Valentine’s Day 2024: वैलेंटाइन डे से पहले न करें ये 7 गलतियां, नहीं तो हो सकते हैं मुंहासे

क्या आप को भी बारबार मुंहासे होते हैं? लाख जतन करने पर भी आप का इन से पीछा नहीं छूट रहा है? औयली फूड खाना भी बंद कर दिया, फेस वाश से ले कर ऐंटीएक्ने पैक भी ट्राय कर लिया पर यह परेशानी जस की तस है? तो यकीन मानिए अनजाने में ही सही पर कुछ तो आप ऐसा कर रही हैं जो आप को नहीं करना चाहिए. जैसे:

1. चेहरे से खेलें नहीं

कई महिलाओं की चेहरे को बारबार छूने की आदत होती है. बिना मतलब चेहरे पर हाथ फेरती रहती हैं. अगर आप भी ऐसा करती हैं तो चेहरे पर दाने निकलना स्वाभाविक है. जैसे अगर हम कंप्यूटर या लैपटौप पर काम करती हैं तो हमारी उंगलियां कीबोर्ड पर चलती रहती हैं, जिस से बहुत से बैक्टीरिया हमारे हाथों के संपर्क में आते हैं और जब हम उन्हीं हाथों को चेहरे पर लगाते हैं तो पिंपल्स होने लगते हैं.

कई बार ऐसा भी होता है कि जब कोई मुंहासा निकलता है तो हम उसे दबा देते हैं. हमें लगता है कि ऐसा करने से वह जल्दी ठीक हो जाएगा. लेकिन होता उलटा है. जब हम मुंहासे को छेड़ते हैं तो उस के बैक्टीरिया फैल जाते हैं, जिस से समस्या और बढ़ जाती है. एक तो वहां नए मुंहासे निकलने लगते हैं दूसरा वहां दाग और गड्ढे भी हो जाते हैं, जो देखने में बहुत गंदे लगते हैं. ऐसे में अगर आप चाहती हैं कि मुंहासे जल्दी खत्म हो जाएं तो चेहरे पर बारबार हाथ लगाना छोड़ दें.

2. तनाव से बचें

आप को सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन तनाव भी पिंपल्स होने का एक कारण हो सकता है. अगर आप भी हमेशा काम में व्यस्त रहती हैं और खुद को समय नहीं दे पाती हैं तो ऐसा आप के साथ भी हो सकता है. जी हां, तनाव हमारे अंदर कोर्टिसोल जैसे हारमोन पैदा करता है, जिस से तेलग्रंथियां उत्तेजित हो जाती हैं और फिर रोमछिद्र बंद हो जाते हैं. रोमछिद्र बंद होने के बाद चेहरे पर दाने निकलने लगते हैं. अगर आप चाहती हैं कि आप के चेहरे से मुंहासों का नामोनिशान मिट जाए तो काम से ब्रेक ले कर थोड़ा रिलैक्स करें.

3. नो स्मोकिंग

जब हम धूम्रपान करते हैं तो हमारी त्वचा तक औक्सीजन सही तरह नहीं पहुंच पाती, जिस से चेहरे पर  झुर्रियां भी पड़नी शुरू हो जाती हैं. धुएं में कार्सिनोनन होता है, जो चेहरे के लिए हानिकारक होता है. अत: धूम्रपान छोड़ दें.

4. खानपान

मसालेदार और औयली खाना खाने में तो स्वादिष्ठ लगता है, लेकिन इस के साइड इफैक्ट्स से कई बीमारियां शरीर में घर कर जाती हैं. इन में से एक है मुंहासे. मसालेदार खाना मुंहासों का एक कारण है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ मसालेदार खाना ही पिंपल्स की वजह है. कई लोगों को डेयरी प्रोडक्ट्स सूट नहीं करते और इस वजह से भी पिंपल्स हो जाते हैं. इसलिए खाने में उन्हीं चीजों का सेवन करें जो आप को सूट करती हों. स्वाद के चक्कर में सेहत पर लापरवाही भारी पड़ सकती है.

5. साफसफाई पर ध्यान न देना

आप घंटों जिम में पसीना बहाती हैं ताकि फिट रहें. वर्कआउट करने से चेहरे पर भी निखार आता है, लेकन छोटी सी लापरवाही कहें या आलसीपन के कारण त्वचा पर पिंपल्स होने लगते हैं. कई महिलाएं वर्कआउट करने के बाद नहाती नहीं हैं, जिस से रोमछिद्रों में गंदगी, बैक्टीरिया, तेल और पसीना समा जाता है जो पिंपल्स होने की वजह बनता है. इसलिए वर्कआउट करने के कुछ समय बाद नहाना न भूलें.

6. कोई भी ब्यूटी प्रोडक्ट लगाना

अपनी त्वचा का ध्यान रखना बहुत अच्छी बात है, लेकिन बिना सोचे कोई भी प्रोडक्ट खरीद कर सीधे अप्लाई करना भी सम झदारी नहीं है. यह आप का चेहरा है कोई ऐक्सपैरीमैंट करने वाली जगह नहीं जो कुछ भी लगा लिया.  झेलना भी तो आप को ही पड़ता है. इसलिए ब्यूटी प्रोडक्ट खरीदने से पहले उस पर लगा लैवल जरूर पढ़ें कि किसी ऐसे इनग्रीडिऐंट का इस्तेमाल तो नहीं किया गया जो रोमछिद्रों को बंद कर दे, साथ ही किसी स्किन ऐक्सपर्ट की राय भी जरूर लें कि क्या लगाना चाहिए और क्या नहीं.

7. ज्यादा स्क्रबिंग

औयली स्किन पिंपल्स होने का कारण है, लेकिन ड्राई स्किन वालों को भी मुंहासे होते हैं. दरअसल, जब हम ज्यादा स्क्रब करते हैं तो हमारी स्किन ड्राई हो जाती है, जो पिंपल्स को दावत देती है. इसलिए महीने में 1 या 2 बार ही हल्के हाथों से स्क्रब करें. साथ ही चेहरा धोने के लिए माइल्ड फेस वाश का प्रयोग करें.

Valentine’s Day 2024: वैलेंटाइन डे को मनाना चाहते हैं यादगार, तो अपने पार्टनर के लिए करें ये प्लान

इस वैलेंटाइन डे पर आप छोटीछोटी खुशियों से अपने प्यार के पुराने पलों को याद कर सकती हैं. एकदूसरे को स्पैशल फील करा सकती हैं, कुछ इस तरह:

तुम हो खास

जब कोई हमारे लिए सरप्राइज प्लान करता है, तो हम स्पैशल फील करते हैं. इस वैलेंटाइन डे आप भी अपने पति के लिए कुछ स्पैशल प्लान करें, जो उन के चेहरे पर प्यारी सी मुसकान ला सके. आप उन की पसंदीदा चीज औनलाइन और्डर कर के उन्हें सरप्राइज दे सकती हैं या फिर मूवी के टिकट बुक करा कर उन के फोन पर मैसेज कर सरप्राइज दे सकती हैं.

तोहफा उन के लिए

इस दिन पति को गिफ्ट जरूर दें. जरूरी नहीं कि कोई महंगी चीज ही गिफ्ट करें. आप उन की जरूरत की छोटीछोटी चीज भी गिफ्ट कर सकती हैं.

बातोंबातों में हो जाए प्यार

पतिपत्नी साथ तो रहते हैं, लेकिन घरपरिवार की जिम्मेदारियों की वजह से उन्हें इतना समय नहीं मिलता कि एकदूसरे से प्यार भरी बातें कर सकें. अत: कोशिश करें कि इस वैलेंटाइन डे थोड़े रोमांटिक अंदाज में पेश आएं. पति से प्यार भरी बातें करें.

माहौल हो रोमानी

इस दिन अपने घर को अच्छी तरह सजाएं. घर को रोमांटिक माहौल दें. दीवारों पर अपनी कुछ तसवीरें लगा सकती हैं. घर को फूलों से सजा सकती हैं. इस दिन बैडरूम को स्पैशल तरीके से सजाएं ताकि वे आप से चाह कर भी दूर न रह पाएं.

बस हमतुम

आप इस दिन कहीं बाहर घूमने का भी कार्यक्रम बना सकती हैं. बाहर एकदूसरे के साथ को ऐंजौय करें. इस दिन पार्टनर को ‘आई लव यू’ जरूर कहें. ये 3 शब्द मैजिक भरे होते हैं, जो रिश्ते में मिठास लाते हैं.

क्या न करें

महिलाओं में अकसर देखा जाता है कि वे तुलना करती हैं कि मेरी सहेली के पति ने उस के लिए पार्टी रखी, इतना महंगा गिफ्ट दिया. आप ऐसा न करें. पैसे को महत्त्व न दें, बल्कि जो पति कर रहे हैं उसी में खुश हो ऐंजौय करें.

