मेघमल्हार: भाग 1- अभय की शादीशुदा जिंदगी में किसने मचाई खलबली

उस का नाम मेघा न हो कर मल्हार होता तो शायद मेरे जीवन में बादलों की गड़गड़ाहट के बजाय मेघमल्हार की मधुर तरंगें हिलोरें ले रही होतीं. परंतु ऐसा नहीं हुआ था. वह काले घने मेघों की तरह मेरे जीवन में आई थी और कुछ ही पलों में अपनी गड़गड़ाहट से मुझे डराती और मेरे मन के उजालों को निगलती हुई अचानक चली गई.

मेघा मेरे जीवन में तब आई जब मैं अधेड़ावस्था की ओर अग्रसर हो रहा था. मेरी और उस की उम्र में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं था. मैं 30 के पार था और वह 20-22 के बीच की निहायत खूबसूरत लड़की. वह कुंआरी थी और मैं एक शादीशुदा व्यक्ति. उस से लगभग 10 साल बड़ा, परंतु उस ने मेरी उम्र नहीं, मुझ से प्यार किया था और मुझे इस बात का गर्व था कि एक कमसिन लड़की मेरे प्यार में गिरफ्तार है और वह दिलोजान से मुझ से प्यार करती है और मैं भी उसे उसी शिद्दत से प्यार करता हूं.

मेरे साथ रहते हुए उस ने मुझ से कभी कुछ नहीं मांगा. मैं ही अपनी तरफ से उसे कभी कपड़े, कभी कौस्मैटिक्स या ऐसी ही रोजमर्रा की जरूरत की चीजें खरीद कर दे दिया करता था. हां, रेस्तरां में जा कर पिज्जा, बर्गर खाने का उसे बहुत शौक था. मैं अकसर उसे मैक्डोनल्ड्स या डोमिनोज में ले जाया करता था. उसे मेरे साथ बाहर जानेआने में कोई संकोच नहीं होता था. उस के व्यवहार में एक खिलंदरापन होता था. बाहर भी वह मुझे अपना हमउम्र ही समझती थी और उसी तरह का व्यवहार करती थी. भीड़ के बीच में कभीकभी मुझे लज्जा का अनुभव होता, परंतु उसे कभी नहीं. ग्लानि या लज्जा नाम के शब्द उस के जीवन से गायब थे.

वह असम की रहने वाली थी और अपने मांबाप से दूर मेरे शहर में पढ़ाई के लिए आई थी. होस्टल में न रह कर वह किराए का मकान तलाश कर रही थी और इसी सिलसिले में वह मेरे मकान पर आई थी. अपने घर में मैं अपनी पत्नी और एक छोटे बच्चे के साथ रहता था. उसे किराए पर एक कमरे की आवश्यकता थी. हमारा अपना मकान था, परंतु हम ने कभी किराएदार रखने के बारे में नहीं सोचा था. हमें किराएदार की आवश्यकता भी नहीं थी, परंतु मेघा इतनी प्यारी और मीठीमीठी बातें करने वाली लड़की थी कि कुछ ही पलों में उस ने मेरी पत्नी को मोहित कर लिया और न न करते हुए भी हम ने उसे एक कमरा किराए पर देने के लिए हां कर दी. वह मेरे घर में पेइंगगेस्ट की हैसियत से रहने लगी. एक घर में रहते हुए हमारी बातें होतीं, कभी एकांत में, कभी सब के सामने और पता नहीं वह कौन सा क्षण था, जब उस की भोली सूरत मेरे दिल में समा गई और उस की मीठी बातोें में मुझे रस आने लगा. मैं उस के इर्दगिर्द एक मवाली लड़के की तरह मंडराने लगा. पत्नी को तो आभास नहीं हुआ, परंतु वह मेरे मनोभावों को ताड़ गई कि मैं उसे किस नजर से देख रहा था.

यह सच भी है कि लड़कियां पुरुषों के मनोभाव को बहुत जल्दी पहचान जाती हैं. उस ने एक दिन बेबाकी से पूछा, ‘‘आप मुझे पसंद करते हैं?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, तुम एक बहुत प्यारी लड़की हो,’’ मैं ने बिना किसी हिचक के कहा.

‘‘तुम एक पुरुष की दृष्टि से मुझे पसंद करते हो न?’’ उस ने जोर दे कर पूछा.

मैं सकपका गया. उस की आंखों में तेज था. मैं न नहीं कह सका. मेरे मुंह से निकला, ‘‘हां, मैं तुम्हें प्यार करता हूं,’’ मैं सच को कहां तक छिपा सकता था.

‘‘आप का घर बिखर जाएगा,’’ उस ने मुझे सचेत किया. मैं चुप रह गया. वह सच कह रही थी. परंतु प्यार अंधा होता है. मैं उस के प्रति अपने झुकाव को रोक नहीं सका. वह भी अपने को रोकना नहीं चाहती थी. उस के अंदर आग थी और वह उसे बुझाना चाहती थी. वह मुझ से प्यार न करती तो किसी और से कर लेती. लड़कियां जब घर से बाहर कदम रखती हैं तो उन के लिए लड़कों की कोई कमी नहीं होती.

हम दोनों जल्द ही एक अनैतिक संबंध में बंध गए. हमें इस बात की भी कोई परवा नहीं थी कि हम एक ही घर में रह रहे थे, जहां मेरी पत्नी और एक छोटा बच्चा था, परंतु हम सावधानी बरतते थे और अकसर एकांत में मिलने के अवसर ढूंढ़ निकालते थे.

एक दिन वह बोली, ‘‘अभय,’’ अकेले में वह मुझे मेरे नाम से ही बुलाती थी, ‘‘हमारे संबंध ज्यादा दिनों तक किसी की नजरों से छिपे नहीं रह सकते हैं.’’

‘‘तब…?’’ मैं ने इस तरह पूछा जैसे समस्या का उस के पास समाधान था.

‘‘मुझे आप का घर छोड़ना पड़ेगा,’’ उस ने बिना हिचक के कहा.

‘‘तुम मुझे छोड़ कर चली जाओगी?’’ मैं आश्चर्यचकित रह गया.

‘‘नहीं, मैं केवल आप का घर छोड़ूंगी, आप को नहीं… मुझे आप दूसरा घर किराए पर दिलवा दो. हम लोग वहीं मिला करेंगे. हफ्ते में 1 या 2 बार… आपस में सलाह कर के.’’

‘‘मैं शायद इतनी दूरी बरदाश्त न कर सकूं,’’ मेरे दिल के ऊपर जैसे किसी ने एक भारी पत्थर रख दिया था. हवा जैसे थम सी गई थी. सांस रुकने लगी थी. प्यार में ऐसा क्यों होता है कि जब हम मिलते हैं तो हर चीज आसान लगती है और जब बिछड़ते हैं तो हर चीज बेगानी हो जाती है. समय भारी लगने लगता है.

उस का स्वर सधा हुआ था, ‘‘अगर आप चाहते हैं कि हमारे संबंध इसी तरह बरकरार रहें तो इतनी दूरी हमें बरदाश्त करनी ही पड़ेगी. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’

वह अपने इरादे पर दृढ़ थी और मैं उस के सामने पिटा हुआ मोहरा…पत्नी को उस ने उलटीसीधी बातों से मना लिया और वह इस प्रकार अपने कालेज के पास एक नए घर में रहने के लिए आ गई. मैं ने अपना परिचय वहां उस के स्थानीय गार्जियन के तौर पर दिया था. इस प्रकार मुझे उस के घर आनेजाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती थी. किसी को शक भी नहीं होता था.

परंतु अलग घर में रहने के कारण मैं मेघा से रोज नहीं मिल पाता था. औफिस की व्यस्तताएं अलग थीं. फिर घर की जिम्मेदारियां थीं. मैं दोनों से विमुख नहीं होना चाहता था, परंतु मेघा का आकर्षण अलग था. मैं उस के हालचाल जानने के बहाने छुट्टी में उस से मिलने चला जाता था. परंतु हर रविवार जाने से पत्नी को शक भी हो सकता था. कई बार तो वह भी साथ चलने को तैयार हो जाती थी. एकाध बार उसे ले कर भी जाना पड़ा था. तब मैं मन मसोस कर रह जाता था.

Father’s Day 2023: परीक्षाफल- क्या चिन्मय ने पूरा किया पिता का सपना

जैसे किसान अपने हरेभरे लहलहाते खेत को देख कर गद्गद हो उठता है उसी प्रकार रत्ना और मानव अपने इकलौते बेटे चिन्मय को देख कर भावविभोर हो उठते थे.

चिन्मय की स्थिति यह थी कि परीक्षा में उस की उत्तर पुस्तिकाओं में एक भी नंबर काटने के लिए उस के परीक्षकों को एड़ीचोटी का जोर लगाना पड़ता था. यही नहीं, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर की अन्य प्रतिभाखोज परीक्षाओं में भी उस का स्थान सब से ऊपर होता था.

इस तरह की योग्यताओं के साथ जब छोटी कक्षाओं की सीढि़यां चढ़ते हुए चिन्मय 10वीं कक्षा में पहुंचा तो रत्ना और मानव की अभिलाषाओं को भी पंख लग गए. अब उन्हें चिन्मय के कक्षा में प्रथम आने भर से भला कहां संतोष होने वाला था. वे तो सोतेजागते, उठतेबैठते केवल एक ही स्वप्न देखते थे कि उन का चिन्मय पूरे देश में प्रथम आया है. कैमरों के दूधिया प्रकाश में नहाते चिन्मय को देख कर कई बार रत्ना की नींद टूट जाती थी. मानव ने तो ऐसे अवसर पर बोलने के लिए कुछ पंक्तियां भी लिख रखी थीं. रत्ना और मानव उस अद्भुत क्षण की कल्पना कर आनंद सागर में गोते लगाते रहते.

चिन्मय को अपने मातापिता का व्यवहार ठीक से समझ में नहीं आता था. फिर भी वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें प्रसन्न रखने की कोशिश करता रहता. पर तिमाही परीक्षा में जब चिन्मय के हर विषय में 2-3 नंबर कम आए तो मातापिता दोनों चौकन्ने हो उठे.

‘‘यह क्या किया तुम ने? अंगरेजी में केवल 96 आए हैं? गणित में भी 98? हर विषय में 2-3 नंबर कम हैं,’’ मानव चिन्मय के अंक देखते ही चीखे तो रत्ना दौड़ी चली आई.

‘‘क्या हुआ जी?’’

‘‘होना क्या है? हर विषय में तुम्हारा लाड़ला अंक गंवा कर आया है,’’ मानव ने रिपोर्ट कार्ड रत्ना को थमा दिया.

‘‘मम्मी, मेरे हर विषय में सब से अधिक अंक हैं, फिर भी पापा शोर मचा रहे हैं. मेरे अंगरेजी के अध्यापक कह रहे थे कि उन्होंने 10वीं में आज तक किसी को इतने नंबर नहीं दिए.’’

‘‘उन के कहने से क्या होता है? आजकल बच्चों के अंगरेजी में भी शतप्रतिशत नंबर आते हैं. चलो, अंगरेजी छोड़ो, गणित में 2 नंबर कैसे गंवाए?’’

‘‘मुझे नहीं पता कैसे गंवाए ये अंक, मैं तो दिनरात अंक, पढ़ाई सुनसुन कर परेशान हो गया हूं. अपने मित्रों के साथ मैं पार्क में क्रिकेट खेलने जा रहा हूं,’’ अचानक चिन्मय तीखे स्वर में बोला और बैट उठा कर नौदो ग्यारह हो गया.

मानव कुछ देर तक हतप्रभ से बैठे शून्य में ताकते रह गए. चिन्मय ने इस से पहले कभी पलट कर उन्हें जवाब नहीं दिया था. रत्ना भी बैट ले कर बाहर दौड़ कर जाते हुए चिन्मय को देखती रह गई थी.

‘‘मानव, मुझे लगता है कि कहीं हम चिन्मय पर अनुचित दबाव तो नहीं डाल रहे हैं? सच कहूं तो 96 प्रतिशत अंक भी बुरे नहीं हैं. मेरे तो कभी इतने अंक नहीं आए.’’

‘‘वाह, क्या तुलना की है,’’ मानव बोले, ‘‘तुम्हारे इतने अंक नहीं आए तभी तो तुम घर में बैठ कर चूल्हा फूंक रही हो. वैसे भी इन बातों का क्या मतलब है? मेरे भी कभी 80 प्रतिशत से अधिक अंक नहीं आए, पर वह समय अलग था, परिस्थितियां भिन्न थीं. मैं चाहता हूं कि जो मैं नहीं कर सका वह मेरा बेटा कर दिखाए,’’ मानव ने बात स्पष्ट की.

उधर रत्ना मुंह फुलाए बैठी थी. मानव की बातें उस तक पहुंच कर भी नहीं पहुंच रही थीं.

‘‘अब हमें कुछ ऐसा करना है जिस से चिन्मय का स्तर गिरने न पाए,’’ मानव बहुत जोश में आ गए थे.

‘‘हमें नहीं, केवल तुम्हें करना है, मैं क्या जानूं यह सब? मैं तो बस, चूल्हा फूंकने के लायक हूं,’’ रत्ना रूखे स्वर में बोली.

‘‘ओफ, रत्ना, अब बस भी करो. मेरा वह मतलब नहीं था, और चूल्हा फूंकना क्या साधारण काम है? तुम भोजन न पकाओ तो हम सब भूखे मर जाएं.’’

‘‘ठीक है, बताओ क्या करना है?’’ रत्ना अनमने स्वर में बोली थी.

‘‘मैं सोचता हूं कि हर विषय के लिए एकएक अध्यापक नियुक्त कर दूं जो घर आ कर चिन्मय को पढ़ा सकें. अब हम पूरी तरह से स्कूल पर निर्भर नहीं रह सकते.’’

‘‘क्या कह रहे हो? चिन्मय कभी इस के लिए तैयार नहीं होगा.’’

‘‘चिन्मय क्या जाने अपना भला- बुरा? उस के लिए क्या अच्छा है क्या नहीं, यह निर्णय तो हमें ही करना होगा.’’

‘‘पर इस में तो बड़ा खर्च आएगा.’’

‘‘कोई बात नहीं. हमें रुपएपैसे की नहीं चिन्मय के भविष्य की चिंता करनी है.’’

‘‘जैसा आप ठीक समझें,’’ रत्ना ने हथियार डाल दिए पर चिन्मय ने मानव की योजना सुनी तो घर सिर पर उठा लिया था.

‘‘मुझे किसी विषय में कोई ट्यूशन नहीं चाहिए. मैं 5 अध्यापकों से ट्यूशन पढ़ूंगा तो अपनी पढ़ाई कब करूंगा?’’ उस ने हैरानपरेशान स्वर में पूछा.

‘‘5 नहीं केवल 2. पहला अध्यापक गणित और विज्ञान के लिए होगा और दूसरा अन्य विषयों के लिए,’’ मानव का उत्तर था.

‘‘प्लीज, पापा, मुझे अपने ढंग से परीक्षा की तैयारी करने दीजिए. मेरे मित्रों को जब पता चलेगा कि मुझे 2 अध्यापक घर में पढ़ाने आते हैं तो मेरा उपहास करेंगे. मैं क्या बुद्धू हूं?’’ यह कह कर चिन्मय रो पड़ा था.

पर मानव को न मानना था, न वह माने. थोड़े विरोध के बाद चिन्मय ने इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार लिया. स्कूल और ट्यूशन से निबटता चिन्मय अकसर मेज पर ही सिर रख सो जाता.

