Diwali Special: अंतस के दीप- दीवाली में कैसे बदली पूजा और रागिनी की जिंदगी

‘‘अरे रागिनी, 2 बज गए, घर नहीं चलना क्या? 5 बजे वापस भी तो आना है स्पैशल ड्यूटी के लिए.’’ सहकर्मी नेहा की आवाज से रागिनी की तंद्रा टूटी. दीवाली पर स्पैशल ड्यूटी लगने का औफिस और्डर हाथ में दबाए रागिनी पिछली दीवाली की काली रात के अंधेरों में भटक रही थी जो उस के मन के भीतर के अंधेरे को और भी गहरा कर रहे थे. नफरत का एक काला साया उस के भीतर पसर गया जो देखते ही देखते त्योहार की सारी खुशी, सारा उत्साह लील गया. रागिनी बुझे मन से नेहा के साथ चैंबर से बाहर निकल आई.

ऐसा नहीं है कि उसे रोशनी से नफरत है. एक वक्त था जब उसे भी दीपों का यह त्योहार बेहद पसंद था. घर में सब से छोटी और लाड़ली रागिनी नवरात्र शुरू होने के साथ ही मां के साथ दीवाली की तैयारियों में जुट जाती थी. सारे घर में साफसफाई करना, पुराना कबाड़, सालभर से इस्तेमाल नहीं हुआ सामान, छोटे पड़ चुके कपड़े और रद्दी आदि की छंटाई करना व उस के बाद घर की सजावट का नया सामान खरीदना उस का शौक था. इन सारे कामों में तुलसीबाई और पूजा भी उस का हाथ बंटाती थीं और सारा काम मजेमजे में हो जाता था.

दीवाली के सफाई प्रोजैक्ट में कई बार स्टोर में से पुराने खिलौने और कपड़े ?निकलते थे जिन्हें रागिनी और पूजा पहनपहन कर देखतीं व मां को दिखातीं, कभी टूटे हुए खिलौनों से खेल कर बीते हुए दिनों को फिर से जीतीं…मां कभी खीझतीं, कभी मुसकरातीं. कुल मिला कर हंसीखुशी के साथ घर में दीवाली के स्वागत की तैयारियां की जाती थीं.

पूजा उन की घरेलू सहायिका तुलसीबाई की एकलौती बेटी थी और दोनों मांबेटी उन के घर में ही छत पर बने छोटे से कमरे में रहती थीं. पूजा के पिता की जहरीली शराब पीने से मौत हो गई थी. पति की मृत्यु के बाद जवान विधवा तुलसीबाई पर उन की झुग्गी बस्ती का हर पुरुष बुरी नजर रखने लगा तो उस ने रागिनी की मां शीला से उन के घर में रहने की इजाजत मांगी. शीला को वैसे भी एक फुलटाइम सहायक की जरूरत थी, सो, उन्होंने खुशीखुशी हामी भर दी. तब से इस पूरी दुनिया में रागिनी का परिवार ही उन का अपना था. पूजा रागिनी से लगभग 10 वर्ष छोटी थी. खूबसूरत गोलमटोल पूजा उसे गुडि़या सी लगती थी और गुडि़या की तरह ही सजाती, उस के बाल बनाती और उस के साथ खेला करती थी.

समय के साथ दोनों लड़कियां बड़ी हो रही थीं. रागिनी ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटैक की डिगरी ली और एक कंपीटिशन एग्जाम पास कर बिजली विभाग की राजकीय सेवा में आ गई. रागिनी को पहली पोस्ंिटग जैसलमेर के पास एक छोटे से कसबे फलौदी में मिली. रागिनी के मम्मीपापा उसे अपने शहर जोधपुर से इतनी दूर अकेली भेजने में संकोच कर रहे थे. तभी तुलसीबाई ने उन की मुश्किल यह कह कर आसान कर दी कि दीदी, बुरा न मानें तो छोटे मुंह बड़ी बात कहूं? आप पूजा को रागिनी बेबी के साथ भेज दीजिए. यह उन का छोटामोटा काम कर देगी, दोनों का मन भी लगा रहेगा और आप बेफिक्र भी हो जाएंगी.

हालांकि यह खयाल शीला के दिल में भी आया था मगर वह यह सोच कर चुप रह गई कि पराई बेटी की सौ जिम्मेदारियां होती हैं, कल को कोई ऊंचनीच हो गई तो क्या जवाब दूंगी तुलसी को?

और फिर रागिनी जब अपने पूरे परिवार यानी मम्मीपापा, तुलसीबाई और पूजा के साथ अपनी नौकरी जौइन करने आई तो सब को एकसाथ देख कर रागिनी के अधिकारी मुसकरा उठे. 4 दिन रैस्टहाउस में रह कर स्टाफ की मदद से औफिस के पास ही 2 कमरों का एक छोटा सा फ्लैट किराए पर ले कर रागिनी और पूजा को वहां शिफ्ट कर दिया गया. अब मम्मीपापा रागिनी की तरफ से पूरी तरह बेफिक्र थे.

रागिनी की फील्ड की जौब थी. अकसर उसे साइट्स पर दूरदूर जाना पड़ता था. कई बार तो वापसी में रात भी हो जाती थी. मगर उस के अधिकारी और स्टाफ सभी अच्छे स्वभाव के थे, इसलिए उसे कोई परेशानी नहीं होती थी. घर आते ही पूजा गरमागरम खाना बना कर उस के इंतजार में बैठी मिलती. दोनों साथसाथ खाना खातीं, रागिनी दिनभर का हाल पूजा को सुनाती, उसे दिनभर में मिलने वाले तरहतरह के लोगों के बारे में बताती और दोनों खूब हंसतीं. कुल मिला कर सबकुछ ठीकठाक चल रहा था.

4 महीने बाद रागिनी का खास त्योहार दीवाली आया. वह त्योहार पर अपने घर नहीं जा सकती थी. जिस तरह पुलिस वालों की होली पर और पोस्टमैन की रक्षाबंधन पर स्पैशल ड्यूटी लगती है उसी तरह बिजली विभाग के इंजीनियर्स की दीवाली पर स्पैशल ड्यूटी लगाई जाती है, ताकि बिजली की व्यवस्था सुचारु बनी रहे और लोग बिना व्यवधान के यह त्योहार मना सकें.

रागिनी की धनतेरस से दीवाली तक 3 दिन शाम 5 बजे से रात 12 बजे तक स्पैशल ड्यूटी लगाई गई. पहले 2 दिनों की ड्यूटी आराम से निबट गई. रागिनी की असली परीक्षा तो आज यानी दीवाली के मुख्य त्योहार के दिन ही होनी थी. वह तय समय पर अपने सबस्टेशन पहुंच गई. शाम लगभग 7 बजे फीडरों पर बिजली का लोड बढ़ने लगा. 8 बजे तक लोड स्थिर हो गया और इस बीच किसी तरह की कोई ट्रिपिंग भी नहीं आई यानी सबकुछ सामान्य था.

‘अब लोड और नहीं बढ़ेगा, मुझे एरिया का एक राउंड ले लेना चाहिए,’ यह सोचते हुए रागिनी गाड़ी ले कर राउंड पर निकली. अपनी गली के पास से गुजरते हुए अचानक पूजा का खयाल आ गया तो सोचा, ‘आ ही गई हूं तो घर में दीयाबाती करती चलूं वरना पूजा रात 12 बजे तक घर में अंधेरा किए बैठी रहेगी.’

उसे देखते ही पूजा खुश हो गई. पहली बार दोनों ने घर में दीये जलाए और थोड़ा सा कुछ खा कर रागिनी फिर से निकल पड़ी अपनी ड्यूटी पर.

अब बस, इसी तरह का शेड्यूल बन गया था हर दीवाली पर रागिनी 5 बजे ड्यूटी पर जाती और 8 बजे फिर से ड्यूटी पर चली जाती, फिर दीवाली के दूसरे दिन सप्ताहभर की छुट्टी ले कर दोनों बहनें मम्मीपापा के पास जोधपुर चली जातीं त्योहार मनाने और सालभर की थकान उतारने…

पिछले 3 सालों में काफीकुछ बदल गया था रागिनी और पूजा की लाइफ में. 2 साल पहले अचानक हार्टअटैक से तुलसीबाई की मृत्यु हो गई. पूजा अनाथ हो गई. रागिनी के मम्मीपापा ने उसे विधिवत गोद ले कर अपनी बेटी बना लिया. रागिनी तो उसे हमेशा से ही अपनी छोटी बहन सा प्यार करती थी, अब इस रिश्ते पर सामाजिक मुहर भी लग गई.

