Trust Broken : कहीं मेरे पति का अफेयर तो नहीं चल रहा, मैं कैसे पता लगाऊं ?

Trust Broken : अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं 25 वर्षीय विवाहिता हूं. विवाह को 5 साल हुए हैं. एक 3 वर्ष की बेटी है. कुछ महीनों से मेरे पति घरपरिवार से काफी उदासीन रहने लगे थे. मुझे लगा कि शायद औफिस में काम का अधिक बोझ होगा. फिर जब वे अकसर घर देर से लौटने लगे और बेवजह मुझ से लड़नेझगड़ने लगे तब मुझे शक हुआ. बारबार कुरेदने पर एक दिन सचाई उन की जबान पर आ ही गई. उन का अपनी एक सहकर्मी जो कुंआरी है, से चक्कर चल रहा है. जब से इस राज का पता चला है हमारा रोज झगड़ा होने लगा है. मन करता है कि आत्महत्या कर लूं पर बेटी की वजह से ऐसा नहीं कर सकती. क्या मेरी समस्या का कोई समाधान है?

जवाब-

आप की शादी को अभी ज्यादा समय नहीं बीता है, बावजूद इस के आप के पति आप से विमुख हो किसी और युवती के चक्कर में पड़ गए हैं. लगता है बेटी हो जाने के बाद आप उस के पालनपोषण में इतनी व्यस्त हो गईं कि पति की ओर से बिलकुल उदासीन होती गईं. यह सही है कि छोटे बच्चे की परवरिश भी काफी बड़ी जिम्मेदारी होती है पर इस के चलते पति की अनदेखी करना भी गलत है. जो हुआ सो हुआ. अब आप पति से लड़ाईझगड़ा करने के बजाय उन पर ध्यान दें. उन्हें भरपूर प्यार दें ताकि उन का उस युवती से मोहभंग हो जाए और वे आप के पास लौट आएं.

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रात के 10 बज रहे थे. 10वीं फ्लोर पर स्थित अपने फ्लैट से सोम कभी इस खिड़की से नीचे देखता तो कभी उस खिड़की से. उस की पत्नी सान्वी डिनर कर के नीचे टहलने गई थी. अभी तक नहीं आई थी. उन का 10 साल का बेटा धु्रव कार्टून देख रहा था. सोम अभी तक लैपटौप पर ही था, पर अब बोर होने लगा तो घर की चाबी ले कर नीचे उतर गया.

सोसाइटी में अभी भी अच्छीखासी रौनक थी. काफी लोग सैर कर रहे थे. सोम को सान्वी कहीं दिखाई नहीं दी. वह घूमताघूमता सोसाइटी के शौपिंग कौंप्लैक्स में भी चक्कर लगा आया. अचानक उसे दूर जहां रोशनी कम थी, सान्वी किसी पुरुष के साथ ठहाके लगाती दिखी तो उस का दिमाग चकरा गया. मन हुआ जा कर जोर का चांटा सान्वी के मुंह पर मारे पर आसपास के माहौल पर नजर डालते हुए सोम ने अपने गुस्से पर कंट्रोल कर उन दोनों के पीछे चलते हुए आवाज दी, ‘‘सान्वी.’’

सान्वी चौंक कर पलटी. चेहरे पर कई भाव आएगए. साथ चलते पुरुष से तो सोम खूब परिचित था ही. सो उसे मुसकरा कर बोलना ही पड़ा, ‘‘अरे प्रशांत, कैसे हो?’’

प्रशांत ने फौरन हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया, ‘‘मैं ठीक हूं, तुम सुनाओ, क्या हाल है?’’

सोम ने पूरी तरह से अपने दिलोदिमाग पर काबू रखते हुए आम बातें जारी रखीं. सान्वी चुप सी हो गई थी. सोम मौसम, सोसाइटी की आम बातें करने लगा. प्रशांत भी रोजमर्रा के ऐसे विषयों पर बातें करता हुआ कुछ दूर साथ चला. फिर ‘घर पर सब इंतजार कर रहे होंगे’ कह कर चला गया.

Kahaniyan : वह चालाक लड़की – क्या अंजुल को मिल पाया उसका लाइफ पार्टनर

Kahaniyan : रोज की तुलना में अंजुल आज जल्दी उठ गई. आज उस का औफिस में पहला दिन है. मास मीडिया स्नातकोत्तर करने के बाद आज अपनी पहली नौकरी पर जाते हुए उस ने थोड़ा अधिक परिश्रम किया. अनुपम देहयष्टि में वह किसी से उन्नीस नहीं.

सभी उस की खूबसूरती के दीवाने थे. अपनी प्रखर बुद्धि पर भी पूर्ण विश्वास है. अपने काम में तीव्र तथा चतुर. स्वभाव भी मनमोहक, सब से जल्दी घुलमिल जाना, अपनी बात को कुशलतापूर्वक कहना और श्रोताओं से अपनी बात मनवा लेना उस की खूबियों में शामिल है. फिर भी उस ने यह सुन रखा है कि फर्स्ट इंप्रैशन इज द लास्ट इंप्रैशन. तो फिर रिस्क क्यों लिया जाए भले?

मचल ऐडवर्टाइजिंग ऐजेंसी का माहौल उसे मनमुताबिक लगा. आबोहवा में तनाव था भी और नहीं भी. टीम्स आपस में काम को ले कर खींचातानी में लगी थीं किंतु साथ ही हंसीठिठोली भी चल रही थी. वातावरण में संगीत की धुन तैर रही थी और औफिस की दीवारों पर लोगों ने बेखौफ ग्राफिटी की हुई थी.

अंजुल एकबारगी प्रसन्नचित्त हो उठी. उन्मुक्त वातावरण उस के बिंदास व्यक्तित्व को भा गया. उस की भी यही इच्छा थी कि जो चाहे कर सकने की स्वतंत्रता मिले. आज तक  अपने जीवन को अपने हिसाब से जीती आई थी और आगे भी ऐसा ही करने की चाह मन में लिए जीवन के अगले सोपान की ओर बढ़ने लगी.

बौस रणदीप के कैबिन में कदम रखते हुए अंजुल बोली, ‘‘हैलो रणदीप, आई एम अंजुल, योर न्यू इंप्लोई.’’ उस की फिगर हगिंग यलो ड्रैस ने रणदीप को क्लीन बोल्ड कर दिया. फिर ‘‘वैलकम,’’ कहते हुए रणदीप का मुंह खुला का खुला रह गया.

अंजुल को ऐसी प्रतिक्रियाओं की आदत थी. अच्छा लगता था उसे सामने वाले की ऐसी मनोस्थिति देख कर. एक जीत का एहसास होता था और फिर रणदीप तो इस कंपनी का बौस है. यदि यह प्रभावित हो जाए तो ‘पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में’ वाली कहावत को चिरतार्थ होते देर नहीं लगेगी. वैसे रणदीप करीब 40 पार का पुरुष था, जिस की हलकी सी तोंद, अधपके बाल और आंखों के नीचे काले घेरे उसे आकर्षक की परिभाषा से कुछ दूर ही रख रहे थे.

अंजुल अपना इतना होमवर्क कर के आई थी कि उस का बौस शादीशुदा है. 1 बच्चे का बाप है, पर जिंदगी में तरक्की करनी है तो कुछ बातों को नजरअंदाज करना ही होता है, ऐसी अंजुल की सोच थी.

अपने चेहरे पर एक हलकी स्मित रेखा लिए अंजुल रणदीप के समक्ष बैठ गई. उस का मुखड़ा जितना भोला था उस के नयन उतने ही चपल दिल मोहने की तरकीबें खूब आती थीं.

रणदीप लोलुप दृष्टि से उसे ताकते हुए कहने लगा, ‘‘तुम्हारे आने से इस ऐजेंसी में और भी बेहतर काम होगा, इस बात का मुझे विश्वास है. मुझे लगता है तुम्हारे लिए मीडिया प्लानिंग डिपार्टमैंट सही रहेगा. अपने ए वन ग्रेड्स और पर्सनैलिटी से तुम जल्दी तरक्की कर जाओगी.’’

‘‘मैं भी यही चाहती हूं. अपनी सफलता के लिए आप जैसा कहेंगे, मैं वैसा करती जाऊंगी,’’ द्विअर्थी संवाद करने में अंजुल माहिर थी. उस की आंखों के इशारे को समझाते हुए रणदीप ने उसे एक सरल लड़के के साथ नियुक्त करने का मन बनाया. फिर अपने कैबिन में अर्पित को बुला कर बोला, ‘‘सीमेंट कंपनी के नए प्रोजैक्ट में अंजुल तुम्हें असिस्ट करेंगी. आज से ये तुम्हारी टीम में होंगी.’’

‘‘इस ऐजेंसी में तुम्हें कितना समय हो गया?’’ अंजुल ने पहला प्रश्न दागा.

अर्पित एक सीधा सा लड़का था. बोला, ‘‘1 साल. अच्छी जगह है काम सीखने के लिए. काफी अच्छे प्रोजैक्ट्स आते रहते हैं. तुम इस से पहले कहां काम करती थीं?’’

अर्पित की बात का उत्तर न देते हुए अंजुल ने सीधा काम की ओर रुख किया, ‘‘मुझे क्या करना होगा? वैसे मैं क्लाइंट सर्विसिंग में माहिर हूं. मैं चाहती हूं कि मुझे इस सीमेंट कंपनी और अपनी क्रिएटिव टीम के बीच कोऔर्डिनेशन का काम संभालने दिया जाए.’’

अगले दिन अंजुल ने फिर सब से पहले रणदीप के कैबिन से शुरुआत की, ‘‘हाय रणदीप, गुड मौर्निंग,’’ कर उस ने पहले दिन सीखे सारे काम का ब्योरा देते हुए रणदीप से कुछ टिप्स लेने का अभिनय किया और बदले में रणदीप को अपने जलवों का भरपूर रसास्वादन करने दिया. रणदीप की मधुसिक्त नजरें अंजुल के सुडौल बदन पर इधरउधर फिसलती रहीं और वह बेफिक्री से मुसकराती हुई रणदीप की आसक्ति को हवा देती रही.

जल्द ही अंजुल ने रणदीप के निकट अपनी जगह स्थापित कर ली. अब यह रोज का क्रम था कि वह अपने दिन की शुरुआत रणदीप के कैबिन से करती. रणदीप भी उस के यौवन की खुमारी में डुबकी लगाता रहता.

उस सुबह कौफी देने के बहाने रणदीप ने अंजुल के हाथ को हौले से छुआ. अंजुल ने इस की प्रतिक्रिया में अपने नयनों को झाका कर ही रखा. वह नहीं चाहती थी कि रणदीप की हिम्मत कुछ ढीली पड़े. फिर काम दिखाने के बहाने वह उठी और रणदीप के निकट जा कर ऐसे खड़ी हो गई कि उस के बाल रणदीप के कंधे पर झालने लगे. इशारों की भाषा दोनों तरफ से बोली जा रही थी.

तभी अर्पित बौस के कैबिन में प्रविष्ट हुआ तो दोनों संभल गए. उफनते दूध में पानी के छींटे लग गए. किंतु अर्पित के शांत प्रतीत होने वाले नयनों ने अपनी चतुराई दर्शाते हुए वातावरण को भांप लिया.

इस प्रकरण के बाद अर्पित का अंजुल के प्रति रवैया बदल गया. अब तक अंजुल को नई

सीखने वाली मान कर अर्पित उस की हर मुमकिन मदद कर रहा था, परंतु आज के दृश्य के बाद वह समझा गया कि इस मासूम दिखने वाली सूरत के पीछे एक मौकापरस्त लड़की छिपी है. कौरपोरेट वर्ल्ड एक माट्स्करेड पार्टी की तरह हो सकता है जहां हरकोई अपने चेहरे पर एक मास्क लगाए अपनी असली सचाई को ढकते हुए दूसरों के सामने अपनी एक छवि बनाने को आतुर है.

आज लंच में अर्पित ने अंजुल को टालते हुए कहा, ‘‘आज मुझे कुछ काम है. तुम लंच कर लो,’’ वह अब अंजुल से बहुत निकटता नहीं चाह रहा था. उस की देखादेखी टीम के अन्य लोगों ने भी अंजुल को टालना आरंभ कर दिया. इस से अंजुल को काम समझाने और करने में दिक्कत आने लगी.

‘‘जो नई पिच आई है, उस में मैं तुम्हारे साथ चलूं? मुझे पिच प्रेजैंटेशन करना आ जाएगा,’’ अंजुल ने अपनी पूरी कमनीयता का पुट लगा कर अर्पित से कहा. अपने कार्य में दक्ष होते हुए भी उस ने अर्पित की ईगो मसाज की.

‘‘उस का सारा काम हो चुका है. तुम्हें अगली पिच पर ले चलूंगा. आज तुम औफिस में दूसरी प्रेजैंटेशन पर काम कर लो,’’ अर्पित ने हर प्रयास करना शुरू कर दिया कि अंजुल केवल औफिस में ही व्यस्त रहे.