मानव और रत्ना ने उस के खानेपीने पर भी रोक लगा रखी थी. चिन्मय की पसंद की आइसक्रीम और मिठाइयां तो घर में आनी ही बंद थीं.

समय पंख लगा कर उड़ता रहा और परीक्षा कब सिर पर आ खड़ी हुई, पता ही नहीं चला.

परीक्षा के दिन चिन्मय परीक्षा केंद्र पहुंचा. मित्रों को देखते ही उस के चेहरे पर अनोखी चमक आ गई, पर रत्ना और मानव का बुरा हाल था मानो परीक्षा चिन्मय को नहीं उन्हें ही देनी हो.

परीक्षा समाप्त हुई तो चिन्मय ही नहीं रत्ना और मानव ने भी चैन की सांस ली. अब तो केवल परीक्षाफल की प्रतीक्षा थी.

मानव, रत्ना और चिन्मय हर साल घूमने और छुट्टियां मनाने का कार्यक्रम बनाते थे पर इस वर्ष तो अलग ही बात थी. वे नहीं चाहते थे कि परीक्षाफल आने पर वाहवाही से वंचित रह जाएं.

धु्रव पब्लिक स्कूल की परंपरा के अनुसार परीक्षाफल मिलने का समाचार मिलते ही रत्ना और मानव चिन्मय को साथ ले कर विद्यालय जा पहुंचे थे. उन की उत्सुकता अब अपने चरम पर थी. दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी. विद्यालय के मैदान में मेला सा लगा था. कहीं किसी दिशा में फुसफुसाहट होती तो लगता परीक्षाफल आ गया है. कुछ ही देर में प्रधानाचार्या ने इशारे से रत्ना को अंदर आने को कहा तो रत्ना हर्ष से फूली न समाई. इतने अभिभावकों के बीच से केवल उसे ही बुलाने का क्या अर्थ हो सकता है, सिवा इस के कि चिन्मय सदा की तरह प्रथम आया है. वह तो केवल यह जानना चाहती थी कि वह देश में पहले स्थान पर है या नहीं.

उफ, ये मानव भी ऐन वक्त पर चिन्मय को ले कर न जाने कहां चले गए. यही तो समय है जिस की उन्हें प्रतीक्षा थी. रत्ना ने दूर तक दृष्टि दौड़ाई पर मानव और चिन्मय कहीं नजर नहीं आए. रत्ना अकेली ही प्रधानाचार्या के कक्ष में चली गई.

‘‘देखिए रत्नाजी, परीक्षाफल आ गया है. हमारी लिपिक आशा ने इंटरनेट पर देख लिया है, पर बाहर नोटिसबोर्ड पर लगाने में अभी थोड़ा समय लगेगा,’’ प्रधानाचार्या ने बताया.

‘‘आप नोटिसबोर्ड पर कभी भी लगाइए, मुझे तो बस, मेरे चिन्मय के बारे में बता दीजिए.’’

‘‘इसीलिए तो आप को बुलाया है. चिन्मय के परीक्षाफल से मुझे बड़ी निराशा हुई है.’’

‘‘क्या कह रही हैं आप?’’

‘‘मैं ठीक कह रही हूं, रत्नाजी. कहां तो हम चिन्मय के देश भर में प्रथम आने की उम्मीद लगाए बैठे थे और कहां वह विद्यालय में भी प्रथम नहीं आया. वह स्कूल में चौथे स्थान पर है.’’

‘‘मैं नहीं मानती, ऐसा नहीं हो सकता,’’ रत्ना रोंआसी हो कर बोली थी.

‘‘कुछ बुरा नहीं किया है चिन्मय ने, 94 प्रतिशत अंक हैं. किंतु…’’

‘‘अब किंतुपरंतु में क्या रखा है?’’ रत्ना उदास स्वर में बोली और पलट कर देखा तो मानव पीछे खड़े सब सुन रहे थे.

‘‘चिन्मय कहां है?’’ तभी रत्ना चीखी थी.

‘‘कहां है का क्या मतलब है? वह तो मुझ से यह कह कर घर की चाबी ले गया था कि मम्मी ने मंगाई है,’’ मानव बोले.

‘‘क्या? उस ने मांगी और आप ने दे दी?’’ पूछते हुए रत्ना बिलखने लगी थी.

‘‘इस में इतना घबराने और रोने जैसा क्या है, रत्ना? चलो, घर चलते हैं. चाबी ले कर चिन्मय घर ही तो गया होगा,’’ मानव रत्ना के साथ अपने घर की ओर लपके थे. वहां से जाते समय रत्ना ने किसी को यह कहते सुना कि पंकज इस बार विद्यालय में प्रथम आया है और उसी ने चिन्मय को परीक्षाफल के बारे में बताया था, जिसे सुनते ही वह तीर की तरह बाहर निकल गया था.

विद्यालय से घर तक पहुंचने में रत्ना को 5 मिनट लगे थे पर लिफ्ट में अपने फ्लैट की ओर जाते हुए रत्ना को लगा मानो कई युग बीत गए हों.

दरवाजे की घंटी का स्विच दबा कर रत्ना खड़ी रही, पर अंदर से कोई उत्तर नहीं आया.

‘‘पता नहीं क्या बात है…इतनी देर तक घंटी बजने के बाद भी अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही है मानव, कहीं चिन्मय ने कुछ कर न लिया हो,’’ रत्ना बदहवास हो उठी थी.

‘‘धीरज रखो, रत्ना,’’ मानव ने रत्ना को धैर्य धारण करने को कहा पर घबराहट में उस के हाथपैर फूल गए थे. तब तक वहां आसपास के फ्लैटों में रहने वालों की भीड़ जमा हो गई थी.

कोई दूसरी राह न देख कर किसी पड़ोसी ने पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस अपने साथ फायर ब्रिगेड भी ले आई थी.

बालकनी में सीढ़ी लगा कर खिड़की के रास्ते फायरमैन ने चिन्मय के कमरे में प्रवेश किया तो वह गहरी नींद में सो रहा था. फायरमैन ने अंदर से मुख्यद्वार खोला तो हैरानपरेशान रत्ना ने झिंझोड़कर चिन्मय को जगाया.

‘‘क्या हुआ, बेटा? तू ठीक तो है?’’ रत्ना ने प्रेम से उस के सिर पर हाथ फेरा था.

‘‘मैं ठीक हूं, मम्मी, पर यह सब क्या है?’’ उस ने बालकनी से झांकती सीढ़ी और वहां जमा भीड़ की ओर इशारा किया.

‘‘हमें परेशान कर के तुम खुद चैन की नींद सो रहे थे और अब पूछ रहे हो यह सब क्या है?’’ मानव कुछ नाराज स्वर में बोले थे.

‘‘सौरी पापा, मैं आप की अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर सका.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते बेटे, हमें तुम पर गर्व है,’’ रत्ना ने उसे गले से लगा लिया था. मानव की आंखों में भी आंसू झिलमिला रहे थे. कैसा जनून था वह, जिस की चपेट में वे चिन्मय को शायद खो ही बैठते. मानव को लग रहा था कि जीवन कुछ अंकों से नहीं मापा जा सकता, इस का विस्तार तो असीम, अनंत है. उन्मुक्त गगन की सीमा क्या केवल एक परीक्षा की मोहताज है?

Father’s day Special: बाप बड़ा न भैया

उस दिन डाक में एक सुनहरे, रुपहले,  खूबसूरत कार्ड को देख कर उत्सुकता हुई. झट खोला, सरसरी निगाहों से देखा. यज्ञोपवीत का कार्ड था. भेजने वाले का नाम पढ़ते ही एक झनझनाहट सी हुई पूरे शरीर में.

ऐसी बात नहीं थी कि पुनदेव का नाम पढ़ कर मुझे कोई दुख हुआ, बल्कि सच तो यह था कि मुझे उस व्यवस्था पर, उस सामाजिक परिवेश पर रोना आया.

पुनदेव का तकिया कलाम था ‘दरबे से सरबा जे चहबे से करबा’ तब मुझे उस की यह स्वरचित पंक्तियां बेवकूफी भरी लगती थीं पर अब उस कार्ड को देख कर लग रहा था, शायद वही सही सोचता था और हमारी इस व्यवस्था को बेहतर जानता था.

कार्ड को फिर पढ़ा. लिखा था, ‘‘डाक्टर पुनदेव (एम.ए. पीएच.डी.) प्राचार्य, रामयश महाविद्यालय, हीरापुर, आप को सपरिवार निमंत्रित करते हैं, अपने तृतीय पुत्र के यज्ञोपवीत संस्कार के अवसर पर…’’

मेरी आंखें कार्ड पर थीं, पर मन बरसों पीछे दौड़ रहा था.

पुनदेव 5वीं बार 10वीं कक्षा में फेल हो गया था. उस के परिवार में अब तक किसी ने 7वीं पास नहीं की थी, पुनदेव क्या खा कर 10वीं करता. सारे गांव में जंगल की आग की तरह यही चर्चा फैली हुई थी. जिस केजो जी में आता, कहता और आगे बढ़ जाता.

एक वाचाल किस्मके अधेड़ व्यक्ति ने व्यंग्य कसते हुए कहा, ‘लक्ष्मी उल्लू की सवारी करेगी. पुनदेव के खानदान में सभी लोग उल्लू हैं.’

पर रामयश (पुनदेव के पिता) उन लोगों में से थे जो यह मान कर चलते थे कि इस दुनिया में लक्ष्मी की कृपा से सब काला सफेद हो सकता है. वह काले को सफेद करने की उधेड़बुन में लगे थे.

तब तक उन के दरबारी आ गए और लगे राग दरबारी अलापने. कोई स्कूल के शिक्षकों को लानत भेजता तो कोई गांव के उन परिवारों को गालियां देने लगता, जो पढ़ेलिखे थे और बकौल दरबारियों के पुनदेव के फेल हो जाने से बेहद प्रसन्न थे. रामयश चतुर सेनापति थे. वह अपने उन चमचों को बखूबी पहचानते थे, पर उस समय उन की बातों का उत्तर देना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा.

थोड़ी देर हाजिरी लगा कर वे पालतू मानव अपनीअपनी मांदों में चले गए तो रामयश ने अपने एक खास आदमी को बुलावा भेजा.

विक्रमजी शहर का रहने वाला था. रामयश को बड़ेबड़े सत्ताधारियों तक पहुंचाने वाली सीढ़ी का काम वही करता था. उसे आया देख कर उन्होंने गहन गंभीर आवाज में कहा, ‘विक्रमजी, आप ने तो सुना ही होगा कि पुनदेव इस बार भी फेल हो गया, स्कूल बदलतेबदलते मेरी फजीहत भी हुई और हाथ लगे ढाक के वही तीन पात. पर मैं हार मानने वाले खिलाडि़यों में से नहीं हूं. धरतीआकाश एक कर दीजिए. कर्मकुकर्म कुछ भी कीजिए, पर मेरे कुल पर काला अक्षर भैंस बराबर का जो ठप्पा लगा है, उसे पुनदेव के जरिए दूर कीजिए. इस बार मैं उसे पास देखना चाहता हूं. मैं इन दो टके के मास्टरों के पास गिड़गिड़ाने नहीं जाऊंगा. पता नहीं, ये लोग अपनेआप को जाने क्या समझते हैं.’

विक्रम ने कुछ दिन बाद लौट कर कहा, ‘रामयशजी, सारा बंदोबस्त हो गया. गंगा के उस पार के हाईस्कूल में प्रधानाध्यापक से बात हो गई है. 10 हजार रुपए ले कर वह पुनदेव को पास कराने की गारंटी ले लेगा. पुनदेव को अपने कमरे में बैठा कर परचे हल करा देगा. बस, समझ लीजिए पुनदेव पास हो गया?’

रामयश गद्गद हो गए और कहा,

‘मुझे भी इतनी देर से अक्ल आई, विक्रमजी. पहले आप से कहा होता तो अब तक मेरा बेटा कालिज में होता.’

सचमुच ही पुनदेव पास हो गया. अब यह अलग बात थी कि वह इतने बड़े अश्वमेध के पश्चात दूसरी श्रेणी में ही पास हुआ था. पर जहां लोग एकएक बूंद को तरस रहे हों वहां लोटा भर पानी मिल गया देख रामयश का परिवार फूला न समा रहा था. उस सफलता की खुशी में गांव वालों को कच्चापक्का भोज मिला. रात्रि में नाचगाने की व्यवस्था थी. नाच देखने वालों के लिए बीड़ी, तंबाकू, गांजा, भांग, ताड़ी और देसी दारू तक की मुफ्त व्यवस्था थी. लग रहा था कि रामयश खुशी के मारे बौरा गए हों.

उन की पत्नी भी खुशी के इजहार में अपने पति महोदय से पीछे नहीं थीं. रिश्तेनाते की औरतों को बुला कर तेलसिंदूर दिया. सामूहिक गायन कराया. पंडित को धोतीकुरता, टोपीगंजी और गमछा दे कर 5 रु पए बिवाई फटे पैरों पर चढ़ा कर मस्तक नवाया. बेचारे पंडितजी सोच रहे थे कि यजमानिन का एक बेटा हर साल पास होता रहता तो कपडे़लत्ते की चिंता छूट जाती. नौकरों में अन्नवस्त्र वितरित किए गए.

शहर के सब से अच्छे कालिज में पुनदेव का दाखिला हुआ. छात्रावास में रहना पुनदेव ने जाने किन कारणों से गैरमुनासिब समझा. शुरू में किराए का एक अच्छा सा मकान उस के लिए लिया गया. कालिज जाने के लिए एक नई चमचमाती मोटरसाइकिल पिता की ओर से उपहारस्वरूप मिली. खाना बनाने के लिए एक बूढ़ा रसोइया तथा सफाई और तेल मालिश के लिए एक अलग नौकर रखा गया. कुल मिला कर नजारा ऐसा लगता था जैसे 20 वर्षीय पुनदेव शहर में डाक्टरी या वकालत की प्रैक्टिस करने आया हो.

10वीं कक्षा 6 बार में पास करने वाले पुनदेव के लिए उस की उम्र कुछ मानों में वरदान साबित हुई. कक्षा में पढ़ने वाले कम उम्र के छात्र स्वत: ही उसे अपना बौस मानने लगे. जी खोल कर खर्च करने के लिए उस के पास पैसों की कमी नहीं थी. लिहाजा, कालिज में उस के चमचों की संख्या भी तेजी से बढ़ी. अपने उन साथियों को वह मोटरसाइकिल पर बैठा कर सिनेमा ले जाता, रेस्तरां में उम्दा किस्म का खाना खिलाता. प्रथम वर्ष के पुनदेव के कालिज पहुंचने पर जैसी गहमागहमी होती, वैसी प्राचार्य के आने पर भी नहीं होती.

तिमाही परीक्षा के कुछ रोज पहले पुनदेव ने मुझे बुलाया और बडे़ प्यार से गले लगाता हुआ बोला, ‘यार, तुम तो अपने ही हो, पर परायों की तरह अलगअलग रहते हो. इतना बड़ा मकान है साथ ही रहा करो न. कुछ मेरी भी मदद हो जाएगी पढ़ाईलिखाई में.’

मैं ने कहा, ‘नहीं भाई, मेरे लिए छात्रावास ही ठीक है. तुम नाहक ही इस झमेले में पड़े हो. कालिज की पढ़ाई हंसीठट्ठा नहीं है, कैसे पार लगाओगे?’

पुनदेव ने हंस कर एक धौल मेरी पीठ पर जमाया और कहा, ‘‘दरबे से सरबा जे चहबे से करबा.’’

मैं ने कहा, ‘नहीं भाई, पैसा सब कुछ नहीं है.’

