: बोली, ‘प्रेम मुझ से करते हो और विवाह रुक्मिणी से?’

कृष्ण ने फिर कहा, ‘राधा, विवाह 2 में होता है जो पृथकपृथक हों, तुम और मैं तो एक हैं. हम कभी अलग हुए ही नहीं, फिर विवाह की क्या आवश्यकता है?’

‘आकाश, तुम मुझे क्या समझते हो? मैं अमूर्त हूं, मेरी कामनाएं निष्ठुर हैं.’

‘तुम रुको, मैं बताता हूं तुम्हें, रुको तुम,’ आकाश उठा, इस से पहले कि नेहा कुछ समझ पाती वह जोर से पुकारने लगा. ‘खड़ी हो जाओ तुम,’ आकाश ने जैसे आदेश दिया.

‘अरे, लेकिन तुम कर क्या रहे हो?’ नेहा ने अचरज भरे स्वर में पूछा.

‘खड़ी हो जाओ, आज के बाद तुम कृष्णराधा की तरह केवल प्रेम के प्रतीक के रूप में याद रखी जाओगी, जो कभी अलग नहीं होते, जो सिर्फ नाम से अलग हैं, लेकिन वे यथार्थ में एक हैं, शाश्वत रूप से एक…’

नेहा ने देखा आकाश के हाथ में एक लिपस्टिक थी जो शायद उस ने उसी के हैंडबैग से निकाली थी, उस से आकाश ने अपनी उंगलियां लाल कर ली थीं.

‘अब सब गवाह रहना,’ आकाश ने बुलंद आवाज में कहा.

नेहा ने देखा बस का सन्नाटा टूट चुका था. सभी यात्री खड़े हो कर इस अद्भुत नजारे को देख रहे थे. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाती आकाश की उंगलियां उस के माथे पर लाल रंग सजा चुकी थीं. लोगों ने तालियां बजा कर उन्हें आशीर्वाद दिया. उन के चेहरों पर दिव्य संतुष्टि प्रसन्नता बिखेर रही थी और मुबारकबाद, शुभकामनाओं और करतल ध्वनि के बीच अलौकिक नजारा बन गया था.

आकाश नतमस्तक हुआ और उस ने सब का आशीर्वाद लिया.

बाहर खिड़की से राधाकृष्ण की मूर्ति दिख रही थी जो अब लगातार उन के नजदीक आ रही थी… पास… और पास… जैसे आकाश और नेहा उस में समा रहे हों.

‘‘नेहा… नेहा… उठो… दिल्ली आ गया. कब तक सोई रहोगी?’’ नेहा की सहेली बेसुध पड़ी नेहा को झिंझोड़ कर उठाने का प्रयास करने लगी. कुछ देर बाद नेहा आंखें मलती हुई उठने का प्रयास करने लगी.

सफर खत्म हो गया था… मंजिल आ चुकी थी. लेकिन नेहा अब भी शायद जागना नहीं चाह रही थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था… वे सब क्या था? काश, जिंदगी का सफर भी कुछ इसी तरह चलता रहे… वह पुन: सपने में खो जाना चाहती थी.

सपना-भाग 2: कैसा था नेहा का सफर

बस ने एक झटका लिया. उस की तंद्रा उसे मदहोशी में घेरे हुए थी. उसे अपने आसपास तूफानी सांसों की आवाज सुनाई दी. वह फिर से मुसकराने लगी, तभी पता नहीं कैसे 2 अंगारे उसी के होंठों से हट गए. वह झटके से उठी… आसपास अब भी अंधियारा फैला था. बस की खिड़की का परदा पूरी तरह तना था. उस की सीट ड्राइवर की तरफ पहले वाली थी, इसलिए जब भी सामने वाला परदा हवा से हिलता तो ड्राइवर के सामने वाले शीशे से बाहर सड़क का ट्रैफिक और बाहरी नजारा उसे वास्तविकता की दुनिया से रूबरू कराता. वह धीरे से अपनी रुकी सांस छोड़ती व प्यास से सूखे होंठों को अपनी जबान से तर करती. उस ने उड़ती नजर अपनी सहेली पर डाली, लेकिन वह अभी भी गहन निद्रा में अलमस्त और सपनों में खोई सी बेसुध दिखी.

उस की नजर अचानक अपनी साथ वाली सीट पर पड़ी. वहां एक पुरुष साया बैठा था. उस ने घबरा कर सामने हिल रहे परदे को देखा. उस की हथेलियां पसीने से लथपथ हो उठीं. डर और घबराहट में नेहा ने अपनी जैकेट को कस कर पकड़ लिया. थोड़ी हिम्मत जुटा कर, थूक सटकते हुए उस ने अपनी साथ वाली सीट को फिर देखा. वह साया अभी तक वहीं बैठा नजर आ रहा था. उसे अपनी सांस गले में अटकी महसूस हुई. अब चौकन्नी हो कर वह सीधी बैठ गई और कनखियों से उस साए को दोबारा घूरने लगी. साया अब साफ दिखाई पड़ने लगा था. बंद आंखों के बावजूद जैसे वह नेहा को ही देख रहा था. सुंदरसजीले, नौजवान के चेहरे की कशिश सामान्य नहीं थी. नेहा को यह कुछ जानापहचाना सा चेहरा लगा. नेहा भ्रमित हो गई. अभी जो स्वप्न देखा वह हकीकत था या… कहीं सच में यह हकीकत तो नहीं? क्या इसी ने उसे सोया हुआ समझ कर चुंबन किया था? उस के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं.

‘क्या हुआ तुम्हें?’ यह उस साए की आवाज थी. वह फिर से अपने करीब बैठे युवक को घूरने लगी. युवक उस की ओर देखता हुआ मुसकरा रहा था.

‘क्या हुआ? तुम ठीक तो हो?’ युवक पूछने लगा, लेकिन इस बार उस के चेहरे पर हलकी सी घबराहट नजर आ रही थी. नेहा के चेहरे की उड़ी हवाइयों को देख वह युवक और घबरा गया. ‘लीजिए, पानी पी लीजिए…’ युवक ने जल्दी से अपनी पानी की बोतल नेहा को थमाते हुए कहा. नेहा मौननिस्तब्ध उसे घूरे जा रही थी. ‘पी लीजिए न प्लीज,’ युवक जिद करने लगा.

नेहा ने एक अजीब सा सम्मोहन महसूस किया और वह पानी के 2-3 घूंट पी गई.

‘अब ठीक हो न तुम?’ उस ने कहा.

नेहा के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला. पता नहीं क्यों युवक की बेचैनी देख कर उसे हंसी आने लगी. नेहा को हंसते देख वह युवक सकपकाने लगा. तनाव से कसे उस के कंधे अब रिलैक्स की मुद्रा में थे. अब वह आराम से बैठा था और नेहा की आंखों में आंखें डाल उसे निहारने लगा था. उस युवक की तीक्ष्ण नजरें नेहा को बेचैन करने लगीं, लेकिन युवक की कशिश नेहा को असीम सुख देती महसूस हुई.

‘आप का नाम पूछ सकती हूं?’ नेहा ने बात शुरू करते हुए पूछा.

‘आकाश,’ युवक अभी भी कुछ सकपकाया सा था.

‘मेरा नाम नहीं पूछोगे?’ नेहा खनकते स्वर में बोली.

