Raksha Bandhan: बहनें- भाग 3-रिश्तों में जलन का दर्द झेल चुकीं वृंदा का बेटिंयों के लिए क्या था फैसला?

वृंदा ने बात को जल्दी ही समाप्त किया और लगभग भागती हुई अपने घर आ गई. घंटेभर शांति से बैठने के बाद जब उस की सांसें स्थिर हुईं तब उसे घर छोड़ कर बाहर अकेले रहने का अपना फैसला गलत लगने लगा. कितना कहा था रवि ने कि इसी घर में पड़ी रहो, पर वह कहां मानी. स्वाभिमान और आत्मसम्मान आड़े आ रहा था. पता नहीं क्या हो गया था उसे. भूल गई थी कि औरतों का भी कहीं सम्मान होता है. पर उसे तो स्वयं पर भरोसा था, समाज पर विश्वास था. सुनीसुनाई बातें वह मानती नहीं थी.

उस के अनुभव में भी अब तक ऐसी कोई घटना नहीं थी कि वह डरती. किंतु अब तक वह पति के द्वारा छोड़ी भी तो नहीं गई थी. पति ने छोड़ा है उसे? नहीं, वृंदा स्वाभिमान से घिर जाती. वह पति के द्वारा छोड़ी गई नहीं है बल्कि उस ने अपने पति को छोड़ा था. जब वह अपने पति द्वारा दिए अपमान को न सह सकी तब डा. निगम से इतना डर क्यों? इसी साहस के बल पर वह अकेले रहने निकली है? डा. निगम जैसे तो अब पगपग पर मिलेंगे. कब तक डरेगी?

अंधेरा घिर आया था. किसी ने दरवाजा फिर खटखटाया. वृंदा फिर भयभीत हुई. भय अंदर तक समाने की कोशिश कर रहा था, किंतु वृंदा ने उठ कर पूरे साहस के साथ दरवाजा खोल दिया. दरवाजे के सामने पड़ोस में रहने वाली मिसेज श्रीवास्तव खड़ी थीं. वृंदा को उदास देख उन्हें शंका हुई. उन्होंने कारण पूछा तो वृंदा रो पड़ी तथा शाम को घटी घटना का बयान ज्यों का त्यों उन के सामने कर दिया. फिर मिसेज श्रीवास्तव के प्रयास से ही 15 दिन के भीतर उसे यह कमरा मिला था.

वृंदा ने एक गहरी सांस ली. कमरे में रखे सामान पर उस की नजर गई. इस कमरे में तमाम सामान के साथ एक अटैची भी थी, जिस में सब से नीचे एक तसवीर रखी थी. तसवीर में रवि मुसकरा रहा था. वृंदा जब उस अटैची को खोलती तो उस तसवीर को जरूर देख लेती. क्या था इस तसवीर में? क्यों इसे इतना संभाल कर रखती है वह? बारबार इसे देखने की उस की इच्छा क्यों उमड़ती है? वह तो रवि से नफरत करती है. इतनी नफरत के बाद भी वह तसवीर उस की अटैची में कैसे है? उस ने महसूस किया कि न सिर्फ अटैची में है उस की तसवीर बल्कि अपनी हर छोटीमोटी परेशानी में वह सब से पहले रवि को ही याद करती है. क्या उस के हृदय में रवि के प्रति प्रेम जैसा कुछ अब भी है?

जितनी बार वृंदा के मन में ये विचार, ये प्रश्न उठते, उतनी ही बार वह मन को विश्वास दिलाती कि ऐसा कुछ नहीं है. यह तसवीर तो वह अपनी बेटियों के लिए लाई है, खुद अपने लिए नहीं. बेटियां पूछेंगी अपने पापा के बारे में तो वह बता सकेगी कि देखो, ये हैं तुम्हारे पापा, यह चेहरा है उन का, इस चेहरे से करो नफरत कि इस चेहरे ने किया है अनाथ तुम्हें. उस की बच्चियां और अनाथ? वह क्या कर रही है फिर? उस ने अपने अस्तित्व को नकार दिया है क्या? बस रवि ही सब कुछ था क्या? दुख में रवि, खुशी में रवि, नफरत में रवि. उलझ गई है वृंदा. वह रवि को जितना नकारती है, रवि उतना ही उसे याद आता है तभी तो अटैची खोलते ही वह सामान बाद में निकालती है तसवीर को पहले देखती है.

वृंदा अब लेटी नहीं रह पा रही थी. वह उठ कर खिड़की के पास तक आई. बाहर अभी भी अंधेरा था किंतु सुबह होने में अब अधिक देर नहीं थी. सरसराती हवा कमरे में आ रही थी. वृंदा ने अपने माथे को खिड़की से टिका दिया और एक लंबी सांस ली, चलो किसी तरह एक रात और बीती.

आज बच्चों के स्कूल में ऐनुअल फंक्शन था. उस ने बच्चियों को जगाया और अपने काम में लग गई. प्राची अपने कपड़ों को उलटनेपलटने लगी. गिनती के कपड़ों में वह यह देख रही थी कि अब तक कौन सी ड्रैस पहन कर स्कूल नहीं गई है. किंतु बारबार पलटने पर भी उसे एक भी ऐसी ड्रैस नहीं मिल रही थी. इन सब कपड़ों को एक बार तो क्या कईकई बार पहन कर वह स्कूल गई है. हार कर उस ने एक पुरानी फ्रौक निकाल ली और नहाने के लिए बाथरूम में घुसी.

रश्मि अभी तक बिस्तर पर लेटी थी. प्राची को बाथरूम में जाते देख चिल्लाने लगी कि पहले वह नहाएगी. रश्मि का रोना सुन कर प्राची बाथरूम से बाहर आ गई ताकि रश्मि ही पहले नहा ले. प्राची के हाथ में फ्रौक थी. रश्मि फ्रौक को खींचती हुई बोली, ‘‘इसे मैं पहनूंगी, तुम दूसरी पहन लेना. फ्रौक बड़ी है इस बात की चिंता उसे नहीं थी. वह तो खुश थी कि प्राची यह फ्रौक नहीं पहन पाई, बस.