पुनदेव ने एक अर्थपूर्ण मुसकराहट बिखेरी. कुछ देर और इधरउधर की बातें कर के मैं वापस आ गया.

छात्रावास के संरक्षक प्रो. श्याम ने जब मुझे यह सूचना दी कि दर्शन शास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. मनोहर अपनी खूबसूरत, कोमल, सुशील कन्या की शादी पुनदेव से करने जा रहे हैं तो वाकई मुझे दुख हुआ. केवल दुख ही नहीं, क्रोध, घृणा और लज्जा की मिलीजुली अनुभूतियां हुईं. सारा कालिज जानता था कि पुनदेव ‘गजेटियर मैट्रिक’ है. संधि और समास भी कोई उस से पूछ ले तो क्या मजाल वह एक वाक्य बता दे. उस के पास जितने सूट थे, उतने वाक्यों का वह अंगरेजी में अनुवाद भी नहीं जानता था. वैसे उस से अपनी बेटी की शादी कर के प्रो. मनोहर दर्शनशास्त्र के किस सूत्र की व्याख्या कर रहे थे? क्या गुण देखा था उन्होंने? जी चाहा घृणा से थूक दूं उन के नाम पर, जो अपने को ज्ञानी कहते थे, पर उल्लू से हंसिनी की शादी रचाने जा रहे थे.

‘तुम क्या सोचने लगे?’ जब प्रोफेसर श्याम का यह वाक्य कानों में पड़ा तो मेरी तंद्रा भंग हुई.

मैं ने कहा, ‘कुछ नहीं, सर.’

वह हंस कर बोले, ‘‘मैं सब समझता हूं, तुम क्या सोच रहे हो? मैं ने ही नहीं, बहुत प्रोफेसरों ने मना किया, पर मनोहरजी का कहना है, ‘लड़के के पास सबकुछ है, विद्या के सिवा और विद्या केसिवा मेरे पास कुछ नहीं है. सबकुछ का ‘कुछ’ के साथ संयोग सस्ता, सुंदर और टिकाऊ होगा.’ अब तुम बताओ, हम लोग इस में क्या कर सकते हैं…उन की बेटी उन की मरजी.’’

 

शादी बड़ी धूमधाम से हुई. रामयश हाथ जोड़े, सिर झुकाए प्रो. मनोहर के सामने खड़े थे. विदाई के समय आमतौर पर जैसे कन्या पक्ष विनम्रता और सज्जनता में लिपटा अश्रुपूरित नेत्रों से देखता है, वैसे उस विवाह में वर पक्ष खड़ा था. खड़ा भी क्यों नहीं रहता, जिस घर में किसी ने इस से पूर्व हाईस्कूल नहीं देखा था, यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर उस घर का समधी हो गया था. सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता में ‘हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में…’ पढ़ा था. पर विद्या की मूर्खता के साथ शादी पहली बार देख रहा था. प्रो. मनोहर की पत्नी ससुराल से आए बेटी के गहने, कपड़े देखदेख कर मारे हर्ष के पागल सी हो गई थीं.

विवाहोपरांत रामयश ने एक बंगलानुमा मकान खरीद लिया था. पुनदेव अब नए मकान में सपत्नीक रहता था, एकदो और नौकरचाकरों को ले कर. छात्र जीवन का गृहस्थाश्रम के साथ इतना सुंदर समन्वय अन्यत्र कहां देखने को मिलता.

एक रोज प्रो. श्याम की पत्नी को ले कर प्रो. मनोहर की धर्मपत्नी अपने जामाता के घर गईं. बेटी का वैभव देख कर इतनी प्रसन्न हुईं कि बोल पड़ीं, ‘सारी जिंदगी प्रोफेसरी की, पर ऐसा गहनाकपड़ा, इतने नौकरचाकर हम ने सपने में भी नहीं देखे, बड़ा अच्छा रिश्ता खोजा है, नीलम के बाबूजी ने नीलम के लिए.’

छात्रावास में प्रो. श्याम की पत्नी के माध्यम से यह बात सभी लड़कों के लिए एक चुटकुला बन गई थी.

परीक्षा के दिन निकट आते गए. सभी लड़के अपनेअपने कमरों में सिमटते गए, किताबों और प्रश्नोत्तरों की दुनिया में दीनदुनिया से बेखबर, पर पुनदेव की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया. वह  वैसे ही मस्त था, पान की गिलौरियों और  ठंडाई के गिलासों में. हां, प्रोफेसर का जामाता बनने के बाद उस में एक तबदीली हुई थी.

अब वह उपन्यासों का रसिया हो गया था. मोटरसाइकिल की डिकी हो या तकिया, दोचार उपन्यास जरूर रखे होते. इस शौक के बारे में वह कहता, ‘मेरे ससुरजी कहते हैं कि इस से लिखने की क्षमता बढ़ती है, भाषा सुधरती है और परीक्षा में कम से कम, लिखना तो मुझे ही होगा.’

परीक्षा कक्ष में पुनदेव को देख कर लगा कि शायद वह बीमार हो, इसलिए अनुपस्थित है. पर उस के एक खास चमचे ने परचा खत्म होने पर कहा, ‘यार, पहुंच हो तो पुनदेव की तरह. विभागाध्यक्ष का दामाद है, पलंग पर बैठ कर परीक्षा दे रहा है. नए व्याख्याता उस के लिए प्रश्नोत्तर ले कर बैठते हैं. वह उन्हें अपनी कापी पर केवल उतार देता है. बेशक लोगों की नजरों में बीमार है पर असल में मजे लूट रहा है.’

मैं भौचक्का था इस जानकारी से.

परीक्षा खत्म होने पर सभी इधरउधर चले गए, पर पुनदेव अपने ससुर के साथ पर्यटन करता रहा. यह तो बाद में अन्य प्रोफेसरों से पता चला कि उस की कापियां जिन लोगों के पास गई थीं, वह उन सब की चरण रज लेने और बच्चों के लिए मिठाई देने निक ला था.

परीक्षाफल निकला. मुझे अपने प्रथम श्रेणी में आने की खुशी नहीं हुई, जब मैं ने देखा कि प्रथम श्रेणी में द्वितीय स्थान पुनदेव का था.

उस समय स्नातक और आनर्स की पढ़ाई साथसाथ ही होती थी. हम ने भी स्नातक आनर्स में दाखिला ले लिया और जिंदगी की गाड़ी पहले की तरह ही अपनी रफ्तार से चलती रही. पुनदेव बी.ए में 2 जुड़वां बेटों का बाप बन कर और भी अकड़ गया था. उस ने दर्शनशास्त्र में दाखिला लिया था. अत: विभागाध्यक्ष के दामाद होने का एक लाभ यह भी मिल रहा था कि बाकी छात्रों को उपस्थिति सशरीर बनवानी पड़ती, जबकि उस का काम कक्षा में आए बिना ही चल जाता.

इसी प्रकार पुनदेव को बी.ए. आनर्स में भी जैसतैसे बड़ेबड़े पापड़ बेल कर बस, प्रथम श्रेणी मिल सकी. इस बार उसे कोई स्थान नहीं मिला था. उस की निर्लज्जता मुझे अब भी याद है, जब उस ने प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पाने वाले हम तीनों विद्यार्थियों से मुबारकबाद देते हुए कहा था, ‘तुम तीनों को मेरा शुक्रगुजार होना चाहिए कि मैं ने परीक्षकों से कहा, ‘सर, मुझे केवल प्रथम श्रेणी चाहिए, कोई विशिष्टता नहीं क्योंकि जो पढ़ाकू दोस्त हैं, उन की छात्रवृत्ति बंद हो गई तो वे मुझ से नाराज हो जाएंगे.’ और तुम लोगों की नाराजगी मुझे कतई गवारा नहीं.’

गुस्सा तो बहुत आया, पर उस से बात कौन बढ़ाता. गुस्सा पी कर हम चुप रह गए.

पुनदेव ने इधर एम.ए. में दाखिला लिया, उधर रामयश को प्रो. मनोहर की कृपा एवं रामयश के पैसों के कारण विधायक का टिकट मिल गया. चुनाव अभियान में पुनदेव और उस केखास किस्म के साथी दिनरात लगे रहते, पोस्टर छपते, परचे लिखे जाते, दूसरी पार्टी वालों के बैनर रातोंरात नोच दिए जाते, दीवारों पर लिखे चुनाव प्रचार पर कालिख पोत दी जाती. सक्रिय विरोधियों को पिटवा दिया जाता. उन की चुनाव सभाओं में पुनदेव के फेल होने वाले दोस्त हंगामा कर देते. काले झंडे लहराने लगते. ईंटरोड़े बरसाने लगते, भीड़ तितरबितर हो जाती.

मेरा खून खौल जाता. जी चाहता अकेले ही मैदान में कूद पडूं और उस की सारी कलई खोल कर रख दूं, पर मेरे मांबाप ऐसे कामों के विरोधी थे. उन्होंने जबरदस्ती मुझे वापस शहर भेज दिया और कहा, ‘तुम क्या कर लोगे अकेले? वह किसी से वोट मांगता नहीं है. साफ कहता है, ‘आप लोग बूथ पर आने का कष्ट न करें, सारे वोट शांतिपूर्वक खुद ब खुद गिर जाएंगे. आप लोगों के वहां जाने से, जाने क्या हुड़दंग हो जाए. फिर आप लोग यह न कहना कि तुम ने हमें सचेत नहीं किया.’ बेटे, इस जंगलराज में राजनीति को दूर से सलाम करो और अपना काम करो.’

एम.ए. तक आतेआते मुझ में परिपक्वता आ गई थी. मैं सोचता, ‘पुनदेव क्या करेगा ऐसी नकली डिगरी हासिल कर के. वह न बोल सकता है, न तर्क कर सकता है. बात की तह तक जाने की उस की सामर्थ्य ही नहीं है. केवल हल्ला कर सकता है, मारपीट कर सकता है.’

मुझे कभीकभी उस पर दया भी आती, ‘बेचारा पुनदेव, चोरी कर के, चापलूसी कर के पास तो हो गया, पर साक्षात्कार में क्या होगा. खेतीबाड़ी या व्यवसाय ही करना था तो इतने वर्ष स्कूलकालिज में व्यर्थ ही गंवा दिए.’ फिर मन में बैठा चोर फुसफुसाता, ‘उस का बाप विधायक है. उस के लिए हजारों रास्ते हैं, तुम अपनी फिक्र करो.’

अंतिम परचा देने के बाद मैं मोती झील पर अपने दोस्तों के साथ टहल रहा था. प्रो. श्याम थोड़ी देर पूर्व मिले थे और मेरी तथा मेरे अन्य 2 मित्रों की तारीफों के पुल बांध कर अभीअभी विदा हुए थे.

जाने किधर से कार लिए हुए पुनदेव आ गया और बड़ी गर्मजोशी से मिला. इधरउधर की बातें होती रहीं. पुनदेव की परेशानी यह थी कि इस बार कुलपति आई.ए.एस. पदाधिकारी आ गए थे और उन्होंने परीक्षा में ‘जंगलराज’ नहीं चलने दिया था. पुनदेव ने उन पर हर तरह का दबाव डलवा कर देख लिया था. भय दिखा कर, लोभ दे कर भी आजमा लिया था, पर वह टस से मस नहीं हुए थे. प्रो. मनोहर क्या करते, जब कुलपति खुद ही 2-3 बार परीक्षा हाल का चक्कर लगा जाते थे.

जब अपनी सारी परेशानी पुनदेव बयान कर चुका तो जाने क्यों मेरे मन को तसल्ली सी हुई.

‘चलो, कहीं तो तुम्हारा ‘दरबे से सरबा जे चहबे से करबा’ वाला फार्मूला गलत हुआ.’ मैं ने भड़ास निकालते हुए कहा, ‘आगे क्या इरादा है, क्योंकि जैसा तुम बतला रहे हो, उस हिसाब से तुम पास नहीं हो सकोगे. पास हो भी गए तो प्राध्यापक तो बन नहीं पाओगे.’

पुनदेव ने अपनी आंखों में लाखों वाट के बल्ब की रोशनी भर कर एक हथेली से दूसरी को जकड़ते हुए पुन: वही राग अलापा, ‘दरबे से सरबा जे चहबे से करबा.’ तुम देखते रहे हो, मैं एक बार फिर साबित कर दूंगा कि बाप बड़ा न भैया, सब से बड़ा रुपय्या.’

जाने कैसे पुनदेव की खींचखांच कर दूसरी श्रेणी आ गई. मुझे अपनी नौकरी के सिलसिले में इस शहर में आना पड़ा. बरसों बाद एक सहपाठी मोहन मिला तो उस ने बतलाया, ‘मनोहरजी की सलाह पर रामयश ने शहर में एक कालिज खोल दिया है. 20-20 हजार

रुपए दान दे कर पुनदेव किस्म के व्याख्याताओं की नियुक्तियां हुई हैं. उसी में पुनदेव भी लग गया है.’

मैं ने मुंह बना कर कहा, ‘ऐसे कालिज का क्या भविष्य है, मोहन?’

पर अब उस कार्ड को देख कर पता चल रहा था कि पुनदेव के पिता के नाम पर खोला गया वह कालिज विश्व- विद्यालय का अंगीभूत कालिज है और पुनदेव की तरह विद्या का दुश्मन विद्यार्थी उस का प्राचार्य है. पता नहीं, कैसे यह सब संभव हुआ, मैं नहीं जानता. पर उस का रटारटाया वाक्य रहरह कर मेरे कमरे की दीवारों में गूंजने लगा.

मैं दांत पीसता हुआ चीख उठा, ‘नहीं, पुनदेव, नहीं. तुम्हारा दरबे यानी द्रव्य सब कुछ नहीं है, तुम भूल जाते हो कि भौतिक सुखों के अलावा भी मन का एक जगत है, जहां व्यक्ति खुद को, खुद की कसौैटी पर ही खरा या खोटा साबित करता है. तुम्हारा मन तुम्हें धिक्कारता होगा. तुम ज्ञानपिपासु छात्रों से मुंह चुराते होगे. तुम्हें खुद पता होगा कि जिस जिम्मेदारी की कुरसी पर तुम बैठे हो, उस के काबिल तुम न थे, न हो, न होगे. यह सब संयोग था या…याद रखना अवसर या संयोग प्रकृति केशाश्वत नियम नहीं होते, बल्कि अपवाद होते हैं.’

सहसा मेरे कंधे पर स्पर्श सा हुआ और मैं चेतनावस्था में आ गया.

पत्नी ने चाय की प्याली मेरे सामने मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘क्या अपवाद होता है?’’

मैं ने कार्ड उस के हाथों में देते हुए कहा, ‘‘14 वर्ष बाद गांव के किसी व्यक्ति ने साग्रह बुलाया है. तुम भी चलना. हजारों किलोमीटर की यात्रा करनी है, तैयारी शुरू कर दो.’’

यह तो होना ही था: भाग 2- वासना का खेल मोहिनी पर पड़ गया भारी

कोमल अनिल को पति के रूप में पा कर खुश थी. कोमल के मधुर और शिष्ट व्यवहार ने अनिल को बहुत प्रभावित किया. वह कोमल को दिल से प्यार करने लगा. उसे साफ लगा कि उस परिवार में जाति को ले कर सवाल ही नहीं उठते थे. लेकिन अब भी मोहिनी का जादू उस पर चढ़ा रहता.

कोमल को सपने में भी अंदाजा नहीं था कि उस की अनुपस्थिति में प्यार का कैसा खेल चलता है. वह अकेली मां का बहुत ध्यान रखती और यह देख कर खुश करती कि अनिल और मोहिनी के संबंधों में बहुत अपनापन है. मन ही मन सोचती चलो, मां को दामाद के रूप में एक बेटा मिल गया. वह बहुत संतुष्ट रहती.