‘जी, बताइए न, आप का नाम क्या है?’ आकाश ने व्यग्र हो कर पूछा.

‘नेहा,’ वह मुसकरा कर बोली.

‘नेहा,’ आकाश उस का नाम दोहराने लगा. नेहा को लगा जैसे आकाश कुछ खोज रहा है.

‘वैसे अभी ये सब क्या था मिस्टर?’ अचानक नेहा की आवाज में सख्ती दिखी. नेहा के ऐसे सवाल से आकाश का दिल बैठने लगा.

‘जी, क्या?’ आकाश अनजान बनते हुए पूछने लगा.

‘वही जो अभीअभी आप ने मेरे साथ किया.’

‘देखिए नेहाजी, प्लीज…’ आकाश वाक्य अधूरा छोड़ थूक सटकने लगा.

‘ओह हो, नेहाजी? अभीअभी तो मैं तुम थी?’ नेहा अब पूरी तरह आकाश पर रोब झाड़ने लगी.

‘नहीं… नहीं, नेहाजी… मैं…’ आकाश को समझ नहीं आ रहा था कि वह अब क्या कहे. उधर नेहा उस की घबराहट पर मन ही मन मुसकरा रही थी. तभी आकाश ने पलटा खाया, ‘प्लीज, नेहा,’ अचानक आकाश ने उस का हाथ थामा और तड़प के साथ इसरार भरे लहजे में कहने लगा, ‘मत सताओ न मुझे,’ आकाश नेहा का हाथ अपने होंठों के पास ले जा रहा था.

‘क्या?’ उस ने चौंकते हुए अपना हाथ पीछे झटका. अब घबराने की बारी नेहा की थी. उस ने सकुचाते हुए आकाश की आंखों में झांका. आकाश की आंखों में अब शरारत ही शरारत महसूस हो रही थी. ऐसी शरारत जो दैहिक नहीं बल्कि आत्मिक प्रेम में नजर आती है. दोनों अब खिलखिला कर हंस पड़े.

बाहर ठंड बढ़ती जा रही थी. बस का कंडक्टर शीशे के साथ की सीट पर पसरा पड़ा था. ड्राइवर बेहद धीमी आवाज में पंजाबी गाने बजा रहा था. पंजाबी गीतों की मस्ती उस पर स्पष्ट झलक रही थी. थोड़ीथोड़ी देर बाद वह अपनी सीट पर नाचने लगता. पहले तो उसे देख कर लगा शायद बस ने झटका खाया, लेकिन एकदम सीधी सड़क पर भी वह सीट पर बारबार उछलता और एक हाथ ऊपर उठा कर भांगड़ा करता, इस से समझ आया कि वह नाच रहा है. पहले तो नेहा ने समझा कि उस के हाथ स्टेयरिंग पकड़ेपकड़े थक गए हैं, तभी वह कभी दायां तो कभी बायां हाथ ऊपर उठा लेता. उस के और ड्राइवर के बीच कैबिन का शीशा होने के कारण उस तरफ की आवाज नेहा तक नहीं आ रही थी, लेकिन बिना म्यूजिक के ड्राइवर का डांस बहुत मजेदार लग रहा था. आकाश भी ड्राइवर का डांस देख कर नेहा की तरफ देख कर मुसकरा रहा था. शायद 2 प्रेमियों के मिलन की खुशी से उत्सर्जित तरंगें ड्राइवर को भी खुशी से सराबोर कर रही थीं. मन कर रहा था कि वह भी ड्राइवर के कैबिन में जा कर उस के साथ डांस करे. नेहा के सामीप्य और संवाद से बड़ी खुशी क्या हो सकती थी? आकाश को लग रहा था कि शायद ड्राइवर उस के मन की खुशी का ही इजहार कर रहा है.

‘बाहर चलोगी?’ बस एक जगह 20 मिनट के लिए रुकी थी.

‘बाहर… किसलिए… ठंड है बाहर,’ नेहा ने खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा.

‘चलो न प्लीज, बस दो मिनट के लिए.’

‘अरे?’ नेहा अचंभित हो कर बोली. लेकिन आकाश नेहा का हाथ थामे सीट से उठने लगा.

‘अरे…रे… रुको तो, क्या करते हो यार?’ नेहा ने बनावटी गुस्से में कहा.

‘बाहर कितनी धुंध है, पता भी है तुम्हें?’ नेहा ने आंखें दिखाते हुए कहा.

‘वही तो…’ आकाश ने लंबी सांस ली और कुछ देर बाद बोला, ‘नेहा तुम जानती हो न… मुझे धुंध की खुशबू बहुत अच्छी लगती है. सोचो, गहरी धुंध में हम दोनों बाइक पर 80-100 की स्पीड में जा रहे होते और तुम ठंड से कांपती हुई मुझ से लिपटतीं…’

‘आकाश…’ नेहा के चेहरे पर लाज, हैरानी की मुसकराहट एकसाथ फैल गई.

‘नेहा…’ आकाश ने पुकारा… ‘मैं आज तुम्हें उस आकाश को दिखाना चाहता हूं… देखो यह… आकाश आज अकेला नहीं है… देखो… उसे जिस की तलाश थी वह आज उस के साथ है.’

सपना-भाग 1: कैसा था नेहा का सफर

सरपट दौड़ती बस अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी. बस में सवार नेहा का सिर अनायास ही खिड़की से सट गया. उस का अंतर्मन सोचविचार में डूबा था. खूबसूरत शाम धीरेधीरे अंधेरी रात में तबदील होती जा रही थी. विचारमंथन में डूबी नेहा सोच रही थी कि जिंदगी भी कितनी अजीब पहेली है. यह कितने रंग दिखाती है? कुछ समझ आते हैं तो कुछ को समझ ही नहीं पाते? वक्त के हाथों से एक लमहा भी छिटके तो कहानी बन जाती है. बस, कुछ ऐसी ही कहानी थी उस की भी… नेहा ने एक नजर सहयात्रियों पर डाली. सब अपनी दुनिया में खोए थे. उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें अपने साथ के लोगों से कोई लेनादेना ही नहीं था. सच ही तो है, आजकल जिंदगी की कहानी में मतलब के सिवा और बचा ही क्या है.

वह फिर से विचारों में खो गई… मुहब्बत… कैसा विचित्र शब्द है न मुहब्बत, एक ही पल में न जाने कितने सपने, कितने नाम, कितने वादे, कितनी खुशियां, कितने गम, कितने मिलन, कितनी जुदाइयां आंखों के सामने साकार होने लगती हैं इस शब्द के मन में आते ही. कितना अधूरापन… कितनी ललक, कितनी तड़प, कितनी आहें, कितनी अंधेरी रातें सीने में तीर की तरह चुभने लगती हैं और न जाने कितनी अकेली रातों का सूनापन शूल सा बन कर नसनस में चुभने लगता है. पता नहीं क्यों… यह शाम की गहराई उस के दिल को डराने लगती है…

एसी बस के अंदर शाम का धुंधलका पसरने लगा था. बस में सवार सभी यात्री मौन व निस्तब्ध थे. उस ने लंबी सांस छोड़ते हुए सहयात्रियों पर दोबारा नजर डाली. अधिकांश यात्री या तो सो रहे थे या फिर सोने का बहाना कर रहे थे. वह शायद समझ नहीं पा रही थी. थोड़ी देर नेहा यों ही बेचैन सी बैठी रही. उस का मन अशांत था. न जाने क्यों इस शांतनीरव माहौल में वह अपनी जिंदगी की अंधेरी गलियों में गुम होती जा रही थी. कुछ ऐसी ही तो थी उस की जिंदगी, अथाह अंधकार लिए दिग्भ्रमित सी, जहां उस के बारे में सोचने वाला कोई नहीं था. आत्मसाक्षात्कार भी अकसर कितना भयावह होता है? इंसान जिन बातों को याद नहीं करना चाहता, वे रहरह कर उस के अंतर्मन में जबरदस्ती उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकतीं. जिंदगी की कमियां, अधूरापन अकसर बहुत तकलीफ देते हैं. नेहा इन से भागती आई थी लेकिन कुछ चीजें उस का पीछा नहीं छोड़ती थीं. वह अपना ध्यान बरबस उन से हटा कर कल्पनाओं की तरफ मोड़ने लगी.