सालभर पहले रागिनी की शादी विवेक से हो गई. विवेक भी उसी की तरह विद्युत विभाग में अधिकारी था. उस की पोस्टिंग जैसलमेर में थी. शादी के बाद यह उन की पहली दीवाली थी. मगर हमेशा की तरह दोनों की ही ड्यूटी अपनेअपने सबस्टेशन पर लगी थी. इसलिए दोनों को ही अपनी पहली दीवाली साथ नहीं मना पाने का दुख था. दीवाली के अगले दिन रागिनी विवेक के पास जैसलमेर और पूजा मांपापा के पास जोधपुर चली गई. पहली बार दोनों बहनें अलगअलग बसों में सवार हो कर गई थीं.

रागिनी और उस के घर वाले सभी अब चाह रहे थे कि विवेक और उस का ट्रांसफर एक ही जगह हो जाए तो वे रागिनी की चिंता से मुक्त हो कर पूजा की शादी के बारे में सोचें. दोनों परिवारों ने बहुत कोशिश की, कई नेताओं की सिफारिश लगवाई, सरकारी नियमों का हवाला दिया और लगभग सालभर की मेहनत के बाद आखिरकार रागिनी का ट्रांसफर फलौदी से जैसलमेर हो गया. रागिनी बहुत खुश थी. अब उसे विवेक की जुदाई नहीं सहनी पड़ेगी. अब उस का परिवार पूरा हो सकेगा और पूजा की भी शादी हो जाएगी. कई तरह के सपने देखने लगी थी रागिनी.

ट्रांसफर के बाद पूजा भी रागिनी के साथ जैसलमेर आ गई. यहां विवेक को बड़ा सा सरकारी क्वार्टर मिला हुआ था. एक सहायक भी था घर के काम में मदद करने के लिए, मगर वह सिर्फ बाहर के काम ही देखता था. घर के अंदर की सारी व्यवस्था पूजा ने संभाल ली थी.

अब रागिनी यही कोशिश करती थी कि उसे देर तक घर से बाहर न रहना पड़े. वह औफिस से जल्दी घर आ कर ज्यादा से ज्यादा टाइम विवेक के साथ बिताना चाहती थी. अकसर दोनों शाम को घूमने निकल जाते थे और देररात को लौटते थे. मगर चाहे कितनी भी देर हो जाए, रात का खाना वे पूजा के साथ ही खाते थे. छुट्टी के दिन रागिनी पूजा को भी अपने साथ ले कर जाती थी. कभी पटवों की हवेली, कभी सोनार किला, कभी गढ़ीसर लेक और कभी सम के धोरों पर. तीनों खूब मस्ती करते थे. पूजा भी अधिकार से विवेक को जीजूजीजू कह कर उस से मजाक करती रहती थी. पूरा घर तीनों की हंसी से गुलजार रहता था.

देखते ही देखते फिर से दीवाली आ गई. इस बार रागिनी पूरे उल्लास से यह त्योहार मनाने वाली थी. हमेशा की तरह दोनों बहनों ने मिल कर घर की साफसफाई की, कई तरह के नए सजावटी सामान खरीद कर घर को सजाया. 2 दिन पहले दोनों ने मिल कर कई तरह की मिठाइयां व नमकीन बनाईं. नए कपड़े खरीदे गए. पूरे घर पर रंगीन रोशनी की झालरें लगाई गईं. घर के मुख्यद्वार पर इस बार पूजा ने सुंदर सी रंगोली भी बनाई थी.

हमेशा की तरह शाम 5 बजे रागिनी अपनी ड्यूटी पर निकल गई और विवेक अपनी पर. धनतेरस और छोटी दीवाली बिना किसी अड़ंगे के निकल गई. आज दीवाली का मुख्य त्योहार था. रागिनी विवेक को सरप्राइज देना चाहती थी. वह लगभग 8 बजे औफिस से निकली और सीधे मार्केट गई. ज्वैलरी के शोरूम से विवेक के लिए सोने की चेन ली जो उस ने धनतेरस पर बुक करवाई थी और घर की तरफ गाड़ी घुमा ली.

घर पहुंचने से पहले ही न जाने क्यों किसी अनहोनी की आशंका से उस का दिल बैठने लगा. घर के बाहर शगुन का एक भी दीया नहीं जलाया था आज पूजा ने. घर का दरवाजा भी अंदर से बंद है. दीवाली के दिन तो पूजा घर का दरवाजा एक मिनट के लिए भी बंद नहीं करने देती थी. कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया…घबराई हुई रागिनी जोरजोर से दरवाजा पीटने लगी. दरवाजा कुछ देर में खुला. खुलते ही पूजा रोती हुई रागिनी से लिपट गई.

पूजा के आंसू और विवेक का हड़बड़ाहट में अपनी पैंट पहनते हुए घर से बाहर निकलना, वहां हुए हादसे को बयान करने के लिए काफी था. पत्थर हो गई रागिनी. उस ने तुरंत पूजा का हाथ थामा और निकल गई घर से. रात दोनों ने रोतेरोते विभाग के गैस्टहाउस में बिताई और सुबह होते ही दोनों जोधपुर के लिए निकल गईं.

पीछेपीछे विवेक भी आया था माफी मांगने, मगर रागिनी को अब ऐसे व्यक्ति का साथ कतई स्वीकार नहीं था जिस ने अपनी बहन जैसी साली पर बुरी नियत रखी. मम्मीपापा ने भी उस का ही साथ दिया और दोनों का रिश्ता बनने से पहले ही टूट गया.

आज उसे विशाल बहुत याद आ रहा था जो कालेज के समय से ही उसे बेहद पसंद करता था, उस से शादी करना चाहता था. धर्म के ठेकेदारों के हिसाब से वह छोटी जाति का था, इसलिए रागिनी की हिम्मत नहीं हुई थी उस का जिक्र अपने मम्मीपापा के सामने करने की. हां, पूजा जरूर सबकुछ जानती थी, विवेक से रिश्ता जुड़ने के बाद रागिनी अपने अनकहे प्यार को दिल के एक कोने में दफन कर के सिर्फ विवेक की हो कर रह गई थी.

एक ही विभाग और एक ही शहर होने के कारण रागिनी का विवेक से सामना होना लाजिमी था. उस ने फिर से कोशिश कर के अपना ट्रांसफर फलौदी करवा लिया. पूजा ने सारा कुसूर अपना मानते हुए कभी शादी न करने का रागिनी के साथ रहने की जिद पकड़ ली. मगर रागिनी नहीं चाहती थी कि उस की बहन की जिंदगी बरबाद हो. पिछले दिनों ही एक अच्छा सा लड़का देख मांपापा ने पूजा की शादी करवा दी.

इस दीवाली रागिनी बिलकुल अकेली थी. तन से भी और मन से भी…आज दीवाली का मुख्य त्योहार है. वह बुझे मन से अपनी ड्यूटी कर रही थी. हर बार की तरह आज भी रात 8 बजे वह एरिया के राउंड पर निकली तो अभ्यस्त सी गाड़ी खुदबखुद घर की तरफ मुड़ गई. यह क्या? घर के बाहर दीये किस ने जला दिए. घर का दरवाजा भी खुला हुआ था. दरवाजे पर खड़ी रागिनी पसोपेश में थी, तभी किसी ने पीछे से आ कर उसे बाहों में भर लिया, ‘‘दीवाली मुबारक हो, दीदी.’’

‘‘अरे, पूजा, तुम यहां? आने की खबर तो दी होती. मैं स्टेशन पर गाड़ी भेज देती.’’

