स्किन के लिए फायदेमंद ऑलिव ऑयल

सर्दियों में ठंड और ड्राई क्लाइमेट होने की वजह से बॉडी में नेचुरल ऑयल कम हो जाता है और स्किन ड्राई हो जाती है. स्किन, लिप्स और बालों में डैंड्रफ की समस्या बढ़ जाती है. ऐसे में जरूरी हो जाता है, कुछ ऐसे उपाय अपनाना जो स्किन को फ्रेश और हेल्दी रख सकें. ऐसे में ऑलिव ऑयल आपके लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है.

ऑलिव ऑयल के फायदे

हाथों को सॉफ्ट बनाने के लिए ऑलिव ऑयल से मसाज करें.

दो मुंहे बालों से निजात पाने के लिए वीक में एक बार इस तेल को लगाएं.

अगर आपकी स्किन ड्राई है, तो एक अंडे को ऑलिव ऑयल में मिलाकर चेहरे पर लगाएं.

बॉडी मसाज के लिए चार चम्मच जैतून के तेल में दो चम्मच ऐरोमेटिक ऑयल मिलाएं.

सर पर डैंड्रफ है, तो जैतून के तेल को गर्म करें और रुई से सर पर लगाएं. हल्के हाथों से 5 मिनट मलें. जमा डैंड्रफ बालों से निकल जाएगी.

हार्ड स्किन जैसे, घुटनों, कोहनियों और फटे होंठों को ठीक रखने के लिए इस तेल की मसाज फायदेमंद होती है.

बालों की ड्राईनेस को खत्म करने में भी यह तेल बेहद फायदेमंद है.

मीठे में बनाये वॉलनट बौल्स

कुछ लोगों को खाने के बाद कुछ मीठा खाने की आदत होती है. बच्चों को भी मीठा बेहद पसंद है. घर पर बना कर रखें वॉलनट बौल्स. ताकि आप भी खुश और बच्चे भी खुश. हमें लिखना न भूलें, कि आपको ये रेसिपी कैसी लगी.

सामग्री

– 150 ग्राम अखरोट

– 100 ग्राम खोया

– 8-10 अखरोट अलग से

– 2 छोटे चम्मच पिस्ता बारीक कतरा

– 1/4 छोटा चम्मच छोटी इलायची चूर्ण

– 2 छोटे चम्मच देशी घी

– 100 ग्राम बूरा

– 1 छोटा चम्मच सोंठ पाउडर

विधि

अखरोट को घी में हलका भून कर दरदरा कूट लें. खोए को भी हलका भूनें. गरम में ही सोंठ पाउडर और सौंफ मिला दें. जब खोया ठंडा हो जाए तो इस में कुटे अखरोट, इलायची चूर्ण और बूरा मिला दें. थोड़ा-थोड़ा मिश्रण ले कर छोटेछोटे लड्डू बना कर बीच में कतरा पिस्ता व एक अखरोट चिपका दें. वॉलनट बौल्स तैयार हैं. 

व्यंजन सहयोग: नीरा कुमार

फिल्म रिव्यू: हरामखोर

बेसिर पैर की कहानी, बेतुका प्रेम संबंध, बेतुकी पटकथा और बेतुका निर्देशन यानी कि फिल्म ‘‘हरामखोर’’.फिल्मकार दावा कर रहे हैं कि यह फिल्म शिक्षक व छात्रा के बीच की प्रेम कहानी है, पर इसे शिक्षक व छात्रा के बीच हवस पर आधारित बोल्ड फिल्म कहना ज्यादा उचित होगा.

यह फिल्म एक चौदह वर्षीय लड़की और उसके शिक्षक के बीच प्रेम कहानी है. मगर पूरी फिल्म में फिल्म निर्देशक शिक्षक व छात्रा की प्रेम कहानी को स्थापित नहीं कर पाए, बल्कि यह प्रेम की बजाय महज वासना ही नजर आयी. निर्देशक व पटकथा की कमजोरी के चलते शिक्षक अर्थात श्याम महज सेक्स के हवसी नजर आते हैं.

फिल्म ‘‘हरामखोर’’ की कहानी के केंद्र में मध्यप्रदेश के एक गांव में अपने पुलिस अफसर पिता के साथ रह रही नौंवी कक्षा की छात्रा संध्या (श्वेता त्रिपाठी) और उसके शिक्षक श्याम सर (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) हैं. संध्या की मांबचपन में ही उसे छोड़कर चली गयी थी, श्याम सर ने अपनी छात्रा रही सुनीता (त्रिमाला अधिकारी) से हीशादी कर रखी है, पर उनकी कोई संतान नहीं है. श्याम सर स्कूल में पढ़ाने के साथ साथ अपने घर पर भी ट्यूशन लेते हैं. श्याम सर अपनी छात्राओं व छात्र छात्राओं की माताओं पर डोरे डालते रहते हैं. संध्या का सहपाठी कमल (बाल कलाकार इरफान खान) भी संध्या के संग शादी रचाने का सपना देख रहा है. उसके इस सपने को पूरा करने में मदद की बात संध्या व कमल का सहपाठी मिंटू (बाल कलाकार मो.समद) करता है. कमल व मिंटू, दोनों ही श्याम सर व संध्या की गतिविधियों पर नजर रखते हैं.

संध्या व श्याम सर के बीच भी प्रेम संबंध हैं. एक दिन संध्या के पिता अपनी प्रेमिका मीनू से मिलने जाते हैं, तब रात में डर का बहाना कर संध्या, श्याम सर के घर पहुंच जाती हैं. फिर श्याम सर के बेडरूम के दरवाजे को खिसका कर श्याम सर को अपनी पत्नी के साथ सेक्स संबंध बनाते हुए देखती है. श्याम सर भी देखते हैं कि संध्या उनके इस कृत्य को देख रही है. मगर श्याम सर जानकर भी अनजान बने रहते हुए अपनी पत्नी के साथ सेक्स सुख का आनंद लेते रहते हैं. फिर कुछ समय बाद श्याम सर, संध्या के पास जाकर उसके शरीर को हाथ लगाते हैं. दूसरे दिन स्कूल में संध्या उनसे पन बिजली के पास सुनसान इलाके में मिलने के लिए कहती है. जहां श्याम सर पहुंच कर संध्या के साथ अपनी हवस मिटाते हैं.

फिर यह सिलसिला चल पड़ता है. कभी कभी संध्या के पिता की गैरमौजूदगी में श्याम सर, संध्या के घर के अंदर ही उसके साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं. एक दिन संध्या कहती है कि इस बार उसका मासिक धर्म नहींहुआ. तो श्याम सर उसे शहर डाक्टर के पास ले जाते हैं, जहां संध्या के पिता की प्रेमिका मीनू नर्स  के रूप मेंमिल जाती है, जो कि संध्या का साथ देती है. इसके एवज में  अब मीनू, संध्या के घर रहने लगती है.

मीनू का साथ मिलने के बाद संध्या व श्याम सर के बीच का कुकृत्य ज्यादा तेज गति से चलने लगता है. पर एक दिन इसका पता श्याम सर की पत्नी सुनीता को लग जाता है. सुनीता घर छोड़कर चल देती है. श्याम सर,संध्या के घर जाकर उसे बुलाते हैं और उसे सुनसान जगह पर ले जाकर कहते हैं कि उसकी वजह से उनकी पत्नी चली गयी..इधर कमल व मिंटू, श्याम सर के घर में घुसकर खाते पीते, उधम मचाने के बाद श्याम सर के कुछ कपड़े चुराकर चले जाते हैं.

जब श्याम सर घर वापस लौटते हैं, तो उनकी पत्नी वापस आ चुकी होती हैं. अब श्याम सर को यह पता लगाना है कि उनके घर चोरी किसने की. एक दिन वह कमल व मिंटू को अपने कपड़ों में देख लेते हैं. गुस्से में वह कमल की हत्या कर देते हैं, यह देख मिंटू भी बड़ा पत्थर उठाकर श्याम सर के सिर पर मारता है. श्याम सर की भी मौत हो जाती है. खुद मिंटू, संध्या के घर जाकर बता देता है. यहीं से फिल्म खत्म.

16 दिन में फिल्मायी गयी फिल्म ‘‘हरामखोर’’ के लेखक व निर्देशक के तौर पर श्लोक शर्मा बहुत बुरी तरह से असफल रहे. यह फिल्म उनके अंदर की रचनात्मकता की बजाय उनके दिमागी दिवालियापन का चित्रण करती है. कई जगह तो लगता है कि उन्होंने बिना पटकथा के कुछ दृश्यों को फिल्माकर जोड़ दिया है. श्याम सर की पत्नी सुनीता को श्याम व संध्या के रिश्ते के बारे में कैसे पता चला? सुनीता वापस श्याम सर के ही पास क्यों आयी? श्याम सर व संध्या के बीच प्यार या चाहत कैसे पैदा हुई? श्याम सर का रवैया खौफनाक व भयावह है,मगर संध्या के मन में क्या चल रहा है, यह साफ नहीं होता. यानी कि शिक्षक व छात्रा की प्रेम कहानी स्थापित ही नहीं होती. यह तमाम अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिनका जवाब फिल्म में नहीं है. पिता व पुत्री का रिश्ता भी उभरा नहीं. यह खामी पूर्णरूपेण पटकथा लेखक व निर्देशक के दिमागी खालीपन का ही परिचायक है. कथा कथन में भी काफी त्रुटियां हैं. जिस तरह से फिल्म के दो अलग अलग धुरी के लोगों की मौत के साथ फिल्म खत्म की गयी, उससे भी पता चलता है कि निर्देशक की समझ में नही आ रहा था कि वह फिल्म का अंत किस मोड़ पर करें. बची कुची कसर फिल्म के एडीटर  ने फिल्म की एडीटिंग तितर बितर तरीके से कर फिल्म को चौपट कर दिया. पूरी फिल्म बोर करने के अलावा कुछ नहीं करती.