इसी बीच एक दिन मोहिनी घर के सामने की सड़क के उस पार बने घर के सामने से गुजरते हुए रुक गई, यह घर काफी दिनों से बंद पड़ा था और आज ट्रक से किसी का सामान उतर रहा था. उस की नजर एक पुरुष पर पड़ी जो सावधानी से सामान उतारने के निर्देश दे रहा था, मोहिनी ने अंदाजा लगाया शायद यही लोग रहने आए है. अंदर से आती एक महिला को देख कर वह रुक गई. अपना परिचय दिया. उस ने भी मुसकरा कर मोेहिनी का अभिवादन करते हुए अपना नाम पुष्पा बताते हुए अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘ये मेरे पति सुधीर है. हमारा 1 ही बेटा है जो अमेरिका में पढ़ रहा है. हम दोनों ही पुणे में जौब करते हैं, अभी इन का ट्रांसफर यहां हो गया है. मैं भी अपना ट्रांसफर यहां करवाने की कोशिश कर रही हूं, अभी तो मैं घर सैट कर के चली जाऊंगी, वीकैंड पर ही आना हुआ करेगा.’’

मोहिनी पुष्पा और सुधीर के प्रभावशाली व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई और उसी समय उन्हें डिनर पर आने के लिए कहा. पुष्पा और सुधीर ने सहर्ष निमंत्रण स्वीकार कर लिया.

करीब 8 बजे सुधीर और पुष्पा मोहिनी के घर आ गए. मोहिनी ने टू बैडरूम

फ्लैट काफी सलीके से सजाया हुआ था. दोनों ने घर की तारीफ की, मोहिनी ने उन की खूब आवभगत की.

अपने बारे में सब बताया तो पुष्पा तो हैरान हो कर कह उठी, ‘‘अरे, लगता ही नहीं आप एक विवाहिता बेटी की मां हैं, आप तो बहुत यंग और स्मार्ट हैं.’’

मोहिनी खुश हो गई. उस के बनाए खाने की दोनों ने खूब तारीफ की. पुष्पा ने 1 हफ्ते की छुट्टी ली हुई थी, जाने तक औपचारिकता खत्म हो चुकी थी. 11 बजे के आसपास वे लोग चले गए.

उस के अगले दिन भी माहिनी घूमतीटहलती उन से मिल आई, सुधीर ने औफिस जौइन कर लिया था. अनिल और कोमल को भी उस ने इन नए परिचितों के बारे में बता दिया था.

कोमल ने खुश हो कर कहा था, ‘‘अच्छा है, आप को कुछ साथ मिल जाएगा.’’

घर अच्छी तरह व्यवस्थित कर पुष्पा पुणे चली गई. मोहिनी ने सुधीर से कह दिया था, ‘‘किसी चीज की भी जरूरत हो तो बे िझ झक कह सकते हैं मु झे.’’

एक दिन शाम को मार्केट में ही मोहिनी की सुधीर से मुलाकात हो गई तो सुधीर ने कहा, ‘‘आइए, घर ही तो जाना है, मैं छोड़ देता हूं.’’

थोड़ी नानुकुर के बाद मोहिनी सुधीर की गाड़ी में बैठ गई. सुधीर ने मोहिनी को सीट बैल्ट बांधने का इशारा किया. मोहिनी ने कोशिश की लेकिन बांध नहीं पाई. सुधीर थोड़ा  झुक कर मोहिनी की बैल्ट बांधने लगा. दोनों के हाथ ही नहीं टकरा गए बदन भी टकरा गए. मोहिनी की सुडौल छातियां सुधीर को महसूस होती रहीं.

मोहिनी ने शरमाते हुए सुधीर को देखा. वह पुरुषों की इस नजर से भलीभांति परिचित थी. वह  एक पुरुष की मुग्ध दृष्टि थी. सुधीर के महंगे परफ्यूम की खुशबू मोहिनी के तनमन में एक नई उमंग जगा गई.

सुधीर ने मुसकरा कर गाड़ी आगे बढ़ा दी. घर आया तो मोहिनी ने कहा, ‘‘आप जब चाहें घर आ सकते हैं, अगर मन हो तो एक कप कौफी अभी पी सकते हैं.’’

सुधीर ने सहमति में सिर हिलाया और मोहिनी के घर आ गया. मोहिनी सामान रख कर कौफी बना लाई. दोनों आम विषयों पर बातें करते रहे.

कौफी पी कर सुधीर जाने लगा तो मोहिनी ने उस की आंखों में आंखें डाल कर फिर आने के लिए कहा. सुधीर के जाने के बाद मोहिनी सुधीर के खयालोें में खो गई. सुधीर का आकर्षक व्यक्तित्व, बात करने का ढंग उसे छू गया.

अगले दिन अनिल और कोमल दोनों मोहिनी से मिलने आ गए, मोहिनी उन्हें नए पड़ोसियों के बारे में बताती रही. तीनों ने डिनर साथ ही किया. इतने में पड़ोस में रहने वाले उमाशंकर भी आ गए. अनिल और कोमल को उन्होंने आते हुए देख लिया था, सब थोड़ी देर बातें करते रहे.

उमाशंकर ने अनिल की तारीफ करते हुए कोमल से कहा, ‘‘बहुत अच्छा दामाद मिला है मोहिनीजी को हालचाल पूछने आता रहता है.’’

कोमल हैरान हुई. खुश भी कि कितने अच्छे हैं अनिल, मां का ध्यान भी रखते हैं और कभी शो भी नहीं करते. कोमल को रात को घर छोड़ कर अनिल फिर अभी आया, कह कर मोहिनी के पास पहुंच गया, मोहिनी खिल उठी. उसे अनिल की चाहत देख कर स्वयं पर गर्व सा हो आया और फिर दोनों सारी मर्यादाओं को भूल एकदूसरे में खो गए.

कुछ दिन बाद सुधीर मोहिनी से मिलने अचानक आ गया. कहा, ‘‘पुष्पा वीकैंड पर नहीं आ पाएगी, उस की कुछ जरूर मीटिंग है. वह दिल्ली जा रही है.’’

मोहिनी ने मन के भाव चेहरे पर नहीं

आने दिए. बोली, ‘‘आप तो बोर हो जाएंगे छुट्टी के दिन.’’

‘‘हां देखता हूं क्या करना है.’’

‘‘लंच यहीं कर लीजिए.’’

सुधीर ने मोहिनी को ध्यान से देखा. एक औरत का आंखों ही आंखों में बहुत कुछ कहता मौन निमंत्रण पलभर सोच, फिर कहा, ‘‘ऐसा

ही करते हैं, मैं ही आप को बाहर ले चलता हूं लंच पर.’’

मोहिनी को और क्या चाहिए था. सहर्ष तैयार हो गई.

‘‘तो फिर कल तैयार रहिएगा. मैं लेने आ जाऊंगा.’’

मोहिनी तो जैसे किसी और दुनिया में पहुंच गई. अगले दिन दोपहर तक का समय उस से नहीं कट रह था. सुबह से ही तैयारी शुरू कर दी. आसमानी रंग की शिफौन की साड़ी जो अनिल ने गिफ्ट में दी थी, साथ में मैचिंग ज्वैलरी, बालों का ढीला सा जूड़ा, सुधीर को आकर्षित करने की पूरी तैयारी थी उस की.

सुधीर लेने आया तो मोहिनी को देखता ही रह गया. कहा, ‘‘आप बहुत सुंदर लग रही हो.’’

‘‘थैंक्स,’’ मोहिनी ने शरमा कर कहा.

गाड़ी में बैठ कर सुधीर ने मुसकराते हुए थोड़ा  झुक कर मोहिनी की सीट बैल्ट

खुद ही बांध दी तो मोहिनी खुल कर अदा से मुसकरा दी.

सुधीर ने बहुत सी बातें करते हुए एक शानदार महंगे होटल में उसे लंच करवाया. मोहिनी जैसे आसमान में उड़ रही थी. ऐसे होटल में वह कभी नहीं आई थी. अनिल के साथ उस के संबंध उस के घर के बिस्तर तक ही सीमित रहे थे और अब सुधीर के साथ के स्टार होटल का वैभव, मोहिनी जैसी गूंगी हो गई थी. सुधीर और पुष्पा के आर्थिक स्तर का अंदाजा तो उसे पहले भी था. आज उस ने सुधीर को अपनी तरफ आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वह सोच चुकी थी अगर सुधीर के साथ उस की नजदीकी बढ़ेगी तो उस का जीवन और आसान हो जाएगा, अनिल के साथ उस के रिश्ते पर कोमल का एक बंधन था, यहां तो सुधीर पूरा हफ्ता अकेला रहता है. उस ने मन ही मन खूब अच्छी तरह से बहुत कुछ सोच लिया.

लंच करते हुए सुधीर ने मोहिनी की सुंदरता की खूब तारीफ की. वापसी में सुधीर

उसे छोड़ने आया तो मोहिनी ने कहा, ‘‘अंदर नहीं आएंगे.’’

सुधीर मुसकराते हुए अंदर आ गया. जैसे ही मोहिनी ने दरवाजा बंद किया, सुधीर ने उसे बांहों में भर लिया. मोहिनी तो जैसे इस के लिए तैयार ही थी, उस ने थोड़ा सकुचानेशरमाने का नाटक किया, फिर सुधीर की बांहों में खुद को सौंप दिया और एक और पुरुष उस से प्यार करने लगा है यह सोच कर उस के मन में अजीब गर्वमिश्रित खुशी हुई. वह आज भी किसी पुरुष को अपना दीवाना बना सकती है, यह सोच कर वह मन ही मन आसमान में उड़ रही थी.

शाम तक सुधीर उस के घर पर रहा और फिर जाते हुए उसे अगले दिन अपने घर पर ही आने के लिए कह गया.

अब यही क्रम चलने लगा. उस ने अनिल को भी कह दिया था, ‘‘तुम जब भी आना, फोन कर के आना.’’

अनिल ने पूछा, ‘‘क्यों?’’

‘‘ऐसे ही, मैं कहीं बाहर होऊं… घर का कुछ सामान लेने भी जाना पड़ जाता है.’’

‘‘ठीक है.’’

कभी कोमल मिलने आने वाली होती तो वह सुधीर को पहले ही मिलने के लिए मना कर देती. सुधीर बेचैनी से मोहिनी से मिलने की प्रतीक्षा करता रहता. पुष्पा वीकैंड पर आती तो मोहिनी से जरूर मिलती. कभी सुधीर पुष्पा के पास जाता तो मोहिनी अनिल से खुल कर मिलती.

कोमल को अकेली रह रही अपनी मां से बहुत हमदर्दी रहती. वह दिन में कई बार फोन करती. मौका मिलते ही मिलने भी आ जाती. उसे तो कभी अंदाजा भी नहीं हो सकता था कि उस की मां अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए 2 पुरुषों को एकसाथ अपनी उंगलियों पर नचा रही है. अपने जीवन में आए इन दोनों पुरुषों को वह अच्छी तरह बेवकूफ बना रही थी. मोहिनी का जीवन ऐसे ही बीत रहा था. 2 पुरुषों को अपनी अंदाओं, सुंदरता, नाजनखरों से अपने इशारों पर नचाते हुए ही एक दिन अनहोनी हो गई.

एक दिन सुधीर ने फोन पर कहा, ‘‘मोहिनी, मैं ने आज छुट्टी ली है. तुम सुबह ही आ जाना. पूरा दिन ऐश करेंगे.’’

मोहिनी तैयार हो गई. सुबह ही उस ने पूरा काम कर लिया. खूब अच्छी तरह से तैयार हो कर वह सुधीर के घर पहुंच गई. सुधीर की मेड भी उस के औफिस की वजह से सुबह ही काम कर के चली गई थी. दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए.

Father’s day Special: अब तो जी लें

‘‘पापाकी बातों से लग रहा था कि वे बहुत डिप्रैस्ड हैं. मैं चाहता तो बहुत हूं कि उन से मिलने का प्रोग्राम बना लूं, लेकिन नौकरी की बेडि़यों ने ऐसा बांध रखा है कि क्या कहूं?’’ फोन पर अपने पिता से बात करने के बाद मोबाइल डाइनिंग टेबल पर रखते हुए गौरव परेशान सा हो पत्नी शुभांगी और बेटे विदित से कह रहा था.

‘‘मैं ने कल मम्मी को फोन किया था. वे बता रहीं थी कि आजकल पापा बहुत मायूस से रहते हैं. टीवी देखने बैठते हैं तो उन्हें लगता है कि सभी डेली सोप और बाकी कार्यक्रम 60 साल से कम उम्र वाले लोगों के लिए ही हैं… बालकनी में जा कर खडे़ होते हैं तो लगता कि सारी दुनिया चलफिर रही है, केवल वे ही कैदी से अलगथलग हैं… उन्हें लगने लगा है कि दुनिया में उन की जरूरत ही नहीं है अब,’’ शुभांगी भी गौरव की चिंता में सहभागी थी.

‘‘मैं ने आज बात करते हुए उन्हें याद दिलाया कि कितने काम ऐसे हैं जो अब तक अधूरे पड़े हैं और कब से उन को पूरा करना चाह रहे हैं. अब पापा की रिटायरमैंट के बाद क्यों न मम्मीपापा वे सब कर लें, मसलन मम्मी के बांए हाथ में बहुत दिनों से हो रहे दर्द का ढंग से इलाज, पापा का फुल बौडी चैकअप और घर में जमा हो रहे सामान से छांट कर बेकार पड़ी चीजों को फेंकने का काम भी. पापा किसी बात में रुचि ही नहीं ले रहे. बस शिकायत कि तुम लोग इतना कम क्यों आतेजाते हो यहां?’’ गौरव के हृदय की पीड़ा मुख से छलक रही थी.

‘‘मम्मी भी फोन पर अकसर हमारे नहीं जाने की शिकायत करती हैं. कल भी कह रहीं थीं कि जब कोई पड़ोसी मिलता है पूछ ही लेता है कि कई दिनों से बेटेबहू को नहीं देखा,’’ शुभांगी बेबस सी दिख रही थी.

‘‘हमारी प्रौब्लम जब मम्मीपापा ही नहीं समझ पा रहे हैं तो पड़ोसियों से क्या उम्मीद की जाए? एक दिन भी ना जाओ तो खटक जाता है बौस को. तुम भी कितनी छुट्टियां करोगी स्कूल की? फिर विदित की पढ़ाईलिखाई भी है… चलो, कोशिश करते हैं इस इतवार को चलने की,’’ गौरव कुछ सोचता सा बोला.

‘‘दादाजी और दादीजी से मिलने का मेरा भी बहुत मन है, लेकिन इस वीकऐंड पर मैथ्स की ट्यूशन में प्रौब्लम्स पर डिस्कशन होगी. मैं मिस नहीं कर सकता,’’ 12 वर्षीय विदित की भाव भंगिमाएं बता रही थी कि आजकल बच्चे पढ़ाई को ले कर कितने गंभीर हैं.