‘‘तब यह खुशी कहां देखने को मिलती हमें, दीदी जो अभी आप के चेहरे पर दिखी है,’’ पूजा ने उस का चेहरा अपनी हथेलियों में थामते हुए कहा. पूजा के पति ने झुक कर रागिनी के पांव छू लिए.

‘‘और हां, हम सब ने तय किया है कि अब से आने वाली हर दीवाली हम सब साथसाथ मनाएंगे हमेशा की तरह, पूजा फिर से अपनी बहन से लिपट गई.’’

‘‘अरे भई, और भी बहुत से लोग आए हैं.’’ पीछे से मांपापा की आवाज आई तो रागिनी ने मुड़ कर देखा. मां के पीछे खड़ा विशाल शरारत से मुसकरा रहा था. मां ने रागिनी का हाथ विशाल के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘‘हमें पूजा ने सबकुछ बता दिया है. तुम दोनों को दीवाली बहुतबहुत मुबारक हो.’’ यह सुन कर रागिनी की पलकें शर्म से झुक गईं.

घरों की मुंडेरों और छज्जों पर जगमगाते दीपकों के साथ रागिनी के भीतर भी खुशी की लौ झिलमिलाने लगी.

‘‘चलो, चलो, जल्दी से खाना लगा लें, फिर आतिशबाजी करेंगे. दीदी को वापस ड्यूटी पर भी तो जाना है,’’ पूजा ने कहा तो सब मुसकरा उठे. रागिनी मां के कंधे पर सिर टिकाए घर के भीतर चल दी. सब से पीछे चल रहे पापा ने सब की नजर बचा कर अपने आंसू पोंछ लिए.

Diwali Special: दीवाली पर ऐसे दिखें स्टाइलिश

फेस्टिव सीजन यानी कलर, ब्राइटनेस और ऐनर्जी से भरपूर वह समय जब दिल और दिमाग एक अलग तरह की खुशी व उत्साह से सरोबार रहता है. फेस्टिवल में सिर्फ घर ही सजावट से नहीं चमचमाता, हम भी नए नए कपड़ों में सजधज कर हर्षोल्लास से त्योहार मनाते हैं. इस दीवाली ग्लैमर का तड़का लगाना और दूसरों से अलग दिखना है तो ध्यान रखिए निम्न बातों का.

– दीवाली के दिन आप चटक व भड़कीले रंग जैसे रौयल ब्लू, पैरट ग्रीन, गहरे मरून, लाल और गहरे गुलाबी रंग के परिधान पहन सकती हैं.

– ब्लिंग या चमकीले कुर्ती के साथ आप चूड़ीदार पहन सकती हैं और बांधनी दुपट्टा ले सकती हैं, हल्के मेकअप के साथ कानों में बड़े झुमके पहन सकती हैं.

– फ्यूजन (भारतीय-पश्चिमी) लुक के लिए ब्लिंग टाप के साथ आप प्रिंटेड सिल्क स्कर्ट पहन सकती हैं, या चाहें तो दुपट्टा भी ले सकती हैं.

– परंपरागत परिधान के साथ वेस्टर्न लुक के लिए आप लंबा गाउन और मंगलापुरी ड्रेस आजमा सकती हैं, इसके साथ झुमका और रस्टिक सिल्वर नेकपीस पहनें.

– ब्राइडल ड्रेस में कुछ आसान से बदलाव के साथ आप इसे फिर से पहन सकती हैं.

– प्लेन जार्जेट या शिफान साड़ी के साथ कंट्रास्ट कलर का ब्लाउज पहनें. यह भारी काम वाले ब्लाउज पहनने पर आपके लुक को बैलेंस करेगा. अगर आप चोली पहन रही हैं तो उसके साथ दिन या शाम के फंक्शन के लिए साथ जार्जेट या शिफान की चौड़े बौर्डर वाली साड़ी पहनें.

– एक्सेसरी के तौर पर पार्टी क्लच लेना नहीं भूलें.

– दुपट्टे के सिपंल बार्डर वाले सिंपल सूट के ऊपर लिया जा सकता है, साथ में क्लासिक रिस्ट वाच और क्लच लें. दुपट्टे को प्लाजो पैंट्स के साथ भी कैरी कर सकती हैं.

– लंहगे को आप प्लेन रौ सिल्क ब्लाउड या अलग रंग की चोली के साथ पहन सकती हैं. लंहगे के ऊपर कम कढ़ाई वाला दुपट्टा ओढ़ें. कम गहने पहनें और कंप्लीट लुक के लिए पार्टी क्लच कैरी करें.

– ऊपर और अंदर की तरफ की लैशलाइन पर ब्लू काजल लगाएं और आईशैडो बिल्कुल नहीं लगाएं, लेकिन आप स्मज प्रूफ काजल लगा सकती हैं जो उमस के मौसम में नहीं फैले.

– नैचुरल लुक के लिए गालों पर पीच रंग का ब्लश लगाएं और गुलाबी रंग का ब्लश लगाने से बचें.

– अच्छे रंग की लिपस्टिक लगाना नहीं भूलें, आप चाहें तो न्यूड शेड की लिपस्टिक लगा सकती हैं. होंठ अगर रूखे या फट गए हैं तो पहले बाम लगा लें. ज्यादा देर तक रंग लिपस्टिक को होठों पर बरकरार रखने के लिए लिप ग्लास लगाएं. मैट औरेंज या हल्के गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगाएं.

बुड्ढा कहीं का: शीतला सहाय को कैसे हुआ बुढ़ापे का एहसास

फब्तियां कसते लड़के इस प्रतीक्षा में थे कि उन का भी नंबर लग जाए. सास की उम्र वाली औरतें अपने को बिना कारण व्यस्त दिखाने में लगी थीं. बिना पूछे हर अवसर पर अपनी राय देते रहना भी तो एक अच्छा काम माना जाता है. ‘‘चलोचलो, गानाबजाना करो. ढोलक कहां है? और हारमोनियम कल वापस भी तो करना है,’’ सास का ताज पहने चंद्रमुखी ने शोर से ऊपर अपनी आवाज को उठा कर सब को निमंत्रण दिया. स्वर में उत्साह था.

‘‘हांहां, चलो. भाभी से गाना गवाएंगे और उन का नाच भी देखेंगे,’’ चेतना ने शरारत से भाभी का कंधा पकड़ा.

शिप्रा लजा कर अपने अंदर सिमट गई.

तुरंत ही लड़कियों व कुछ दूसरी औरतों ने शिप्रा के चारों ओर घेरा डाल दिया. बड़ी उम्र की महिलाओं ने पीछे सोफे या कुरसियों पर बैठना पसंद किया. युवकों को इस मजलिस से बाहर हो जाने का आदेश मिला पर वे किसी न किसी तरह घुसपैठ कर रहे थे.

शादी के इस शरारती माहौल में यह सब जायज था. अब रह गए घर के कुछ बुड्ढे जिन्हें बाहर पंडाल में बैठने को कहा गया. दरअसल, हर घर में वृद्धों को व्यर्थ सामान का सम्मान मिलता है. वे मनोरंजन का साधन तो होते हैं लेकिन मनोरंजन में शामिल नहीं किए जाते.

गानाबजाना शुरू हो गया. कुछ लड़कियों को नाचने के लिए ललकारा गया. हंसीमजाक के फव्वारे छूटने लगे. छोटीछोटी बातों पर हंसी छूट रही थी. सब को बहुत मजा आ रहा था.

पंडाल में केवल 4 वृद्ध बैठे थे. आपस में अपनीअपनी जवानी के दिनों का बखान कर रहे थे. जब अपनी पत्नियों का जिक्र करते तो खुसरपुसर कर के बोलते थे. हां, बातें करते समय भी उन का एक कान, अंदर क्या चल रहा है, कौन गा रहा है या कौन नाच रहा होगा, सुनने को चौकस रहता.

‘‘क्या जीजाजी,’’ रंजन प्रसाद ने मुंह के दांत ठीक बिठाते हुए कहा, ‘‘आप का घर है. रौनक आप के कारण है लेकिन आप को सड़े आम की तरह बाहर फेंक दिया गया है. चलिए, अंदर हमला करते हैं.’’

