नीरज को फिर झटके से खामोश होना पड़ा, क्योंकि गुस्से से भरी संगीता उठ कर शयनकक्ष की तरफ चल पड़ी थी.
‘‘तुम कहां जा रही हो?’’ नीरज के इस सवाल का उस ने कोई जवाब नहीं दिया.
‘‘वह फिल्म के टिकट ढूंढ़ने गई है, दामादजी. कहां रखा है तुम ने उन्हें? अपने पर्स
में या ब्रीफकेस में?’’ मीनाजी ने शरारती लहजे में पूछा.
नीरज झल्ला उठा, बोला, ‘‘टिकट वहीं होंगे जहां उन्हें आप ने रखा होगा,
सासूमां. कम से कम मु झे तो बता दो कि मु झे फंसाने वाला यह सारा नाटक आप किसलिए…’’
‘‘मैं कोई नाटक नहीं कर रही हूं, दामादजी. अपनी बेटी की विवाहित जिंदगी की खुशियों और सुरक्षा को कौन मां सुनिश्चित नहीं करना चाहेगी? मैं तुम से पूछती हूं कि तुम मेरी बेटी को क्यों धोखा दे रहे हो?’’
‘‘पर सासूमां, मैं सचमुच किसी रितु को नहीं जानता…’’ नीरज को फिर झटके से खामोश होना पड़ा, क्योंकि बहुत गुस्से में नजर आ रही संगीता हाथ में फिल्म के 2 टिकट लिए ड्राइंगरूम में लौट आई थी.
‘‘अब तो सच बोल ही डालो, दामादजी. गलतियां इंसान से ही होती हैं, पर तुम अगर दिल से माफी मांगोगे तो संगीता तुम्हें जरूर माफ कर देगी,’’ मीनाजी के इस डायलौग को सुन नीरज का मन किया कि वह अपने बाल नोच डाले.
‘‘तुम्हारी मम्मी न जाने किस बात का बदला मु झ से ले रही हैं, जानेमन…’’
‘‘मु झे जानेमन मत कहो,’’ संगीता इतनी जोर से चिल्लाई कि नीरज चौंक पड़ा.
‘‘सासूमां, प्लीज मु झे अपनी बेटी के कहर से बचाओ,’’ नीरज ने फिर मीनाजी के सामने हाथ जोड़ दिए.
‘‘तुम जो मेरी बेटी को धोखा दे रहे हो, वह बहुत गलत बात है, दामादजी. तुम्हारे साथ मेरे संबंध हमेशा बहुत अच्छे रहे हैं. मैं तुम्हें अपना बेटा ही मानती हूं, लेकिन इस मामले में मैं असलियत छिपा कर तुम्हारा साथ बिलकुल नहीं दूंगी,’’ मीनाजी भी अचानक नीरज से खफा नजर आने लगी थीं.
‘‘नीरज, तुम इसी वक्त मु झे सचाई बता दो, वरना मैं कभी न लौट कर आने के लिए मायके जा रही हूं.’’
संगीता की इस धमकी को सुन नीरज के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी. बोला, ‘‘तुम पागल हो गई हो क्या? क्या मैं ने आज तक कभी
तुम्हें इस तरह की शिकायत का मौका दिया है? मेरी जिंदगी में तुम्हारे अलावा कोई दूसरी औरत नहीं है.’’
संगीता रोने लगी तो मीनाजी ने उसे अपनी छाती से लगा कर प्यार करना शुरू कर दिया. साथ ही वे नीरज को गुस्से से घूर भी रही थीं.
‘‘मैं अभी इस रितु से तुम्हारी बात करा कर सारा मामला साफ करा देता हूं,’’ कह कर नीरज ने तुरंत अपने फोन से रितु का नंबर मिलाया.
रितु का फोन स्विच औफ मिला तो उस की आंखों में परेशानी के भाव बढ़ते चले गए.
‘‘मर्दों की जात पर भरोसा किया ही नहीं जा सकता है, मेरी गुडि़या. तू बेकार आंसू बहा रही है. बेटी, अब तो तू ऐसे बेवफा इंसान के साथ जिंदगी गुजारने की आदत डाल ले,’’ मीनाजी ने अपनी बेटी को यों सम झाना शुरू किया तो नीरज की आंखें गुस्से से लाल हो उठीं.
‘‘अगर ये मु झे धोखा दे रहे होंगे तो मैं इस घर में नहीं रहूंगी, मम्मी,’’ संगीता ने सुबकते हुए अपना फैसला सुना दिया.
‘‘अगर तू तलाक लेने का फैसला करती है तो मैं तेरा साथ दूंगी, मेरी बच्ची.’’
‘‘तुम्हें यह कैसी उलटी पट्टी पढ़ा रही हैं तुम्हारी मम्मी? कोई भी सम झदार मां बिना कोई छानबीन किए अपनी बेटी को तलाक लेने की सलाह कैसे दे सकती है, संगीता?’’ नीरज के हावभाव से साफ जाहिर हो रहा था कि मीनाजी की भड़काऊ बातों से उस के दिल को जबरदस्त धक्का लगा है.
‘‘मेरी बेटी को मेरे खिलाफ भड़काने की कोशिश बेकार जाएगी, दामादजी,’’ मीनाजी गुस्से से भर उठीं, ‘‘तुम्हारी बेवफाई ने इस वक्त तुम्हें कठघरे में खड़ा किया हुआ है, मु झे नहीं. क्यों धोखा दे रहे हो तुम मेरी बेटी को? क्या शिकायत है तुम्हें इस से?’’
‘‘मु झे कोई शिकायत नहीं है तुम से, संगीता. तुम अपनी मम्मी के भड़काने में मत आओ, प्लीज,’’ अपनी सास से उल झने के बजाय नीरज ने अपनी पत्नी को सम झषना बेहतर सम झा.
‘‘अगर तुम्हें इस से कोई शिकायत नहीं है तो फिर इस रितु के साथ इश्क क्यों फरमा रहे हो? अरे, क्या यह तुम्हारी घरगृहस्थी को ढंग से नहीं संभाल रही है?’’
‘‘बिलकुल संभाल रही है और मैं ने कभी कोई शिकायत…’’
‘‘यह हो सकता है कि अब राहुल की देखभाल के चक्कर में उल झे रहने के कारण यह तुम्हारे लिए ज्यादा वक्त न निकाल पाती हो पर क्या ऐसा होना स्वाभाविक नहीं है?’’
‘‘मैं ने यह कभी नहीं कहा कि इसे राहुल की देखभाल पर कम ध्यान देना चाहिए.’’
‘‘क्या यह रितु बहुत सुंदर है?’’ नीरज के जवाब को अनसुना कर मीनाजी ने
आक्रामक लहजे में अगला सवाल पूछ डाला.
‘‘मु झे क्या पता? मैं जब उसे जानता
ही नहीं…’’
‘‘अब इतना ज्यादा सीधा दिखने की कोशिश भी मत करो. क्या वह कुंआरी है?’’
‘‘यह मैं कैसे बता…’’
‘‘वह जरूर कुंआरी होगी. लेकिन मैं एक सवाल पूछती हूं तुम से, दामादजी. भला 1 बच्चे की मां बन चुकी संगीता का रंगरूप किसी कुंआरी लड़की जैसा कैसे हो सकता है? तुम इस की तुलना उस कुंआरी रितु के साथ कर इसे धोखा कैसे दे सकते हो?’’
‘‘मैं ने कब की तुलना?’’ नीरज ने गुस्से से पूछा.
‘‘अरे, बच्चे को जन्म देने के बाद औरत का फिगर खराब हो ही जाता है. संगीता भी मोटी हो गई है, लेकिन उस का चेहरा तो पहले जैसा सुंदर है या नहीं?’’
‘‘मुझे उस के मोटा हो जाने से कोई शिकायत नहीं…’’
‘‘तुम्हें कोई शिकायत इसलिए नहीं है, क्योंकि तुम इस रितु के साथ मौजमस्ती कर रहे हो. तुम्हें पिता बनने का सुख दिया है मेरी बेटी ने और तुम बदले में उसे धोखा दे रहे हो. इस रितु के पीछे लार टपकाते घूम रहे हो छि:…’’
‘‘मैं किसी के पीछे लार टपकाते…’’
‘‘मुझ से झूठ मत बोलो. यह तो तुम से
हुआ नहीं कि संगीता को फिट और आकर्षक बनाने के लिए उस के साथ रोज घूमने जाओ.
उसे जिम जाने के लिए प्रेरित करो. डाइटिंग
करने के लिए उस का हौसला बढ़ाओ. लेकिन तुम ने…’’
‘‘मैं ने हजारों बार संगीत को यह सलाह दी होगी, सासूमां, लेकिन मैं इसे कोई धोखा…’’
‘‘इस के साथ तुम्हारा रूखा व्यवहार बताता है कि तुम इसे धोखा दे रहे हो, दामादजी. तुम ने क्यों इस की सारी सेवाओं को भुला दिया? इस के बेडौल शरीर के अंदर धड़कता प्यार करने वाला दिल तुम्हें दिखना क्यों बंद हो गया है?’’ बहुत भावुक हो जाने से मीनाजी का गला रुंध गया.
‘‘अब मैं आप को कैसे विश्वास दिलाऊं कि संगीता को मैं अभी भी बहुत प्यार करता हूं और मेरी जिंदगी में कोई दूसरी औरत नहीं है,’’ नीरज बहुत परेशान नजर आने लगा.
‘‘इस मैसेज और इन टिकटों को देख कर हम कैसे तुम पर विश्वास करें? खुद भटकने के बजाय अगर तुम मेरी इस कमअक्ल बेटी को प्यार से सम झाते तो क्या यह तुम्हारे साथ बिताने के लिए ज्यादा वक्त न निकालने लगती? तुम इस का हौसला बढ़ाते तो क्या यह आज यों मोटी भैंस सी नजर आने के बजाय पतली और आकर्षक न दिख रही होती? इस जवान, कुंआरी और खूबसूरत रितु के साथ चक्कर चलाने से पहले तुम्हें इस बेवकूफ को यों बेडौल हो जाने व मां और पत्नी की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन न बैठाने के खतरे बड़े धैर्य के साथ सम झाने चाहिए थे या नहीं?’’
‘‘ऐसा कुछ सम झाने की कोशिश मैं ने की…’’
‘‘तुम ने सही ढंग से सम झाने की कोशिश करने के बजाय इसे धोखा दिया है, दामादजी. लेकिन तुम मेरी एक चेतावनी कान खोल कर सुन लो. अगर तुम ने फौरन इस रितु से अपना चक्कर हमेशा के लिए खत्म नहीं किया तो मेरी बेटी तुम्हारे साथ रहने के बजाय तलाकशुदा स्त्री होने का ठप्पा अपने माथे पर लगवाना ज्यादा पसंद करेगी… उसे राहुल को बिना पिता के पालना मंजूर होगा… वह दुनिया की नजरों में दया और हंसी का पात्र बनना स्वीकार कर लेगी पर तुम जैसे धोखेबाज के साथ बिलकुल नहीं रहेगी,’’ ऐसी धमकियां देने के बाद गुस्से से भरी मीनाजी ने अपनी बेटी को छाती से लगाने के लिए अपने हाथ फैला दिए.
तेंतिस साल की उम्र में 15 अगस्त 1947 को स्व. ताराचंद बड़जात्या ने बेटों राज कुमार बड़जात्या,कमल बड़जात्या व अजीत कुमार बड़जात्या की बजाय अपनी बेटी राजश्री के नाम पर फिल्म प्रोडक्शन व वितरण कंपनी ‘राजश्री’ की नींव रखी थी. उन्होने शुरूआत में दक्षिण भारत से उत्तर भारत तक कई शहरों में अपने आफिस खोलकर फिल्म वितरण/डिस्टिब्यूसन से शुरूआत की थी. ताराचंद्र बड़जात्या ने देश के कई शहरों में अपने सिनेमाघर भी बनाए. फिर भारतीय परंपरा व रीति रिवाजों की बात करने वाली पारिवारिक फिल्मों का निर्माण करने का संकल्प लेकर 1962 में फणी मजुमदार के निर्देशन में मीना कुमारी, अशोक कुमार व प्रदीप कुमार को लेकर पहली फिल्म ‘‘आरती’’ का निर्माण किया था. जिसे क्रिटिकली काफी सराहा गया था.1964 में सत्येन बोस के निर्देशन में ताराचंद बड़जात्या निर्मित फिल्म ‘दोस्ती’ ने सफलता के रिकार्ड स्थापित किए थे.उसके बाद से ‘राजश्री प्रोडक्शन’ ने कभी पीछे मुड़कर नही देखा.