कुरसी से पीठ टिका आंखें मूंद कर उंगलियां चटकाते हुए गौरव गहन चिंतन में डूब गया. उस के पिता अरुण 3 वर्ष पहले निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. विभिन्न राज्यों में स्थानांतरण और जिम्मेदार पद के कारण अपने कार्यकाल में वे खासे व्यस्त रहते थे. रिटायरमैंट के बाद का खाली जीवन उन्हें रास नहीं आ रहा था. मेरठ में अपने पैतृक मकान को तुड़वा आधुनिक रूप दे कर बनवाए गए मकान में परिवार के नाम पर पत्नी ममता ही थी. बड़ी बेटी पति के साथ आस्ट्रेलिया में रह रही थी, इसलिए अरुण और ममता की सारी आशाएं गौरव पर टिकी रहतीं थीं. उन का सोचना था कि मेरठ से नोएडा इतना दूर भी तो नहीं है कि गौरव का परिवार उन से प्रत्येक सप्ताह मिलने न आ सके. गौरव विवश था, क्योंकि प्रतिस्पर्धा और व्यस्तता के इस युग में समय ही तो नहीं है व्यक्ति के पास.

खाना खा कर विदित अपने कमरे में जा स्टडी टेबल पर पुस्तकों में खो गया. शुभांगी सुबह के नाश्ते की तैयारी करने किचन में चली गई और गौरव भी अपनी सोच से बाहर निकल लैपटौप खोल मेल के जवाब देने लगा. थक कर चूर उन सभी को प्रतिदिन सोने में देर हो जाया करती थी.

नोएडा के थ्री बैड रूम फ्लैट में रहने वाला गौरव एक मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत था. पत्नी शुभांगी वहीं के एक विद्यालय में अध्यापिका थी. गौरव सुबह 8 बजे दफ्तर के लिए घर से निकलता तो रात के 9 बजे से पहले कभी घर वापस नहीं आ पाता था. कभीकभी काम ज्यादा होने से रात के 11 तक बज जाते थे, विदित और शुभांगी सुबह साढे छ: बजे साथसाथ निकलते और एकसाथ ही वापस आ जाते थे. विदित उसी विद्यालय में पढ़ रहा था, शुभांगी जिस में टीचर थी.

सुबह जल्दी उठ कर सब का ब्रैकफास्ट बना, विदित और अपना टिफिन तैयार

करने के बाद कुछ अन्य कार्य निबटा शुभांगी 10 मिनट में तैयार हो स्कूल चली जाती थी. बाद में मेड आ कर गौरव के जाने तक बरतन, सफाई का काम कर दोपहर का खाना बनाती और गौरव का टिफिन लगा देती थी. स्कूल से लौटने पर भी शुभांगी को आराम करने का समय नहीं मिल पाता था. विदित के लिए मेड का बनाया खाना गरम कर उसे ट्यूशन के लिए छोड़ने जाती. लौट कर खाना खा गमलों में पानी देती, आरओ से पानी की बोतलें भर कर रखती और सूखे कपड़े स्टैंड से उतार कर इस्त्री के लिए देने जाती. वहीं से वह विदित को वापस ले कर घर आ जाती थी. अपनी शाम की चाय पीते हुए होमवर्क में विदित की मदद कर वह रात के खाने की तैयारी में जुट जाती. शाम को रसोई संभालने का काम शुभांगी स्वयं ही करती थी. इस के 2 कारण थे. पहला यह कि विदित और गौरव को उस के हाथ का बना खाना ही पसंद था, दूसरा चारों ओर से वह बचत के रास्ते खोजती रहती थी. फ्लैट के लिए गए लोन की कई किश्तें बाकी थीं अभी.

गौरव और शुभांगी का लगभग 12-13 वर्ष पूर्व प्रेमविवाह हुआ था. उस समय शुभांगी दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ा रही थी. आईआईएफटी कोलकाता से एमबीए करने के बाद गौरव ने भी कुछ दिन पहले ही दिल्ली की एक कंपनी में नौकरी शुरू की थी. शुभांगी से जब उस की मैट्रो में पहली मुलाकात हुई थी तो दोनों को ही ‘लव ऐट फर्स्ट साइट’ जैसा अनुभव हुआ था. पहली नजर का प्यार जल्द ही परवान चढ़ा और दोनों ने जीवनसाथी बनने का फैसला कर लिया. शुभांगी के परिवार वालों को इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं थी. ममता ने भी इस विजातीय विवाह की सहज स्वीकृति दे दी थी, लेकिन अरुण इस विवाह के विरुद्ध था. बाद में ममता के समझाने पर उस ने भी विवाह के लिए हामी भर दी थी.

विवाह के बाद कुछ समय तक गौरव शुभांगी के घर

पर रहा. फिर नोएडा की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बढि़या औफर मिला तो वहीं किराए का मकान ले लिया. शुभांगी ने भी तब नोएडा के जानेमाने स्कूल में अपनी सीवी भेज दी. उस के अनुभव व योग्यता को देख वहां उस का सिलैक्शन हो गया. विदित भी तब तक ढाई वर्ष का हो गया था. शुभांगी ने उस का ऐडमिशन अपने स्कूल में करवा दिया. कुछ वर्ष किराए के में बिताने के बाद गौरव ने नोएडा में अपना फ्लैट खरीद लिया.

गौरव चाहता था कि अरुण के सेवानिवृत्ति होने पर मम्मीपापा उस की साथ ही रहें. यही सोच कर उस ने बड़ा फ्लैट खरीदा था, लेकिन अरुण मेरठ में बसने का इच्छुक था. गौरव उस समय थोड़ेथोड़े समय अंतराल पर ही मातापिता से मिलने चला जाता था. तब विदित चौथी कक्षा में था. बाद में उस की पढ़ाई का बोझ और बढ़ते ट्यूशन तथा गौरव की प्रमोशन के कारण दफ्तर का काम बढ़ जाने से उन का मेरठ जाना कम हो गया. परिस्थिति को समझे बिना अपने को उपेक्षित मान ममता व अरुण मन ही मन खिन्न रहने लगे.

इन दिनों भी वे बारबार फोन कर गौरव को आने के लिए कह रहे थे. कुछ दिन पहले ही विदेश में रहने वाले अरुण के एक मित्र का निधन हो गया था. उस दोस्त से फोन पर अरुण अकसर बातचीत कर लिया करता था. मित्र की मृत्यु के कारण अरुण अवसाद से घिर गया था. ममता भी इस समाचार से दुखी थी.

अपने मम्मीपापा की उदासी से चिंतित हो गौरव ने 2 दिन के लिए मेरठ जाने का कार्यक्रम बना लिया. शुभांगी और विदित ने स्कूल से छुट्टी ले ली. गौरव के औफिस में यद्यपि शनिवार की छुट्टी रहती थी, किंतु काम की अधिकता के कारण उस दिन औफिस जा कर या घर पर ही काम निबटाना पड़ता था. ‘काम वहीं जा कर पूरा कर लूंगा’ सोच कर उस ने लैपटौप साथ रख लिया.

तीनों मेरठ पहुंचे तो अरुण व ममता के सूने घर में ही नहीं सूने चेहरे पर भी रौनक

आ गई. शुभांगी वहां पहुंच कर चाय पीते ही रसोई में जुट गई. विदित दादाजी को अपने स्कूल और दोस्तों के किस्से सुनाने लगा और गौरव ने औफिस का काम निबटाने के उद्देश्य से लैपटौप औन कर लिया. गौरव को काम करते देख ममता ताना मारते हुए बोली, ‘‘पता है मुझे कि मेरा बेटा बहुत ऊंचे ओहदे पर है, लेकिन ये सब हमें दिखाने से क्या फायदा तुम्हारे पापा के दिन कितनी मुश्किल से बीतते हैं, पता है तुम्हें? न घर पर चैन न बाहर. बस इंतजार करते हैं कि कोई पड़ोसी मिलने आ जाए या फिर दफ्तर से कोई दोस्त फोन कर कहे कि सब बहुत याद कर रहे हैं. अब बताओ ऐसा हुआ है क्या कभी? तुम बंद करो काम और पापा को सारा समय दो आज अपना.’’

अरुण ने ममता की बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अरे, मैं तो सरकारी महकमे के डायरैक्टर की पोस्ट से रिटायर हुआ हूं. इतना काम तो मैं ने भी नहीं किया कभी, तुम क्या जबरन ओट लेते हो काम अपने ऊपर?’’

‘‘पापा प्राइवेट सैक्टर में कंपीटिशन इतना बढ़ चुका है कि मैं काम सही ढंग से नहीं करूंगा तो मुझे रिप्लेस करने में उन के 2 दिन भी नहीं लगेंगे. चलिए, आप की बात मानते हुए नहीं करूंगा आज काम. लेकिन 1-2 दिन हम लोग आप के पास रह भी जाएंगे तो क्या हो जाएगा? आप लोग ही चलिए न हमारे साथ,’’ गौरव काम बीच में ही छोड़ लैपटौप शटडाउन कर मुसकराता हुआ बोला.

‘‘कहां चलें? तुम्हारे घर? अरे बेटा, वहां भी तुम तीनों रोज अपनेअपने काम पर निकल जाओगे. मैं और ममता फिर अकेले हो जाएंगे. यहां कम से कम पुराने पड़ोसी और यारदोस्त तो हैं. फिर मैं तो दूध, सब्जी लेने जाता हूं तो किसी न किसी से दुआ सलाम हो ही जाती है. असली मुश्किल तो तुम्हारी मम्मी की है. यहां की किट्टी में छोटी उम्र की औरतें ज्यादा आती हैं, ये कहते हैं कि उन के साथ बात करूं तो वही सासननद की शिकायतें ले कर बैठ जाती हैं. फोन पर कितना बतिया लेंगी अपनी हमउम्र सहेलियों के साथ?’’ कह कर अरुण ने ममता की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. ममता ने हामी में सिर हिला दिया.

शुभांगी किचन में खड़ी उन की बातें सुन रही थी. बाहर निकल अपनी एक

सहेली की मम्मी के विषय में बताते हुए वह बोली, ‘‘मेरी फ्रैंड शिवानी की मम्मी उस के पापा के दुनिया से चले जाने के बाद बहुत अकेली हो गईं थीं. उन्हें बागवानी का बहुत शौक था. छोटा सा किचन गार्डन भी था उन के आंगन में. वे अकसर फोन पर गार्डनिंग की प्रौब्लम्स, तरहतरह के पौधों और फूलों की देखभाल और खाद वगैरह के बारे में अपने भैया से डिस्कस करती रहती थीं. शिवानी के वे मामा यूनिवर्सिटी के हौर्टिकल्चर डिपार्टमैंट में लेक्चरार थे. उन के कहने पर आंटी ने इस सब्जैक्ट को इंट्रस्टिंग बनाते हुए हाउसवाइव्स के लिए वीडियो बना कर अपने यूट्यूब चैनल पर डालने शुरू कर दिए. यू नो, धीरेधीरे वे इतनी पौपुलर हो गईं कि लोग सजेशंस मांगने लगे. फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जब वे अपने सुंदरसुंदर गमलों और क्यारियों की पिक्स डालतीं तो लाइक्स और कमैंट्स की बरसात हो जाती. इस से जिंदगी में उन्हें खुशियां तो मिली हीं, साथ ही वे बिजी भी हो गईं.’’

शुभांगी की बात पूरी होते ही ममता तपाक से बोली, ‘‘मुझे भी कुकिंग का बहुत शौक है. इन का जहां भी ट्रांसफर हुआ, वहां का खाना बनाना सीख लिया था मैं ने. हिमाचल प्रदेश के तुड़किया भात और बबरू, मध्य प्रदेश की भुट्टे की कीस, गोआ के गोइन रैड राइस और फोनना कढ़ी, बंगाल के आलू पोस्तो, पीठा, लूची संग छोलार दाल… और… और… अरे बहुत कुछ है. सुनोगे?’’

‘‘हां… हां…’’ सब सम्मिलित स्वर में बोले.

ममता ने दोगने उत्साह से बोलना शुरू कर दिया, ‘‘जब गौरव के पापा के साथ मैं इंडिया से बाहर गई थी तो…’’

‘‘पर हम तो तब गैस्ट हाउस में ठहरे थे, वहां कैसे सीखा?’’ अरुण ने आश्चर्यचकित हो ममता की बात बीच में ही काट दी.

‘‘आप के काम पर चले जाने के बाद मैं हर रोज गैस्ट हाउस की किचन में पहुंच जाती थी. भाषा तो नहीं जानती थी वहां की, लेकिन खाना बनते देखती रहती थी. फिर इस्तेमाल होने वाली चीजों के नाम इशारे से पूछती तो शेफ भी टूटीफूटी इंग्लिश में बता देते थे.’’

सभी ठहाका लगा कर हंसने लगे. शुभांगी तालियां बाते हुए बोली, ‘‘वाओ मम्मी, क्याक्या सीखा आप ने?’’

‘‘फ्रांस में रंगबिरंगे मैकरोने और जौ के आटे से बनने वाले क्रेप केक… लेबनान में सीखी पीटा ब्रैड बनाने की विधि और चने से बने फलाफल जो उस के अंदर भरे जाते हैं. मुझे बहुत तरह

की सौस और डिप बनानी भी आती हैं, जो आजकल बाजार में तरहतरह के नामों से खूब महंगी बिकती हैं.’’

‘‘दादी, क्या कह रही हो आप, मैं अपने फ्रैंड्स को बताऊंगा न ये बातें तो आप के हाथ की बनी चीजें खाने की जिद करने लगेंगे.’’ विदित के चेहरे पर आश्चर्य और उल्लास के भाव एकसाथ तैरने लगे.

‘‘तो आप ये डिशेस बना कर यूट्यूब पर डालो न. पापा बनाएंगे आप का वीडियो,’’ गौरव चहकते हुए बोला.

‘‘भई इस बहाने हमें भी रोजरोज अच्छा खाना मिला करेगा,’’ अरुण खिलखिला कर हंस दिया.

घर के सभी लोग उत्सव सरीखे वातावरण में भीग रहे थे. अगले दिन विदित दादाजी को

वीडियो बनाना और उसे यूट्यूब पर डालना सिखा रहा था. शुभांगी और ममता तरहतरह के व्यंजनों के विषय में चर्चा कर रहीं थीं. सब को प्रसन्नता पूर्वक अपने कार्यों में व्यस्त देख गौरव को अपने औफिस का काम निबटाने का अवसर मिल गया.

रविवार की शाम को वापसी के लिए रवाना होने से पहले शुभांगी ने 2 टिकट ममता की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मम्मी ये पापा और आप के लिए मौरीशस जाने की टिकट हैं. 15 दिन के लिए आप दोनों घूम कर आइए. ‘वीजा औन एराइवल’ की सुविधा है वहां. यानी मौरीशस पहुंच कर वीजा लेना है आप को. इस के लिए सिर्फ औनलाइन अप्लाई करना होगा. सारी उम्र आप बिजी रहे, कहीं गए भी तो औफिशियल टूर पर, बहुत लोगों के साथ. अब आप दोनों फ्री हैं तो एंजौय कीजिए एक मस्ती भरे ट्रिप में एकदूसरे की कंपनी को. हमें भी खुशी होगी.’’

‘‘अरे लोग क्या कहेंगे इस उम्र में हम ऐसे ट्रिप पर जाएंगे तो?’’ सकुचाते हुए ममता बोली.

शुभांगी ममता के पास जा उस के गले में अपनी बांहें डालती हुई स्नेह से बोली, ‘‘मेरी प्यारी मम्मी, आप और पापा अब तक जिम्मेदारियां निभाते रहे, जिंदगी को आप ने बिताया जरूर है, लेकिन जिया नहीं. कोई कुछ भी कहे उस की बात अनसुनी कर आप को एकदूसरे का हाथ थाम कहना चाहिए कि अब तो जी लें.’’