‘‘साले साहब, यह सब तुम्हारी बहन की वजह से है. तुम तो उसे मेरी शादी से भी पहले से जानते हो. वैसे तुम क्यों नहीं पहल करते? दरवाजा खुला है,’’ शीतला सहाय ने साले को चुनौती दी.

‘‘2-4 बातें सुनवानी हैं क्या? अपनी बहन से तो निबट लूंगा लेकिन अपनी पत्नी से कैसे पार पाऊंगा? मुंह नोच लेती है,’’ रंजन प्रसाद ने मुंह लटका कर कहा.

‘‘यार, हम दोनों एक ही किश्ती पर सवार हैं,’’ शीतला सहाय ने मुसकरा कर कहा, ‘‘याद है तुम्हारी शादी में तो मुजरा भी हुआ था. बंदोबस्त क्यों नहीं करते?’’

‘‘क्यों जले पर नमक छिड़कते हो, जीजाजी,’’ रंजन प्रसाद ने आह भर कर फिर से दांत ठीक किए और कहा, ‘‘मैं जा रहा हूं सोने. पता नहीं आप ने कचौडि़यों में क्या भरवाया था. अभी तक पेट नहीं संभला है.’’

‘‘अपनी बहन चंद्रमुखी से क्यों नहीं पूछते?’’ शीतला सहाय ने प्रहार किया, ‘‘हलवाई तो उस की पसंद का मायके से आया है.’’

रंजन प्रसाद खीसें निपोर कर चल दिए. शीतला सहाय ने देखा, बाकी के दोनों वृद्ध मुंह खोल कर खर्राटे भर रहे थे. उन्हें सोता देख कर एक गहरी सांस ली और सोचने लगे अब क्या करूं? मन नहीं माना तो खुले दरवाजे से अंदर झांकने लगे.

पड़ोस की लड़की महिमा फिल्मी गानों पर नाचने के लिए मशहूर थी. जहां भी जाती थी महफिल में जान आ जाती थी. महिमा के साथ एक और लड़की करिश्मा भी नाच रही थी. बहुत अच्छा लग रहा था. पास ही एक खाली कुरसी पर शीतला सहाय बैठ गए.

‘‘यहां क्या कर रहे हो?’’ चंद्रमुखी ने झाड़ लगाई, ‘‘कुछ मानमर्यादा का भी ध्यान है? बहू क्या सोचेगी?’’

शीतला सहाय ने झिड़क कर पूछा, ‘‘तो जाऊं कहां? क्या अपने घर में भी आराम से नहीं बैठ सकता? क्या बेकार की बात करती हो.’’ रंजन प्रसाद की पत्नी कलावती ने चुटकी ले कर कहा, ‘‘जीजाजी, बाहर घूम आइए. यहां तो हम औरतों का राज है.’’

कुछ औरतों को हंसी आ गई.

मुंह लटका कर शीतला सहाय ने कहा, ‘‘क्या करूं, साले साहब की तरह प्रशिक्षित नहीं हूं न. ठीक है, जाता हूं.’’

लगता है कहीं घूम कर आना ही होगा? शीतला सहाय अभी सोच ही रहे थे कि उन को अचानक अपने पुराने मित्र काशीराम का ध्यान आया. शादी का निमंत्रण उसे भेजा था लेकिन किसी कारणवश नहीं आया था. कोरियर से 50 रुपए का चेक भेज दिया था. शिकायत तो करनी थी सो यह समय ठीक ही था.

शीतला सहाय ने आटोरिकशा में बैठना छोड़ दिया था क्योंकि दिल्ली की सड़कों पर आटो बहुत उछलता है. हर झटके पर लगता है कि शरीर के किसी अंग की एक हड्डी और टूट गई. मजबूरन बस की सवारी करनी पड़ती थी. बस स्टाप पर खड़े हो कर 561 नंबर की बस की प्रतीक्षा करने लगे जो काशीराम के घर के पास ही रुकती थी.

बस आई तो पूरी भरी हुई थी. बड़ी मुश्किल से अंदर घुसे. आगेपीछे से धक्के लग रहे थे. अपने को संभालने के लिए उन्होंने एक सीट को पकड़ लिया. दुर्भाग्य से उस सीट पर एक अधेड़ महिला बैठी हुई थी. उस के सिर पर कटोरीनुमा एक ऊंचा जूड़ा था. बस के हिलने पर शीतला सहाय का हाथ उस के जूड़े से लग जाता था. बहुत कोशिश कर रहे थे कि ऐसा न हो, लेकिन ऐसा न चाहते हुए भी हो रहा था.

अंत में झल्ला कर उस महिला ने कहा, ‘‘भाई साहब, जरा ठीक से खड़े रहिए न.’’

‘‘ठीक तो खड़ा हूं,’’ शीतला सहाय बड़बड़ाए.

‘‘क्या ठीक खड़े हैं. बारबार हाथ मार रहे हैं. उम्र का लिहाज कीजिए. शरम नहीं आती आप को,’’ महिला ने एक सांस में कह डाला.

‘‘क्या हो गया?’’ आगेपीछे बैठे   लोगों की उत्सुकता जागी.

‘‘कुछ नहीं. इन से ठीक से खड़े होने को कह रही हूं,’’ महिला ने रौब से कहा.

मर्दों को हंसी आ गई.

महिला के पास बैठी युवती ने कहा, ‘‘जाने दीजिए आंटी, क्यों मुंह लगती हैं. सारे मर्द एक से होते हैं.’’

महिला मुंह बना कर चुप हो गई.

अगले स्टाप पर बहुत से लोग उतर गए. खाली सीटों पर खड़े हुए यात्री झपट्टा मार कर बैठ गए. शीतला सहाय को कोई अवसर नहीं मिला. मन ही मन सोच रहे थे, उन के बुढ़ापे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. कहां गई भारतीय शिष्टता, संस्कृति और संस्कार? लाचार और विवश खड़े रहे. टांगें जवाब दे रही थीं.

यह स्टाप शायद किसी कालिज के पास का था. धड़धड़ा कर 10-15 लड़कियां अंदर घुस आईं. उन के हंसने और किलकारी मारने से लग रहा था कि 100-200 चिडि़यां एकसाथ चहचहा रही हों. शीतला सहाय लड़कियों के बीच घिर गए.

बस एक झटके के साथ चल पड़ी. खड़े लोगों में कोई आगे गिरा तो कोई पीछे लेकिन अधिकतर संभल गए. रोज की आदत थी. शीतला सहाय ने गिरने से बचने के लिए आगे कुछ भी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो एक लड़की का कंधा हाथ में आ गया.

‘‘अंकल, ये क्या कर रहे हैं?’’ लड़की ने तीखे स्वर में कहा.

‘‘माफ करना, बेटी, मैं गिर गया था,’’ शीतला सहाय ने खेद प्रकट किया.

‘‘आप जैसे बूढ़े लोगों को मैं अच्छी तरह पहचानती हूं,’’ लड़की ने क्रोध से कहा, ‘‘मुंह से बेटीबेटी कहते हैं पर मन में कुछ और होता है. रोज आप जैसे लोगों से पाला पड़ता है. मेहरबानी कर के दूर खड़े रहिए.’’

‘‘क्या हुआ, जुगनी? क्यों झगड़ रही है?’’ दूसरी लड़की ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, अंकलजी धक्का दे रहे थे. मैं जरा इन्हें सबक सिखा रही थी,’’ जुगनी ने ढिठाई से कहा.

‘‘लगता है अंकलजी के घर में बेटियां नहीं हैं,’’ तीसरी लड़की ने अपना योगदान दिया.

पीछे से एक और लड़की ने फुसफुसा कर कहा, ‘‘बुड्ढा बड़ा रंगीन मिजाज का लगता है.’’ इस पर सारी लड़कियां फुल- झडि़यों की तरह खिलखिला कर हंस दीं.

शीतला सहाय शरम से पानीपानी हो गए. उन्होंने मन ही मन प्रण किया कि अब कभी बस में नहीं बैठेंगे.

शीतला सहाय की असहाय स्थिति को देखते हुए एक वृद्ध महिला ने कहा, ‘‘भाई साहब, आप यहां बैठ जाइए. मैं अगले स्टाप पर उतर जाऊंगी.’’