अपने हाथ से 2 पिच के अवसर निकलते ही अंजुल भी अर्पित की चाल समझाने लगी, ‘उफ, बेवकूफ है अर्पित जो मुझे इतना सरलमति समझा रहा है. क्या सोचता है कि यदि यह मुझे अवसर नहीं प्रदान करेगा तो मैं अनुभवहीन रह जाऊंगी,’ सोचते हुए अंजुल ने सीधा रणदीप के कैबिन में धावा बोल दिया.

‘‘रणदीप, क्या मैं आप के साथ आज लंच कर सकती हूं? आप के साथ मेरे इंडक्शन की फीडबैक बाकी है,’’ अंजुल ने अपने प्रस्ताव को इस तरह रखा कि वह आवश्यक कार्य प्रतीत हुआ. अत: रणदीप ने सहर्ष स्वीकारोक्ति दे दी.

लंच के दौरान अंजुल ने अपने काम का ब्योरा दिया और साथ ही दबेढके शब्दों में एक स्वतंत्र क्लाइंट लेने की पेशकश कर डाली, ‘‘टीम में सभी इतने व्यस्त रहते हैं कि किसी से काम सीखना मुझे उन के काम में रुकावट बनना लगता है और फिर अपनी शिक्षा, प्रशिक्षण व अनुभव के बल पर मुझे पूर्ण विश्वास है कि एक क्लाइंट मैं हैंडल कर सकती हूं, यदि आप अनुमति दें तो?’’

बातचीत के दौरान अंजुल के नयनों का मटकना, उस के भावों का अर्थपूर्ण चलन उस के अधरों पर आतीजाती स्मितरेखा, कभी पलकें उठाना तो कभी झाकाना, सबकुछ इतना मनमोहक था कि रणदीप के पुरुषमन ने उसे एक अवसर देने का निश्चय कर डाला, ‘‘ठीक है, सोचता हूं कि तुम्हें किस अकाउंट में डाल सकता हूं.’’

उस शाम अंजुल ने आर्ट गैलरी में कुछ समय व्यतीत करने का सोची. जब से जौब लगी तब से उस ने कोई तफरी नहीं की. दिल्ली आर्ट गैलरी शहर की नामचीन जगहों में से एक है सो वहीं का रुख कर लिया. मंथर गति से चलते हुए अंजुल वहां सजी मनोरम चित्रकारियां देख रही थी कि अगली पेंटिंग पर प्रचलित लौंजरी ब्रैंड ‘औसम’ के मालिक महीप दत्त को खड़ा देखा. ऐजेंसी में उस ने सुना था कि पहले महीप दत्त का अकाउंट उन्हीं के पास था, किंतु पिछले साल से उन्होंने कौंट्रैक्ट रद्द कर दिया, जिस के कारण ऐजेंसी को काफी नुकसान हुआ. स्वयं को सिद्ध करने का यह स्वर्णिम अवसर वह जाने कैसे देती. उस ने तुरंत महीप दत्त की ओर रुख किया.

‘‘आप महीप दत्त हैं न ‘औसम’ ब्रैंड के मालिक?’’ अपने मुख पर उत्साह के सैकड़ों दीपक जला कर उस ने बात की शुरुआत की.

‘‘यस. आप हमारी क्लाइंट हैं क्या?’’ महीप अपने ब्रैंड को प्रमोट करने का कोई मौका नहीं चूकते थे.

‘‘मैं आप की क्लाइंट हूं और आप मेरे.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं?’’

‘‘दरअसल, मैं आप के ब्रैंड की लौंजरी इस्तेमाल करती हूं और एक हैप्पी क्लाइंट हूं. मेरा नाम अंजुल है और मैं मचल ऐडवर्टाइजिंग ऐजेंसी में कार्यरत हूं, जिस के आप एक हैप्पी क्लाइंट नहीं हैं. सही कहा न मैं ने?’’ वह अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए बोली.

‘‘तो आप यहां मचल की तरफ से आई हैं?’’ महीप ने हैंड शेक करते हुए कहा, परंतु उन के चेहरे पर तनाव की रेखाएं सर्वविदित थीं, ‘‘मैं काम की बात केवल अपने औफिस में करता हूं,’’ कहते हुए वे आगे बढ़ गए.

‘‘काम की बात तो यह है महीप दत्तजी कि मैं आप को वह फीडबैक दे सकती हूं, जो आप के लिए सुननी जरूरी है और वह भी फ्री में. मैं यहां आप से मचल की कार्यकर्ता बन कर नहीं, बल्कि आप की क्लाइंट के रूप में मिल रही हूं. विश्वास मानिए, मुझे आइडिया भी नहीं था कि मैं यहां आप से मिल जाऊंगी,’’ अंजुल के चेहरे पर मासूमियत के साथ ईमानदारी के भाव खेलने लगे. वह अपने चेहरे की अभिव्यक्ति को स्थिति के अनुकूल मोड़ना भली प्रकार जानती थी.

बोली, ‘‘मैं जानती हूं कि अब आप अपने विज्ञापन किसी एजेंसी के द्वारा नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर इन्फ्लुऐंसर के जरीए करते हैं. किंतु एक इन्फ्लुऐंसर की पहुंच केवल उस के फौलोअर्स तक सीमित होती है. मेरा एक सुझाव है आप को- आप का प्रोडक्ट प्रयोग करने वाली महिलाएं आम गृहिणियां या कामकाजी महिलाएं अधिक होती हैं, उन की फिगर मौडल की दृष्टि से बिलकुल अलग होती है.

‘‘मौडल का शरीर एक आदर्श फिगर होता है, जबकि आम महिला की जरूरत भिन्न होती है. तो क्यों न आप अपने विज्ञापन में मौडल की जगह आम महिलाओं से अपनी बात कहलवाएं. यदि वे कहेंगी तो यकीनन अधिक प्रभाव पड़ेगा,’’ अपनी बात कह कर अंजुल महीप दत्त की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगी.

कुछ क्षण मौन रह कर महीप ने अंजुल के सुझाव को पचाया. फिर अपनी कलाई पर

बंधी घड़ी देख कहने लगे, ‘‘तुम से मिल कर अच्छा लगा, अंजुल. आल द बैस्ट,’’ और महीप चले गए.

उन के चेहरे पर कोई भाव न पढ़ने के कारण अंजुल असमंजस में वहीं खड़ी रह गई.

अगले दिन अंजुल औफिस में अपने कंप्यूटर पर कुछ काम कर रही थी कि रणदीप का फोन आया, ‘‘क्या मेरे कैबिन में आ सकती हो?’’

अंजुल तुरंत रणदीप के कैबिन में पहुंची. वहां उन के साथ महीप दत्त को बैठा देख कर उस के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. सिर हिला कर हैलो किया. रणदीप ने उसे बैठने का इशारा किया.

‘‘महीप हमारे साथ दोबारा जुड़ना चाहते हैं और साथ ही यह भी कि उन का अकाउंट तुम हैंडल करो,’’ कहते हुए रणदीप के मुख पर कौंटै्रक्ट वापस मिलने की प्रसन्नता थी तो अंजुल के चेहरे पर अपनी जीत की दमक. अब उस के रास्ते में कोई रोड़ा न था. उस ने साधिकार अपना स्वतंत्र अकाउंट प्राप्त किया था.

‘‘इस कौंट्रैक्ट की खुशी में क्या मैं आप को एक डिनर के लिए इन्वाइट कर सकती हूं?’’ अचानक अंजुल ने पूछा.

यह सुन कर रणदीप चौंक गया. फिर बोला, ‘‘कल चलते हैं. आज मुझे अपनी पत्नी के साथ बाहर जाना है,’’ रणदीप ने जानबूझा कर अपनी पत्नी का जिक्र छेड़ा ताकि अंजुल भविष्य की कोई कल्पना न करने लगे और फिर फ्लर्ट किसे बुरा लगता है खासकर तब जब सबकुछ सेफजोन में हो.

‘औसम’ के औफिस में जब अंजुल मीडिया प्लानिंग डिपार्टमैंट की तरफ से क्रिएटिव दिखाने पहुंची तो वहां उसे करण मिला. करण ‘औसम’ की ओर से अंजुल को काम समझाने के लिए नियुक्त किया गया था. आज एक लौंजरी ब्रैंड के साथ मीटिंग के लिए अंजुल बेहद सैक्सी ड्रैस पहन कर गई. उसे देखते ही करण, जोकि लगभग उसी की उम्र का अविवाहित लड़का था, अंजुल पर आकृष्ट हो उठा. जब उसे ज्ञात हुआ कि अंजुल के यहां आने का उपलक्ष्य क्या है, तो उस के हर्ष ने सीमा में बंधने से इन्कार कर दिया.

‘‘हाय अंजुल,’’ करण की विस्फारित आंखें उस के मन का हाल जगजाहिर कर रही थीं, ‘‘मैं तुम्हारा मार्केटिंग क्लाइंट हूं.’’

होंठों को अदा से भींचती हुई अंजुल ने जानबूझा कर अपना हाथ बढ़ा कर मिलाते हुए कहा, ‘‘और मैं तुम्हें सर्विस दूंगी, पर कोई ऐसीवैसी सर्विस न मांग लेना वरना…’’ कहते हुए अंजुल ने उस के कंधे पर आहिस्ता से अपना हाथ रखा और हंस पड़ी.

उस के शरारती नयन करण के अंदर एक सुरसुरी पैदा करने लगे. मन ही मन वह बल्लियों उछलने लगा. आज से पहले उस ने कभी इतनी हौट लड़की के साथ काम नहीं किया था. बहुत जल्दी दोनों में दोस्ती हो गई. करण ने अंजुल को अगले हफ्ते अपने औफिस की पार्टी का न्योता दे डाला.

‘‘इतनी जल्दी पार्टी इन्वाइट? हम आज ही मिले हैं,’’ अंजुल ने करण की गति को थामने का नाटक करते हुए कहा.

‘‘मैं टाइम वेस्ट करने में विश्वास नहीं करता,’’ वह अपने पूरे वेग से दौड़ना चाह रहा था.

‘‘दिन में सपने देख रहे हो…’’

‘‘दिन में सपने देखने को प्लानिंग कहते हैं, मैडम,’’ अंजुल की खुमारी पहले ही दिन से करण के सिर चढ़ कर बोलने लगी.

पार्टी में अंजुल काली चमकदार ड्रैस में कहर ढा रही थी. करण तो उस के पास से हटने का नाम ही नहीं ले रहा था. कभी दौड़ कर स्नैक्स लाता तो कभी ड्रिंक.

‘‘क्या कर रहे हो करण. मैं खुद ले लूंगी जो मुझे चाहिए होगा,’’ उस की इन हरकतों से मन की तहों में पुलकित होती अंजुल ने ऊपरी आवरण ओढ़ते हुए कहा.

‘‘ये सब मैं तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए कर रहा हूं. मुझे पता है किस को खुश करने से मैं खुश रहूंगा,’’ करण फ्लर्ट करने का कोई अवसर नहीं गंवाना चाहता था.

पार्टी में सब ने बहुत आनंद उठाया. खायापीया, थिरकेनाचे. पार्टी खत्म होने

को थी कि अंजुल के पास अचानक महीप आ पहुंचे. इसी बात की राह वह न जाने कब से देख रही थी.

औसम की पार्टी में आने का एक कारण यह भी था.

‘‘तुम्हें यहां देख कर अच्छा लगा,’’ संक्षिप्त सा वाक्य महीप के मुख से निकला.

‘‘तुम महीप दत्त को कैसे जानती हो?’’ उन की मुलाकात से करण अवश्य अचरज में पड़ गया, ‘‘बहुत ऊंची चीज लगती हो.’’

‘‘हैलो, चीज किसे बोल रहे हो?’’ अंजुल ने अपनी कोमल उंगलियों से एक हलकी सी चपत करण के गाल पर लगाते हुए कहा, ‘‘आफ्टर औल, महीप दत्त हमारे क्लाइंट हैं,’’ उस ने इस से अधिक कुछ बताने की आवश्यकता नहीं समझा.

अंजुल हर दूसरे दिन औसम के औफिस पहुंच जाती. करण से फ्लर्ट करने से उस के कई काम बन जाते, यहां तक कि जब उस की ऐड कैंपेन डिजाइन में कुछ कमी रह जाती तब भी उसे काम करवाने के लिए फालतू समय मिल जाता. ‘औसम’ के फाइनैंस सैक्सशन से भी अंजुल एकदम समय पर पेमैंट निकलवाने में कारगर सिद्ध होती.