ममता गदगद हो उठी. इस से पहले कि वह कुछ कहती गौरव अपने बैग से एक कैमरा निकाल अरुण की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘पापा, आप के लिए हम ने यह कैमरा खरीदा है. मिररलैस होने के कारण यह हलका भी है और साइज में भी छोटा है, लेकिन पिक्स बहुत सुंदर आती हैं इस से. पापा, मुझे पता है कि आप को फोटोग्राफी का कितना शौक था. मेरे बचपन की कितनी तसवीरें खींची थी आप ने. फिर बिजी होने से या शायद अच्छे कैमरे के अभाव में आप ने इस शौक पर लगाम लगा दिया था, लेकिन आप इसे भूले नहीं थे. मुझे याद है कि जब 2 साल पहले चाचाजी का परिवार यहां घूमने आया था तो उन की कैमरे से खींची हुई तसवीरों को आप कितने ध्यान से देखते थे. आप की आंखों में एक ललक मुझे साफसाफ दिखाई दी थी उस समय. पापा, जिंदगी के उन पलों को अब कस कर पकड़ लीजिए, जो आप को हमेशा लुभाते रहे लेकिन हाथ नहीं आए. मौरीशस जा कर ढेर सारी फोटो खींचिएगा, बेहद सुंदर है मौरीशस.’’

ममता व अरुण की नम आंखों से आंसूओं की बूंदें टपकीं तो मन में पल रही गलतफहमियां उन की साथ ही बह गईं.

शुभांगी को कुछ दिनों बाद ममता का भेजा हुआ एक यूट्यूब लिंक मिला जिस में ममता ने ‘हमस’ नामक डिप को कई प्रकार से बनाना सिखाया था. हमस एक प्रकार की चटनी होती है, जो छोले से बनाई जाती है. ममता ने चुकंदर, शिमलामिर्च, गाजर व मटर का प्रयोग करते हुए चटनी के विभिन्न रूप प्रदर्शित किए थे. वीडियो में ममता ने यह भी बताया कि हमस न केवल खाने में स्वादिष्ठ होती है, वरन इस के नियमित सेवन से वजन पर भी नियंत्रण रखा जा सकता है. प्रोटीन व कैल्सियम से भरपूर यह डिश डायबिटीज के पेशेंट के लिए भी अच्छी होती है. इसे मिडल ईस्ट देशों में बहुत शौक से खाया जाता है.

शुभांगी ने वह लिंक अपनी सहेलियों के साथ शेयर किया. ममता को इतनी अच्छी रैसिपी बनाने के लिए बधाई देते हुए उस ने कहा कि सभी ने मुफ्त कंठ से उस के यूट्यूब चैनल की प्रशंसा की है. सखियां अगले व्यंजन की वीडियो आने की आतुरता से प्रतीक्षा कर रहीं हैं.

मौरीशस से लौटने के बाद अरुण ने अपने खींचे हुए फोटो

व्हाट्सऐप पर भेजे. तसवीरें इतनी जीवंत थीं कि दर्शनीय स्थल आंखों के सामने होने का आभास दे रहीं थीं. अगले दिन ममता ने शुभांगी को फोन पर बताया कि उस का वीडियो देखने के बाद पड़ोस की कुछ महिलाओं ने उस से कुकरी क्लासेज लेने का अनुरोध किया है.

कुछ दिनों बाद गौरव का अरुण का भेजा हुआ एक मेल मिला, जिस में लिखा था कि हिंदी की एक सुप्रसिद्ध पत्रिका में अरुण का लिखा लेख प्रकाशित हुआ है. गौरव ने मेल पढ़ते ही पिता को फोन मिला लिया. अरुण ने बताया कि उसे हिंदी में लिखने की हमेशा से रुचि रही है. अपने कार्यालय की वार्षिक पत्रिका में उस से कहानी या लेख लिखने का अनुरोध किया जाता था, इस के अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष औफिस में मनाए जाने वाले हिंदी दिवस में भी वह प्रसन्नतापूर्वक भाग लेता था. अरुण द्वारा भेजे लेख की पीडीएफ फाइल डाउनलोड कर गौरव ने पढ़ा तो अभिभूत हो उठा. उस लेख में अरुण ने रिटायरमैंट फेज को जीवन का स्वर्णिम चरण बताया था और इस समय को बेहतर ढंग से जीने के तरीकों के विषय में लिखा था. लेख उस चर्चा पर आधारित था जो शुभांगी और वह समयसमय पर उन से करते रहते थे. लेख का शीर्षक था ‘अब तो जी लें.’

Father’s day Special: पापा मिल गए

शब्बीर की मौत के बाद दोबारा शादी का जोड़ा पहन कर इकबाल को अपना पति मानने के लिए बानो को दिल पर पत्थर रख कर फैसला करना पड़ा, क्योंकि हालात से समझौता करने के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी तो उस के पास नहीं था. अपनी विधवा मां पर फिर से बोझ बन जाने का एहसास बानो को बारबार कचोटता और बच्ची सोफिया के भविष्य का सवाल न होता, तो वह दोबारा शादी की बात सोचती तक नहीं.

‘‘शादी मुबारक हो,’’ कमरे में घुसते ही इकबाल ने कहा.

‘‘आप को भी,’’ सुन कर बानो को शब्बीर की याद आ गई. इकबाल को भी नुसरत की याद आ गई, जो शादी के 6-7 महीने बाद ही चल बसी थी. वह बानो को प्यार से देखते हुए बोला, ‘‘क्या मैं ने अपनी नस्सू को फिर से पा लिया है?’’

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया.

‘‘क्या बात है?’’ कहते हुए इकबाल ने दरवाजा खोला तो देखा कि सामने उस की साली सलमा रोतीबिलखती सोफिया को लादे खड़ी है.

‘‘आपा के लिए यह कब से परेशान है? चुप होने का नाम ही नहीं लेती. थोड़ी देर के लिए आपा इसे सीने से लगा लेतीं, तो यह सो जाती,’’ सलमा ने डरतेडरते कहा.

‘‘हां… हां… क्यों नहीं,’’ सलमा को अंदर आ जाने का इशारा करते हुए इकबाल ने गुस्से में कहा. रोती हुई सोफिया को बानो की गोद में डाल कर सलमा तेजी से कमरे से बाहर निकल गई. इधर बानो की अजीब दशा हो रही थी. वह कभी सोफिया को चुप कराने की कोशिश करती, तो कभी इकबाल के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करती. सोफिया के लिए इकबाल के चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था. इस पर बानो मन ही मन सोचने लगी कि सोफिया की भलाई के चक्कर में कहीं वह गलत फैसला तो नहीं कर बैठी?

सुबह विदाई के समय सोफिया ने अपनी अम्मी को एक अजनबी के साथ घर से निकलते देखा, तो झट से इकबाल का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी, ‘‘आप कौन हैं? अम्मी को कहां ले जा रहे हैं?’’ सोफिया के बगैर ससुराल में बानो का मन बिलकुल नहीं लग रहा था. अगर हंसतीबोलती थी, तो केवल इकबाल की खातिर. शादी के बाद बानो केवल 2-4 दिन के लिए मायके आई थी. उन दिनों सोफिया इकबाल से बारबार पूछती, ‘‘मेरी अम्मी को आप कहां ले गए थे? कौन हैं आप?’’

‘‘गंदी बात बेटी, ऐसा नहीं बोलते. यह तुम्हारे खोए हुए पापा हैं, जो तुम्हें मिल गए हैं,’’ बानो सोफिया को भरोसा दिलाने की कोशिश करती.

‘‘नहीं, ये पापा नहीं हो सकते. रोजी के पापा उसे बहुत प्यार करते हैं. लेकिन ये तो मुझे पास भी नहीं बुलाते,’’ सोफिया मासूमियत से कहती. सोफिया की इस मासूम नाराजगी पर एक दिन जाने कैसे इकबाल का दिल पसीज उठा. उसे गोद में उठा कर इकबाल ने कहा, ‘‘हां बेटी, मैं ही तुम्हारा पापा हूं.’’ यह सुन कर बानो को लगने लगा कि सोफिया अब बेसहारा नहीं रही. मगर सच तो यह था कि उस का यह भरोसा शक के सिवा कुछ न था.

इस बात का एहसास बानो को उस समय हुआ, जब इकबाल ने सोफिया को अपने साथ न रखने का फैसला सुनाया.

‘‘मैं मानता हूं कि सोफिया तुम्हारी बेटी है. इस से जुड़ी तुम्हारी जो भावनाएं हैं, उन की मैं भी कद्र करता हूं, मगर तुम को मेरी भी तो फिक्र करनी चाहिए. आखिर कैसी बीवी हो तुम?’’ इकबाल ने कहा.

‘‘बस… बस… समझ गई आप को,’’ बानो ने करीब खड़ी सोफिया को जोर से सीने में भींच लिया. इस बार बानो ससुराल गई, तो पूरे 8 महीने बाद मायके लौट कर वापस आई. आने के दोढाई हफ्ते बाद ही उस ने एक फूल जैसे बच्चे को जन्म दिया. इकबाल फूला नहीं समा रहा था. उस के खिलेखिले चेहरे और बच्चे के प्रति प्यार से साफ जाहिर था कि असल में तो वह अब बाप बना है. आसिफ के जन्म के बाद इकबाल सोफिया से और ज्यादा दूर रहने लगा था. इस बात को केवल बानो ही नहीं, बल्कि उस के घर वाले भी महसूस करने लगे थे. इकबाल के रूखे बरताव से परेशान सोफिया एक दिन अम्मी से पूछ बैठी, ‘‘पापा, मुझ से नाराज क्यों रहते हैं? टौफी खरीदने के लिए पैसे भी नहीं देते. रोजी के पापा तो रोज उसे एक सिक्का देते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी. पापा तुम से भला नाराज क्यों रहेंगे. वे तुम्हें टौफी के लिए पैसा इसलिए नहीं देते, क्योंकि तुम अभी बहुत छोटी हो. पैसा ले कर बाहर निकलोगी, तो कोई छीन लेगा.

‘‘पापा तुम्हारा पैसा बैंक में जमा कर रहे हैं. बड़ी हो जाओगी, तो सारे पैसे निकाल कर तुम्हें दे देंगे.’’ ‘‘मगर, पापा मुझे प्यार क्यों नहीं करते? केवल आसिफ को ही दुलार करते हैं,’’ सोफिया ने फिर सवाल किया.

‘‘दरअसल, आसिफ अभी बहुत छोटा है. अगर पापा उस का खयाल नहीं रखेंगे, तो वह नाराज हो जाएगा,’’ बानो ने समझाने की कोशिश की. इसी बीच आसिफ रोने लगा, तभी इकबाल आ गया, ‘‘यह सब क्या हो रहा है बानो? बच्चा रो रहा है और तुम इस कमबख्त की आंखों में आंखें डाल कर अपने खो चुके प्यार को ढूंढ़ रही हो.’’ इकबाल के शब्दों ने बानो के दिल को गहरी चोट पहुंचाई.

‘यह क्या हो रहा है?’ घबरा कर उस ने दिल ही दिल में खुद से सवाल किया, ‘मैं ने तो सोफिया के भले के लिए जिंदगी से समझौता किया था, मगर…’ वह सिसक पड़ी. इकबाल ने घर लौटने का फैसला सुनाया, तो बानो डरतेडरते बोली, ‘‘4-5 रोज से आसिफ थोड़ा बुझाबुझा सा लग रहा है. शायद इस की तबीयत ठीक नहीं है. डाक्टर को दिखाने के बाद चलते तो बेहतर होता.’’

इकबाल ने कोई जवाब नहीं दिया. आसिफ को उसी दिन डाक्टर के पास ले जाया गया.

‘‘इस बच्चे को जौंडिस है. तुरंत इमर्जैंसी वार्ड में भरती करना पड़ेगा,’’ डाक्टर ने बच्चे का चैकअप करने के बाद फैसला सुनाया, तो इकबाल माथा पकड़ कर बैठ गया.

‘‘अब क्या होगा?’’ माली तंगी और बच्चे की बीमारी से घबरा कर इकबाल रोने लगा.

‘‘पापा, आप तो कभी नहीं रोते थे. आज क्यों रो रहे हैं?’’ पास खड़ी सोफिया इकबाल की आंखों में आंसू देख कर मचल उठी. डरतेडरते सोफिया बिलकुल पास आ गई और इकबाल की भीगी आंखों को अपनी नाजुक हथेली से पोंछते हुए फिर बोली, ‘‘बोलिए न पापा, आप किसलिए रो रहे हैं? आसिफ को क्या हो गया है? वह दूध क्यों नहीं पी रहा?’’ सोफिया की प्यारी बातों से अचानक पिघल कर इकबाल ने कहा, ‘‘बेटी, आसिफ की तबीयत खराब हो गई है. इलाज के लिए डाक्टर बहुत पैसे मांग रहे हैं.’’ ‘‘कोई बात नहीं पापा. आप ने मेरी टौफी के लिए जो पैसे बैंक में जमा कर रखे हैं, उन्हें निकाल कर जल्दी से डाक्टर अंकल को दे दीजिए. वह आसिफ को ठीक कर देंगे,’’ सोफिया ने मासूमियत से कहा.

इकबाल सोफिया की बात समझ नहीं सका. पूछने के लिए उस ने बानो को बुलाना चाहा, मगर वह कहीं दिखाई नहीं दी. दरअसल, बानो इकबाल को बिना बताए आसिफ को अपनी मां की गोद में डाल कर बैंक से वह पैसा निकालने गई हुई थी, जो शब्बीर ने सोफिया के लिए जमा किए थे.

‘‘इकबाल बाबू, बानो किसी जरूरी काम से बाहर गई है, आती ही होगी. आप आसिफ को तुरंत भरती कर दें. पैसे का इंतजाम हो जाएगा,’’ आसिफ को गोद में चिपकाए बानो की मां ने पास आ कर कहा, तो इकबाल आसिफ को ले कर बोझिल मन से इमर्जैंसी वार्ड की तरफ बढ़ गया. सेहत में काफी सुधार आने के बाद आसिफ को घर ले आया गया.

‘‘यह तुम ने क्या किया बानो? शब्बीर भाई ने सोफिया के लिए कितनी मुश्किल से पैसा जमा किया होगा, मगर…’’ असलियत जानने के बाद इकबाल बानो से बोला.

‘‘सोफिया की बाद में आसिफ की जिंदगी पहले थी,’’ बानो ने कहा.

‘‘तुम कितनी अच्छी हो. वाकई तुम्हें पा कर मैं ने नस्सू को पा लिया है.’’ ‘‘वाकई बेटी, बैंक में अगर तुम्हारी टौफी के पैसे जमा न होते, तो आसिफ को बचाना मुश्किल हो जाता,’’ बानो की तरफ से नजरें घुमा कर सोफिया को प्यार से देखते हुए इकबाल ने कहा. ‘‘मैं कहती थी न कि यही तुम्हारे पापा हैं?’’ बानो ने सोफिया से कहा.

इकबाल ने भी कहा, ‘‘हां बेटी, मैं ही तुम्हारा पापा हूं.’’ सोफिया ने बानो की गोद में खेल रहे आसिफ के सिर को सीने से सटा लिया और इकबाल का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘मेरे पापा… मेरे अच्छे पापा.’’

यह तो होना ही था: भाग 1- वासना का खेल मोहिनी पर पड़ गया भारी

अपमानित, शर्मसार, निर्वस्त्र मोहिनी अपनेआप को बैड पर बिछी चादर से ढकने की कोशिश कर रह थी. मन फूटफूट कर, चीखचीख कर रोने को कर रहा था, लेकिन अपमान के सदमे से आंखें इतनी खुश्क थीं जैसे पत्थर की हों. अभीअभी एक तूफान उस के जीवन में आ कर गया था. कमरे के बाहर का शोर कुछ ठंडा तो पड़ा था. लेकिन यह तूफान उस के जीवन को हमेशा के लिए तहसनहस कर गया था.