‘राजश्री प्रोडक्शन्स’ अब तक 64 फिल्मों का निर्माण कर चुका है.जिनमें से ‘जीवन-मृत्यु‘, ‘गीत गाता चल‘, ‘तपस्या‘, ‘उपहार‘, ‘पिया का घर‘, ‘दुल्हन वही जो पिया मन भाए‘, ‘सावन को आने दो‘, ‘अंखियों के झरोखे से‘, ‘नदिया के पार‘, ‘सारांश‘, ‘मैंने प्यार किया‘, ‘हम आपके हैं कौन‘, ‘हम साथ-साथ हैं‘,‘विवाह’ और ‘प्रेम रतन धन पायो‘ जैसी चर्चित फिल्मों का समावेश है.इनमें से ‘मैने प्यार किया’,‘हम आपके हैं कौन’,‘हम साथ साथ हैं’,‘विवाह’ और ‘प्रेम रतन धन पाओ’का निर्देशन ताराचंद बड़जात्या के पोते और राज कुमार बड़जात्या के बेटे सूरज कुमार बड़जात्या ने किया. अब ‘राजश्री प्रोडक्शन’ की 64वीं फिल्म ‘‘दोनो’ का निर्देशन सूरज बड़जात्या के बेटे अवनीश कुमार बड़जात्या ने किया है,जिसमें सनी देओल के बेटे राजवीर देओल व पूनम ढिल्लों की बेटी पालोमा ने अभिनय किया है. षश्भ मुहूर्त देखकर इस फिल्म को छह अक्टूबर,शुक्रवार की बजाय गुरूवार,पांच अक्टूबर की रात सवा आठ बजे पहला शो रखकर प्रदर्शित किया.लेकिन बड़जात्या की चाौथी पीढ़ी की अपनी कमजोरी के चलते यह मुहूर्त भी काम न आया. अफसोस थाईलैंड में फिल्मायी गयी 20 करोड़ की लागत वाली फिल्म ‘दोनो’ पहले दिन बाक्स आफिस पर महज दस लाख रूपए ही कमा सकी.जिसके चलते अब बौलीवुड में चर्चा गर्म हो गयी है कि ‘दोनो’ की असफलता की वजह क्या है और ‘राजश्री’ के 76वें वर्ष में स्व.ताराचंद बड़जात्या की लीगसी /परंपरा को कौन डुबा रहा है…???
बहरहाल,ताराचंद बड़जात्या हमेशा समय के साथ चलते रहे हैं.राजश्री प्रोडक्शन्स ने 1985 में टीवी सीरियल के निर्माण के क्षेत्र में कदम रखते हुए ‘पेइंग गेस्ट‘ सीरियल का निर्माण किया.उसके बाद ‘वो रहने वाली महलों की‘,‘प्यार के दो नाम- एक राधा एक श्याम‘जैसे कुछ सीरियल बनाए.1998 में स्व. ताराचंद बड़जात्या की मृत्यू के बाद ‘राजश्री म्यूजिक‘ की भी नींव रखी गई, जिससे कई प्राइवेट अलबम आ चुके हैं.
जब ‘राजश्री’ की परंपरा से हटे थे सूरज बड़जात्याः
बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि ताराचंद बड़जात्या के पड़पोते और सूरज कुमार बड़जात्या के बेटे अवनीश ने अपने खानदान व परदादा की 76 वर्ष से चली आ रही परंपरा को धता बताते हुए लीक से हटकर फिल्म बनाने के प्रयास में ‘बड़जात्या’ की परंपरा व ‘राजश्री’ की नींव खोदने का काम किया है.उनके इस कृत्य से न सिर्फ फिल्म ‘दोनो’ डूबी है,बल्कि ‘राजश्री प्रोडक्षन’ की साख पर भी बट्टा लगा है.बौलीवुड से जुड़ा एक तबका ‘राजश्री प्रोडक्शन’ को डुबाने के लिए अपरोक्ष रूप से सूरज कुमार बड़जात्या पर भी उंगली उठा रहा है.कहा जा रहा है अपने परदादा ताराचंद बड़जात्या की 21 सितंबर 1992 को मृत्यू होने के बाद सूरज कुमार बड़जात्या ने ‘राजश्री’ पर अपना प्रभुत्व बढ़ाना शुरू कर दिया था.सबसे पहले सूरज कुमार बड़जात्या ने ही अपने परदादा की परंपरा के खिलाफ जाकर आधुनिकता का लबादा ओढ़कर 2003 में लगभग सवा तीन घंटे की अवधि की रोमांटिक काॅमेडी फिल्म ‘‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ का लेखन व निर्देशन किया था,जो कि ‘राजश्री’ की ही 1976 में प्रदर्शित बासु चटर्जी निर्देशित सफलतम फिल्म ‘‘चितचोर’’ का ही आधुनीकरण थी.फिल्म ‘मैं प्रेम की दीवानी हॅूं’ में करीना कपूर,हृतिक रोषन व अभिषेक बच्चन जैसे कलाकार थे.‘राजश्री प्रोडक्शन’ के बैनर तले बनी यह पहली फिल्म थी,जिसमें नायिका का विवाह संस्था में यकीन नही होता.अंततः उसकी शादी उसी इंसान के साथ होती है,जिससे वह प्यार करती है.इस फिल्म में पहली बार नायिका ने अपने शरीर पर कम कपड़े पहनकर ग्लैमर परोसा था.जब 27 जून 2003 को यह फिल्म सिनेमाघर पहुॅची,तो इसने पानी तक नही मांगा.
इससे ‘राजश्री’ के अंदर काफी हंगामा हुआ था.उसके बाद सूरज कुमार बड़जात्या ने अपनी गलती स्वीकार कर ‘बड़जात्या’ व ‘राजश्री प्रोडक्शन’ की ही परंपरा पर आंख मूॅदकर कर 2006 में बतौर लेखक व निर्देशक फिल्म ‘‘विवाह’’ लेकर आए थे,जिसमें विवाह संस्था,शादी के रीतिरिवाज आदि को ‘मैने प्यार किया’ की ही तरह परोसा गया था.इस फिल्म में शाहिद कपूर और अमृता राव की जोड़ी थी.80 मिलियन की लागत से बनी इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर 539 मिलियन कमा कर दिए थे.फिर भी अच्छी कहानी की तलाश के नाम पर पूरे नौ वर्ष तक सूरज कुमार बड़जात्या ने कोई फिल्म निर्देशित नही की.2015 में उन्होने सलमान खान को लेकर फिल्म ‘प्रेम रतन यान पाओ’ का लेखन व निर्देशन किया.यह फिल्म भी काफी सफल रही.
सरकार बदलने के साथ बदलते बौलीवुड का असरः
लेकिन 2014 के बाद बौलीवुड में आ रहे बदलाव के रंग में सूरज कुमार बड़जात्या भी ख्ुाद को रंगने लगे.वास्तव में 2014 के बाद धीरे धीरे बौलीवुड पत्रकारों से दूरी बनाते हुए अपने पीआर व पीआर कंपनी के इशारे पर नाचने लगा था.इसी वजह से ‘राजश्री प्रोडक्शन’ निर्मित 2016 में ‘दावत ए इष्क’ और अभिषेक दीक्षित लिखित व निर्देशित ‘हम चार’ जैसी फिल्मों का ठीक से प्रचार नही किया गया और यह दोनों फिल्में बाक्स आफिस पर धराशाही हो गयी.तब सात वर्ष बाद असफल फिल्म ‘‘हम चार’’ के ही लेखक की कहानी पर बतौर निर्देषक सूरज कुमार बडजात्या ने फिल्म ‘‘उंचाई’ का निर्देषन किया.फिल्म की कहानी अच्छी थी,फिल्म बनी भी ठीक ठाक थी.लेकिन यह पहली बार था,जब ‘राजश्री प्रोडक्शन’ और सूरज कुमार बड़जात्या ने इस फिल्म का प्रचार उस पैमाने पर नही किया,जिस पैमाने पर ‘राजश्री प्रोडक्शन’ अपनी हर फिल्म को प्रचारित करता था.परिणामतः यह फिल्म बाक्स आफिस पर किसी तरह से महज अपनी लागत ही वसूल कर पायी.जबकि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, डैनी,अनुपम खेर,सारिका,नीना गुप्ता जैसे कलाकार हैं.
सूरज के बेटे अवनीश बने निर्देशकः ताराचंद बड़जात्या की चैथी पीढ़ी का कारनामाः
अब सूरज बड़जात्या के बेटे,राज कुमार बड़जात्या के पोते और ताराचंद बड़जात्या के पड़पोते अवनीश बड़जात्या ने कुछ कमियों के बावजूद राजश्री की ही परंपरा को आज के परिवेश की कहानी बयां करते हुए आगे बढ़ाने का प्रयास किया है.फिल्म ‘दोनो’ में राजस्थानी परिवेश की शादी व्याह,पे्रम, विछोह, डेस्टीनेशन वेडिंग के साथ ही पारिवारिक मूल्य व वर्तमान पीढ़ी की आधुनिक सोच को भी रेखंाकित किया गया है.
फिल्म ‘दोनोः किसने डुबायी
पिछले पांच छह वर्ष के दौरान ‘राजश्री प्रोडक्शन’’ के कर्ताधर्ताओं और खुद सूरज कुमार बड़जात्या ने अनुभवो के आधार पर क्या सीखा,यह तो वही जाने.लेकिन सूरज कुमार बड़जात्या के बेटे अवनीश कुमार बड़जात्या निर्देशित फिल्म ‘दोनो’ का बाक्स आफिस पर जो हाल है,वह इसी ओर इंगित करता है कि शायद अब ‘राजश्री प्रोडक्शन’ से जुड़े लोग इसे डुबाने पर आमादा हो गए हैं.
जी हाॅ! ‘‘प्रेम रतन धन पाओ’’ और हम चार’ में बतौर सहायक निर्देशक तथा फिल्म ‘‘उंचाई’’ में बतौर एसोसिएट निर्देशक काम कर चुके अवनीश कुमार बड़जात्या ने अपने पिता सूरज बड़जात्या के पदचिन्हो पर चलते हुए बतौर स्वतंत्र निर्देशक रोमांटिक फिल्म ‘‘दोनो’’ के सह लेखन व निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली तो तय किया कि वह ‘राजश्री’ की परंपरा के साथ ही लीक से हटकर फिल्म बनाएंगे.अवनीश बड़जात्या अपनी फिल्म ‘दोनो’ में जहां एक तरफ पुरानी मान्यताओं व रीति रिवाजों को चुनौती देने के साथ ही अपरोक्ष रूप से नारी समानता के नाम पर संयुक्त परिवारों को तोड़ने व धार्मिक रीति रिवाजों,पूजा आदि की अवमानना करने की वकालत करते हुए नजर आते हैं,तो वहीं वह भारतीय शादी व्याह के रीति रिवाजों की भी वकालत करते हुए नजर आते हैं.यानी कि वह पूरी तरह से द्विविधाग्रस्त हैं.
फिल्म ‘दोनो’ की कहानीः
रोमांटिक कहानी की शुरूआत बंगलोर में अपने स्टार्ट व्यवसाय को जमाने में व्यस्त देव सराफ (राजवीर देओल ) से षुरू होती है.उसके माता पिता मंुबई में रहते हैं और देव की स्कूल व कालेज की दोस्त अलीना (कनिका कपूर ) की षादी होने जा रही है.इससे वह परेषान हो गया है.क्योंकि वह पंद्रह साल की उम्र से ही अलीना से प्यार करता आया है,पर वह इस बात को आज तक अलीना से कह नहीं पाया.वह अपनी मां व अलीना को भी फोन पर शादी में शामिल होने पर असमर्थता जाहिर कर देता है.तब अलीना कहती है कि यदि वह षादी में नही आया तो वह शादी नही करेगी.
क्योंकि अलीना की नजर में देव सराफ अच्छा दोस्त है.यह शादी डेस्टीनेशन वेडिंग है,जो कि थाईलैंड में हैं.लेकिन मिस अंजली मल्होत्रा (टिस्का चोपड़ा ) के एक कार्यक्रम में एक काॅलर निशांत की इसी तरह की समस्या का जवाब देते हुए अंजली मल्होत्रा ,निशांत को सलाह देती हैं कि ‘स्टेशन पर बैठकर ऐसी ट्रेन का इंतजार करने से क्या फायदा, जो ट्रेन उस स्टेशन पर आती ही नहीं. दूसरी ट्रेन पकड़ने के लिए उसे दूसरे स्टेशन पर जाना पड़ेगा या फिर उसी स्टेशन पर आने वाली दूसरी ट्रेन को पकड़ना पड़ेगा. तभी उसको एक नई मंजिल मिल सकती है. इसलिए उसे अपनी दोस्त की षादी में जाना चाहिए,हो सकता है वहां पर उसे नई ट्ेन की राह मिल जाए.’’देव सराफ थाईलेंड में अलीना की शादी में शामिल होता है.जहां उसकी मुलाकात मेघना (पालोमा ढिल्लों) से होती है. छह साल तक गौरव (आदित्य नंदा) संग रिलेशनशिप में रहने के बाद एक माह पहले ही उसका ब्रेक अप हुआ है. इस शादी में गौरव भी आया हुआ है.देव और मेघना दोनो एक दूसरे के को समझने की कोशिश करते हैं.
