अदला बदली: दूसरे को बदलने की इच्छा का क्या होता है परिणाम

मेरे पति राजीव के अच्छे स्वभाव की परिचित और रिश्तेदार सभी खूब तारीफ करते हैं. उन सब का कहना है कि राजीव बड़ी से बड़ी समस्या के सामने भी उलझन, चिढ़, गुस्से और परेशानी का शिकार नहीं बनते. उन की समझदारी और सहनशीलता के सब कायल हैं.

शादी के 3 दिन बाद का एक किस्सा  है. हनीमून मनाने के लिए हम टैक्सी से स्टेशन पहुंचे. हमारे 2 सूटकेस कुली ने उठाए और 5 मिनट में प्लेटफार्म तक पहुंचा कर जब मजदूरी के पूरे 100 रुपए मांगे तो नईनवेली दुलहन होने के बावजूद मैं उस कुली से भिड़ गई.

मेरे शहंशाह पति ने कुछ मिनट तो हमें झगड़ने दिया फिर बड़ी दरियादिली से 100 का नोट उसे पकड़ाते हुए मुझे समझाया, ‘‘यार, अलका, केवल 100 रुपए के लिए अपना मूड खराब न करो. पैसों को हाथ के मैल जितना महत्त्व दोगी तो सुखी रहोगी. ’’

‘‘किसी चालाक आदमी के हाथों लुटने में क्या समझदारी है?’’ मैं ने चिढ़ कर पूछा था.

‘‘उसे चालाक न समझ कर गरीबी से मजबूर एक इनसान समझोगी तो तुम्हारे मन का गुस्सा फौरन उड़नछू हो जाएगा.’’

गाड़ी आ जाने के कारण मैं उस चर्चा को आगे नहीं बढ़ा पाई थी, पर गाड़ी में बैठने के बाद मैं ने उन्हें उस भिखारी का किस्सा जरूर सुना दिया जो कभी बहुत अमीर होता था.

एक स्मार्ट, स्वस्थ भिखारी से प्रभावित हो कर किसी सेठानी ने उसे अच्छा भोजन कराया, नए कपडे़ दिए और अंत में 100 का नोट पकड़ाते हुए बोली, ‘‘तुम शक्लसूरत और व्यवहार से तो अच्छे खानदान के लगते हो, फिर यह भीख मांगने की नौबत कैसे आ गई?’’

‘‘मेमसाहब, जैसे आप ने मुझ पर बिना बात इतना खर्चा किया है, वैसी ही मूर्खता वर्षों तक कर के मैं अमीर से भिखारी बन गया हूं.’’

भिखारी ने उस सेठानी का मजाक सा उड़ाया और 100 का नोट ले कर चलता बना था.

इस किस्से को सुना कर मैं ने उन पर व्यंग्य किया था, पर उन्हें समझाने का मेरा प्रयास पूरी तरह से बेकार गया.

‘‘मेरे पास उड़ाने के लिए दौलत है ही कहां?’’ राजीव बोले, ‘‘मैं तो कहता हूं कि तुम भी पैसों का मोह छोड़ो और जिंदगी का रस पीने की कला सीखो.’’

उसी दिन मुझे एहसास हो गया था कि इस इनसान के साथ जिंदगी गुजारना कभीकभी जी का जंजाल जरूर बना करेगा.

मेरा वह डर सही निकला. कितनी भी बड़ी बात हो जाए, कैसा भी नुकसान हो जाए, उन्हें चिंता और परेशानी छूते तक नहीं. आज की तेजतर्रार दुनिया में लोग उन्हें भोला और सरल इनसान बताते हैं पर मैं उन्हें अव्यावहारिक और असफल इनसान मानती हूं.

‘‘अरे, दुनिया की चालाकियों को समझो. अपने और बच्चों के भविष्य की फिक्र करना शुरू करो. आप की अक्ल काम नहीं करती तो मेरी सलाह पर चलने लगो. अगर यों ही ढीलेढाले इनसान बन कर जीते रहे तो इज्जत, दौलत, शोहरत जैसी बातें हमारे लिए सपना बन कर रह जाएंगी,’’ ऐसी सलाह दे कर मैं हजारों बार अपना गला बैठा चुकी हूं पर राजीव के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती.

बेटा मोहित अब 7 साल का हो गया है और बेटी नेहा 4 साल की होने वाली है अपने ढीलेढाले पिता की छत्रछाया में ये दोनों भी बिगड़ने लगे हैं. मैं रातदिन चिल्लाती हूं पर मेरी बात न बच्चों के पापा सुनते हैं, न ही बच्चे.

राजीव की शह के कारण घर के खाने को देख कर दोनों बच्चे नाकभौं चढ़ाते हैं क्योंकि उन की चिप्स, चाकलेट और चाऊमीन जैसी बेकार चीजों को खाने की इच्छा पूरी करने के लिए उन के पापा सदा तैयार जो रहते हैं.

‘‘यार, कुछ नहीं होगा उन की सेहत को. दुनिया भर के बच्चे ऐसी ही चीजें खा कर खुश होते हैं. बच्चे मनमसोस कर जिएं, यह ठीक नहीं होगा उन के विकास के लिए,’’ उन की ऐसी दलीलें मेरे तनबदन में आग लगा देती हैं.

‘‘इन चीजों में विटामिन, मिनरल नहीं होते. बच्चे इन्हें खा कर बीमार पड़ जाएंगे. जिंदगी भर कमजोर रहेंगे.’’

‘‘देखो, जीवन देना और उसे चलाना प्रकृति की जिम्मेदारी है. तुम नाहक चिंता मत करो,’’ उन की इस तरह की दलीलें सुन कर मैं खुद पर झुंझला पड़ती.

राजीव को जिंदगी में ऊंचा उठ कर कुछ बनने, कुछ कर दिखाने की चाह बिलकुल नहीं है. अपनी प्राइवेट कंपनी में प्रमोशन के लिए वह जरा भी हाथपैर नहीं मारते.

‘‘बौस को खाने पर बुलाओ, उसे दीवाली पर महंगा उपहार दो, उस की चमचागीरी करो,’’ मेरे यों समझाने का इन पर कोई असर नहीं होता.

समझाने के एक्सपर्ट मेरे पतिदेव उलटा मुझे समझाने लगते हैं, ‘‘मन का संतोष और घर में हंसीखुशी का प्यार भरा माहौल सब से बड़ी पूंजी है. जो मेरे हिस्से में है, वह मुझ से कोई छीन नहीं सकता और लालच मैं करता नहीं.’’

‘‘लेकिन इनसान को तरक्की करने के लिए हाथपैर तो मारते रहना चाहिए.’’

‘‘अरे, इनसान के हाथपैर मारने से कहीं कुछ हासिल होता है. मेरा मानना है कि वक्त से पहले और पुरुषार्थ से ज्यादा कभी किसी को कुछ नहीं मिलता.’’

उन की इस तरह की दलीलों के आगे मेरी एक नहीं चलती. उन की ऐसी सोच के कारण मुझे नहीं लगता कि अपने घर में सुखसुविधा की सारी चीजें देखने का मेरा सपना कभी पूरा होगा जबकि घरगृहस्थी की जिम्मेदारियों को मैं बड़ी गंभीरता से लेती हूं. हर चीज अपनी जगह रखी हो, साफसफाई पूरी हो, कपडे़ सब साफ और प्रेस किए हों, सब लोग साफसुथरे व स्मार्ट नजर आएं जैसी बातों का मुझे बहुत खयाल रहता है. मैं घर आए मेहमान को नुक्स निकालने या हंसने का कोई मौका नहीं देना चाहती हूं.

अपनी लापरवाही व गलत आदतों के कारण बच्चे व राजीव मुझ से काफी डांट खाते हैं. राजीव की गलत प्रतिक्रिया के कारण मेरा बच्चों को कस कर रखना कमजोर पड़ता जा रहा है.

‘‘यार, क्यों रातदिन साफसफाई का रोना रोती हमारे पीछे पड़ी रहती हो? अरे, घर ‘रिलैक्स’ करने की जगह है. दूसरों की आंखों में सम्मान पाने के चक्कर में हमारा बैंड मत बजाओ, प्लीज.’’

बड़ीबड़ी लच्छेदार बातें कर के राजीव दुनिया वालों से कितनी भी वाहवाही लूट लें, पर मैं उन की डायलागबाजी से बेहद तंग आ चुकी हूं.

‘‘अलका, तुम तेरामेरा बहुत करती हो, जरा सोचो कि हम इस दुनिया में क्या लाए थे और क्या ले जाएंगे? मैं तो कहता हूं कि लोगों से प्यार का संबंध नुकसान उठा कर भी बनाओ. अपने अहं को छोड़ कर जीवनधारा में हंसीखुशी बहना सीखो,’’ राजीव के मुंह से ऐसे संवाद सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं, पर व्यावहारिक जिंदगी में इन के सहारे चलना नामुमकिन है.

बहुत तंग और दुखी हो कर कभीकभी मैं सोचती हूं कि भाड़ में जाएं ये तीनों और इन की गलत आदतें. मैं भी अपना खून जलाना बंद कर लापरवाही से जिऊंगी, लेकिन मैं अपनी आदत से मजबूर हूं. देख कर मरी मक्खी निगलना मुझ से कभी नहीं हो सकता. मैं शोर मचातेमचाते एक दिन मर जाऊंगी पर मेरे साहब आखिरी दिन तक मुझे समझाते रहेंगे, पर बदलेंगे रत्ती भर नहीं.

जीवन के अपने सिखाने के ढंग हैं. घटनाएं घटती हैं, परिस्थितियां बदलती हैं और इनसान की आंखों पर पडे़ परदे उठ जाते हैं. हमारी समझ से विकास का शायद यही मुख्य तरीका है.

कुछ दिन पहले मोहित को बुखार हुआ तो उसे दवा दिलाई, पर फायदा नहीं हुआ. अगले दिन उसे उलटियां होने लगीं तो हम उसे चाइल्ड स्पेशलिस्ट के पास ले गए.

‘‘इसे मैनिन्जाइटिस यानी दिमागी बुखार हुआ है. फौरन अच्छे अस्पताल में भरती कराना बेहद जरूरी है,’’ डाक्टर की चेतावनी सुन कर हम दोनों एकदम से घबरा उठे थे.

एक बडे़ अस्पताल के आई.सी.यू. में मोहित को भरती करा दिया. फौरन इलाज शुरू हो जाने के बावजूद उस की हालत बिगड़ती गई. उस पर गहरी बेहोशी छा गई और बुखार भी तेज हो गया.

‘‘आप के बेटे की जान को खतरा है. अभी हम कुछ नहीं कह सकते कि क्या होगा,’’ डाक्टर के इन शब्दों को सुन कर राजीव एकदम से टूट गए.

मैं ने अपने पति को पहली बार सुबकियां ले कर रोते देखा. चेहरा बुरी तरह मुरझा गया और आत्मविश्वास पूरी तरह खो गया.

‘‘मोहित को कुछ नहीं होना चाहिए अलका. उसे किसी भी तरह से बचा लो,’’ यही बात दोहराते हुए वह बारबार आंसू बहाने लगते.