‘‘हमारे यहां एक फाइनैंस डिपार्टमैंट पेमैंट को ले कर बहुत बदनाम है, पर देखता हूं कि तुम्हारी हर पेमैंट टाइम से हो जाती है. वहां भी अपना जादू चलाती हो क्या?’’ एक दिन करण के पूछने पर अंजुल खीसें निपोरने लगी. अब उसे क्या बताती कि अपनी सैक्सी बौडी पर मर्दों की लोलुप्त नजरों को झेलना उस की कोई मजबूरी नहीं, अपितु कई नफे हैं. जरा अदा से हंस दिए, एकाध बार हाथ से हाथ छुआ दिया, आंखों की गुस्ताखियों वाला खेल खेल लिया और बन गया अपना मन चाहा काम.

कुछ माह बीतने के बाद इतने दिनों की जानपहचान, हर मुलाकात में फ्लर्ट, दोनों का लगभग एक ही उम्र का होना, ऐसे कारणों की वजह से अंजुल को आशा थी कि संभवतया करण उस के साथ लिवइन में रहने की पेशकश कर सकता है. तभी तो वह हर बार अपने मकानमालिक के खड़ूस होने, अधिक किराया होने, कमरा अच्छा न होने जैसी बातें किया करती, ‘‘काश, मैं किसी के साथ अपना किराया आधा बांट सकती.’’

‘‘तुम अपना रूम शेयर करने को तैयार हो? मैं तो कभी भी शेयर न करूं. मुझे अपनी प्राइवेसी बहुत प्यारी है,’’ करण की ऐसी फुजूल की बातों से अंजुल का मनोबल गिर जाता.

‘‘जरा मेरे कैबिन में आना, अंजुल,’’ रणदीप ने इंटरकौम पर कहा.

अंजुल ने उस के कैबिन में प्रवेश किया तो हर ओर से ‘हैप्पी बर्थडे टु यू’ के सुर गुंजायमान होने लगे.

रणदीप आज उस का जन्मदिन खास अपने कैबिन में औफिस के सभी लोगों को बुला कर मना रहा था, ‘‘अंजुल, हमारे औफिस में जब से आईं हैं तब से इन की मेहनत और लगन ने हमारी ऐजेंसी को कहां से कहां पहुंचा दिया…’’, रणदीप सब को संबोधित करते हुए कहने लगा.

‘‘ऐसा लग रहा है जैसे हम तो यहां काम करने नहीं तफरी करने आते हैं,’’ लोगों में सुगबुगाहट होने लगी.

‘‘हमारा तो कभी जन्मदिन नहीं मनाया गया,’’ अर्पित फुंका बैठा था. आखिर उस के नीचे आई अंजुल आज औफिस में उस से अधिक धूम मचा रही थी.

‘‘आप अंजुल हैं क्या जो रणदीप आप की तरफ यों मेहरबान हों?’’ दबेढके ठहाकों के स्वर अंजुल के कानों में चुभने लगे.

औफिस में शानदार पार्टी फिर कभी रणदीप तो कभी करण तो कभी फाइनैंस डिपार्टमैंट के अनिल साहब… अंजुल ने कहां नहीं अपने तिलिस्म का जादू बिखेरने का प्रयास किया. किंतु हाथ क्या लगा. केवल दफ्तर के लोगों की खुसपुसाहट. पुरुष सहकर्मियों की लार टपकाती निगाहें या फिर महिला सहकर्मियों की घृणास्पद हेय दृष्टि.

आज अंजुल पूरे 32 वर्ष की हो गई थी, परंतु इतनी खूबसूरती और इतनी हौट फिगर होते हुए भी कोई उस का हाथ थामने को तैयार नहीं था. सब को केवल उस की कमर में अपनी बांह की चाहत थी. व्यग्र मन और निद्राहीन नयन लिए अंजुल कई घंटे बिस्तर पर लेटी अपने कमरे की छत ताकती रही.

जब पिछले महीने वह अपना रूटीन चैकअप करवाने डाक्टर के पास गई थी तब उस लेडी डाक्टर ने भलमनसाहत में सलाह दी थी कि देखिए अंजुल, स्त्रियों का शरीर एक जैविक घड़ी के हिसाब से चलता है. मां और बच्चे की अच्छी सेहत के लिए 30 वर्ष की आयु से पहले बच्चा हो जाए तो सर्वोत्तम रहता है किंतु 35 वर्ष से देर करना श्रेयस्कर नहीं रहता. आप की बायोलौजिकल क्लौक चल रही है. आप को सैटल होने के बारे में सोचना चाहिए. इन विचारों में घिरी अंजुल के कानों में घड़ी की टिकटिक का शोर बजने लगा. व्याकुलता से उस ने तकिए से अपने कान ढक लिए.

अगले दिन अंजुल ने औफिस में एक नए प्रोजैक्ट की पिच के बारे में सुना तो रणदीप से उसे मांगने पहुंच गई.

‘‘परंतु यह प्रोजैक्ट मुंबई में है और तुम दिल्ली का ‘औसम’ अकाउंट हैंडल कर रही हो,’’ रणदीप के सुरों में हिचकिचाहट थी.

‘‘सो वाट, रणदीप, मैं दोनों को हैंडल कर सकती हूं. मुंबई में भी तो हमारा एक औफिस है. मैं वहां विजिट करती रहूंगी और ‘औसम’ तो जाती ही रहती हूं,’’ अंजुल ने रणदीप को अपनी बात मानने हेतु राजी कर लिया.

मुंबई पहुंच कर अंजुल औफिस के गैस्ट हाउस में ठहरी. कमरा एकदम साधारण

था, किंतु उस के यहां आने का लक्ष्य कुछ और था. अंजुल डरने लगी थी कि कहीं ऐसा न हो जाए कि उस के हाथों से उस की उम्र तेजी से रेत की मानिंद फिसल जाए और वह खाली हथेलियों को मलती रह जाए. अपनी सैक्सी बौडी की बदौलत उस ने कई अवसर पाए थे, जिन्हें उस ने अपनी बुद्धि व चपलता के बलबूते बखूबी भुनाया था.

उस का अनुमान रहा था कि इसी आकर्षण के कारण उसे अपना जीवनसाथी मिल जाएगा, परंतु अब बढ़ती उम्र ने उसे डरा दिया था. हो सकता है करण बात आगे बढ़ाए, मगर अभी तक उस ने ऐसा कोई इशारा नहीं दिया, केवल फ्लर्ट करता रहता है.

इसलिए समय रहते उसे अपने लिए एक जीवनसाथी तो खोजना ही पड़ेगा. मुंबई में 2 दफ्तरों में जा कर हो सकता है उसे अपने औफिस या फिर क्लाइंट औफिस में कोई मिल जाए…

जब अंजुल मुंबई में क्लाइंट के औफिस पहुंची तो उसे एक लड़के से मिलवाया गया. लड़का बेहद खूबसूरत लगा. उसे देख कर अंजुल के मन में सुनहरे ख्वाब सजने लगे.

‘‘माई नेम इस ऋषि. मैं इस औफिस की तरफ से आप का कौंटैक्ट पौइंट रहूंगा,’’ ऋषि ने अपना परिचय दिया.

‘‘आप का नाम, आप का व्यक्तित्व, सबकुछ शानदार है. आप से मिल कर बेहद प्रसन्नता हुई,’’ अंजुल ने अपने दिल में उठ रही हिलोरों को बाहर बहने से बिलकुल नहीं रोका.

उस की बात सुन कर ऋषि हौले से हंस पड़ा. काम पर अपनी पकड़ से अंजुल ने उसे पहली ही मीटिंग में प्रभावित कर दिया. फिर लंच के समय ऋषि ने अंजुल से पूछा कि औफिस की तरफ से उस के लिए क्या मंगवाया जाए?

‘‘कुछ भी चलेगा बस साथ में आप की कंपनी जरूर चाहिए,’’ अंजुल अब समय बरबाद नहीं करना चाहती थी.

पहले ही दिन से दोनों में अच्छी मित्रता हो गई. अपने बचपन, शिक्षा, कैरियर, परिवार संबंधी काफी बातें साझा करने के बाद दोनों ने शाम को एकदूसरे से विदा ली. गैस्ट हाउस लौट कर अंजुल ने कपड़े बदले और निकल गई गेटवे औफ इंडिया की सैर करने. ‘कल ऋषि से कहूंगी कि मुंबई की सैर करवाए,’ वह सोचने लगी. आज इसलिए नहीं कहा कि कहीं वह डैसपरेट न लगे. सुबह जो कमरा उसे बहुत साधारण लगा था, अब वहीं उसे उजले सपनों ने घेर लिया.

अगले दिन क्लाइंट औफिस जाते हुए रास्ते में करण का फोन आया, ‘‘हाय जानेमन, कैसा लग रहा है मुंबई?’’

‘‘फर्स्ट क्लास, शहर भी और यहां के लोग भी,’’ अंजुल ने चहक कर उत्तर दिया.

Short Story : नाम की केंचुली

Short Story :  होटल सिटी पैलेस के रेस्तरां से बाहर निकलते समय पीहू की चाल जरूर धीमी थी मगर उस के कदमों में आत्मविश्वास की कमी नहीं थी. चेहरे पर उदासी की एक परत जरूर थी लेकिन पीहू ने उसे अपने मन के भीतर पांव नहीं पसारने दिया.

घर आ कर बिस्तर पर लेटी तो अखिल के साथ अपने रिश्ते को अंतिम विदाई देती उस की आंखें छलछला आईं.

पूरे 5 साल का साथ था उन का. ब्रेकअप तो खलेगा ही लेकिन इसे ब्रेकअप कहना शायद इस रिश्ते का अपमान होगा. इसे टूटा हुआ तो तब कहा जाता जब इस रिश्ते को जबरदस्ती बांधा जाता.

अखिल के साथ उस के बंधन में तो जबरदस्ती वाली कोई बात ही नहीं थी. यह तो दोनों का अपनी मरजी से एकदूसरे का हाथ थामना था जिसे अनुकूल न लगने पर उस ने बहुत हौले से छुड़ा लिया था, अखिल को भावी जीवन की शुभकामनाएं देते हुए.

पीहू और अखिल कालेज के पहले साल से ही अच्छे दोस्त थे. आखिरी बरस में आतेआते दोस्ती ने प्रेम का चोला पहन लिया. लेकिन यह प्रेम किस्सेकहानियों या फिल्मों वाले प्रेम की तरह अंधा नहीं बल्कि समय के साथ परिपक्व और समझदार होता गया था. यहां चांदतारे तोड़ कर चुनरी में टांकने जैसी हवाई बातें नहीं होती थीं, यहां तो अपने पांवों पर खड़ा हो कर साथ चलने के सपने देखे जा रहे थे.

कालेज खत्म होने के बाद पीहू और अखिल दोनों ही जौब की तलाश में जुट गए ताकि जल्द से जल्द अपने सपनों को हकीकत में ढाल सकें. हालांकि अखिल का अपना पारिवारिक व्यवसाय था लेकिन वह खुद को जमाने की कसौटी पर परखना चाहता था इसलिए एक बार कोई स्वतंत्र नौकरी करना चाहता था जो उसे विरासत में नहीं बल्कि खुद अपनी मेहनत से मिली हो.

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए दोनों दिल्ली आ गए. एक ही कोचिंग में साथसाथ तैयारी करने और घर के अनुशासन से दूर रहने के बावजूद दोनों ने अपनी परिधि तय कर रखी थी. जब भी अकेले में कोई एक बहकने लगता तो दूसरा उसे संभाल लेता. कई जोड़ियों को लिवइन में रहते देख कर उन का मन अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटका.

“यार जब हम ने शादी करना तय कर ही लिया है तो अभी क्यों नहीं? सिर्फ एक बार…” कई बार उतावला पुरुष मन हठ पर उतर आता.

“शादी के बाद यही सब तो करना है. एक बार कैरियर बन जाए बस. फिर तो सदा साथ ही रहना है…” संयमी स्त्री उस के बढ़े हाथ हंस कर परे सरका देती. वहीं कभी जब सधे हुए नाजुक कदम अरमानों की ढलान पर फिसलने लगते तो दृढ़ मजबूत बांहें उन्हें सहारा दे कर थाम लेती और गर्त में गिरने से बचा लेती.

आज ऊपर तो कल नीचे, कोलंबस झूले से रिश्ते में दोनों झूल रहे थे. इसी बीच पीहू की बैंक में नौकरी लग गई और उस ने दिल्ली छोड़ दिया.

हालांकि दोनों फोन के माध्यम से बराबर जुड़े हुए थे लेकिन अब अखिल के लिए दिल्ली में अकेले रह कर परीक्षा की तैयारी करना जरा मुश्किल हो गया था. मन उड़ कर बारबार पीहू के पास पहुंच जाता लेकिन फिर भी वह खुद को एक मौका देने का मानस बनाए हुए वहां टिका रहा.

2 साल मेहनत करने के बाद भी अखिल का कहीं चयन नहीं हुआ तो वह वापस आ कर अपने परिवार के पुश्तैनी बिजनैस में हाथ बंटाने लगा. भागदौड़ खत्म हुई, स्थायित्व आ गया. जिंदगी एक तय रास्ते पर चलने लगी.