सैलिब्रेट करने के बजाय शिकायत ले कर न बैठ जाएं कि आप ने उन के लिए इतना अच्छा सरप्राइज प्लान किया है, लेकिन वे आप के लिए कुछ ले कर नहीं आए.

गिफ्ट पसंद न आने पर तीखी प्रतिक्रिया तो कतई न दें. कई बार कुछ महिलाएं गिफ्ट पसंद नहीं आने पर पति के सामने ही कह देती हैं कि यह क्या लाए हो? यह मेरे किसी काम का नहीं है.

समाज में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो इस तरह के उत्सव या खास दिन को धर्म व संस्कृति से जोड़ कर देखते हैं. उन का मानना होता है कि इस तरह के उत्सवों को नहीं मनाना चाहिए. ये हमारी संस्कृति में नहीं हैं. लेकिन यह बेतुकी बात है. यह किसी धर्म या संस्कृति का दिन नहीं है, बल्कि प्यार का दिन है और इसे एकदूसरे के साथ प्यार से मनाना चाहिए.

तुम्हारी सास: भाग 1- क्या वह अपने बच्चे की परवरिश अकेले कर पाई?

पति विपुल की अचानक मृत्यु के गम से रेखा उभर नहीं पाई. वह डिप्रैशन में पहुंच गई. लाख कोशिश करने पर भी उठतेबैठते, खट्टीमीठी यादें उस के जेहन में उभर आतीं. विपुल के साथ गुजारे उन पलों को रेखा ने जीने का सहारा बना लिया.

रेखा को उदास देख कर मांजी को बहुत तकलीफ होती. उन की कोशिश होती कि रेखा खशु रहे. मांजी ने बहुत सम?ाने की कोशिश कर कहा, ‘‘जिस मां का जवान बेटा उस की आंखों के सामने गुजर जाए, उस मां के कलेजे से पूंछो, मु?ा पर क्या गुजरती होगी…’’ बेटे की मौत का गम कोई कम नहीं होता, मेरी आंखों के सामने मेरा जवान बेटा चला गया और मैं अभागिन बैठी रह गई. मैं किस के आगे रोऊं. मैं ने तो कलेजे पर पत्थर रख लिया, लेकिन बेटा हम दोनों एक ही नाव पर सवार हैं.’’

‘‘मांजी, विपुल अगर बीमार होते तो बात सम?ा में आती लेकिन अचानक विपुल का इस दुनिया को छोड़ कर चले जाना… न कुछ अपनी कही, न मेरी सुनी. मैं कितना अकेला महसूस कर रही हूं… कुछ कह भी नहीं पाई विपुल से.’’ ‘‘जिस के लिए तुम दुखी हो, वह मेरा भी बेटा था. एक बार मेरी तरफ देख मेरी बच्ची. वक्त हर जख्म का मरहम है. उसे जितना कुरेदोगी उतना उभर कर आएगा. शांत मन से सोच कर तो देखो. जो यादें तकलीफदेह हों,

उन्हें भूल जाना ही बेहतर है, बेटा,’’ मांजी ने रेखा के सिर पर हाथ रखा और कहा, ‘‘अब अपने बच्चे को देखो, यही हमारी दुनिया है. इस की खुशी में ही हमारी खुशी है. तुम खुश रहोगी तब ही मैं खुश रह पाऊंगी. विपुल और तुम एक ही औफिस में थे. तुम्हारे कंधों पर घर की जिम्मेदारी थी, इसलिए तुम्हें जौब छोड़नी पड़ी. अब बेटी वक्त आ गया है विपुल के छोड़े काम अब तुम्हें ही तो पूरे करने हैं. कल से तुम्हें औफिस भी जाना है. अब तुम्हें घर संभालना है… अब मैं तुम्हारी आंखों में आंसू न देखूं… चलो सोने की कोशिश करो.’’

रेखा को नींद नहीं आई. इस घर में उस की छोटी सी दुनिया थी, जो उस ने विपुल के साथ बसाई थी. विपुल के साथ लड़ना?ागड़ना, रूठनामनाना सब ही तो था. अब ये दीवारें उस के आंसुओं की गवाह हैं. यही सोचतेसोचते सारी रात पलकों में ही गुजर गई.

आज रेखा का जन्मदिन भी है. वह बिस्तर पर लेटी सोचने लगी कि अगर विपुल होते तो 4 दिन पहले से ही हंगामा हो रहा होता. पिछले साल की ही बात है. इस दिन विपुल ने घर ही सिर पर उठा लिया था. रेखारेखा करते मुंह नहीं सूखता था. उदास मन से बिस्तर छोड़ चादर की तह बनाई और फ्रैश होने चली गई. सोचा आज के दिन जल्दी नहा लेती हूं. मांजी और बबलू ने भी मेरे लिए कुछ प्लान किया होगा. नहा कर कपड़े पहन ही रही थी तो देखा ब्लाउज का हुक टूटा हुआ है. वह गाउन पहन कर मांजी के पास गई और उन के पैर छुए, मांजी ने रोज की तरह उस के सिर पर हाथ रखा, लेकिन जन्मदिन विश नहीं किया. रेखा ने मन में सोचा शायद मांजी को मेरा जन्मदिन याद नहीं रहा होगा.

आगे बढ़ कर अपने बेटे बबलू को उठाया और स्कूल जाने के लिए तैयार होने के लिए कहा, लेकिन यह क्या? बबलू ने भी उसे विश नहीं किया. किसी को याद नहीं कि आज उस का जन्मदिन है. हमेशा मांजी उस के जन्मदिन पर माथा चमूती थीं और बबलू चुम्मियां करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था, पर आज ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. रेखा की आंखें भर आईं. वह बाथरूम में गई और चेहरे पर पानी की छींटे डाल कर अपनेआप को संभाला और औफिस जाने के लिए तैयार होने लगी. पीछे मुड़ विपुल की तसवीर को देखा तो लगा कि वे मुसकरा कर ‘आल दा बैस्ट’ कह रहे हों जैसे.

रेखा को बबलू को स्कूल बस तक छोड़ना भी था. सोचने लगी इन 3 महीनों में जिंदगी के रंग ही बदल गए. मेरे दुखसुख का साथी जिस के साथ जीनेमरने के वादे किए थे अब नहीं रहा, कैसे मैनेज होगा सबकुछ? मैनेज कर भी पाऊंगी या नहीं?

मांजी यह सब देख अपनी बहू रेखा के लिए चितिंत रहती थीं. उन की कोशिश रहती कि रेखा को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो. वे आगे बढ़बढ़ कर उस का काम में हाथ बंटातीं. रेखा को देर होते देख, मांजी ने घड़ी की तरफ नजर की, मन में सोचा आज रेखा को इतनी देर क्यों लग रही है फिर आवाज लगाई, ‘‘अरे बहू (रेखा) क्या कर रही हो? जल्दी करो बेटा, घड़ी देखो तुम लेट हो रही हो.

बबलू की बस निकल गई तो तुम्हें स्कूल तक छोड़ना पड़ेगा.’’

रेखा ने जवाब में कहा, ‘‘बस मांजी जरा ब्लाउज में हुक टांक लूं फिर तैयार होती हूं.’’

‘‘लाओ बेटा, ब्लाउज मु?ो दे दो, हुक मैं लगा देती हूं.’’

‘‘अरे नहीं मांजी, आप मेरे ब्लाउज में हुक लगाएंगी, मु?ो अच्छा नहीं लगेगा.’’

मांजी ने फिर कहा, ‘‘इस में अच्छा नहीं लगने वाली क्या बात है बेटा? अगर मेरी जगह तुम्हारी मां होतीं तो वे भी ऐसा ही करतीं.’’

रेखा के उदास मन ने शादी के पहले की बात सोच कहा, ‘‘नहीं मांजी, ऐसा नहीं है, मेरी मां ऐसा कभी नहीं करतीं और 4 बातें मु?ो सुना देतीं, कहतीं कि बेटी तुम्हें पराए घर जाना है, अपना काम स्वयं करने की आदत डालो, ससुराल में कौन करेगा, तुम्हारी सास?’’ इतना कह हंस पड़ी.

Valentine’s Day 2024: धड़कनें तेरी मेरी- क्या अपना प्यार वापस पा सकी पाखी?