उन यादों की सुखद कल्पनाएं थीं, उस की मुहब्बत थी और उसे चाहने वाला वह राजकुमार, जो उस पर जान छिड़कता था और उस से अटूट प्यार करता था.

नेहा पुन: हकीकत की दुनिया में लौटी. बस की तेज रफ्तार से पीछे छूटती रोशनी अब गुम होने लगी थी. अकेलेपन से उकता कर उस का मन हुआ कि किसी से बात करे, लेकिन यहां बस में उस की सीट के आसपास जानपहचान वाला कोई नहीं था. उस की सहेली पीछे वाली सीट पर सो रही थी. बस में भीड़ भी नहीं थी. यों तो उसे रात का सफर पसंद नहीं था, लेकिन कुछ मजबूरी थी. बस की रफ्तार से कदमताल करती वह अपनी जिंदगी का सफर पुन: तय करने लगी.

नेहा दोबारा सोचने लगी, ‘रात में इस तरह अकेले सफर करने पर उस की चिंता करने वाला कौन था? मां उसे मंझधार में छोड़ कर जा चुकी थीं. भाइयों के पास इतना समय ही कहां था कि पूछते उसे कहां जाना है और क्यों?’

रात गहरा चुकी थी. उस ने समय देखा तो रात के 12 बज रहे थे. उस ने सोने का प्रयास किया, लेकिन उस का मनमस्तिष्क तो जीवनमंथन की प्रक्रिया से मुक्त होने को तैयार ही नहीं था. सोचतेसोचते उसे कब नींद आई उसे कुछ याद नहीं. नींद के साथ सपने जुड़े होते हैं और नेहा भी सपनों से दूर कैसे रह सकती थी? एक खूबसूरत सपना जो अकसर उस की तनहाइयों का हमसफर था. उस का सिर नींद के झोंके में बस की खिड़की से टकरातेटकराते बचा. बस हिचकोले खाती हुई झटके के साथ रुकी.

नेहा को कोई चोट नहीं लगी, लेकिन एक हाथ पीछे से उस के सिर और गरदन से होता हुआ उस के चेहरे और खिड़की के बीच सट गया था. नेहा ने अपने सिर को हिलाडुला कर उस हाथ को अपने गालों तक आने दिया. कोई सर्द सी चीज उस के होंठों को छू रही थी, शायद यह वही हाथ था जो नेहा को सुखद स्पर्श प्रदान कर रहा  था. उंगलियां बड़ी कोमलता से कभी उस के गालों पर तो कभी उस के होंठों पर महसूस हो रही थीं. उंगलियों के पोरों का स्पर्श उसे अपने बालों पर भी महसूस हो रहा था. ऐसा स्पर्श जो सिर्फ प्रेमानुभूति प्रदान करता है. नेहा इस सुकून को अपने मनमस्तिष्क में कैद कर लेना चाहती थी. इस स्पर्श के प्रति वह सम्मोहित सी खिंची चली जा रही थी.

नेहा को पता नहीं था कि यह सपना था या हकीकत, लेकिन यह उस का अभीष्ट सपना था, वही सपना… उस का अपना स्वप्न… हां, वही सपनों का राजकुमार… पता नहीं क्यों उस को अकेला देख कर बरबस चला आता था. उस के गालों को छू लेता, उस की नींद से बोझिल पलकों को हौले से सहलाता, उस के चेहरे को थाम कर धीरे से अपने चेहरे के करीब ले आता. उस की सांसों की गर्माहट उसे जैसे सपने में महसूस होती. उस का सिर उस के कंधे पर टिक जाता, उस के दिल की धड़कन को वह बड़ी शिद्दत से महसूस करती, दिल की धड़कन की गूंज उसे सपने की हकीकत का स्पष्ट एहसास कराती. एक हाथ उस के चेहरे को ठुड्डी से ऊपर उठाता… वह सुकून से मुसकराने लगती.

नींद से ज्यादा वह कोई और सुखद नशा सा महसूस करने लगती. उस का बदन लरजने लगता. वह लहरा कर उस की बांहों में समा जाती. उस के होंठ भी अपने राजकुमार के होंठों से स्पर्श करने लगते. बदन में होती सनसनाहट उसे इस दुनिया से दूर ले जाती, जहां न तनहाई होती न एकाकीपन, बस एक संबल, एक पूर्णता का एहसास होता, जिस की तलाश उसे हमेशा रहती.

15 अगस्त स्पेशल: एक कश्मीरी- क्यों बेगाने हो गए थे कश्मीरी

जिन हिंदू और मुसलमानों ने कभी एकदूसरे के त्योहारों व सुखदुख को एकसाथ जिया था, आज उन्हें ही जेहादी व शरणार्थी जैसे नामों से पुकारा जाने लगा है.

ड्राइवर को गाड़ी पार्क करने का आदेश दे कर मैं तेजी से कानफ्रेंस हाल की तरफ बढ़ गया. सभी अधिकारी आ चुके थे और मीटिंग कुछ ही देर में शुरू होने वाली थी. मैं भी अपनी नेम प्लेट लगी जगह को देख कर कुरसी में धंस गया.

चीफ के हाल में प्रवेश करते ही हम सभी सावधानी से खड़े हो गए. तभी किसी के मोबाइल की घंटी घनघना उठी. चीफ की तेज आवाज ‘प्लीज, स्विच आफ योर मोबाइल्स’ सुनाई दी. मीटिंग शुरू हो चुकी थी. चपरासी सभी को गरम चाय सर्व कर रहा था.

चीफ के दाहिनी ओर एक लंबे व गोरेचिट्टे अधिकारी बैठे हुए थे. यह हमारे रीजन के मुखिया थे. ऊपर से जितने कड़क अंदर से उतने ही मुलायम. एक योग्य अधिकारी के साथसाथ लेखक भी. विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में उन की कहानियां व कविताएं छपती थीं. ज्यादातर वह उर्दू में ही लिखा करते थे इसलिए उर्दू पढ़ने वालों में उन का नाम काफी जानापहचाना था. मीटिंग में जब कभी चीफ किसी बात पर नाराज हो जाया करते तो वह अपनी विनोदप्रियता से स्थिति को संभाल लेते.