मोहिनी 18 साल की थी जब शिव कुमार से उस का विवाह हुआ था, मोहिनी का उन से कभी वैचारिक तालमेल नहीं बैठा. शिव कुमार इंगलिश के अध्यापक थे व शांत गंभीर शिव कुमार ने उसे घर की चाबी पकड़ाई और लगभग भूल गए कि वह है चंचल मोहिनी. उन के गहरेपन को कभी सम झ नहीं पाई. शिव कुमार ने उसे आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहन दिया, लेकिन अपने रूप और मन के बिंदासपन के आगे उस ने कभी शिव कुमार की बात को गंभीरता से नहीं लिया.

उसी साल मोहिनी ने एक पुत्री को जन्म दिया, मां बन कर भी वह अल्हड़ युवती बनी रही. शिव कुमार ने बेटी कोमल की देखरेख भी एक तरह से अपने जिम्मे ले ली. कालेज से आते तो बेटी की देखरेख पर ध्यान देते, मोहिनी इधरउधर सहेलियों के साथ सैरसपाटा करती.

कोमल अपने पिता की तरह धीरगंभीर, शांत, दृढ़चरित्र की स्वामिनी थी. वह अपने पिता की छत्रछाया में पलतीबढ़ती रही. कोमल ने इंग्लिश में एमए किया ही था कि शिव कुमार का हृदयाघात से निधन हो गया. मांबेटी दोनों ने किसी तरह अपने को संभाला. पीएफ, पैंशन सब मोहिनी को मिला, अब उसे अपने भविष्य की चिंता खाए जा रही थी.

सब से बड़ी चिंता उसे कोमल की नहीं, अपनी थी, उसे अपने लिए किसी पुरुष का साथ चाहिए था, वह दूसरा विवाह भी नहीं करना चाहता थी, सोचती कौन फिर से  झं झट में पड़े, किसी की घरगृहस्थी की जिम्मेदारी क्यों उठाए. अगर किसी से तनमनधन की जरूरत बिना विवाह के पूरी हो जाए तो क्या हरज है आराम से जी लेगी.

मोहिनी दिनभर यही योजनाएं बनाती, सोचती कुछ ऐसा किया जाए ताकि बाकी का जीवन आराम से कट जाए, देखते में वह कोमल की बड़ी बहन ही लगती थी, यत्न से सजाया गया रूपसौंदर्य किशोरियों को भी पीछे छोड़ देता था और इसी बीच कोमल ने बीएड भी कर लिया तो शिव कुमार के कालेज में ही उसे इंगलिश की अध्यापिका का पद मिल गया. आर्थिक रूप से मांबेटी ठीक स्थिति में थीं, घर अपना था ही लेकिन मोहनी को मन ही मन यह चिंता थी कि शादी के बाद कोमल की अपनी घरगृहस्थी होगी तो वह मां पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाएगी.

मोहिनी के मायके में अब कोई नहीं था, मातापिता की मृत्यु हो चुकी थी, भाईबहन कोई था नहीं. ससुराल वालों से उस की कभी बनी नहीं थी. शिव कुमार की मृत्यु के बाद तो संबंध बिलकुल ही खत्म हो चुके थे और अब लखनऊ की इस कालोनी में मांबेटी अकेली ही रहती थीं. पासपड़ोसी अच्छे थे, उन का हालचाल लेते रहते थे, लेकिन मोहिनी को जिस चीज की तलाश थी, वह उसे एक विवाह समारोह से मिली, अनिल से उस का परिचय उस की सहेली अंजू ने करवाया था. अंजू ने उस को कहा था, ‘‘मोहिनी है हमारे दफ्तर के नया सीनियर अफसर, मातापिता हैं नहीं, एक बहन है जो विदेश में रहती है. महाराष्ट्र से है और रिजर्व कोटे की वजह से आए है पर अच्छेअच्छों को मात दे देता.’’

मोहिनी को अनिल पहली ही नजर में पसंद आ गया. उस के मन की मुराद पूरी हो गई. सुंदर, स्मार्ट है, भिन्न जाति का है तो क्या हुआ. सुल झा हुआ है, देखने में कश्मीरी लगता है. अनिल की तरफ वह आकर्षित हो गई.

अनिल उस से अच्छी तरह मिला और यह जान कर हैरान हुआ कि वह एक युवा बेटी की मां है. दोनों काफी देर अकेले में बातें करते रहे. अनिल भी उस के सौंदर्य से प्रभावित हुआ. मोहिनी को भी लगा कि अनिल में कहीं से हीनग्रंथि नहीं है.

चलते समय अगले दिन अनिल को घर आने का निमंत्रण दे कर मोहिनी स्वप्नों के संसार में डूबतीउतराती घर पहुंची.

कोमल ने पूछा, ‘‘मां, कैसी रही शादी?’’

‘‘तुम्हें क्या, तुम्हें तो अपने पापा की तरह बस किताबों में सिर खपाए रखने का शौक है.’’

‘‘नहीं मां, कुछ जरूरी नोट्स बनाने थे मु झे और वैसे भी मैं वहां किसी को जानती नहीं थी. मै वहां क्या करती.’’

‘‘अरे, कहीं जाओगी तभी तो जानपहचान होगी. कितने नएनए लोगों से मिली मैं आज. बहुत अच्छा लगा.’’

कोमल ने कहा, ‘‘अच्छा हुआ मां, आप हो आईं, आप को अच्छा लगा वहां यह आप को देख कर ही पता चल रहा है.’’

मोहिनी गुनगुनाते हुए चेंज करने अपने बैडरूम में चली गई तो कोमल अपने काम में व्यस्त हो गई.

अगले दिन कोमल कालेज चली गई. लंच के समय अनिल ने जब मोहिनी की डोरबैल बजाई तो दरवाजा खोलने पर मोहिनी हैरान नहीं हुई. उस ने अनिल को जिन अदाओं से आने का निमंत्रण दिया था अनिल जरूर आएगा यह उसे पूरा विश्वास था. उस ने अनिल की खूब आवभगत की. उसे घर दिखाया, उस के साथ ही लंच किया, अपनी दुखद कहानी सुनाई, कम उम्र में शादी, फिर वैधव्य का दुख और अकेलापन.

मोहिनी से अनिल को सहानुभति हुई. उस ने कहा, ‘‘आप परेशान न हों,

मु झे आप अपने साथ ही सम िझए. मैं आप की ऊंची जाति का नहीं पर जानता हूं कि दुनिया कैसे चलती है,’’ कह कर वह उठ कर मोहिनी के  पास ही बैठ गया तो मोहिनी ने भी अपना हाथ उस के हाथ पर रख दिया. अनिल के सामीत्य ने कई दिनों से पुरुष संपर्क को तरसते उस के तनमन में एक चिनगारी भी भड़का दी तो उस ने सारी लाजशर्म छोड़ कर अनिल की बांहों में खुद को सौंप दिया और फिर यह एक दिन की बात नहीं रही, कोमल के बाहर जाने का समय देख कर वह अनिल के मोबाइल पर मैसेज भेज देती और अनिल पहुंच जाता, वह अच्छे पद पर था. मोहिनी पर खुल कर खर्च करता. मोहिनी को हवस और पैसों का स्वाद मुंह लग गया.

अनिल और कोमल का अभी तक आमनासामना नहीं हुआ था, लेकिन एक दिन मार्केट में मोहिनी कोमल के साथ घर का कुछ सामान खरीद रही थी, तो अनिल वहां मिल गया. मोहिनी ने कोमल को अनिल का परिचय दिया. कहा कि अंजू के परिचित हैं और अनिल ने कोमल को पहली बार देखा तो देखता रह गया. शांत, कोमल, सुंदर सा चेहरा, दुबलीपतली. कोमल का शिष्ट व्यवहार उसे प्रभावित कर गया.

मोहिनी ने अनिल की आंखों में कोमल के लिए पसंदगी के भाव देखे तो उस के दिमाग में फौरन नई योजनाएं जन्म लेने लगीं.

अब तक कई पड़ोसी बातबात में अनिल कौन है, क्या करता है, क्या करने आता है, इस तरह के कई सवाल मोहिनी से करने लगे थे. मोहिनी ने अनिल को अपना एक परिचित बता कर बात टाल दी थी. अब वह ज्यादा सचेत रहने लगी थी. अनिल दूसरी कालोनी में अकेला रहता था. उस के मातापिता अरसा पहले मर चुके थे. वह वर्षों से अकेला रहा क्योंकि शादी के लिए कोई कहने वाला भी तो हो.

मोहिनी ने अनिल से कह दिया, ‘‘तुम यहां कम ही आया करो, मैं ही तुम्हारे घर आ जाया करूंगी.’’

अनिल को इस में कोई आपत्ति नहीं थी. अब फुरसत मिलते ही वह मोहिनी को फोन

कर देता.

मोहिनी कोमल को कोई न कोई काम बता कर

अनिल के घर पहुंच जाती और दोनों एकदूसरे में डूब कर काफी समय साथ बिताते. ऐसी ही एक शाम थी जब दोनों साथ थे, मोहिनी ने बात छेड़ी, ‘‘अनिल, तुम्हें कोमल पसंद है?’’

अनिल चौंका. पूछा, ‘‘क्यों?’’

‘‘मैं काफी दिनों से कुछ सोच रही हूं, तुम जवाब दो तो आगे बात करूं?’’

‘‘हां, अच्छी है,’’ अनिल ने  िझ झकते हुए कहा.

मोहिनी हंसी,’’ तो शरमा क्यों रहे हो. तुम्हारे ही फायदे की बात सोच रही हूं.’’

‘‘बताओ क्या सोचा है?’’

‘‘तुम कोमल से शादी कर लो.’’

जैसे करंट लगा अनिल को. बोला, ‘‘यह आप कैसे सोच सकती हो? मेरेआप के जो संबंध हैं उन के बाद भी मु झे अपनी बेटी से शादी करने के लिए कह रही हो? वैसे भी अपनी जाति के लोग आप को खा जाएंगे कि दलित से शादी

कर ली.’’

‘‘तो क्या हुआ. शादी तो तुम एक दिन किसी से करोगे ही और कोमल की भी शादी तो होनी ही है, तुम उस से कर लोगे तो उस के बाद भी हमारे संबंध ऐसे ही रहेंगे, फिर कभी किसी को हम पर शक भी नहीं होगा. रही बात जाति की तो तुम तो देख ही रहे हो कि हमारी जाति वालों ने ही हमें कैसे छोड़ दिया. उन्हें मैं अपशकुनी लगती. ऐसी जाति का क्या करूंगी.’’

अनिल मोहिनी का मुंह देखता रह गया कि कोई औरत ऐसा भी सोच सकती है.

मोहिनी ने अनिल के गले में बांहें डालते हुए कहा, ‘‘क्यों, क्या तुम मु झे प्यार नहीं करते? मेरे साथ हमेशा संबंध नहीं रखना चाहते?’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है,’’ कहते हुए उस ने भी मोहिनी को बांहों में भर लिया. कहा, ‘‘लेकिन मु झे सोचने का समय तो दो.’’

‘‘ठीक है, अच्छी तरह सोच लो,’’ कुछ देर रुक कर मोहिनी चली गई.

अनिल ने बाद में सोचा, मेरा क्या नुकसान है, अच्छीभली शरीफ सी लड़की है. मेरे तो

दोनों हाथों में लड्डू हैं. जब मोहिनी को बेटी से अपना प्रेमी शेयर करने में कोई परेशानी नहीं तो मु झे क्या.

अनिल ने मोहिनी को फोन पर अपनी स्वीकृति दे दी तो मोहिनी ने कोमल को भी अनिल से विवाह के लिए तैयार कर लिया. उस की बिरादरी में तो इस तरह के संबंध बहुत होते थे और कोई कुछ बोलता भी नहीं था.

बहुत जल्दी मोहिनी ने कोमल और अनिल की सीविल मैरिज करवा दी. कोमल चली गई. अब मोहिनी को रोकनेटोकने वाला कोई नहीं रहा. कोमल कालेज जाती तो अनिल कोमल को बिना बताए छुट्टी ले लेता. मोहिनी पहुंच जाती और दोनों कोमल के आने तक का समय साथ बिताते.

फादर्स डे- वरुण और मेरे बीच कैसे खड़ी हो गई दीवार

मुझे रात को जल्दी सोने की आदत है. बेटेबहू की तरह मैं देररात तक जागना पसंद नहीं करता. शाम का खाना जल्दी खा कर थोड़ी देर टहलने जाना और फिर गहरी नींद का मजा लेने के लिए बिस्तर पर लेट जाना मेरी रोज की दिनचर्या है. इस में मैं थोड़ा सा भी बदलाव नहीं करता.

उस दिन भी मैं अपनी इसी दिनचर्या के अनुसार अपने बिस्तर पर आ कर लेट गया. किंतु जाने क्या हुआ मुझे नींद ही नहीं आ रही थी. बिस्तर पर करवटें बदलतेबदलते जब मैं उकता गया तो सोचा क्यों न कुछ देर पोतापोती के साथ खेल कर मन बहला लूं.

मैं जब पोतापोती के कमरे में पहुंचा तो देखा वे लोग कुछ काम कर रहे थे. पहले तो मुझे लगा कि शायद वे पढ़ाई कर रहे हैं और उन की पढ़ाई में खलल डालना उचित नहीं होगा, मगर फिर ध्यान से देखने पर पता चला कि वे दोनों तो चित्रकारी कर रहे थे. मैं उन के पीछे जा कर खड़ा हो गया और उन की चित्रकारी देखने लगा. जल्द ही उन दोनों को एहसास हो गया कि मैं उन के पीछे खड़ा हूं. उन्होंने आश्चर्य से मेरी तरफ कुछ ऐसे देखा मानो पूछ रहे हों, ‘आप इस समय यहां क्या कर रहे हैं?’

‘‘क्या कर रहे हो बच्चो, किस का चित्र बना रहे हो, जरा मुझे भी तो दिखाओ.’’

आंखों ही आंखों में दोनों में कुछ इशारेबाजी हुई और फिर दोनों लगभग एकसाथ बोले, ‘‘कुछ खास नहीं दादाजी, हमें स्कूल में एक प्रोजैक्ट मिला है, वही कर रहे हैं.’’

‘‘अच्छा. लाओ मुझे दिखाओ, क्या प्रोजैक्ट मिला है. मैं मदद कर देता हूं.’’

‘‘नहींनहीं दादाजी, मुश्किल नहीं है, हम कर लेंगे. वैसे भी थोड़ा सा ही काम बचा है. आप अभी तक सोए नहीं, काफी देर हो गई है?’’ मेरी पोती ने पूछा.

‘‘मैं पानी पीने के लिए उठा था. तुम्हारे कमरे की लाइट जल रही थी, इसलिए तुम से मिलने आ गया.’’

‘‘मैं आप के लिए पानी लाती हूं,’’ पोती ने उठते हुए कहा.

‘‘नहीं, रहने दो, मैं पानी पी चुका हूं.’’

‘‘मैं आप को कमरे तक छोड़ आऊं दादाजी.’’ मेरे पोते ने बड़ी मासूमियत से यह कहा तो मुझे उन दोनों पर बड़ा प्यार आया. मैं उन दोनों के सिर पर हाथ फेर कर अपने कमरे में चला आया. यों तो मेरे पोतापोती बड़े अच्छे बच्चे हैं, दोनों मेरा हमेशा ही आदर करते हैं और मेरी परवा भी, किंतु उन का आज का व्यवहार मेरे प्रति कतई सम्मानजनक नहीं था बल्कि वे दोनों मुझे जल्दी से जल्दी अपने कमरे से बाहर करना चाहते थे.