बीच बीच में गौरव की अपनी हरकतें हैं,तो वहीं अलीना के होने वाले पति निखिल(रोहण खुराना ) की अपनी हरकते हैं.षादी के रीति रिवाज संपन्न होते रहते हैं.हल्दी व संगीत कार्यक्रम हो जाते हैं.कहानी बढ़ती रहती हंै.कहानी में कई मोड़ आते हैं.एक मोड़ पर लगता है कि मेघना,गौरव के पास वापस जाएगी.उधर अलीना व निखिल की षादी से पहले की रात,अलीना व निखिल का समुद्री बीच पर सैकड़ों लोगो के सामने लिया गया लंबा चुंबन वायरल हो जाता है.उस चुंबन दृष्य को लेकर रिश्तेदारों में फुसफुसाहट शुरू होती है.अलीना की मां उसे डांटती है,तब अलीनाप मन ही मन निखिल से प्याह न करने की सोचकर देव सराफ के साथ रात में ही कार में बैठकर होटल से बाहर घूमने निकल जाती है.रास्ते में अलीना,निखिल से षादी न करने व देव,अलीना से प्यार करने की बात कबूल करता है.
पर सारा सच जानने के देव सराफ, अलीना को सलाह देता है कि उसे इस बारे में बात करके अंतिम निर्णय लेना चाहिए.निखिल पूरे परिवार व रिश्तेदारों के सामने अलीना से कह देता है कि वह दोनो राजी हैं,जिन्हे एतराज है वह भाड़ में जाएं.और दोनों एक दूसरे संग लंबे समय तक चुंबनबद्ध होते हैं.सब कुछ देख व सुनकर निखिल के पिता अलीना से वरमाला डालने के लिए कहते हैं.
बाक्स आफिस पर बुरी तरह से लुढ़की ‘दोनो’
राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म ‘‘दोनों’ पूरे देश में महज 273 स्क्रीन्स में ही प्रदश्र्षत हो पायी है. इनमें उन स्क्रीन्स का भी समावेश है,जिनके मालिक ‘राजश्री फिल्मस’ खुद है.निर्माता ने एक टिकट खरीदने पर एक टिकट मुफ्त का प्रावधान भी रखा हुआ है, इसके बावजूद फिल्म ने पहले दिन केवल दस लाख रूपए कमाए.कुछ स्क्रीन्स में सिर्फ छह लोग नजर आए तो कुछ स्क्रीन्स के षो रद्द कर दिए गए.75 वर्षो से जिस कंपनी की चार पीढ़ियां फिल्म निर्माण व वितरण में सक्रिय हों,उस ‘राजश्री प्रोडक्षंस ’ की फिल्म की यह दुर्गति शुभ संकेत नही है.इस पर ‘राजश्री प्रोडक्षन’ से जुडे़ हर शख्स को गंभीरता से मनन करना चाहिए.
वास्तव में इसकी मूलतः दो बड़ी वजहें हैं.पहली वजह तो अनुभवी लोगों ने पहली बार अपनी फिल्म का ठीक से प्रचार नही किया.लोगों को पता ही नहीं चला कि ‘दोनो’ नाम की कोई फिल्म बनी है.इसके लिए फिल्म के प्रचार की जिम्मेदारी जिन लोगो को दी गयी,उन लोगों ने इमानदारी से काम नही किया.पी आर कंपनी का पत्रकारों के संग व्यवहार ऐसा रहा,जैसे कि पत्रकार उनके गुलाम हो.दूसर बात लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरियां व द्विविधाग्रस्त होकर फिल्म बनाना रहा.वहीं फिल्म के कलाकारों ने भी फिल्म को डुबाने में कोई कसर बाकी नही रखी.
कहानी के स्तर पर कमीः
फिल्म ‘दोनो’ एक प्रेम कहानी प्रधान रोमांटिक फिल्म है.मगर पूरी फिल्म में रोमांस कहीं नही है.लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरियों के चलते फिल्म गड़बड़ा गयी.फिल्म के नायक देव सराफ के साथ किसी को हमदर्दी नहीं होती? क्योंकि फिल्मकार इस बात को ठीक से चित्रित ही नहीं कर पाए कि देव सराफ का अलीना से एक तरफा प्यार की गहराई कितनी है? फिल्म देखने पर अहसास होता है कि देव का 15 वर्ष की उम्र में अलीना से प्यार का अहसास महज बचपना था.बचपने में किए गए प्यार का कोई महत्व नही होता.यही वजह है कि जब क्लायमेक्स से पहले अलीना को पता चलता है कि देव उसका सिर्फ अच्छा दोस्त ही नही है,बल्कि प्यार करता है.तब भी उस पर ज्यादा असर नही होता.यहां तक क्लायमेक्स मे जब देव,अलीना से निखिल से ब्याह करने की सलाह देता है,तब भी लोगों को देव पर तरह नही आता.देव के किरदार में हीरोईजम नजर ही नहीं आता.
अवनीष की लीक से हटकर बनी फिल्म ‘दोनो’ की कमियांः
जैसा कि हमने पहले ही बताया कि ‘राजश्री प्रोडक्शन’ पिछले 76 वषों अपनी फिल्मों में भारतीय परंपरा,पारिवारिक जीवन मूल्यों की वकालत करते हुए विवाह व उसके रीति रिवाजों के इर्द गिर्द ही कहानियां पेश करते आया है.लेकिन पहली बार स्व.ताराचंद बड़जात्या के परिवार की चैथी पीढ़ी यानी कि सूरज बड़जात्या के बेटे व निर्देशक अवनीश बड़जात्या ने अपने निर्देषन में बनी पहली फिल्म ‘‘दोनों’’ में लीक से हटकर काम किया है.
स्टार्ट अप का माखौल
लीक से हटकर फिल्म बनाने के चक्कर में अवनीश बड़जात्या ने अपनी फिल्म ‘दोनो’ की शुरूआत ही गलत कर दी.फिल्म की शुरूआत में ही युवा पीढ़ी यानी कि नायक देव सराफ के ‘स्टार्ट अप’ व्यापार का माखौल उड़ाया गया है.फिल्म के पहले ही दृश्य में देव की स्टार्ट अप कंपनी में एक ग्राहक आता है और उसे देखकर मजाक उड़ाता हुए कहता है-‘‘अरे आप इस कंपनी के सीईओ है.मैने तो किसी बुजुर्ग इंसान की कल्पना की थी’ और वह देव की कंपनी के साथ व्यापार नही करता.फिर फिल्म बताती है कि देव सराफ ‘लूजर’ हैं.उसकी स्टार्ट अप कंपनी सफल नही है और उस पर कर्जा है. इस तरह फिल्म की षुरूआत कर अवनीष बड़जात्या युवा पीढ़ी को अपनी फिल्म से दूर ले जाने का ही काम किया है.सच यह है कि वर्तमान समय में युवा पीढ़ी ‘स्टार्ट अप’ षुरू कर निरंतर प्रगति कर रही है.
गणपति भगवान की पूजा छोड़कर नायिका का होने वाले पति संग चुंबनबद्ध होनाः …??
फिल्म में एक दृष्य है,जहां विवाह से पूर्व गणपति पूजा का कार्यक्रम चल रहा है.वर व वधु दोनों पक्ष के लोग मौजूद हैं.नायिका अलीना अपनी मां के साथ गणपति पूजा कर रही है.पर अलीना को यही नही पता कि रक्त अक्षत व नैवेद्य किसे कहते हैं.इतना ही नहीं पूजा शुरू होेते ही अलीना अपने दोस्तों के इशारे पर गणपति पूजा छोड़कर अपने पति निखिल के पास समुद्र के किनारे पहंुच जाती है,जहां उसका होने वाला पति निखिल दोस्तों के सामने ही उसके सामने घुटने के बल बैठकर शादी का प्रस्ताव रखता है और फिर दोनों एक दूसरे के साथ लंबे समय तक चुंबन लेते हैं,जिसका वीडियो भी बनाया जाता है.मजेदार बात यह है कि यह बात दोनों परिवारों को पसंद नही है.सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि ‘राजश्री प्रोडक्शन’ इससे पहले 63 फिल्में बना चुका है और अब तक किसी भी फिल्म में एक भी ‘चंुबन दृश्य’ नही रहा.मगर ‘दोनों’ राजश्री प्रोडक्शन’ की पहली फिल्म है,जिसमें एक नही बल्कि तीन तीन लंबे चुंबन दृश्य हैं.
अब क्लायमेक्स में अलीना विवाह से पूर्व समुद्री बीच पर सैकड़ाें लोगों के बीच अपने होने वाले पति निखिल संग लिए गए लंबे चुंबन दृश्य के वायरल हो जाने पर बतंगड़ खड़ा करती है,जिसे युवा पीढ़ी भी गलत मानती है,इस कारण भी किसी को भी अलीना से हमदर्दी नही होती.
दूसरी बात फिल्म के इस तरह के दृश्यों से अहसास होता है कि लेखक व निर्देशक पूरी तरह से द्विविधा में हैं,कि शादी के धार्मिक रीति रिवाजों को सही ठहराते हुए ‘राजश्री फिल्मस’ की 76 साल पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाएं अथवा लीक से हटकर आधुनिकता की बात करते हुए धार्मिक रीति रिवाजों व गणेश पूजा के खिलाफ जाएं. जब निर्देषक अवनीष बड़जात्या ने लीक से हटकर कुछ करने का निर्णय लिया था,तब उन्हे ‘राजश्री प्रोडक्शन’ की फिल्मों की परंपरा और आधुनिकता में से किसी एक का दामन थामना चाहिए था.
पुरानी फिल्मों का कचूमरः
लेकिन अपनी पिछली तीन पीढ़ी से चली आ रही परंपरा का निर्वाह करने के चक्कर में उन्होने अपनी ही कंपनी की कुछ पुरानी फिल्मों के दृश्यों को सही ढंग से ‘दोनो’ में पिरोने का असफल प्रयास किया है.वह भूल गए कि समय व संदर्भ बदलने के साथ ही षब्दों के भी अर्थ बदल जाते हैं,इसलिए नए तरह के दृष्य गढ़े जाने चाहिए थे.फिल्म ‘दोनो’ में अविष्वसनीय दृष्यों की भरमार है.कुछ दृष्य इस बात की ओर इंगित करते है कि वर्तमान पीढ़ी के लिए रिष्ते मायने नहीं रखते.इतना ही नही पति पत्नी में समानता व नारी स्वतंत्रता की बात करते हुए फिल्म निर्देशक ने जो बात कही है,उस पर अमल करने से संयुक्त परिवार विखरते हैं,जबकि ‘राजश्री’ की फिल्मों की परंपरा परिवार विखेरना नही रहा है..
इसी तरह फिल्म में चुंबन वाला दृश्य भी खटकता है.जिस तरह से राजस्थानी परिवेश की शादी में निर्देशक ने नायक व नायिका को सार्वजनिक रूप से सभी रिश्तेदारों के समक्ष लंबे लंबे चुंबन दृश्यों दिखाए हैं,वह स्वीकार नही किए जा सकते. क्या दो पीढ़ियों के बीच जो अंतर है,उसे अवनीश इसी तरह से समझते हैं.क्या उनके अपने परिवार के संस्कार अब यही हो गए हैं? इस तरह के सवाल उठना लाजमी हैं.वैसे अवनीश बड़जात्या ने फिल्म में यह सवाल उठाने की कोशिश की है कि जब किसी भी काम में लड़के और लड़की दोनों की समान भागीदारी है,तो दोष सिर्फ लड़की के सिर पर क्यों?
फिल्म ‘‘दोनो’’ में कुछ अच्छा संदेशः
वैसे लेखक व निर्देशक ने कई गल्तियों के बावजूद कुछ अच्छा संदेश परोसने में सफल रहे हैं.फिल्म इस बार पर रोशनी डालती है कि कोई भी इंसान हर किसी को खुश नहीं रख सकता है.अगर इंसान सारी जिंदगी इस बात से डर डर के जिए सिर्फ अपनी नजरो में उठने की जरूरत है,तो वह सफल नही हो सकता.हमारी जीवन शैली और रहने के तौर तरीके पर दूसरे क्या सोचते हैं, यह सोचने के बजाय, इस बात पर गौर करना चाहिए कि खुद को क्या पसंद है और क्या अच्छा लगता है? हर इंसान अपने आप में हीरो होता है,बशर्ते उसे खुद की काबिलियत समझ में आ जाए.