जहां तक अभिनय का सवाल है. तो नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अच्छी परफार्मेंस दी है, मगर उन्हे खुद को दोहराने से बचना चाहिए. फिल्म हरामखोर में श्याम सर के किरदार में उन्हे देखकर उनकी पुरानी फिल्मों के कई किरदारों के मैनेरिजम याद आ जाते हैं. ‘रमन राघव 2’ की ही तरह ‘हरामखोर’ में भी वह कई जगह बहुत खौफनाक लगते हैं. ‘हरामखोर’ के कई दृश्यों में नवाजुद्दीन ने ‘रमन राघव 2’ के अपने किरदार के ही मैनेरिज्म को दोहराया है. यदि नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपनी अभिनय शैली पर ध्यान नहीं दिया, तो वह हर फिल्म में इसी तरह खुद को दोहराते नजर आएंगे. 14 वर्षीय छात्रा लड़की संध्या के किरदार में श्वेता त्रिपाठी ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

एक घंटे 34 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हरामखोर’’ का निर्माण गुनीत मोंगा, अनुराग कश्यप, फिरोज अलामीर व अचिन जैन तथा निर्देशन श्लोक शर्मा ने किया है. फिल्म के संगीतकार जसलीन रायल तथा कलाकार हैं- नवाजुद्दीन सिद्दिकी, श्वेता त्रिपाठी, त्रिमाला अधिकारी, मा.इरफान खान, मा.मो.समद व अन्य.

कैलेंडर के लिए टॉपलेस हुईं दिशा पटानी

हर साल की तरह इस साल भी प्रसिद्ध फोटोग्राफर डब्‍बू रतनानी साल 2017 का नया कैलेंडर लेकर आ रहे हैं. लेकिन एक बार फिर डब्‍बू रतनानी के इस कैलेंडर ने आने से पहले ही सुर्खिंया बटोरनी शुरू कर दी है.

दरअसल, इस फोटोशूट में फिल्‍म ‘एम.एस. धोनी: द अनटोल्‍ड स्‍टोरी’ की एक्‍ट्रेस दिशा पटानी काफी हॉट अवतार में नजर आ रही हैं. डब्‍बू रतनानी के इस हर साल आने वाले कैलेंडर में हर साल ही बॉलीवुड के एक से एक स्‍टार शामिल होते हैं, लेकिन इस बार दिशा पटानी ने सारी चर्चा अपनी तरफ मोड़ ली है.

हर साल की तरह इस साल भी डब्‍बू रतनानी के इस फोटोशूट में एश्‍वर्या राय बच्‍चन, अनुष्‍का शर्मा, वरुण धवन, शाहरुख खान, अभिषेक बच्‍चन,  दिशा पटानी, सनी लियोनी, श्रद्धा कपूर, रणबीर सिंह, प्रियंका चोपड़ा जैसे कई सितारे नजर आने वाले हैं.

एक इंटरव्‍यू में दिशा ने बताया, ‘इस फोटो शूट में मेरा सिर्फ मेकअप में सहयोग है. मैं इस शूट में स्‍मोकी आई मेकअप और बालों को खुला और उड़ता हुआ चाहती थी. मुझे नहीं लगता कि मेकअप हमारी त्‍वचा के लिए अच्‍छा नहीं होता. हमें हमारी त्‍वचा को सांस लेते रहने देना चाहिए.’

अपने फोटोशूट के बारे में दिशा ने कहा कि यह डब्‍बू का कॉन्‍सेप्‍ट था और मैंने इसे सिर्फ उनके बताए अनुसार ही किया है. मैं पहली बार इस कैलेंडर का हिस्‍सा बन रही हूं और हम चाहते थे कि यह सबसे अलग दिखे.’ हालांकि दिशा ने अपने टॉपलेस होने पर सफाई देते हुए कहा है, ‘मैं टॉपलेस नहीं हूं. आपको कुछ नहीं दिखेगा, बस मेरी पीठ दिख रही है.’

बता दें कि दिशा पटानी जल्‍द ही जैकी चैन की फिल्‍म ‘कुंग फू योगा’ में भी नजर आने वाली हैं. इस फिल्‍म में एक्‍टर सोनू सूद भी नजर आएंगे. इस फिल्‍म की शूटिंग जयपुर और आइसलैंड में हुई है. दिशा के अलावा कई अन्‍य सितारे भी इस कैलेंडर में काफी स्‍टाइलिश और बेहद अलग लुक में दिख रहे हैं.

होस्टल व पेइंगगैस्ट कमाई बैस्ट

बढ़ती महंगाई और खर्चों में तालमेल बैठाने के लिए हर कोई कमाई के नए साधन और तरीके खोजने में लगा हुआ है. चाहे नौकरीपेशा आदमी हो या बिजनैसमैन, महंगाईर् ने सभी की कमर तोड़ दी है. अपने बजट को बैलेंस में रखने के लिए आप अपनी नौकरी या बिजनैस के साथ कुछ ऐसा कर सकते हैं जिस में न तो आप को ज्यादा मेहनत की जरूरत है और न ही ज्यादा लागत की. जरूरत है तो सिर्फ जगह की. अगर आप का घर बड़ा है औैर परिवार छोटा तो आप घर में बची हुई जगह को आमदनी का जरिया बना सकते हैं.

होस्टल, पेइंगगैस्ट यानी पीजी के बारे में तो आप ने सुना ही होगा. आजकल बड़े शहरों में घर बैठे कमाई के साधनों में घर पर ही किराए पर कमरों को देने का काम बहुत प्रचलित है. खासतौर पर दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों जहां कोचिंग, कालेज या नौकरी के लिए बड़ी संख्या में दूसरे शहरों से लोग आते हैं वहां इस क्षेत्र में कमाई की बड़ी संभावनाएं हैं. इस काम में न तो मैंटल प्रैशर है, न फिजिकल.

दिल्ली के लक्ष्मीनगर स्थित गुरु कृपा गर्ल्स होस्टल के संचालक गुरु चरण सिंह कहते हैं, ‘‘घर में होस्टल खोलने में कौन सी बुराई है. अगर घर में एक कमरा भी खाली है तो उसे किराए पर चढ़ा देने के 2 फायदे हैं. एक, घर बैठे बिना किसी टैंशन के आप को आमदनी होती है और दूसरा, घर के खाली पड़े स्थान का इस्तेमाल होने लगता है.’’ पीजी या होस्टल खोलने का काम कामकाजी पुरुषों की अपेक्षा घरेलू महिलाएं ज्यादा अच्छे से कर सकती हैं. क्योंकि वे पूरे दिन घर में उपस्थित रहती हैं, इसलिए वे किराए पर दिए कमरों और कमरों में रहने वालों की निगरानी अच्छी तरह कर सकती हैं.

दिल्ली के निर्माण विहार स्थित एक पेइंगगैस्ट की मालकिन मधु डोगरा कहती हैं, ‘‘यह बहुत ही आसान काम है. हमारे घर के एक पूरे फ्लोर पर हम ने पीजी खोल रखा है. लड़कियों का पीजी है, इसलिए उन के हिसाब से सारी सुविधाएं भी उन्हें दे रखी हैं. मैं दिनभर घर पर रहती हूं, किसी भी लड़की की कोई भी समस्या होती है तो उसे जल्द ही निबटा देती हूं.’’

पीजी खोलने की प्रक्रिया

यह आसान काम है लेकिन एक प्रक्रिया के तहत किया जाए तो ही इस में सफलता मिलती है. यदि आप घर पर या अपनी किसी भी प्रौपर्टी पर पीजी या होस्टल खोलने की सोच रहे हैं तो सब से पहले आप को यह तय करना होगा कि आप लड़कियों के लिए सुविधा मुहैया करवा सकते हैं या फिर लड़कों के लिए. इस के बाद ही आप को यह सुनिश्चित करना होगा कि आप के पास कितने रूम हैं और आप के हर रूम में 1, 2 या 3, कितने लोग रह सकते हैं. फिर आप यह देखिए कि आप को प्रति व्यक्ति कितना किराया रखना है.

कितने व्यक्ति: इस काम में कितने लोगों की जरूरत है, यह बात आप के पीजी या होस्टल में रह रहे लोगों की संख्या पर निर्भर करती है. यदि आप ने अपने घर में ही पीजी या होस्टल खोल रखा है तो एक सफाई कर्मचारी के अलावा ज्यादा किसी की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन आप ने एक बड़ा होस्टल खोलने का विचार किया है तो इस के लिए आप को कई लोगों की जरूरत पड़ती है. 1 सिक्योरिटी गार्ड, 1 रिसैप्शनिस्ट, 1 कुक, 2 सफाई कर्मचारी, 1 चपरासी और सभी चीजों की देखरेख व लोगों की समस्याओं को सुलझाने वाला केयरटेकर.

जरूरी सामान: इस के लिए आप को कुछ जरूरी सामान भी खरीदना पड़ सकता है. कूलर, टेबल, चेयर, बैड और अलमारी जैसी बेसिक चीजें तो आप को पीजी या होस्टल में रहने वाले को उपलब्ध करानी ही होंगी. यदि पहले से ही आप के घर में एक्स्ट्रा सामान है तो आप उसी से कुछ सामान अपने पीजी या होस्टल में रहने वाले को दे सकते हैं.