‘दिलक्या करे जब किसी से किसी को प्यार हो जाए…’ एफएम पर यह गाना बज रहा था और पाखी सोच रही थी कि ऐसे गाने आज भी फिट बैठते हैं. लेकिन इस गाने की नायिका का नाम जूली न हो कर पाखी होता, तो और सटीक लगता. रोमांटिक तबीयत वाली व शेरोशायरी की शौकीन पाखी को जब प्यार हुआ तो जनून बन कर सिर पर चढ़ गया. उस ने कसम खा ली और इरादा पक्का कर लिया गड़बड़ी फैलाने, चांदनी की शादी को चौपट करने और उस के सपनों पर पानी फेरने का. लेकिन यह नहीं सोचा था उस ने कि उस की योजना का अंत हौस्पिटल के इमरजैंसी वार्ड में होगा. पर इतना वह अवश्य मानती है कि जो कुछ हुआ वह अच्छा हुआ. इस से बेहतर की उम्मीद भी वह क्या करती?

आज मौसम भी खुशगवार था. लग रहा था जैसे पत्तों और शाखों के बीच अनबन खत्म हो गई है. पत्तों ने गिरना बंद कर दिया था. अपनी जगह चिपके वे ठंडी बयार की कोमल सहलाहट का आनंद ले रहे थे. ऐसे सुहावने मौसम में सूप का घूंट भरती पाखी की नजर पास रखी पत्रिका पर गई. उस में ‘अपना प्यार कैसे पाएं’ लेख पर जैसे ही उस की नजर पड़ी, उस की हंसी छूट गई. मुंह से निकली सूप की फुहार उस के गालों पर छिटक गई. काश, इतना सरल होता यह सब, तो पत्रिका में दिए गए सुझावों को अपनाती और पा लेती अपना प्यार.

पाखी की मोहित पर पहली नजर कालेज की वैलकम पार्टी में पड़ी थी और वह उसे पहली नजर में ही भा गया था. उस पार्टी में सभी युवा एकदूसरे को टटोल रहे थे. आखिर एमबीए करने आए सभी विद्यार्थी परिपक्व जो थे. कई तो नौकरी का अनुभव लेने के पश्चात आए थे. लेकिन पाखी के कदम बढ़ाने से पूर्व चांदनी मोहित को खींच कर ले गई. इस से पहले कि मोहित संभल पाता, वह उस के साथ पूरी पार्टी में नाचती फिर रही थी. पहले गले में बांहें, फिर कमर में. उफ हद हो गई. मोहित बेचारे की क्या गलती? जब चांदनी ही उस आकर्षक नौजवान पर मेहरबान हो उठी तो भला उसे क्या आपत्ति हो सकती थी? चांदनी एक खूबसूरत लड़की थी जिस की अदाएं रहीसही कसर पूरी कर देती थीं.

जल्द ही चांदनी ने यहां भी अपना परचम लहरा दिया था. पूरे कालेज में उस का शोर रहता. हर क्लास उस के बिना अधूरी होती और हर पार्टी में आ कर वह जान डाल देती. चांदनी और मोहित की बढ़ती प्रगाढ़ता पाखी को खिन्न कर जाती. पाखी ठहरी एक आम रंगरूप वाली साधारण लड़की. चांदनी के उजले रूप के आगे उस की क्या बिसात? लेकिन चांदनी को तो कोई भी मिल जाता फिर मोहित ही क्यों? क्या वह पाखी की आंखों में मोहित के लिए कुछ नहीं पढ़ पाई थी? हुंह, बड़ी सहेली बनी फिरती है. विद्यालय के दिनों से ही दोनों साथ थीं. कितनी भावनाएं, कितने अनुभव साझा किए थे. कम से कम उसे तो पाखी के अनकहे प्यार को समझना चाहिए था. पाखी अब इसी उधेड़बुन में डूबी रहती कि क्या करे जिस से मोहित उसे मिल जाए? किंतु वह कुछ सोच पाती इस से पहले वह घट गया जिस का डर उसे खाए जा रहा था.

‘‘मैं और मोहित शादी कर रहे हैं पाखी,’’ चांदनी ने उस की बांहें पकड़, उछल कर बताया था, ‘‘ओह पाखी, मैं कितनी खुश हूं बता नहीं सकती. मैं तो पगला ही गई थी जब कल शाम मोहित ने मेरे समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा. बिलकुल फिल्मों की तरह, डायमंड रिंग हाथ में लिए… ओह, मेरी तो आंखें छलछला गई थीं. ‘‘अपनी शादी के अवसर पर यदि मेरा दिल किसी से अपनी बातें कह सकता है तो वह तुम हो. अब मैं तुम्हारे साथ और समय बिताना चाहती हूं, शादी की सारी खरीदारी करना चाहती हूं,’’ चांदनी सातवें आसमान में उड़ान भर रही थी, ‘‘वैसे भी तुम पीजी में रहती हो तो शादी से 1 हफ्ता पहले तुम्हें मेरे घर में शिफ्ट होना होगा.’’ लेकिन पाखी का दिल चाक हो चुका था. ऊपर से अपने अधरों पर मुसकान का मुखौटा चढ़ाए वह अंदर ही अंदर फूटफूट कर रो रही थी. पहली बार उसे कोई लड़का पसंद आया और उसे अपने दिल की बात कहने से पहले ही वह किसी और का हो गया. और वह भी चांदनी का. उस की अपनी सहेली का. उस का मन यह बात इतनी सरलता से कैसे स्वीकारता भला?

पाखी का मन तैयारियों में जुट गया. वह सोचती रहती थी कि ऐसा क्या करे कि चांदनी की शादी धरी की धरी रह जाए? ऐन शादी वाले दिन उस के लहंगे पर कैंची चला दे या उस के मेकअप का डब्बा गायब कर दे या फिर उस की सैंडल तोड़ दे… पर यह सब तो पहले ही नजर में आ जाएगा और फिर उस के रंगे हाथों पकड़े जाने का खतरा भी तो है. पाखी कभी नहीं चाहेगी कि मोहित की नजरों में वह गिर जाए. नहीं, वह कुछ ऐसा करेगी कि मोहित को उस की भावनाओं के बारे में पता चलेपाखी के ‘क्या करूं, क्या करूं’ की सोच पर दिन बीतने लगे. फिर एक दिन उस ने एक योजना बनाई. मोहित व अपनी एक तसवीर कालेज के अलबम में से निकाली. उस पर एक कागज चिपका कर ‘आई लव यू’ लिखा. फिर चांदनी और मोहित को अपने यहां दावत के लिए निमंत्रण दिया. उस के लिए खूब तैयारी की. मोहित की पसंदीदा डिशेज मंगाईं और अपने पीजी की कुक को पैसे दे कर रोक लिया ताकि वह खाना सर्व करती रहे और पाखी अपनी योजना को कारगर कर सके.

चांदनी व मोहित पाखी के लिए उस की पसंद के सफेद आर्किड फूलों का गुलदस्ता लिए साथ में आए. थोड़ी देर तीनों बैठ कर बातचीत करते रहे फिर खाने के लिए पाखी उन्हें डाइनिंग टेबल पर ले चली, जहां उस ने बड़ी सफाई से वह तसवीर अपनी डायरी से आधी झांकती हुई पहले से ही रखी थी. उस में से ‘आई लव यू’ बाहर दिख रहा था, इसलिए उसे विश्वास था कि मोहित उसे बाहर खींच कर देखने का प्रयास अवश्य करेगा. और तब उस के दिल की बात उस के बिना कुछ कहे ही मोहित तक पहुंच जाएगी. जब चांदनी हाथ धोने गई, पाखी जल्दी से मोहित को डाइनिंग टेबल पर ले आई. उसे वहीं छोड़ वह खाना लाने के बहाने किचन में चली गई. फिर खाना लगाया तो सब ने बड़े स्वाद से खाया. उस दौरान उन के बीच हंसीमजाक चलता रहा, किंतु मोहित के चेहरे पर कोई शिकन, कोई परेशानी नहीं थी.