मीटिंग का प्रथम दौर खत्म होते ही मैं उन के साथ हो लिया. चूंकि मेरी नियुक्ति अभी नईनई थी, अत: उन के अनुभवों से मुझे काफी कुछ सीखने को मिलता. चूंकि वह काफी वरिष्ठ थे, अत: हर चीज उन से पूछने का साहस भी नहीं था. फिर भी उन के बारे में काफी कुछ सुनता रहता था. मसलन, वह बहुत अकेला रहना पसंद करते थे, इसी कारण उन की पत्नी उन से दूर कहीं विदेश में रहती हैं और वहीं एक स्कूल में बतौर टीचर पढ़ाती हैं. एक लंबा समय उन्होंने सेना में प्रतिनियुक्ति पर बिताया व अधिकतर दुर्गम जगहों पर उन की तैनाती रही थी. आज तक उन्होंने किसी भी जगह अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया था. यहां से भी उन के ट्रांसफर आर्डर आ चुके थे.

बात शुरू करने के उद्देश्य से मैं ने पूछा, ‘‘सर, आप नई जगह ज्वाइन कर रहे हैं?’’

वह मुसकराते हुए बोले, ‘‘देखो, लगता है जाना ही पड़ेगा. वैसे भी किसी जगह मैं लंबे समय तक नहीं टिक पाया हूं.’’

इस बीच चपरासी मेज पर खाना लगा चुका था. धीरेधीरे हम ने खाना शुरू किया. खाने के दौरान मैं कभीकभी उन्हें ध्यान से देखता और सोचता, इस व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है? सामने जितना खुशमिजाज, फोन पर उतनी ही कड़क आवाज. वह मूलत: कश्मीरी ब्राह्मण थे. अचानक बातों के सिलसिले में वह मुझे अपने बीते दिनों के बारे में बताने लगे तो लगा जैसे समय का पहिया अचानक मुड़ कर पीछे चला गया हो.

‘‘देखो, आज भी मुझे अपने कश्मीरी होने पर गर्व है. अगर कश्मीर की धरती को स्वर्ग कहा गया तो उस में सचाई भी है. अतीत में झांक कर देखो तो न हिंदूमुसलमान का भेद, न आतंकवाद की छाया. सभी एकदूसरे के त्योहार व सुखदुख में शरीक होते थे और जातिधर्म से परे एक परिवार की तरह रहते थे.’’

उन्होेंने अपने बचपन का एक वाकया सुनाया कि एक बार मेरी छोटी बहन दुपट्टे को गरदन में लपेटे घूम रही थी कि तभी एक बुजुर्ग मुसलमान की निगाह उस पर पड़ी. उन्होंने प्यार से उसे अपने पास बुलाया और पूछा कि बेटी, तुम किस के घर की हो? परिचय मिलने पर उस बुजुर्ग ने समझाया कि तुम शरीफ ब्राह्मण खानदान की लड़की हो और इस तरह दुपट्टे को गले में लपेट कर चलना अच्छा नहीं लगता. फिर उसे दुपट्टा ओढ़ने का तरीका बताते हुए उन्होंने घर जाने को कहा व बोले, ‘तुम भी मेरी ही बेटी हो, तुम्हारी इज्जत भी हमारी इज्जत से जुड़ी है. हम भले ही दूसरे धर्म को मानते हैं पर नारी की इज्जत सभी की इज्जत से जुड़ी है.’

इतना बताने के बाद अचानक वह खामोश हो गए. एक पल रुक कर वह कहने लगे कि पता नहीं किन लोगों की नजर हमारे कश्मीर को लग गई कि देखते ही देखते उसे आतंकवाद का गढ़ बना दिया और हम अपने ही कश्मीर में बेगाने हो गए. हम ने तो कभी हिंदूमुसलमान के प्रति दोतरफरा व्यवहार नहीं पाला, फिर कहां से आया यह सब.

मैं उन की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था और उन की आवाज के दर्द को समझने की कोशिश भी कर रहा था. वह बता रहे थे कि सिविल सर्विस में आने से पहले वह एक दैनिक पत्र के लिए काम करते थे. 1980 के दौर में जब भारत पर सोवियत संघ की सरपरस्ती का आरोप लगता था तो अखबारों में बड़ेबड़े लेख छपते थे. मैं उन को ध्यान से पढ़ता था, और तब मेरे अंदर भी सोवियत संघ के प्रति एक विशेष अनुराग पैदा होता था. पर वह दिन भी आया जब सोवियत संघ का बिखराव हुआ और उसी दौर में कश्मीर भी आतंक की बलि चढ़ गया. वह मुझे तब की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को समझाने की कोशिश करते और मैं अबोध शिशु की तरह उन का चेहरा देखता.

चपरासी आ कर जूठी प्लेटें उठा ले गया. फिर उस ने आइसक्रीम की बाबत हम से पूछा पर उसे उन्होंने 2 कड़क चाय लाने का आदेश दिया. तभी उन के मोबाइल पर मैसेज टोन बजी. उन्होंने वह मैसेज पढ़ा और मेरी तरफ नजर उठा कर बोले कि बेटे का मैसेज है.

अब वह अपने बेटे के बारे में मुझे बताने लगे, ‘‘पिछले दिनों उस ने एक नौकरी के लिए आवेदन किया था और उस के लिए जम कर मेहनत भी की थी, पर नतीजा निगेटिव रहा था. मैं उस पर काफी नाराज हुआ और हाथ भी छोड़ दिया. इस के बाद से ही वह नाराज हो कर अपनी मम्मी के पास विदेश चला गया,’’ फिर हंसते हुए बोले, ‘‘अच्छा ही किया उस ने, यहां पर तो कैट, एम्स जैसी परीक्षाओं के पेपर लीक हो कर बिक रहे हैं, फिर अच्छी नौकरी की क्या गारंटी? वहां विदेश में अब अच्छा पैसा कमाता है,’’ एक लंबी सांस छोड़ते हुए आगे बोले, ‘‘यू नो, यह भी एक तरह का मानसिक आतंकवाद ही है.’’

हमारी बातों का सिलसिला धीरेधीरे फिर कश्मीर की तरफ मुड़ गया. वह बताने लगे, ‘‘जब मेरी नियुक्ति कश्मीर में थी तो मैं जब भी अपने गांव पहुंचता, महल्ले की सारी औरतें, हिंदू हों या मुसलमान, मेरी कार को घेर कर चूमने की कोशिश करतीं. उन के लिए मेरी कार ही मेरे बड़े अधिकारी होने  की पहचान थी.

‘‘मैं अपने गांव का पहला व्यक्ति था जो इतने बड़े ओहदे तक पहुंचा था. जब भी मैं गांव जाता तो सभी बुजुर्ग, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, मेरा हालचाल पूछने आते और मेरे द्वारा पांव छूते ही वह मुझे अपनी बांहों में भर लेते थे और कहते, ‘बेटा, तू तो बड़ा अधिकारी बन गया है, अब तो दिल्ली में ही कोठी बनवाएगा.’ तब मैं उन से कहता, ‘नहीं, चाचा, मैं तो यहीं अपने पुश्तैनी मकान में रहूंगा.’’

अचानक उन की आंखों की कोर से 2 बूंद आंसू टपके और भर्राए गले से वह बोले, ‘‘मेरा तो सपना सपना ही रह गया. अब तो जाने कितने दिन हो गए मुझे कश्मीर गए. पिछले दिनों अखबार में पढ़ा था कि मेरे गांव में सेना व आतंक- वादियों के बीच गोलीबारी हुई है. आतंकवादी जिस घर में छिपे हुए थे वह मेरा ही पुश्तैनी मकान था.