मेरे लिए उन का हौसला बनाए रखना बहुत कठिन हो गया. मोहित की हालत में जब 48 घंटे बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ तो राजीव बातबेबात पर अस्पताल के कर्मचारियों, नर्सों व डाक्टरों से झगड़ने लगे.

‘‘हमारे बेटे की ठीक से देखभाल नहीं कर रहे हैं ये सब,’’ राजीव का पारा थोड़ीथोड़ी देर बाद चढ़ जाता, ‘‘सब बेफिक्री से चाय पीते, गप्पें मारते यों बैठे हैं मानो मेले में आएं हों. एकाध पिटेगा मेरे हाथ से, तो ही इन्हें अक्ल आएगी.’’

राजीव के गुस्से को नियंत्रण में रखने के लिए मुझे उन्हें बारबार समझाना पड़ता.

जब वह उदासी, निराशा और दुख के कुएं में डूबने लगते तो भी उन का मनोबल ऊंचा रखने के लिए मैं उन्हें लेक्चर देती. मैं भी बहुत परेशान व चिंतित थी पर उन के सामने मुझे हिम्मत दिखानी पड़ती.

एक रात अस्पताल की बेंच पर बैठे हुए मुझे अचानक एहसास हुआ कि मोहित की बीमारी में हम दोनों ने भूमिकाएं अदलबदल दी थीं. वह शोर मचाने वाले परेशान इनसान हो गए थे और मैं उन्हें समझाने व लेक्चर देने वाली टीचर बन गई थी.

मैं ये समझ कर बहुत हैरान हुई कि उन दिनों मैं बिलकुल राजीव के सुर में सुर मिला रही थी. मेरा सारा जोर इस बात पर होता कि किसी भी तरह से राजीव का गुस्सा, तनाव, चिढ़, निराशा या उदासी छंट जाए. ’’

4 दिन बाद जा कर मोहित की हालत में कुछ सुधार लगा और वह धीरेधीरे हमें व चीजों को पहचानने लगा था. बुखार भी धीरेधीरे कम हो रहा था.

मोहित के ठीक होने के साथ ही राजीव में उन के पुराने व्यक्तित्व की झलक उभरने लगी.

एक शाम जानबूझ कर मैं ने गुस्सा भरी आवाज में उन से कहा, ‘‘मोहित, ठीक तो हो रहा है पर मैं इस अस्पताल के डाक्टरों व दूसरे स्टाफ से खुश नहीं हूं. ये लोग लापरवाह हैं, बस, लंबाचौड़ा बिल बनाने में माहिर हैं.’’

‘‘यार, अलका, बेकार में गुस्सा मत हो. यह तो देखो कि इन पर काम का कितना जोर है. रही बात खर्चे की तो तुम फिक्र क्यों करती हो? पैसे को हाथ का मैल…’’

उन्हें पुराने सुर में बोलता देख मैं मुसकराए बिना नहीं रह सकी. मेरी प्रतिक्रिया गुस्से और चिढ़ से भरी नहीं है, यह नोट कर के मेरे मन का एक हिस्सा बड़ी सुखद हैरानी महसूस कर रहा था.

मोहित 15 दिन अस्पताल में रह कर घर लौटा तो हमारी खुशियों का ठिकाना नहीं रहा. जल्दी ही सबकुछ पहले जैसा हो जाने वाला था पर मैं एक माने में बिलकुल बदल चुकी थी. कुछ महत्त्वपूर्ण बातें, जिन्हें मैं बिलकुल नहीं समझती थी, अब मेरी समझ का हिस्सा बन चुकी थीं.

मोहित की बीमारी के शुरुआती दिनों में राजीव ने मेरी और मैं ने राजीव की भूमिका बखूबी निभाई थी. मेरी समझ में आया कि जब जीवनसाथी आदतन शिकायत, नाराजगी, गुस्से जैसे नकारात्मक भावों का शिकार बना रहता हो तो दूसरा प्रतिक्रिया स्वरूप समझाने व लेक्चर देने लगता है.

घरगृहस्थी में संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसा होना जरूरी भी है. दोनों एक सुर में बोलें तो यह संतुलन बिगड़ता है.

मोहित की बीमारी के कारण मैं भी बहुत परेशान थी. राजीव को संभालने के चक्कर में मैं उन्हें समझाती थी. और वैसा करते हुए मेरा आंतरिक तनाव, बेचैनी व दुख घटता था. इस तथ्य की खोज व समझ मेरे लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण साबित हुई.

आजकल मैं सचमुच बदल गई हूं और बहुत रिलेक्स व खुश हो कर घर की जिम्मेदारियां निभा रही हूं. राजीव व अपनी भूमिकाओं की अदलाबदली करने में मुझे महारत हासिल होती जा रही है और यह काम मैं बड़े हल्केफुल्के अंदाज में मन ही मन मुसकराते हुए करती हूं.

हर कोई अपने स्वभाव के अनुसार अपनेअपने ढंग से जीना चाहता है. अपने को बदलना ही बहुत कठिन है पर असंभव नहीं लेकिन दूसरे को बदलने की इच्छा से घर का माहौल बिगड़ता है और बदलाव आता भी नहीं अपने इस अनुभव के आधार पर इन बातों को मैं ने मन में बिठा लिया है और अब शोर मचा कर राजीव का लेक्चर सुनने के बजाय मैं प्यार भरे मीठे व्यवहार के बल पर नेहा, मोहित और उन से काम लेने की कला सीख गई हूं.

लेखक- अवनीश शर्मा

एक मोड़ पर: जया की जिंदगी में क्या बदल गया था

दुकान से घर लौटते हुए वह अचानक ही उदास हो उठता है. एक अजीब तरह की वितृष्णा उस के भीतर पैदा होने लगती है. वह सोचने लगता है, घर लौट कर भी क्या करूंगा? वहां कौन है जो मुझे प्यार दे सके, अपनत्व दे सके, मेरी थकान मिटा सके, मेरी चिंताओं का सहभागी बन सके? पत्नी है, मगर उस के पास शिकायतों का कभी न खत्म होने वाला लंबा सिलसिला है. न वह हंसना जानती है न मुसकरा कर पति का स्वागत करना.

वह जब भी दुकान से घर लौटता है, जया का क्रोध से बिफरा और घृणा से विकृत चेहरा ही उसे देखने को मिलता है. जब वह खाने बैठता है तभी जया अपनी शिकायतों का पिटारा खोल कर बैठ जाती है. कभी मां की शिकायतें तो कभी अपने अभावों की. शिकायतें और शिकायतें, खाना तक हराम कर देती है वह. जब वह दुकान से घर लौटता है तब उस के दिल में हमेशा यही हसरत रहती है कि घर लौट कर आराम करे, थकी हुई देह और व्याकुल दिमाग को ताजगी दे, जया मुसकरा कर उस से बातें करे, उस के सुखदुख में हिस्सेदार बने. मगर यह सब सुख जैसे किसी ने उस से छीन लिया है. पूरा घर ही उसे खराब लगता है.

घर के हर शख्स के पास अपनीअपनी शिकायतें हैं, अपनाअपना रोना है. सब जैसे उसी को निचोड़ डालना चाहते हैं. किसी को भी उस की परवा नहीं है. कोई भी यह सोचना नहीं चाहता कि उस की भी कुछ समस्याएं हैं, उस की भी कुछ इच्छाएं हैं. दिनभर दुकान में ग्राहकों से माथापच्ची करतेकरते उस का दिमाग थक जाता है. उसे जिंदगी नीरस लगने लगती है. मगर घर में कोई भी ऐसा नहीं था जो उस की नीरसता को खत्म कर, उस में आने वाले कल के लिए स्फूर्ति भर सके. जया को शिकायत है कि वह मां का पक्ष लेता है, मां को शिकायत है कि वह पत्नी का पिछलग्गू बन गया है. लेकिन वह जानता है कि वह हमेशा सचाई का पक्ष ही लेता है, सचाई का पक्ष ले कर किसी के पक्ष या विपक्ष में कोई निर्णय लेना क्या गलत है? जया या मां क्यों चाहती हैं कि वह उन्हीं का पक्ष ले? वे दोनों उसे समझने की कोशिश क्यों नहीं करतीं? वह समझ नहीं पाता कि ये औरतें क्यों छोटीछोटी बातों के लिए लड़तीझगड़ती रहती हैं, चैन से उसे जीने क्यों नहीं देतीं?

उसे याद है शादी के प्रारंभिक दिनों में सबकुछ ठीकठाक था. जया हमेशा हंसतीमुसकराती रहती थी. घर के कामकाज में भी उसे कितना सुख मिलता था. मां का हाथ बंटाते हुए वह कितना आनंद महसूस करती थी. देवरननदों से वह बड़े स्नेह से पेश आती थी. मगर कुछ समय से उस का स्वभाव कितना बदल गया है. बातबात पर क्रोध से भर जाती है. घर के कामकाज में भी हाथ बंटाना उस ने बंद कर दिया है. मां से सहयोग करने के बजाय हमेशा उस से लड़तीझगड़ती रहती है. किसी के साथ भी जया का सुलूक ठीक नहीं रहा है. समझ नहीं आता कि आखिर जया को अचानक हो क्या गया है…इतनी बदल क्यों गई है? उस के इस प्रकार ईर्ष्यालु और झगड़ालू बन जाने का क्या कारण है? किस ने उस के कान भरे कि इस घर को युद्ध का मैदान बना डाला है?

अब तो स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि जया अलग से घर बसाने के लिए हठ करने लगी है. अपनी मांग मनवाने के लिए वह तमाम तरह के हथियार और हथकंडे इस्तेमाल करने लगी है. वह जब भी खाना खाने बैठता है, उस के साथ आ कर वह बैठ जाती है. लगातार भुनभुनाती, बड़बड़ाती रहती है. कभीकभी रोनेसिसकने भी लगती है. शायद इस सब का एक ही उद्देश्य होता है, वह साफसाफ जतला देना चाहती है कि अब वह मां के साथ नहीं रह सकती, उसे अलग घर चाहिए.

उसे हैरानी है कि आखिर जया एकाएक अलग घर बसाने की जिद क्यों करने लगी है. यहां उसे क्या तकलीफ है? वह सोचती क्यों नहीं कि उन के अलग हो जाने से यह घर कैसे चलेगा? मां का क्या होगा? छोटे भाईबहनों का क्या होगा? कौन उन्हें पढ़ाएगालिखाएगा? कौन उन की शादी करेगा? पिताजी की मौत के बाद इस घर की जिम्मेदारी उसी पर तो है. वही तो सब का अभिभावक है. छोटे भाई अभी इतने समर्थ नहीं हैं कि उन के भरोसे घर छोड़ सके. अभी तो इन सब की जिम्मेदारी भी उस के कंधों पर ही है. वह कैसे अलग हो सकता है? जया को उस ने हमेशा समझाने की कोशिश की है. मगर जया समझना ही नहीं चाहती. जिद्दी बच्चे की तरह अपनी जिद पर अड़ी हुई है. वह चाहता है इस मामले में वह जया की उपेक्षा कर दे. वह उस की बात पर गौर तक करना नहीं चाहता. मगर वह क्या करे, जया उस के सामने बैठ कर रोनेबुड़बुड़ाने लगती है. वह उस का रोनाधोना सुन कर परेशान हो उठता है.