फिल्म के प्रचार में पत्रकारों कीे अनदेखी करना
पर फिल्म दोनो’ की असफलता का एक कारण फिल्म का सही प्रचार न किया जाना भी रहा.‘राजश्री’ की अपनी एक परंपरा रही है.वह कम बजट में अच्छी फिल्में बनाते हुए अपनी फिल्म का जमकर प्रचार करते रहे हैं.हमें अच्छी तरह से याद है कि 1986 में जब गोविंद मुनीस के निर्देशन में ज्ञान शिवपुरी, रश्मी मिश्रा व आकाशदीप जैसे नए कलाकारों को लेकर ताराचंद बड़जात्या ने फिल्म ‘बाबुल’ बनायी थी,तब उन्होने इस फिल्म के प्रचार के लिए अपने बेटे स्व.राज कुमार बड़जात्या के नेतृत्व में फिल्म की पूरी टीम को राजस्थान,दिल्ली,मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के कई शहरों में पत्रकारों व आम दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए भेजा था.
अब तक ताराचंद बड़जात्या के तीन बेटों में से किसी ने भी निर्देशन के क्षेत्र में कदम नहीं रखा था.सभी फिल्म निर्माण व वितरण के कार्य में अपने पिता की मदद कर रहे थे.लेकिन 1989 में जब राज कुमार बड़जात्या के बेटे और ताराचंद बड़जात्या के बेटे सूरज बड़जात्या ने निर्देशन में कदम रखने का फैसला किया,तब परिवार के सभी सदस्यों ने इसका विरोध किया था,मगर ताराचंद बड़जात्या ने सूरज को फिल्म निर्देशन की इजाजत दी थी.
सूरज बड़जात्या ने भाग्यश्री व सलमान खान को लेकर फिल्म ‘‘मैने प्यार किया’ का निर्माण किया था,जिसके प्रचार के लिए भी पूरा देष घूमे थे और फिल्म ने सफलता के नए रिकार्ड बनाए थे. लेकिन अब ‘राजश्री प्रोडक्शन’ का 76 वर्ष और 64 फिल्मों के निर्माण के अनुभवांे के बावजूद पत्रकारों और समाचार पत्र व पत्रिकाओं की अनदेखी कर सोषल मीडिया के आगे घुटने टेकना भारी पड़ गया.फिल्म निर्माता यह भूल गए कि जब अखबार या पत्रिका में फिल्म के संबंध में कुछ छपता है,तो उसे पढ़कर पाठक/ दर्शक कल्पना करता है और फिर उसके अंदर फिल्म देखने की उत्सकुता पैदा होती है.पर ‘दोनो’ के प्रचार में ऐसा हुआ ही नहीं.
इंफ्यूलंसर और छोटे छोटे यूट्यूबरों के आगे नतमस्तक होना
इतना ही नहीं यह पहली बार हुआ जब प्रेस शो में कुछ इन्फ्यूलंसर के साथ ही देश के कोन कोने से छोटे यूट्यूबरों को बुलाया गया था.शायद फिल्म के निर्माता व उनकी पीआर कंपनी ने सोचा होगा कि मुंबई के पत्रकारों से दूरी बना देश के छोटे छोटे यूट्यूबराें को बुलाकर फिल्म को सुपर हिट बना लेंगे. पर फिल्म के बाक्स आफिस की कमाई से साबित होता है कि फिल्म के निर्माता,निर्देशक,कलाकारों और उनकी पीआर कंपनी की हरकतों ने इस फिल्म को डुबाने में कोई कसर बाकी नही रखी.
कलाकारों का अहम और कमतर अभिनयः
फिल्म ‘दोनों’ की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इस फिल्म में नए कलाकारों की जोड़ी है.फिल्म के मुख्य कलाकार तो अपने परिवार के नाम पर अहम में रहे.फिल्म के नायक राजवीर देओल के दिमाग में हावी है कि वह महान अभिनेता धर्मेंद्र के पोते व सफल अभिनेता सनी देओल के बेटे हैं. जबकि अभिनय व संवाद अदायगी के मामले में वह शून्य हैं.उनका चेहरा सदैव सपाट रहता है.तो वहीं फिल्म की नायिका पालोमा ढिल्लों को अहम है कि वह तो मषहूर अभिनेत्री पूनम ढिल्लों व मशूहूर फिल्म निर्माता अशोक ठाकरिया की बेटी हैं.वह न खास सुंदर हैं और न ही उनके अंदर अभिनय क्षमता है.मजेदार बात यह है कि अब सोशल मीडिया पर मुहीम चलायी जा रही है सफलतम अभिनेता के बेटे राजवीर देओल को ‘‘राजश्री फिल्मस’’ ने फंसा दिया.मगर सोशल मीडिया पर इस तरह की बकवास करने वाले यह भूल जाते हैं कि 2019 में सनी देओल ने स्वयं अपने बड़े बेटे करण देओल के कैरियर की पहली फिल्म ‘‘पल पल दिल के पास’’ निर्देषित की थी,जिसने बाक्स आफिस पर पानी नहीं मांगा था और करण देओल का कैरियर शुरू होने सेे पहले ही डूब गया था.
वैसे कुछ दिन पहले करण देओल के कैरियर को डुबाने का आरोप अपरोक्ष रूप से राजवीर देओल अपने पिता सनी देओल पर यह कहते हुए लगा चुके हैं कि उनके भाई करण देओल को अपने किरदार को चुनने की स्वतंत्रता नही मिली थी. जबकि उन्होेने ‘दोनों’ के देव के किरदार को स्वयं चुना है.अब यदि हम राजवीर देओल की बात सच मान ले,तो खुद देव का किरदार चुनकर राजवीर देओल ने कौन सी सफलता दर्ज करा ली. राजवीर को याद रखना चाहिए कि करण देओल की फिल्म ‘‘पल पल दिल के पास’ ने पहले दिन लगभग एक करोड़ कमाए थे,जबकि राजवीर की फिल्म ‘दोनो’ ने बाक्स आफिस पर केवल दस लाख रूपए ही कमाए.कड़वा सच सह है कि अभिनय के मामले में राजवीर देओल और पालोमा को बहुत अधिक मेहनत करने की जरुरत है.
राजवीर और पालोमा को इसी फिल्म में पंद्रह वर्षीय देव व अलीना के किरदारो में क्रमषः वरूण बुद्धदेवा और मुस्कान कल्याणी के अभिनय से कुछ सीखना चाहिए.इन दोनों किषोर वय के कलाकार अपने अभिनय से न सिर्फ अमिट छाप छोड़ जाते हैं,बल्कि इस ओर भी इशारा करते है कि उनमें आगे बढ़ने की असीम संभावनाए हैं.
जवाबदेही तय करने की आवश्यकता
हम स्वयं ‘दोनो’ की असफलता या ‘राजश्री प्रोडक्शन’ को पतन की ओर ले जाने के लिए किसी पर भी दोषारोपण नही करना चाहते.हम तो सिर्फ सच बयम कर रहे हैं,जिन पर पूरी टीम को गौर करना चाहिए.प्रिंट मीडिया एक शाश्वत सत्य है.इसकी अनदेखी से किसी भी शख्स को फायदा नही हो सकता.नए जमाने की आड़ में तेजी से उभर रही पीआर कंपनियों और ईवेंट कंपनियों का मकसद ऐन केन प्रकारेण अपनी जेंबें भरना है. सभी को रातोंरात करोड़पति बनना है.इन कंपनियों से काम लेने के लिए इनकी एकाउंटेबिलिटी/ जवाबदेही तय करना आवष्यक है.तो वहीं परंपराओं को तोड़ने वाला या लीक से हटकर सिनेमा बनाने में बुराई नही है,मगर उस दिषा में ठोस कहानी व ठोस तथ्यों के साथ विश्वसनीय दृश्य पेश किए जाना अनिवार्य है. ढुलमुल नीति कभी किसी भी क्षेत्र में सफल नही होती.
कलाकारः मधुर मित्तल,महिमा नांबियार, नारायण,किंग रत्नम, नासर, वाड़िवरकरासी, रियाथिका, वेला राममूर्ति,विनोद सागर, रित्विक, यारथ लोहितस्व, दिलीपन व अन्य
भाषा: तमिल व हिंदी
अवधिः दो घंटे 39 मिनट
अब तक क्रिकेट पर आधारित जितनी भी फिल्में बनी हैं,उन सभी को दर्शक सिरे से नकारते रहे हैं.इसकी मूल वजह यह रही है कि हर फिल्मकार सिनेमा की मूल जरुरत मनोरंजन को दरकिनार कर हमेशा क्रिकेट के खेल व खिलाड़ी को महान साबित करने का ही प्रयास करता रहा है.अब मशहूर तमिल फिल्मकार श्रीलंका के आफ स्पिनर गेंदबाज व क्रिकेट टीम के पूर्व कैप्टन मुथैया मुरलीधरन की बायोपिक फिल्म ‘‘800’’ लेकिन आए हैं.तमिल भाषा में बनी यह फिल्म हिंदी में डब करके भी प्रदर्शित की गयी है.फिल्म की कहानी अस्सी के दशक,जब श्रीलंका गृहयुद्ध से जूझ रहा था,से लेकर मुथैया मुरलीधरन के 800 विकेट लेने के बाद क्रिकेट से संयास लेने तक की कहानी है.इस फिल्म में इस बात को खास तौर पर रेखंाकित किया गया है कि तमीलियन श्रीलंकन क्रिकेटर मुथैया मुरलीधरन के लिए प्रतिभा के बावजूद अपने देश श्रीलंका के लिए क्रिकेट खेलना कितना मुश्किल था.
जब इस फिल्म की घोषणा हुई थी,तब मुथैया मुरलीधरन का किरदार दक्षिण भारतीय अभिनेता विजय सेतुपति निभा रहे थे,पर बाद में उन्होने खुद को इस फिल्म से अलग कर लिया.उस वक्त कहा गया था कि विजय सेतुपति के प्रशंसकों ने उनके घर पर हमला बोलकर उनसे इस फिल्म का हिस्सा न बनने के लिए कहा था. लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद बात समझ में आ गयी कि विजय सेतुपति ने इस घटिया फिल्म से दूरी बनायी थी.इतना ही नही उस वक्त तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने भी फिल्म के निर्माण के खिलाफ आवाज उठाई थी,मगर निर्माता व निर्देशक ने आश्वस्त किया था कि इस फिल्म में मुरलीधरन की कहानी के साथ ही श्रीलंका के भारतीय तमिलों की अनकही कहानी भी बताएगी,जिन्हें अक्सर देश के अन्य श्रीलंकाई तमिलों व सिंहलियों से भेदभाव का सामना करना पड़ता है.फिल्म में मुरलीधरन पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए खुद को तमिल या सिंहली की बजाय एक क्रिकेटर ही कहते नजर आते हैं.पर उन्होने ‘तमिल’ होने की अपनी पहचान को कभी नहीं छिपाया.
कहानीः
फिल्म की शुरूआत तमिल बनाम सिंहली लड़ाई के दृष्य से होती है,जिसमें दिखाया गया है कि किस तरह सिंहली एक एक तमीलियन को मौत के घाट उतारने के साथ ही उनकी फैक्टरी तक को आग लगा रहे हैं.कैंडी में अपने माता पिता व दादी के साथ रहने वाले छह सात वर्षीय मुथैया मुरलीधरन को जब उसके गांव के बड़े बच्चे अपने साथ क्रिकेट नही खेलने देते, तब वह अपनी दादी को बुलाकर लाता है.दादी के हड़काने के बाद वह गांव के लड़कों के साथ फील्डिंग करने व बल्लेबाजी करते हुए क्रिकेट खेलता है.
एक दिन उसे गेंदबाजी करने का अवसर मिलता है,तभी वहां सिंहली उपद्रवी आ जाते हैं,और तमीलियन की तलाश कर उन्हे मौत की नींद सुलाने लगते हैं.तब एक मुस्लिम षख्स मुरली व मुरली की मां सहित कई लोगों को अपने घर में शरण देता है.पर सिंहली उसके पिता की बिस्कुट फैक्टरी में आग लगा देते हैं..उसके बाद उनकी मां उन्हें एक चर्च में पादरी से मिलकर रख देती हैं.पादरी की शरण में मुरली चर्च के ही स्कूल में पढ़ाई करने के साथ ही क्रिकेट भी खेलता है.वह पढ़ाई पर कम पर क्रिकेट में ज्यादा रूचि रखते हैं.