कुक और गैस्ट में लड़ाई: पेइंगगैस्ट में अगर आप ने गैस्ट को खाने की सुविधा दे रखी है तो एक परमानैंट कुक भी रखा होगा. कई बार गैस्ट और कुक के मध्य खाने में वैराइटी और मनपसंद खाना बनाने की बात को ले कर बहस हो जाती है. यह बहस कभीकभी झगड़े का भी रूप ले लेती है. ऐसी परिस्थिति में पेइंगगैस्ट के मालिक को झगड़ा सुलझाना पड़ता है. इस बाबत गुरु चरण सिंह कहते हैं, ‘‘बहुत ही असमंजस वाली परिस्थिति होती है. क्योंकि न तो आप गैस्ट के विरोध में बोल सकते हैं और न ही अपने कुक को निकाल सकते हैं. क्योंकि एक अच्छा कुक खोजना बेहद मुश्किल काम है. इसलिए ऐसी परिस्थिति में आप का दोनों के बीच तालमेल बैठाने के लिए कुक और गैस्ट दोनों को समझना भी पड़ेगा और समझाना भी.’’

जब एक दूसरे पर चोरी का इलजाम लगाएं: कई बार एक ही कमरे में रहने वाले एक दूसरे पर चोरी का इलजाम लगा देते हैं. ऐसे में पीजी या होस्टल मालिक के लिए असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है. इसलिए उस में व्यक्ति को परखने का गुण होना चाहिए क्योंकि हर व्यक्ति एक सा नहीं होता है. खासतौर पर यदि आप ने पीजी के कमरों को शेयरिंग पर दे रखा हो. एक ही कमरे में रहने वाले 2 व्यक्तियों की आपस में पटे, यह जरूरी नहीं.

कई बार मनमाफिक रूमपार्टनर न मिलने पर दोनों के बीच कई तरह के मनमुटाव हो सकते हैं, जैसे कि ऊंची और नीची जाति को ले कर छुआछूत की समस्या होना, एकदूसरे का बिना पूछे सामान इस्तेमाल करने पर झगड़े और सब से बड़ी समस्या एक गैस्ट द्वारा दूसरे गैस्ट के पैसे या सामान चुरा लेने पर हंगामा खड़ा करना. इन सब से बचने के लिए आप को सब से पहले यह तय कर लेना होगा कि आप को किस तरह के व्यक्ति को पीजी में रखना है, फिर आप को कमरे में बैड से ले कर अलमारी, यहां तक कि टेबलचेयर भी दोनों को अलगअलग देनी होगी. इन सब के बावजूद यदि किसी के पैसे या सामान चोरी हो तो आप को इस के लिए पहले से गैस्ट को ‘अपने सामान की सुरक्षा खुद करें’ जैसी चेतावनी देनी होगी ताकि सामान या पैसे खोने पर मालिक को जिम्मेदारी न लेनी पड़े.

गैस्ट लड़के लड़कियां लाएं तो: कई बार गैस्ट अपने दोस्तों, गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड को अपने कमरे में ले आते हैं. कभी कभी उन के दोस्त उन के कमरे में ही रुक भी जाते हैं. दोस्तों के साथ मस्ती करते वक्त वे यह भूल जाते हैं कि आसपास दूसरे परिवार रहते हैं जिन्हें उन के शोरशराबे से परेशानी हो रही है. कई दोस्तों के आपसी झगड़ों की वजह से भी पूरे घर और उस के आसपास का माहौल खराब होता है. अगर आप पेइंगगैस्ट रख रहे हैं तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि वे खराब नीयत और नजर के न हों. वरना आसपास की तो छोडि़ए, आप के अपने घर की लड़कियों व महिलाओं का रहना दूभर हो जाएगा.

लड़कियों को रखने पर भी आप को कुछ बातों पर ध्यान देना होगा, जैसे कि वे देर रात तक घर के बाहर न रहती हों और न ही किसी लड़के को पीजी के अंदर बुलाती हों. दरअसल, कई बार लड़कियां घर से भाग कर आती हैं, ऐसी परिस्थिति में पीजी के मालिक को बेवजह के कानूनी पचड़ों में पड़ना पड़ता है और पैसे खर्च करने पड़ते हैं. इन सब से बचने के लिए पहले से ही जिसे पेइंगगैस्ट रख रहे हैं उसे अपने कमरे में किसी को भी न रोकने की हिदायत दे दें और किसी भी तरह के अभद्र व्यवहार पर तुरंत पीजी खाली करवाने का नियम भी बता दें. लड़की है तो उसे लड़कों को कमरे में न लाने को कहें और लड़कों को लड़की की एंट्री के लिए पहले से ही मना कर दें.

जांच के बहाने पुलिस आने लगे तो: इस बात का विशेष ध्यान रखें कि किसी भी व्यक्ति को पेइंगगैस्ट रखने से पहले उस का पुलिस वैरिफिकेशन जरूर करवा लें. पुलिस वैरिफिकेशन अब अनिवार्य हो गया है. इस के लिए पुलिस स्टेशन से एक वैरिफिकेशन फौर्म लाना होता है जो निशुल्क मिलता है. इस फौर्म को अपने सभी पेंइगगैस्ट से भरवाना होता है और उसे अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन में जमा करना होता है. पुलिस वाले  समयसमय पर पीजी और होस्टल के चक्कर काटते रहते हैं और गैस्टों का वैरिफिकेशन चैक करते रहते हैं. यदि पीजी में रहने वाले किसी भी व्यक्ति का वैरिफिकेशन नहीं हुआ होता है तो इस के लिए पीजी के मालिक को जेल और जुर्माना भरना पड़ सकता है.

कई बार पुलिस वैरिफिकेशन होने के बावजूद पीजी और होस्टल के चक्कर काटती है. दरअसल, ऐसा तब होता है जब पुलिस को आप के पीजी या उस के आसपास का माहौल संदिग्ध नजर आता है. खासतौर पर जहां लड़के और लड़कियां दोनों साथ में रहते हैं वहां अकसर ही पुलिस चक्कर काटती रहती है. ऐसा करने के पीछे उन का मकसद पीजी के मालिक पर अनापशनाप आरोप लगा कर उन से पैसे ऐंठना होता है.

जब लड़केलड़कियां बाहर खड़े हो कर बात करें: अधिकतर दूसरे शहरों से आए छात्रछात्राएं ही पीजी में रहते हैं. इन लोगों का एक बड़ा फ्रैंड सर्किल भी होता है. अपने फ्रैंड्स को कभी ये अपने कमरे ले आते हैं तो कभी पीजी के बाहर ही खड़े हो कर बतियाने लगते हैं. खासतौर पर गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड हों तो उन की बातें घंटों चलती रहती हैं. पीजी में रहने वाले अन्य लोगों या आसपास के लोगों को यह बात बुरी लग सकती है और वे इस पर आपत्ति भी कर सकते हैं.

ऐसा न हो, इस के लिए पीजी के अंदर ही एक ऐसा जोन बना दीजिए जहां आप के गैस्ट अपने दोस्त को बुला कर उन से बातचीत कर सकें. ऐसी जगहों पर कैमरा जरूर लगाएं ताकि गैस्ट और उस के दोस्त आप की नजर में रहें और कैमरे के डर से उन्हें कुछ भी गलत करने का मौका न मिले.

खाने में फीकापन हो: बहुत कम पीजी या होस्टल होते हैं जो अच्छा और घर जैसा खाना अपने गैस्ट को परोसते हैं.  सभी पीजी में गैस्ट को खाने में फीकेपन की शिकायत होती है. ऐसे में पीजी या होस्टल चलाने वालों का यह दायित्व है कि वे गैस्ट की शिकायत को दूर करें.

प्रतिभा को मुकाम मिले: सुनील शेट्टी

फिल्म ‘बलवान’ से ऐक्शन हीरो के रूप में अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले सुनील शेट्टी अपनी 3 वर्षों की खामोशी के बाद अब फिर अभिनय के मैदान में उतर चुके हैं. यही नहीं, अब वे नई प्रतिभाओं के लिए कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा के साथ वैबसाइट ‘एफ द काउच’ भी शुरू कर चुके हैं.

कास्टिंग एजेंसी वाली वैबसाइट ‘एफ द काउच’ की बात आप के दिमाग में क्या किसी घटना के कारण आई, इस सवाल पर सुनील शेट्टी कहते हैं, ‘‘मुंबई से सैकड़ों किलोमीटर दूर रह रहे बच्चे इस फिल्मनगरी में अपने सपने ले कर आते हैं, तो उन का कई तरह से शोषण होता है. उन्हें पता ही नहीं होता कि वे वहां क्यों जा रहे हैं. उन्हें यह भी पता नहीं होता कि वास्तव में कहां पर किस तरह के किरदार के लिए औडीशन हो रहे हैं. ऐसी ही प्रतिभाओं के लिए हम ने काफी सोचविचार कर यह प्लेटफौर्म तैयार किया है. यह ऐसा प्लेटफौर्म है, जहां हम पूरे देश की प्रतिभाओं को एक जगह ला रहे हैं और निर्माता इन प्रतिभाओं को देख व समझ सकते हैं.”

उन्होंने कहा कि ‘‘हमारे इस प्लेटफौर्म पर प्रतिभाओं का काम मौजूद होता है. इस से हर बच्चे को अपने टेलैंट का पता होता है. हम निर्माताओं की जरूरत को भी इस प्लेटफौर्म पर पेश कर रहे हैं, जिसे देख कर बच्चों को पता चलेगा कि किस निर्माता को किस किरदार के लिए प्रतिभा की तलाश है. जिस बच्चे में वह प्रतिभा होगी, वह अपना एक वीडियो बना कर इस प्लेटफौर्म पर डाल देगा और वह निर्माता तक पहुंच जाएगा. इस के लिए उसे सबकुछ छोड़ कर मुंबई में दरदर की ठोकरें खाने की जरूरत नहीं रहेगी.’’