तब उस का मन करता है कि वह खाने की थाली उठा कर फेंक दे. जया को उस की बदतमीजी का मजा चखा दे या घर से कहीं बाहर भाग जाए, फिर कभी लौट कर न आए. आखिर यह घर है या पागलखाना जहां एक पल चैन नहीं?

इच्छा न होते भी वह घर लौट आता है. आखिर जाए भी कहां? जिम्मेदारियों से भाग भी तो नहीं सकता. उसे देखते ही जया मुंह फुला कर अपने कमरे में चली जाती है. अब उस का स्वागत करने का यही तो तरीका बन गया है. वह जानता है कि अब जया अपने कमरे से बाहर नहीं आएगी. इसलिए वह अपनेआप ही बालटी में पानी भरता है. अपनेआप ही कपड़े उठा कर गुसलखाने में चला जाता है. नहा कर वह अपने कमरे में चला जाता है. जया तब भी मुंह फुलाए बैठी रहती है. उसे उबकाई सी आने लगती है. क्या पत्नी इसी को कहते हैं? क्या गृहस्थी का सुख इसी का नाम है. वह जया से खाना लाने के लिए कहता है. वह अनमने मन से ठंडा खाना उठा लाती है. खाना देख कर उसे गुस्सा आने लगता है, फिर भी वह खाने लगता है.

जया उस के पास ही बैठ जाती है. फिर एकाएक कहती है, ‘‘मैं पूछती हूं, आखिर मुझे कब तक इसी तरह जलना होगा? कब तक मुझे मां की गालियां सुननी होंगी? कब तक देवरननदों के नखरे उठाने पड़ेंगे?’’

रोटी का कौर उस के मुंह में ही अटक जाता है. उस का मन जया के प्रति घोर नफरत से भर जाता है. वह क्रोधभरे स्वर में कहता है, ‘‘आखिर तुम्हें कब अक्ल आएगी, जया? तुम मेरा खून करने पर क्यों तुली हुई हो? कभी थोड़ाबहुत कुछ सोच भी लिया करो. कम से कम खाना तो आराम से खा लेने दिया करो. यदि तुम्हें कोई शिकायत है तो खाना खाने के बाद भी तो कह सकती हो. क्या यह जरूरी है कि जब भी मैं खाने बैठूं, तुम अपनी शिकायतें ले कर बैठ जाओ? प्यार की कोई बात करना तो दूर, हमेशा जलीकटी बातें ही करती रहती हो.’’ हमेशा की तरह जया रोने लगती है, ‘‘हां, मैं तो आप की दुश्मन हूं. आप का खून करना चाहती हूं. मैं तो आप की कुछ लगती ही नहीं हूं.’’

‘‘देखो जया, मैं मां से अलग नहीं हो सकता. इस घर के प्रति मेरी कुछ जिम्मेदारियां हैं. मैं उन से भाग नहीं सकता. तुम्हारे लिए अच्छा यही है कि तुम मां के साथ निभाना सीखो. अलग होने की जिद छोड़ दो.’’

‘‘नहीं,’’ वह रोतेरोते ही कहती है, ‘‘मैं नहीं निभा सकती. मुझ से मां की गालियां नहीं सही जातीं.’’

वह जानता है कि गालीगलौच करने की आदत मां की नहीं है. चूंकि जया अलग होना चाहती है, इसलिए हमेशा मां के खिलाफ बातें बनाती है. उसे समझाना बेकार है. वह समझना ही नहीं चाहती. उस के दिमाग में तो बस एक ही बात बैठी हुई है- अलग होने की. दुखी और परेशान हो कर वह खाना बीच में ही छोड़ कर उठ खड़ा होता है. घर से बाहर आ कर वह सड़कों पर घूमने लगता है. अपने दुख को हलका करने का प्रयास करता है. सोचता रहता है, यही जया कभी उस की मां से कितना स्नेह करती थी. आज उसे किस ने भड़का दिया है? किस ने उसे सलाह दी है अलग हो जाने की? कौन हो सकता है वह धूर्त इंसान? उसे ध्यान आता है जब से सुनयना इस घर में आने लगी है तभी से जया के तेवर भी बदलते जा रहे हैं. सुनयना जया की मौसेरी बहन है. वह अकसर घर में आती है. दोनों बहनें अलग कमरे में बैठी देर तक बातें करती रहती हैं. पता नहीं वे क्याक्या खुसुरफुसुर करती रहती हैं.

सुनयना के पति विनोद को भी वह जानता है. विनोद बीमा विभाग में क्लर्क है. सुनयना और विनोद के बीच हमेशा खटपट रहती है. दोनों के बीच कभी नहीं बनती, किसी न किसी बात पर दोनों झगड़ते रहते हैं. विनोद की आदत लड़नेझगड़ने की नहीं है. मगर सुनयना उसे चैन से जीने नहीं देती. वह बहुत झगड़ालू और ईर्ष्यालु औरत है. तरहतरह के इलजाम लगा कर वह विनोद को लांछित करती रहती है. रोजरोज के इन्हीं झगड़ों से तंग आ कर विनोद अकसर घर नहीं आता. होटल में खाना खा लेता है और कहीं भी जा कर सो जाता है. घर और पत्नी के होते हुए भी वह बेघर इंसान की जिंदगी जी रहा है. विनोद की मां या भाई उसे मना कर वापस घर ले आते हैं, सुनयना के साथ उस का समझौता करा देते हैं. कुछ दिन तो सब ठीकठाक रहता है, मगर थोड़े ही दिनों में सुनयना फिर अपनी असलियत पर उतर आती है और वह फिर घर छोड़ने के लिए विवश हो जाता है. वही सुनयना अब उस के घर को भी तबाह करने पर तुली हुई है. कुछ लोग अत्यंत नीच प्रकृति के होते हैं. वे न तो स्वयं सुखी रहते हैं और न किसी दूसरे को सुखी रहने देना चाहते हैं. दूसरों के घर उजाड़ना उन की आदत हो जाती है. सुनयना भी ऐसी ही औरत है. अपना घर तो वह उजाड़ ही चुकी है, अब इस घर को तबाह करने पर तुली हुई है.

सुनयना से उसे हमेशा ही नफरत रही है. वह उस से कभी बात तक नहीं करता. वह सोचा करता है जो औरत अपने पति के साथ निभा न सकी, जिस ने अपने हाथों से अपना घर बरबाद कर लिया, जो अपने अच्छेभले पति पर लांछन लगाने से बाज नहीं आती, वह किसी दूसरे की हितचिंतक कैसे हो सकती है? जिस का अपना पति होटलों में खाता है, जिस के व्यवहार से दुखी हो कर उस का पति घर भी लौटना नहीं चाहता, ऐसी औरत किसी दूसरे के घर का सुख कैसे बरदाश्त कर सकती है?

सुनयना जब भी इस घर में आती है वह उस की उपेक्षा कर देता है. जया जरूर उस से घंटों बतियाती रहती है. शायद इसीलिए इस घर की रगों में उस जहरीली नागिन का जहर फैलता जा रहा है, इस घर की शांत और सुखी जिंदगी तबाह होती जा रही है. लेकिन सुनयना पर इलजाम लगाने से पूर्व वह पूरी तरह इतमीनान कर लेना चाहता था कि इस स्थिति के लिए वाकई वही जिम्मेदार है. अगर वही इस सब की जड़ में है तो उसे काटना ही होगा. उस की काली करतूत का मजा उसे चखाना ही होगा. इस सांप के फन को यहीं कुचल देना होगा. काफी रात गए तक वह सड़कों पर घूमता रहा. फिर वापस लौट आया इस निर्णय के साथ कि वह सही स्थिति का पता लगा कर रहेगा, असली अपराधी को दंडित कर के रहेगा.

अगले दिन सुबहसुबह ही सुनयना आ धमकी. चेहरे पर झलकती वही कुटिल मुसकान और आंखों में वही कमीनापन. उसे देखते ही वह क्रोध से भर गया. उस ने सोच लिया कि आज फैसला कर के ही रहेगा. सुनयना और जया हमेशा की तरह अलग कमरे में बैठ गईं. दोनों के बीच खुसुरफुसुर होने लगी. वह दरवाजे के पास खड़ा हो कर दोनों की बातें सुनने लगा. सुनयना धीमेधीमे स्वर में कह रही थी, ‘‘तुम तो मूर्ख हो, जया. तुम समझतीं क्यों नहीं? तुम इस घर की बहू हो, कोई लौंडीबांदी तो हो नहीं. तुम्हें क्या पड़ी है कि तुम सास की मिन्नतचिरौरी करती फिरो? तुम क्यों किसी की धौंस सहो? आखिर इस घर में कमाता कौन है? तुम्हारा पति ही तो. फिर तुम्हें देवरननदों के नखरे उठाने की क्या जरूरत है?’’

वह चुपचाप सुनता रहा. सुनयना जया को समझाती रही. जया उसे अपनी सब से बड़ी हितचिंतक समझती थी जबकि वह उसे बरबाद करने पर तुली थी. काफी देर तक वह सुनता रहा. वह अपनेआप को रोक नहीं पाया. दरवाजे की ओट से निकल कर वह भीतर चला गया. उसे इस प्रकार अप्रत्याशित रूप से आया देख कर दोनों बहनें सकपका गईं. मगर सुनयना तुरंत ही संभल गई. वह मुसकरा कर बोली, ‘‘आइए जीजाजी. आप तो कभी हमारे साथ बैठते ही नहीं, हम से कभी बोलते ही नहीं.’’

‘‘आज मैं तुम से बातें करने के लिए ही आया हूं,’’ वह बोला. उस की आवाज में व्यंग्य का पुट था.

सुनयना सकपका सी गई, फिर बोली, ‘‘आप की तबीयत कैसी है?’’

‘‘तुम्हारी मेहरबानी से अच्छा ही हूं,’’ कटु और व्यंग्यभरी आवाज में बोला. लेकिन फिर अपने स्वर को मधुर बना कर पूछा, ‘‘विनोद भाईसाहब के क्या हाल हैं?’’

‘‘ठीक हैं,’’ सुनयना ने जवाब दिया. इस प्रसंग से वह बचना चाहती थी. यह उस का एक कमजोर पहलू जो था.

‘‘सुना है पिछले कई दिनों से वे घर पर नहीं लौटे.’’ सुनयना का चेहरा पीला पड़ गया. भरे बाजार में जैसे उसे किसी ने निर्वस्त्र कर दिया हो. कोई उपयुक्त जवाब उसे नहीं सूझा. फिर भी उस ने कहा, ‘‘यह तो उन की मरजी है, मैं क्या कर सकती हूं?’’