लेखन व निर्देशनः
मुथैया मुरलीधरन ने टेस्ट क्रिकेट में 800 और वनडे क्रिकेट में 532 विकेट लिए.इसी से उनकी खतरनाक गेदबाजी का अंदाजा लगाया जा सकता है.सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि आस्ट्रेलियन व इंग्लैंड के बल्लेबाज भी उनकी गेंदबाजी से डरते थे.पर तमीलियन श्रीलंकन क्रिकेटर मुथैया मुरलीधरन के लिए प्रतिभा के बावजूद अपने देश श्रीलंका के लिए क्रिकेट खेलना बहुत ही कठिनाइयों वाली डगर थी. इसे सही ढंग से परदे पर उकेरना हर फिल्मकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है. फिल्म में मुरलीधरन के संघर्ष व दर्द भरी कहानी का चित्रण है,जो कि किसी भी युवा के लिए प्रेरणा बन सकती है,मगर इसका चित्रण व तकनीकी पक्ष इस कदर कमजोर है कि यह युवा पीढ़ी तक नही पहुॅच पाएगी.
नेक मकसद से बनायी गयी इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसकी पटकथा है.पूरी पटकथा विखरी हुई है.फिल्म देखते हुए अहसास होता है कि लेखक व निर्देशक का फोकश तय नही है.परिणामतः दर्शकों को बांधकर नहीं रख पाती. फिल्म में मुरलीधरन द्वारा खेेले गए कुछ चर्चित मैचों को पुनः जीवित करके दिखाया गया है,ऐसे दृष्यों के साथ फिल्मकार न्याय नही कर पाए. काश उन्होने ऐसे क्रिकेट मैचों के मौलिक दृष्यों के अधिकार खरीदकर उन्हे इस फिल्म में पिरोया होता. इस कमी के चलते सिनेमा के दर्शक ही नही क्रिकेट के फैन को भी इस फिल्म से कुछ नहीं मिलता.
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी बहुत खराब है.क्रोमा पर शूट किए गए दृष्य अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहे हैं. इतना ही नही भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाफ मुरलीधरन द्वारा खेल गए क्रिकेट मैचों को नजरंदाज किया गया है.यॅूं तो मैं क्रिकेट का बहुत बड़ा फैन नही हॅूं,पर फिल्म देखकर अहसास होता है कि फिल्मकार का पूरा ध्येय मुरलीधरन को नेकदिल व बेहतरीन इंसान के रूप में पेश करने की रही है और उन्होने उन सभी घटनाक्रमो से बचने का प्रयास किया, जिनसे भारतीय दर्शक नाराज हो सकता है.
मसलन एक टुर्नामेंट में श्रीलंका ने पूरी भारतीय टीम को महज 54 रनों पर आउट किया था और इसमें अहम भूमिका मुरलीधरन की ही थी,जिन्होने पांच विकेट लिए थे.फिल्मकार ने चकिंग विवाद को कुछ ज्यादा ही विस्तार से चित्रित किया है,हो सकता है कि कहानी के लिए इसकी जरुरत हो,पर सिने प्रेमियों को यह अखरता है.फिल्मकार मुरलीधरन के निजी जीवन व उनकी पत्नी को भी ठीक से चित्रित नही कर पाए हैं. वास्तव में यह फिल्म मुरली धरन के लिए अपना दामन साफ करने व ख्ुाद का स्तुतिगान ही है,इसलिए भी फिल्म अपना महत्व खो देती है.
अभिनयः
इस फिल्म को बर्बाद करने में लेखक व निर्देशक के साथ ही अभिनेता मधुर मित्तल भी कम दोषी नही है.मधुर मित्तल ने ही इस फिल्म में मुथैया मुरलीधरन का किरदार निभाया है.जबकि छह सात वर्षीय मुरलीधरन के किरदार को निभाने वाला बाल कलाकार अपने अभिनय की छाप छोड़ जाता है.मधुर मित्तल का अभिनय व संवाद अदायगी काफी गड़बड़ है. इतना ही नहीं मधुर मित्तल एक भी दृश्य में मुथैया मुरलीधरन की तरह गेंदबाजी करते हुए नजर नही आए. मधुर मित्तल ने पहली बार अभिनय किया हो,ऐसा भी नही है.मधुर ने नौ वर्ष की उम्र में बाल कलाकार के रूप में अभिनय जगत में कदम रखा था.
2008 में उन्होने फिल्म ‘स्लमडाॅग मिलेनियर’ में सलीम का किरदार निभाया था.बाल कलाकार के तौर पर कुछ टीवी सीरियलों भी अभिनय किया.फिर तेइस वर्ष की उम्र में वह मिलियन डालर आर्म में भी नजर आए थे.फिर ‘पाॅकेट गैंगस्टर’ व ‘मातृ’ जैसी सुपर फ्लाप फिल्मों में नजर आए. दो वेब सीरीज भी की. इसके बावजूद बतौर अभिनेता वह इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी हैं.मधुर मित्तल को चाहिए कि वह एक दो वर्ष अपने अंदर की अभिनय प्रतिभा को निखारने के लिए मेहनत करें.अखबार के संपादक की भूमिका में अभिनेता नासर ने शानदार अभिनय किया है.अर्जुन रणतुंगा के किरदार में राजा रत्नम अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे हैं.इसके अलावा कोई भी कलाकार ठीक से अभिनय नही कर पाया.मुरलीधरन की पत्नी मधिमलार के किरदार में महिमा नांबियार के हिस्से करने को कुछ आया ही नहीं.
भारत विविधताओं का देश है यहां त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है. जल्द ही Festive सीजन आ रहा है. घर की हर गृहणी इसी चिंता में है इस त्योहार पर मीठे में क्या बनाएं. परेशान बिल्कुल न हो गृहशोभा पर मिलेगी आपको अनगिनत फूड रेसिपी और मिठाई की रेसिपी. आज हम आपके लिए लेकर आए ग्रीन ऐप्पल श्रीखंड और औरेंज ऐंड लैमन ड्रिंक की रेसिपी.
ग्रीन ऐप्पल श्रीखंड
सामग्री
1. 1/2 कप योगर्ट
2. 1 हरा सेब
3. थोड़ा सा ग्रीन ऐप्पल सिरप
4. थोड़ा सा दालचीनी पाउडर.
विधि
सेब को चौकोर टुकड़ों में काट लें. फिर एक बाउल में योगर्ट ले कर उस में ग्रीन ऐप्पल सिरप मिलाएं. जब सिरप अच्छे से मिल जाए फिर इस में सेब के टुकड़े और दालचीनी पाउडर डाल कर फ्रिज में 45 मिनट के लिए ठंडा होने पर सर्व करें.
2. औरेंज ऐंड लैमन ड्रिंक
सामग्री
1. जरूरतानुसार और्गेनिक औरेंज जूस
2. 15 मिली लैमन जूस
3. 30 मिली और्गेनिक हनी
4. 1/2 छोटा चम्मच अदरक पाउडर
5. थोड़ी सी पुदीनापत्ती
6. 5-6 आइस क्यूब्स
7. थोड़ा सा ठंडा पानी.
विधि
औरेंज और लैमन जूस के साथ सारी सामग्री को डाल कर अच्छे से मिला कर ऊपर से आइस क्यूब्स और पुदीनापत्ती से सजा कर सर्व करें.
सनातन धर्म का नाम ले कर भाजपा के कट्टरपंथी और उनके अंधभक्त एक बार फिर वही पौराणिक युग लाना चाहते हैं जिस में औरतों को केवल दासी के समान, पति की सेवा, पिता-पति-पुत्र की आज्ञाकारिणी और बच्चे पैदा करने की मशीन समझा जाता था. हमारे अधिकांश देवता यही सिद्ध करने में लगे रहे कि औरतों का अपना कोई वजूद नहीं है जबकि समाज का एक वर्ग, एक बड़ा वर्ग, इन्हीं औरतों की देवी के रूप में पूजा करता रहा.
आजकल इस अलिखित पौराणिक कानून को संविधान के बराबर सिद्ध करने की कोशिश करी जा रही है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पुत्र उदयनिधि के सनातन धर्म के भेदभाव वाले बयान के कारण सनातन धर्म के दुकानदार तिलमिलाए हुए हैं क्योंकि उन्हें आधी आबादी केवल सेवा करने के लिए सदियों से मिलती रही है.
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा है कि सनातन धर्म का अपमान करना संविधान का अपमान करना है. यह कैसे तर्क पर ठीक ठहरेगा? सनातन धर्म तो न लिखा गया है, न उस की अदालतें हैं और न ही उस में कोई बराबरी या न्याय का स्थान है जबकि संविधान लिखित है, अदालतों में उस की व्याख्या होती है. उस के दुकानदार नहीं हैं. इस का लाभ हर नागरिक और भारत निवासी को मिलता है.
सनातन धर्म का एक गुण भी भाजपाई नहीं बता सकते जबकि संविधान की हर धारा, हर पंक्ति नागरिक को सरकार के विरुद्ध कुछ अधिकार देती है. संविधान की ढाल में पैसा नहीं कमाया जा सकता जबकि सनातन धर्म का मुख्य ध्येय तो दानदक्षिणा है. पूजापाठ, देवीदेवता, रीतिरिवाज सभी सनातन के दुकानदारों को हलवापूरी का इंतजाम करते रहे हैं. हर मंदिर पैसे से लबालब भरा है और हर मंदिर में मौजूद हर जना इस पैसे का अघोषित मालिक है.
सनातन धर्म के केंद्र मंदिरों में देवदासियों का बोलबाला था, वहां नाचगाना होता था. वहां देश की 80% जनता को घुसने तक की इजाजत नहीं थी जबकि संविधान हर नागरिक को बराबर का हक देता है और औरतों को पुरुषों के बराबर खड़ा करता है.
अर्जुन राम मेघवाल ने धर्म की भगवा पट्टी आंखों पर बांध रखी हो तो कोई कुछ नहीं कर सकता पर सच फिर भी छिपाया नहीं जा सकता कि सनातन धर्म की देन संविधान की देन के सामने तुच्छ, रेत के कण के बराबर है जबकि संविधान को तो अभी 75 वर्ष भी नहीं हुए.
हर किसी व्यक्ति को अपने जीवन में कभी न कभी हार का सामना करना ही पड़ता है फिर हार चाहे कैरियर में हो, बिजनैस में हो, किसी रिश्ते में हो या जीवन की किसी भी परिस्थिति में, लेकिन यह हार हमें कुछ न कुछ नया सबक अवश्य सिखाती है और अकसर वही लोग अधिक कामयाब होते हैं जो अपनी हार से सीख लेते हैं न कि अपनी किस्मत को कोसते हैं. वृंद सतसई का दोहा, करतकरत अभ्यास के जड़मति होत सुजान. रसरी आवत-जात ते सिल पर पड़त निशान.
इस बात के लिए बिलकुल सटीक है कि यदि हम असफलता के बाद भी निरंतर प्रयास करते हैं तो कठिन से कठिन कार्य भी आसान बन जाता है इसलिए जरूरी है कि अपनी गलतियों से सीख लें और जीवन में सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ते रहें क्योंकि आप की सही सोच आप के लक्ष्य को पाने में मदद करती है.
तो आइए जानते हैं कुछ ऐसे टिप्स ऐंड ट्रिक्स जो आप को सफल बनाने में मदद करते हैं:
गलतियों से लें सीख
यदि हम अपनी हार को खुद पर हावी कर लेते हैं तो हमें सिर्फ निराशा ही हाथ लगती है, लेकिन यदि अतीत में की गई गलती से हम सबक लेते हैं तो निश्चित ही एक न एक दिन कामयाबी हमारे कदम चूमती है. इसलिए अतीत में की गई गलती का पछतावा न करें बल्कि अपनी खामियों और खूबियों को जान कर उन पर और काम करें व सकारात्मक बदलाव के साथ आगे बढ़ें.
डरना मना है
एक मूवी का बहुत ही फेमस डायलौग है ‘जो डर गया सो मर गया’ और यह सही भी है. जो इंसान डर के सामने घुटने टेक देता है और पीछे हट जाता है वह अपना आत्मविश्वास बिलकुल खो देता है. रोजमर्रा के कामकाजों तक में निर्णय लेने में वह असहज महसूस करता है इसलिए जरूरी है कि असफलता से डरें नहीं बल्कि डट कर सामना करें और सफल बनें.