उन के जाने के बाद पाखी की कुक रसोई समेटने के बाद आई और उस के हाथ में डायरी थमाते हुए कहने लगी, ‘‘ये लो दीदी. आप की डायरी बेतरतीबी से टेबल पर पड़ी थी. कागज बाहर निकल रहे थे. मेहमान देखते तो सोचते कि हमारी दीदी को रहने का सलीका नहीं आता, इसलिए मैं ने उठा कर रसोई में रख ली थी.’’पाखी का मन हुआ कि वह कुक का सिर तोड़ दे. किस ने कहा था उसे जरूरत से ज्यादा सलीका दिखाने के लिए. आमतौर पर उस की जिन बातों से पाखी खुश हो जाती थी, आज उन्हीं बातों ने उस की सारी योजना बिगाड़ दी थी. अगले हफ्ते शौपिंग का कार्यक्रम तय था. पाखी के दिमाग के घोड़े फिर से दौड़ने लगे. फेसबुक पर अपने क्लासमैट्स के ग्रुप में उस ने संचेत को ढूंढ़ निकाला. चाहे कुछ महीनों के लिए ही सही पर चांदनी और संचेत के प्रेम के किस्से पूरे स्कूल में मशहूर हुए थे. लड़कपन की वह चाहत जल्द ही पढ़ाई के बोझ तले दब गई थी. पर पाखी ने सुना था कि औरत अपना पहला प्यार कभी नहीं भूलती. उस ने संचेत को फेसबुक पर मैसेज भेजा. उधर से उस का उत्तर आया, ‘कहां हो आजकल? मिलने का प्रोग्राम बनाते हैं.’ पाखी को और क्या चाहिए था. उस ने संचेत को उसी मौल में, जहां चांदनी और मोहित उस के साथ खरीदारी को जाने वाले थे, आमंत्रित कर डाला, ‘पैसिफिक मौल के फूडकोर्ट में सागररत्ना रेस्तरां में मिलते हैं. करीब 2 बजे.’

दक्षिण भारतीय भोजन चांदनी को पसंद था और पाखी 1 तीर से 2 निशाने करना चाह रही थी. यानी चांदनी का पहला प्यार उस से टकरा जाए और मोहित के मन में शंका का बीज उत्पन्न हो जाए. तब इस के परिणामस्वरूप उस का अपना जैकपौट लग जाए. चांदनी आई तो उस ने मौल में काफी खरीदारी की. मोहित ने भी जी खोल कर उसे खरीदारी करवाई. बड़े मौल में खरीदारी का यही तो फायदा है कि नामी ब्रैंड्स के शोरूम्स से वातानुकूलित वातावरण में चैन से खरीदारी कीजिए, फिर वहीं फूडकोर्ट में अपनी भूखप्यास शांत कीजिए. जैसे ही 2 बजने को हुए पाखी ने शोर मचा दिया, ‘‘बहुत भूख लग रही है. चलो न कुछ खा कर आते हैं. यहां पर सागररत्ना रेस्तरां है, वहीं चलते हैं. वैसे भी चांदनी को तो बहुत भाता है दक्षिण भारतीय खाना.’’ अपनी खरीदारी आगे जारी रखने का मन बना कर तीनों सागररत्ना रैस्तरां की ओर बढ़ गए. मोहित काउंटर पर और्डर देने गया तो पाखी चालाकी से चांदनी को उसी टेबल पर ले गई जहां संचेत बैठा प्रतीक्षा कर रहा था.

‘‘हाय संचेत, इतने दिन बाद?’’ कह पाखी ने संचेत का ध्यान आकर्षित किया. चांदनी और संचेत अचानक एकदूसरे को सामने पा सकपकाए किंतु अगले ही क्षण वे सहज हो गए. लड़कपन की बातों को बचपना समझना ही परिपक्वता की निशानी है. दोनों एकदूसरे के वर्तमान से अवगत हो ही रहे थे कि मोहित आ गया.

‘‘संचेत, ये है मोहित मेरा प्यार और जल्द ही होने वाला मेरा पति,’’ चांदनी मोहित के सीने पर सिर टिका कर बोली.

‘‘और संचेत कौन है यह नहीं बताओगी मोहित को?’’ पाखी को उन दोनों का प्रेम सहन न हुआ. ‘‘मोहित, ये संचेत है. हम एकसाथ स्कूल में पढ़ते थे और ये मेरा पहला क्रश था,’’ कह चांदनी बेफिक्री से हंस दी.

‘‘अरे, फिर चांदनी जैसी लड़की को हाथ से जाने कैसे दिया संचेत तुम ने?’’ मोहित भी उतना ही बेफिक्र था.

‘‘गलतियां सब से हो जाती हैं, यार,’’ संचेत बोला और मोहित हंसा तो दोनों एकदम दोस्त बन गए. यह योजना भी मुंह के बल गिर पड़ी तो पाखी बहुत परेशान हो उठी. मोहित और चांदनी के बीच न केवल प्यार था, बल्कि विश्वास का अटूट रिश्ता भी साफ दिखाई दे रहा था. पाखी का कोई भी पासा ठीक नहीं पड़ रहा था और घड़ी की सूइयों ने रेस लगा कर शादी का हफ्ता ला खड़ा कर दिया था. पाखी चांदनी के घर शिफ्ट हो गई. वहां की तैयारियों में पाखी की उपस्थिति आवश्यक थी. शादी की सजावट, रस्मोरिवाज वगैरह सभी में वह मौजूद रहती थी. घर फूलमालाओं से सज चुका था. बरात के स्वागत की तरकीबें बताई जा रही थीं.

‘‘बरात आते ही हम पटाखे चलाएंगे,’’ चांदनी का छोटा भाई बोला.

‘‘नहीं, कभीकभी घोड़ी बिदक जाती है,’’ पिताजी ने साफ मना कर दिया.

‘‘तो हम गुब्बारों और फीतों से पूरा रास्ता सजाएंगे,’’ चचेरी बहन बोली.

‘‘पागल है? ये कोई जन्मदिन की पार्टी है क्या?’’ अब भाई के मना करने की बारी थी.

‘‘एक सरल व नया उपाय बताऊं,’’ कनाडा से आई चांदनी की मौसेरी बहन ने कहा, ‘‘हम वहां साबुन के पानी के बुलबुले उड़ाएंगे. इस से बरातघर की तेज चमकती रोशनी में सतरंगी समां बंध जाएगा.’’ ‘‘बुलबुले?’’ पाखी चौंकी और बोली, ‘‘मैं जानती हूं साबुन के बुलबुले कैसे बनाए जाते हैं. पर यह तो एक बचकाना सुझाव है.’’

‘‘तो क्या हम कुछ भी न करें?’’ छोटे भाईबहन उदास हो गए.

‘‘भाई साबुन के बुलबुलों से तो बरातघर के फर्श व सीढि़यों पर फिसलन…’’ कहतीकहती पाखी चतुरता से चुप हो गई. फिसलन… वाह. इस से बढि़या और क्या होगा? बरातघर की सीढि़यों से मंडप की ओर आती चांदनी फिसल पड़ेगी. उस के बाल उस के मुंह पर बिखरे होंगे, साड़ी अस्तव्यस्त हो चुकी होगी और वह धड़ाम से अपनी हड्डी तोड़ती हुई नीचे फर्श पर पड़ी होगी.

‘‘हां, बुलबुले ही सब से अच्छे रहेंगे,’’ पाखी ने फौरन इस सुझाव का समर्थन किया. उसे लगा कि यह सुझाव उस के अपने दिमाग की उपज भी नहीं कहलाएगा. तैयारियों और उत्साह से बीतते दिन कब विवाह के दिन तक आ पहुंचे, पता ही न चला. सभी घर वाले काम में व्यस्त थे किंतु पाखी अपनी ही तैयारी में जुटी थी. शाम होतेहोते उस ने सभी बच्चों के हाथों में साबुन के पानी से भरे छोटेछोटे टब थमा दिए थे. यहां तक कि खुद तैयार होने भी वह पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही गई. सारे हंगामे की परिकल्पना से ही वह रोमांचित हो रही थी. अंदर की खुशी बाहर मुसकराहट बन फूट रही थी. फिर भी कुछ पुराना था, जो अंदर बचा हुआ था, पूरी तरह से भस्म नहीं हुआ था. चांदनी की खुशी के लिए पाखी ने उस का पसंदीदा नीला रंग ही पहना. जब चांदनी ब्यूटीपार्लर से सजसंवर कर बरातघर के दुलहन कक्ष में पहुंची तो पाखी उसे देखती रह गई. चांदनी की छटा पूरे माहौल में बिखर रही थी.

‘‘तुम बहुत सुंदर लग रही हो,’’ कह कर पाखी उस के गले लग गई. और फिर अचानक ही उसे चांदनी में अपनी दुश्मन नहीं अपितु वह सहेली दिखने लगी जो बचपन से उस की अपनी थी. आखिर वर्षों पुरानी दोस्ती थी दोनों की. कितनी खुशियां, कितने गम और कितनी चोरियां बांटी थीं आपस में दोनों ने. चांदनी वही तो थी जिस ने पाखी को मिली सजा में साथ देने हेतु अपना गृहकार्य अपनी अध्यापिका को नहीं दिखाया था. जब पाखी के पिता की आकस्मिक मृत्यु से उस का परिवार डांवाडोल हो गया था, तब चांदनी ने ही तो उस की कालेज फीस भरी थी और फिर आज तक उस ने वे पैसे वापस नहीं लिए थे. आज भी चांदनी ने वही साड़ी पहनी थी, जो पाखी ने उस के लिए पसंद की थी. जबकि सभी जानते थे कि चांदनी को गुलाबी रंग खास पसंद नहीं था. चांदनी और पाखी अच्छे और बुरे दिनों में साथ रही थीं. भावनाएं भी क्याक्या खेल खेलती हैं. पाखी और चांदनी जो अंतरंग सहेलियां थीं, उन के बीच एक अनजान लड़के ने आ कर यह क्या कर दिया? एक ऐसा रिश्ता जो बना ही नहीं, लेकिन बनने की केवल चाहत भर ने पाखी के मन में अपने पुराने रिश्ते के प्रति इतनी खटास ला दी. कैसे भूल गई वह चांदनी से अपनी मित्रता? और फिर आज उसे दुलहन के रूप में अपने समक्ष देख यह कैसी भावना जागी पाखी के मन के कोने में जिस की हिलोर ने उस का पूरा हृदय परिवर्तन कर दिया.