अपने मूल मकसद के बारे में बताते हुए वे कहते हैं, ‘‘मुंबई से दूरदराज छोटे शहरों या कसबों में रह रहे जो बच्चे सोचते हैं कि पढ़ाई छोड़ कर मांबाप को बिना बताए भाग कर मुंबई चला जाता हूं, उन्हें हम अपनी इस एजेंसी के माध्यम से एक नई राह दिखाना चाहते हैं. हम उन्हें बताना चाहते हैं कि सबकुछ छोड़ कर मुंबई आने की जरूरत नहीं है. यह ऐसा प्लेटफौर्म है, जहां बच्चे अपना पोर्टफोलियो, अपना वीडियो वगैरा पोस्ट कर सकते हैं. यहां उन्हें इस बात की भी जानकारी मिलती रहती है कि कहां, किस तरह की प्रतिभा की जरूरत है. हमारी अपनी टीम है, जो कि इन प्रतिभाओं का आकलन कर निर्माता की मांग के अनुरूप 5 प्रतिभाओं का चयन कर उन्हें औडीशन के लिए बुलाती है.

‘‘हम बच्चों से कुछ नहीं चाहते हैं. आप हमारे इस प्लेटफौर्म को प्रतिभाओं के मिलन की जगह मान सकते हैं. हम पूरे विश्व की लोकेशनों की भी जानकारी इस प्लेटफौर्म पर दे रहे हैं, तो निर्माता को एक ही प्लेटफौर्म पर प्रतिभाओं के साथसाथ लोकेशन भी मिल जाती हैं. इस प्लेटफौर्म पर कलाकार ही नहीं, बल्कि कैमरामैन, सहायक निर्देशक, लेखक, संवाद लेखक, आर्ट डायरैक्टर से ले कर जानवरों से संबंधित जानकारी भी हम मुहैया कर रहे हैं. यानी कि हर तरह की प्रतिभाओं के साथसाथ हर तरह के फिल्मकार की हर जरूरत का हम खयाल रख रहे हैं.’’

करियर के शुरुआती दिनों के संघर्ष के याद आने पर आप ने इस तरह का प्लेटफौर्म शुरू करने के बारे में सोचा या कोई और वजह है, इस पर वे बताते हैं, ‘‘मुझे ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा. पर तब से मैं ने बहुत लोगों को संघर्ष करते, निराश होते देखा. इसलिए मुझे लगा कि एक विशाल मकसद के साथ इस तरह का प्लेटफौर्म शुरू किया जाना चाहिए. मुझे लगा कि यह एक मौका है, कुछ कर दिखाने व करने का. हमारे इस प्लेटफौर्म की खूबी यह है कि मुझे कुछ हास्य के सीन चाहिए, मैं ने सिच्युएशन दे दी और टास्क दे दिया कि इस सिच्युएशन को फिल्मा कर वीडियो भेजें. लोग बना कर भेज देंगे. मसलन, मैं ने संताबंता के जोक्स पर फिल्म मांगी तो कई वीडियो आ गए. हम इन में से कुछ बेहतरीन वीडियो को एडिट कर उस में संगीत वगैरा डाल कर कंटैंट की जरूरत रखने वालों को बेचेंगे. कंटैंट बिका, तो हम उस इंसान को अपना भागीदार बना लेंगे, वह घर बैठे कमाएगा.

‘‘हम अपनी वैबसाइट पर तमाम कंटैट डालते रहते हैं. मसलन, अभी हम ने लोगों को चुनौती दी है कि वे 3 मिनट की एक बहुत ज्यादा डरावनी फिल्म बना कर भेजें. अब लोगों की जो फिल्में आएंगी, उन में से जो काफी अच्छी होगी, उन्हें तकनीकी स्तर पर विकसित कर कंटैंट की इच्छा रखने वालों के सामने पेश कर देंगे. इस तरह हमारा यह प्लेटफौर्म कंटैंट को पैदा करने वाला, कंटैंट मुहैया करने वाला व प्रतिभाओं के लिए पैसा मुहैया करने वाला भी साबित होगा. आखिर, हमारे इस प्लेटफौर्म से कलाकार, निर्देशक, कैमरामैन, संगीतकार, लेखक, तकनीशियन सभी जुड़ रहे हैं.

‘‘हम एक नया स्टूडियो विकसित कर रहे हैं, जिस के लिए हमें कला निर्देशक की जरूरत थी. हम ने इस की जानकारी इस वैबसाइट पर दी. हमारे पास 22 कला निर्देशकों का ब्योरा आ गया. मैं ने 6-7 लोगों को बुलाया है. उन से काम करा कर देखेंगे. यदि मैं यह कहूं कि हमारा यह प्लेटफौर्म कलाकारों का, कलाकारों द्वारा, कलाकारों के लिए है, तो गलत नहीं होगा.’’

फीस के बारे में पूछने पर सुनील शेट्टी कहते हैं, ‘‘हमारी वैबसाइट पर किसी एक विभाग में काम करने के लिए आप मुफ्त में अपना रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं. एक से ज्यादा विभागों के लिए रजिस्टे्रशन करवाएंगे, तो मामूली शुल्क दे कर सदस्यता लेनी पड़ती है. आप अपना पोर्टफोलियो हमारी साइट पर डाल सकते हैं. इस से आप को अपना पोर्टफोलियो ले कर घूमने की जरूरत नहीं है. बहुत कम समय में 5 हजार लोग हमारे साथ जुड़ चुके हैं. इन में से 2 लोगों को बतौर निर्देशक हम ने काम दिया है. 6-7 लोगों को कलाकार के तौर पर काम मिल गया है. हमारे साथ मुकेश छाबड़ा जुड़े हुए हैं, जोकि फिल्मों के लिए कलाकारों का चयन करते हैं. वे हमारी वैबसाइट से जुड़ी प्रतिभाओं को महत्त्व दे रहे हैं.’’

आप की बेटी आथिया का करियर आगे नहीं बढ़ पा रहा है, इस पर वे कहते हैं, ‘‘वह पीआर की गलती के चलते गलत प्रचार का शिकार हो गई. मगर आथिया हिम्मत हारने वालों में से नहीं. उस का आत्मविश्वास जबरदस्त है. उस ने अनीस बज्मी की फिल्म ‘मुबारका’ अनुबंधित की है. 2 अन्य फिल्मों की भी बात चल रही है.’’

अब तो आप का बेटा भी अभिनय में कदम रखने वाला है, इस पर वे कहते हैं, ‘‘जी हां, मेरे बेटे अहान शेट्टी को साजिद नाडियाडवाला अपनी फिल्म में ब्रेक देने वाले हैं.’’

फिर से अभिनय में व्यस्त होने के बारे में वे कहते हैं कि वे फिल्म में अपनी उम्र के हिसाब से ही किरदार निभा रहे हैं.

जिम्मेदारी बहन की सुरक्षा की

‘‘गुडि़या, अब तुम बड़ी हो गई हो. अब तुम्हारी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी मेरी है. तुम मेरी प्यारी बहन हो. तुम्हें कोई तकलीफ होगी तो मुझे दर्द होगा,’’ सुशांत ने अपनी बहन नेहा को समझाते हुए कहा.

‘‘भाई मैं अब बड़ी हो गई हूं. अपना खयाल रख सकती हूं. आप परेशान न हों, आप भी तो मेरे से केवल 2 साल ही बडे़ हैं,’’ नेहा ने अपना तर्क दिया.

‘‘बहन, मैं जानता हूं कि तुम बड़ी हो चुकी हो. अपना खयाल रख सकती हो. फिर भी मैं हमेशा तुम्हारी रक्षा का वचन देता हूं. 2 साल ही सही पर हूं तो तुम से बड़ा न,’’ सुशांत ने बात को समझाने का प्रयास किया.

‘‘हां, मान गई भाई, तुम जीते और मैं हारी. अब चौकलेट मुझे दो और मुझे इस का स्वाद लेने दो,’’ भाई के तर्क के आगे हार मानते हुए नेहा ने कहा.

इस तरह की जिम्मेदारी भरी नोकझोंक हर घर में भाईबहन के बीच होती ही रहती है. यह नोकझोंक आज की नहीं है. हर पीढ़ी के बीच होती रही है. नई पीढ़ी की बहन को लगता है कि वह बहुत बड़ी, समझदार और जिम्मेदार हो गई है और उसे भाई की मदद की जरूरत नहीं रह गई है. इस के विपरीत भाई को यह लगता है कि उस की बहन अभी मासूम, छोटी सी गुडि़या है, जिसे समाज में अच्छेबुरे का पता नहीं है. ऐसे में वह परेशान हो सकती है. 

कई बार बड़ी होती बहन को लगता है कि सुरक्षा के नाम पर भाई या परिवार के दूसरे लोग उस की आजादी में बाधक हैं. असल में यही वह सोच है जो बहन को समझनी चाहिए. भाई या परिवार का कोई सदस्य उस की आजादी में बाधक नहीं होता. वह यह जरूर चाहता है कि लड़की के दामन पर कोई दाग न लगे, जो जीवन भर उसे परेशान करता रहे.

भावनात्मक सुरक्षा भी जरूरी

जब हम बहन की सुरक्षा की बात करते हैं तो केवल शारीरिक सुरक्षा ही मुद्दा नहीं होता बल्कि बहन की शारीरिक सुरक्षा के साथ ही साथ उस की भावनात्मक सुरक्षा भी जरूरी होती है. बड़ी होती बहन के दोस्तों में केवल लड़कियां ही नहीं होतीं लड़के भी होते हैं. इन दोस्तों में कई मासूमियत का लाभ उठाने के प्रयास में रहते हैं. बहन को लगता है कि सुरक्षा के नाम पर उस की आजादी को रोका जा रहा है. ऐसे में कई बार वह ऐसी बातों को छिपा जाती है, जो उस की सुरक्षा के लिए जरूरी होती हैं. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बहन के साथ भाई भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे. भाई और बहन के बीच उम्र का अंतर काफी कम होता है. इसलिए बहन और भाई की सोच एकजैसी होती है. कई बार बहन अपने मातापिता को कई बातें नहीं बताती पर अपने भाई को बता देती है.