इधर, कुछ दिनों से वृंदा रश्मि की इन आदतों, जिस में प्राची की चीजों को छीन लेना और उसे हरा देना शामिल होता जा रहा था, से परेशान थी. और शायद इसलिए आजकल उसे डरावने सपने भी अधिक आने लगे थे. वृंदा को रश्मि के जन्म के समय मैटरनिटी होम में कहे गए उस बंगाली महिला के शब्द याद आ गए. उस के दोनों बच्चों में मात्र सालभर का अंतर है, यह जानते ही बंगाली महिला ने उसे सलाह दी थी, ‘इस को, इस के हाथ से केला खिला देना. तब वह बहन से हिंसा नहीं करेगी.’

हिंसा शब्द ईर्ष्या शब्द के पर्याय में बोला गया था. यह तो वृंदा भलीभांति समझ गई थी, किंतु केला बड़ी बेटी के हाथ से छोटी को खिलाए या छोटी बेटी के हाथ से बड़ी बेटी को, यह नहीं समझ पाई थी. समझने का प्रयास भी नहीं किया था, कहीं केला खिलाने से प्रेम और द्वेष हो सकता है भला.

पर अब उस के मन में कभीकभी आता है कि वह पूरी तरह क्यों नहीं उस बंगाली महिला की बात को समझी. समझ कर वैसा कर लेती तो शायद रश्मि प्राची से इतनी ईर्ष्या न करती. लेकिन प्राची इतनी उदार कैसे हो गई? कहीं अनजाने में उस ने रश्मि को केला खिला तो नहीं दिया था. वृंदा झुंझला उठी, क्या हो गया है उसे? किनकिन बातों में विश्वास करने लगी है वह?

स्कूल के स्टेज पर एक कार्यक्रम के बाद दूसरा कार्यक्रम था. तालियों पर तालियां बज रही थीं, किंतु वृंदा का मन अपने ही द्वारा बुने गए विचारों में उलझा था. समारोह समाप्त होने पर सब बच्चों को स्कूल की तरफ से एकएक पैकेट चिप्स और चौकलेट दी गई.  बच्चे खुश हो कर घर लौटे.

वृंदा का मन अब तक उदास था. वह बेमन से घर के कामों को निबटाने लगी.

प्राची ने रश्मि से पूछा, ‘‘रश्मि चौकलेट का स्वाद कैसा था?’’

‘‘अच्छा, बहुत अच्छा,’’ रश्मि ने इठलाते हुए जवाब दिया.

‘‘तुम्हें नहीं मिली थी क्या?’’ वृंदा के काम करते हाथ रुक गए.

‘‘हां, मिली थी.’’

‘‘फिर तुम ने भी तो खाई होगी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘रश्मि ने मांग ली थी.’’

‘‘उसे भी तो मिली होगी?’’

‘‘हां, उसे मिली थी, पर उसे और खानी थी.’’

‘‘आधी दे देनी थी, पूरी क्यों दी?’’

‘‘रश्मि रोने लगी थी, मम्मी.’’

प्राची के जवाब से वृंदा का धैर्य थर्रा कर टूट गया. उस ने प्राची के गाल पर तड़ातड़ कई थप्पड़ जड़ दिए, ‘‘उस ने मांगी और तुम ने दे दी, अपनी चीजों को बचाना नहीं आता तुम्हें? तुम दादी बन रही हो? तुम्हें क्या लगता है कि रश्मि तुम्हारा बड़ा मानसम्मान करेगी कि तुम ने हर पल अपने हिस्से को उसे दिया है…अरे, यों ही देती रहोगी तो एक दिन वह तुम से तुम्हारा जीवन भी छीन लेगी…अब उसे कुछ दोगी, बोलो, अब दोगी अपनी चीजें उसे…’’ वृंदा प्राची को मारे जा रही थी और बोले जा रही थी.

मां का रौद्र रूप देख कर रश्मि डर के मारे एक कोने में दुबक गई थी. वृंदा के मारते हाथ जब थोड़े रुके तो वह स्वयं फूटफूट कर रोने लगी और वहीं दीवार के सहारे जमीन पर बैठ गई.

घंटों रो लेने के बाद उस ने कमरे में नजर दौड़ाई. खिड़की के बाहर एक स्याह परदा पड़ गया है. भीतर की पीली रोशनी में कमरा कुछ उदास और खोयाखोया सा लग रहा था. उस की दोनों बेटियां रोतेरोते वहीं उस के पास जमीन पर ही सो गई थीं. रश्मि प्राची की गोद में दुबक गई थी और प्राची का हाथ रश्मि के सिर पर था. वृंदा का मन विह्वल हो गया. वह क्यों पिछली जिंदगी की गुत्थियों में उलझी है? 10 साल पहले घटी एक घटना का अब तक इतना गहरा प्रभाव? वह गलत राह पर है. उसे इस छाया को अपनी जिंदगी से मिटाना पड़ेगा. कितना प्रेम तो है दोनों में? वह क्यों अलगाव के बीज बो रही है. उस के इस व्यवहार से तो दोनों एकदूसरे से बहुत दूर हो जाएंगी. उस ने तय किया कि अब वह कभी पीछे लौट कर नहीं देखेगी. वह काली छाया अपनी बेटियों पर नहीं पड़ने देगी. उस ने बारीबारी से दोनों के सिर पर हाथ फेरा और आश्चर्य उसे यह हुआ कि आज इस अवसाद की स्थिति में भी उस ने रवि को याद नहीं किया.

तुम्हारी कोई गलती नहीं: भाग 2- रिया के साथ ऐसा क्या हुआ था

महीने भर में रिया के शरीर की खरोंचें और घाव तो ठीक हो गए, लेकिन वह अपने साथ हुए हादसे को भूल नहीं पा रही थी. न वह खातीपीती, न स्कूल जाने या पढ़ने को तैयार होती. बस बिस्तर पर लेटी हुई एक ही बात बोलती रहती, ‘‘मुझे मर जाने दो, मुझे मर जाने दो.’’