‘‘सिर्फ बुलबुलों में खो कर मत रह जाना,’’ पाखी बच्चों को निर्देश देने लगी. वैसे चिंता की कोई बात नहीं थी, क्योंकि बरातघर के फर्श पर कालीन बिछा था. वैसे भी लगभग सभी बुलबुले हवा में तैर रहे थे. बरातघर की रोशनी में इंद्रधनुषी बुलबुलों के बीच से आ रही चांदनी किसी परी से कम नहीं लग रही थी. जोश में आ कर पाखी ने भी बुलबुले उड़ाने शुरू कर दिए. उस समय उसे अपनी उम्र या लिपस्टिक का भी खयाल न रहा. मुश्किल तो तब आई जब साबुन का पानी बाहर फूंकने के बजाय वह अंदर गुटक गई जिस से उस के पूरे गले में साबुन फंस गया. घबराहट में उस का पैर अपने ही लहंगे में अटका और वह बरातघर की सीढि़यों से लुढ़क कर नीचे गिर पड़ी.

ऐसा होने पर हौस्पिटल से उस के लिए ऐंबुलैंस मंगाई गई तो चांदनी भी उस के साथ ऐंबुलैंस में चढ़ने लगी. पाखी ने उस का हाथ पकड़ उसे रोक दिया, ‘‘चांदनी, शादी मुबारक हो. तुम्हें सारी खुशियां मिलें. जीवन में तुम दोनों को कभी कोई परेशानी न घेरे, तुम्हारी सारी बलाएं मुझे…’’

‘‘अच्छा, अब चुप हो कर बैठ. क्या वाकई मेरे साथ चलने की जरूरत नहीं?’’ चांदनी ने पूछा.

‘‘नहीं, तू जा कर खुशीखुशी मंडप में बैठ, मोहित प्रतीक्षा कर रहा होगा,’’ पाखी ने उत्तर दिया. चांदनी गई तो ऐंबुलैंस चल पड़ी. मजे की बात तो यह थी कि एड़ी में तेज दर्द होते हुए भी पाखी खुश थी. यदि वह चांदनी की शादी बरबाद कर देती तो शायद ही कभी स्वयं को माफ कर पाती. अंतत: पाखी की अंतिम योजना का अंत हौस्पिटल के इमरजैंसी वार्ड में हुआ. ‘‘डाक्टर कुछ ड्रिप वगैरह देंगे, तुम्हारे पैर में बैंडेज लगेगी, फिर मैं तुम्हें वापस ले चलूंगा,’’ रोहन ने पाखी से कहा. रोहन कोई नया किरदार नहीं था. वह चांदनी का मौसेरा भाई था, जो कनाडा से आया था. जिद कर के वह ऐंबुलैंस के पीछेपीछे आया था यह देखने कि पाखी को किसी चीज की आवश्यकता तो नहीं. पाखी मोहित और चांदनी की शादी में खलल डालने की कोशिश में इस कदर उलझ कर रह गई थी कि रोहन को अपनी तरफ आकर्षित होता भी न देख पाई. उसे यह एहसास हुआ भी तो यहां हौस्पिटल में, जब रोहन की चिंता, उस की भागदौड़ और उस की आंखों में उमड़ रहे भावों ने यह जता दिया कि यह सब कुछ केवल इंसानियत के नाते नहीं हो रहा था. तभी तो वह मानने लगी थी कि जो हुआ, अच्छा हुआ. इस से बेहतर की उम्मीद भी वह क्या करती?

Valentine’s Day 2024: तीन शब्द- क्या परम कह पाया वो तीन शब्द

परम आज फिर से कैंटीन की खिड़की के पास बैठा यूनिवर्सिटी कैंपस को निहार रहा था. कैंटीन की गहमागहमी के बीच वह बिलकुल अकेला था. यों तो वह निर्विकार नजर आ रहा था पर उस के मस्तिष्क में विगत घटनाक्रम चलचित्र की तरह आजा रहे थे.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के नौर्थ कैंपस की चहलपहल कैंपस वातावरण में नया उत्साह पैदा कर रही थी. हवा में हलकी ठंडक से शरीर में सिहरन सी दौड़ रही थी. दोस्तों के संग कैंटीन के बाहर खड़े हो कर आनेजाने वाले छात्रों को देख कर परम सोचने लगा कि टाइमपास का इस से अच्छा तरीका और क्या हो सकता है.

संकोची स्वभाव के परम ने जब पहली बार उसे देखा था तो एक अजीब सी झुरझुरी उस के शरीर में दौड़ गई थी. राखी, हां, यही नाम था उस का. वह भी तो उसी क्लास की छात्रा थी, जिस में परम पढ़ता था.

क्लास में कभी जब चाहेअनचाहे दोनों की निगाहें मिलतीं तो परम बेचैन हो उठता और चाहता कि वह उस के सामने खड़ा हो कर बस, उसे ही निहारता रहे.

कई बार परम ने राखी के समक्ष खुद की भावनाएं व्यक्त करने का प्रयास किया पर उस का संकोची स्वभाव आड़े आ जाता था. एक दिन संकोच को ताक पर रख कर उस ने उस का नाम मालूम होने पर भी अनजान बनते हुए पूछ लिया था, ‘‘क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’’

हलकी मुसकराहट के साथ उस ने उत्तर दिया था, ‘‘राखी.’’

मात्र नाम जानने से ही परम को ऐसा लगा कि जैसे उस ने पूरा जीवन जी लिया. वह जड़वत उस एक शब्द को प्रतिध्वनित होते हुए महसूस कर रहा था.

कुछ समय बाद कालेज की ओर से छात्रों का समूह शैक्षणिक भ्रमण पर शिमला जा रहा था. परम के मित्र संदीप और चंदर ने कई बार परम को भी चलने के लिए कहा पर वह मना करता रहा, लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि राखी भी जा रही है, एकाएक उस ने भी हामी भर दी.

बस की यात्रा के दौरान हंसीमजाक के दौर के बीच उसे राखी से बात करने का मौका मिल ही गया. सादगी की प्रतिमूर्ति राखी भी उस की बातों में दिलचस्पी लेती नजर आई तो उस का हौसला और बढ़ गया. चीड़ और देवदार के पेड़ों से आती खुशबू ने मानो उस के मन को भांप लिया था और पूरे मंजर को खुशनुमा बना दिया था.

‘‘आप बहुत कम बोलती हैं?’’

‘‘जी, ऐसी तो कोई बात नहीं है,’’ और फिर बातों का सिलसिला आरंभ हो गया.

परम ने महसूस किया कि राखी भी उस के नजदीक आने का प्रयास कर रही थी. ज्यादातर दोस्त अपनेअपने चाहने वालों में मस्त थे. अनजाने में परम ने राखी के हाथ को हलके से क्या छू लिया उसे ऐसा लगा कि जैसे उस ने सारा जहां पा लिया हो.

लौटते समय दोनों एकसाथ बैठे. औपचारिक वार्त्तालाप खत्म होते ही दोनों एकदूसरे से बहुत कुछ कहना चाहते थे, पर जबान साथ नहीं दे रही थी. गंभीर खामोशी के बीच अनवरत एकदूसरे को निहारते हुए परम और राखी चुप रहने के बाद भी आंखों से मानो सबकुछ कह रहे थे. इस खामोशी की आवाज दोनों के दिलों में गहरे तक उतरती जा रही थी.

शिमला से वापस लौटने के बाद कैंपस में वे अब साथसाथ नजर आने लगे. कैंटीन, लाइबे्ररी व कैंपस के पार्क उन की उपस्थिति के गवाह थे. बिना आवाज का यह सफर एक निष्कर्षहीन सफर था. उन दोनों के मध्य खामोशी ही उन की आवाज बन गई थी. खामोश रह कर सबकुछ कह देने का उन का अंदाज निराला था.