‘‘अंकलजी को आंटीजी मिल गईं,’’ किसी लड़की ने धीरे से हंसते हुए कहा.

एक और हंसी का फव्वारा.

‘‘नहींनहीं, आप बैठी रहिए. मैं भी उतरने ही वाला हूं,’’ शीतला सहाय ने झूठ कहा.

लड़कियों ने शरारत से खखारा.

वृद्घा ने क्रोध से लड़कियों को देखा और कहा, ‘‘क्या तुम्हारे मांबाप ने यही शिक्षा दी है कि बड़ों का अनादर करो? शरम करो.’’

अचानक बस में शांति छा गई.

अगले स्टाप पर वृद्धा उतर गईं और शीतला सहाय ने बैठ कर गहरी सांस ली. बस अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रही थी. बस धीरेधीरे खाली होती जा रही थी.

जैसे ही बस रुकी किसी ने शीतला सहाय के कंधे को छुआ और कहा, ‘‘सौरी, अंकल.’’

शीतला सहाय ने नजर उठा कर देखा तो वही लड़की थी जो उन से झगड़ रही थी.

क्षीण मुसकान से कहा, ‘‘कोई बात नहीं, बेटी.’’

लड़की जल्दी से उतर कर चली गई. उस ने पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा. धीरेधीरे चलते हुए शीतला सहाय जब काशीराम के घर तक पहुंचे तो अपने दोस्त को बाहर टहलते हुए पाया.

अपने पुराने अंदाज से हंसी का ठहाका लगाते हुए दोनों गले मिले.

‘‘क्या बात है, उर्मिला ने घर से बाहर निकाल दिया?’’ शीतला सहाय ने छेड़ते हुए पूछा.

‘‘यही समझो, यार. प्रमिला ससुराल से आई है, सो उर्मिला ने कीर्तन मंडली बुला ली. अंदर औरतों का कीर्तन चल रहा है और मुझे अंदर बैठने की आज्ञा नहीं,’’ काशीराम ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘अपने ही घर में अब्दुल्ला बेगाना.’’

‘‘हाहाहा,’’ शीतला सहाय ने ठठा कर हंसते हुए कहा, ‘‘तो यह बात है.’’

‘‘यह तो नहीं पूछूंगा कि क्यों आए हो लेकिन फिर भी शंका समाधान तो करना ही पड़ेगा,’’ काशीराम ने शीतला सहाय के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा.

‘‘यार, मेरी हालत भी कुछ तुम्हारे जैसी ही है. सब लोग नाचगा रहे हैं. मस्ती कर रहे हैं. मेरा भी मन किया कि जवानों के साथ बैठ कर तबीयत बहला लूं, लेकिन उन की दुनिया में बुड्ढों के लिए कोई जगह नहीं है,’’ शीतला सहाय ने ठंडी सास छोड़ी, ‘‘बस, घर से बाहर कर दिया.’’

शीतला सहाय ने अपने मित्र को बस में उन के साथ जो कुछ हुआ नहीं बताया क्योंकि उन्हें बुढ़ापे पर तरस आ रहा था. थोड़ी देर गप्पें मार कर उन्होंने घर का रास्ता नापा. मन हलका हो गया. बस यहीं से चलती थी सो बैठने की जगह मिल गई और वह अब की बार बिना हादसे के घर पहुंच गए.

उन्हें देखते ही बहुत लोगों ने घेर लिया मानो एक बिछुड़ा हुआ आदमी बहुत दिनों बाद मिला था.

‘‘बाबा को देखो. कितने खुश हैं. जरूर काशी अंकल से मिल कर आए होंगे,’’ निक्की ने छेड़ा.

‘‘यहां से जाते समय कितने बुड्ढे लग रहे थे. अब देखो एकदम जवान लग रहे हैं.’’

रोशन ने पूछा, ‘‘ये काशी अंकल आप को कौन सी घुट्टी पिलाते हैं?’’

शीतला सहाय हंस दिए, ‘‘कम से कम एक आदमी तो है जो बुड्ढे का बुढ़ापा भुला देता है. तुम लोग तो हमेशा मुझ से दूर रहने की कोशिश करते हो और हमेशा मेरी उम्र मुझे याद दिलाते रहते हो.’’

‘‘ठीक तो है, आदमी की उम्र उतनी ही होती है जितनी कि वह महसूस करता है. चलो, गरमगरम कचौडि़यां और ठंडी रसमलाई आप का इंतजार कर रही है,’’ रंजन प्रसाद ने कहा और शीतला सहाय का हाथ पकड़ लिया.

नशा: क्या रेखा अपना जीवन संवार पाई

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YRKKH Twist: अभिमन्यु का हुआ एक्सीडेंट, उजड़ जाएगी अक्षरा की जिंदगी

टीवी सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ आज भी दर्शकों के बीच छाया हुआ है. इसकी खासी पॉपुलैरिटी की वजह से कई सालों से ये टीवी सीरियल टीआरपी में आगे बना हुआ है. हर्षद चौपड़ा और प्रणाली राठौड़ स्टारर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में इन दिनों काफी हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिल रहा है, शो में जल्द ही लीप आने वाला है. हालांकि इससे पहले मेकर्स कई सारे नए ट्विस्ट लेकर आने वाले है. इस सीरियल में हर्षद चौपड़ा और प्रणाली राठौड़ लीड रोल निभा रहे है. प्रणाली अक्षरा के किरदार में टेलीविजन पर छाई हुई हैं. इसी के साथ हर्षद चौपड़ा ने भी दर्शकों का दिल जीता है. वहीं इस शो का प्रोमो आया है सामने. एक पल में उजड़ जाएगी अक्षरा की जिंदगी.

नहीं होगी अक्षरा और अभिमन्यु की शादी

हर्षद चौपड़ा और प्रणाली राठौड़ स्टारर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ का प्रोमो सामने आ चुका है. प्रोमो की शुरुआत में अक्षरा- अभिमन्यु को वीडियो कॉल करती है. वह पूछती है, तुम लोग कहां हो?  इसके जवाब में अभिमन्यु कहता है कि, हम बस 15 मिनट में पहुंच जाएंगे. वहीं अबीर कहता है कि, हां मम्मा. आज आपकी शादी है. इस बात पर अक्षरा कहती है ‘शादी के बच्चे’! डैडा को ठीक से गाड़ी चलाने दो. वहीं 15 मिनट से 1 घंटा हो जाता है लेकिन अभिमन्यु और अबीर मंदिर नहीं पहुंचते है. ऐसे में पडित जी, अक्षरा से पूछते है ये लोग कहां रह गए. अक्षरा घबरा जाती है तभी पंडित जी बताते हैं कि घाटी वाले रास्ते में लैंड स्लाइड हुई है.

दौड़ते-भागते पहुंची अक्षरा अस्पताल

पंडित जी के बात सुनकर अक्षरा भागते हुए अस्पताल पहुंचती है. अस्पताल में अक्षरा, लैंड स्लाइड की वजह से जान गवाने वाले व्यक्ति का शव देखकर टूट जाती है. कहा जा रहा है लीप आने से पहले अभिमन्यु के साथ-साथ अबीर की मौत हो जाएगी. वहीं लीप के बाद रूही और अभिरा( अक्षरा और अभिनव की बेटी) की कहानी दिखाई जाएगी.

बर्थडे पर Shahrukh Khan ने किया ट्वीट, बोले- यकीन नहीं होता कि…

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता शाहरुख खान का आज जन्मदिन है. 2 नंबर 1965 में दिल्ली में पैदा हुए शाहरुख. आज एक्टर अपना 58वा जन्मदिन मना रहे है. ‘पठान’ एक्टर सिर्फ बॉलीवुड में ही नहीं इनका डंका ग्लोबली बजता है और बर्ल्ड वाइड इनकी तगड़ी फैन फॉलोइंग है.  इस खास दिन पर शाहरुख खान हमेशा की तरह देर रात घर के बाहर मौजूद फैंस से रुबरु होते है. सोशल मीडिया पर एक्टर के फोटोज और वीडियो काफी वायरल हो रहे है. इसी के साथ शाहरुख खान ने ट्वीट करके अपने फैंस का शुक्रिया किया है.