जैसाकि आम मध्यवर्गीय परिवारों में होता है, बच्चों के जीवन में स्थिरता आते ही घर में उन के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश शुरू हो जाती है. अखिल के घर में भी उस की शादी की बात चलने लगी. उधर पीहू के लिए भी लड़के की तलाश जोरशोर से जारी थी. जहां अखिल के परिवार की प्राथमिकता घरेलू लड़की थी, वहीं पीहू के घर वाले उस के लिए कोई बैंकर ही चाहते थे ताकि दोनों में आसानी से निभ जाए.

अखिल संयुक्त परिवार में तीसरी पीढ़ी का सब से बड़ा बेटा है. उस के द्वारा उठाया गया कोई भी अच्छाबुरा कदम भावी पीढ़ी के लिए लकीर बन सकता है. पारंपरिक मारवाड़ी परिवार होने के कारण अखिल के घर में बड़ों की बात पत्थर की लकीर मानी जाती है. दादा ने जो कह दिया वही फाइनल होता है. इस के बाद पापा या चाचा की एक नहीं चलने वाली. दूसरी तरफ पीहू का परिवार इस मामले में जरा तरक्कीपसंद है. उन्हें पीहू की पसंद पर कोई ऐतराज नहीं था बशर्ते कि उस का चयन व्यावहारिक हो.

परिवार की परिपाटी से भलीभांति परिचित अखिल घर वालों के सामने अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, उधर पीहू इस मामले में एकदम शांत थी. वह अखिल की पहल की प्रतीक्षा कर रही थी. उस ने ना तो अखिल पर शादी करने का कोई दबाव बनाया और ना ही अपनी असहमति जताई.

“पीहू मैं बहुत परेशान हूं यार. क्या करूं समझ में नहीं आ रहा. घर वाले चाहते हैं कि मेरी शादी किसी सजातीय मारवाड़ी खानदान की लड़की से हो यानी यह शादी सिर्फ 2 लोगों का नहीं बल्कि 2 व्यापारिक घरानों का मिलन हो ताकि यह संबंध दोनों परिवारों के बिजनैस को भी आगे बढ़ाए, लेकिन तुम तो जानती हो ना मैं ने तो तुम्हारे साथ के सपने देखे हैं. तुम्हीं बताओ, मैं कैसे अपने दादाजी को राजी करूं?” एक दिन अखिल ने कहा.

“इतनी हिम्मत तो तुम्हें जुटानी ही होगी अखिल. यदि आज हिम्मत नहीं करोगे तो सोच लो, बाद में पछताना ना पड़े,” पीहू ने गंभीर हो कर कहा.

“तो क्या तुम कुछ नहीं करोगी?” अखिल ने आश्चर्य से पूछा.

“तुम्हारे परिवार के मामले में मैं क्या कर सकती हूं? मैं अपनेआप में साफ हूं और जानती हूं कि मुझे तुम से शादी करनी है. इस के लिए मेरे घर वाले भी राजी हो जाएंगे लेकिन पहले तुम तो अपने घर वालों को राजी करो. लेकिन एक बात ध्यान रहे अखिल, मैं जैसी हूं मुझे इसी रूप में स्वीकार करना होगा. मुझ से मेरी पहचान छीनने की कोशिश मत करना. ना अभी, ना बाद में,” पीहू ने अपना फैसला सुनाया तो अखिल सोच में पड़ गया.

आधुनिक और आत्मनिर्भर पीहू की छवि उस के दादाजी की पसंद से एकदम विपरीत है. वैसे भी उन के परिवार में आजतक कोई विजातीय बहू या दामाद नहीं आए. उन्हें पीहू के लिए तैयार करना आसान नहीं होगा.

अखिल अपनी चाची से थोड़ा खुला हुआ था. उस ने उन से बात की. पहले तो चाची ने अखिल को ही समझाने का प्रयास किया लेकिन जब वह नहीं माना तो उन्होंने अखिल के चाचा से उस की पसंद का जिक्र किया. जैसाकि अंदेशा था, सुनते ही वे उखड़ गए.

“दिमाग खराब हो गया क्या लड़के का? अपने समाज में लड़कियों का अकाल पड़ गया क्या? अरे मैं तो उसे दिल्ली भेजने की उस की जिद पूरी करने के फैसले के ही खिलाफ था. फिर सोचा था जवानी की जिद है, सालदो साल में उतर जाएगी लेकिन यहां तो एक जिद के साथ दूसरी जिद भी साथ उठा लाया. एक तो बिजनैस में 2 साल पिछड़ गया, दूसरा यह प्रेम का चक्कर… समझाओ उसे कि नौकरी करने वाली लड़कियां हमारे यहां नहीं चल सकतीं,” चाचा ने अखिल को दिल्ली भेजने के बड़े भाई के फैसले का गुस्सा चाची पर उतारा.

लेकिन अखिल ने हौसला बनाए रखा. पिता को राजी करने का उस का प्रयास जारी रहा. इधर वह पीहू को भी जौब छोड़ने के लिए राजी कर रहा था ताकि कम से कम लड़की के घरेलू होने की शर्त तो पूरी हो सके. अखिल का प्रस्ताव पीहू के जरा भी गले नहीं उतरता था.

“तुम मुझे क्यों समझा रहे हो अखिल? मैं अपनी नौकरी जारी रखूंगी, बस इतना ही तो चाह रही हूं. देखो, समझने की जरूरत तुम्हें है. तुम्हारे सामने 2 विकल्प हैं. एक तुम्हारे परिवार की परंपरा और दूसरा तुम्हारा प्यार यानी मैं और मैं भी बिना अपनी पहचान खोए. जानते हो ना कि जब हमें 2 में से किसी 1 विकल्प का चुनाव करना होता है तो फैसला बहुत सोचसमझ कर करना पड़ता है. तुम तय करो कि तुम्हें क्या चाहिए,” पीहू ने दृढ़ता से कहा.

एक तरह से उस ने अपना निर्णय अखिल के सामने साफ कर दिया. बुझा हुआ अखिल एक बार फिर से अपने घर वालों को मनाने में जुट गया. इस बार उस ने दादाजी को चुना.

कहते हैं कि मूल से प्यारा सूद होता है. दादाजी पोते के आग्रह पर पिघल गए. थोड़ी नानुकुर के बाद उन्होंने विजातीय पीहू के साथ उस का गठजोड़ करने के लिए हरी झंडी दिखा दी. अपनी कुछ शर्तों के साथ वे पीहू के परिवार से मिलने को तैयार भी हो गए.

अखिल इसे अपनी जीत समझते हुए खुशी से उछलने लगा. उस ने फोन पर पीहू को यह खुशखबरी दी और आगे की प्लानिंग करने के लिए उसे उसी होटल सिटी पैलेस में मिलने के लिए बुलाया जहां वे अकसर मिला करते थे. हालांकि पीहू अभी भी थोड़ी आशंकित थी.

“तुम ने उन्हें बता तो दिया ना कि मैं शादी के बाद जौब नहीं छोडूंगी?” पीहू ने अखिल को एक बार फिर से आगाह किया.

“जौबजौब… यह कैसी जिद पकड़ कर बैठी हो तुम? अरे हमारे परिवार को कहां कोई कमी है जो अपनी बहूबेटियों से नौकरी करवाएंगे…” पीहू की बात सुनते ही अखिल बिफर गया.

पीहू की आशंका सही साबित हुई. उस ने अखिल की तरफ अविश्वास से देखा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. उस ने पीहू का हाथ कस कर पकड़ लिए और अपने स्वर को भरसक मुलायम किया.

“हमारे यहां बहुएं सिर्फ हुक्म चलाती हैं, हुक्म बजाती नहीं,” कहते हुए अखिल ने प्यार से पीहू के गाल खींच दिए. पीहू ने उस के हाथ झटक दिए.

“हमारे समाज में बहुओं के नखरे तब तक ही उठाए जाते हैं जब तक वे सिर पर पल्लू डाले, आंखें नीची किए सजीधजी गुड़िया सी घर में पायल बजाती घूमती रहें.”

“मुझ से यह उम्मीद मत रखना,” पीहू ने कहा.

“अरे यार गजब करती हो. एक बार शादी तो हो जाने दो फिर कर लेना अपने मन की. मैं बात करूंगा ना अपने घर वालों से,” अखिल ने उसे मनाने की कोशिश की.

“मेरे लिए भी यही बात तुम ने अपने घर में कही होगी कि एक बार शादी हो जाने दो, फिर छुड़वा देंगे नौकरी. मैं बात करूंगा ना पीहू से. है ना?”अखिल की आंखों में झांक कर पीहू ने उस की नकल उतारते हुए कहा.

बात सच ही थी. उस ने अपने दादाजी को यही कह कर पीहू से शादी करने के लिए राजी किया था. अखिल के पास पीहू के सवालों का कोई जवाब नहीं था. वह नजरें चुराने लगा.

“अच्छा बताओ, मेरी मां का नाम क्या है?” पीहू के अचानक दागे गए इस सवाल से अखिल अचकचा गया. उस ने इनकार में अपने कंधे उचका दिए.

“नहीं पता ना? पता होगा भी कैसे क्योंकि लोग उन्हें उन के नाम से जानते ही नहीं. वे बाहर के लोगों के लिए मिसेज सक्सेना और रिश्तेदारों के लिए पीहू की मम्मी हैं. और सिर्फ वे ही क्यों, ऐसी न जानें कितनी ही औरतें हैं जो अपना असली नाम भूल ही गई होंगी. वे या तो मिसेज अलांफलां या फिर गुड्डू, पप्पू की मम्मी के नाम से पहचानी जाती हैं. मैं ने देखा है अपने आसपास. अपने घर में भी. बहुत बुरा लगता है,” कहती हुई पीहू आवेश में आ गई.

“लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होना बहुत जरूरी है. मैं तुम्हें प्यार करती हूं लेकिन सिर्फ इसी वजह से तुम्हारे घर में शोपीस बन कर नहीं रह सकती. तुम तो मेरे संघर्ष के साथी हो. सब जानते हो. मैं ने कितनी मुश्किल से अपनी पहचान बनाई है. इतनी मेहनत से हासिल इस मुकाम को मैं घूंघट की ओट में नहीं छिपा सकती. अपने नाम की पहचान को ऐशोआराम के लालच की आग में नहीं झोंक सकती,” पीहू ने अखिल का चेहरा पढ़ते हुए कहा.

“इस का मतलब तुम्हारे लिए तुम्हारी अपनी पहचान मुझ से अधिक जरूरी है. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा नाम मेरे नाम से जुड़ कर पहचाना जाए, हमारे नाम एक हो जाएं? जरा सोचो, पीहू अखिल लखोटिया… आहा… सोच कर ही कितना अच्छा लग रहा है,” अखिल के स्वर में अभी भी एक उम्मीद शेष थी.

“नहीं, मैं नहीं चाहती कि मेरी पहचान तुम्हारे नाम की केंचुली में छिप जाए. पीहू अखिल सक्सेना या पीहू सक्सेना लखोटिया जैसा कुछ बन कर इतराने की बजाय मैं सिर्फ पीहू सक्सेना कहलाना अधिक पसंद करूंगी. सक्सेना ना भी हो तो भी चलेगा. मैं तो सिर्फ पीहू बन कर भी खुश रहूंगी. बल्कि मैं तो कहती हूं कि दुनिया की हर लड़की के लिए उस की अपनी पहचान बहुत जरूरी है,” पीहू ने भावुक होते हुए अखिल का हाथ थाम लिया.

“यानी तुम्हारी ना समझूं? हमारे सपनों का क्या होगा पीहू?” अखिल रुआंसा हो गया.

“हमारे सपने जुड़े हुए जरूर थे लेकिन उस के बावजूद भी वे स्वतंत्र थे, एकदूसरे से अलग थे. मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं. मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम मेरे लिए अपने परिवार से बगावत करो, लेकिन माफ करना, मैं अपनी पहचान नहीं खो सकती. इसे तुम मेरा आखिरी फैसला ही समझो,” पीहू ने अपना आत्मविश्वास से भरा फैसला सुना दिया और स्नेह से अखिल का कंधा थपथपाती हुई उठ खड़ी हुई.

पीहू नहीं जानती थी कि वह अपने इस निर्णय को कितनी सहजता से स्वीकार कर पाएगी लेकिन यह भी तो आखिरी सच है कि हमारे हरेक कठोर निर्णय के समय मन के तराजू में एक तरफ निर्णय और दूसरी तरफ उस की कीमत रखी होती है.

आज भी पीहू के मन की तुला पर एक तरफ उस की निज पहचान थी तो दूसरी तरफ उस का प्रेम और सुविधाओं से भरा भविष्य. पीहू ने प्रेम की जगह अपनी पहचान को चुना. वह अखिल के नाम की केंचुली पहनने से इनकार कर अपने गढ़े हुए रास्ते पर बढ़ गई.