वे शांत बहती नदी की तरह ही थे. उन के दिल के हाल से प्रकृति भी खासी परिचित होती जा रही थी. पेड़, पत्ते, नदी, फूलों पर मंडराती तितलियां, सब ने ही तो उन के बारे में बातें करना शुरू कर दिया था.

कालेज कैंपस में उन के भविष्य को ले कर चर्चाएं आम होती जा रही थीं और वे स्वयं खयालों में डूबे एकदूसरे के पूरक बनते जा रहे थे.

शब्दों के बिना की अभिव्यक्ति यों तो सशक्त होती है पर कुछ भाव तो शब्दों के बिना व्यक्त हो ही नहीं सकते. कितना कठिन होता है केवल ‘3 शब्द’, ‘आई लव यू’ कहना.

यों तो वे खामोश रह कर भी हर पल यही दोहराते थे, पर उन दोनों के मध्य ये 3 शब्द तो थे, पर उन में आवाज नहीं थी. शायद वे दोनों किसी खास पल, खास माहौल का इंतजार कर रहे थे, जब इन शब्दों को मूर्त रूप दिया जा सके.

छुट्टियों के एक लंबे अंतराल के बाद इन 3 शब्दों के अभाव ने 5 शब्दों का प्रादुर्भाव कर दिया, ये 5 शब्द थे, ‘राखी की शादी हो गई.’ और फिर राखी लौट कर नहीं आई.

कैंटीन में बैठे हुए विगत को निहारते हुए परम ने खुद के हाथ का दूसरे हाथ से स्पर्श किया, जिस ने पहली बार राखी के हाथों का स्पर्श किया था, गहरे विषाद ने उस के अंतर्मन को झकझोर दिया. आखिर एक लंबे अरसे के बाद वह इस स्थान पर अकेला बैठा था. आज उस के साथ राखी नहीं थी.

एकांत में बैठा परम बारबार उन 3 शब्दों का उच्चारण कर रहा था, पर उसे सुनने वाला कोई नहीं था. अगर उस ने समय पर हिम्मत दिखाई होती तो चाहे जो होता, आज उसे गिला तो नहीं होता. वह कोने में यों अकेला तो न बैठा होता.

आजादी: भाग 3- अचानक क्यों बदली होस्टल वार्डन

यह सारा कुछ हम ने इस तरह से किया कि ठेले वाले भैया को लगे कि पास की दुकान पर बैठा हुआ वह लड़का हमारा परिचित है.

चाट खाते हुए हम ने ठेले वाले भैया से कहा, ‘‘भैया, आप इस के पैसे उन से ले लेना, वे हमारे पहचान वाले हैं,’’ मैं ने अपनी उंगलियों के इशारे से उस लड़के की ओर इशारे किया. चाट वाले ने  मेरे द्वारा लक्ष्य किए गए उस लड़के की ओर देखा और सिर हिला कर हामी भर दी.

चाय पीने के बाद वह लड़का ठेले के पास खड़ी अपनी बाइक से लग कर खड़ा हो गया और हमारी तरफ ही देखने लगा. मैं ने मुसकरा कर उसे बाय कहा और सरस्वती के साथ तेजतेज कदमों से चलती हुई कालेज के गेट से अंदर दाखिल हो गई. अंदर आते वक्त मैं ने वापस बाहर पलट कर देखा वह लड़का सच में उस ठेले वाले को पैसे दे रहा था.

अचानक मुझे अपने किए पर शर्मिंदगी महसूस हुई. मैं भागती हुई कालेज गेट से बाहर निकली ताकि ठेले वाले को उस लड़के से पैसा लेने से रोक सकूं, लेकिन मेरे वहां पहुंचने से पहले ही वह लड़का पैसे दे कर अपनी बाइक स्टार्ट कर चुका था. जाते हुए उस ने एक बार फिर से मेरी ओर मुसकरा कर देखा था. ऐसा लगा जैसे वह जानबू  झ कर हमारी प्लानिंग का हिस्सा बना था, वह जानबू  झ कर बेवकूफ बना था.

इस घटना के घटे हुए करीब 2 हफ्ते बीत चुके थे. मैं और सरस्वती दोनों इस घटना को भूल कर अपनी आने वाले परीक्षा की तैयारी में जुटे हुए थे कि एक दिन कालेज से लौटने के बाद हम ने वही बाइक होस्टल के गेट पर खड़ी देखी. वही लड़का अंदर डाइनिंग एरिया के साथ लगे कुरसी पर होस्टल वार्डन के पास बैठा था.

‘जरूर यह यहां हमारी शिकायत करने आया होगा,’ मैं ने मन ही मन सोचा और नजरें चुराती हुई धीरेधीरे सीढि़यां चढ़ने लगी. मैं ने डरतेडरते एक बार उस की ओर देखा तो वह लड़का मुसकराते हुए कनखियों से मेरी ओर ही देख रहा था. हमारी हालत तो ऐसी हो रही थी जैसे हम ने कोई भूतप्रेत देख लिया हो. उस दिन के बाद तो वह लड़का अकसर हमें होस्टल वार्डन के पास बैठा दिख जाता था.

एक दिन होस्टल वार्डन ने स्वयं ही हमारा परिचय उस लड़के से कराया और हम ऐसे अनजान बने रहे जैसे हम उसे पहली बार देख रहे हों. हमें मालूम हुआ कि उस लड़के का नाम शैलेंद्र है, वह इंजीनियरिंग प्रथम वर्ष का छात्र है और वह होस्टल वार्डन के भाई का लड़का है. शैलेंद्र अपने इंजीनियरिंग के छात्रावास में रह रहा था जोकि हमारे कालेज के रास्ते से कुछ दूरी पर था.

शैलेंद्र के साथ मेरी मुलाकात धीरेधीरे गहरी दोस्ती में बदल गई थी. मैं अपनी इस आजादी से बहुत खुश थी किसी भी तरह की कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं थी. मैं अपनी इस खुशी में इतनी डूबी हुई थी  कि मेरे पीछे, बनारस मेरे घर में, मेरी इस आजादी की कीमत मां किस तरह चुका रही थीं. उस की मु  झे कोई खबर तक नहीं थी.

बनारस से मेरे लखनऊ आए हुए काफी महीने बीत चुके थे. परीक्षा का दिन भी नजदीक आ रहा था. लखनऊ आते वक्त मां ने सख्त हिदायत दी थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, पढ़ाई पूरी कर के ही बनारस वापस आना. लखनऊ में मेरे मौसेरे भइया ही मेरे अभिभावक थे. रुपए पैसे से लेकर मेरी सारी जरूरतें वही पूरा करते थे. मु  झे एक बात की हैरानी अवश्य होती थी. मेरे घर से आए हुए इतने महीने बीत जाने के बाद भी मेरे पिता ने मेरी कोई खोजखबर नहीं ली थी.

सत्यम भैया भी बनारस के विषय में मु  झे ज्यादा कुछ नहीं बताते थे, ‘‘बेकार की बातों में ध्यान देने की जगह अपनी बाकी की पढ़ाई और  मैडिकल ऐंटरैंस की तैयारी पर ध्यान दो,’’ बहुत पूछने पर भी उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया था.

मेरे लखनऊ आने के बाद प्रकाश को चाचाजी से काफी डांट खानी पड़ी थी तो वह भी अब मेरा फोन नहीं उठाता था. लखनऊ पहुंचने पर  प्रकाश से बात हुई थी. उस के बाद उस से बात नहीं हो सकी थी.

‘‘रूपा अपना सामान पैक कर लो तु  झे बनारस चलना होगा आज ही 11 बजे की ट्रेन है. मैं तुझे लेने आ रहा हूं,’’ सुबहसुबह सत्यम भैया का फोन आया. फोन पर उन की कांपती हुई आवाज ने मु  झे चौंका दिया.

‘‘क्यों भैया क्या हुआ? 10 दिन बाद ही तो मेरी परीक्षा है और आप बनारस जाने की बात कर रहे हैं,’’ मेरी आवाज में घबराहट थी.

‘‘रूपा अगर नहीं चली तो मौसी…’’ आगे उन की आवाज सिसकियों में बदल गई.

‘‘अपनी मां के अंतिम दर्शन करने चलेगी न रूपा,’’ भैया का 1-1 शब्द मेरे कानों को छलनी कर गया.

घर के आंगन में मां का शव सफेद कपड़े से ढका रखा था. मां के मृत शरीर से लिपट कर रोती हुई दीदी का बुरा हाल था. दीदी को संभालते हुए चाची भी रोए जा रही थी.

‘‘बड़ी मां गंगा घाट गई थीं नहाने, वहीं पर पैर फिसला और डूबने से उन की मृत्यु हो गई,’’ प्रकाश का यह वाक्य जाने क्यों मु  झे उसे रटाया हुआ सा महसूस हुआ.