अपने सपने का पीछा करें
परिस्थिति कोई भी हो लेकिन असफलता मिलने पर हमें अपने सपनों को बिखरने नहीं देना चाहिए बल्कि अपने अनुभवों से सीख लेनी चाहिए क्योंकि दोबारा प्रयास करते समय आप की शुरुआत शून्य से नहीं बल्कि अनुभव से होती है. इसलिए अपने सपने को पूरा करे बिना हार न मानें.
कंफर्ट जोन से हट कर कुछ नया करो
असफलता हमें सिखाती है कि हमें अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकल कर कुछ अलग, कुछ नया करना है. कुछ लोग किसी भी काम को करने से पहले ही उस से डरने लगते हैं. लेकिन हमें नकारात्मक विचारों को त्याग कर सकारात्मक सोच के साथ कुछ नया करने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि जब तक नया करने की कोशिश नहीं करेंगे तब तक हम आगे नहीं बढ़ सकते. साथ ही हमें कभी भी किसी और के जीवन से खुद की तुलना नहीं करनी चाहिए क्योंकि हर किसी व्यक्ति की क्षमता अलग होती है.
अक्षरज्ञान ही नहीं जनून भी है जरूरी
हमें सफल बनने के लिए केवल डिगरी की आवश्यकता नहीं होती बल्कि जनून की आवश्यकता होनी बेहद जरूरी है. कुछ लोग बिना किसी डिगरी के भी कामयाब होते हैं तो कुछ लोग पढ़ेलिखे होने के बाद भी नाकामयाब रहते हैं. सफलता के लिए इंसान के अंदर जनून और आगे बढ़ने की भूख होनी चाहिए. फिर कामयाबी आप के कदम अवश्य चूमेगी.
भारत अपनी विविधता और पूरे सालभर अलगअलग आस्थाओं तथा जातियोंधर्मों के लोगों द्वारा मनाए जाने वाले विभिन्न त्योहारों की वजह से जाना जाता है. साल में अपने त्योहारों को मनाने के लिए परिवार और दोस्त अकसर भोजन के इर्दगिर्द जमा होते हैं और साथ मिल कर खातेपीते, मौज करते हैं. ऐसा घर पर, रैस्टोरैंट में या बारबेक्यू में हो सकता है. साथ मिलजुल कर खानेपीने के बहुत फायदे हैं. सब से बड़ा फायदा तो सामाजिक मेलमिलाप है जोकि मानसिक स्वास्थ्य तथा खुशहाली के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है.
त्योहारों के अवसर पर हम सिर्फ अच्छे और खास व्यंजनों के बारे में सोचते हैं. लेकिन त्योहार और छुट्टियों के मौसम में ही हम सभी से कई बार चूक भी हो जाती है. हम सेहतमंद खानपान के बजाय ज्यादा मात्रा में भोजन, मिठाई, प्रोसैस्ड फूड वगैरह का सेवन करते हैं यानी हमारे शरीर में कैलोरी की अधिक मात्रा पहुंचती है.
अधिक कैलोरीयुक्त भोजन का मतलब है अधिक मात्रा में फैट, शुगर, अत्यधिक कंसंट्रेटेड ड्रिंक्सतथा अधिक नमकयुक्त यानी सोडियम से भरपूर भोजन का सेवन. ऐसे में जो आम
समस्याएं सामने आती हैं, उन में प्रमुख हैं: वजन बढ़ना या पाचन संबंधी समस्याएं जैसेकि ऐसिडिटी, गैस्ट्राइटिस, कब्ज, शरीर में पानी की कमी होना आदि.
त्योहारों के बीतने के बाद वजन कम करने को ले कर बढ़ता तनाव वास्तव में ज्यादा वजन बढ़ाता है क्योंकि तनाव की वजह से भूख का एहसास बढ़ाने वाले हारमोन ज्यादा बनते हैं. इसलिए त्योहारी सीजन में कुछ सावधानियों के साथ उन खास पलों का आनंद उठाएं, आगामी त्योहारों के मद्देनजर आप के लिए कुछ आसान उपायों की जानकारी दी जा रही है.
खाली पेट रहने से बचे
दिन की सेहतमंद और संतुलित शुरुआत के लिए ब्रेकफास्ट में साबूत अनाज, लो फैट प्रोटीन तथा फलों का सेवन करें. कहीं किसी से मिलनेजुलने के लिए खाली पेट न जा कर भरे पेट जाएंगे तो फैस्टिव ट्रीट्स के नाम पर अनापशनाप खाने से बचेंगे.
अकसर होता यह है कि व्यंजनों का लुत्फ उठाने के लिए हम मील्स स्किप करते हैं और इस के चलते ओवरईटिंग हो जाती है. खाली पेट होने पर सैरोटानिन लैवल गिरता है. इसलिए जब भी हम बिना कुछ खाएपीए हुए लंबे समय तक रहते हैं तो स्ट्रैस बढ़ने लगता है और यही से बिना सोचेसमझे हुए लगातार कुछ न कुछ खाते रहने की शुरुआत होती है और हम जरूरत से ज्यादा भोजन पेट में ठूंस लेते हैं.
इसलिए ओवरईटिंग से बचने और वजन को नियंत्रण में रखने के लिए नियमित रूप से (1 बड़ा मील+2 स्नैक मील्स) खाना खाएं.
मात्रा नियंत्रित करें
जो भी खाएं उस की मात्रा का भरपूर ध्यान रखें यानी ‘पोर्शन कंट्रोल’ करें क्योंकि आप का पेट भर चुका है यह एहसास शरीर को कुछ देर से होता है. इसलिए अगर आप तब तक खाते रहेंगे जब तक कि पेट भरने का एहसास न हो जाए तो आप ओवरईटिंग करेंगे.
इसलिए जरूरी है कि एक बार में कम मात्रा में ही खाएं. धीरेधीरे खाने से आप के शरीर को यह पता चलता रहता है कि आप ने पर्याप्त मात्रा में खा लिया और आप ओवरईट नहीं करते.
सही भोजन करें
यह सब से महत्त्वपूर्ण है. सही चयन/विकल्प का चुनाव करने से आप त्योहारों की मस्ती और मजे को दोगुना कर सकते हैं क्योंकि आप अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं और जोखिम वाले कारकों से दूर रहते हैं.
अधिक फाइबरयुक्त भोजन: ऐसा भोजन चुनें जो फाइबरयुक्त हो क्योंकि फाइबरयुक्त भोजन आप को तृप्ति का एहसास दिलाता है, आप देर तक पेट भरा हुआ महसूस करते हैं और इस तरह ओवरईटिंग से बचते हैं तथा अपने भोजन की मात्रा को भी नियंत्रित रखते हैं.
साबूत अनाज पोषण से भरपूर होता है, उस में कैलोरी की मात्रा कम होती है और पैकेज्ड एवं प्रोसैस्ड फूड्स की तुलना में इस के सेवन से पेट अधिक भरा हुआ महसूस होता है. साथ ही कैलोरीयुक्त मेन कोर्स मील शुरू करने से पहले किसी हैल्दी डिश का सेवन करें और कम ऐनर्जी वाले खाद्यपदार्थों जैसेकि सलाद या वैजिटेबल सूप आदि लें.
सब्जियों में विटामिन, मिनरल्स, फाइबर और पानी की मात्रा अधिक होती है यानी इन के सेवन से आप अपने पेट को भरा हुआ महसूस करते हैं और इस तरह खुद ही अपनी प्लेट में भोजन की मात्रा को नियंत्रित रखते हैं.
हर मील में प्रोटीन लें. प्रोटीन न सिर्फ शरीर के विभिन्न ऊतकों की बढ़त के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं, बल्कि लीन बौडी मास (एलबीएम) के लिए भी फायदेमंद होते हैं.
हाल के अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि मील्स के बीच फिलर्स के तौर पर सही मात्रा में प्रोटीन के पर्याप्त सेवन से ब्लड शुगर लैवल में उतारचढ़ाव को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है. इसलिए मेवे और बीजों का सेवन करने से खाने के बीच हैल्दी स्नैकिंग का विकल्प मिलता है.
फू्रटी डैजर्ट: खाने के बाद मीठा (डैजर्ट) खाने की तलब स्वाभाविक है और यह भोजन को पूरा करने खासतौर से त्योहारी सीजन में बेहतरीन तरीका भी है. लेकिन चीनी और मैदे से बने डैजर्ट स्वास्थ्य केलिए अच्छे नहीं होते. इसलिए साबूत अनाज के आटे जैसेकि गेहूं और गुड़ (सीमित मात्रा में) का प्रयोग सेहतमंद विकल्प है. इसी तरह फल आधारित डैजर्ट जैसेकि फ्रूट योगर्ट शरबत पेट के लिए हलके होते हैं और सच तो यह है कि चाशनी में डूबे रसगुल्लों और जलेबियों जैसे तले हुए डैजर्ट की तुलना में ये काफी सेहतमंद भी होते हैं.
चांदी का वर्क लगी मिठाई खाने से बचें क्योंकि इस में ऐल्युमीनियम की मिलावट होती है जोकि सेहत के लिए अच्छी नहीं है. इसी तरह कृत्रिम रंगों के इस्तेमाल से बनी मिठाई खाने से भी बचना चाहिए. इन की जगह विभिन्न फू्रट आइटम्स के प्राकृतिक और स्वस्थ रंगों के इस्तेमाल से बनी मिठाई का प्रयोग करें.
ऐसी गलती न करें: हम सभी एक बड़ी गलती यह करते हैं कि तलने के बाद बच गए तेल को दोबारा इस्तेमाल करते हैं. इस प्रकार तेल को दोबारा इस्तेमाल करने से फ्री रैडिकल्स बनते हैं जो शरीर की रक्तवाहिकाओं को अवरुद्ध करने के साथसाथ ऐसिडिटी का कारण भी बनते हैं. हो सके तो चीजों को तलने से बचना चाहिए और इन के बजाय स्नैक्स तथा मील्स के लिए स्टीमिंग, ग्रिलिंग, रोस्टिंग आदि को अपनाना सेहतमंद विकल्प है.
शरीर में पानी का पर्याप्त स्तर
कैलोरी को सीमित करने का एक आसान उपाय है- कैलोरी पीएं नहीं यानी सौफ्ट ड्रिंक्स पीने के बजाय पानी पीएं जिस से आप का पेट भर जाएगा और शरीर में फालतू कैलोरी भी नहीं जाएगी. इसलिए जूस की बोतल, सोडा/ऐरेटेड ड्रिंक्स या अलकोहलिक ड्रिंक लेने की बजाय पानी का सेवन करना अच्छा विकल्प है. ऐसा कर आप न सिर्फ कैलोरी की मात्रा नियंत्रित रखते हैं बल्कि अपने शरीर को प्राकृतिक रूप से हाइड्रेट भी रखते हैं. इस से भूख पर नियंत्रण आसान होता है.
खेलकूद या व्यायाम से शरीर को अधिक ऊर्जावान बनाया जा सकता है. गैस्ट्राइटिस से बचाव होता है, साथ ही कब्ज की शिकायत भी नहीं होती क्योंकि सभी प्रकार के ऐरेटेड ड्रिंक्स/ जूस ऐसिडिक होते हैं. इसी तरह नैचुरल ड्रिंक्स जैसेकि स्मूदी/ लस्सी/ मिल्कशेक (लो फैट, अतिरिक्त शुगर रहित), शिकंजी (चीनी रहित) आदि त्योहारों के मौसम में अच्छे विकल्प होते हैं.
शारीरिक गतिविधि
वजन को नियंत्रित करने के लिए डाइट कंट्रोल के साथसाथ शारीरिक व्यायाम करना महत्त्वपूर्ण होता है. इस से तनाव घटता है और उस का सीधा या परोक्ष असर आप की खानपान की आदतों पर पड़ता है. व्यायाम करने से ऐंडोमार्फिंस को बढ़ावा मिलता है जो आप को हर दिन सकारात्मक और ऊर्जावान बने रहने में मदद करते हैं.
साथ ही नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियां आप के मसल एनाबौलिज्म के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं जिस से मसल लौस से बचाव होता है. अच्छी सेहत के लिए सप्ताह में 5-6 दिन 30-45 मिनट तक शारीरिक व्यायाम करने की सलाह दी जाती है.
हम सभी को त्योहारों के उल्लास का हिस्सा बनना और समाज में खुशहाली बढ़ाने का कारण बनना अच्छा लगता है. खानपान जीवन के उत्सव का अहम हिस्सा है.
अच्छा भोजन अच्छी सेहत को बढ़ावा देता है, इसलिए समझदारी से भोजन कर सेहतमंद रहें.
उस रविवार की सुबह चाय पीने के बाद नीरज आराम से अखबार पढ़ रहा था. तभी उस की सास मीनाजी ने अचानक उलाहना सा देते हुए कहा, ‘‘अब तुम मेरी बेटी को पहले जितना प्यार नहीं करते हो न दामादजी?’’