अखिल नम आंखों से उस आत्मविश्वास की मूरत को जाते हुए देख रहा था.

Hindi Kahani : कैसा मोड़ है यह

Hindi Kahani : ‘‘अदालतसे गुजारिश है कि मेरी मुवक्किला को जल्दी न्याय मिले ताकि वह अपनी एक नई जिंदगी शुरू कर सके,’’ माला के वकील ने अपनी दलीलें पेश करने के बाद जज साहब से कहा. जज साहब ने मामले की गंभीरता को समझते हुए अगली तारीख दे दी. तलाक के मामलों में बहुत जल्दी फैसला लेना मुश्किल ही होता है, क्योंकि अदालत भी चाहती है कि तलाक न हो. यही वजह थी कि हमेशा की तरह आज भी अदालत में कोई फैसला नहीं हुआ. दोनों ही पक्षों के वकील अपनीअपनी दलीलें पेश करते रहे, पर जज साहब ने तो तारीख बढ़ाने का ही काम किया.

वल्लभ और माला दोनों उदास और खिन्न मन से अदालत से बाहर निकल आए, लेकिन बाहर निकलते वक्त उन्हें नेहा और भानू की घूरती नजरों का सामना करना पड़ा. उन दोनों की नफरत, क्रोध और धोखा देने के आक्रोश का सामना वे दोनों पिछले 5 सालों से कर रहे हैं और अब तो जैसे आदत ही हो गई है. वल्लभ उस नफरत और आक्रोश के साए में जीतेजीते टूट सा गया है. अफसोस और अपराधभाव उस के चेहरे के भावों से परिलक्षित होने लगे हैं. सच तो यह भी है कि अदालत के चक्कर काटतेकाटते वह थक गया है. हालत तो माला की भी कुछ ऐसी ही है, क्योंकि पिछले 5 सालों से वह भी अपनेपरायों सब की नफरत झेल रही है. यहां तक कि उस के बच्चे भी उस से दूर हो गए हैं. आखिर क्या मिला उन्हें इस तरह का कदम उठा कर?

‘‘चलो तुम्हें घर छोड़ देता हूं,’’ वल्लभ ने माला से कहा, तो थकी हुई आवाज में उस ने कहा, ‘‘मैं चली जाऊंगी, तुम्हें तो वैसे ही देर हो चुकी है.’’

‘‘बैठो,’’ वल्लभ ने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा. फिर माला को उस के घर छोड़ कर जहां वह बतौर पेइंग गैस्ट रहती थी, वल्लभ औफिस की ओर चल दिया.

लंच टाइम हो चुका था. आज भी हाफ डे लगेगा. इस केस के चक्कर में हर महीने छुट्टियां या हाफ डे लेने पड़ते हैं. कितनी बार तो वह विदआउट पे भी हो चुका है. निजी कंपनियों में सरकारी नौकरी जैसे सुख नहीं हैं कि जब चाहे छुट्टी ले लो. यहां तो काम भी कस कर लेते हैं और समय देख कर काम करने वालों को तो पसंद ही नहीं किया जाता है. माला की तो इस वजह से 2 नौकरियां छूट चुकी थीं. अदालत में आतेजाते और वकील की फीस देतेदेते उन की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ गई थी. बेशक माला और वल्लभ एकदूसरे का पूरा साथ दे रहे थे और उन के बीच के प्यार में इन 5 सालों में कोई कमी भी नहीं आई थी, पर कहीं न कहीं दोनों को लगने लगा था कि ऐसा कदम उठा कर उन से कोई भूल हो गई है. उन्हें अभी भी अलग ही रहना पड़ रहा था. समाज, परिवार और दोस्तों, सब की नाराजगी सहते हुए वे जी रहे थे, सिर्फ इस आशा से कि एक दिन अदालत का फैसला उन के हक में हो जाएगा और वे दोनों साथसाथ रहने लगेंगे.

वल्लभ औफिस में भी सारा दिन तनाव में ही रहा. वह काम में मन ही नहीं लगा पा रहा था. ‘‘कोई बात बनी?’’ कुलीग रमन ने पूछा तो उस ने सिर हिला दिया, ‘‘माला के लिए भी कितना मुश्किल है न यह सब. लेकिन फिर भी वह तेरा साथ दे रही है. वह सचमुच तुझ से प्यार करती है यार वरना कब की भानू के पास चली जाती.’’

‘‘रमन तू सही कह रहा है. पर माला और मैं अब दोनों ही बहुत थक गए हैं. अब तो लगता है कि 5 साल पहले जैसे जिंदगी चल रही थी, वही ठीक थी. न माला मेरी जिंदगी में आती और न यह तूफान आता. 42 साल का हो गया हूं, पर अभी भी परिवार बनाने के लिए भाग रहा हूं. माला भी अब 40 की है. कभीकभी गिल्टी फील करता हूं कि मेरी वजह से उसे भानू को छोड़ना पड़ा,’’ वल्लभ भावुक हो उठा.

‘‘संभाल अपनेआप को यार. प्यार कोई सोचसमझ कर थोड़े ही करता है. वह तो बस हो जाता है. तू अपने आप को दोष मत दे. सब ठीक हो जाएगा,’’ रमन ने उसे तसल्ली तो दे दी. पर वह भी जानता था कि मामला इतनी आसानी से सुलझने वाला नहीं है.

‘‘कैसे ठीक हो जाएगा? अब तक तो तू समझ ही गया होगा कि नेहा मुझे कभी तलाक नहीं देगी और अदालत के चक्कर लगवाती रहेगी. वह उन लोगों में से है, जो न खुद चैन से जीते हैं और न दूसरों की जीने देते हैं.’’

वल्लभ को मायूस देख रमन ने उस का कंधा थपथपाया. हालांकि वह जानता था कि उस की तसल्ली भी उस के काम नहीं आएगी. औफिस से लौट कर अपने घर का दरवाजा खोल वल्लभ बिना लाइट जलाए ही सोफे पर पसर गया. शरीर और मन जब दोनों ही थक जाएं तो इंसान बिलकुल टूट जाता है. बीते पल उसे बारबार झकझोर रहे थे. 15 साल पहले उस की और नेहा की शादी हुई थी. उस समय वह नौकरी करता था. पर उस का वेतन इतना नहीं था कि नेहा के शाही खर्चों को वह उठा सके. उस के ऊपर छोटी बहन का भी दायित्व था और अपनी मां की भी वह सहायता करना चाहता था, क्योंकि पिता थे नहीं. नेहा को उस के घर के हालात पता थे, फिर भी उस के  मांबाप ने उस की उस से शादी की तो कुछ देखा ही होगा. पर नेहा बहुत गुस्सैल और कर्कश स्वभाव की थी. वह बातबात पर उस से लड़ने लगती और मां से भी बहस करने लगती. बहन को ताने देती कि उस की वजह से उसे अपनी छोटीछोटी खुशियों को भी दांव पर लगाना पड़ता है.

नेहा चाहती थी कि सारा दिन घूमे या शौपिंग करे. घर का काम करना तो उसे पसंद ही नहीं था. वल्लभ उसे समझाने की कोशिश करता तो वह मायके चली जाती और बहुत मिन्नतों के बाद वापस आती. रोजरोज की किचकिच से वह तंग आ गया था. शादी के 2 साल बाद जब उन का बेटा हुआ तो उसे लगा कि अब शायद नेहा सुधर जाएगी. पर वह तो वैसी लापरवाह बनी रही. मां या बहन को ही बेटे को संभालना पड़ता. बेटा बीमार होता तो भी उसे छोड़ सहेलियों के साथ पिक्चर देखने चली जाती. एक बार बेटे को निमोनिया हुआ और नेहा ने उसे ठंडे पानी से नहला दिया. नन्ही सी जान ठंड सह नहीं पाई और बुखार बिगड़ गया. 2 दिन बाद उस की मौत हो गई. कुछ दिन नेहा रोई, शांत बनी रही, पर फिर वापस अपने ढर्रे पर लौट आई.

परेशान वल्लभ ने घर में रहना ही कम कर दिया. मां बहन को ले कर गांव चली गई. नेहा कईकई दिनों तक खाना नहीं बनाती थी. घर गंदा पड़ा रहता, पर वह तो बस घूमने निकल जाती. वल्लभ उस समय इतना परेशान था कि वह घंटों पार्क में बैठा रहता. ‘‘क्यों आजकल घर में दिल नहीं लगता? क्या कोई और मिल गई है?’’ नेहा का कटाक्ष उसे आहत कर जाता. उस ने बहुत बार उसे प्यार से समझाना चाहा, पर वह अपनी मनमानी करती रही. मांबहन के जाने के बाद से जैसे वह और आजाद हो गई थी. वल्लभ का जिस बिल्डिंग में औफिस था, उसी की दूसरी मंजिल पर माला का औफिस था. लिफ्ट में आतेजाते उन की मुलाकातें हुईं और फिर बातें होने लगीं. धीरेधीरे एकदूसरे के प्रति उन का आकर्षण बढ़ने लगा. वल्लभ तो वैसे भी प्यार के लिए तरसरहा था और माला भी अपने वैवाहिक जीवन से दुखी थी. उस के पति भानू को शराब की लत थी और नशे में वह उसे मारता था. अपने दोनों बच्चों की खातिर वह उसे सह रही थी. धीरेधीरे वे दोनों कब एकदूसरे को चाहने लगे, उन्हें पता नहीं चला. दोनों ही अपनेअपने साथी से छुटकारा पा एक खुशहाल जीवन जीने के सपने देखने लगे. पर उस के लिए दोनों का तलाक लेना जरूरी था. नेहा तो अपने बच्चों को भी अपने साथ रखना चाहती थी, जिसे ले कर वल्लभ को कोई आपत्ति नहीं थी, क्योंकि वह खुद बच्चों के लिए तरस रहा था.

उन दोनों के रिश्ते के बारे में लोगों को पता चलते ही जैसे बम फूटा था. नेहा तो जैसे रणचंडी बन गई थी, ‘‘तुम चाहते होगे कि तुम्हें तलाक दे दूं ताकि तुम उस कलमुंही के साथ गुलछर्रे उड़ा सको. कभी नहीं. अब समझ आया कि मुझ से क्यों भागते रहते हो. मुझे छोड़ तुम दूसरी शादी करने का सपना देख रहे हो. सारी उम्र अदालत के चक्कर काटते रहना, पर मैं तुम्हें तलाक देने वाली नहीं.’’

माला के साथ तो भानू ने और भी बुरा व्यवहार किया, शर्म नहीं आई तुझे, किसी और के साथ मुंह काला करते हुए…’’ यह तो उस ने कहा ही इस के अलावा उस ने पासपड़ोस वालों के सामने क्याक्या नहीं कहा. उस के बाद वह उसे रोज ही मारने लगा. बच्चे कुछ समझ नहीं पा रहे थे, इसलिए सहमे से रहते. जब कभी माला से मिलने वल्लभ घर जाता तो बच्चे कहते, ‘‘मम्मी, ये अंकल हमारे घर क्यों आते हैं? हमें अच्छा नहीं लगता. हमारे स्कूल फैं्रड्स कहते हैं कि आप दूसरी शादी करने वाली हो. मम्मी, पापा जैसे भी हैं हमें उन्हीं के साथ रहना है.’’

फिर एक वक्त ऐसा आया जब भानू तो तलाक देने को तैयार हो गया. पर उस की शर्त थी कि वह उसे तलाक और बच्चों को कस्टडी तभी देगा जब वह उसे क्व20 लाख देगी. माला कहां से लाती इतनी बड़ी रकम. तब से यानी पिछले 5 सालों से माला और वल्लभ दोनों तलाक पाने के लिए लड़ रहे हैं, पर कोई फैसला ही नहीं हो पा रहा है. समय के साथसाथ पैसा भी खर्च हो रहा है और माला और वह साथसाथ नहीं रह सकते, इसलिए दोनों अलगअलग रह रहे हैं.मोबाइल बजा तो वल्लभ की तंद्रा भंग हुई. 9 बज गए थे. उस ने लाइट जलाई. फोन पर माला थी. ‘‘वल्लभ, मैं तो अदालत के चक्कर लगातेलगाते तंग आ गई हूं. भानू ने आज तो मुझे धमकी दी है कि जल्दी ही मैं ने उसे पैसे नहीं दिए तो वह बच्चों को ले कर कहीं दूर चला जाएगा. कुछ समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं,’’ कहते हुए माला रो रही थ, लेकिन आज वल्लभ के पास कुछ कहने के लिए शब्द ही नहीं थे. कैसे कहे वह कि माला सब ठीक हो जाएगा, तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे साथ हूं. कहां कुछ ठीक हो पा रहा है? ‘‘कल मिल कर बात करते हैं,’’ कह कर वल्लभ ने फोन काट दिया.