मनोविज्ञानी डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘यहां पर भाई की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. वह बहन के साथ इमोशनली ऐसे व्यवहार रखे जिस से बहन हर बात उस को बताती रहे. ज्यादातर परेशानियां वहीं से शुरू होती हैं जब बच्चे अपनी बातें छिपाना शुरू करते हैं. यह केवल बहनें ही नहीं भाई भी करते हैं. जब भाई अपनी बातें बहन को बताएगा तो बहन भी उसे अपनी बातें बताने में संकोच नहीं करेगी. जरूरत इस बात की है कि बहन और भाई के बीच रिश्ता दोस्ताना भी बना रहे. अगर भाई पेरैंट्स की तरह बहन से व्यवहार करेगा तो वह बात को छिपा सकती है. दोस्त की तरह भाई संबंध रखेगा तो परेशानी नहीं आएगी. भाई को शारीरिक सुरक्षा के साथ बहन को भावनात्मक सुरक्षा भी देनी चाहिए.’’

सोच बदलने की जरूरत

लड़की और लड़के के बीच समाज एक तरह का फर्क करता है, जिस की वजह से कुछ बातें भाई के लिए उतनी बुरी नहीं समझी जातीं जितनी बहन के लिए समझी जाती हैं. इस बात को समझने के लिए देखें तो भाई की गर्लफ्रैंड को ले कर उतना हंगामा नहीं होता जितना बहन के बौयफ्रैंड को ले कर होता है.

आज जब महिला अधिकारों की बात हो रही है तो बहन भी अपने लिए भाई जैसे अधिकार चाहती है. समाज भाई की गलतियों को उस तरह से नहीं लेता जिस तरह से बहन की गलतियों को लेता है. यह समाज की एक तरह की पुरुषवादी मानसिकता है. यही वजह है कि केवल भाई ही नहीं पेरैंट्स भी बेटी को ले कर बेटे से अधिक सचेत रहते हैं. इस बात से ही लड़कियों का मतभेद होता है. वे इस सोच में भाईबहन के सामाजिक अधिकार के अंतर को ले कर विद्रोही हो जाती हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता विनीता ग्रेवाल कहती हैं, ‘‘लड़कियों के भोलेपन का लाभ उठाने वाला पुरुषवर्ग ही होता है. इस में कई बार करीबी रिश्तेदार तक शामिल होते हैं. जरूरत इस बात की है कि लड़कियों को भी यह समझाया जाए कि वे सही और गलत के फर्क को समझ सकें. हमारे समाज में सैक्स की चर्चा पूरी तरह से बेमानी मानी जाती है ़ऐसे में सैक्स को ले कर लड़कियां जागरूक नहीं होतीं, यह बात उन के लिए मुसीबत का सबब बनती है. सैक्स संबंधों को ले कर ज्यादातर लड़कियां इमोशनली ठगी जाती हैं, जिस का प्रभाव केवल उन के  जीवन पर ही नहीं पड़ता बल्कि परिवार पर भी पड़ता है. समाज सीधे सवाल करता है कि लड़की की सुरक्षा का परिवार वालों ने खयाल नहीं रखा. इस वजह से पेरैंट्स और भाई कुछ ज्यादा ही परेशान रहते हैं. अपनी आजादी के साथ लड़कियों को इस तर्क को सामने रख कर सोचना चाहिए, जिस से विद्रोह जैसे हालात से बचा जा सकता है.’’ 

खुद बनें मजबूत

समय बदल रहा है. आज लड़की को लड़के जैसे अधिकार हासिल हैं. वह भी पढ़ाई, कोचिंग, शौपिंग के लिए खुद ही जाना चाहती है. कई घरों में लड़कियों के भाई नहीं हैं, केवल पेरैंट्स ही हैं. ऐसे में हर जगह बहन की सुरक्षा में भाई नहीं मौजूद रह सकता. तब लड़कियों को खुद ही मजबूत बनना पडे़गा. केवल मानसिक  रूप से ही नहीं शारीरिक रूप से भी उसे मजबूत रहना है. यही नहीं कानून ने जो अधिकार उसे दिए हैं वे भी उसे पता होने चाहिए, जिस से पुलिस और प्रशासन से अपने लिए मदद हासिल कर सके. आज सैल्फ डिफैंस के तमाम कार्यक्रम चल रहे हैं, जिन से लड़कियां अपना बचाव कर सकें. ऐसे में जरूरी है कि लड़कियां शारीरिक मेहनत करें और खुद को मजबूत बनाएं. इस के बाद वे जरूरत पड़ने पर अपना बचाव करने में सक्षम हो सकेंगी, जिस पेरैंट्स और भाई को इस बात का यकीन होता है कि लड़की अपनी सुरक्षा खुद कर सकती है तो वह चिंतामुक्त होता है.

रैड बिग्रेड संस्था लड़कियों को आत्मरक्षा के तमाम गुण सिखाती है. संस्था की संचालक ऊषा विश्वकर्मा कहती हैं, ‘‘केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि लड़कियों को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग लेनी चाहिए. इस से कमजोर बौडी वाली लड़कियां भी मजबूत से मजबूत विरोधी को मात दे कर अपना बचाव कर सकती हैं. स्कूल, पेरैंट्स, सरकार और समाज को सहयोग कर के सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग को बढ़ावा देना चाहिए, जिस से लड़की मजबूत ही नहीं होगी, उस के अंदर का डर भी खत्म हो जाएगा.’’

ऊषा को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग देने के लिए कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. वे अपने स्तर से कई तरह की वर्कशौप कर के सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग दे रही हैं.

बढ़ाएं आपसी समझदारी

बहन की सुरक्षा भाई की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में जरूरी है कि भाईबहन के बीच आपसी समझदारी बढे़. जब दोनों के बीच आपसी समझदारी होगी तो उसे किसी भी तरह की परेशानी का अनुभव नहीं होगा. वह यह नहीं सोचेगी कि सुरक्षा के नाम पर उस की आजादी को प्रभावित किया जा रहा है. जब उस को समझाया जाएगा कि यह सुरक्षा क्यों जरूरी है, तो वह किसी बात को छिपाएगी नहीं. जब भाईबहन एकदूसरे से कुछ छिपाएंगे नहीं तो आपस में समझदारी बढ़ेगी, जिस से खुद ही सुरक्षा का एहसास होगा. सुरक्षा का यह एहसास खुद में आत्मविश्वास पैदा करेगा. आज के दौर में समाज और हालात बहुत बदल चुके हैं. ऐसे में बच्चों के बीच आपसी समझदारी जरूरी है.

अंश वैलफेयर की अध्यक्षा श्रद्धा सक्सेना कहती हैं, ‘‘बदलते दौर में भाई और बहन दोनों को समान अवसर मिले हैं. ऐेसे में जरूरी है कि वे आपसी समझदारी दिखाएं. केवल बहन पर ही नहीं अगर भाई पर भी कोई उंगली उठती है तो बहन को भी उतनी ही तकलीफ होती है. टीनएज में होने वाले क्रश का प्रभाव केवल बहन पर ही नहीं पड़ता भाई का जीवन और कैरियर भी उस से प्रभावित होता है. ऐसे में जब भाईबहन समझदारी भरा व्यवहार करते हैं आपस में बातें शेयर करते हैं तो मुसीबतों से बचे रहते हैं, कई घरपरिवार में बहन बड़ी होती है, ऐसे में वह भाई को पूरी सुरक्षा देती है. भाई केवल बहन को ही नहीं बहन भी भाई को खुश और सुरक्षित देखना चाहती है.’’ 

पैतृक संपत्ति पर बेटियों का भी समान अधिकार

टैक्सी में बैठने से पहले कविता ने ‘स्नेह विला’ को नम आंखों से देखा, गेट पर आई अपनी मां उमा  के गले लगी. बराबर में दूसरे गेट पर भी नजर डाली. दोनों भाभियों और भाइयों का नामोनिशान भी नहीं था. वे उसे छोड़ने तक नहीं आए थे. ठीक है, कोई बात नहीं, यह दिन तो आना ही था. उस के लिए भाईभाभी की उपस्थित मां की ममता और अपने कर्तव्य की पूर्ति से बढ़ कर नहीं थी. मन ही मन दिल को समझाती हुई कविता टैक्सी में बैठ सहारनपुर की तरफ बढ़ गई.

55 वर्षीया कविता अपनी मां की परेशानियों का हल ढूंढ़ने के लिए एक हफ्ते से मेरठ आई हुई थी. सुंदर व चमकते ‘स्नेह विला’ में उस की मां अकेली रहती थीं. ऊपर के हिस्से में उस के दोनों भाई रहते थे. कविता सब से बड़ी थी, कई सालों से वह देख रही थी कि मां का ध्यान ठीक से नहीं रखा जा रहा है. अब तो कुछ समय से दोनों भाइयों ने अपनीअपनी रसोई भी अलग बनवा ली थी.

आर्थ्राइटिस की मरीज 75 वर्षीया उमा अपने काम, खाना, पीना आदि का प्रबंध स्वयं करती थीं, यह देख कर कविता को हमेशा बहुत दुख होता था. कविता ने उन्हें कईर् बार अपने साथ चलने को कहा. उमा का सारा जीवन इसी घर में बीता था, यहां उन के पति मोहन की यादें थीं, इसलिए वे कुछ दिनों के लिए तो कविता के पास चली जातीं पर घर की यादें उन्हें फिर वापस ले आतीं. पर अब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा था. अब कविता के दोनों भाई उमा पर यह जोर भी डालने लगे थे कि वे आधाआधा मकान उन के नाम कर दें. उमा हैरान थी अैर यह सुन कर कविता भी हैरान हो गई थी.

बीमार उमा को कोई एक गिलास पानी देने वाला भी नहीं था जबकि मकान के बंटवारे के लिए दोनों भाई तैयार खड़े थे. कविता ने कई बार स्नेहपूर्वक भाइयों को मां का ध्यान रखने को कहा, तो उन्होंने दुर्व्यवहार करते हुए अपशब्द कहे, ‘इतनी ही चिंता है तो मां को अपने साथ ले जाओ, उन की देखभाल करना, तुम्हारा भी तो फर्ज है.’