मम्मीपापा, भैया ने बहुत कोशिश की  वह दोबारा पढ़ने में अपना मन लगा ले तो यह हादसा भूल जाएगी, लेकिन उस की जीने की इच्छा ही खत्म हो चुकी थी. वह अपने मन की गहराई में कहीं अपनेआप को ही गुनहगार मान बैठी थी. उसे अपने शरीर से घृणा हो गई थी.

मम्मीपापा को उस के भविष्य की चिंता होने लगी. उन की मेधावी बेटी का भविष्य एक हैवान ने बरबाद कर दिया था. उन्होंने बहुत कोशिश की पता लगाने की, मगर नहीं जान पाए कि वह कौन शैतान था, जिस ने एक मासूम की खुशियां, उस का सुनहरा भविष्य, उस की प्यारी मुसकराहट सब कुछ बरबाद कर दिया.

डा. आशा अब भी कभीकभी रिया से मिलने आ जाती थीं. उन्हें उस से हमदर्दी हो गई थी. वे स्वयं भी इस घटना से बहुत दुखी और क्षुब्ध थीं और नहीं चाहती थीं कि इतनी अच्छी प्रतिभा यों घुट कर रह जाए.

एक दिन वे रिया से बोलीं, ‘‘बेटा, अब तो तुम ठीक हो चुकी हो. स्कूल जाना और पढ़ना शुरू करो. इस साल तो तुम्हें बहुत मेहनत से पढ़ना होगा, क्योंकि तुम्हें मैडिकल की तैयारी भी तो करनी है. अब समय मत गंवाओ और कल से ही स्कूल जाना शुरू करो.’’

‘‘क्या करूंगी मैं पढ़ कर? मैं अब जीना नहीं चाहती. सब कुछ खत्म हो गया.’’

उस का सदमे से भरा सपाट स्वर सुन कर आशाजी धक रह गईं. सचमुच रिया में जीने की कोई इच्छा बाकी नहीं रह गई थी. फिर भी उन्होंने कोशिश करना नहीं छोड़ा. वे उसे सम?ाने लगीं, ‘‘पढ़ कर तुम डाक्टर बनोगी. तुम्हारे तो मम्मीपापा, भाईबहन सब हैं. जीते तो वे भी हैं जिन का कोई नहीं होता. फिर तुम्हारा तो पूरा परिवार है. उन के लिए और डाक्टर बन कर लोगों का दुख बांटने के लिए तुम्हें जीना है, लोगों की सेवा करनी है. अपने लिए नहीं तो दूसरों के लिए जीना सीखो रिया. यों हिम्मत हारने से कुछ नहीं होता.’’

‘‘आप तो जानती हैं मेरे साथ क्या हुआ. मैं स्कूल जाऊंगी तो सब मु?ा से दूर भागेंगे. कौन अपनी लड़की को मेरे साथ रहने देगा. तब मेरे साथसाथ मेरे घर वालों का भी घर से बाहर निकलना बंद हो जाएगा आंटी. सब जगह मेरी बदनामी होगी,’’ और रिया फफकफफक कर रो दी.

आशाजी ने उसे रोने दिया. वे चाहती थीं कि रिया के मन का सारा गुबार निकल जाए, तभी वह कुछ अच्छा सोच और समझ पाएगी. वे चुपचाप उस की पीठ पर हाथ फेरती रहीं. जब रिया कुछ शांत हुई तब उन्होंने उसे प्यार से देखा और बोलीं, ‘‘दुनिया बस कालापीपल तक ही सीमित नहीं है. तुम दूसरे शहर भी जा सकती हो. मैं तुम्हारे पापा से कहूंगी वे अपना ट्रांसफर करा लें और ऐसी जगह चले जाएं जहां तुम्हें कोई न पहचानता हो और तुम सहजता से रह सको.’’

रिया की आंखों में क्षण भर को एक चमक सी आ गई. फिर बोली, ‘‘लेकिन मैं तो वही रहूंगी न. लोग मुझे नहीं जानेंगे, लेकिन मैं कैसे भूल पाऊंगी कि मेरे साथ क्या हुआ है?’’ रिया की आंखों में फिर एक भय उभर आया.

इसी बात का डा. आशा को डर था. दरअसल, हमारे समाज का ढांचा ही ऐसा है कि बचपन से ही लड़की को यह सिखाया जाता है कि विवाह होने तक उसे अक्षत यौवना रहना चाहिए. पति के अलावा किसी भी पुरुष के छूने या कौमार्य भंग होने से लड़की अपवित्र हो जाती है. बचपन से ही रूढिवादी समाज ऐसी मान्यताएं लड़की के मन में कूटकूट कर भर देता है और इन खोखली मान्यताओं के जाल में उलझ बेचारी पीडि़ता निर्दोष होते हुए भी किसी दूसरे के कुकर्म की सजा उम्र भर भोगने को विवश हो जाती है.

रिया भी ऐसे ही समाज में पलीबढ़ी है, इसलिए उस में भी ऐसे ही संस्कार भरे हुए हैं. समाज में भले ही किसी को पता न चले पर वह स्वयं अपनेआप को उम्र भर के लिए अपवित्र हो गई है, मान बैठी है. पर डा. आशा ऐसा हरगिज नहीं होने देना चाहती थीं.

‘‘तुम्हें भूलना होगा रिया,’’ आशाजी कठोर स्वर में बोलीं, ‘‘क्या लोगों के ऐक्सीडैंट नहीं होते? हाथपैर नहीं टूटते? उस के लिए तो लोग जिंदगी भर मुंह छिपा कर रोते नहीं रहते? फिर तुम क्यों रोओगी? जो कुछ भी हुआ उस में तुम्हारा क्या दोष है? यह तुम्हारा कुसूर नहीं है. हमारे संस्कार ही ऐसे हैं कि इस केस में हमेशा लड़की को ही दोषी ठहराया जाता है. वह नीच राक्षस तो समाज में सिर ऊंचा कर के चलता है और पीडि़त लड़की कोई गलती न होने के बाद भी ताउम्र एक अपराधबोध से ग्रस्त रहती है.