इन 5 सालों में उस के बालों की सफेदी चमकने लगी थी. काम में ध्यान नहीं लगा पाने के कारण प्रमोशन हर बार रुक जाता था. मां अलग नाराज थीं कि चाहे बीवी जैसी हो उस के साथ निभाना ही पड़ता है. इस चक्कर में बहन की शादी भी नहीं हो पा रही थी. सारे रिश्तेदारों ने उस से मुंह मोड़ लिया था. समाज से कट गया था वह पूरी तरह और औफिस में भी वह मजाक का पात्र बन गया था.

माला से प्यार करने की उसे इतनी बड़ी सजा मिलेगी उस ने कहां सोचा था. कहां तो उस ने सोचा था कि नेहा से तलाक ले कर माला के साथ एक खुशहाल जिंदगी बिताऊंगा, पर यहां तो सब उलटा हो गया था. इतनी मुसीबतें झेलने से तो अच्छा था कि वह कर्कशा बीवी के साथ ही जिंदगी गुजार लेता. उस का तो अब यह हाल है कि न माया मिली न राम. ‘‘आखिर हमें क्या मिला वल्लभ? माना कि भानू के साथ मैं कभी सुखद जीवन जीने की बात तो छोड़ो उस के सपने भी नहीं देख पाई, पर उस से अलग हो कर भी कहां सुखी हूं? मेरे बच्चे तक अब मुझ से मिलना नहीं चाहते हैं और तुम से भी दूर ही तो रहना पड़ रहा है. समाज मुझे ऐसे देखता है मानो पति को छोड़ मैं ने कोई बड़ा अपराध किया है. 40 साल की हो गई हूं और कुछ सालों में बुढ़ापा छा जाएगा, तब मेरा क्या होगा? दिनरात की भागदौड़ में कैरियर भी ठीक से बन नहीं पाया है और मेरे मांबाप तक ने मेरा साथ देने के लिए मना कर दिया है,’’ वल्लभ से मिलते ही जैसे माला के अंदर भरा गुबार बाहर निकल आया.

‘‘मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही है माला, पर अब कर भी क्या सकते हैं?’’ वल्लभ ने एक आह भरी.

‘‘जानते हो जिन के घर में मैं बतौर पेइंग गैस्ट रहती हूं, वे अकसर कहती हैं कि जैसे आप पेरैंट्स चूज नहीं कर सकते हो, वैसे ही पार्टनर के बारे में अपनी तरफ से कोई फैसला नहीं ले सकते हो. जिस से एक बार शादी हो जाए, वह जैसा है उसे वैसा ही ऐक्सैप्ट कर लो. यही प्रैक्टिकल ऐप्रोच मानी जाती है.’’

वल्लभ को लगा कि वे माला से ठीक ही कह रही थीं. आखिर माला और उसे शादी के बाद प्यार में पड़ कर क्या मिला? तलाक न जाने कब मिले और कोई गारंटी भी नहीं कि मिलेगा भी कि नहीं. एक हफ्ते बाद फिर उन के केस की सुनवाई हुई. नेहा अड़ी हुई थी कि वह तलाक नहीं देगी और भानू पैसे मांग रहा था. अदालत की सीढि़यां उतरते हुए माला और वल्लभ ने एकदूसरे को इस तरह देखा कि मानों पूछ रहे हों कि अब क्या करें? दोनों के पास इस का कोई उत्तर नहीं था पर शायद भीतर ही भीतर दोनों समझ गए थे कि तलाक लेने का उन का फैसला गलत था. शादीशुदा हो कर प्यार करना और उसे निभाना उतना आसान नहीं है, जितना कि उन्होंने सोचा था. दोनों चुपचाप एक बैंच पर जा कर बैठ गए. जिंदगी उन्हें जिस मोड़ पर ले आई थी वहां से लौटना क्या अब आसान होगा? थोड़ी देर बाद माला उठी और बिना कुछ कहे चल दी. हर बार की तरह वल्लभ ने उस से न घर तक छोड़ आने की बात कही और न ही उस ने कार में बैठते हुए अदालत की उन सीढि़यों को देखा, जिन पर चलतेचलते उन दोनों के पैर ही नहीं दिलोदिमाग भी थक गया था.

Stories : खौफ – क्या था स्कूल टीचर अवनि और प्रिंसिपल मि. दास के रिश्ते का सच

Stories : प्रिंसिपल दास की नजरें आजकल अक्सर ही अवनि पर टिकी रहती थीं. अवनि स्कूल में नई आई थी और दूसरे टीचर्स से काफी अलग थी. लंबी, छरहरी, गोरी, घुंघराले बालों और आत्मविश्वास से भरपूर चाल वाली अवनि की उम्र 30- 32 साल से अधिक की नहीं थी. उधर 48 साल की उम्र में भी मिस्टर दास अकेले थे. बीवी का 10 साल पहले देहांत हो गया था. तब से वे स्कूल के कामों में खुद को व्यस्त रखते थे. मगर जब से स्कूल में टीचर के रूप में अवनि आई है उन के दिल में हलचल मची हुई है. वैसे अवनि विवाहिता है पर कहते हैं न कि दिल पर किसी का जोर नहीं चलता. प्रिंसिपल दास का दिल भी अवनि को देख बेकाबू रहता था.

” अवनि बैठो,” प्रिंसिपल दास ने अवनि को अपने केबिन में बुलाया था.

उन की नजरें अवनि के बालों में लगे गुलाब पर टिकी हुई थीं. अवनि के बालों में रोज एक छोटा सा गुलाब लगा होता था जो अलगअलग रंग का होता था. प्रिंसिपल दास ने आज पूछ ही लिया,” आप के बालों में रोज गुलाब कौन लगाता है?”

“कोई भी लगाता हो सर वह महत्वपूर्ण नहीं. महत्वपूर्ण यह है कि आप की नजरें मेरे गुलाब पर रहती हैं. जरा अपनी मंशा तो जाहिर कीजिए,”
शरारत से मुस्कुराते हुए अवनि ने पूछा तो प्रिंसिपल दास झेंप गए.

हकलाते हुए बोले,” नहीं ऐसा नहीं. दरअसल मेरी नजरें तो… आप पर ही रहती हैं.”

अवनि ने अचरज से प्रिंसिपल दास की तरफ देखा फिर मीठी मुस्कान के साथ बोली,” यह बात तो मुझे पता थी जनाब बस आप के मुंह से सुनना चाहती थी. वैसे मानना पड़ेगा आप हैं काफी दिलचस्प.”

“थैंक्स,” अवनि के कमेंट पर प्रिंसिपल दास थोड़े शरमा गए थे.

पानी का गिलास बढ़ाते हुए बोले,” आप के लिए क्या मंगाऊं चाय या कॉफी?”

“नहीं नहीं पानी ही ठीक है. आज तो आप की बातों ने ही चायकॉफ़ी का सारा काम कर दिया,” कहते हुए अवनि हंस पड़ी.

ऐसी ही दोचार छोटीमोटी मुलाकातों के बाद आखिर प्रिंसिपल दास ने एक दिन हिम्मत कर के कह ही दिया,” आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो. वैसे मैं जानता हूं एक विवाहित स्त्री से मेरा ऐसी बातें कहना उचित नहीं पर बस एक बार कह देना चाहता था.”

“मिस्टर दास हर बात जुबां से कहनी जरूरी तो नहीं होती. वैसे भी आप की नजरें यह बात कितनी ही दफा कह चुकी हैं.”

“तो क्या आप भी नजरों की भाषा पढ़ लेती हैं?”

“बिल्कुल. मैं हर भाषा पढ़ लेती हूं.”

“आप के पति भी आप से बहुत प्यार करते होंगे न,” प्रिंसिपल ने उस के चेहरे पर निगाहें टिकाते हुए पूछा.

“देखिए मैं यह नहीं कहूंगी कि वह प्यार नहीं करते. प्यार तो करते हैं पर बहुत बोरिंग इंसान हैं. न कहीं घूमने जाना, न रोमांटिक बातें करना और न हंसनाखिलखिलाना. वैरी बोरिंग. घर में पति के अलावा केवल सास हैं जो बीमार हैं. ससुर हैं नहीं. पूरे दिन घर में बोर हो जाती थी इसलिए स्कूल जॉइन कर लिया. मुझे घूमनाफिरना, दिलचस्प बातें करना, दुनिया की खुशियों को अपनी बाहों में समेट लेना यह सब बहुत पसंद है. आप जैसे लोग भी पसंद हैं जिन के अंदर कुछ अट्रैक्शन हो. मेरे पति में कोई अट्रैक्शन नहीं है.”

प्रिंसिपल दास को अवनि की बातें सुन कर गुदगुदी हो रही थी. अवनि जैसी महिला उन्हें अट्रैक्टिव कह रही थी और क्या चाहिए था. उन्हें दिल कर रहा था अपनी महबूबा यानी अवनि को बाहों में भर लें पर कैसे? कोई पृष्ठभूमि तो बनानी पड़ेगी.

मिस्टर दास ने इस का भी उपाय निकाल लिया.

“अवनि क्यों न आप की क्लास के बच्चों को ले कर हम पिकनिक पर चलें. स्पोर्ट्स डे के दौरान आप की क्लास के बच्चों ने बेहतरीन परफॉर्मेंस दी. उन के रिजल्ट भी काफी अच्छे आए हैं.”

“ग्रेट आइडिया सर. बताइए न कब चलना है और कहां जाना है?” खुश हो कर अवनि ने कहा.

अवनि क्लास 7 की क्लास टीचर थी. अगले संडे ही कक्षा 7 के बच्चों को शहर के सब से खूबसूरत पार्क में ले जाया गया. पूरे दिन बच्चे एक तरफ खेलते रहे और पार्क के दूसरे कोने में मिस्टर दास अवनि के साथ रोमांस की पींगे बढ़ाने में व्यस्त रहे.

अब तो अक्सर बहाने ढूंढे जाने लगे. प्रिंसिपल और अवनि कभी कोई मीटिंग अटैंड करने बाहर निकल जाते तो कभी किसी सेलिब्रेशन के नाम पर, कभी स्कूल के दूसरे बच्चे और टीचर की शामिल होते तो कभी दोनों अकेले ही जाने का प्रोग्राम बना लेते. प्रिंसिपल को हर समय अवनि का साथ पसंद था तो अवनि को इस बहाने घूमनाफिरना, खानापीना और मस्ती मारना. दोनों ही एकदूसरे की इच्छा पूरी कर अपना मतलब निकाल रहे थे. ऐसे ही वक्त गुजरता रहा. उन का यह अवैध रिश्ता वैध रास्तों से आगे बढ़ता रहा.

अब तो अवनि अक्सर अपने हाथ का बना खाना और पकवान आदि प्रिंसिपल के लिए ले कर आती. सब की नजरें बचा कर दोनों एकदूसरे में खो जाते. पर कहते हैं न इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता. धीरेधीरे स्टाफ रूम में दूसरे टीचर इन के रिश्ते पर कानाफूसी करने लगे. मगर अवनि इन बातों के लिए तैयार थी. वह बड़ी कुशलता से इन बातों को अफवाह बता कर आगे बढ़ जाती.

एक दिन अवनि स्कूल आई तो उसे खबर मिली कि साधारण टीचर के रूप में हाल ही में आई मिस श्वेता गुलाटी को प्रमोशन दे कर क्लास 10th की क्लास टीचर बना दिया गया है. इस बात से हर कोई अचंभित था. स्कूल के सब से सीनियर क्लास की क्लास टीचर बनना और वह भी इतने कम दिनों में, किसी को भी सहजता से कुबूल नहीं हो रहा था. अवनि तो बौखला ही गई.

वह पहले से ही यह बात गौर कर रही थी कि प्रिंसिपल दास आजकल श्वेता गुलाटी पर काफी मेहरबान रहने लगे हैं. 20 साल की श्वेता काफी खूबसूरत थी जैसे अभीअभी किसी कमसिन कली ने पंखुड़ियां खोली हों. वह जब इंग्लिश में गिटिरपिटिर करती तो दूसरे टीचर इनफीरियरिटी कंपलेक्स से ग्रस्त हो जाते. उस पर श्वेता के कपड़े भी काफी बोल्ड होते. कभी ऑफशोल्डर्ड ड्रेस तो कभी स्लीवलैस, कभी बैकलेस तो कभी शौर्ट स्कर्ट. वैसे तो उस की अदाओं के दीवाने स्कूल के ज्यादातर पुरुष थे मगर सब से ज्यादा पावरफुल प्रिंसिपल दास ही थे. सो श्वेता उन के केबिन के आसपास मंडराने लगी थी.

अवनि गुस्से में आगबबूला हो कर प्रिंसिपल के केबिन में पहुंची पर वे वहां नहीं थे. पूछने पर पता चला कि वे मिस गुलाटी के साथ लाइब्रेरी में हैं. अवनि का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने बैग उठाया और बिना किसी को इन्फॉर्म किए घर चली आई. बाद में उस के मोबाइल पर प्रिंसिपल का फोन आया तो अवनि ने फोन उठाया ही नहीं.