शाहरुख खान का ट्वीट

अभिनेता शाहरुख खान ने सुबह के 3 बजकर 18 मिनट पर ट्वीट किया है और अपने फैंस के बर्थडे फिश के लिए धन्यवाद किया. शाहरुख ने लिखा है कि, ‘विश्वास नहीं होता कि आप में से इतने सारे लोग देर रात आकर मुझे बधाई दी है. मैं तो महज एक अभिनेता हूं. मुझे इससे ज्यादा कुछ भी और खुशी नहीं मिलती है कि मैं आपको थोड़ा बहुत मनोरंजन कर पाता हूं. मैं आपके प्यार को सपने में जीता हूं. मुझे आपका मनोरंजन करने देने के लिए आप सभी का धन्यवाद. आप सभी से सुबह मिलता हूं…ऑनस्क्रीन भी और ऑफस्क्रीन भी.’

 

डंकी का टीजर हो सकता है रिलीज

आपको बता दें, आज शाहरुख खान का 58वां जन्मदिन है इस मौके पर शाहरुख के मन्नत घर के बाहर फैंस की तादात में भीड इक्ट्ठा हो गई थी. यह दिन शाहरुख फैंस के बेहद खास है, वहीं सोशल मीडिया पर बीते 3 दिन से ही एक्टर से जुडे हैशटेग काफी ट्रेड कर रहे है. इसके साथ ही ये दिन उनके फैंस के लिए खास है, क्योंकि आज डंकी का टीजर रिलीज हो सकता है. वहीं पठान और जवान के बाद ये उम्मीद की जा रही है कि डंकी भी बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचेगी. दरअसल, डंकी की टीजर रिलीज हो चुका है, शाहरुख ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर जारी कर दिया है.

 

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Diwali Special: इस त्योहार घर पर बनाएं ये लजीज पकवान

त्योहारों का सीजन शुरु हो चुका है. त्योहारों पर मेहमानों का घर में आना भी स्वाभाविक सी बात है. मेहमानों के आने पर कुछ नया सा बनाने का मन करता है ताकि मेहमानों को कुछ स्पेशल सा फील हो. आज हम आपके लिए लेकर आए ये खास डिश की रेसिपी.

  1. बटर कुकीज

सामग्री

1. 60 ग्राम मक्खन

 2. 3/4 कप मैदा

 3. 1/4 कप कौर्न पाउडर

 4.  3 बड़े चम्मच चीनी पाउडर.

विधि

मक्खन और चीनी पाउडर मिला कर क्रीम बनाएं. इस में कौर्न पाउडर और मैदा मिलाएं. फिर बेल कर मनपसंद आकार में काट लें. गरम ओवन में 160 डिग्री पर 8-10 मिनट तक बेक करें.

2. पालक साबूदाने की टिक्की

सामग्री

1. 1 कप साबूदाना 

 2.  1 कप पालक बारीक कटा

 3. 1/2 कप मूंगफली का चूरा 

 4. 1/2 कप पनीर

 5.  2 उबले आलू 

 6.  2 हरीमिर्चें कटी

7.  1/2 चम्मच अदरक कसा 

8. तलने के लिए तेल 

9. नमक स्वादानुसार.

विधि

साबूदाने को 7-8 घंटों के लिए 1 कप पानी में भिगो दें. इस में पालक, हरीमिर्चें, मूंगफली का चूरा, पनीर और आलू कस कर तथा नमक अच्छी तरह मिला लें. इस की छोटीछोटी टिकियां बना लें. कड़ाही में तेल गरम कर धीमी आंच पर साबूदाने की टिकियां सुनहरा होने तक तल लें. चटनी या सौस के साथ गरमगरम परोसें.

3. फैस्टिव स्लाइस

सामग्री

1.  1 कप कंडैंस्ड मिल्क 

 2.  एकचौथाई कप मक्खन 

 3. 1/2 कप नारियल का पाउडर

4.  1 कप चौकलेट द्य  1/2 कप काजू, बादाम, पिस्ता कटे

5.  1 कप मीठे बिस्कुटों का चूरा.

विधि

एक कड़ाही में कंडैंस्ड मिल्क व मक्खन गरम कर बिस्कुटों का चूरा, नारियल का पाउडर और कटा मेवा डाल कर मिलाएं. पाई डिश में इसे सैट करें. डबल बौयलर में चौकलेट मैल्ट करें और इस में मक्खन मिलाएं. इस चौकलेट की सैट की डिश पर एक परत लगाएं. फ्रिज में ठंडा करें. टुकड़े काट कर सर्व करें.

4. ड्रमस्टिक लीव्स फ्रिटर्स

सामग्री

1.  1/2 कप ड्रमस्टिक लीव्स

 2.  1/2 कप चने की दाल

3.  2 बड़े चम्मच लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च कटी

 4. 1 प्याज कटा

5.  1 हरीमिर्च कटी

 6.  तलने के लिए तेल

7. नमक स्वादानुसार.

विधि

चने की दाल को 2-3 घंटों के लिए पानी में भिगो दें. फिर मिक्सी में पीस लें. इस में प्याज, हरीमिर्च, सभी शिमलामिर्च, ड्रमस्टिक लीव्स और नमक डाल कर अच्छी तरह फेंट कर इस के गरम तेल में छोटेछोटे पकौड़े तल चटनी के साथ गरमगरम परोसें.

कम सेक्स करना बन सकता है प्री मेनोपोज़ का कारण

सेक्स शादीशुदा लोगो के लिए उनके रिश्ते में मजबूती देने में एक अहम भूमिका निभाता है. यह हमारी पर्सनल लाइफ के साथ साथ शारारिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रखने में बेहद कारगर सिद्ध होता है लेकिन आज के समय का लाइफस्टाइल ऐसा हो गया है की लोग अपनी व्यस्तता के चलते सेक्स को  तवज्जो नहीं देती और सेक्स को सिर्फ वंश बढ़ाने का उद्देश्य मनने लगते हैं तो कुछ महिलएं  कामकाजी होने के कारण अपने काम को प्राथमिकता देना पसंद करती है और थकान के कारण सेक्स करने से बचने लगती हैं लेकिन एक स्टडी में पाया गया है की सेक्स हमारे काम करने की क्षमता को बढ़ता है और जो महिलाऐं सेक्स करने से बचती है उन में तनाव की बढ़ोतरी होती है देखा जाए तो पुरुष सेक्स के  मामले में महिलाओं से अधिक रूचि रखतें हैं और महिलाऐं कम अहमियत देती हैं इस  कारण महिलाओं में  मेनोपॉज़ की समस्या उम्र से पहले होने लगती है.

 मेनोपॉज़ होने का कारण

जिस तरह किशोरावस्था यानि  12 से 15  कि उम्र में  महिलाओं के पीरियड्स शुरू हो जाते हैं. पीरियड्स का होने  का संकेत है कि महिला के शरीर में हार्मोनल बदलाव होने लगे है और अब वह गर्भधारण करना चाहे  तो अब वह इस के लिए शारारिक रूप से तैयार होने लगी है लेकिन 45  कि उम्र के बाद महिलाओं में पीरियड्स बंद होने लगते है जिसे मेनोपोज़ कहा जाता है इसे रजोनिवृत्ति भी कहते हैं. लेकिन अब देखा जा रहा है कि जो महिलाएं सेक्सुअली कम एक्टिव होती हैं, उनको 35 की  उम्र में ही मेनोपोज़ कि समस्या का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि कम सेक्स करने के कारण उनका शरीर ओव्यूलेशन बंद करने के जल्दी संकेत देने लगता है, जिसके कारण उनका मेनोपॉज़ समय से पहले हो जाता है. सेक्स कि कमी के कारण प्रजनन की प्रक्रिया में कमी आने लगती है जिस कारण अंडों का बनना बंद होने लगता है , इसलिए ओवरी प्रजनन की क्षमता बिल्कुल खो देती है।और मेनोपॉज़ हो जाता है.