‘‘लेकिन मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगी रिया. मैं किसी भी हालत में तुम्हारी प्रतिभा को बरबाद नहीं होने दूंगी. तुम न गलत हो, न ही दोषी. गलत और दोषी तो वह हैवान था. तुम्हें इस घटना को रात में देखा गया बुरा सपना समझ कर भूलना ही होगा. एक सुनहरा भविष्य तुम्हारा इंतजार कर रहा है.’’

‘‘मैं किसी आश्रम या मिशनरी चली जाऊंगी. ईश्वर की आराधना कर लोगों की सेवा में अपना जीवन बिता लूंगी,’’ रिया ने उदास स्वर में कहा.

‘‘ईश्वर होता तो तुम्हारे साथ यह होने देता? वह पत्थर या मूर्तियों में कभी नहीं होता और तुम्हें अभी इन धार्मिक स्थलों और आश्रमों की सचाई पता नहीं है. ऐसी बात भी अपने मन में कभी मत लाना. धर्म के तथाकथित ठेकेदार भगवान और धर्म के नाम पर अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए इन आश्रमों में ऐसेऐसे काले कारनामे करते हैं, जिन के बारे में कोई दूसरा सोच भी नहीं सकता. मैं तुम्हें अपने बचपन की एक घटना बताती हूं.’’

डाक्टर आशा ने 2 मिनट रुक कर अपने माथे से पसीना पोंछा और आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं तब 10-11 साल की थी और छुट्टियों में नानी के गांव गई थी. नानी के पड़ोस में एक परिवार रहता था. उन की 16-17 वर्ष की एक छोटी बेटी थी, जो बहुत सुंदर व गुणवान थी. मैं सारा दिन दीदीदीदी कहती उस के आसपास घूमती रहती थी. एक दिन खेत से वह अकेली लौट रही थी. पिता जरूरी काम से खेत पर ही रुक गए थे.

रिया पलंग पर लेटी तो उसे देर तक नींद नहीं आई. वह भी नीरज से काफी प्रभावित हुई थी. जिंदगी में पहली बार किसी ने उस के दिल के एक कोने को छू लिया था. लेकिन वह बारबार यह सोच रही थी कि क्या वह नीरज को अपने अतीत के बारे में बता दे या चुप रह कर रिश्ता स्वीकार कर ले? अगर वह बता देती है, तो नीरज से रिश्ता टूटना तय था और अगर नहीं बताती तो सारी उम्र उस के मन पर एक बोझ रहेगा और वह यह बोझ ले कर जी नहीं पाएगी.

रिया बेचैनी में उठ कर टहलने लगी. उस का अतीत उस की आंखों के सामने नाचने लगा… तब रिया के पिता कालापीपल नामक छोटे कसबे में रहते थे. 2 साल के लिए उन की पोस्टिंग वहां हुई थी. हंसताखेलता सुखी परिवार था उन का, जिस में उन के बच्चे रिया, उस का बड़ा भाई और छोटी बहन थी. तीनों ही मेधावी छात्र थे. उन का बड़ा सा सरकारी बंगला कसबे से बाहर की ओर था.

रिया तब मात्र 16 साल की किशोरी थी. अपने रंगरूप और मेधावी होने के कारण वह सब की लाडली थी. पूरे कसबे में उस की सुंदरता के चर्चे थे. लड़के उस की एक झलक पाने के लिए उस के स्कूल के आसपास चक्कर काटते थे, लेकिन रिया इन सब बातों से बेखबर अपनी ही दुनिया में मस्त रहती थी. वह खुशमिजाज थी, हमेशा हंसती रहती और सब से मीठा व्यवहार करती.

रिया तब 11वीं कक्षा में पढ़ती थी. अगले साल उसे मैडिकल की प्रवेश परीक्षा देनी थी. कसबे में एक टीचर थे सिद्धार्थ सर. वे बौटनी और जुलौजी बहुत अच्छा पढ़ाते थे. उन से पढ़े हुए बहुत से स्टूडैंट्स का चयन मैडिकल में हो चुका था. रिया ने 11वीं कक्षा की परीक्षा समाप्त होते ही एक सीनियर से 12वीं कक्षा की किताबें लीं और सिद्धार्थ सर के यहां पढ़ने जाने लगी. उन का घर कसबे के बिलकुल दूसरे छोर पर था और वहां ज्यादा घनी बस्ती भी नहीं थी.

यह 27 जून की बात है. मानसून आ चुका था. शाम 6 बजे तक आसमान बिलकुल साफ था. रिया अपनी स्कूटी उठा कर पढ़ने चली गई. उस की 2 सहेलियां भी उस के साथ पढ़ती थीं. पढ़ाई के बाद उन के बीच स्कूल की पढ़ाई और पीएमटी की तैयारी पर चर्चा होने लगी. ऐसे में रात के 8 कब बज गए, पता ही नहीं चला. बाहर आसमान पर बादल छाए हुए थे. रिया की सहेलियां पास ही में रहती थीं. अत: वे पैदल ही चली गईं.

रिया ने भी अपनी स्कूटी उठाई और घर की ओर तेजी से चल दी. अभी वह आधा किलोमीटर दूर भी नहीं पहुंची होगी कि तेज बारिश शुरू हो गई. रिया बारिश से तरबतर हो गई.

तभी अचानक रिया की स्कूटी चलतेचलते रुक गई. रिया स्कूटी से उतर कर किक लगा कर उसे स्टार्ट करने की कोशिश करने लगी मगर गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई. उसे अपनेआप पर गुस्सा आया कि सहेलियों ने कहा था, मगर वह उन के घर नहीं गई. सोचा था कि बारिश शुरू होने से पहले ही घर पहुंच जाएगी, लेकिन अब क्या हो सकता है?

रिया का घर 2 किलोमीटर आगे है और सहेलियों के लगभग इतना ही पीछे. आखिर उस ने तय किया कि स्कूटी को ताला लगा कर यहीं खड़ी कर पैदल ही घर चली जाएगी. आते समय धूप थी इसलिए वह रेनकोट भी नहीं लाई थी. वह जिस स्थान पर थी, वह एकदम सुनसान था.