अगले दिन भी वह स्कूल नहीं पहुंची तो प्रिंसिपल ने उसे मैसेज किया,’ मैं तुम्हारे घर के सामने कार ले कर पहुँच रहा हूं. मुझ से नाराज हो तो भी एक बार हमें बात करनी चाहिए. आज हम बाहर ही लंच करेंगे. मैं 20 -25 मिनट में पहुंच जाऊँगा, तैयार रहना. ‘

अवनि तैयार हो कर बाहर निकली. तब तक प्रिंसिपल की कार पहुंच चुकी थी. वह कार में पीछे जा कर बैठ गई. दोनों शहर से दूर एक रेस्टोरेंट पहुंचे. कोने की एक खाली सीट पर बैठते हुए प्रिंसिपल ने बात शुरू की,” अब आप कुछ बताएंगी इस नाराज़गी की वजह क्या है?”

“वजह भी बतानी पड़ेगी? आप इतने नादान तो नहीं.”

“ओके बाबा मैं ने श्वेता को प्रमोशन दी इसी बात पर नाराज़ हो न?” प्रिंसिपल ने अपनी गलती मानी.

“मैं जान सकती हूं उस में ऐसे कौन से सुर्खाब के पंख लगे हैं जो मुझ में नहीं?” गुस्से में अवनि ने कहा.

“ऐसा कुछ नहीं है डार्लिंग…..मैं… ”

“डोंट टेल मी डार्लिंग. अब तो नई डार्लिंग मिल गई है जनाब को.”

“अरे ऐसी बात नहीं अवनि. ऐसा क्यों कह रही हो?”

“सच ही कह रही हूं. जरूर उस ने खुश कर दिया होगा आप को. तभी तो इतने कम समय में…, ” अवनि ने सीधा इल्जाम लगा दिया था.

“जुबान संभाल कर बात करो अवनि. मैं ऐसा नहीं कि हर किसी को इसी नजर से देखूं. खबरदार जो ऐसी बातें कीं. मैं प्रिंसिपल हूं, मेरे पास ऑथोरिटी है. जो मुझे काबिल लगेगा उसे प्रमोशन दूंगा. इस में तुम्हें बीच में आने का कोई हक नहीं.” प्रिंसिपल ने भी तेवर में कहा.

“हक तो वैसे भी कुछ डिसाइड नहीं हुए हैं मेरे. अब बता देना कि मैं कहां फेंक दी जाऊंगी? अब मेरी जरुरत तो रही नहीं आप को ”

“शट अप अवनि कैसी बातें कर रही हो? ”

“बातें ही नहीं काम भी करूंगी. आप खुद को सीनियर मोस्ट मत समझो. आप के ऊपर भी मैनेजमेंट है. मैं मैनेजमेंट से आप की शिकायत करूंगी.”

“अच्छा तो इतनी सी बात के लिए तुम मुझे धमकी दे रही हो? अवनि मेरे प्यार का यही बदला दोगी? ठीक है मैं भी देख लूंगा. तुम्हारे भी तो अमीर पति हैं न जिन्हें धोखा दे रही हो. मेरे पास भी बहुत से सबूत हैं अवनि जिन्हें तुम्हारे पति को दिखा दूं तो अभी हाथ में तलाक के कागजात मिल जाएंगे,” प्रिंसिपल ने धमकी दी.

“तो मिस्टर दास आप भी सावधान रहना. मेरे साथ आप की बहुत सी तस्वीरें, मैसेज और चैटिंग हैं जिन्हें मैनेजमेंट को दिखा कर अभी आप को नौकरी से निकलवा सकती हूं. आप को लूज करेक्टर साबित कर इज्जत पानी में मिला सकती हूं. पर मैं ऐसा करूंगी नहीं. मैं ने भी प्यार किया है आप को. भले ही आज कोई और पसंद आ गई हो.”

“ऐसा नहीं है अवनि. श्वेता पसंद नहीं आई बल्कि मेरे छोटे भाई की फ्रेंड है और फिर काबिल भी है. नॉलेज अच्छी है उस की. अगर तुम्हें बुरा लगा तो सॉरी पर मेरा मकसद तुम्हें हर्ट करना नहीं था,” प्रिंसिपल की आवाज नर्म पड़ गई थी.

“इट्स ओके सर. शायद मैं ने भी कुछ ज्यादा ही कह दिया आप को,”

अवनि ने भी झगड़ा बढ़ाना उचित नहीं समझा. झगड़ा बढ़ता इस से पहले ही दोनों ने पैचअप कर लिया. दोनों ही जानते थे कि उन के हाथ में एकदूसरे की कमजोर कड़ी है. नुकसान दोनों का ही होना था. बात आई गई हो गई. दोनों फिर से एकदूसरे के रोमांस में डूबते चले गए.

मगर इस बार दोनों की ही तरफ से सावधानी बरती जा रही थी. मिल कर तस्वीरें और सेल्फी लेने की परंपरा बंद कर दी गई. दोनों घूमने भी जाते तो साथ में तस्वीरें कम से कम लेते. चैटिंग के बजाय व्हाट्सएप कॉल करते और मैसेज करना भी बंद कर दिया गया. दोनों को ही डर था कि सामने वाला कभी भी उस की पोल पट्टी खोल कर उसे नंगा कर सकता है. उन के बीच पतिपत्नी का रिश्ता तो था नहीं जो हक के साथ रोमांस करें. यहां रोमांस भी छिपछिप कर करना था और एकदूसरे पर कोई हक भी नहीं था.

अवनि ने अपने मोबाइल ‘में से वे सारी तसवीरें निकाल कर लैपटॉप में एक जगह इकट्ठी कर लीं जिन तस्वीरों में दोनों एकदूसरे के बहुत करीब नजर आ रहे थे. यही नहीं सारी चैटिंग और मैसेज भी एक जगह स्टोर कर के रख लिए. वह कभी भी मौके पर चौका मारने के लिए तैयार थी. उसे पता था कि प्रिंसिपल भी ऐसा ही कुछ कर सकता है. इसलिए वह इस रिश्ते को खत्म कर उस की नाराजगी भी बढ़ाना नहीं चाहती थी.

अब उन के बीच जो रोमांस था उस में मजा तो था पर एकदूसरे से ही खौफ भी था. प्यार के साथ डर की यह भावना दोनों के लिए ही नई थी. मगर अब यही खौफ उन की जिंदगी का हिस्सा बन चूका था. दोनों ही एकदूसरे को प्यार भरी नजरों से देखते थे पर दोनों के दिमाग का एक हिस्सा समझ रहा था कि एक शख्स मेरी तबाही की वजह बन सकता है.

Kofta Recipe : घर पर बनाएं टेस्टी मटर कोफ्ता

Kofta Recipe : कोफ्ता हर किसी को पसंद आता है, लेकिन लोगों को लगता है कि मटर कोफ्ता बनाना मुश्किल है. आज हम आपको टेस्टी मटर कोफ्ता की आसान रेसिपी बताएंगे, जिसे आप अपनी फैमिली और फ्रेंड्स को लंच या डिनर में खिला सकते हैं.

हमें चाहिए

– मटर के दाने (1 कप)

– पनीर (1/4 कप कद्दूकस किया)

– हरी मिर्चें (1-2)

– टमाटर (2 कटे हुए)

– 1 प्याज (कटा हुआ)

– 1 लालमिर्च साबूत

– 3 से 4 काजू भुने

– 1 टुकड़ा अदरक ( कटा हुआ)

– 1 बड़ा चम्मच (मलाई)

– तेल (तलने के लिए)

– नमक (स्वादानुसार)

– हल्दी (1/4 छोटा चम्मच)

– धनिया पाउडर (1 छोटा चम्मच)

– जीरा पाउडर (1/4 छोटा चम्मच)

– गरममसाला (1/4 छोटा चम्मच)

– कौर्न पाउडर (1 बड़ा चम्मच)

बनाने का तरीका

– मटर और हरीमिर्च एकसाथ मिक्सी में पीस लें.

– इस मिश्रण में पनीर, कौर्न पाउडर और नमक मिला कर छोटीछोटी बौल्स तैयार करें व गरम तेल में तल कर रख लें.

– एक पैन में घी गरम कर प्याज, अदरक, काजू, टमाटर, लालमिर्च व मसाले डाल कर भूनें.

– तैयार मिश्रण को मिक्सी में पीस कर पेस्ट बना लें.

– पेस्ट को कड़ाही में डालें और जरूरतानुसार पानी व नमक मिलाएं.

– पहले से तैयार कोफ्ते भी इस में मिलाएं और 2 मिनट तक धीमी आंच पर ढक कर पकाएं.

– अब क्रीम से फिनिश कर परोसें.

क्या Pregnancy में ज्यादा यूज कर रही हैं स्मार्टफोन, तो जान लें ये जरूरी बातें

Pregnancy  : 1 माह की गर्भवती स्वरा जब अपनी गाइनोकोलौजिस्ट से मंथली चैकअप कराने गई तो प्राइमरी चैकअप करने के बाद डाक्टर ने कहा,”स्वरा, इट इज योर फर्स्ट प्रैगनैंसी, इसलिए मैं तुम्हें वार्न करना चाहूंगी कि जितना हो सके मोबाइल का यूज कम से कम करने की कोशिश करो ताकि तुम खुद को और बच्चे को हैल्दी रख सको.”

दिनभर मोबाइल में स्क्रौलिंग करने वाली स्वरा यह सुन कर थोड़ी परेशान तो हुई पर अपने बच्चे के लिए उस ने डाक्टर की सलाह के अनुसार ही मोबाइल को यूज करना सुनिश्चित किया.

सोशल मीडिया के इस युग में जहां आम लोगों को ही मोबाइल का कम से कम प्रयोग करने की सलाह दी जाती है वहीं गर्भवती महिलाओं के लिए यह सलाह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि गर्भवती महिलाएं अपने साथसाथ शिशु को भी अपने गर्भ में पाल रही होती हैं.

मोबाइल का अधिक उपयोग नींद और सेहत दोनों पर ही नकारात्मक प्रभाव डालता है. इसलिए डाक्टर्स आज गर्भवती महिलाओं को केवल बहुत जरूरी होने पर ही मोबाइल प्रयोग करने की सलाह देते हैं. मोबाइल, लैपटॉप और टैब से निकलने वाली इलैक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य और विकास को प्रभावित करती हैं. यदि आप भी प्रैगनैंट हैं तो मोबाइल प्रयोग करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें :

● डाक्टरों के अनुसार मोबाइल स्क्रीन का अधिक देर तक प्रयोग करने से उस से निकलने वाली इलैक्ट्रोमैग्नेटिक रेज के प्रभाव से जन्म के बाद बच्चे में अटेंशन डेफिसिट हाइपर ऐक्टिविटी डिसऔर्डर(एडीएचडी) या हाइपर ऐक्टिविटी जैसी समस्यायों के होने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए फोन का प्रयोग पूरे दिन में 1 घंटे से अधिक न करें.

● आजकल अधिकांश महिलाएं बाथरूम में भी अपने साथ मोबाइल ले कर जाती हैं पर बाथरूम में अनेक बैक्टीरिया होते हैं जो आप के फोन में चिपक कर आप के और बच्चे के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. इस के अतिरिक्त मोबाइल पर बात करते समय ध्यान भटकने से आप का पैर भी फिसल सकता है.

● आज के इस युग में फोन से दूरी बनाना तो असंभव ही है. इसलिए फोन का प्रयोग सीमित करने के साथसाथ फोन का प्रयोग करते समय उसे पेट से दूर रखें ताकि फोन से निकलने वाली हानिकारक तरंगें बच्चे के शारीरिक विकास को प्रभावित न कर पाएं.

● भोजन करते समय भी मोबाइल का प्रयोग करने से बचें क्योंकि इस स्थिति में आप का ध्यान भटकेगा और शरीर को सही और समुचित मात्रा में पोषण नहीं मिल पाएगा.

● यदि आप वर्किंग हैं तो फोन को हमेशा बैग में ही डाल कर रखें। साथ ही घर आने के बाद मोबाइल प्रयोग बिलकुल भी न करें क्योंकि आप का स्क्रीन टाइम औफिस में औलरेडी बहुत अधिक हो जाता है.

● बात करते समय स्पीकर औन कर के बात करने का प्रयास करें। यदि आप ईयरफोन लगा कर बात कर रहीं हैं तो भी ईयरफोन को कुरते की जेब में डालने की बजाय हाथ में पकड़ें ताकि यह पेट से दूर रहे.

● सोने से 1 घंटे पहले फोन का प्रयोग बंद कर दें ताकि आप की ब्रेन ऐक्टिविटी प्रभावित न हो और आप रात में अच्छी नींद सो सकें.