खैर, मैं वापस अपने कमरे में आ गया. हालांकि बच्चों ने तो छिपाने की पूरी कोशिश की थी पर मुझे पता चल ही गया कि वे दोनों क्या कर रहे थे. वे फादर्स डे के मौके पर अपने पापा के लिए कार्ड बना रहे थे और कहीं मैं उन के इस सरप्राइज के बारे में जान न जाऊं, इसीलिए उन्होंने जल्द से जल्द मुझे अपने कमरे से टालने की कोशिश की.

फादर्स डे पर न जाने क्यों मेरे कदम अपनेआप ही अपनी अलमारी की तरफ उठ गए. मैं ने अलमारी खोली और उस में से एक डब्बा निकाला. यह डब्बा टाई का था. मैं ने डब्बे में से टाई निकाली और उसे प्यार से सहला दिया. यह टाई मेरे बेटे वरुण ने तोहफे में दी थी. वह फादर्स डे के मौके पर इसे मेरे लिए अपनी पहली तनख्वाह से खरीद कर लाया था. हालांकि मुझे इसे कभी पहनने का मौका नहीं मिला, लेकिन यह मेरे दिल के बेहद करीब है. मैं ने इसे संभाल कर रखा है.

सुबह नाश्ते की मेज पर दोनों बच्चों  ने अपने पापा को कार्ड भेंट  किया. मेरा बेटा कार्ड देख कर अपने बच्चों पर निहाल हो गया. उस ने दोनों को अपनी गोद में बैठा लिया और उन्हें अपने हाथों से नाश्ता करवाने लगा. बच्चों द्वारा बनाया गया कार्ड देखने को मुझे भी मिला. उन के द्वारा बनाई गई अपने बेटे की कार्टून जैसी सूरत देख कर मेरे होंठों पर मुसकान आ गई जिसे मैं बहुत कोशिश कर के भी अपने बेटे से छिपा नहीं पाया.

‘‘बच्चों की कोशिश बहुत अच्छी थी. हमें उन का हौसला बढ़ाना चाहिए. प्यार से दिया गया  हर तोहफा अनमोल होता है, हमें यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए. मगर कुछ लोग दूसरों की भावनाओं को समझते ही नहीं या तो तोहफा देने वाले को डांट देते हैं या उस का मजाक उड़ाने लगते हैं,’’ वरुण ने सख्त शब्दों में अपनी नाराजगी व्यक्त की.

उस की यह नाराजगी उस के बच्चों के कार्ड का मजाक उड़ाने के लिए नहीं थी, बल्कि उस की इस नाराजगी की असली वजह वह टाई थी जिसे खरीदने पर मैं ने उसे डांटा था. वह पुराना वाकेआ हम पितापुत्र के बीच आज भी मौजूद है. न उस वाकए को कभी मैं भुला पाया और न ही कभी वो. यह बात उस के दिल में ऐसी घर कर गईर् कि उस के बाद मेरा बेटा मुझ से दूर हो गया.

हालांकि कोई भी यह कह सकता है कि मुझ से तब बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं खुद भी कभी इस बात के लिए खुद को माफ नहीं कर सका. सफाई भी क्या दूं, जब यह हुआ उस समय मेरे हालात से वह बिलकुल अनजान तो नहीं था. एक तो उस समय मेरी आर्थिक स्थिति काफी नाजुक थी, उस पर पत्नी का स्वास्थ्य दिनोंदिन बिगड़ता जा रहा था और वह हमारा साथ छोड़ने की तैयारी में थी. ऐसे में इन औपचारिकताओं के लिए जिंदगी में जगह ही कहां थी.

मैं कुछ कहता तो बात और बढ़ती, उस से पहले मेरी बहू सुमी हमेशा की तरह आगे आई, ‘‘अच्छा अब छोड़ो पुरानी बातें और जल्दी से नाश्ता खत्म करो. फिर बाजार भी जाना है. आज बच्चे अपने पापा के लिए दोपहर के खाने में कुछ खास बनाना चाहते हैं.’’ वह बातें करतेकरते सब के लिए नाश्ता भी परोसती जा रही थी. सब पनीरसैंडविच खा रहे थे जबकि मुझे उस ने दूध व कौर्नफ्लैक्स खाने को दिए. यह भेदभाव देख कर मुझे बुरा लगा.

वरुण ने बाजार जाने से मना कर दिया. उसे दफ्तर की कोई जरूरी फाइल देखनी थी. सुमी भी इतवार की सुबह काफी व्यस्त रहती है. सो, बाजार जाने की जिम्मेदारी मैं ने ले ली. सुमी ने सामान की सूची और झोले के साथ यह हिदायत भी दे डाली कि मैं अधिक दूर न जा कर पास की मार्केट से ही सामान ले आऊं.

सुमी की हिदायत के बावजूद मैं दूर  सब्जी मंडी चला गया. शायद  सुबह की खीझ मिटाने और रास्ते में अपने मित्र रामलाल हलवाई की दुकान तक पहुंच कर मेरा सब्र टूट गया और वहां मैं ने डट कर कचौरी व जलेबी का नाश्ता किया. नाश्ता करते समय मैं ने ‘फादर्स डे’ के मौके पर बड़े ही भावपूर्ण तरीके से अपने पिताजी को याद किया और बेटे के लिए उस की सलामती की कामना की.

‘‘बड़ी देर लगा दी पापाजी, कहां चले गए थे?’’ घर पहुंचते ही सुमी ने इस सवाल के साथ मेरा स्वागत किया.

‘‘मैं मंडी चला गया था. वहां सब्जी सस्ती और अच्छी मिलती है न.’’ अपनी इस समझदारी पर दाद मिलने की उम्मीद से मैं ने उस की ओर देखा पर उस ने मेरा दिल तोड़ दिया.

‘‘सब्जी लेने ही गए थे न या फिर कुछ और भी?’’ उस के इस आधेअधूरे सवाल का मतलब मैं बखूबी समझ गया था और जवाब में उसे घूर कर भी देखना चाहता था मगर चोरी पकड़ी जाने के डर से ऐसा कर न सका. थकान का बहाना बना कर मैं अपने कमरे में चला आया.

रसोई में हंगामा सा मचा हुआ था. बच्चे खाना बना रहे थे और उन के मातापिता उन की मदद कर रहे थे. पता नहीं खाना ही बना रहे थे या कोई खेल खेल रहे थे, मुझे समझ नहीं आया. अच्छा ही हुआ जो मैं बाहर से खा कर आ गया, पता नहीं घर में तो आज खाना बनेगा भी या नहीं.

मेज पर खाना लग चुका था. मेरा पोता मुझे बुलाने आया. मेरा पेट जरा भारी सा हो रहा था. इस समय भोजन करने का बिलकुल भी मन नहीं था. पर मना करने का तो सवाल ही नहीं उठता, कमजोरी मेरी ही थी. मैं मन ही मन अपनी मधुमेह आदि बीमारियों को कोसते हुए, जो मुझे अपने बच्चों से झूठ बोलने को मजबूर कर देती हैं, बाहर चला आया.

यों तो आज भी मेरे लिए लौकी की सब्जी और चपाती बनी थी पर शायद आज बच्चों को मुझ पर थोड़ा ज्यादा प्यार आ गया, इसलिए उन्होंने अपने खाने में से भी थोड़ा सा चखने के लिए दे दिया. खाना बेहद स्वादिष्ठ बना था, शायद इसलिए कि उस में बच्चों का प्यार भी मिला था, पर मजा नहीं आ रहा था. इस का कारण भी मैं जानता था.

‘‘क्या बात है पापाजी, आप खाना नहीं खा रहे? अच्छा नहीं लग रहा है क्या?’’ बहू ने मुझे प्लेट में चम्मच घुमाते देख पूछा. वह खोजी नजरों से मुझे देख रही थी. मुझे उस की इस अदा से बड़ा डर लगता है, लगता है मानो अंदर झांक कर सारे राज मालूम कर लेगी.

‘‘नहीं बेटे, ऐसी कोई बात नहीं है. खाना बहुत अच्छा बना है,’’ मैं ने जल्दीजल्दी निवाले निगलते हुए कहा. उस समय मुझे अपनी पोल खुलने से अधिक फिक्र अपने बच्चों की भावनाओं की थी. मैं ने सब के साथ भरपेट भोजन किया और दिल खोल कर भोजन की तारीफ भी की.

शाम को बच्चों का बाहर जाने का प्लान था. जब वे लोग मुझ से इजाजत लेने आए तब मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा था, लेकिन मैं ने उन्हें इस बाबत बताना ठीक नहीं समझा क्योंकि वे लोग अपना प्लान रद्द कर देते. मेरे पोतापोती मुझे बाय कर रहे थे और मैं किसी तरह अपने दर्द को दबाए हुए मुसकराने की कोशिश कर रहा था. सुमी अब भी मेरे लिए खाना बना कर गई थी. मुझे बड़ी खुशी हुई यह देख कर कि वह मेरी हर छोटीबड़ी जरूरत का हर तरह से ध्यान रखती है. मन तो किया कि उस के लिए ही सही, दो निवाले खा लूं, मगर मुझ से नहीं हुआ. हार कर मैं अपने बिस्तर पर पड़ गया.

मैं इतनी तकलीफ में था कि बच्चे कब घर वापस आए, मुझे पता ही नहीं चला. मुझे सोया जान उन्होंने मुझे नहीं जगाया. मैं रातभर दर्द से तड़पता रहा. सुबह खाई कचौरियां मेरे पेट में कुहराम मचाए हुए थीं. ऐसे में ठीक तो यही रहता कि मैं अपने बेटाबहू को जगा देता पर सब थके हुए थे और मुझे उस समय उन्हें परेशान करना ठीक नहीं लगा. मगर परेशान तो वे लोग फिर भी हो गए. मेरी लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें मेरी तकलीफ के बारे में पता चल गया. मेरे वाशरूम से बारबार आती फ्लश की आवाज ने चुगली जो कर दी थी.

वरुण और सुमी मेरे कमरे में चले आए. मेरी हालत देख कर वे घबरा गए. वे तो उसी समय डाक्टर को बुलाना चाहते थे मगर इतनी रात डाक्टर का आना मुश्किल था. सो, खुद ही मेरी तीमारदारी में जुट गए. मुझे उस समय अपने बच्चों पर प्यार आ रहा था और शायद उन्हें गुस्सा, तभी तो वरुण मुझे घूर कर देख रहा था. वरुण के इस तरह घूरने से मुझे डर लगता था. उस के गुस्से से खुद को बचाने के लिए मैं आंखें बंद कर के लेट गया. थोड़ी देर में मुझे दवा के कारण नींद आ गई.

10 बजे के करीब मेरी नींद टूटी. मैं चौंक कर उठ बैठा. सुमी का दफ्तर जाने का समय हो रहा था. आज मैं अपनी आदत के उलट बहुत देर तक सोता रहा. मैं ने उठने की कोशिश की, पर उठ नहीं पाया. बड़ी कमजोरी महसूस हो रही थी. कुछ ही देर में सुमी मुझे देखने आई. मुझे जगा हुआ देख कर वह चाय बना लाई. तब तक वरुण ने मुझे सहारा दे कर बैठा दिया. दोनों को उस समय घर के कपड़ों में देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ, ‘‘तुम दोनों अब तक तैयार नहीं हुए. आज औफिस नहीं जाना है क्या?’’

‘‘आप को ऐसी हालत में छोड़ कर औफिस कैसे जाएं. आज हम दोनों ने दफ्तर से छुट्टी ले ली है,’’ वरुण ने जवाब दिया.

‘‘नहीं बेटा, इस की कोई जरूरत नहीं है. मैं अब ठीक महसूस कर रहा हूं. तुम लोग आराम से दफ्तर जाओ,’’ जाने मैं बच्चों से झूठ बोल रहा था या फिर खुद से, मुझे समझ नहीं आया.

‘‘हां, पता है हमें कितना ठीक महसूस कर रहे हैं आप. आप का चेहरा देख कर ही पता चल रहा है. अब आप कुछ नहीं बोलेंगे, सिर्फ आराम करेंगे. आज हम आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे. पूरा दिन आप पर नजर रखेंगे और आप वो करेंगे जो हम कहेंगे. चलिए, लेट जाइए.’’ बहू की यह मीठी झिड़की मुझे अच्छी लगी. इस के बाद दोनों पूरा दिन मेरी इस तरह देखभाल करते रहे जैसे कि मैं एक छोटा बच्चा हूं और वे दोनों मेरे अभिभावक, मैं भी उन की हर आज्ञा का पालन करता रहा.

शाम तक मेरी हालत में काफी सुधार हो चुका था. मैं अपने कमरे में बैठेबैठे बोर हो गया था. सो, उठ कर हौल में चला आया. मुझे देख कर सुमी ने चाय का कप और एक प्लेट में बिस्कुट परोस कर मेरे सामने रख दिए. मुझे बड़ी हसरत से पैस्ट्री और समोसों की ओर ताकते देख उस के होंठों पर शरारती मुसकान आ गई जिसे देख कर मैं शरमा गया.

‘‘कल आप कहां गए थे पापा?’’ वरुण ने मेरी ओर सवाल दागा.

उस के इस सवाल के लिए मैं तैयार नहीं था, इसलिए कुछ पलों के लिए तो हड़बड़ा गया लेकिन फिर विरोध करने वाले अंदाज में बोला. ‘‘तुम्हारी याददाश्त अभी से कमजोर हो गई है क्या? याद नहीं तुम्हें, सब्जी लेने गया था, बहू ने ही तो भेजा था.’’

‘‘मेरी याददाश्त बिलकुल ठीक है. आप की बहू ने तो आप को पास वाली मार्केट भेजा था, पर आप रामलाल चाचा की दुकान पर पहुंच गए. पूछ सकता हूं क्यों?’’

‘‘मैं रामलाल की दुकान पर नहीं, मंडी गया था, अच्छी और सस्ती सब्जी लेने.’’ मैं जानता था अब मेरा झूठ ज्यादा देर तक नहीं चलेगा, पर फिर भी मैं ने एक आखिरी कोशिश की.

‘‘मेरे दोस्त दिनेश ने आप को रामलाल चाचा की दुकान पर देखा था वह भी जलेबी और कचौरी खाते हुए.’’

मेरे बेटे के बिगड़े तेवरों ने मुझे सीधा कर दिया. दिनेश को तो मैं ने भी देखा था उस दिन पर यह नहीं सोचा था कि वह मेरे बेटे से मेरी चुगली कर देगा, चुगलखोर कहीं का. आजकल के लड़कों में बड़ों के लिए आदरसम्मान रहा ही नहीं. मैं ने अपने बेटे की ओर देखा. वह सच सुनने के इंतजार में लगातार मुझे घूर रहा था. अब और किसी झूठ के लिए जगह नहीं थी, बहाने भी लगभग खत्म हो चुके थे. सो, अब सच बोलने में ही भलाई थी.

‘‘कल तुम लोगों को फादर्स डे मनाते देख मेरा भी मन कर गया. मैं वहां फादर्स डे मनाने गया था.’’ मेरा यह मासूमियत भरा जवाब सुन कर मेरी बहू की हंसी छूट गई. जाने उस की हंसी में क्या था कि पहले मैं, फिर मेरा बेटा भी उस के साथ खुल कर हंस दिए. हम हंसे जा रहे थे और दोनों बच्चे हमारी ओर आश्चर्यभरी नजरों से देख रहे थे.

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