स्ट्रीट लाइट की रोशनी में वह थोड़ा ही आगे बढ़ी थी कि अचानक बिजली गरजी और लाइट चली गई. चारों ओर घुप्प अंधेरा हो गया. रिया का दिल जोरों से धड़कने लगा. वह अपना बैग सीने से दबाए तेजी से घर की ओर भागने लगी कि तभी 2 मजबूत हाथों ने उसे पीछे से दबोच लिया. रिया की चीख निकल गई. वह छूटने के लिए बहुत छटपटाई, चीखीचिल्लाई, लेकिन उस की चीखें मूसलाधार बारिश और बिजली की गड़गड़ाहट में दब कर रह गईं. हवस में अंधे नरपिशाच के आगे रिया बेदम हो गई.

जब उसे होश आया उस समय वह अपने पलंग पर अधमरी पड़ी थी. सुबह के शायद 8 बजे थे. मम्मीपापा व दोनों भाईबहन सहमे से खड़े थे. मम्मी के आंसू थम ही नहीं रहे थे. रिया को होश आता देख कर सब लोग उस के आसपास सिमट आए. रिया ने निर्जीव निगाहों से सब की ओर देखा और तभी उस के मस्तिष्क में रात की घटना कौंध गई और वह चीख मार कर पुन: बेहोश हो गई.

4-5 दिन बाद रिया की तबीयत जरा संभली. डाक्टर आशा सुबहशाम रिया का चैकअप करने आतीं. अपने सामने उसे सूप या जूस वगैरह दिलवातीं.

इस घटना को 1 माह बीत गया. रिया अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली. घर वालों की बातों से पता चला कि उस रात जब वह काफी देर तक घर नहीं पहुंची, तो उस का भाई उसे ढूंढ़ने निकला. रास्ते में ही उसे रिया की किताबें पड़ी दिखाई दे गईं और पास ही सड़क से थोड़ा हट कर झडि़यों में रिया पड़ी मिली.

घर के नौकरचाकरों को यही पता है कि वह स्कूटी से फिसल कर गिर पड़ी है. उस के स्कूल में भी यही खबर भिजवाई गई थी. उस की सहेलियां जब भी उसे देखने आतीं कोई न कोई बहाना बना कर उस का भाई उन्हें उस से मिलने से रोक देता था.

अंशिका: भाग 2- क्या दोबारा अपने बचपन का प्यार छोड़ पाएगी वो?

समय के भी पंख होते हैं. देखते ही देखते मेरी फाइनल परीक्षा भी खत्म हो गई. आखिरी पेपर के दिन शांत ने दोपहर को एक रैस्टोरैंट में मिलने को कहा. वहां हम दोनों कैबिन में बैठे और शांत ने कुछ स्नैक्स और कौफी और्डर की.

शांत ने कहा, ‘‘तनु, तुम ने ग्रैजुएशन के बाद क्या सोचा है? आगे पीजी करनी है?’’

मैं ने कहा, ‘‘अभी कुछ तय नहीं है. वैसे मातापिता को कहते सुना है कि तनुजा की अब शादी कर देनी चाहिए. शायद किसी लड़के से बात भी चल रही है.’’

मैं ने महसूस किया कि शादी शब्द सुनते ही उस के चेहरे पर एक उदासी सी छा गई थी.

फिर शांत बोला, ‘‘तुम्हारे मातापिता ने तुम से राय ली है? तुम्हारी अपनी भी तो कोई पसंद होगी? तुम्हें यहां बुलाने का एक विशेष कारण है. याद है एक दिन मैं ने कहा था कि तुम्हें इलू का मतलब बताऊंगा. आज मैं ने तुम्हें इसीलिए बुलाया है.’’

‘‘तो फिर जल्दी बताओ,’’ मैं ने कहा.

‘‘मेरे इलू का मतलब आई लव यू है,’’ शांत ने कहा.

मैं बोली, ‘‘तुम्हारे मुख से यह सुन कर खुशी हुई. पर हमेशा अव्वल रहने वाले शांत ने प्यार का इजहार करने में इतनी देर क्यों कर दी? मेरे आगे की पढ़ाई और शादी के बारे में अपने मातापिता का विचार जानने की कोशिश करूंगी, फिर आगे बात करती हूं. मुझे तो तुम्हारा साथ वर्षों से प्यारा है,’’ इस के बाद मैं ने उस का हाथ दबाते हुए घर ड्रौप करने को कहा.

मेरे मातापिता शांत को पसंद नहीं करते थे. मेरे गै्रजुएशन का रिजल्ट भी आ गया था और मैं अपने रिजल्ट से खुश थी. इस दौरान मां ने मुझे बताया कि मेरी शादी एक लड़के से लगभग तय है. लड़के की ‘हां’ कहने की देरी है. इसी रविवार लड़का मुझे देखने आ रहा है. मैं ने मां से कहा भी कि मुझे पीजी करने दो, पर वे नहीं मानीं. कहा कि मेरे पापा भी यही चाहते हैं. लड़का सुंदर है, इंजीनियर है और अच्छे परिवार का है. मैं ने मां से कहा भी कि एक बार मुझ से पूछा होता… मेरी पसंद भी जानने की कोशिश करतीं.

अभी रविवार में 4 दिन थे. पापा ने भी एक दिन कहा कि संजय (लड़के का नाम) 4 दिन बाद मुझे देखने आ रहा था. मैं ने उन से भी कहा कि मेरी शादी अभी न कर आगे पढ़ने दें. पर उन्होंने सख्ती से मना कर दिया. मै ने दबी आवाज में कहा कि इस घर में किसी को मेरी पसंद की परवाह नहीं है. तब पापा ने गुस्से में कहा कि तेरी पसंद हम जानते हैं, तेरी पसंद प्रशांत है न? पर यह असंभव है. प्रशांत बंगाली बनिया है और हम हिंदी भाषी ब्राह्मण हैं.