‘‘सुना है आजकल खाना भी वे होटल में ही खाते हैं,’’ वह एक के बाद एक सवाल करता गया. सुनयना की असली तसवीर को वह जया के सामने प्रकट कर देना चाहता था ताकि जया पहचान सके कि सुनयना कैसी औरत है. जया सुनयना को अपनी सब से बड़ी हितचिंतक समझती थी. वह उस की बातों में आ कर, उस पर विश्वास कर के अपने घर को तबाह करने पर तुली हुई थी. जया के सामने सुनयना की पोल खोल देना बहुत जरूरी थी. जया बड़ी हैरानी से उसे देख रही थी. उसे आश्चर्य हो रहा था कि आज वह कैसी बातें कर रहा है, सुनयना का अपमान करने पर क्यों तुला हुआ है. सुनयना अपनी सफाई देती हुई बोली, ‘‘अब देखिए न, जीजाजी, उन के लिए घर में क्या जगह नहीं है? घर में खाना नहीं है? लेकिन मुझे बदनाम करने के लिए वे होटलों में रहते हैं.’’

‘‘होटलों में सोनेखाने का न तो विनोद को शौक है और न ही वह तुम्हें बदनाम करना चाहता है. तुम अपनी गलतियों पर परदा क्यों डालना चाहती हो? तुम यह क्यों नहीं स्वीकार करतीं कि तुम्हारे व्यवहार की वजह से ही विनोद यह जिंदगी जीने को

विवश हुआ है? मैं मानता हूं कि वह घर में होगा तो उसे सोने की जगह और खाने को रोटी मिल जाएगी,  मगर घर सिर्फ खाने और सोने के लिए ही नहीं होता. वहां और भी बहुत कुछ होता है. प्यार होता है, मधुर संबंध होते हैं. तुम ने कभी अपने पति को प्यार दिया है,

पत्नीत्व का सुख दिया है? विनोद दफ्तर से लौटता है और तुम मुसकरा कर उस का स्वागत करने के बजाय उसे जलीकटी सुनाने लगती हो. उस पर तरहतरह के लांछन लगाती हो. आखिर कोई कब तक बरदाश्त कर सकता है? वह होटल में नहीं जाएगा तो क्या करेगा?’’ वह क्रोध और आवेश में सुनयना पर बरस पड़ा. सुनयना इस अपमान को बरदाश्त नहीं कर पाई. तिलमिला कर उठ गई, ‘‘जीजाजी, आप मेरा अपमान कर रहे हैं. हमारी घरेलू जिंदगी में दखल दे रहे हैं आप.’’

‘‘मैं मानता हूं कि मैं तुम्हारी घरेलू जिंदगी में दखल दे रहा हूं. मगर तुम्हें भी हमारे घरेलू मामलों में दखल देने का क्या अधिकार है? तुम क्यों हमारे घर की बरबादी पर जश्न मनाना चाहती हो? तुम यहां किसलिए आती हो? इसीलिए न कि तुम जया को हम सब के खिलाफ भड़का सको, इस घर की शांति को भी खत्म कर सको? अपना घर तो तुम ने तबाह कर ही लिया है, अब हमारा घर तबाह करने पर तुली हुई हो.’’ सुनयना इस अपमान को झेल नहीं पाई. क्रोध और आवेश में आ कर वह जाने लगी, ‘‘जया, मैं नहीं जानती थी कि इस घर में मेरा इस प्रकार अपमान होगा.’’ जया ने उसे रोकना चाहा मगर वह उसे मना करते हुए बोला, ‘‘उसे जाने दो, जया, और उस से कह दो कि फिर कभी हमारे घर न आए. हमें ऐसे हितचिंतकों की जरूरत नहीं है.’’ सुनयना चली गई तो जया रोने लगी,  ‘‘यह आज आप को क्या हो गया है? आप ने मेरी बहन का अपमान किया है.’’

उस ने जया को समझाया, ‘‘उसे अपनी बहन मत कहो. जो औरत तुम्हारी बसीबसाई गृहस्थी उजाड़ना चाहती है, तुम्हारे सुखों को जला डालना चाहती है, उसे बहन समझना तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है. जानती हो विनोद की क्या हालत है? अपना घर और अपनी पत्नी होते हुए भी वह बेचारा आवारों जैसी जिंदगी जी रहा है. न उस के रहने का कोई ठिकाना है न खाने का. कभी कहीं पड़ा रहता है, कभी कहीं. उस की यह दशा किस ने की है? तुम्हारी इसी प्यारी बहन ने. सुनयना उसे चैन से नहीं जीने देती. उस से हर समय झगड़ती रहती है. वह न खुद शांति से रहती है न दूसरों को रहने देती है. वही सुनयना हर रोज तुम्हें कोई न कोई पाठ पढ़ा जाती है. हर रोज तुम्हें किसी नए षड्यंत्र में उलझा जाती है क्योंकि उसे तुम्हारा सुख बरदाश्त नहीं है. अपनी तरह वह तुम्हें भी उजाड़ डालना चाहती है.

‘‘जया, जरा याद करो पहले हम कितने सुखी थे. तुम भी खुश रहती थी. मां भी खुश थीं. कैसी हंसीखुशी से हमारी जिंदगी बीत रही थी. न तुम्हें किसी से कोई शिकायत थी और न किसी को तुम से. लेकिन आज क्या हालत है? दिनरात तुम क्रोध और घृणा से भरी रहती हो. हर रोज मां से तुम्हारी लड़ाई होती है. तुम्हें किसी से प्यार नहीं रह गया है. मुझ से भी तुम प्यार के बजाय शिकायतें ही करती रहती हो. क्यों? सिर्फ सुनयना की वजह से. वह एक मक्कार और धूर्त औरत है. कुछ लोग ऐसे ही होते हैं जो कभी किसी का सुख बरदाश्त नहीं कर पाते. सुनयना ऐसी ही औरत है.

‘‘मुझे समझने की कोशिश करो, जया. मेरी जिम्मेदारियों को समझने की कोशिश करो. सुनयना की बातों से हट कर सोचने की कोशिश करो. इस घर को उजाड़ने के बजाय बसाने की कोशिश करो.’’ जया भौचक्की सी रह गईं. उसे लगा  जैसे उस के दिमाग के परदे खुलने शुरू हो गए हैं. उस की आंखों में आंसू आ गए. वह पति के कंधे पर सिर रख कर आत्मग्लानि व आत्मसमर्पण से सिसकने लगी. आज कितने दिनों बाद वह घर में सुख महसूस कर रहा था.

Health Tips: ठंड के मौसम में बढ़ जाता है जोड़ों का दर्द, तो डॉक्टर से जानें राहत पाने के उपाय

सर्दी बढ़ने के साथ ही जोड़ों में तकलीफ तथा आर्थराइटिस के मरीजों की समस्याएं भी सामने आने लगी हैं. अकसर सर्दी के दिनों में ऐसे लोगों की स्थिति बहुत खराब हो जाती है. दर्द और तकलीफ बढ़ जाती है. इस मौसम में जोड़ों के टिश्यू सूज जाते हैं, इस से दर्द नियंत्रित करने वाली नसों पर दबाव पड़ता है.

आर्थराइटिस के शिकार लोगों के लिए सर्दी में जोड़ों और हड्डियों की बीमारी से निबटने में निम्न उपाय सहायक होंगे.

सर्दी के मौसम में आर्थराइटिस की समस्याओं को दूर रखने के लिए सब से महत्त्वपूर्ण है गरम रहना. ठंडक में हड्डियों को साइलैंट नुकसान होता रहता है. इसलिए दर्द से बचने के लिए कपड़े पहन कर गरम रहना सब से आसान काम है.

  • जोड़ों के दर्द को दूर रखने के लिए विटामिन डी एक आवश्यक तत्त्व है. इस के लिए ज्यादा से ज्यादा धूप में रहना आवश्यक है. धूप में रहने से न सिर्फ शरीर गरम होता है बल्कि विटामिन डी भी मिलता है जिस की आवश्यकता शरीर को होती है. आप चाहें तो विटामिन डी के सप्लीमैंट भी ले सकते हैं.
  • जाड़े में अकसर लोग हाइड्रेटेड रहना भूल जाते हैं और शरीर में पानी का स्तर कम होने से स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं होती हैं, खास कर, शरीर में दर्द होने लगता है. ढेर सारा पानी पीने से शरीर सक्रिय रहता है और दर्द के प्रति कम संवेदनशील होता है.
  • जाड़े के मौसम में घर में घुसे रहने से मोटापा भी बढ़ता है. घर में ज्यादा रहने के साथ स्वादिष्ठ भोजन ज्यादा खाया जाता है और इस से मोटापा बढ़ता है. वजन ज्यादा होना घुटने और पैरों के लिए भी समस्या पैदा करता है.
  • वैसे तो ठंड में व्यायाम और काम करना ही चुनौती है पर यह महत्त्वपूर्ण है कि सक्रिय रहा जाए. इसलिए, थोड़ा व्यायाम आवश्यक है. अगर शरीर स्थिर रहता है तो स्वास्थ्य की समस्याएं बढ़ जाती हैं.
  • आर्थराइटिस के शिकार लोगों के लिए गरम पानी से स्नान करना बहुत उपयोगी हो सकता है. गरम पानी में तैरना या स्टीम बाथ शरीर के लिए बहुत लाभप्रद है.
  • फिश औयल में ओमेगा 3 फैटी एसिड होता है. यह हड्डियों की समस्या वाले लोगों के लिए बहुत उपयोगी होता है. इस से सूजन का स्तर कम हो जाता है. हालांकि, यह महत्त्वपूर्ण है कि फिश औयल सप्लीमैंट डाक्टर की सलाह से लिए जाएं.

शरीर की अच्छी तरह मालिश कराने से जोड़ों और मांसपेशियों का दर्द कम करने में सहायता मिलती है.

डा. यश गुलाटी

जौइंट रिप्लेसमैंट ऐंड स्पाइन सीनियर कंसल्टैंट, अपोलो, दिल्ली   

Fashion Tips: सिंपल सी ड्रेस को फैशनेबल बनाने के लिए लें दुपट्टे की मदद

दुपट्टा भारतीय परिधान सलवार कुर्ते का ही एक हिस्सा है जिसे महिलाएं शरीर के ऊपरी हिस्से पर पहनतीं हैं. कुछ समय पूर्व तक महिलाएं दुपट्टे का उपयोग शरीर के उपरी भाग को ढकने के लिए किया करतीं थीं परन्तु वर्तमान समय में दुपट्टा का उपयोग सलवार सूट, पलाज़ो सूट और शरारा सूट को स्टाइलिश बनाने के लिए किया जाता है. दुपट्टे को ओढ़नी, चुन्नी, और शाल के नाम से भी जाना जाता है. यह प्लेन अथवा सलवार सूट के डिज़ाइन वाला होता है. कुछ समय पूर्व तक यह शिफान, जोर्जेट या सूती फेब्रिक का होता था परन्तु वर्तमान में वनारसी, चंदेरी, और सिल्क फेब्रिक में भी काफी महंगे दामों पर दुपट्टे बाजार में उपलब्ध हैं जो साधारण सी ड्रेस को भी स्टाइलिश बना देते हैं.