कविता ने अपने पति दिनेश से बात की. कविता ने तय किया कि वह लालची भाइयों को सबक सिखा कर रहेगी. एक वकील से मिलने के बाद पता चला कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, जिस में 9 सितंबर, 2005 से संशोधन हुआ है, के अनुसार, पिता की संपत्ति पर विवाहित बेटी का भी पूरा हक है. उसे संपत्ति का कोई लालच नहीं था. उसे व उस के पति दिनेश के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. वह अपने भाइयों को इस तरह सबक सिखाना चाहती थी कि वे मां का ध्यान रखें. उस ने फोन पर भाइयों से कहा, ‘‘ठीक है, मैं मां को अपने पास ले आऊंगी पर मुझे भी मकान में हिस्सा चाहिए.’’

दोनों भाइयों को सांप सूंघ गया, बोले, ‘‘तुम्हें क्या कमी है जो मायके का मकान चाहिए?’’ ‘‘क्यों, मैं मां की सेवा कर सकती हूं तो अपना हिस्सा क्यों नहीं ले सकती? यह तो अब मेरा कानूनन हक भी है. फिर मेरा मन कि मैं अपना हिस्सा बेचूं या उस में कोई किराएदार रखूं. मैं ने वकील से बात कर ली है, जल्दी ही कागजात बनवा कर तुम्हें कानूनी नोटिस भिजवाऊंगी.’’

कविता ने अपने मन की बात मां को बता दी थी. दोनों भाइयों का गुस्से के मारे बुरा हाल था. उन्होंने पड़ोसियों, रिश्तेदारों में जम कर कविता की बुराई करनी शुरू कर दी. लालची, खुदगर्ज बेटी को मकान में हिस्सा चाहिए. दोनों भाइयों ने काफी देर सोचा कि 3 हिस्से हो गए तो नुकसान ही नुकसान है और अगर कविता ने अपना हिस्सा बेच दिया तो और बुरा होगा.

दोनों भाई अपनी पत्नियों के साथ विचारविमर्श करते रहे. तय हुआ कि इस से अच्छा है कि मां की ही देखभाल कर ली जाए. दोनों ने मां से माफी मांग कर उन की हर जिम्मेदारी उठाने की बात की. दोनों ने मां के पास जा कर अपनी गलती स्वीकारी. उमा के दिल को बहुत संतोष मिला कि उन का शेष जीवन अपने घर में चैन से बीत जाएगा. कविता को भी अपने प्रयास की सफलता पर बहुत खुशी हुई. वह यही तो चाहती थी कि मां अपने घर में ससम्मान रहें, इसलिए वह मकान में हिस्से की बात कर बैठी थी. अगर कारण कोई और भी होता तो भी अपना हिस्सा मांगने में कोई बुराई नहीं थी.

दरअसल, जब कानून ने एक लड़की को हक दे दिया है तो पड़ोसी, रिश्तेदार इस मांग की निंदा करने वाले कौन होते हैं? आज जब कोई बेटी ससुराल में रह कर भी मातापिता के प्रति अपने कर्तव्य याद रखती है तो मायके की संपत्ति में उस को अपना हिस्सा मांगना बुरा क्यों समझा जाता है? और वह भी तब जब कानून उस के साथ है.

हिंदू उत्तराधिकार संशोधित अधिनियम 2005 के प्रावधान में यह साफ किया गया है कि पिता की संपत्ति पर एक बेटी भी बेटे के समान अधिकार रखती है. हिंदू परिवार में एक पुत्र को जो अधिकार प्राप्त हैं, वे अब बेटियों को भी समानरूप से मिलेंगे. यह प्रस्ताव 20 दिसंबर, 2004 से पहले हुए संपत्ति के बंटवारे पर लागू नहीं होगा.

गौरतलब है कि हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 में बेटी के लिए पिता की संपत्ति में किसी तरह के कानूनी अधिकार की बात नहीं कही गई. बाद में 9 सितंबर, 2005 को इस में संशोधन कर पिता की संपत्ति में बेटी को भी बेटे के बराबर अधिकार दिया गया. इस में कानून की धारा 6 (5) में स्पष्टरूप से यह लिखा है कि इस कानून के पास होने के पूर्व में हो चुके बंटवारे इस नए कानून से अप्रभावित रहेंगे.

कानून की नजर में ‘संपत्ति के उत्तराधिकार’ के मामले में भले ही बेटे व बेटी में कोई भेद न हो परंतु क्या बेटियां यह हक पा रही हैं? और अगर नहीं, तो क्या वे अपने पिता या भाई से अपने हक की मांग सामने भी रख पा रही हैं? बेटियों के अधिकार के प्रति सामाजिक रवैया शायद ठीक नहीं है.

सामाजिक मानसिकता

हमारा तथाकथित सभ्य समाज, जो सदियों से रूढि़वादी परंपराओं के बोझ तले दबा हुआ है, आसानी से पैतृक संपत्ति पर बेटियों के हक को बरदाश्त नहीं कर पा रहा है. जहां बचपन से पलती हुई हर बेटी के मन में कूटकूट कर ये विचार विरासत में दिए जाते हों कि तुम पराए घर की हो, इस घर में किसी और की अमानत हो,

यह घर तुम्हारे लिए सिर्फ रैनबसेरा है, उस घर की बेटी इसी को मान बंटवारे की मानसिकता से कोसों दूर रहती है. खासकर, अपनी शादी के बाद पहली बार मायके आने पर वह खुद को मेहमान समझ इस तथ्य को स्वीकार कर लेती है कि अब उसे मायके से रस्मोरिवाज के नाम पर कुछ उपहार तो मिल सकते हैं, पर संपत्ति में बराबरी का हक कदापि नहीं.

आज भी महिलाएं पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगने में हिचकती हैं. इंदौर में रह रही 2 बेटियों की मां शैलजा का कहना है कि इस में दोराय नहीं है कि पैतृक संपत्ति में बेटियों का भी हक दिए जाने से उन की स्थिति में सुधार होगा, पर खुद उन के लिए अपने पिता या भाई से संपत्ति में हक मांगना थोड़ा सा मुश्किल है, क्योंकि इस से अच्छेभले चलते रिश्तों में भी दरार आ सकती है.

देश की राजधानी दिल्ली की तमाम औरतों व लड़कियों से की गई बातचीत में सभी ने लगभग यही बताया कि कानून भले ही एक झटके में हमें बराबरी का हक दे दे लेकिन समाज में बदलाव एकाएक नहीं आते. यही वजह है कि वास्तविकता के धरातल पर इस फर्क को दूर होने में कुछ समय लगेगा. हमारा समाज संपत्ति के नाम पर भाईभाई में हुए झगड़े या फसाद को तो सामान्यरूप में ले सकता है, परंतु एक बहन के यही हक जताने पर उसे घोर आपत्ति होगी.

सुप्रीम कोर्ट के महत्त्वपूर्ण निर्णय

पिता की संपत्ति में बेटियों के हक के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय सर्वोच्च अदालत द्वारा किया गया, जिस में उस ने कहा कि एक इंसान मरने के बाद अपना फ्लैट अपने बेटे या पत्नी को देने के बजाय अपनी शादीशुदा बेटी को भी दे सकता है.

कोर्ट ने यह फैसला बिस्वा रंजन सेनगुप्ता के मामले में सुनाया. इस केस में बिस्वा रंजन द्वारा अपनी शादीशुदा बेटी इंद्राणी वाही को कोलकाता के सौल्ट लेक सिटी में पूर्वांचल हाउसिंग स्टेट की मैनेजिंग कमेटी के फ्लैट का मालिकाना हक दिया गया. जिस पर कड़ी आपत्ति लेते हुए उन के बेटे और पत्नी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सोसाइटी के रजिस्ट्रार ने भी रंजन की बेटी का नाम उत्तराधिकारी के रूप में दर्ज करने से मना कर दिया था.

उपरोक्त मामले में बिस्वा रंजन अपनी पत्नी और बेटे के दुर्व्यवहार के कारण अपनी शादीशुदा बेटी के पास रह रहे थे. प्रतिवादी पक्षकारों द्वारा यह दावा किया गया कि संपत्ति के मालिक ने मकान के अंशधारकों व वारिस की सूची में सिर्फ पत्नी व बेटे को शामिल किया है, इसलिए वह बेटी को मकान का उत्तराधिकारी घोषित नहीं कर सकता है. साथ ही, उत्तराधिकार नियमों के मुताबिक भी वादी के बेटे और पत्नी उक्त संपत्ति में अपनी हिस्सेदारी का दावा कर सकते हैं क्योंकि बेटे को पिता की संपत्ति में हक लेने का कानूनी अधिकार प्राप्त है. पक्षकारों की तीसरी दलील बेटी के शादीशुदा होने की थी.

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर कहा कि अव्वल तो बेटा और पत्नी विवादित मकान को पैतृक संपत्ति नहीं कह सकते हैं क्योंकि यह प्रतिवादी ने खुद खरीदी थी. इसलिए इसे उत्तराधिकार के दायरे में नहीं रख सकते. जहां तक सोसाइटी ऐक्ट के प्रावधानों का सवाल है तो अदालत ने कहा कि संपत्ति के मालिक ने पत्नी और बेटे के गैर जिम्मेदाराना रवैए से तंग आ कर संपत्ति का उत्तराधिकार बेटी को दिया है. खरीदारी के समय नौमिनी बनाना इस बात का पुख्ता आधार नहीं है कि वे ही उत्तराधिकारी हैं. मालिक के चाहने पर नौमिनी कभी भी बदला जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानून के अलावा सामाजिक लिहाज से भी बेटियों के लिए खासा महत्त्व रखता है.