 जल्दी मेनोपोज़ बन सकता है समस्या

जनन शक्ति या गर्भ धारण की क्षमता खत्म हो जाती  है. खून में असंतुलन के कारण गर्मी लगती है, दिल तेज धड़कता है, रात में पसीना आता है, नींद नहीं आती है.  हड्डी कमजोर होने लगती है इसके कारण जोड़ों, पीठ और मांसपेशियों में दर्द का अनुभव होता है. तनाव, चिड़ाचिड़ापन, उदासी, कुछ भी न करने की इच्छा, याद न रहना, जैसी मानसिक समस्या भी होने लगती हैं

प्री मेनोपॉज  से बचाव है जरूरी

महिलाओं को शारारिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि  हफ़्ते में एक बार सेक्स अवश्य करें , ऐसा करने से उनमें मेनोपॉज़ होने की संभावना, उन महिलाओं की तुलना में 28% कम होता है, जो महिलाएं महीने में एक बार सेक्स करती हैं.

शारारिक व मानसिक रूप  से स्वस्थ रहने के लिए सेक्स एक अहम रोल अदा  करता है यह सिर्फ मेनोपोज़ से ही नहीं बल्कि आपको फिट और हेल्दी रखने में भी मदद करता है साथ ही आपके रिश्ते को मजबूती भी देता

मेरे पति नसबंदी कराना चाहते हैं, इसका वैवाहिक जीवन पर कोई असर तो नहीं होगा?

सवाल

मैं 29 वर्षीय और 2 बच्चों की मां हूं. हम आगे बच्चा नहीं चाहते और इस के लिए मेरे पति स्वयं पुरुष नसबंदी कराना चाहते हैं. कृपया बताएं कि इस से वैवाहिक जीवन पर कोई असर तो नहीं होगा?

जवाब

आज जबकि सरकारें पुरुष नसबंदी को प्रोत्साहन दे रही हैं, आप के पति का इस के लिए स्वयं पहल करना काफी सुखद है. आमतौर पर पुरुष नसबंदी को ले कर समाज में अफवाहें ज्यादा हैं. आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि भारत में पुरुष नसबंदी कराने वालों का प्रतिशत काफी निराशाजनक है.

दरअसल, पुरुष नसबंदी अथवा वासेक्टोमी पुरुषों के लिए सर्जरी द्वारा परिवार नियोजन की एक प्रक्रिया है. इस क्रिया से पुरुषों की शुक्रवाहक नलिका अवरुद्ध यानी बंद कर दी जाती है ताकि शुक्राणु वीर्य (स्पर्म) के साथ पुरुष अंग तक नहीं पहुंच सकें.

यह बेहद ही आसान व कम खर्च में संपन्न होने वाली सर्जरी है, जिस में सर्जरी के 2-3 दिनों बाद ही पुरुष सामान्य कामकाज कर सकता है. सरकारी अस्पतालों में तो यह सर्जरी मुफ्त की जाती है. अपने मन से किसी भी तरह का भय निकाल दें और पति के इस निर्णय का स्वागत करें.

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मैं 26 वर्षीय युवती हूं. मेरा एक बौयफ्रैंड है, जिसे मैं बेहद पसंद करती हूं. एकांत में वह मेरी ब्रैस्ट को सहलाना चाहता है. मेरे ब्रैस्ट सामान्य से बड़ी है और मैं ने सुना है कि शादी से पहले ब्रैस्ट दबाने अथवा सहलाने से वह बड़ी हो जाती है. मुझे डर है कि यह बेडौल न हो जाए. इसी डर से जब मैं बौयफ्रैंड को मना करती हूं, तो वह नाराज हो जाता है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

सैक्स से जुड़े मिथकों में यह भी एक आम मिथक है कि ब्रैस्ट को दबाने, सहलाने व चूमने आदि से वह बड़ी होती है. वास्तव में सैक्स के दौरान फोरप्ले में ब्रैस्ट को छूने, सहलाने से वे कड़े जरूर हो जाते हैं और आमतौर पर ऐसा उत्तेजना की वजह से और ब्रैस्ट की नसों में रक्तसंचार बढ़ने की वजह से होता है.

ब्रैस्ट इंप्लांट के अलावा ऐसा कोई जरीया नहीं है जिस से ब्रैस्ट का साइज बड़ा हो जाए. हां, नियमित ऐक्सरसाइज से बौडी को सही शेप जरूर मिलती है पर ब्रैस्ट बड़ी नहीं होती. वह आकर्षक जरूर दिखने लगती है. अत: बौयफ्रैंड को केवल इस वजह से मना न करें और अपने मन से यह भय निकाल दें.

यह कैसा प्रेम- भाग 1 : आलिया से क्यों प्यार करता था वह

वह मुझ से प्रेम करती थी, अगाध प्रेम. जैसा एक स्त्री एक पुरुष से करती है. और हम दोनों ही जानेअनजाने पगलाए रहते हैं. प्रेम में डूबे रहते हैं. सुधबुध सब खो बैठते हैं. दुनियाजहान से अलग कर लेते हैं. बिलकुल वैसा ही प्रेम वह मुझ से करती थी. उस के प्रेम में लेशमात्र भी बनावटीपन न था. न दिखावा, न आग्रह, न संकोच. बस, कभीकभार रूठ जाया करती उतनी देर, जब तक मैं जीभर लाड़मनुहार कर उसे मना न लूं. उस के बाद तो उस का प्रेम और परवान चढ़ जाया करता. जैसे कोई लता वृक्ष की आगोश में समा जाती है, बिलकुल वैसे ही उस की भावनाएं मुझ में समा जातीं.

वह खुद को मुझ में तलाशती और जब पा लेती तो चहक उठती. न पाने पर उदास हो जाती, यह सोचती कि मुझे उस की परवा नहीं.

मैं सब समझती रही और आनंद से अंतस को भिगोती रही. धीरेधीरे उस का मुझ में इस कदर आसक्त होना मुझे अच्छा लगने लगा था. उस की कमी खलने लगी थी. उस से मिलने को, बातें करने को मन करता और फिर फोन पर आवाज सुनते ही चंद मिनटों मे ही मन खिल जाता, ऐसा सब से पहले उस ने ही मुझे बताया था. उस के बाद मुझे भी वही लगने लगा.

धीरेधीरे ही सही, प्रगाढ़ता बढ़ती गई. इस प्रगाढ़ता का समय के साथ सुद्रढ़ हो जाना उसी तरह था जैसा दो लताओं का परस्पर आपस में एक हो जाना और जीवनपर्यंत उसी तरह से समाहित रहना. जलजला, विशालकाय वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकता है, मगर लिपटी हुई लताओं को छू भी नहीं पाता.

भले ही आधुनिक युग में युवावर्ग कुछ तंग शब्द ले कर आया हो जिस में से लैसबियन जैसे शब्द हैं, जो प्रेम को अलग ही तरह से मापते हैं, जबकि उस समय इन शब्दों की, इन के मानों की कोई जगह न थी. दो व्यक्तियों का आत्मसात होना शुद्ध प्रेम का सूचक होता था.

वह हमेशा मुझे मरमिटने वाली शेरोशायरी से भरे खत लिखती. उन में उस की दिनचर्या का ब्योरा होता, जो उस की भीतरी विकलताओं की हलचल समेटे होता.  कुछ सवाल होते जो रोज ही पूछे जाते थे और फिर जवाब का इंतजार भी उसी शिद्दत से करती जैसे व्याकुलता की पोटली बगल में दबाए बैठी हो. मैं ने भी उस के सौम्य प्रेम को बड़े आदर से लिया और यह जताया भी कि मैं भी उस की परवा करती हूं, उसे याद करती हूं. नितांत शांत दिखने वाला मेरा व्यक्तित्व उस की उपेक्षा करने में असमर्थ था. मगर हां, मैं खत लिखने में थोड़ी ढीली जरूर थी. इस की शिकायत करने से वह कभी नहीं चूकती थी. तब मेरे मन के स्वर्णपुष्प कुम्हलाने लगते. मुझे एहसास होता कि अगर रोपे गए पौधे को खादपानी न दिया जाए तो वे मुरझा कर पीले पड़ जाते हैं और एक दिन टहनी से अलग हो कर झड़ जाते हैं.