कैसे कैसे दुपट्टे

आजकल बाजार में भांति भांति के दुपट्टे उपलब्ध हैं जिनमें से कुछ खास इस प्रकार हैं-

फुलकारी दुपट्टा-फुलकारी दुपट्टा मुख्यतया पंजाब की देन है. जार्जेट के प्लेन कपड़े पर वर्गाकार डिजायन में विविध रंगों के रेशमी धागों से की जाने वाली आकर्षक कढाई इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती होती है. इसे प्लेन कुर्तें अथवा हल्की फुल्की कढाई वाले कुर्ते के साथ पेयर करना उचित रहता है. कुर्ते के साथ आप पलाजो, लैंगिग्स, अथवा सलवार या शरारा जैसी मनचाही आउटफिट पहन सकती हैं. अधिक कढ़ाई वाला दुपट्टा महंगा और कम कढ़ाई वाला दुपट्टा कम दामों पर मिलता है. एक या दो रंग के धागे से की गयी कढ़ाई की अपेक्षा अधिक रंग की कढ़ाई वाला फुलकारी दुपट्टा खरीदना उचित रहता है क्योंकि इसे आप कई ड्रेस के साथ केरी कर सकतीं हैं.

बनारसी दुपट्टा-वनारस के रिच और रॉयल फेब्रिक वाला वनारसी दुपट्टा आज अत्यधिक फैशन में है. यह मूलतः सिल्क फेब्रिक पर बनाया जाता है, परन्तु आजकल सिंथेटिक फेब्रिक पर भी बनारसी लुक के दुपट्टे बनाये जाने लगे हैं जो सिल्क फेब्रिक की अपेक्षा कम दाम में मिल जाते हैं. किसी भी प्लेन ड्रेस को क्लासी और हैवी बना देता है बनारसी दुपट्टा. शादी, बर्थ डे पार्टी, अथवा किटी पार्टी कहीं भी आप इसे पहनकर अपना जलवा बिखेर सकतीं हैं.

गोटा पत्ती दुपट्टा-राजस्थान के गोटा पत्ती के प्रभाव से आज दुपट्टे भी अछूते नहीं हैं. ये एक प्रकार का एप्लीक वर्क होता है जिसमें गोल्डन या सिल्वर कलर के रिबन से बार्डर और डिजायन्स बनाए जाते हैं. इन दुपट्टों को आप मैचिंग अथवा कंट्रास कलर के सूट के साथ पहन सकतीं हैं. ये दुपट्टे वजन में काफी हल्के और चमकीले होते हैं. गोटा पत्ती के दुपट्टे शरारा ड्रेस के साथ बहुत फबते हैं.

नेट के दुपट्टे-यदि आप भारी भरकम दुपट्टे नहीं कैरी करना चाहतीं तो आपके लिए नेट के दुपट्टे बहुत अच्छा विकल्प हैं. आजकल बाजार में हल्के, भारी, सेल्फ डिज़ाइन, मुकेश वाले एक से बढकर एक सुंदर दुपट्टे उपलब्ध हैं. इनका दाम भी अन्य दुपट्टों की अपेक्षा कम होता है. ये डिजायन्स में सुंदर होने के साथ साथ वजन में बहुत हल्के होते हैं जिससे इन्हें हर आयुवर्ग की महिलाएं अथवा किशोरियां पहन सकतीं हैं.

इन दुपट्टों के अतिरिक्त लहरिया, बांधनी, कान्था वर्क, और लेसयुक्त दुपट्टे भी चलन में हैं. इन्हें अपने बजट और आवश्यकता के अनुसार बाजार से खरीद सकतीं हैं.

साधारण से दुपट्टे को ऐसे बनाएं खास

-पुरानी और आउट ऑफ फैशन हो चुकीं साड़ियों से आप लेस और सूट के कपड़े की पाइपिन लगाकर उसे एक नया लुक दे सकतीं हैं.

-प्लेन दुपट्टे को आप सितारे, मिरर, मुकेश, और लेस लगाकर खास बना सकतीं हैं.

-बाजार में उपलब्ध बनारसी लेस को प्लेन दुपट्टे पर लगाकर आप कम बजट में ही बनारसी दुपट्टा तैयार किया जा सकता है.

-किसी भी प्लेन दुपट्टे को हल्की फुलकी कढ़ाई और सूट के कपड़े से एप्लीक वर्क  करके भी   बड़ी आसानी से ख़ास बनाया जा सकता है.

-आजकल दुपट्टों में लटकन बहुत चलन में है बाजार में लटकन वाले दुपट्टे काफी महंगे दामों पर मिलते हैं, आप स्वयं लगाकर काफी कम दाम में ही लटकन वाला ख़ास दुपट्टा तैयार कर सकतीं हैं.

Bathroom इस्तेमाल करते समय रखें इन 8 बातों का ध्यान

कई लोग बाथरूम उपयोग करते वक्‍त छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज कर देते हैं जिस वजह से उनका बाथरूम गंदा नजर आता है. लेकिन कुछ बातों का ध्‍यान रखकर आप अपने बाथरूम को साफ रख सकते हैं.

1. टॉयलेट ढक्कन को बंद करें

ज्यादातर लोग फ्लश करते हुए लिड बंद नहीं करते हैं. ऐसा करना वाकई जरूरी है. जर्म्स वाले छींटे पूरे बाथरूम में फैल जाते हैं अगर हम लिड बंद नहीं करते. ये ऊपर और आसपास तकरीबन छह फीट तक उछलते हैं, तो अगली बार जब फ्लश करें तो लिड बंद करना नहीं भूलें.

2. टूथब्रश स्टोरिंग

अगर आप सोचते हैं कि मेडिसिन कैबिनेट में ब्रश रखने से वे साफ रहेंगे तो ऐसा नहीं है. जब ब्रश कैबिनेट या कंटेनर में रखे हों तो वे सूख नहीं पाते हैं. सूखते नहीं तो इनमें बैक्टीरिया पनपने लगते हैं. अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन ने जारी किया है कि ब्रश को हमेशा ऐसे रखें की वे अन्य ब्रश से दूर रखें.

3. प्रोडक्ट्स

जो कुछ भी आप अपने चेहरे पर लगाते हैं उसे बाथरूम जर्म्स से काफी दूर ही रखें. इसके अलावा अगर आप अपना मेकअप बाथरूम में स्टोर करते हैं तो मॉइस्चर से उसमें बैक्टीरिया पनप सकते हैं. ब्यूटी प्रोडक्ट्स डब्बों में बंद करके सूखे कमरे में रखें. वो आपका ड्रेसिंग रूम तो हो सकता है लेकिन बाथरूम नहीं.

4. लूफा

लूफा में बहुत जल्दी बैक्टीरिया लग जाते हैं, इसलिए ऐसा न हो इस बात का पूरा ध्यान रखें. हर तीन से चार हफ्ते में अपना लूफा बदल लें.

5. तौलिया

अपने बाथ-टॉवेल्स को दो बार यूज करने के बाद जरूर धुलवा लें. लेकिन ध्यान रखें कि पहली बार यूज करने के बाद इन्हे बाथरूम हुक पर नहीं टांगे बल्कि इसे बाहर खुली हवा और धूप में सुखाएं. बाथरूम में टॉवल पर मॉइस्चर बना रहता है और ये फोल्ड्स के बीच में बैक्टीरिया को जन्म देता है. जब आप इसे यूज करेंगे तो बैक्टीरिया आपके स्किन पर ट्रांसफर हो जाएंगे जिससे गंभीर स्किन की बीमारियां हो सकती हैं.

6. बाथरूम में पंखा

बाथरूम का मॉइस्चर बहुत सी बुरी चीजों के लिए जिम्मेदार है. इससे बचें, या तो बाथरूम में पंखा लगवाएं या जब बाथरूम यूज नहीं करें तो खिड़की हमेशा खुली ही रखें. ऐसा नहाने के बाद तो जरूर ही करें.

7. शॉवर कर्टेन साफ करें

शॉवर कर्टेन बहुत से लोग साफ नहीं रखते जो कि सही नहीं है. इसे साफ रखने से भी बाथरूम में बैक्टीरिया ग्रोथ कम की जा सकती है. अगर आप शॉवर कर्टेन को स्क्रब करने में आलस करते हैं तो इन्हें बार-बार वॉशिंग मशीन में भी धोया जा सकता है.

8. बाथरूम में सेल फोन

अगर आप इंस्टाग्राम चेक करने के लिए या कैंडीक्रश खेलने के लिए अपना सेल फोन बाथरूम में ले जाते हैं तो ध्यान रखें कि जो भी चीज बाथरूम में एंटर करेगी उसमें जर्म्स का चिपकना निश्चित है. बाथरूम से बाहर आने पर आप तो हाथ धोकर आते हैं लेकिन अपने फोन को नहीं धोते और फिर तुरंत ही आप फोन सुनने के लिए वही इन्फेक्टेड फोन चेहरे पर लगा लेते हैं.

New Year Special: चाहती हैं दमकती त्वचा, तो मेकअप आर्टिस्ट के इन टिप्स को करें फॉलो

नया साल हमारे लिए एक नया अवसर ले कर आता है. हमारे अंदर आत्मविश्वास और कुछ कर दिखाने का जज्बा पैदा करता है. हम नए साल के लिए काफी कुछ प्लान करते हैं. नए साल के आसपास बहुत सी पार्टीज भी अटेंड करते हैं. ऐसे में भला आप स्किन को कैसे अनदेखा कर सकते हैं।  हेल्दी त्वचा के लिए एक स्किन केयर रूटीन को फॉलो करना शुरू कीजिए ताकि आप के चेहरे पर एक अलग सा निखार और रौनक नजर आए. नए साल पर आप अपनी चमकती त्वचा के साथ आप सबसे दिलकश नजर आए.

चेहरे पर ग्लो लाने के लिए आप को रोजाना अपने शेड्यूल में केवल कुछ ही स्टेप्स को शामिल करना है. इस सन्दर्भ में सेलिब्रिटी मेकअप आर्टिस्ट, गुंजन अघेरा पटेल बताती हैं कि स्किन की देखभाल के लिए इन टिप्स का पालन करना
बिलकुल भी न भूलें-

1. एक्सफोलिएट करें :

अगर आप की स्किन पर ब्लैक या व्हाइट हेड्स ज्यादा दिखते हैं या फिर डेड स्किन सेल्स की वजह से चेहरा डल दिखना शुरू हो गया है तो इस स्थिति से बचने के लिए आप को नियमित रूप से अपनी स्किन को एक्सफोलिएट करते रहना चाहिए.

नए साल पर चमकता चेहरा हासिल करने के लिए यह स्टेप सब से ज्यादा जरूरी है. एक्सफोलिएट करने के लिए या तो आप स्क्रब का प्रयोग कर सकती हैं या फिर खुद घर पर ही एक्सफोलिएटर बना सकती हैं.

इस के लिए आप को कुछ हाइड्रेटिंग और मॉइश्चराइजिंग तत्व और कुछ स्क्रब करने वाले इंग्रेडिएंट्स की जरूरत होगी. हफ्ते में ज्यादा से ज्यादा केवल दो बार ही स्क्रब करें. इस से ज्यादा करने पर आप की स्किन का प्राकृतिक ऑयल लॉस हो सकता है जिस से स्किन ड्राई हो सकती है.