आंगन से कुछ ही दूरी पर चाचा चुपचाप खड़े थे. मैं ने चारों तरफ नजर दौड़ाई लेकिन पिताजी मु  झे कहीं नहीं दिखे.

मुझे देखते ही दीदी मु  झ से लिपट कर रोने लगी, ‘‘रूपा मां चली गईं, वे हम दोनों के हिस्से की लड़ाई अकेली ही लड़ रही थीं. देख उन का क्या हश्र हो गया…’’

मैं बुत बनी खड़ी थी… मु  झे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे सामने कोई चलचित्र चल रहा हो. मु  झे कुछ भी सम  झ में नहीं आ रहा था, दीदी क्या कहना चाह रही थी. उन के शब्द मेरे कानों से टकरा कर वापस चले जाते थे.

‘‘रूपा तू मां को छू कर वादा कर कि तू जब तक डाक्टर नहीं बनेगी लौट कर नहीं आएगी,’’ दीदी मु  झे आंगन में रखे मां के पार्थिव शरीर के पास ले गई.

‘‘देख ले मेरी बच्ची अपनी मां को आखिरी बार,’’ चाची ने रोते हुए  मां के चेहरे से कपड़ा हटाया.

मां के चेहरे पर चोट के निशान थे. मां की यह हालत देखते ही मेरे मुख से चीख निकल पड़ी, मैं दहाड़ मार कर रोने लगी. दीदी ने मु  झे संभाला, चाची बारबार अपने आंचल से मेरे आंसू पोंछ रही थी.

दीदी ने जिद कर के मु  झे वापस लखनऊ भेज दिया, ‘‘रूपा मां की कुरबानी बेकार नहीं जानी चाहिए. वैसे भी अब यहां क्या रखा है, तू यहां रुक कर भी क्या करेगी, मां तो चली गईं. अब   झूठमूठ के ड्रामे में शामिल होने से अच्छा है तू अपनी परीक्षा की तैयारी कर. इसी से मां की आत्मा को शांति मिलेगी,’’ दीदी मु  झे सम  झती हुई रोती जा रही थी.

मैं बड़े ही भारी मन के साथ वापस लखनऊ आ गई. लेकिन मन में उठते कई सवाल अब भी मौजूद थे.

मां जिन्हें मैं हमेशा कमजोर सम  झती रही, पिताजी के आगे डरतेसहमते देख मेरा मन जिन के प्रति गुस्से से भर उठता था वे वास्तव में अंदर से कितनी मजबूत थीं. खुद घुटघुट कर जीती रहीं फिर भी हम दोनों बहनों के लिए ढाल बन कर खड़ी थीं. वह तो हम दोनों के हिस्से की लड़ाई अकेली लड़ रही थीं.

बनारस से लौटने के बाद मैं बिलकुल बदल गई. जिस आजादी की कीमत मैं ने मां को खो कर चुकाई उस के महत्त्व को मैं कैसे न सम  झती. मेरे अंदर काफी कुछ बदल गया था. नाश्ते और खाने को ले कर मैं होस्टल वार्डन से भी कोई जिरह नहीं करती. जो कुछ मेरे सामने परोसा जाता, उसे चुपचाप खा लेती.

मगर इन दिनों मैं ने होस्टल वार्डन के व्यवहार में काफी बदलाव भी देखा. वह मेरा कुछ ज्यादा ही ध्यान रखने लगी थी. मेरी पसंद न पसंद का खास ध्यान रख रही थी. मु  झ से बड़े ही प्यार और अपनेपन से बातें करती, जिस का मैं पीठ पीछे खड़ूस और न जाने क्याक्या कह कर मजाक उड़ाती थी वह अब मु  झे ममतामयी सी लगने लगी थी.

मेरे बनारस जाने वाले दिन एक और घटना घटी थी, जिस की जानकारी मु  झे बाद में मिली. ज्योत्सना और उस के बौयफ्रैंड की लाश संदिग्ध अवस्था में गोमती नदी से मिली थी, जिस के कारण होस्टल का माहौल काफी दिनों तक तनावपूर्ण बना रहा. सुनने में आया था कि ज्योत्सना घटना वाले दिन होस्टल से कानपुर अपने घर जाने के लिए कह कर निकली थी.

मैं अपना अब सारा समय पढ़नेलिखने में लगाने लगी थी. शैलेंद्र से भी मैं ने दूरी बना ली थी. पढ़ाई के प्रति मेरी लगन और दिनरात की मेहनत ने मेरी सफलता का मार्ग खोल दिया. मैं हर परीक्षा में अव्वल आने लगी थी.

‘‘रूपा आज तेरी स्पीच है न, तूने तैयारी तो ठीक से कर ली है न?’’ सरस्वती ने सुबहसुबह मेरी स्पीच की तैयारी के विषय में पूछा.

‘‘हांहां कर ली है,’’ मैं ने अनमने ढंग से जवाब दिया.

‘‘तू इतनी उखड़ीउखड़ी सी क्यों है? तु  झे तो खुश होना चाहिए, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर स्पीच देने के लिए मैम ने तेरा चुनाव किया है.’’

‘‘स्वतंत्रता यानी आजादी?’’

‘‘हां यार आजादी,’’ सरस्वती ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा.

‘‘आजादी, मेरे मुख से निकला. लेकिन, मेरी आंखों में कई सवाल ज्योत्सना और मेरी मां की शक्ल में घूमने लगे.

अक्षय कुमार हुए डीपफेक वीडियो का शिकार, देखें वायरल वीडियो

बॉलीवुड के एक्शन अभिनेता अक्षय कुमार इन दिनों अपनी अपकमिंग फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ लेकर काफी सुर्खियों में हैं. अक्षय की साल 2024 की ये पहली फिल्म हैं जो जल्द ही सिनेमाघरों में रिलीज होनी वाली है. लेकिन इस बीच अक्षय कुमार एक डीपफेक स्कैंडल का शिकार हो गए हैं. एक वीडियो ऑनलाइन सामने आया है, जिसमें सुपरस्टार एक गेम एप्लिकेशन को बढ़ावा दे रहे हैं.

डीपफेक के शिकार हुए अक्षय

रश्मिका मंदाना, कटरीना कैफ, नोरा फतही के बाद अब अक्षय कुमार भी डीपफेक वीडियो का शिकार हो गए हैं. इस डीपफेक वीडियो में अक्षय कुमार की आवाज और चेहरे का इस्तेमाल करके एक गेम एप्लिकेशन का प्रमोशन कराया गया है. वहीं इस फर्जी वीडियो को बनाने और प्रचारित करने के लिए सोशल मीडिया हैंडल और कंपनी के खिलाफ साइबर शिकायत दर्ज की गई है. इस AI जनरेटेड

वीडियो में अक्षय कहते है- “क्या आपको भी खेलना पसंद है? मैं आपको सलाह देता हूं कि आप इस एप्लिकेशन को डाउनलोड करें और एविएटर गेम आजमाएं”.

ये स्टार्स भी हो चुके है डीपफेक का शिकार

इससे पहले साल 2023 में श्मिका मंदाना, नोरा फतेही, कैटरीना कैफ, काजोल और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर जैसे अभिनेताओं के डीप फेक वीडियो वायरल हो चुके हैं. वहीं खिलाड़ी कुमार अक्षय ‘बड़े मियां छोटे मियां’ की रिलीज की तैयारी कर रहे हैं. अक्षय की वर्कफ्रंट की बात करें तो उनके पास पाइपलाइन में ‘स्काई फोर्स’, ‘सिंघम अगेन’, ‘वेलकम टू द जंगल’, ‘हेरा फेरी 3’ और ‘वेदत मराठे वीर दौडले सात’ भी हैं.

 

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क्विकी: भाग 3- आखिर उसने क्या फैसला लिया

नाश्ते के बरतन समेटतेसमेटते मैं ने व्यंजन सूची में एकदम से परिवर्तन कर दिया और तय कर लिया कि आज सारा खाना इन्हीं की पसंद का बनाऊंगी, जिस से इन्हें एहसास हो कि मैं इन की उपेक्षा नहीं करती हूं. शाम को मैं औफिस से आते समय प्रशांत की पसंद की चीजों के लिए जरूरी सामान बड़े स्टोर से ले आई.

मैं ने बड़े जतन से इन की पसंद की उरद की दाल, भरवां भिंडी, मसाले वाले सूखे आलू, बूंदी का रायता, खीरे और टमाटर का सलाद तथा नमकीन चावल तैयार किए. आज बच्चों की पसंद को एकदम से भुला कर मैं ने इन्हीं की पसंद की मीठी चीज भी बना डाली.