‘‘पुरखों की बनाई हुई अमानत व मेरे सपनों का इतना बुरा अंजाम होगा, कभी सोचा भी नहीं था. अब तो किसी को बताने में भी डर लगता है कि मैं कश्मीरी हूं.’’

आंसुओं को रूमाल से पोंछते हुए वह कह रहे थे, ‘‘पता नहीं, हमारे कश्मीर को किस की नजर लग गई? जबकि कश्मीर में आम हिंदू या मुसलमान कभी किसी को शक की निगाह से नहीं देखता पर कुछ सिपाही लोगों के चलते आम कश्मीरी अपने ही घर में बेगाना बन गया. जिन हिंदू और मुसलमान भाइयों ने कभी एकदूसरे के त्योहारों व सुखदुख को एकसाथ जिया था, आज उन्हें ही जेहादी व शरणार्थी जैसे नामों से पुकारा जाने लगा है.’’

कुछ देर तक वह खमोश रहे फिर बोले, ‘‘अपने जीतेजी चाहूंगा कि कश्मीर एक दिन फिर पहले जैसा बने और मैं वहां पर एक छोटा सा घर बनवा कर रह सकूंगा पर पता नहीं, ऐसा हो कि नहीं?’’

दरवाजे पर खड़ा चपरासी बता रहा था कि चीफ मैडम मीटिंग के लिए बुला रही हैं. वह ‘अभी आया’ कह कर बाथरूम की ओर बढ़ गए. शायद अपने चेहरे की मासूम कश्मीरियत साफ कर एक अधिकारी का रौब चेहरे पर लाने के लिए गए थे.

 

15 अगस्त स्पेशल: बंटवारा- क्या थी फौजिया की कहानी

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15 अगस्त स्पेशल: साहस- अंकित ने कैसे पूरा किया दादीमां का सपना

टैक्सी एअरपोर्ट के डिपार्चर टर्मिनल के बाहर रुकी. मीरा और आनंद उतरे. टैक्सी ड्राइवर ने डिक्की खोली और स्ट्रोली निकाल कर आनंद को पकड़ाई. आनंद ने झुक कर मीरा के पांव छुए.

‘‘अच्छा मां, मैं जा रहा हूं. अपना खयाल रखना. मेरे बारे में आप को कोई आशंका नहीं होनी चाहिए. मैं अपनी देखभाल अच्छी तरह कर सकता हूं. मैं आप को समयसमय पर फोन किया करूंगा और पढ़ाई खत्म होते ही भारत लौट आऊंगा आप की देखभाल करने के लिए,’’ यह कह कर आनंद ने मीरा से विदा ली.

‘‘जाओ बेटे, अच्छे से रहना. मेरे बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है. तुम सुखी रहो और तुम्हारी सारी मनोकामनाएं पूरी हों,’’ मीरा ने प्रसन्नता के साथ उसे विदा किया. आनंद टर्मिनल की ओर घूमा और मीरा टैक्सी में वापस बैठी. उस की आंखें सूखी थीं क्योंकि उस ने आंसू रोक रखे थे. वह टैक्सी ड्राइवर के सामने रोना नहीं चाहती थी. घर लौटते समय वह मन ही मन सोचने लगी, आनंद उस का इकलौता पुत्र था, जो अपने पिता की मौत के 6 महीने बाद पैदा हुआ था. मीरा ने उसे अकेले, अपने दम पर, पढ़ालिखा कर बड़ा किया था. और आज आनंद उसे छोड़ कर चला गया था. हमेशा के लिए तो नहीं, पर मीरा को शक था कि अब जब भी आनंद भारत लौटेगा तो वह सिर्फ चंद दिनों के लिए ही उस से मिलने के लिए आएगा.

उस ने हमेशा सोचा था कि आनंद को वह अपने पति मेजर विजय की तरह फौजी बना देगी, पर यह बात उस के बेटे के दिमाग में कभी नहीं जमी. वह तो बचपन से ही अमेरिका में जा कर बस जाने के सपने देखने लगा था. फौज में जाता तो उस का सपना अधूरा रह जाता. अपने सपने पूरे करने के लिए आनंद ने दिनरात पढ़ाई की जिस के कारण वह यूनिवर्सिटी में गोल्ड मैडलिस्ट बना, यानी अव्वल नंबर पर आया. उसे अमेरिका में आगे पढ़ाई करने के लिए बहुत अच्छी स्कौलरशिप मिली. अब उसे कौन रोक सकता था.

घर लौटने के बाद मीरा अपने पति के चित्र के आगे जा कर खड़ी हो गई, ‘‘देखिए, आज मैं ने आप के बेटे को अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल बना दिया है. आप की तरह देशसेवक फौजी तो नहीं बना सकी पर मुझे यकीन है कि वह जीवन में बहुत सफलताएं प्राप्त करेगा ताकि हमारे सिर गर्व से ऊंचे रहेंगे.’’ मीरा अपने दिवंगत पति से और भी बातें करना चाहती थी, पर उस की भावनाओं का बांध टूट गया और वह हिचकियां ले कर रो पड़ी. उसे लगा कि उस के सारे सपने टूट गए थे.

उस का आनंद को फौजी बनाने का इरादा अधूरा ही रह गया था. आनंद ने उसे यह विश्वास दिलाया था कि वह पढ़ाई पूरी कर के भारत लौट आएगा, पर मीरा जानती थी कि यह बात उस ने उस को बहलाने के लिए ही कही थी. अचानक मीरा का ध्यान बंट गया. साथ वाले घर में रेडियो पर मन्ना डे का पुराना लोकप्रिय गाना बज रहा था, ‘इधर झूम के गाए जिंदगी उधर है मौत खड़ी. कोई क्या जाने कहां है सीमा, उलझन आन पड़ी…’ गाने को सुनतेसुनते मीरा को खयाल आया, ‘हां, यह तो बिलकुल ठीक है. सच में आज तक किसी को नहीं पता चला है कि जिंदगी और मौत की सीमा कहां है.’

वह कैसे भूल सकती थी अक्तूबर के उस शनिवार की काली रात को, जिस के दौरान उस की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. उन के कैंटोन्मैंट के फौजी अफसरों के क्लब में हर महीने के दूसरे शनिवार को पार्टी होती थी. यह बड़ा कैंटोन्मैंट था, कई यूनिटें स्थलसेना की और 2 यूनिटें वायुसेना की थीं. क्लब की इन पार्टियों में काफी ज्यादा रौनक रहती थी. म्यूजिक सिस्टम पर नए से नए हिंदी और अंगरेजी गाने बजते थे, जिन की धुन पर जोडि़यां नाचती थीं. उस शनिवार की रात भी मीरा का पति मेजर विजय सिंह हमेशा की तरह उसे ले कर पार्टी में पहुंचा. क्लब का प्रोग्राम शुरू हुआ.

गाने बजने लगे और जोडि़यों ने नाचना शुरू किया. जो नाच नहीं रहे थे वे हाथों में डिं्रक का गिलास पकड़े उन्हें देख रहे थे. विजय नाचना चाहता था. पर मीरा नाचना नहीं चाहती थी क्योंकि वह गर्भ के तीसरे महीने में थी. पर विजय माना नहीं. ‘तुम फौजी की बीवी हो. तुम्हें कुछ नहीं होगा,’ कहते हुए वह मीरा सहित नाचने वालों में शामिल हो गया. 11 बजे के करीब, वे लोग जो अपने जवान बेटेबेटियों को साथ लाए हुए थे, जाने लगे. तभी अचानक एक अनापेक्षित बदलाव कार्यक्रम में आया. 