2. दाग धब्बों से स्किन को करें मुक्त :

अगर आप की स्किन पर ज्यादा डार्क स्पॉट दिखाई देते हैं और यह आप की एक इनसिक्योरिटी है तो अब उस की चिंता करने की बिलकुल भी जरूरत नहीं है क्योंकि आप अपने स्किन केयर रूटीन में हाईरूलोनीक एसिड या फिर रेटिनॉल जैसे इंग्रेडिएंट्स का प्रयोग करके इन दाग धब्बों को बाय बोल सकती हैं.

आप चाहें तो अपनी स्किन के लिए सूट करने वाले एसेंशियल ऑयल का भी प्रयोग कर सकती हैं. एंटी स्पॉट मॉश्चराइजर का चुनाव करें जो आप को एक लाइटनिंग ट्रीटमेंट दे सके. अगर दिन में दो बार इस तरह के सीरम का भी प्रयोग करती हैं तो काफी जल्दी अच्छे नतीजे देखने
को मिलने लगते हैं.

3. स्किन साइकिलिंग :

पूरे हफ्ते काम करते करते हमारी स्किन भी काफी प्रभावित हो जाती है इसलिए इसे रिजूवनेट करने के लिए स्किन साइकिलिंग का पालन करना चाहिए. यह एक हफ्ते में 4 दिन तक पालन किया जाने वाला रूटीन है जिस से आप की स्किन रिकवर भी होती है. इस में पहली रात में आप को अपनी
स्किन को एक्सफोलिएट करना है.

इस के लिए केमिकल एक्सफोलिएंट का प्रयोग किया जा सकता है. दूसरी रात में आप को स्किन पर रेटिनॉल से युक्त प्रोडक्ट का प्रयोग करना है. तीसरी और चौथी रात को स्किन को अपने आप ही हील करने के लिए छोड़ देना है और केवल मॉइश्चराइजर का प्रयोग करना है. अगर आप एक काफी प्रभावी और सिंपल और कम स्टेप्स वाला स्किन केयर रूटीन प्रयोग करना चाहती हैं तो इस के साथ जा सकती है.

4. कुछ खास इंग्रेडिएंट्स का प्रयोग करना शुरू करें :

अगर स्किन के लिए कुछ आवश्यक इंग्रेडिएंट्स की बात की जाए तो पेप्टाइड्स, एल्गी, एल ग्लूटामाइन, कोजिक एसिड और रेटिनॉल जैसी चीजों का प्रयोग कर सकती हैं. अश्वगंधा का प्रयोग करना भी शुरू कर सकती हैं. इस में काफी सारे विटामिन और मिनरल पाए जाते हैं जो आप की स्किन के लिए बहुत ही लाभदायक होते हैं. यह स्किन के लिए एंटी ऑक्सीडेंट और मॉइश्चराइजर का काम करता है. इन सभी इंग्रेडिएंट्स को अपनी 2024 की स्किन केयर प्रोडक्ट्स की लिस्ट में जरूर शामिल करें.

5. मसाज :

आप की स्किन को एक अच्छी और रिलैक्सिंग मसाज की भी जरूरत होती है. अगर आप कभी भी मेकअप करना शुरू करती हैं तो शुरुआत में स्किन को प्रेप करने के लिए मसाज करनी चाहिए.

इस के लिए किसी भी ऑयल या फिर मॉइश्चराइजर का प्रयोग कर सकती हैं. इस से ब्लड सर्कुलेशन अच्छा होगा और साथ ही आप की मसल्स को भी लाभ मिलेगा. इस से दाग धब्बों से रहित ग्लोइंग स्किन प्राप्त करने में मदद मिलेगी.

6. अपनी आंखों को न भूलें :

आज कल का शेड्यूल इतना बिगड़ा हुआ है की हमें कम उम्र में ही थोड़े बहुत रिंकल्स, लाइन और डार्क सर्कल आने लगते हैं. इसलिए आप को अपने स्किन केयर रूटीन में आंखों का भी ख्याल रखना चाहिए.

अगर आप की आंखें हर समय सूजी हुई रहती हैं तो किसी भी टी बैग से आंखों के नीचे कुछ समय थोड़ी बहुत मसाज कर लें. यह न्यू इयर तक आप की आंखों को काफी फ्रेश लुक देने में मदद करेगा जिस से आप को ज्यादा कंसीलर और फाउंडेशन का प्रयोग करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. अंडर आई क्रीम का भी रोजाना प्रयोग करना शुरू कर दें.

6 Type की होती हैं Bread, जानिए क्या हैं इनके फायदे

लेखिका- दीप्ति गुप्ता

बदलती जीवनशैली में हमारे खान-पान की आदतें भी विकसित हो रही हैं. अब नाश्ते में लोग ब्रेड का सेवन ज्यादा करते हैं, क्योंकि ये सेहत के लिए बेस्ट ब्रेकफास्ट है. सैंडविच के रूप में या जैम, मक्खन के साथ खाने के अलावा इससे कई तरह के स्नैक्स भी बनाए जाने लगे हैं. आमतौर पर इन सभी के लिए हम व्हाइट ब्रेड का ही इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अब बाजार में ब्रेड की कई किस्में मौजूद हैं, जिनके बारे में अब भी बहुत से लोग नहीं जानते. ये ब्रेड न केवल खाने में स्वादिष्ट होती हैं, बल्कि स्वास्थ से जुड़े इनके फायदे बहुत हैं. तो चलिए आज के इस आर्टिकल में हम आपको बताते हैं ब्रेड के प्रकार और इनसे मिलने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारे में.

ब्राउन ब्रेड (Brown Bread)

ब्राउन गेहूं के आटे से बनी होती है. इसे बनाने के दौरान चोकर और गेहूं के कीटाणु को नहीं हटाया जाता है. परिणामस्वरूप ब्रेड में पोषण तत्व बरकरार रहते हैं. एक ब्राउन ब्रेड में लगभग 3.9 ग्राम प्रोटीन, 21.6 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 2.8 ग्राम फाइबर, 15.2मिग्रा कैल्शियम, 1.4 मिग्रा आयरन, 37.3 मिग्रा मैग्रीशियम, पोटेशियम, सोडियम और जिंक जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं. ब्राउन ब्रेड में मौजूद फाइबर बवासीर, हदय रोग, टाइप टू डायबिटीज और कब्ज के जोखिम को कम करने में मदद करता है.

हनी और ओट्स ब्रेड (Honey and Oats Bread):

शहद और जई से बनी ये ब्रेड कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती है. इसमें 49 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 5 ग्राम फाइबर और 260 कैलोरी होने के साथ विटामिन बी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होता है. सभी पौष्टिक तत्व होने के कारण यह कोलेस्ट्रॉल को कम कर वजन घटाने में सहायता करती है. इस ब्रेड का सेवन करने से पाचन तंत्र भी ठीक रहता है. अध्ययनों के अनुसार, हनी और ओट्स ब्रेड के सेवन से महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर नहीं होता.

राई ब्रेड (Rye Bread)

राई की ब्रेड राई और गेहूं के मिश्रण से तैयार की जाती है. राई की ब्रेड में एक सेक्लाइनिन नाम का प्रोटीन पाया जाता है, जो आपकी बढ़ी हुई भूख को कंट्रोल करने का काम करता है और आपको लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है, जिससे वजन कम करने में तो आसानी होती ही है, साथ ही डायबिटीज में इसे खाया जाए, तो ये बहुत फायदेमंद होती है.

फ्रूट ब्रेड (Fruit Bread): 

फ्रूट ब्रेड बहुत स्वादिष्ट होती है. इसमें किशमिश, संतरे के छिलके, खुबानी, खजूर जैसे ड्राई फ्रूट्स और शुगर मिलाई जाती है. इसके स्वाद को बढ़ाने के लिए इसमें अंडे, दालचीनी, जायफल भी डाले जाते हैं. फ्रूट ब्रेड प्रोटीन और फाइबर के साथ-साथ पोषक तत्वों से भरपूर होती है. एक तरफ जहां ड्राई फ्रूट्स ओरल हेल्थ को बढ़ावा देते हैं और मसूड़ों की बीमारियों से बचाते हैं, वहीं सोडियम की मात्रा कम होने की वजह से उच्च रक्त चाप का खतरा कम हो जाता है.

बैगूएट ब्रेड (Baguette Bread):

पौष्टिकता की बात आए, तो बगुएट ब्रेड अच्छा ऑप्शन है. ये ब्रेड एक लंबे पाव की तरह होती है, जो अक्सर बड़े रेस्टोरेंट्स या बेकरी पर देखने को मिलती है. यह आमतौर पर लीन आटे का उपयोग करके बनाई जाती है. इसमें विटामिन बी, जिंक, आयरन जैसे पोषक तत्व होते हैं. अन्य ब्रेडों की तुलना में इसमें फाइबर की मात्रा न के बराबर होती है, लेकिन ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखने के लिए प्रभावी है.

वॉलनट ब्रेड( Walnut Bread ) :

वॉलनट ब्रेड दिल के मरीजों के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है. दरअसल, इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है, जिससे आप अपनी प्रतिरक्षा को बढ़ा सकते हैं. बता दें, कि अखरोट को ब्रेन बूस्टिंग फूड भी माना जाता है, इसलिए दिमाग को तेज करने के लिए वॉलनट ब्रेड या अखरोट की ब्रेड का सेवन आपको एक बार जरूर करना चाहिए.

तो अगली बार आप जब भी ब्रेड खरीदने की सोचें, तो सुनिश्चित करें, कि इन हेल्दी ब्रेड का ऑप्शन चुनें. इस लेख में बताए गई 6 प्रकार की ब्रेड न केवल पोषण से भरपूर हैं, बल्कि इनका स्वाद भी आम ब्रेड से बहुत अलग है.

सुकून: क्यों सोहा की शादी नहीं करवाना चाहते थे उसके माता-पिता

सुधाकरऔर सविता की शादी के 7 साल बाद सोहा का जन्म हुआ था. पतिपत्नी के साथ पूरे परिवार की खुशी की सीमा न रही थी. शानदार दावत का आयोजन कर दूरदूर के रिश्तेदारों को आमंत्रित किया गया था.

सोहा के 3 साल की होने पर उसे स्कूल में दाखिल करवा दिया. एक दिन सविता को बेटी के पैर पर व्हाइट स्पौट्स से दिखे. रात में सविता ने पति को बताया तो अगले दिन सोहा को डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर ने ल्यूकोडर्मा कनफर्म किया. जान कर पतिपत्नी को गहरा आघात लगा. इकलौती बेटी और यह मर्ज, जो ठीक होने का नाम नहीं लेता.

डाक्टर ने बताया, ‘‘ब्लड में कुछ खराबी होने के कारण व्हाइट स्पौट्स हो जाते हैं. कभीकभी कोई दवा भी रीएक्शन कर जाती है. आप अधिक परेशान न हों. अब ऐसी दवा उपलब्ध है जिस के सेवन से ये बढ़ नहीं पाते और कभीकभी तो ठीक भी हो जाते हैं.’’

डाक्टर की बात सुन कर सुधाकर और सविता ने थोड़ी राहत की सांस ली. फिर स्किन स्पैशलिस्ट की देखरेख में सोहा का इलाज शुरू हो गया.