एक अन्य फैसले में अक्तूबर 2011 में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा और जगदीश सिंह खेहर ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधित) अधिनियम 2005 के तहत बेटियां अन्य पुरुष सहोदरों के बराबर का अधिकार रखती हैं. उन्हें बराबरी से अपना उत्तरदायित्व भी निभाना पड़ेगा. इस फैसले में यह भी कहा गया कि अगर बेटियों को बेटों के बराबर उत्तराधिकार नहीं दिया जाता तो यह संविधान द्वारा दिए गए समानता के मौलिक अधिकारों का हनन भी होगा, और दूसरी ओर यह सामाजिक न्याय की भावना के भी विरुद्ध है.

पिता की संपत्ति पर बेटी के  अधिकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य फैसला सुनाते हुए इसे सीमित भी कर दिया है. कोर्ट ने कहा है कि अगर पिता की मृत्यु 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून के संशोधन से पहले हो चुकी है, तो ऐसी स्थिति में बेटियों को संपत्ति में बराबर का हक नहीं मिल सकता.

वैसे, देखा जाए तो इस नियम के लागू होने के बाद महिलाओं की स्थिति समाज में सुधार की तरफ बढ़ चली है. कानूनी रूप से हुआ यह बदलाव निश्चित ही औरत व आदमी के बीच अधिकारों की समानता की बात करता है. इस का फायदा हमें जल्दी ही निकट भविष्य में देखने

को मिलेगा जब महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन समाज व देश की प्रगति में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकेंगी.      

– पूनम पाठक और पूनम अहमद

न्यूड मौडल : आसान नहीं राह

आर्ट कालेज में चित्रकला के पाठ्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण विषय है न्यूड स्टडी. मानव शरीर की पेंटिंग या स्कैच बनाने के लिए शरीर की तमाम बारीकियों को जानना जरूरी है. महिला और पुरुष के शरीर के तमाम उतारचढ़ाव, उस का गठन, अलगअलग होते हैं. आर्ट कालेज में गठनगत बारीकियों का अध्ययन लाइफ स्टडी कहलाता है. इस के अलावा अलगअलग शारीरिक भावभंगिमाओं का भी अध्ययन लाइफ स्टडी या न्यूड स्टडी में शामिल है. इस के लिए आमतौर पर एक जीतेजागते नग्न पुरुष या नग्न महिला मौडल की मदद ली जाती है. तब न्यूड स्टडी होती है.

एक समय था जब लाइफ  स्टडी के लिए मौडल मिलने मुश्किल हुआ करते थे. अब इस पेशे में जो भी लड़कियां या औरतें आती हैं, वे परिवार और समाज से छिप कर आती हैं और आमतौर पर गरीब घरों से होती हैं. ये मजबूरी में पेशे में आती हैं. कोलकाता आर्ट कालेज में बतौर न्यूड मौडल काम करने वाली कुछ गिनीचुनी ही मौडल हैं.

लतिका कर्मकार (बदला हुआ नाम) कोलकाता के चित्रकारों के लिए न्यूड पोज देने वाली मौडल है. वह एक निजी कंपनी में चायपानी पिलाने का काम करती है. कभीकभार कोलकाता के कुछ चित्रकारों के लिए न्यूड पोज भी देती है. पर यह काम लतिका किसी छुट्टी वाले दिन ‘प्राइवेटली’ ही करती है. वह बताती है कि मौडलिंग की एक सिटिंग में उसे 1,000-5,000 रुपए मिल जाते हैं. उस के घर पर मातापिता के साथ उस की एक बेटी है. उस का पति 5 महीने की बेटी के साथ उसे छोड़ कर जा चुका है. पिता निजी कंपनी के दफ्तर में चपरासी थे. अब रिटायर्ड हैं. अपना और अपनी बेटी का खर्च चलाने के लिए वह एक निजी कंपनी में काम करती है. किसी पेंटर के आमंत्रण पर वह न्यूड पोज देती है.

बीना पुरकायस्त (बदला हुआ नाम) भी एक न्यूड मौडल है. और इस काम का उसे बहुत लंबा अनुभव है. 19 साल की उम्र से वह न्यूड पोज देती आ रही है. इस पेशे में उसे 23 साल हो गए हैं. बंगाल के कई नामीगिरामी पेंटरों के लिए उस ने न्यूड पोज दिए हैं. बीना का मानना है कि यह काम बहुत कठिन होता है. कई बार एकजैसे पोज में बैठे रहने पर पैर सुन्न हो जाते हैं. आमतौर पर पेंटर मौडल को बीचबीच में 15 मिनट का ब्रैक देते हैं.

वह बताती है कि कई बार आर्टिस्ट अपने काम में कुछ इतने मगन हो जाते हैं कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि एक जीताजागता इंसान एक ही भावभंगिमा में कितनी देर तक बैठे रह सकता है. वहीं, वह यह भी बताती है कि अगर पोज देते हुए मौडल सकुचाए, शर्माए, हिलतीडुलती रहे तो ऐसी मौडलों को अगली बार काम मिलने में परेशानी होती है. कभीकभी आर्टिस्ट की सहूलियत के अनुसार मौडल को बारबार पोज बदलना भी पड़ता है. वह बताती है कि आजकल एस्कौर्ट के पेशे में आई लड़कियां भी न्यूड पोज देने को तैयार हो जाती हैं. लेकिन इस के लिए वे मोटा मेहनताना वसूलती हैं. इसीलिए, आम न्यूड मौडल की अब भी मांग है.

कोलकाता के जानेमाने आर्टिस्ट जोगेन चौधुरी कहते हैं कि हमारे देश में न्यूड स्टडी का चलन यूरोपीय पेंटिंग के प्रभाव में शुरू हुआ. वे कहते हैं, ‘‘मजेदार बात यह है कि हमारे देश में जब किसी पुरुष मौडल को न्यूड स्टडी के लिए बुलाया जाता है तो वह पूरी तरह से निर्वस्त्र नहीं होता है.’’ महिला मौडल को ज्यादातर न्यूड पोज देना होता है, ऐसा क्यों? उन का कहना है कि कला और नारीदेह सौंदर्य की दृष्टि से न्यूड पुरुष मौडल की अपेक्षा महिला मौडल कहीं अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं.

आर्ट कालेज में अपने पहली लाइफ स्टडी के बारे में बताते हुए जोगेन चौधुरी अपनी फाइन आर्ट के तीसरे वर्ष की छात्रावस्था के दिनों में लौट जाते हैं. ‘न्यूड स्टडी की वह पहली क्लास थी. बहुत तनाव में थे सारे छात्र. क्लास में एक दुबलीपतली 14-15 साल की मौडल आई. क्लास के बाहर उस के मातापिता बैठे थे. हमारे प्रोफैसर थे देवकुमार राय चौधुरी, लाइफ स्टडी के विशेषज्ञ. हाल ही में इटली से लौटे थे. क्लास में केवल प्रोफैसर ही मौडल के बदन को हाथ लगा सकते थे. लड़की के बदन को छू कर प्रोफैसर ने उस के पोज को ठीक किया.’

जोगेन बताते हैं कि मौडल की मनोस्थिति को वे बखूबी समझ रहे थे. इसीलिए उन्हें उस की चिंता भी हो रही थी कि इतने सारे लड़कों के सामने बेचारी मौडल कैसे न्यूड बैठेगी? कितनी देर तक बैठना होगा? मन ही मन उस के प्रति बड़ी सहानुभूति हो रही थी. पर किया कुछ नहीं जा सका. 5 सालों के पाठ्यक्रम में बीचबीच में लाइफ  स्टडी चलती रही.

वे यह भी बताते हैं कि उस समय मौडल मिलना बहुत मुश्किल होता था. ज्यादातर बदनाम गलियों की लड़कियां या औरतें इस काम के लिए उपलब्ध हो पाती थीं. गौरतलब है कि जोगेन चौधुरी की एक विख्यात लाइफ  स्टडी है – सुंदरी. यह पेंटिंग ललित कला अकादमी से प्रकाशित हुई थी. पर आज यह आउट औफ  प्रिंट है. बंगाल के बहुत सारे पेंटर न्यूड स्टडी में महारतप्राप्त हैं. उन की न्यूड स्टडी की शैली भी अलगअलग हैं. प्रकाश कर्मकार ‘इरोटिक’ न्यूड पेंटिंग के लिए जाने जाते हैं तो परितोष सेन क्युबिस्टिक शैली के लिए.

एलिना बनिक कोलकाता की जानीमानी पेंटर हैं. आर्ट कालेज में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि यह उन दिनों की बात थी जब उन्होंने स्कूल से सीधे आर्ट कालेज में दाखिला लिया था. लाइफ  स्टडी की क्लास में महिला और पुरुष मौडल के बीच होने वाले भेदभाव को ले कर वे अकसर मुखर हो जाया करती थीं.

वे कहती हैं कि पुरुषदेह के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था. समझ भी नहीं थी. लेकिन एक बार बहस के दौरान सहपाठी मित्र ने आ कर कान में झल्लाते हुए कहा कि पुरुष मौडल पूरी तरह से न्यूड नहीं हो सकता है. अरे, पुरुषांग कभी भी हिलडुल सकता है. एलिना को बात समझ नहीं आई और वे अपनी बात पर अड़ी रहीं कि महिला मौडल की तरह पुरुष मौडल को भी पूरी तरह से न्यूड रहना होगा और वह दिन तकरार में ही बीत गया. आज इस बात को याद कर के वे मुसकरा देती हैं.

बहरहाल, यह तो हुई लाइफ स्टडी में एक महिला पेंटर के सामने आने वाली दिक्कतों की बात. इसी तरह महिला मौडल भी कई तरह की परेशानियों से जूझती हैं. यहां कुछेक घटनाओं का जिक्र जरूरी समझती हूं ताकि समझा जा सके कि ये मौडल किस तरह की विपरीत परिस्थितियों में काम करती हैं.