‘‘क्या बात करती हैं आप, सासूमां? अरे, मैं अब भी अपनी जान के लिए आसमान से चांदसितारे तोड़ कर ला सकता हूं,’’ अखबार पर से नजरें हटाए बिना ही नीरज ने कहा.
अपने 3 साल के बेटे राहुल को कपड़े पहना रही संगीता ने अपनी मां से उत्सुक लहजे में पूछा, ‘‘ऐसा क्यों कह रही हैं आप?’’
मीनाजी ने गहरी सांस छोड़ने के बाद जवाब दिया, ‘‘बड़ी सीधी सी बात है, मेरी भोली गुडि़या. जब कोई पति दूसरी औरत से इश्क फरमाने लगे तो यह सम झ लेना चाहिए कि अब वह अपनी पत्नी को पहले की तरह दिल की गहराइयों से नहीं चाहता है.’’
राहुल को कपड़े पहना चुकी संगीता परेशान सी अपनी मां की बगल में आ बैठी. नीरज ने भी गहरी सांस छोड़ कर अखबार एक तरफ सरका दिया. फिर चुपचाप मांबेटी दोनों को उत्सुक अंदाज में देखने लगा.
‘‘यों खामोश रहने से काम नहीं चलेगा, दामादजी. मैं ने तुम्हारे ऊपर आरोप लगाया है. अब तुम अपनी सफाई में कुछ तो कहो,’’ मीनाजी की आंखों में शरारत भरी नाराजगी नजर आ रही थी.
‘‘सासूमां, पतिपत्नी के बीच गलतफहमी पैदा करने वाला ऐसा मजाक करना सही नहीं है. मेरी जिंदगी में कोई दूसरी औरत है, यह सुन कर अगर आप की इस भोलीभाली बेटी का हार्टफेल हो गया तो हम बापबेटे का क्या होगा?’’ नीरज ने मुसकराते हुए शिकायत सी की.
‘‘आप मजाक छोडि़ए और मु झे यह बताइए कि क्या आप सचमुच किसी दूसरी औरत से इश्क लड़ा रहे हो?’’ संगीता ने पति से तनाव भरे स्वर में पूछा.
‘‘बस, इतना ही भरोसा है तुम्हें मेरे प्यार पर?’’ नीरज फौरन यों दुखी दिखने लगा जैसे उस के दिल को गहरी ठेस लगी हो, ‘‘अपनी मम्मी के मजाकिया स्वभाव को तुम जानती नहीं हो क्या? अरे पगली, वे मजाक कर रही हैं.’’
‘‘मैं मजाक बिलकुल नहीं कर रही हूं, दामादजी,’’ मीनाजी ने अपने मुंह से निकले हर शब्द पर पूरा जोर दिया.
‘‘सासूमां, अब यह मजाक खत्म कर दो वरना संगीता सवाल पूछपूछ कर मेरी जान ले लेगी,’’ नीरज ने हंसते हुए अपनी सास के सामने हाथ जोड़ दिए.
मीनाजी उठ कर इधरउधर घूमते हुए गंभीर लहजे में बोलीं,
‘‘मुझे यहां आए अभी कुछ ही घंटे हुए हैं, लेकिन इतने कम समय में भी मैं ने तुम्हारे अंदर आए बदलाव को पकड़ लिया है, दामादजी. अब तुम्हारी आंखों में संगीता के प्रति चाहत के भाव नजर नहीं आते… बस काम की ही बातें करते हो तुम उस से… इसीलिए मैं मन ही मन यह सोचने पर मजबूर हो गई कि तुम दोनों के बीच पहले हमेशा नजर आने वाली रोमांटिक छेड़छाड़ कब, कहां और क्यों खो गई है?’’
नीरज ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘सासूमां, हमारी शादी को 5 साल हो गए हैं. अब हमारे रोमांटिक छेड़छाड़ करने के दिन बीत चुके हैं.’’
‘‘क्या तुम रितु के साथ भी रोमांटिक छेड़छाड़ नहीं करते हो, दामादजी?’’
‘‘यह रितु कौन है?’’ संगीता और नीरज ने एकसाथ पूछा तो मीनाजी रहस्यमयी अंदाज में मुसकराते हुए नीरज के सामने आ खड़ी हुईं.
कुछ देर खामोश रह कर मीनाजी ने सस्पैंस और बढ़ा दिया. फिर कहानी सुनाने वाले अंदाज में बोलीं, ‘‘चूंकि मैं अपनी लाडली के विवाहित जीवन की खुशियों को ले कर चिंतित हो उठी थी, इसलिए मैं ने कुछ देर पहले तुम्हारे फोन में आए सारे मैसेज तब पढ़ डाले जब तुम बाथरूम में नहाने गए हुए थे.’’
‘‘यह तो बड़ा गलत काम किया है सासूमां, पर सब मैसेज पढ़ लेने के बाद जब कुछ हाथ नहीं लगा तो आप को मायूसी तो बहुत हुई होगी,’’ नीरज ने उन का मजाक उड़ाया.
‘‘मेरे हाथ कुछ लगता भी कैसे, दामादजी? रितु के सारे मैसेज तो वहां से तुम ने हटा रखे थे, लेकिन…’’
‘‘लेकिन क्या, मम्मी?’’ संगीता ने उंगलियां मरोड़ते हुए परेशान लहजे में पूछा.
‘‘लेकिन संयोग से उसी वक्त रितु का ताजा मैसेज आ गया. मैं ने उसे पढ़ा और सारा मामला मेरी सम झ में आ गया. लो, तुम भी पढ़ो अपने पति परमेश्वर के फोन में आए उन की इस रितु डार्लिंग का मैसेज,’’ मीनाजी ने मेज पर रखा नीरज का फोन उठा मैसेज निकालने के बाद संगीता को पकड़ा दिया.
संगीता ने मैसेज ऊंची आवाज में पढ़ा, ‘मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है. मूवी के टिकट वापस कर दो… आई लव यू, रितु.’
मैसेज पढ़ने के बाद संगीता नीरज की तरफ सवालिया नजरों से देखने लगी. उस की शक्ल बता रही थी कि वह किसी भी क्षण नीरज के साथ झगड़ा शुरू कर सकती है.
मीनाजी ने व्यंग्य भरे स्वर में नीरज से कहा, ‘‘दामादजी, अपनी चोरी पकड़ी जाने पर तुम्हें बहुत हैरान नजर आने का नाटक करते हुए ऊंची आवाज में कहना चाहिए कि संगीता, मैं किसी रितु को नहीं जानता हूं. यह मैसेज किसी और के लिए होगा… गलती से मेरे फोन में आ गया है.’’
‘‘सच भी यही है, संगीता. मैं किसी रितु को नहीं जानता हूं,’’ नीरज ने ऊंचे स्वर में खुद का निर्दोष साबित करने की कोशिश की.
‘‘अगर तुम उसे नहीं जानते हो तो तुम ने उस का फोन नंबर अपने फोन में क्यों सेव कर रखा है, दामादजी?’’ मीनाजी ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा.
उल झन का शिकार बना नीरज जब जवाब में खामोश रहा तो मीनाजी ने उसे फिर छेड़ा, ‘‘अब ‘मु झे नहीं पता कि यह नाम और नंबर
कैसे मेरे फोन में आया है’ यह डायलौग तो बोलो, दामादजी.’’
‘‘संगीता, सचमुच मु झे नहीं मालूम…’’ नीरज सफाई देते हुए झटके से रुका और फिर मीनाजी की तरफ घूम विनती कर उठा,
‘‘सासूमां, मु झे यों फंसा कर आप को क्या मिल रहा है? अब संगीता को सच बता कर यह खेल खत्म करो…’’
चीनू की नन्हीनन्ही हथेलियां दूर होती चली गईं और धीरेधीरे एकदम से ओझल हो गईं.
नीरेंद्र की आंखों में आंसू झिलमिला आए थे. आज उन के सूने घर में महीने भर से आई इस रौनक का अंतिम दिन था.
पूरे 30 दिन से उन का घर गुलजार था. बच्चों के होहल्ले से भरा था. साल भर में उन के घर में 2 ही तो खुशी के मौके आते थे. एक गरमी की लंबी छुट्टियों में और दूसरा, दशहरे की छुट्टियों के समय.
उन दिनों नीरेंद्र की उजाड़ जिंदगी में हुलस कर बहार आ जाती थी. उस का जी करता था कि इस आए वक्त को रोक कर अपने घर में कैद कर ले. खूब नाचेगाए और जश्न मनाए, पर ऐसा हो कहां सकता था.
छोटी बहन के साथ 2 बच्चे, छोटे भाई के 2 बच्चे और बड़ी दीदी के दोनों बच्चे, पूरे 6 नटखट ऊधमी सदस्यों के आने से ऐसा लगता जैसे घर छोटा पड़ गया हो. बच्चे उस कमरे से इस कमरे में और इस कमरे से उस कमरे में भागे फिरते, चिल्लाते और चीजें बिखेरते रहते.
बच्चों के मुंह से ‘चाचीजी’, ‘मामीजी’ सुनसुन कर वे अघाते न थे. दिनरात उन की फरमाइशें पूरी करने में लगे रहते. किसी को कंचा चाहिए तो किसी को गुल्लीडंडा. किसी को गुडि़या तो किसी को लट्टू.
4 माह में जितना पैसा वे बैंक से निकाल कर अपने ऊपर खर्च करते थे, उस से भी ज्यादा बच्चों की फरमाइशें पूरी करने में उन दिनों खर्च कर देते. फिर भी लगता कि कुछ खर्च ही नहीं किया है. वे तो नईनई चीजें खरीदने के लिए बच्चों को खुद ही उकसाते रहते.
कभीकभी भाईबहनों को गुस्सा आने लगता तो वे उन्हें झिड़कते, ‘‘क्या करते हो भैया. सुबह से इन मामूली चीजों के पीछे लगभग 100 रुपए फूंक चुके हो. बच्चों की मांग का भी कहीं अंत है?’’
नीरेंद्र हंस देते, ‘‘अरे, रहने दो, यह इन्हीं का तो हिस्सा है. बस, साल में 10 दिन ही तो इन के चाव के होते हैं. देता हूं तो बदले में इन से प्यार भी तो पाता हूं.’’
सिर्फ 30 दिन का ही तो यह मेला होता है. बाद में बच्चों की बातें, उन की गालियां याद आतीं. उन की छोड़ी हुई कुछ चीजें, कुछ खिलौने संभाल कर वे उन निर्जीव वस्तुओं से बातें करते रहते और मन को बहलाते. उन की एक बड़ी अलमारी तो बच्चों के खिलौनों से भरी पड़ी थी.
इस तरह नीरेंद्र अपने अकेलेपन को काटते. हर बार उन का जी करता कि बच्चों को रोक लें, पर रोक नहीं पाते. न बच्चे रुकना चाहते हैं न माताएं उन्हें यहां रहने देना पसंद करती हैं. पहले तो उन के छोटे होने का बहाना था. बड़े हुए तो छात्रावास में डाल दिए गए. इसी से नीरेंद्र उन्हीं बच्चों में से एक को गोद लेना चाहते थे. मगर हर घर में 2 बच्चे देख खुद ही तालू से जबान लग जाती थी.
किसीकिसी साल तो ऐसा भी होता है कि 30 दिनों में भी कटौती हो जाती. कभीकभी बच्चे यहां आने के बजाय कश्मीर, मसूरी घूमने की ठान लेते. फिर तो ऐसा लगने लगता जैसे जीने का बहाना ही खत्म हो जाएगा. पिछले साल यही तो हुआ था. बच्चे रानीखेत घूमने की जिद कर बैठे थे और यहां आना टल गया था. किसी तरह छुट्टियों के 7-8 दिन बचा कर वे यहां आए थे तो उन का मन रो कर रह गया था.
कभीकभी नीरेंद्र को अपनेआप पर ही कोफ्त होने लगती कि क्यों वे अकेले रह गए? आखिर क्या कारण था इस का? पिता की असमय मृत्यु ने उन के घर को अनाथ कर दिया था. घर में वे सब से बड़े थे, इसलिए जिम्मेदारी निभाना उन्हीं का कर्तव्य था. घर में सभी को पढ़ाया- लिखाया. पूरी तरह से हिम्मत बांध कर उन के शादीब्याह किए तब कहीं जा कर अपने लिए विचार किया था.