मैं ने एक बार फिर विरोध के स्वर में पापा से कहा कि आखिर प्रशांत में क्या बुराई है? उन का जवाब और सख्त था कि मुझे प्रशांत या मातापिता में से किसी एक को चुनना होगा. इस के आगे मैं कुछ नहीं बोल सकी.

अगले दिन मैं ने शांत से उसी रैस्टोरैंट में मिलने को कहा. मैं ने घर की स्थिति से उसे अवगत कराया.

शांत ने कहा, ‘‘देखो तनु प्यार तो मैं तुम्हीं से करता हूं और आगे भी करता रहूंगा. पर नियति को हम बदल नहीं सकते. अभी मेरी पढ़ाई पूरी करने में समय लगेगा…और तुम जानती हो आजकल केवल एमबीबीएस से कुछ नहीं होता है…मुझे एमएस करना होगा…मुझे सैटल होने में काफी समय लगेगा. अगर इतना इंतजार तुम्हारे मातापिता कर सकते हैं, तो एक बार मैं उन से मिल कर बात कर सकता हूं…मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे मातापिता को इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं होगा.’’

कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने कहा, ‘‘मुझे कोई फायदा नहीं दिखता, बल्कि मुझे डर है कि कहीं वे तुम्हारा अपमान न करें जो मुझे गंवारा नहीं.’’

इस पर शांत ने कहा था कि मेरे प्यार के लिए वह यह रिस्क लेने को तैयार है. आखिर वही हुआ जिस का डर था. पापा ने उसे दरवाजे से ही यह कह कर लौटा दिया कि उस के आने की वजह उन्हें मालूम है, जो उन्हें हरगिज स्वीकार नहीं. अगले दिन शांत फिर मुझ से मिला. मैं ने ही उस से कहा था कि मेरे घर कल उस के साथ जो कुछ हुआ उस पर मैं शर्मिंदा हूं और उन की ओर से मुझे माफ कर दे. शांत ने बड़ी शांति से कहा कि इस में माफी मांगने का सवाल ही नहीं है. सब कुछ समय पर छोड़ दो. मातापिता के विरुद्ध जा कर इस समय कोर्ट मैरिज करने की स्थिति में हम नहीं हैं और न ही ऐसा करना उचित है.

मैं भी उस की बात से सहमत थी और फिर अपने घर चली आई. भविष्य को समय के हवाले कर हालात से समझौता कर लिया था.

रविवार के दिन संजय अपने मातापिता के साथ मुझे देखने आए. देखना क्या बस औपचारिकता थी. उन की तरफ से हां होनी ही थी. संजय की मां ने एक सोने की चेन मेरे गले में डाल कर रिश्ते पर मुहर लगा दी. 1 महीने के अंदर मेरी शादी भी हो गई.

संजय पीडब्ल्यूडी में इंजीनियर थे और पटना में ही पोस्टेड थे. चंद हफ्तों बाद मेरा जन्मदिन था. संजय ने एक पार्टी रखी थी तो मुझ से भी निमंत्रण पाने वालों की लिस्ट दिखाते हुए पूछा था कि मैं किसी और को बुलाना चाहूंगी क्या? तब मैं ने प्रशांत का नाम जोड़ दिया और उस का पता और फोन नंबर भी लिख दिया था. शांत अब होस्टल में रहने लगा था. संजय के पूछने पर मैं ने बताया कि वह मेरे बचपन का दोस्त है.

संजय ने चुटकी लेते हुए पूछा था, ‘‘ओनली फ्रैंड या बौयफ्रैंड…’’

मैं ने उन की बातचीत काट कर कहा था, ‘‘प्लीज, दोबारा ऐसा न बोलें.’’

संजय ने कहा, ‘‘सौरी, मैं तो यों ही मजाक कर रहा था.’’

खैर, संजय ने शानदार पार्टी रखी थी. शांत भी आया था. संजय और शांत दोनों काफी घुलमिल कर बातें कर रहे थे. बीचबीच में दोनों ठहाके भी लगा रहे थे. मुझे भी यह देख कर खुशी हो रही थी और मेरे मन में जो डर था कि शांत को ले कर संजय को कोई गलतफहमी तो नहीं, वह भी दूर हो चुकी थी.

Raksha Bandhan: बहनें- भाग 2-रिश्तों में जलन का दर्द झेल चुकीं वृंदा का बेटिंयों के लिए क्या था फैसला?

वृंदा को लगा था कि शादी की बात सुनते ही सास के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ेगा. ‘ऐसा कैसे होगा? मेरे जीतेजी ऐसा नहीं हो सकता.’ इस तरह का कोई वाक्य वे बोलेंगी. किंतु उन्होंने तो सपाट सा जवाब दे कर पल्लू झाड़ लिया.

वृंदा का गला भर्रा गया, ‘मां, आप ऐसा कैसे बोल रही हैं? आप मुझे बहू बना कर इस घर में लाई हैं. क्या आप यह सब होने देंगी? मेरे लिए कुछ भी नहीं करेंगी?’

‘मैं क्या करूंगी? तुम्हारी बहन है, तुम देखो.’

‘लाख मेरी बहन है, घुस तो आप के बेटे के संसार में रही है न. आप अपने बेटे को समझा सकती हैं. कुंदा का विरोध कर सकती हैं. मैं ने आप से कहा तो था कि मैं डिलिवरी के लिए अपनी मां के यहां चली जाती हूं, तब आप ने स्वास्थ्य की दुहाई दे कर मुझे यहीं रोक लिया था. आप के कहने पर ही मैं ने कुंदा को यहां बुलाया था.’

हमेशा उन के सामने चुप रह जाने वाली वृंदा का इतना बोलना सास से सहन नहीं हुआ और उन का क्रोध भभक पड़ा, ‘अब मुझे क्या पता था कि तुम्हारी बहन के लक्षण खराब हैं. पता नहीं कौन से संस्कार दिए थे तुम्हारी मां ने. वैसे यह कोई बड़ी बात भी नहीं हो गई है. तुम्हें कोई घर से निकाल रहा है क्या? रवि तो कहता है कि दूसरी शादी भी कर लूंगा तब भी वृंदा को इस घर से बेघर नहीं करूंगा. अपनी जिम्मेदारी की समझ है उसे.’