8 बज गए. बच्चे डिनर का इंतजार कर रहे थे. काम में व्यस्त होने के कारण सुबह की घटना को मैं कुछ देर भुला बैठी थी, बारबार मन कहता कि इतने गुस्से में गए हैं. कहीं सचमुच ही खाना खाने न आएं तब? पुरुषों का क्या, किसी भी होटल, रेस्तरां या कैंटीन में जा कर भी पेट भर लेते हैं.

और फिर मैं कमरे में ऐसी जगह बैठ कर इन का इंतजार करने लगी जहां से लोग तो आते दिख रहे थे, पर आने वाले मु  झे नहीं देख सकते थे. 10 बज गए बच्चों को खिला कर सुला दिया. 12 बजे बज गए पर ये नहीं आए. अब मु  झे पक्का विश्वास हो गया कि आज ये गुस्से में खाने नहीं आएंगे. मोबाइल स्विच्ड औफ आ रहा था. शायद प्रशांत ने मु  झे ब्लौक कर दिया था.

1 बजते ही मैं काफी निराश हो गई. अपने ऊपर काफी गुस्सा आने लगा कि नाहक छोटी सी बात को इतना तूल दे डाला. अभी न मालूम अपने को कितना धिक्कारती कि एक बज कर 10 मिनट पर देखती हूं कि ये अंधेरे में दूर से चले आ रहे हैं, आहिस्ताआहिस्ता.

इन के द्वार तक पहुंचतेपहुंचते मैं ने जल्दी से इन की थाली परोस दी. मगर ये खाने के कमरे से होते हुए सीधे बैठक में पड़े दीवान पर जा कर लेट गए. इन का चेहरा अभी भी सहज अवस्था में नहीं लौटा था.

मैं थोड़ी देर खाने की मेज के पास खड़ीखड़ी सोचती रही कि क्या करू, जैसे इन्हें खाने के लिए उठाऊं. इन को देखते ही मेरा ठंडा पड़ा गुस्सा फिर भभक उठा. मेरा दिल कहने लगा, पहले तो प्यार का सब्जबाग दिखा कर मु  झे मेरे घर वालों से छुड़ा कर ले आए. अब 11 साल बाद मु  झे घर छोड़ देने को कह दिया जैसे घर छोड़ देना कोई मजाक हो.

इतने में ही मेरे दिमाग में भी एक नए प्रश्न ने जन्म ले लिया कि आखिर इन 11 बरसों में इन्होेंने ही मेरे लिए क्या किया? मु  झे गहनों का बेहद शौक है, पर आज तक इन्होंने एक अंगूठी भी ले कर नहीं दी. कीमती ड्रैस को कहती हूं तो महंगाई का रोना ले कर बैठ जाते हैं, घूमने का शौक भी समाप्त कर देना पड़ा. क्या किया है इन्होंने मेरे लिए? घर का खर्च, बच्चे की फीस में दोनों की सैलरी निकल जाती है. मेरी नौकरी बहुत पैसे देने वाली नहीं है. इन की भी प्रमोशन खास नहीं हुई है.

सुबह उठ कर मैं ने रात के खाने को ही ब्रेकफास्ट में डाल दिया. बच्चों को अजीब लगा. कहां तो रोज मीटमछली बनता था, कल रात सिर्फ वैजिटेरियन खाना बना था और वही अब ब्रेकफास्ट में है. चिकन या सैंडविच नहीं बनाए मैं ने.

इतने में बच्चे स्कूल से आ गए. मैं ने यह सोच कर कि हो सकता है ये कैंटीन से खा कर आए हों, जानबू  झ कर इन्हें खाना नहीं लगाया पर ये स्वयं ही खाने के लिए आ गए.

बच्चों ने खाना देख कर एकदम हल्ला मचा दिया, ‘‘यह आज क्या खाना बना कर धर दिया है मां ने. बिना मीट व मछली के कहीं खाना खाया जाता है?’’

ये मेरी शक्ल देखने लगे. मैं ने बच्चों की बात का कोई उत्तर नहीं दिया.

मेरी चुप्पी को देख कर ये बोल पड़े, ‘‘बच्चो, कल तुम्हारे डैड की पसंद का खाना बना था. तुम्हारी मम्मी ने आज वही खाना ब्रेकफास्ट में दिया है क्योंकि मैं ने रात को खाना नहीं खाया. आज खा लो,’’ और फिर मु  झ से बोले, ‘‘भई, रात को इन्हीं लोगों की पसंद का खाना बनना चाहिए.’’

मैं धीरे से बोली, ‘‘ठीक है.’’

मेरी चुप्पी देख कर बच्चे सम  झ गए कि कहीं कुछ गड़बड़ी है और पूछ बैठे, ‘‘लगता है. आज आप लोगों में कोई   झगड़ा हुआ है. क्यों मौम, डैड से   झगड़ी हो?’’

‘‘हां.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘डैड से पूछो.’’

‘‘डैड, आप लोगों में   झगड़ा क्यों हुआ?’’

‘‘अपनी मौम से पूछो.’’

‘‘यह अच्छा चक्कर है, डैड कहते हैं मौम से पूछो और मौम कहती हैं डैड से पूछो. अच्छा मौम आप ही बताइए,   झगड़ा क्यों हुआ?’’

‘‘  झगड़ा क्यों हुआ, यह तो मु  झे भी नहीं मालूम पर इतना पता है कि तुम्हारे डैड ने मु  झ से घर छोड़ने के लिए कह दिया है.’’

‘‘बहुत बुरी बात है. डैड आप ने ऐसा कहा?’’

‘‘नहीं भई मैं ने ऐसा तो नहीं कहा. मैं ने तो सिर्फ इतना कहा था कि अब इस घर में तुम्हारी मौम ही रहेगी या मैं. लेकिन दफ्तर में काफी देर ठंडे दिमाग से सोचने के बाद मैं ने यह तय किया कि दोनों एकसाथ घर में रहें तो बेहतर है. रात को देर हो गई क्योंकि कोई प्रोजैक्ट अटक गया था,’’ और ये खिलखिला कर हंस पड़े.

बच्चे पिता का उत्तर सुन कर संतुष्ट हो कर स्कूल चले गए. तब मैं ने भी बड़े सहज भाव से इन से पूछा, ‘‘सुनिए, आप के कल सुबह वाले प्रश्न का उत्तर मैं कई घंटे सोचने के बाद भी न पा सकी, लेकिन हां, इसी चक्कर में एक नए प्रश्न ने जरूर जन्म ले लिया और वह यह कि आप ने इन 11 बरसों में मेरे लिए क्या किया?’’

‘‘तुम्हारा प्रश्न भी वाजिब है,’’ ये बोले, ‘‘आज दफ्तर में मैं भी काफी देर तक अपने प्रश्न का  उत्तर खोजता रहा था. सोचतेसोचते मेरे दिमाग में भी अचानक यही प्रश्न कौंध गया कि आखिर मैं ने ही इन 11 सालों में तुम्हारे लिए क्या किया है. किंतु कोई सैटिस्फैक्टरी उत्तर नहीं पा सका, इसलिए मामला बराबर हो गया.

‘‘मामला बराबर होते ही मेरा गुस्सा एकदम शांत हो गया और मैं फौरन ही घर की तरफ निकलने वाला था कि बौस ने एक मीटिंग बुला ली. कोई टैंडर उसी दिन भरना था. इस चक्कर में भूल गया कि फोन में तुम्हें ब्लौक किया हुआ है. असल में पतिपत्नी का संबंध इतना घनिष्ठ होता है कि किस ने किस के लिए क्या किया

और क्या नहीं, यह प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए. इस का हिसाबकिताब रखा ही नहीं जा सकता. इस हिसाब का लेखाजोखा जिस कपल में शुरू हो जाए, सम  झ लो उन का मैरिड लाइफ अपनी अंतिम सांसें गिनने लगी है. इस रिश्ते में तो सारा मामला सदा बराबर का होता है.

पतिपत्नी तो एकदूसरे के पूरक हैं. उन्हें अलगअलग कर के नहीं सोचा जा सकता.

जहां 2 बरतन होंगे, वहां वे कभी एकदूसरे से टकराएंगे भी, लेकिन इस टकराव से उन का टूटना ठीक नहीं.’’

अपने प्रश्न का इतना संतोषजनक उत्तर पा कर मैं संतुष्ट ही नहीं हुई बल्कि इतनी खुश हो गई कि एकाएक गुस्सा भुला कर इन के करीब बैठ गई.

इन्होंने मेरा हाथ प्यार से अपने हाथों में ले लिया और फिर दोनों तुरंत कपड़े उतार कर बिस्तर में घुस गए, क्विकी के लिए.

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