एक कर्नल, जो पूरी वरदी में था, क्लब में फुरती से आया. उस ने गानों को रोकने का संकेत दिया और ‘मैं माफी चाहता हूं’ की संक्षिप्त भूमिका के साथ उस ने विस्मित क्लब अधिकारी के हाथ से माइक्रोफोन का चोंगा अपने हाथ में लिया:

‘प्रतिष्ठित महिलाओ और सज्जनो,’ उस ने घोषणा की, ‘मैं आप की पार्टी को भंग करने के लिए क्षमा चाहता हूं. पर एक गंभीर राष्ट्रीय आपत्ति हमारे सामने उठ खड़ी हुई है. सेना व वायुसेना के सभी अधिकारी तुरंत क्लब छोड़ दें. वे अपने घर जाएं और कार्यक्षेत्र की वरदी पहनें.

फिर एक अन्य जोड़ी वरदी और टौयलेट का सामान छोटे से बैग में डाल कर अपनी यूनिट के हैडक्वार्टर में सुबह 4 बजे से पहले रिपोर्ट करें. मैं फिर कहता हूं कि यह राष्ट्रीय आपदा है और हमें फौरन सक्रिय होना है.’ यह कह कर वह पलटा और बाहर जा कर, जिस जीप में आया था उसी में बैठा और चला गया.

क्लब में सब लोग चौंक कर अपनीअपनी टिप्पणियां देने लगे. प्रश्न था कि क्या समस्या हो सकती है? क्योंकि कर्नल ने कुछ भी स्पष्ट नहीं किया था, इसलिए किसी को पता नहीं था कि कौन सी गंभीर घटना घटी है. तो भी फौजी हुक्म तो हुक्म ही था. सेना और वायुसेना के अफसरान फौरन जल्दीजल्दी बाहर निकले. जो परिवार के साथ आए थे वे घरों की ओर लौटे, अविवाहित अफसर अपने मैस के कमरों की तरफ पलटे.

मीरा और विजय भी अपने घर लौटे. जब तक विजय ने वरदी पहनी, मीरा ने उस के बैग में सामान डाला. ‘यह क्या हो रहा है? तुम लोग क्यों और कहां जा रहे हो? तुम कब तक लौटोगे? मुझे कुछ तो बताओ?’ पर उस के हर सवाल का जवाब विजय का ‘मैं नहीं जानता हूं.

मैं कुछ नहीं कह सकता हूं’ था. बिछुड़ने का समय आ गया. उन की शादी को 2 साल हो गए थे और मीरा पहली बार विजय से अलग हो रही थी. उस की आंखों में आंसू थे और दिल में एक अंजान सा डर, पता नहीं क्या होने वाला था. ‘चिंता मत करो, मेरी जान,’ विजय ने हौसला दिया था, ‘मैं फौजी हूं. हुक्म की तामील करना मेरा फर्ज है. और तुम एक फौजी की बीवी हो, साहस रखना तुम्हारा फर्ज है. मैं जल्दी ही तुम्हारे पास लौट आऊंगा.’

यह कहने के बाद विजय चला गया, हमेशाहमेशा के लिए चला गया. मीरा अतीत में खोई थी कि अचानक दरवाजे की घंटी से उस का ध्यान टूटा. वह आंसू पोंछ कर उठी. दरवाजे पर उस की बाई रामकली खड़ी थी. वह बोली, ‘‘मालकिन, आनंद बाबा को याद कर के रोओ मत.

वे अमेरिका में खूब खुश रहेंगे. आप अपने काम में लग जाओ. आज तक आप ने आनंद बाबा को विजय साहब की यादों के सहारे ही तो पाला है. अब अपने स्कूल के काम में मन लगाओ,’’ फिर मीरा को बहलाते हुए आगे बोली, ‘‘मैं आप के लिए चाय लाती हूं. फिर आप के लिए खाना बनाऊंगी.’’ उस रात को जब मीरा अपने बिस्तर पर लेटी तो यादों का कारवां एक बार फिर उस की आंखों के आगे चल निकला. मीरा को घर पर छोड़ने के बाद विजय पर जो गुजरी वह कई दिनों बाद मीरा को विजय के दोस्त और यूनिट में उस के साथी कैप्टन शर्मा ने बताई.

विजय के यूनिट पहुंचने के कुछ देर बाद कमांडिंग अफसर (सीओ) ने पूरी बटालियन को संबोधित किया और उन्हें बताया कि देश के लिए एक गंभीर संकट की स्थिति उठ खड़ी हुई थी. एक पड़ोस के दुश्मन देश ने, बिना कोई चेतावनी दिए हमारे कई सीमावर्ती अड्डों पर भारी हमला कर दिया था.

इस धोखाधड़ी वाले हमले के कारण हमारे कई सैनिक मारे गए थे और हमारी तकरीबन दर्जनभर चौकियां कुछ पूरब में, कुछ पश्चिम में दुश्मन के हाथ में आ गई थीं. दुश्मन को जल्द से जल्द रोकना अनिवार्य हो गया था. पश्चिम के सरहदी इलाके में दुश्मन को रोकने का काम उन की यूनिट को दिया गया था. 

अंत में सीओ साहब ने कहा, ‘‘हम वीर सैनिक, आने वाले खतरों का डट कर सामना करेंगे, भारतीय सेना की परंपरा के मुताबिक. हो सकता है कि हम में से कुछ अपना फर्ज निभातेनिभाते अपनी जान खो दें. पर इस कारण हमें डरना नहीं चाहिए. हमेशा याद रखो कि वतन की इज्जत के लिए जो भी जवान शहीद होता है वह देश की आंखों में अमर हो जाता है.’’

सीओ के भाषण के फौरन बाद विजय, बटालियन के बाकी सदस्यों के साथ हवाई अड्डे पहुंचा. वहां से सारे सैनिक, 3 हवाई जहाजों में सवार हुए और चंद घंटों के बाद, 14 हजार फुट की ऊंचाई पर सीमा के एक हवाई अड्डे पर उतारे गए. वहां मौजूद अधिकारियों ने उन्हें सूचित किया कि वहां की स्थिति बेहद खतरनाक थी. हवाई अड्डे से कुछ ही दूरी पर, दुश्मनों की एक बड़ी टोली ने मोरचा जमाया था.

वे अपने साथियों का इंतजार कर रहे थे जो हजारों की तादाद में 2-3 दिन बाद वहां पहुंचने वाले थे. हवाई अड्डे के पास वाले दुश्मनों को खदेड़ना और उन के आने वाले साथियों का रास्ता रोकना बेहद जरूरी था, वरना हवाई अड्डा दुश्मन के कब्जे में आ सकता था.

वहां के हालात देख कर, उन के सीओ ने दुश्मनों पर हमला करने की जिम्मेदारी विजय को सौंपी. बाकी सैनिक हवाई अड्डे की रक्षा में, और उस ओर आने वाले रास्ते को रोकने के काम में लगाए गए. अगले दिन सुबहसुबह विजय और उस के सैनिकों ने दुश्मनों पर अचानक धावा बोला. शुरू में तो उन को काफी सफलता मिली, पर इस दौरान विजय की टांग में 2 गोलियां लग गईं.