नीरेंद्र सीधीसादी लड़की चाहते थे. मां ने उन के लिए सुलभा को पसंद किया था. सुलभा में कोई दोष न था. नीरेंद्र खुश थे कि उम्र उन के विवाह में बाधक नहीं बनी. इस से पहले जब वे भाईबहनों का घर बसा रहे थे तब सदा उन्हें एक ही ताना मिला था, ‘‘क्यों नीरेंद्र, ब्याह करोगे भी या नहीं? बूढ़े हो जाओगे, तब कोई लड़की भी न देगा. बाल पक रहे हैं, आंखों पर चश्मा चढ़ गया है और क्या कसर बाकी है?’’
सुन कर नीरेंद्र हंस देते थे, ‘‘चश्मा और पके बाल तो परिपक्वता और बुद्धिमत्ता की निशानी हैं. मेरी जिम्मेदारी को जो लड़की समझेगी वही मेरी पत्नी बनेगी.’’
सुलभा उन्हें ऐसी ही लड़की लगी थी. सगाई के बाद तो वे दिनरात सुलभा के सपने भी देखने लगे थे. उन्हें ऐसा लगता जैसे सुलभा उन की जिंदगी में एक बहार बन कर आएगी.
विवाह की तिथि को अभी काफी दिन थे. एक दिन इसी बीच वे सुलभा के साथ रात को फिल्म देख कर लौट रहे थे. अचानक कुछ बदमाशों ने सुलभा के साथ छेड़छाड़ की थी. नीरेंद्र को बुढ़ऊ कह कर ताना मार दिया था.
सुन कर नीरेंद्र को सहन न हुआ था और वे बदमाशों से उलझ पड़े थे, पर उन से वे कितना निबट सकते थे. अपनेआप से वे पहली बार हारे थे. गुस्सा आया था उन्हें अपनी कमजोरी पर. वे स्वयं को अत्यंत अपमानित महसूस कर रहे थे. हतप्रभ रह गए थे अपने लिए बुढ़ऊ शब्द सुन कर. उस शाम किसी तरह वे और सुलभा बच कर लौट तो आए थे मगर सुलभा ने दूसरे ही दिन सगाई की अंगूठी वापस भेज दी थी. शायद उसे भी यकीन हो गया था कि वे बूढ़े हो गए हैं.
‘अच्छा ही किया सुलभा ने.’ एक बार नीरेंद्र ने सोचा था. परंतु मन में अपनी हीनता और कमजोरी का एक दाग सा रह गया. विवाह से मन उचट गया, कोई इस विषय पर बात चलाए भी तो उस से उलझ बैठते. मां जब तक रहीं नीरेंद्र को शादी के लिए मनाती रहीं, समझाती रहीं.
मां की मृत्यु के बाद वह जिद और मनुहार भी खत्म हो गई. कुछ यह भी जिद थी कि अब इसी तरह जीना है. पहले भाईबहनों पर भरोसा था, पर वे अपनी- अपनी जिंदगी में लग गए तो उन्होंने उन्हें छेड़ना भी उचित न समझा.
हां, भाईबहनों के बच्चों ने अवश्य ही नीरेंद्र के अंदर एक बार गृहस्थी का लालच जगा दिया था. अंदर ही अंदर वे आकांक्षा से भर उठे कि उन्हें भी कोई पिता कहता. वे भी किसी के भविष्य को ले कर चिंता करते. वे भी कोई सपना पालते कि उन का बेटा बड़ा हो कर डाक्टर बनेगा या कोई उन का भी दुखसुख सुनता. सोतेजागते वे यही सोचा करते.
तब कभीकभी मन में मनाते कि कोई उन्हें क्यों नहीं कहता कि ब्याह कर लो. अकेले ही वे रसोईचूल्हे से उलझे हुए हैं कोई पसीजता क्यों नहीं, कोई अजूबा तो नहीं इस उम्र में ब्याह करना. बहुत से लोग कर रहे हैं.
नीरेंद्र अपनी जिंदगी की तुलना भाई की जिंदगी से करते. सोचते कि उन की और धीरेंद्र की सुबह में कितना अंतर है. वे 4 बजे का अलार्म लगा कर सोते. सोचते हुए देर रात गए उन्हें नींद आती. परंतु सुबह तड़के घड़ी की तेज घनघनाहट के साथ ही उन की नींद टूट जाती जबकि वे जागना नहीं चाहते. लेकिन जानते हैं कि सुबह के नाश्ते की तैयारी, कमरों की सफाई, कपड़ों की धुलाई आदि सब उन्हीं को ही करनी है.
मगर धीरेंद्र की सुबह भले ही झल्लाहट से शुरू हो लेकिन उत्सुकता से भरी जरूर होती है. 4 बजे का अलार्म बज जाए तो भी उसे कोई परवाह नहीं. नींद ही नहीं टूटती है. न जाने उसे कैसी गहरी नींद आती है.
घड़ी का कांटा जब 4 से 5 तक पहुंचता है तब उस की पत्नी चिल्लाती है, ‘‘उठो, दफ्तर जाने में देर हो जाएगी.’’
‘‘हूं,’’ धीरेंद्र उसी खर्राटे के साथ कहेगा, ‘‘क्या 5 बज गए?’’
‘‘तैयार होतेहोते 10 बज जाएंगे. फिर मुझे न कहना कि देर हो गई.’’
शायद फिर बच्चों को इशारा किया जाता होगा. पप्पू धीरेंद्र के बिछौने पर टूट पड़ता, ‘‘उठिए पिताजी, वरना पानी डाल दूंगा.’’
फिर वह बच्चों के अगलबगल बैठ कर कहता, ‘‘अरे, नहीं बाबा, मां से कहो कि चाय ले आए.’’
स्नानघर में जा कर भी धीरेंद्र बीवी से उलझता रहता, ‘‘मेरे कुरते में 2 बटन नहीं हैं और जूते के फीते बदले या नहीं? जाने मोजों की धुलाई हुई है या नहीं?’’
पत्नी तमक कर कहती, ‘‘केवल तुम्हें ही तो नौकरी पर नहीं जाना है, मुझे भी दफ्तर के लिए निकलना है.’’
‘‘ओह, तो क्या तुम्हारे ब्लाउज के बटन मुझे टांकने होंगे,’’ धीरेंद्र चुहल करता तो पत्नी उसे धप से उलटा हाथ लगाती.
इसे कोई कुछ भी कहे, पर नीरेंद्र का लोभी मन गृहस्थी के ऐसे छोटेमोटे सुखों की कान लगा कर आहट लेता रहता.
नीरेंद्र बेसन के खुशबूदार हलवे के बहुत शौकीन हैं. जी करता है नाश्ते में कोई सुबहसुबह हलवा परोस दे और वे जी भर कर खाएं. अम्मां थीं तो उन का यह पसंदीदा व्यंजन हफ्ते में 3-4 बार अवश्य मिला करता था. पर उन की मृत्यु के बाद सारे स्वाद समाप्त हो गए.
धीरेंद्र की पत्नी बेसन का हलवा देखते ही मुंह बनाती थी. खुद नीरेंद्र अम्मां की भांति कभी हलवा बना नहीं सके. अब तो बस हलवे की खुशबू मन में ही दबी रहती है.
धीरेंद्र को बेसन के पकौड़ों के एवज में कई बार बीवी के हाथ बिक जाना पड़ता है. बीवी का मन न हो तो कोई न कोई बात पक्की करवा कर ही वह पकौड़े बनाती है. नीरेंद्र भी अपने पसंद के हलवे पर नीलाम हो जाना चाहते हैं, पर वह नीलामी का चाव मन में ही दबा रह गया. अब तो रोज सुबह थोड़ा सा चिवड़ा फांक कर दफ्तर की ओर चल देते हैं.
दफ्तर में नए और पुराने सहयोगियों का रेला नीरेंद्र को देखदेख कर दबी मुसकराहट से अभिवादन करता. कम से कम इतनी तसल्ली तो जरूर रहती कि हर कोई उन से काम निकलवाने के कारण मीठीमीठी बातें तो जरूर करता है. उस के साहब, अपनीअपनी फाइल तैयार करवाने के चक्कर में उसे मसका लगाते रहते. किसी को पार्टी में जाना हो, पत्नी को ले कर बाजार जाना हो, बच्चे को अस्पताल पहुंचाना हो, तुरंत उन्हें पकड़ते. ‘‘नीरेंद्र, थोड़ा सा यह काम कर दो.’’
इतना ही नहीं दफ्तर के क्लर्क, चपरासी, माली, जमादार आदि अपने तरीके से इस अकेले व्यक्ति से नजराना वसूलते रहते. अगर देने में थोड़ी सी आनाकानी की तो वे लोग कह देते, ‘‘किस के लिए बचा रहे हो, बाबू साहब. आप की बीवी होती तो कहते, साड़ी की फरमाइश पूरी करनी है. बेटा होता तो कहते कि उस की पढ़ाई का खर्च है. अगर बेटी होती तो हम कभी धेला भी न मांगते…मगर कुंआरे व्यक्ति को भला कैसी चिंता?’’
पर धीरेंद्र को न तो दफ्तर में रुकने की जरूरत पड़ती और न ही अपने मातहतों के हाथ में चार पैसे धरने की नौबत आती. घर जल्दी लौटने के बहाने भी उसे नहीं बनाने पड़ते. खुद ही लोग समझ जाते हैं कि घर में देरी की तो जनाब की खैर नहीं.
पर नीरेंद्र किस के लिए जल्दी घर लौटें. बालकनी में टहलते ठीक नहीं लगता. अपनीअपनी छतों पर टहलते जोड़ों का आपस में हंसीमजाक सुनना अब उन से सहन नहीं होता. बारबार लगता है जैसे हर बात उन्हें ही सुनाई जा रही है. खनकती, ठुनकती हंसी वे पचा नहीं पाते. घर के अंदर भाग कर आएं तो मच्छरों की भूखी फौज उन की दुबली देह पर टूट पड़ती है. तब एक ही उपाय नजर आता है कि मच्छरदानी गिरा कर अंदर घुस जाएं और घड़ी के भागते कांटों को देखते हुए समय निकालते रहें.
इसीलिए नीरेंद्र कभीकभी वैवाहिक विज्ञापनों में स्वयं ही अपने लिए उपयुक्त पात्र तलाशने लगते हैं. पर ऐसा कभी न हो सका. कई बार समझौतों के सहारे लगा कि बात बनेगी परंतु विवाह के लिए समझौता करना उन्हें उचित नहीं लगा. अकेलेपन के कारण झिझकते हुए उन्होंने छोटे भाई की लड़की नीलू को अपने पास रख लेने का प्रस्ताव किया तो वह बचने लगा था, ‘‘पता नहीं, बच्ची की मां राजी होगी या नहीं?’’
पर नीरेंद्र बजाय बच्ची की मां से पूछने के छोटी बहन के सामने ही गिड़गिड़ा उठे थे, ‘‘कामिनी, मैं चाहता हूं, क्यों न आशू यहीं मेरे साथ रहे. उस का जिम्मा मैं उठाऊंगा.’’
‘‘आशू?’’ बहन की आंखें झुक गईं, ‘‘बाप रे, इस की दादी तो मुझे काट कर रख देंगी.’’
जवाब सुन कर नीरेंद्र चकित रह गए थे, ‘अरे यह क्या? अपनी लगभग सारी कमाई इन के बच्चों पर उड़ाता हूं. कितने दुलार से यहां उन्हें रखता हूं. हर वर्ष राखी पर मुंहमांगी चीज बहन के हाथ में रखता हूं. इतना ही नहीं, किसी भी बच्चे को कुछ भी चाहिए तो साधिकार माएं चालाकी से उन की फरमाइश लिख भेजती हैं, लेकिन क्या कोई भी अपने एक बच्चे को मेरे पास नहीं छोड़ सकती. कल को वह बच्चा मेरी पूरी संपत्ति का वारिस होगा, लेकिन सब ने मेरी मांग ठुकरा दी.’
‘‘अच्छा, आशू से ही पूछती हूं,’’ बहन ने आशू को आवाज दी थी.
नीरेंद्र उस की बातों से बेजार छत ताकने लगे थे, लेकिन आशू को सिर्फ उन की चीजें ही अच्छी लगती थीं.
कुंआरे रह कर नीरेंद्र लोगों के लिए सिर्फ एक पेड़ बन कर रह गए थे, जिसे जिस का जी चाहे, नोचे, फलफूल, लकड़ी आदि प्रत्येक रूप में उस का उपयोग करे. अपने लिए भी वे एक पेड़ की भांति थे. जैसे बसंत के मौसम में पेड़ों के नए फूलपत्ते आते हैं उसी प्रकार वे भी किसी पेड़ की तरह हरेभरे हो जाते. क्या उन्हें वर्ष भर मुसकराने का हक नहीं है? स्वयं के नोचे जाने के विरोध का भी कोई अधिकार नहीं है?