● इस दौरान आप मोबाइल, टैब और लैपटौप की अपेक्षा टीवी का प्रयोग करें क्योंकि टीवी आप एक निश्चित दूरी से देखती हैं जिस से रैडिएशन होने का खतरा नहीं होता.

● आजकल अधिकांश महिलाएं इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप पर स्क्रोलिंग करती रहती हैं जो कई बार निगेटिविटी उत्पन्न कर देता है. बिना वजह स्क्रौलिंग करने के स्थान पर आप पत्रपत्रिकाओं को पढ़ने को तरजीह दें जिस से आप के साथसाथ बच्चे का भी मानसिक विकास ठीक रह सके.

● गर्भावस्था के शुरुआत में ही आप अपनी डाक्टर से मिल कर इस अवस्था में मोबाइल को कितना और कैसे प्रयोग करना है, इस की जानकारी अवश्य ले लें.

Vicky Kaushal की एक और बेहतरीन ऐतिहासिक फिल्म छावा ने बरपाया कहर

Vicky Kaushal : 14 फरवरी के दिन देशभक्ति से भरपूर ऐतिहासिक फिल्म जो कि छत्रपति महाराज संभाजी के शौर्य वीरता पर आधारित है सिनेमाघर में रिलीज हो रही है. फिल्म की रिलीज से पहले ही दर्शकों के बीच इस फिल्म को लेकर उत्साह देखने लायक है. फिल्म रिलीज से पहले ही 3.90,014 टिकट की बिक्री हो चुकी है जिसने अब तक 11.09 करोड़ की कमाई कर ली है. इसकी वजह छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे छत्रपति संभाजी महाराज पर आधारित फिल्म छावा की कहानी इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से लिखी गई है.

जो कि निर्देशक लक्ष्मण उतेकर द्वारा सिल्वर स्क्रीन पर प्रस्तुत की गई है. फिल्म छावा की खास बात यह भी है कि इस फिल्म में संभाजी महाराज के किरदार को एक्टर विकी कौशल ने पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ जिया है. विकी कौशल उन एक्टरों में से हैं जिन्होंने स्टार और एक्टर के बीच का फर्क दर्शकों को समझाया है , स्टार वह होते हैं जो फिल्मों की सफलता के वजह से लोकप्रियता पाते हैं. और एक्टर वह होते हैं जो अपने फिल्मों के किरदारों की वजह से फिल्मी इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों से लिख जाते हैं. इसी का जीता जागता उदाहरण एक्टर विकी कौशल है जिन्होंने उरी द सर्जिकल स्ट्राइक, सरदार उधम सिंह, और सेम बहादुर जैसी फिल्मों में यादगार किरदार निभाने के बाद अब ऐतिहासिक फिल्म छावा में अपने अभिनय का लोहा मनवा लिया है.

फिल्म के बारे में अगर एक शब्द में कहे तो तो यह एक शानदार और जानदार फिल्म है. फिल्म में इतिहास, जुनून, देश भक्ति और प्रेम की भावना, तलवारबाजी और एक्शन से भरे दृश्य, बेहतरीन तरीके से दिखाए गए हैं. फिल्म छावा में जबरदस्त परफौर्मेंस देकर विकी कौशल ने अपनी पीढ़ी के बेहतरीन एक्टर्स में से एक के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर ली है. फिल्म का एकएक सीन देखने लायक है. एक्शन डायरेक्शन, संगीत, सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक लाजवाब है. छावा में जहां विकी कौशल का शेर के साथ युद्ध, युद्ध के दौरान युद्ध की अनेक नीतियों को अलग अलग तरीके से चतुरता के साथ अंजाम देना, महाराज संभाजी पर दिल दहलाने वाले अत्याचार दर्दनाक मौत,जैसे असरदार दृश्य, दमदार संवाद के साथ खूबसूरत तरीके से पेश किये गए है.

विकी कौशल के अलावा औरंगजेब के रोल में अक्षय खन्ना, संभाजी की पत्नी के रोल में रश्मिका मंदाना, औरंगजेब की पत्नी के रोल में डायना पेंटी, अन्य कलाकारो में दिव्या दत्ता, आशुतोष राणा, संतोष जुवेकर, आदि सभी कलाकारों ने अपने किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय किया है . छावा फिल्म में एक खास बात यह भी बताई गई है की पौराणिक युग हो या ऐतिहासिक, दुश्मन या गद्दार घर के अंदर ही होता है, जिसे पहचानना मुश्किल होता है .क्योंकि वह अपना खुद का ही कोई रिश्तेदार होता है. बाहर के दुश्मनों से लड़ा जा सकता है क्योंकि हमें पता है कि वह हमारा दुश्मन है. लेकिन घर के दुश्मनों से लड़ना मुश्किल हो जाता है और वही घर का भेदी ओर गद्दार, मौत का कारण भी बन जाते हैं . छत्रपति संभाजी महाराज की दर्दनाक मौत के जिम्मेदार भी उनके अपने ही थे जिन्होंने मुगलों के साथ मिलकर एक महान शौर्य वीर को मौत के घाट उतार दिया.

बिन बालों की दुलहन बनी Neehar Sachdeva, ‘बाल्ड लुक’ हुआ वायरल

Neehar Sachdeva : लंबे, घने, लहराते बाल हर किसी लड़की की खूबसूरती में चार चांद तो लगाते ही हैं, साथ ही उसके सेल्फ कौन्फिडेंस को भी बढ़ाते हैं और ऐसे में अगर किसी लड़की को अपने बाल हमेशा के लिए खो देना पड़ें तो ये उसके लिए किसी शौकिंग से कम नही हो सकता है. जी हां मैं बात कर रही हूं एक ऐसी ब्राइड की जो अपनी ही मैरिज में बाल्ड लुक में नजर आयी.

बाल्ड लुक को किया एक्सेप्ट

सभी लड़कियां अपनी शादी से पहले ही अपने लुक, मेकअप और हेयरस्टाइल को लेकर बहुत कांसेस रहती हैं ताकि अपनी शादी के दिन ब्राइड के रूप में उनकी खूबसूरती में कोई कमी ना रह जाए . लेकिन एक ब्राइड ऐसी भी हैं. जिसने खूबसूरती की परिभाषा ही बदल दी और अपनी लाइफ के सबसे बड़े दिन यानि अपनी शादी के दिन अपने लुक के बारे में ज्यादा सोचने की बजाय, कौन्फिडेंस के साथ अपने बाल्ड लुक को एक्सेप्ट किया.

वायरल बाल्ड ब्राइड

हाल ही में सोशल मीडिया पर बाल्ड ब्राइड यानि बिना बालों वाली दुल्हन वायरल हो रही है. ट्रेडिशनल रेड ड्रेस में ब्राइड बनी निहार ने अपने बिना बालों वाले सिर पर टेप की हेल्प से मांग टीका भी पहना है. जो एक बोल्ड स्टेटमेंट था. उनके ग्रूम अरुण वी गणपति ने उन्हें आश्चर्य से देखा और राहत भरी सांस ली. इस बाल्ड ब्राइड को देख कर लोग हैरान होने के साथ उसकी प्रशंसा भी कर रहे हैं कौन हैं ये बाल्ड ब्राइड आइये जानते हैं.

खूबसूरती की नई मिशाल

भारत में जन्मी और यूएस में रहने वाली ये बाल्ड ब्राइड डिजिटल क्रिएटर निहार सचदेवा हैं. लंबे समय से लव रिलेशन में रह रहीं निहार ने पिछले दिनों थाईलैंड में अरुण गणपति से शादी की है. इसके बाद सोशल मीडिया पर शादी की तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं.क्योंकि वह अपनी मैरिज में बिना विग पहने ‘बाल्ड लुक’ में ब्राइड बनी नजर आ रही हैं.उन्होंने बिना बालों के खूबसूरती और कॉन्फिडेंस की ऐसी मिशाल दी हैं. जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. इसके साथ ही निहार ने अपनी शादी में उन लोगों को भी इनवाइट किया, जो कभी उनके बाल्ड लुक को देख कर हंसते और मजाक उड़ाते थे। निहार के इस फैसले ने ये बता दिया की किसी भी लड़की की खूबसूरती की परिभाषा उसका सेल्फीकौन्फिडेंस ही हैं ना की उसका ओवरआल लुक.

इस बीमारी से थी पीड़ित 

निहार बचपन से ही एलोपेसिया से पीड़ित थीं. एलोपेसिया एरीटा एक आम आटोइम्यून बीमारी है. जो सिर के स्माल राउंड एरिया में हेयर फौल का कारण बनती हैं. जिससे छोटी उम्र में ही उनके बाल उड़ गए थे. इस वजह से सालों तक उन्होंने विग पहनी. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी नेचुरल ब्यूटी को अपनाने का फैसला किया और अपने सिर के बाल पूरी तरह से हटा लिए. निहार  सचदेवा को एलोपेसिया होने का पता तब चला था जब वह सिर्फ छह महीने की थीं. इस स्थिति में बौडी के डिफरेंट पार्ट से हेयर लौस होने लगते हैं. जिनमें सिर के बाल भी शामिल होते हैं.

सालों तक छुपाया 

निहार की फैमली उनके गंजे सिर (bald head) को सीक्रटे रखना चाहते थे . इसलिए वे जब भी स्कूल या बाहर जाती थी. उस समय उन्हें विग पहननी होती थी. सालों तक उन्होंने अपनी इस स्थिति को छुपाया, फिर निहार ने अपना सिर मुंडवाने और इसका सेलिब्रेशन मनाने का फैसला किया. उन्होंने एक पार्टी आयोजित कर उन सभी लोगों को इन्वाइट किया जो उनके गंजेपन का मजाक उड़ाते थे. उनके इस जज़्बे को लोगों से बहुत सम्मान और समर्थन मिला.

मुहिम का हिस्सा भी रही

इससे पहले निहार ‘द बाल्ड ब्राउन ब्राइड’ नामक मुहिम में हिस्सा ले चुकी थीं, जिसका उद्देश्य महिलाओं को उनकी नेचुरल ब्यूटी को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना था.

Couple Goals : मेरा बौयफ्रैंड उम्र में बड़ा है, उससे रिलेशनशिप में कोई प्रौब्लम तो नहीं?

Couple Goals : अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं 26 साल की हूं और मेरा बौयफ्रैंड मुझ से 5 साल बड़ा है. क्या इस वजह से सैक्स संबंध में कोई परेशानी आ सकती है? मैं उस से सैक्स करना चाहती हूं पर कभीकभी लगता है कि वह मेरा साथ नहीं दे पाता, क्योंकि एक बार जब देर तक फोरप्ले करने के बाद वह अपना पैनिस इंसर्ट करने की कोशिश कर रहा था तो बारबार की कोशिशों के बावजूद वह कामयाब नहीं हो पा रहा था. क्या उसे कोई परेशानी है? कृपया सलाह दें?

जवाब-

आप के पार्टनर की उम्र इतनी भी नहीं है कि वह सैक्स करने में सक्षम नहीं हो. सच तो यह है कि अगर उचित आहार संबंधी निर्देशों का पालन करें और नियमित व्यायाम की आदत डालें तो सैक्स का आनंद लंबी आयु तक किया जा सकता है.

ऐसा आमतौर पर सैक्सुअल इंटरकोर्स की जानकारी के अभाव में होता है. हो सकता है हड़बड़ी में अथवा किसी भय की वजह से वह सैक्स संबंध बनाने में नाकामयाब रहा हो.

सैक्स आराम से निबटाने वाली प्रक्रिया है, जिस में दोनों का ही मन शांत हो और वातावरण भी शांत हो.

बेहतर होगा कि सैक्स से पहले आप दोनों फोरप्ले का आनंद लें. जब साथी पूरी तरह सैक्स के लिए तैयार हो जाए तभी पैनिस इंसर्ट करने को कहें. यकीनन, आप दोनों को ही इस में चरमसुख मिलेगा. पर ध्यान रहे, पुरुष साथी से इस दौरान कंडोम का इस्तेमाल करने को जरूर कहें.

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कोरोना काल में सेक्स सबसे बडी परेशानी का सबब बन गया है. बिना तैयारी के सेक्स से गर्भ ठहरने लगाहै. उम्रदराज लोगों के सामने ऐसी परेशानियां खडी हो गई है. स्कूल बंद होने से बच्चों के घर पर रहने से पति पत्नी को अपने लिये समय निकालना मुश्किल होने लगा. बाहर आना जाना बंद हो गया. कभी पति के पास समय है तो कभी पत्नी का मूड नहीं. कभी पत्नी का मूड बना तो पति को औनलाइन वर्क से समय नहीं. ऐसे में आपसी तनाव, झगडे और जल्दी सेक्स की आदत आम होने लगी है. जिस वजह से आपसी झगडे बढने लगे है. ऐसे में जरूरी है कि आपस में समय तय करके सेक्स करे. जिससे आपसी झगडे कम होगे तालमेल बढ़ेगा.

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