अपने घावों की चिंता किए बिना विजय ने अपने सिपाहियों के आगे जा कर दुश्मन पर फिर धावा बोला. इस बार हमला इतना भयानक था कि बचे हुए दुश्मन सैनिक मोरचा छोड़ कर भाग गए. पर हमले के दौरान दुश्मन की 4 और गोलियों ने विजय की छाती छलनी कर डाली और उस ने वहीं जिंदगी और मौत की सीमा पार कर के वीरगति प्राप्त कर ली थी. इस महान बहादुरी के काम के लिए मेजर विजय को मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला.

यह दास्तान मीरा के दिल और दिमाग पर गहरे निशान छोड़ गई थी. उस रात की याददाश्त ताजी होने पर मीरा की आंखें भर आईं, पर उस ने अपने आंसू रोके. तभी भोर की पहली किरणों ने आकाश में रंग भरना शुरू कर दिया. वह उठ कर बालकनी में गई. उस ने सोचा कि विजय के जाने के बाद भी तो जिंदगी उस ने अकेले ही चलाई थी तो अब आनंद के अमेरिका जाने पर भी चल ही जाएगी. 

समय की रफ्तार को कौन रोक सका है. आनंद ने पढ़ाई पूरी कर के अमेरिका में ही नौकरी कर ली. वह भारत समयसमय पर आताजाता रहा पर अब उस का मन वहां नहीं लगता था. उस ने मां की पसंद से भारत में शादी तो कर ली पर अपनी दुलहन समेत अमेरिका में ही जा कर बस गया.

मीरा का सपना था कि आनंद अपने पिता विजय की तरह फौज में जाता पर वह सपना हकीकत न बन पाया. बाद में आनंद का आना भी कम हो गया. हां, उस की पत्नी शोभा आती रही.

उन का बेटा अंकित भारत में ही पैदा हुआ. 8 साल की उम्र के बाद से तो वह मीरा के पास ही रह कर पला और बढ़ा. वह चाहता था कि वह अपने दादा की तरह फौजी अफसर बने. पर आनंद की इस में रजामंदी नहीं थी. उस ने अपनी मां की जिंदगी में दुख भरे तूफान का असर देखा था और वह नहीं चाहता था कि किसी और महिला को ऐसा दर्द मिले. तो भी अंकित ने स्कूल में एनसीसी में भाग ले लिया और कालेज की पढ़ाई पूरी कर के वह देहरादून मिलिटरी अकेडमी में चला गया.

आनंद इस सब से नाखुश था. अकेडमी से अफसर बन कर जब अंकित बाहर निकला तो उस ने अपने दादाजी की रेजीमैंट को जौइन किया. पर अब वह छुट्टियों में कम ही घर आता. उस की छुट्टियां दोस्तों के साथ घूमनेफिरने और मौजमस्ती में ही कट जातीं. मीरा उसे देखने को तरस जाती.

 एक दिन मीरा दीवार पर लगी विजय की फोटो देख रही थी. फिर उस की नजर साथ लगे डिसप्ले केस पर पड़ी, जिस में विजय के मैडल लगे थे. सर्वप्रथम एक बैगनी रंग के रिबन से लटका परमवीर चक्र था. 3 इंच का कपड़ा, एक तोला धातु, जिस को पाने के लिए सिपाही जान की बाजी दांव पर लगाने को तैयार रहते थे. वाह री शूरवीरता! 

तभी दरवाजे की घंटी बजी. मीरा ने दरवाजा खोला और उस के दिल पर जोर का झटका लगा. उस के सामने वरदी पहने, उस का पोता अंकित खड़ा था. हूबहू विजय. वही विजय जिस ने उस को बहुत साल पहले छोड़ा था और जिस की वरदी पहने वाली तसवीर उस के दिमाग में हमेशा के लिए छप गई थी. उस ने सोचा कि उस की आंखें उस को धोखा दे रही थीं.

तभी एकदम अंकित ने उसे सैल्यूट मारा, फिर झुक कर पैर छुए, ‘‘देखिए दादीमां, मेरा प्रमोशन हो गया है. अब मैं भी दादाजी की तरह मेजर बन गया हूं.’’ मीरा ने अपने पोते को गले लगाया, उस के रुके हुए आंसू बह निकले.

मीरा सोच रही थी कि ठीक था कि विजय ने अपने देश के लिए अपनी जान की बाजी लगा कर सराहनीय साहस का परिचय दिया था. पर मीरा के साहस का कौन अंदाजा लगा सकता था. समय की आंधी के आगे वह तन कर डटी रही और आगे ही बढ़ती गई. आज उसी साहस के बल पर उस ने अपने पोते को देश को समर्पित कर दिया था.

बंटवारा- भाग 4: क्या थी फौजिया की कहानी

इधर, अफशां को काफी देर से बेबे की कोठरी में दरवाज़ा बंद कर के बैठे हुए देख कर रजिया की छोटी भाभी ने फ़ौरन अपनी सास के कान भरे और दरवाज़ा खुलवाने को कहा. फौजिया दनदनाती हुई आई और दरवाज़े पर लात मार कर रजिया से दरवाज़ा खोलने को कहा. तो झट से अपना फोन कुरते की जेब में डाल कर अफशां बेबे से शीरमाल की रैसिपी पूछने लगी और रजिया ने दरवाज़ा खोल दिया.

बीकानेर में अपने घर में बैठे किशनचंद मेघवाल ने पोते से पूछा कि उन की बीरी को भारत लाने   का प्रबंध कैसे किया जाएगा? संजय ने अपने दादू को हौसला देते हुए कहा कि वह जल्दी ही भारतीय विदेश मंत्रालय में इस बारे में पत्र लिखेगा और दादू को उन की बीरी से मिलवाने का प्रयत्न करेगा.

कुछ महीनों के प्रयास के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से बात कर के अमीरन उर्फ़ लक्ष्मी के भारत लौटने का प्रबंध करवा दिया और सरकारी हुक्म होने के कारण बेबे के बेटे उस के भारत जाने में कोई रुकावट नहीं डाल सके. मगर अपनी मां को धमकी ज़रूर दे दी कि अगर वह हिंदुस्तान गई तो बेटे वापस उस को अपने घर में कभी नहीं आने देंगे. अपने देश जाने की ख़ुशी में बेबे ने बेटे की बात पर कोई ध्यान ही नहीं दिया और अपने टीन के बक्से में सफ़र पर ले जाने का सामान रखने लगी.

नियत दिन पर रजिया अपनी बेबे को ले कर अपना वादा पूरा करने के लिए चल पड़ी. उस के अब्बू ने तो साथ चलने से इनकार कर दिया, इसलिए अफशां ने अपने अब्बा से गुजारिश की तो अजीबुर्रहमान अमीरन और रजिया को ले कर कराची रेलवे स्टेशन पंहुच  गए. वहां पंहुचने पर पता चला कि दूतावास की तरफ से भारत जाने का प्रबंध केवल लक्ष्मी के लिए  किया गया है, इसलिए और कोई उस के साथ नहीं जा सकता है. रजिया ने बेबे की उम्र का हवाला देते हुए साथ जाने की इजाज़त मांगी लेकिन पाकिस्तान सरकार ने अनुमति नहीं दी. निराश रजिया ने भीगी आंखों से अपनी बेबे को रुखसत किया और अफशां के अब्बा के साथ अपने गांव वापस आ गई. अफशां द्वारा बेबे के आने की सूचना  मिलने पर संजय व उस के पापा अमृतसर के लिए रवाना हो गए.