फोन पर बात करना और खतों को पढ़ने का मिठैला एहसास,  इन दोनों ही चीजों का फर्क हम दोनों ही बखूबी समझते थे.

न जाने क्यों अपनी तारीफ सुन कर चहकने, इतराने के बजाय वह खामोशी अख्तियार कर लेती. बावजूद इस के, उस के खतों में ज्यादातर मेरी तारीफों के कसीदे गढ़े होते और यह भी ‘अगर ऐसा हो जाए तो कैसा रहे? वैसा हो जाए तो कैसा रहे?’ हम साथसाथ रहें?’  फिर वह संजीदा हो कर कह उठती- ‘बस, तुम दूर जाने की बात न किया करो, दी.’

दी, शब्द में एक अलग सा ठहराव होता है. एक ऐसा एहसास जो मुझ जैसी अंतर्मुखी, स्वभाव में सिमटी, तथाकथित दुर्लभ वस्तु की तरह मैं के लिए बड़ा ही खास था.

उस रोज़ लिखतेलिखते उस की याद काले, घटाघोर मेघों की तरह उमड़ पड़ी. तब मैं इतनी भावविभोर हो उठी कि मुझ से रहा न गया. आओ चलें प्रेमांजलिभर बगीचे की सैर कर लो, ह्रदय का आदेश था और  मैं ने तुरंत लैंडलाइन से फोन मिला लिया.

तब काले और बड़े वाले फोन हुआ करते थे जो अपनी जगह पर स्थाई रहा करते थे और एक जगह रखे रहते थे. उन्हें लगवाने के लिए लंबीलंबी तारें खिंचवाई जाती थीं. उस वक्त मोबाइल, इंटरनैट जैसी सुविधाएं थीं ही नहीं. फोन भी सीधे मिलाना संभव न था. पहले दूरसंचार विभाग को फोन मिलाओ, उसे  बताओ कौन सा नंबर चाहिए? फिर वह नंबर मिला कर देता था. तब जा कर बात हो पाती थी. उस पर भी एक भय, विभाग कर्मचारी उन की बातचीत को सुन न ले. शायद वह भी लाइन पर बन रहता था. ऐसा अनुमान था. फिर यह भी, वे लोग रोज हजारों फोन मिलाते होंगे, मुठठीभर कर्मचारी सब की बातें कहां तक और कब तक सुनेंगे?

जैसे ही मैं ने ‘हैलो’ कहा, उधर से मधुर आवाज कानों से टकराई. वह एक गीत गा रही थी जिस ने मेरे दिल को गहरे तक छू लिया. फिल्म ‘कभी-कभी’ का वह गीत आज भी मेरे जेहन में बिलकुल वैसा ही गूंजता है जैसा उस वक्त गूंजा था. गीत तो मुझे केंद्रित कर के गाया ही गया था, इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण था उस का डूब कर उस में विलीन हो जाना. वह गीत था- ‘दिल आने की बात है जब कोई लग जाए प्यारा, दिल पर किस का जोर है यारो, दिल के आगे हर कोई हारा…’ वह खो गई थी. वह चाहती थी मैं इसे सुनूं और जो वह कहना चाहती है, वह समझ सकूं. यह मजाक नहीं था. वह पहले हंसी, फिर अचानक भावुक हो कर रो पड़ी थी, अगले ही पल संभल गई और खूबसूरती से बात को भी संभाल लिया.

धीरेधीरे वह मुझ में शक्कर की तरह घुलती जा रही थी, जिस का पता मुझे बाद में लगा था.

मुझे नहीं पता था, यह गीत इतना सुंदर है. उस दिन के बाद से आज तक यह गीत मेरी प्रिय सूची में रहा है.

वह उम्र में मुझ से छोटी थी, इसलिए हमेशा कहती तो ‘दी’ थी मगर जान प्रेमियों जैसे दिया करती थी. शायद, वह मेरे लिए पहाड़ से भी कूद जाती. सवाल जो आज तक कौँधते हैं वे ये हैं कि क्यों करती थी वह इतना प्रेम एक स्त्री से? पुरुष से क्यों नहीं? उस ने मुझ में ऐसा क्या देखा होगा? क्या पाती है वह मुझ में? लेकिन फिर भी, मैं ने कभी उस से पूछा नहीं.

उस का नाम था आलिया. बेहद खूबसूरत और संजीदा किस्म की लड़की थी वह. यह बात मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि वह भावुक तो थी ही, ईमानदार भी थी, क्योंकि हमारी पहली मुलाकात का किस्सा इस बात का प्रमाण है. वह मुलाकात बेहद रोचक थी. मुझे लेखन का शौक था, इस के लिए मैं हमेशा एकांत और शांत जगह तलाशती थी जहां दूरदूर तक कोई न हो. भीड़भाड़ से कोसों दूर जहां, बस, पंक्षियों का कलरव हो, हवाओं का संगीत हो, जहां भावों को प्रकृति से जोड़ा जा सके, हरियाली से रस चुराया जा सके और अनुभूति स्पंदन कर सकें.

ऐसे में मैदानी इलाकों को छोड़, मैं अकसर छुट्टियां पहाड़ों पर बिताती. कईकई दिन अकेले रह कर जब वापस लौटती तब दिल में सुकून होता और कागज भरे हुए. उस वक्त आज की तरह लैपटौप या कंप्यूटर नहीं होते थे. इन भरे हुए कागजों में मेरी जान होती, मेरी अमानत होती जिन्हें बड़ा ही संभाल कर रखा जाता. कई उपन्यास, कहानी यों ही रची जाती रहीं.

बेशक शुरुआती दौर में वह मेरे लिए एक कहानी का मसाला भर थी, मगर वह विचार चंद दिन ही ठहर सका. उस के बाद तो हमारा रिश्ता एक फुलवारी की तरह महकने लगा था जिस में पूरा गुलशन समाया हुआ था. उस की बेपरवाह महक हमारे चाहने न चाहने की परवा किए बगैर हर समय हमारे इर्दगिर्द बनी रहती.

बात उन दिनों की है जब मैं शिमला के एक होटल में ठहरी हुई थी. उस रोज मौसम बड़ा खराब हो गया था. आमतौर पर उसे खराब ही माना जाएगा, तेज बारिश जो रुकने का नाम ही न ले रही थी. मेघों की गरज ऐसी कि कलेजा निकाल कर रख दे. दिन में रात जैसा अंधकार और रहरह कर आसमानी बिजली का कड़कना, निश्चिततौर पर भयभीत कर देने वाला था. मगर मेरे लिए वह ऊर्जा का स्रोत था. कुछ रचने का सुअवसर था. तमाम नई कोंपलें फूटने को उद्धत हो रही थीं. जब कोई अंकुर पल्लवित होता है तो बड़ा ही बेपरवाह होता है. सीमाओं से उनमुक्त होता है. धरती का सीना चीर कर रास्तें बना लेता है और फिर नवसृजना की महक से, मन हिलोरे मारता है. संतुष्टि पांव पसार लेती है. मन ही कहां, अंतस भी तो भीगता है. भीगने से मतलब उल्लास से है, जो हर्ष की अनुभूति देता है. ऐसी ही तृप्त ऋतु में  मैं डूबी हुई थी.

कल्पनाओं ने अपना तिलिस्म फैला लिया था एक खूबसूरत से ख्वाब की तरह जो मेरे इर्दगिर्द फैला हुआ था और उस में से तमाम शब्दों ने झांकना शुरू किया था और मैं कागजों में उलझी थी. यह उपन्यास नहीं, बल्कि प्रेमग्रंथ था मेरे लिए जिसे बड़ी तन्मयता से रचा जा रहा था. प्रेम चूंकि प्रेम है, उस पर जितना लिखा जाए कम है. कितने ही शायर, कवि और गीतकार हुए हैं जिन्होंने प्रेम को अपनेअपने तरीके से बयान किया है और अपने दिल को फाड़ती हुई मारक व तपती हुई नगमों से पत्थरों को भी पिघला दिया. मुर्दों मे भी जान फूंक दी और प्रेमियों की तो चांदी ही चांदीं. अकसर जब इजहार के लिए शब्द न हों तो गजलें और रोमांस से भरे गीत ही तो काम आते हैं.

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