तो ये भी रवि की योजना में शामिल हैं. मां के दिए संस्कार की बात कर रही हैं. जो काम कुंदा कर रही है वही तो इन का बेटा भी कर रहा है बल्कि दो कदम आगे बढ़ कर अपनी पहली पत्नी और 2 बच्चियों को छोड़ कर. इन्होंने कौन से संस्कार दिए हैं अपने बेटे को. एहसान बता रही हैं कि घर से नहीं निकाला जा रहा है उसे. अरे कौन होते हैं ये लोग घर से निकालने वाले? शादी कर के आई है यहां. पूरा हक है इस घर पर. यहां से निकलना होगा तो वह खुद ही निकल जाएगी.

जिम्मेदारी की क्या खाक समझ है इन लोगों को? कोई नौकरानी है वह कि सुविधाएं दे देंगे. पगार दे देंगे. उतने से वह खुश हो जाएगी. ये सास हैं? इन के तमाम नखरों को बड़े प्रेम और आदर के साथ झेलते हुए उस ने 5 साल बिता दिए किंतु इस घर की रीतिनीति समझ ही न पाई.

ये वही सास हैं जिन को उस ने मां का दरजा दिया था. इतनी कठोर. इन से डरती रही थी वह. ये तो नफरत के काबिल भी नहीं हैं. वृंदा के सिर से पल्ला सरक कर नीचे गिर गया जिसे फिर से सिर पर रखने की जरूरत उस ने महसूस नहीं की और हिकारत भरी नजर से सास को देखती हुई उठ आई.

वृंदा के मन से सास का आदर एक झटके में ही समाप्त हो गया और इस परिस्थिति से लड़ने की हिम्मत पनपने लगी. उस ने सोचा, अब रवि के सिवा किसी से वह इस विषय पर बात नहीं करेगी. था ही कौन उस का? पिता बहुत पहले ही चल बसे थे. मां के बस का कुछ है नहीं. अब उसे खुद ही सोचना पड़ेगा. इस समस्या से उबरना तो है ही.

मां को उस ने न तो चिट्ठी लिखी, न फोन किया. कुंदा से इस विषय पर बात करने की उस की इच्छा ही नहीं हुई. किंतु रवि? रवि पर तो उस का अधिकार है. वह अपने अधिकार को नहीं छोड़ेगी.

उस दिन से कईकई बार उस ने रवि को समझाने का प्रयास किया था. अपने प्यार का हवाला दिया. बच्चों की तरफ देखने की प्रार्थना की. ‘उस के बिना नहीं रह पाएगी’ कह कर जारजार रोई भी थी, पर रवि का मन काबू में नहीं था. उस की नजरें अन्य सारी बातों को पछाड़ देतीं. बस कुंदा का चेहरा ही उसे दिखता था. वृंदा हताश हो गई थी. अब घर में चौबीसों घंटे तनाव रहने लगा था.

फिर मां आ पहुंचीं. उस की अपनी मां. बताया तो उस ने नहीं था पर मां सब जान गई थीं पर आ कर भी कर कुछ नहीं पाई थीं वे. हार कर वृंदा के आगे ही आंचल पसार दिया था उन्होंने. वृंदा समझ गई थी कि अब मां भी उन्हीं लोगों की भाषा बोलना चाह रही हैं. कोई उस की पीड़ा को नहीं समझता. मां भी नहीं. मां की 2 बेटियां एक ही सुख की कामना किए हैं, मां किस की पीड़ा समझें. अपने सामने फैले मां के आंचल को वृंदा ने अपने हाथों से नीचे किया और बोली, ‘मैं तुम्हारे आंचल में अब कुछ नहीं डाल पाऊंगी

मां. मैं यह घर छोड़ दूंगी. तुम मुझ से कुछ मत मांगो. मैं देने में असमर्थ हूं. मेरी नियति अकेले बहने की है मां. मैं बहूंगी, यहां नहीं रुकूंगी.’

‘कहां जाओगी…? अकेले रहना आसान है क्या? तुम रह भी लो, पर ये बच्चियां? इन्हें पिता से क्यों अलग कर रही हो?’

‘मैं अलग कर रही हूं मां? मैं? रवि ने सोचा इन के बारे में? इन की किस्मत में पिता का सुख नहीं है मां, अपना दम घोंट कर मैं इन्हें पिता का सुख नहीं दे सकती.’

‘बेटा, राजा दशरथ ने भी…’

‘बस करो मां, बस करो. क्या हो गया है तुम्हें? कुछ नहीं कर सकती हो तो कम से कम चुप ही रहो. अब तक मैं यहां इसलिए रही मां, क्योंकि यह मेरा घर था. पूरे हक से रहती थी यहां, अब दया पर नहीं रहूंगी. कह दो कुंदा से, मैं ने उसे अपना पति दे दिया.’

मां वृंदा से लिपट कर फूटफूट कर रोईं. मां वृंदा की मनोव्यथा समझ रही थीं. क्या करें मां. इस उम्र में किसी समस्या से जूझने की शक्ति खो चुकी हैं. वे चाहती हैं कि शांति से इस का निबटारा हो जाए तो न उन्हें कुंदा की चिंता होगी और न ही वृंदा की. दोनों बेटियों के प्रेम में पड़ी मां समझ नहीं पा रही हैं कि वृंदा आखिर पति को बांटे भी तो कैसे?

6 महीने से वृंदा स्थिति को बदलने का प्रयास कर रही है किंतु जब ज्वालामुखी फट ही चुका है तो कब तक वह इस के लावे से बचेगी. इस लावे में झुलस कर दफन नहीं होना है उसे. जानती है वृंदा कि उस का वजूद अब बिखर चुका है किंतु वह उसे समेटेगी. अपनी खातिर नहीं, अपनी बच्चियों की खातिर.