यौवन की दहलीज पर पांव रखते ही सोहा गुलाब के फूल सी खिल उठी. उस के सरल व्यक्तित्व और सौंदर्य में बेहिसाब आकर्षण था. मगर उस के पैरों के व्हाइट स्पौट्स ज्यों के त्यों थे. हां, दवा लेने के कारण वे बढ़े नहीं थे. सोहा को अपने इस मर्ज की कोई चिंता नहीं थी.

सविता और सुधाकर ने कभी इस बीमारी का जिक्र अथवा चिंता उस के समक्ष प्रकट नहीं की. अत: सोहा ने भी कभी इसे मर्ज नहीं समझा.

पढ़ाई पूरी करने के बाद फैशन डिजाइनर की ट्रेनिंग के लिए उस का चयन हो गया. वह कुशाग्रबुद्धि थी. अत: फैशन डिजाइनर का कोर्स पूर्ण होते ही उसे कैंपस से जौब मिल गई. बेटी की योग्यता पर मातापिता को गर्व की अनुभूति हुई.

सोहा को जौब करतेकरते 2 साल बीत गए. अब सविता को उस की शादी की चिंता होने लगी. सर्वगुणसंपन्न होने पर भी बेटी में एक भारी कमी के कारण पतिपत्नी की कहीं बात चलाने की हिम्मत नहीं पड़ती. दोनों जानते थे कि उस की योग्यता और खूबसूरती के आधार पर बात तुरंत बन जाएगी, लेकिन फिर उस की कमी आड़े आ जाएगी, सोच कर उन का मर्म आहत होता.

यद्यपि सुधाकर और सविता को पता था कि शरीर की सीमित जगहों पर हुए ल्यूकोडर्मा के दागों को छिपाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी कराई जा सकती है, लेकिन पतिपत्नी 2 कारणों से इस के लिए सहमत नहीं थे. पहला यह कि वे अपनी प्यारी बेटी सोहा को इस तरह की कोई शारीरिक तकलीफ नहीं देना चाहते थे और दूसरा यह कि इस रोग को सोहा की नजरों में कुछ विशेष अड़चन अथवा शारीरिक विकृति नहीं समझने देना चाहते थे. इसी कारण सोहा अपने को हर तरह से नौर्मल ही समझती.

दोनों पतिपत्नी को पूरा विश्वास था कि उन की बेटी को अच्छा वर और घर मिल जाएगा. इसी विश्वास पर सुधाकर ने औनलाइन सोहा की शादी का विज्ञापन डाला.

कुछ दिनों के बाद यूएसए से डाक्टर अर्पित का ईमेल आया, साथ में उन का फोटो भी. उन्होंने अपना पूरा परिचय देते हुए लिखा था, ‘‘मैं डा. अर्पित स्किन स्पैशलिस्ट हूं. बैचलर हूं और स्वयं के लिए आप का प्रस्ताव पसंद है. आप ने अपनी बेटी में जिस कमी का वर्णन किया है, वह मेरे लिए कोई माने नहीं रखती है. मैं आप को पूर्ण विश्वास दिलाना चाहता हूं कि हमारी तरफ से आप को या आप की बेटी को कभी किसी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.

‘‘यदि आप को भी हमारा रिश्ता मंजूर हो तो आप लोग बैंगलुरु जा कर मेरे मातापिता से बात कर सकते हैं. बात पक्की होने पर मैं विवाह के लिए इंडिया आ जाऊंगा.’’

अर्पित का मैसेज सुधाकर और सविता को सुखद प्रतीत हुआ. सोहा से भी बात की. उसे भी अर्पित की जौब और फोटो पसंद आया. मातापिता के कहने पर उस ने अर्पित से बात भी की. सब कुछ ठीक लगा.

बैंगलुरु जा कर सुधाकर ने अर्पित के परिवार वालों से बातचीत की. बिना किसी नानुकुर के शादी पक्की हो गई. 1 माह का अवकाश ले कर अर्पित इंडिया आ गया. धूमधाम के साथ सोहा और अर्पित परिणयसूत्र में बंध गए. विवाहोपरांत कुछ दिन मायके और ससुराल में रह कर वह अर्पित के साथ यूएसए चली गई.

सबकुछ अच्छा होने पर भी सुधाकर और सविता को बेटी के शुभ भविष्य के प्रति मन में कुछ खटक रहा था.

यूएसए पहुंच कर सोहा रोज ही मां से फोन पर बातें करती. अपना,

अर्पित का और दिनभर कैसे व्यतीत हुआ, पूरा हाल बताती. अर्पित के अच्छे स्वभाव की प्रशंसा भी करती.

सविता को अच्छा लगता. वे पूछना चाहतीं कि उस के पैरों के बारे में कुछ बात तो नहीं होती, लेकिन पूछ नहीं पाती, क्योंकि अभी तक कभी उस से व्यक्तिगत रूप से इस पर बात कर के उस का ध्यान इस तरफ नहीं खींचा था ताकि बेटी को कष्ट की अनुभूति न हो.

सोहा ने भी कभी इस बाबत मां से कोई बात नहीं की, इस विषय में मां से कुछ कहना उसे कोई जरूरी बात नहीं लगती थी. बस इसी तरह समय सरकता रहा.

स्वयं स्किन स्पैशलिस्ट डाक्टर होने के कारण अर्पित को ल्यूकोडर्मा के बारे में पूरी जानकारी थी. वे इस से परिचित थे कि यह बीमारी आनुवंशिक होती है और न ही छूत से. अपितु शरीर में ब्लड में कुछ खराबी होने के कारण हो जाती है. एक लिमिट में रहने तक प्लास्टिक सर्जरी से छिपाया जा सकता है. उन्होंने सोहा के साथ भी वही किया. कुछ अन्य डाक्टरों से सलाहमशवरा कर के उन्होंने बारीबारी से सोहा के दोनों पैर प्लास्टिक सर्जरी द्वारा ठीक कर दिए.

कुछ समय और बीता तो सोहा को पता चला कि उस के पांव भारी हैं. उस ने अर्पित को इस शुभ समाचार से अवगत कराया.

अर्पित ने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए उसे बांहों में भर लिया, ‘‘मां को भी इस शुभ समाचार से अवगत कराओ,’’ अर्पित ने कहा.

‘‘हां, जरूर,’’ सोहा ने मुसकराते हुए कहा.

दूसरे दिन सोहा ने फोन पर मां को बताया. सविता और सुधाकर को अपार हर्ष की

अनुभूति हुई. उन्हें विश्वास हो गया कि उन की बेटी का दांपत्य जीवन सुखद है.

दोनों पतिपत्नी ने शीघ्र यूएसए जाने की तैयारी भी कर ली. सोहा और अर्पित के पास मैसेज भी भेज दिया. यथासमय बेटीदामाद उन्हें रिसीव करने पहुंच गए. काफी दिनों बाद सोहा को देख कर सविता ने उसे गले से लगा लिया. घर आ कर विस्तृत रूप से बातचीत हुई.

सोहा के पैरों को सही रूप में देख कर सुधाकर और सविता को असीम खुशी हुई.

शिकायत करती हुई सविता ने सोहा से कहा, ‘‘अपने पैरों के बारे में तुम ने मुझे नहीं बताया?’’

‘‘हां मां, यह कोई ऐसी विशेष बात तो थी नहीं, जो तुम्हें बताती,’’ सोहा ने लापरवाही से कहा.

सविता के मन ने स्वीकार लिया कि बेटी की जिस बीमारी को ले कर वे लोग 24-25 सालों तक तनाव में रहे वह अर्पित के लिए कोई विशेष बात नहीं रही. ‘योग्य दामाद के साथ बेटी का दांपत्य जीवन और भविष्य उज्ज्वल रहेगा,’ सोच सविता को भारी सुकून मिला.

घोंसला: कपिल की मौत से किसे ज्यादा तकलीफ हुई

सुबह होतेहोते महल्ले में खबर फैल  गई थी कि कोने के मकान में  रहने वाले कपिल कुमार संसार छोड़ कर चले गए. सभी हैरान थे. सुबह से ही उन के घर से रोने की आवाजें आ रही थीं. पड़ोस में रहने वाले उन के हमउम्र दोस्त बहुत दुखी थे. वास्तव में वे मन से भयभीत थे.

उम्र के इस पड़ाव में जैसेतैसे दिन कट रहे थे. सब दोस्तों की मंडली कपिल कुमार के आंगन में सुबहशाम जमती थी. कपिल कुमार को चलनेफिरने में दिक्कत थी, इसलिए सब यारदोस्त उन के यहां ही एकत्रित हो जाते और फिर कभी कोई ताश की बाजी चलती तो कभी लूडो खेला जाता. कपिल कुमार की आवाज में खासा रोब था. ऊपर से जिंदादिली ऐसी कि रोते हुए को वे हंसा देते.

विनोद साहब तो उन की खबर सुन कर सुन्न रह गए. बिलकुल बगल वाला घर उन का ही था. इसलिए सब से पहले खबर उन्हें ही मिली. विनोद साहब अपनी पत्नी के साथ अकेले रहते थे. उन के दोनों बेटे अमेरिका में सैटल थे. कभीकभी मौत का ध्यान कर वे डर जाया करते थे कि अगर वे पहले चले गए तो उन की पत्नी अकेली रह जाएगी, तब उन की भोली पत्नी कैसे पैंशन और बैंक आदि के काम कर पाएगी. दोनों बेटे अपनीअपनी नौकरी में इतने मस्त थे कि वे कभी एक हफ्ते से ज्यादा इंडिया आए ही नहीं.

विनोद साहब काफी ईमानदार व मिलनसार व्यक्ति थे. वे कपिल कुमार से 3 साल बड़े थे. उन्हें मन ही मन काफी विश्वास था कि आगे उन्हें कुछ होगा तो वे उन की पत्नी की जरूर मदद कर देंगे. परंतु कपिल कुमार की अकस्मात मौत की खबर ने उन की चिंता बढ़ा दी थी.

चाय का ठेला लगाने वाला नानका सुबह उन के घर आ कर खबर पक्की कर गया था. वह सुबकसुबक कर रो रहा था. कपिल कुमार अकसर उसे छेड़ा करते थे. उस की शादी नहीं हुई थी. पर अपना घर बसाने का उस के मन में बहुत चाव था. वह पंजाब के होशियारपुर का रहने वाला था. उस के मातापिता बचपन में ही गुजर गए थे. उसे विधवा मौसी ने पाला था. फिर वह भी कैंसर से बीमार हो कर ऊपर वाले को प्यारी हो गई थी. उस का मन संसार से विरक्त हो गया था.

वह घरबार छोड़ कर इधरउधर घूमता रहा. एक दिन विनोद साहब को ट्रेन में मिला था. उस के बारे में जान कर वह उसे सम झाबु झा कर साथ ले आए थे. उन्होंने अपनी मंडली की मदद से उस को चाय का ठेला लगवा दिया था. दिनभर उस के ठेले पर अच्छा जमघट लगा रहता. उस की मीठी बोली का रस लोगों के दिलों तक पहुंच जाता था और सब उस के कायल हो जाते थे. सारा दिन मंडली का चायनाश्ता उस की जिम्मेदारी थी. वे लोग भी उस का खूब खयाल रखते. कभी उस को बड़ा और्डर मिल जाता तो वे सब उस की मदद करने बैठ जाते. उन से उस का कुछ बंधा हुआ नहीं था. जब जिस का मन होता वह उसे पकड़ा देता और उस ने भी उन के साथ कुछ हिसाबकिताब नहीं रखा था. नानका के लिए वे सभी लोग खून से बड़े रिश्ते वाले थे.