इतना लंबा सफ़र अकेले तय करने में लक्ष्मी को बहुत घबराहट हो रही थी. तब उस के साथ सफ़र कर रही एक महिला ने उस से बातें करनी शुरू कीं और बेबे की कहानी सुनने के बाद उस ने रास्तेभर बेबे की पूरी देखभाल की और अमृतसर पर लक्ष्मी के परिवार वालों को उसे सौंप कर ही वहां से गई. अमृतसर स्टेशन पर कुछ रेलवे अधिकारियों के अलावा  प्रैस के संवाददाता और संजय एवं उस के पिता बरसों से बिछुड़ी लक्ष्मी की प्रतीक्षा में फूलों के गुलदस्ते ले कर खड़े थे.  संजय और उस के पिता ने आगे बढ़ कर लक्ष्मी के पैर छू कर जब अपना परिचय दिया तो लछमी ने आंखें मिचमिचाते हुए उन दोनों को पहचानने का प्रयास किया और फिर दोनों को कलेजे से लगा कर सिसकने लगी.

कुछ और घंटों की यात्रा पूरी करने के बाद लक्ष्मी जब अपने राजस्थान पंहुची तो इतने लंबे सफ़र से उस का तन तो थका हुआ था लेकिन अपनी धरती पर पांव रखने की ख़ुशी ने उस थकान को मन पर हावी होने ही नहीं दिया और घर के दरवाज़े पर अपनी प्रतीक्षा करते अपने किसना को देख कर तो उस के पैरों में जैसे पंख लग गए व उस ने अपने किसना को कलेजे से ऐसे चिपका लिया जैसे अब वह अपने भाई से कभी अलग नहीं होगी. घर के अंदर पंहुचने पर संजय की मां ने भी अपनी बरसों से बिछुड़ी बूआ सास के पांव छुए और उस का सत्कार किया.  चायनाश्ता करते हुए  जब लक्ष्मी ने बंसी, सरजू और लाली के बारे में पूछा, तब किशनचंद ने बताया कि बंसी भैया का 2 वर्ष पहले कैंसर से देहांत हो गया और उन के बच्चे जयपुर में कारोबार करते हैं. सरजू भैया मोर गांव में ही रहते हैं और लाली अपने परिवार के साथ कोटा में रहती है.

मोर गांव का नाम सुनते ही लक्ष्मी ने गांव जाने की रट पकड़ ली. तब किशनचंद ने कुछ दिनों बाद गांव ले चलने का आश्वासन दे कर अपनी बीरी को शांत किया. लेकिन 15 दिन निकल गए और अपनीअपनी व्यस्तताओं के चलते किसी का भी गांव जाना न हो सका. लक्ष्मी के अंदर भी अब कभीकभी अमीरन अपना सिर उठाने लगती और उसे अपने बच्चों, विशेषरूप से रजिया, की याद सताने लगती. मगर संकोचवश वह किसी को इस विषय में कुछ न बताती थी.

अचानक मार्च के महीने से दुनिया का माहौल एकदम बदल गया और हर तरफ कोरोना का डर व्याप्त हो गया. तब अमीरन ने लक्ष्मी को अपने टब्बर की तरफ से लापरवाह हो जाने के लिए फटकार लगाई और उस ने संजय से कहा कि वह उस की बात एक बार रजिया से करवा दे. संजय ने तुरंत फोन मिलाया तो अफशां ने अगले दिन बेबे के परिवार से बात करवाने का वादा किया.

अगले दिन अफशां ने रजिया के घर पंहुच कर बेबे से सब की बात करवानी चाही तो बेबे की बहु और पोताबहुएं तो काम के बहाने इधरउधर खिसक गईं और रजिया के भाई खेतों पर थे.  रजिया ने फोन अफशां के हाथ से ले कर अपनी बेबे से बात करने लगी तो बेबे भी खूब चटखारे ले कर अपने भाई व उस के परिवार के बारे में बताने लगी. तभी रजिया का अब्बा अकरम वहां आ गया और जब उसे पता चला कि रजिया फोन पर बेबे से रूबरू है तो उस ने बेटी के हाथ से फोन छीन कर अपनी मां को दोबारा फोन न करने की हिदायत देते हुए कहा कि वह अब पाकिस्तान वापस आने के बारे में सोचे भी न, क्योंकि इस परिवार के लिए वह मर चुकी है. फिर अकरम ने फोन काटा और अफशां के हाथ में थमा कर वहां से चला गया.

रजिया अपने अब्बू के व्यवहार से दुखी हो कर रोने लगी तो अफशां ने उसे दिलासा देते हुए कहा कि उसे जब भी बेबे से बात करनी हो, तो वह उस के घर आ कर आराम से बात कर सकती है.

अपने बेटे के ज़हरबुझे शब्दों से आहत लक्ष्मी फोन हाथ में पकडे निश्छल बैठी रह गई. यह देख कर संजय ने उसे बड़े प्रेम से समझाते हुए कहा कि ‘काका अपनी मां के यहां आ जाने से दुखी हो कर ऐसे बोल रहे होंगे, असलियत में नाराज़ नहीं होंगे.‘  उस की बात सुन कर लक्ष्मी ने अपने आंसू तो पोंछ लिए लेकिन मन ही मन वह जानती थी कि अकरम ने जो भी कहा है, उस का एकएक शब्द सच्चा है.

अब सीमापार लक्ष्मी का कोई टब्बर नहीं है. जीवन की यह कैसी विडंबना है कि जिस परिवार में जन्म लिया वह अब अपना हो कर भी अपना नहीं है और जो नाता ज़बरदस्ती जुड़ा था वह अधिक अपना था लेकिन उसे मानने से उस के अपने बेटे ने ही इनकार कर दिया. कहां जाए अब अमीरन का चेहरा ओढ़े यह लक्ष्मी. यह परिवार अब उस के भाई और बच्चों का है जिस पर उस का कोई अधिकार नहीं है और जिन पर अधिकार बनता है उन्होंने तो उस को जीतेजी ही मार दिया है. वह अब जाए तो कहां जाए? इस बंटवारे ने केवल ज़मीनें ही नहीं बांटी हैं बल्कि रिश्तों के भी टुकड़ेटुकड़े कर दिए हैं.

मन ही मन कुछ तय करने के बाद लक्ष्मी ने किशनचंद से बात की और कहा कि अब वह अपना बाकी जीवन अपने गांव में ही बिताना चाहती है, इसलिए उस को जल्द से जल्द गांव भेजने का प्रबंध करवा दिया जाए. बीरी की इच्छा पूरी करते हुए उसे (लक्ष्मी) को ले कर किशनचंद मोर गांव गए और वहां अपने पैतृक घर के एक हिस्से में लक्ष्मी के रहने का प्रबंध करवा कर लौट आए. और लछमी के गांव जाने के पूरे एक महीने बाद आज सुबहसुबह गांव से सरजू भैया का फोन आया कि बीरी सुबहसुबह परलोक सिधार गई.

आजीवन जो धरती उसे नसीब नहीं हुई, उस ने अंत में अपने अंक में उसे समेट लिया था.

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