नारीदेह की समस्याएं

कोलकाता आर्ट कालेज. एक बड़े कमरे में बहुत सारे आर्ट स्टूडैंट्स अपनेअपने कैनवस के साथ तैयार बैठे हैं. यह क्लास न्यूड स्टडी की है. क्लास में केवल एक स्टूडैंट लड़की के अलावा बाकी सभी लड़के हैं. क्लास चालू है. क्लास में एक नग्न महिला एक खास भावभंगिमा में बैठी है. उसे देखदेख कर स्टडी करने के साथ स्केचिंग की क्लास जारी है. अचानक क्लास में मौजूद लड़की ने देखा कि मौडल के लिए अपनी भावभंगिमा के साथ बुत बन कर बैठे रहना संभव नहीं हो पा रहा है. वह कुछकुछ सकुचा सी रही है, सिमटती चली जा रही है.

आमतौर पर स्टडी क्लास में नियमानुसार मौडल को बुत बन कर बैठे रहना होता है. कहीं कुछ तो था कि मौडल सामान्य आचरण नहीं कर पा रही थी. और उस के सकुचानेसिमटने से क्लास में बैठे स्टूडैंट्स एक हद तक परेशान व नाराज हो रहे थे. पर मौडल थी कि बारबार भावभंगिमा से डिगती चली जा रही थी. ऐसे में तमाम स्टूडैंट्स के साथ क्लास में बैठी लड़की उठती है और मौडल के पास जाती है. कुछ देर मौडल के साथ फुसफुसाने के बाद वह लौट कर आती है और क्लास के तमाम स्टूडैंट्स से मुखातिब हो कर कहती है, ‘तुम लोग जरा क्लास से बाहर जाओ.’

क्लास के स्टूडैंट्स भौचक रह जाते हैं और कुछ तो झल्ला तक जाते हैं. ‘क्यों, अब क्या हुआ? पहले ही इतना समय बरबाद हो चुका है.’

क्लास की वह स्टूडैंट बौखला कर अपने साथी स्टूडैंट को डपटते हुए कहती है, ‘मैं ने कहा, तुम लोग अभी क्लास से बाहर जाओ, तो बाहर जाओ, बिना बहस किए.’ धीरेधीरे क्लास खाली हो गई. इस के बाद उस लड़की ने क्लास का दरवाजा बंद किया.

दरअसल, निर्वस्त्र मौडल का अचानक पीरियड शुरू हो गया था. और ऐसे में वह अपनी लज्जा को भला कैसे ढकती. वहीं, क्लास में मौजूद इतनी सारी निगाहें केवल उस पर और उसी पर टिकी हुई थीं. इस कारण वह अपनी भावभंगिमा के साथ बुत बन कर बैठी नहीं रह पा रही थी. जाहिर है, उस दिन न्यूड स्टडी की क्लास नहीं हुई. मौडल अपने घर लौट गई.

मुश्किलभरा पेशा

एक न्यूड मौडल को अपने पेशे के लिए काम करते हुए क्याक्या नहीं करना पड़ता है. वाकेआ ऋतुपर्णो घोष की फिल्म ‘चोखेर बाली’ का भी है. कहानी की मांग पर शूटिंग के दौरान एक न्यूड मौडल की जरूरत पड़ी. दरअसल, फिल्म का सहनायक महेंद्र डाक्टरी पढ़ रहा था. एनोटौमी के क्लास का एक दृश्य था, जिस में एक मृतक महिला को टेबल पर सोना था. फिल्म के सहयोगी कला निर्देशक को एक न्यूड मौडल की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी दी गई. एक मौडल मिली, पर इस शर्त पर कि फिल्म में किसी भी सूरत में उस का चेहरा न दिखाया जाए और वह मौडल थी कांचन मित्रा (बदला हुआ नाम). कांचन कहती है कि मृत शरीर यानी मृतक को मेकअप की कोई जरूरत नहीं थी लेकिन एनोटौमी की क्लास दिखानी थी तो मौडल के लिए मृतक का मेकअप जरूरी था. मृत दिखाने के लिए मौडल के शरीर का मेकअप करवाया गया. यह मौडल के लिए सब से कठिन काम था. वहीं, फिल्म में लाइट की एक अहम भूमिका होती है. किस एंगल से कितनी रोशनी मृतक के शरीर पर पड़नी चाहिए, ताकि फिल्मांकन अच्छा हो, इस की जांच के लिए मौडल को बारबार मेकअप कर के एनोटौमी टेबल पर सोना जरूरी था. उस के नग्न शरीर को बारबार टचअप करना जरूरी हो जाता था. जाहिर है न्यूड मौडल को बहुत परेशानी पेश आ रही थी.

कांचन को 4 बजे घर जाना था. लेकिन शूटिंग अभी पूरी नहीं हुई थी. और उस के बेटे के स्कूल से आने का समय हो रहा था. कांचन ने सोचा था कि मृत शरीर की शूटिंग होनी है, इस में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा पर सुबह से ले कर 4 बज गए. ऋतुपर्णो घोष को जब पता चला कि मौडल घर जाना चाहती है तो वे एकदम से उखड़ गए. आखिर मौडल को छुट्टी नहीं मिली. काम पूरा होने के बाद ही उसे घर जाने दिया गया.

कुल मिला कर मौडलिंग पेशे की यह लाइन यानी न्यूड मौडलिंग अपना कर पैसा कमाना बहुत ही मुश्किलभरा काम है. वैसे, प्रकाशन या प्रसारण में मौडल का चेहरा तो नहीं दिखाया जाता लेकिन शूटिंग के दौरान स्टूडैंट्स, संबंधित विज्ञापन या फिल्म की यूनिट के सदस्य तो मौडल को साक्षात देखते ही हैं. बहरहाल, महिलाओं के लिए यह भी एक पेचीदा व अजीबोगरीब पेशा है.

गिरगिट की तरह रंग बदलते संजय गुप्ता

फिल्म ‘काबिल’ के निर्देशक संजय गुप्ता काफी खुश हैं. उनकी खुशी की वजह यह है कि फिल्म ‘काबिल’ की वजह से वह सुर्खियों में नहीं छा पा रहे थे, मगर बंद होते स्टूडियो पर खुशी जाहिर कर वह सुर्खियों में छा गए हैं. मगर उनके इसी बयान की वजह से बौलीवुड में उनकी गिनती गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले फिल्मकारों में हो रही है.

मजेदार बात यह है कि बंद होते स्टूडियो पर खुशी जाहिर करने वाले संजय गुप्ता फिल्म ‘‘काबिल’’ के निर्माता राकेश रोशन के बयानों पर चुप हैं. राकेश रोशन के अनुसार संजय गुप्ता हर सीन फिल्माने के बाद पहले राकेशरोशन को दिखाते थे. राकेश रोशन जब उसे ओके  करते थे, तभी वह आगे बढ़ते थे. अन्यथा राकेश रोशन के कहने पर वह उस सीन में बदलाव करते थे.

जबकि अपनी पिछली नाकामयाब फिल्म ‘‘जज्बा’’ तक हर फिल्म को स्टूडियो के साथ बनाते आ रहे संजय गुप्ता कल तक स्टूडियो सिस्टम व कारपोरेट कंपनियों की तारीफों के पुल बांधते हुए नहीं थकते थे. पर जब ‘काबिल’की वजह से सुर्खियां नहीं मिली, तो बंद होते स्टूडियों पर खुशी जाहिर कर सुर्खियां बटोर रहे हैं.

फिल्म ‘‘जज्बा’’ के प्रदर्शन से पहले स्टूडियो सिस्टम व कारपोरेट कंपनियों की तारीफ करते हुए संजय गुप्ता ने हमसे कहा था-‘‘हम हर फिल्म किसी न किसी स्टूडियो के साथ ही बनाते आए हैं. हमने अतीत में ‘बालाजी टेलीफिल्म्स’ और ‘इरोज इंटरनेशनल’ के साथ फिल्में बनायी हैं. अब ‘एस्सेल विजन’ हमारे लिए ‘वन स्टापशॉप’ है. इस कंपनी की शुरुआत ढाई सो करोड़ रूपए से हुई है. ‘बालाजी टेली फिल्मस’ या ‘इरोज इंटरनेशनल’के साथ मिलकर जो फिल्में बनायी थीं. वहां भी कंटेट को लेकर समस्या कभी नहीं हुई. पर हर इंसान काम करने के लिए ज्यादा से ज्यादा कम्फर्ट जोन तलाशता है. मुझे यह मानने में कोई संकोच नही कि तमाम कारपोरेट कंपनियों ने ‘एस्सेल वीजन’ के नितिन केणी के बनाए फार्मूले पर बाद में काम किया.’’

कारपोरेट सिस्टम की वजह से क्रिएटीविटी को नुकसान को गलत ठहराते हुए उस वक्त संजय गुप्ता ने कहा था-‘‘यह कहना गलत है कि कारपोरेट कंपनियों व स्टूडियो के चलते क्रिएटीविटी को नुकसान हो रहा है. क्रिएटिव नुकसान उन लोगों का होता हैं, जिन्हें हम उतनी छूट देते हैं. फिल्म की शूटिंग के दौरान सारे निर्णय मेरे अपने होते हैं.’’

पर अब संजय गुप्ता कहते हैं-‘‘स्टूडियो के बंद होने से हम खुश हैं. पहले निर्माता फिल्म बनाता और वितरक उसे प्रदर्शित करता था. अब बीच में 600 लोगों की टीम के साथ यह कारपोरेट कंपनियां आ गयी हैं. तब से मुनाफा कम हो गया है. मैं इन स्टूडियो के बंद होने से खुश हूं.’’

वाह क्या बात है..संजय गुप्ता, कल तक जब कारपोरेट कंपनियों के गुण गा रहे थे, तब मुनाफा कम नहीं हो रहा था.

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