उन लोगों के दिए प्यार और अपनेपन ने उस के शुष्क मन में हरियाली भर दी. आज कपिल कुमार के जाते ही उस को लगा कि उस का अपना उसे छोड़ कर चला गया. उन की मंडली के खन्ना साहब को भी जब से खबर मिली थी तब से वे भी काफी उदास थे. मन ही मन सोच रहे थे कि उन सब का घोंसला टूट गया. दिल चाह रहा था कि दौड़ कर कपिल कुमार के घर पहुंच जाएं पर पांव थे कि साथ नहीं दे रहे थे. शायद मन ही मन अपना भविष्य वे कपिल कुमार में देख कर डर गए थे.

उन के बेटे ने जब से खबर सुनाई थी, वे सोच में डूबे थे. पता नहीं जिंदगी का मोह था या सचाई से सामना करने का डर जो उन्हें अपने जिगरी यार के घर जाने से रोक रहा था. उन के कानों में कपिल कुमार के जोरदार ठहाकों की आवाज गूंज रही थी. कल शाम ही लूडो खेलते हुए वे जब बाजी जीत गए तो बोले थे, ‘मु झ से कोई जीत नहीं सकता.’

सरदार इंदरपाल का भी यही हाल था. वे कपिल कुमार के घर सुबह ही पहुंच गए थे. उन की बौडी के पास बैठे वे पथरा से गए थे. परिवार के रोने की आवाजें रहरह कर उन के कानों में गूंज रही थीं. ‘पापाजी की तसवीरों में से अच्छी सी तसवीर निकालो…’, ‘बेटे को खबर कर दी…’,  ‘अच्छा दोपहर तक पहुंचेगा…’ ‘बेटी आ गई…’ अचानक रोने की आवाज तेज हो गई. उन के भाईबहन पहुंच गए थे. सरदार इंद्रपाल को मालूम था कि कपिल कुमार के अपने भाई से रिश्ते कुछ खास अच्छे नहीं थे पर अंतिम यात्रा में सब को शामिल होना था.

सरदार इंद्रपाल अपने ही विचारों में खो गए. उन का एक ही बेटा था. अपना सबकुछ लगा कर उसे पढ़ायालिखाया. अमेरिका में एक बड़ी कंपनी में काम करता था. डौलरों में तनख्वाह मिलती थी, खूब पैसा भेजता था. शुरू में तो हमेशा कहता था, ‘कुछ साल का अनुभव लेने के बाद वापस आ जाएगा, तब अपने देश में उसे अच्छी नौकरी मिल जाएगी.’ धीरेधीरे उसे अपने भविष्य के आगे बेटे का भविष्य दिखाई देने लगा. इंद्रपाल पत्नी के साथ अपने पुश्तैनी मकान में रह गए और फिर एक दिन पत्नी भी छोड़ कर चली गई. अब तो ये यारदोस्त की मंडली ही उन के लिए सबकुछ थी.

आज उन में भी एक विकेट गिर गया. कपिल कुमार के घर से बाहर आ कर उन का दिल बहुत भावुक हो गया. उन्होंने बेटे को फोन मिलाया. ‘‘क्या हुआ पापाजी, सब ठीक है न?’’ उस की आवाज की घबराहट सुन कर सरदार इंद्रपाल को अपनी गलती का एहसास हुआ. वहां इस समय मध्यरात्रि थी.

अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए बोले, ‘‘हां पुत्तर, सब ठीक है. रात को बुरा सपना आया था, सो तुम सब की खैरियत जानने के लिए फोन किया था. टाइम का खयाल ही दिमाग से निकल गया.’’

बेटे के दिल तक पिता की व्याकुलता पहुंच चुकी थी. उस ने धीरे से कहा, ‘‘पापाजी, क्या हुआ है?’’‘‘मेरा यार कपिल सानू छड के चला गया,’’ कहतेकहते वे बच्चों की तरह बिलख कर रोने लगे. बेटे ने कई तरह से उन को दिलासा दिया और जल्दी ही आने का वादा कर के उन्हें शांत किया.

इधर बंगाली बाबू का भी घर पर यही हाल था. जब से कपिल कुमार की डैथ का उन्हें पता चला, तब से वे न जाने कितनी बार टौयलेट जा कर आए थे. वे शुरू से कम बोलते थे, पर मितभाषी होने पर भी कुदरत ने इमोशंस उन को भी कम नहीं दिए थे. वे अच्छे सरकारी ओहदे से रिटायर्ड थे. बहुत से लोगों से उन की जानपहचान थी. परंतु रिटायरमैंट के बाद संयोग से जिस भी दोस्त को फोन किया, तो पता चला कि वह इस लोक को छोड़ गया. तब से उन के मन में वहम हो गया, इसलिए उन्होंने फोन करना ही छोड़ दिया.

सब उन का मजाक उड़ाते कि उन के फोन करने और न करने से कुछ बदलने वाला नहीं है. पर वे मुसकरा कर कहते ‘फोन न करने से मेरे मोबाइल में उन का नंबर बना रहता और दिल को तसल्ली रहती है कि मेरे पास अभी भी इतने सारे दोस्त हैं,’ उन की पत्नी कब से पैरों में चप्पल डाले तैयार खड़ी थी पर बंगाली बाबू के पेट में बारबार मरोड़ उठने लगते थे. आखिर हिम्मत कर के वे अपने यार के अंतिम दर्शन के लिए निकल पड़े. रितेश साहब इन सब से कुछ विपरीत थे. वे सुबह ही कपिल

कुमार के घर पर आ कर पूरा इंतजाम संभाल रहे थे. शादीब्याह हो या किसी का मरना, वे इसी तरह अपनी फ्री सेवा प्रदान करते हैं. किसी के बिना कुछ कहे सब इंतजाम वे अपने से कर लेते थे, फिर कपिल तो उन का यार था. इस में कैसे वे पीछे रह जाते. बाहर तंबू लगवाते वे सोच रहे थे कि बाकी दोस्त कहां रह गए. सब की मनोदशा का उन को कुछकुछ अंदाजा था. नानका वहां पहले से पहुंचा हुआ था. घर के बाहर लगे लैटर बौक्स से पानी का बिल हाथ में लिए आया और फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘हर बार साहब मु झे पहले जा कर बिल भरने की हिदायत देते थे और सब के बिल इकट्ठे कर के देते थे. अब मु झे कौन…’’ रितेश साहब ने उसे अपने कंधे से लगा लिया और उसे चुप कराने लगे. नानका सब का दुलारा था. पानी का बिल हो या किसी बीमार रिश्तेदार को देखने जाना हो, सब का यह मुंहबोला बेटा हमेशा उन के साथ जाता था. वह कब उन के दुखसुख का साथी बन गया था, यह किसी को नहीं पता था.

दोपहर तक कपिल कुमार का बेटा परिवार सहित आ गया. सभी रिश्तेदार भी धीरेधीरे जमने शुरू हो गए. कपिल कुमार की मित्रमंडली भी उन के घर के आगे जमा हो गई. आती भी कैसे नहीं, यार को अंतिम यात्रा में कंधा देना था. अर्थी के उठाते ही एक बार फिर रुदन का स्वर ऊंचा हो गया. महल्ले के कोने में खड़ा नानका चाय वाले की आंखें नम हो आई थीं. इस मित्रमंडली की वजह से उस का मनोरंजन होता रहता था, वरना आजकल तो सब लोग घर में ही घुसे रहते हैं, कोई किसी से बात कर के राजी ही नहीं है.

शाम होतेहोते सबकुछ खत्म हो गया. जिस आदमी के ठहाकों से पूरी गली गूंजती थी, वहां आज मातम छाया था. सब अपने घरों में जा कर दुबक गए.

रितेश साहब ने हिम्मत की और कपिल कुमार के घर के आंगन में पहुंच गए. घरपरिवार के लोग अंदर थे. बाहर मित्रमंडली की कुरसियां तितरबितर थीं. धीरेधीरे उन्होंने कुरसियों को सहेजना शुरू किया और बड़े जतन से उसे सटाने लगे. वे बीच में कोई जगह खाली नहीं छोड़ना चाहते थे, शायद ऐसा करने से तथाकथित यमराज उन दोस्तों तक न पहुंच पाए. बाहर हलचल की आवाज सुन कर कपिल कुमार का बेटा बाहर आ गया.

उन्हें कुरसी लगाते देख कर बोला, ‘‘अंकल, कोई आने वाले हैं?’’ ‘‘हां बेटा, हम सब की मजलिस का समय हो गया है,’’ कहतेकहते फफक कर रोने लगे. उन्हें किसी तरह चुप करवा कर कपिल कुमार का बेटा उन्हें उन के घर छोड़ कर आया.

3-4 दिनों में ही सब क्रियाकर्मों के साथ उस ने सामान का निबटारा शुरू कर दिया. सब सामान पुराना था, इसलिए बेहतर यही सम झा गया कि आसपड़ोस वालों को या गरीबों को दे दिया जाए. कपिल कुमार की मित्रमंडली का मन था कि सभी कुरसियां वह ज्यों की त्यों छोड़ दे पर सकुचाहट की वजह से प्रकट में कोई नहीं बोला.  शायद, दोबारा अपनी मंडली को एकसाथ एकत्रित करने का साहस बटोर रहे थे.

चौथे के अगले दिन उन्हें पता चला कि सब सामान इधरउधर दे कर मकान का भी सौदा हो गया है. मानवीय संवेदनाओं को दरकिनार कर व्यावहारिक होने में अब कम ही समय लगता है. नम आंखों के साथ कपिल कुमार का बेटा सब से विदाई ले कर चला गया.

उस के जाते ही सारे दोस्त अपनेअपने घरों से निकल आए जैसे उस के जाने का इंतजार कर रहे हों. कपिल कुमार के घर के बाहर एक कोने में टैंट वाले की दरी अभी भी पड़ी थी. चुपचाप सारे दोस्त असहज हो कर भी उसी दरी पर बैठने की कोशिश करने लगे. उम्र के इस मोड़ पर चौकड़ी मार कर बैठना मुश्किल था, सब निशब्द थे पर उन के मौन में भी एक प्रश्न था कि कल से कहां बैठने का इंतजाम करना है.

महल्ले के कोने में खड़ा चायवाला नानका अचानक से हाथ जोड़े उन के सामने आ कर खड़ा हो गया.  ‘‘साहब, कपिल कुमार के बेटे ने सारी कुरसियां मु झे दे दी हैं. आप सब से विनती है कि आप चल कर मेरी दुकान पर बैठें. आप सब हैं, तो इस महल्ले में रौनक है, वरना आजकल कौन किसी से बात करता है.’’

कुछ ही देर में चाय वाले के यहां उन सब का नया घोंसला तैयार था और वे सब बैठे लूडो खेलने की तैयारी में लगे थे.

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