घर छोड़ कर जब वह अलग रहने के लिए निकली थी तब उसे 2 कमरों का मकान मिल गया था. जगह अच्छी थी किंतु रवि के दूसरे ब्याह की खबर उस से पहले इस घर में पहुंची थी. मिसेज निगम बड़ी नेक विचारों की थीं. हर छोटीमोटी तकलीफों में वृंदा को उन्हीं का सहारा था.

एक दिन शाम को डा. निगम ने वृंदा का दरवाजा खटखटा कर बताया कि उस के लिए फोन आया है. कई बार वृंदा की मां का फोन उन के घर आ जाता था. फोन आने पर उसे निगम की लड़कियां ही बुलाने आती थीं. आज क्या इन के घर में कोई नहीं है? वृंदा असमंजस में थी. वह फोन पर बात करने जाए या न जाए. थोड़ी देर बाद डा. निगम ने फिर आवाज लगाई. मन की तमाम उलझनों के बावजूद भी वृंदा इस बार फोन पर बात करने चली गई.

वृंदा जब तक वहां पहुंची फोन कट गया था. वह वहीं बैठ कर फोन आने का इंतजार करने लगी. डा. निगम वृंदा की बेटियों से बातें कर रहे थे पर उन की नजरें वृंदा की तरफ ही उठ आती थीं. वृंदा असहज हो गई. डर के मारे उस की सांसें चलने लगीं. वह उठ कर अपने घर लौट आना चाहती थी तभी फोन की घंटी बजी. डा. निगम ने फोन उठाया. फोन उस की मां का ही था. वृंदा रिसीवर लेने आगे बढ़ी और उस ने महसूस किया कि यह जो रिसीवर देते समय डा. निगम की उंगलियां उस के हाथों से कुछ गहराई तक छू गईं वह अनजाने में नहीं हुआ.

Film Review: ड्रीम गर्ल 2 -आयुश्मान खुराना के कैरियर पर लगा प्रश्न चिन्ह..?

रेटिंग: पांच में से एक स्टार

 निर्माता: एकता कपूर शोभा कपूर

लेखनः राज शांडिल्य नरेश कथूरिया

निर्देषन: राज शांडिल्य

कलाकार:आयुश्मान खुराना,अनन्या पांडे,अन्नू कपूर,परेश रावल,राजपाल यादव,अभिषेक बनर्जी,मनजोत सिंह, मनोज जोशी सीमा पाहवा,विजय राज,असरानी अन्य.

अवधिः दो घंटे तेरह मिनट

लगातार आठ वर्ष तक  टीवी शो ‘‘कौमेडी सर्कस’’ के संवाद लिखते रहे राज शांडिल्य ने बाद में कुछ असफल फिल्मों के भी संवाद लिखे, मगर बतौर लेखक व निर्देशक 2019 में आयी उनकी फिल्म ‘‘ड्रीम गर्ल’’ ने सफलता के परचम लहरा दिए थे. उसी फिल्म का सिक्अवल ‘ड्रीम गर्ल 2’’ लेकर अब वह आए हैं और उन्होने बता दिया कि वह महज व्हाट्सअप युनिवर्सिटी के चेले है,जिन्हे एक अच्छी कहानी,पटकथा व संवाद लिखना नही आता और न ही वह अच्छे निर्देशक हैं. वास्तव में राज शांडिल्य ने टीवी एपीसोडिक की तरह कुछ हास्य एपीसोड ‘व्हाट्सअप युनिवर्सिटी’ की मदद से लिख डाले, मगर उन्हे फिल्म की कहानी के रूप में बुनना नहीं आया. राज शांडिल्य वही हैं,जिन पर पिछली फिल्म ‘जनहित में जारी’ पर चोरी की कहानी होने का आरोप लगा था और मामला अदालत पहुॅचा,तब लेखक को बड़ी रकम देकर छुटकारा पाया था.

कहानी:

फिल्म ‘‘ड्रीम गर्ल 2‘’ की कहानी मथुरा में यमुना नदी के किनारे रह रहे जगजीत(अन्नू कपूर) व उनके बेटे करम (आयुश्मान खुराना ) के इर्द गिर्द घूमती है. पिछली फिल्म की तरह इस फिल्म में भी करम अपने पिता का कर्ज चुकाने के लिए हर दिन संघर्ष कर रहा है. लेकिन इस बार उसकी जिंदगी में वकालत कर रही परी (अनन्या पांडे  ) आ गयी हैं. परी के वकील पिता श्रीवास्तव ( मनोज जोशी  ),करम के घर के हालात देखकर शर्त रख देते हैं कि करम को शादी से पहले छह माह के अंदर अच्छा घर और अपने खाते में 25 लाख रुपये जमा करके दिखाने होंगे. यहीं से सारा झोल शुरू होता है.

करम पहले तो लेना देना बैंक के टाइगर पांडे(रंजन राज)  से पूजा बन लड़की की आवाज में बात करके अपने पिता के क्रेडिट कार्ड की रकम भरवाते हैं.पिछली फिल्म में करम नाटकों में सीता या राधा बनते थे,इस बार करम अपने दोस्त स्माइली(मनजोत सिंह)  की सलाह मानकर निजी जिंदगी में लड़की यानी कि पूजा बनकर बार डांस में डांस करने से लेकर अपने दोस्त स्माइली की शादी अबू सलीम ( परेश रावल)की बेटी सकीना (अनुषा मिश्रा) से हो सके,इसलिए स्माइली के कहने पर करम उर्फ पूजा अबू सलीम के अवसादग्रस्त बेटे शाहरुख ( अभिषेक बनर्जी) के साथ शादी करते हैं. जबकि शाहरुख का सौतेला भाई षौकिया (राजपाल यादव )  खुद पूजा से शादी करना चाहता है. उधर बार डांस के मालिक साजन तिवारी उर्फ सोना भाई (विजय राज)  के दो बच्चों की मां बनने के लिए भी हामी भरते हैं. जबकि करम के साथ शाहरुख की बुआ और साजन की पत्नी जुमानी (सीमा पाहवा) शादी करना चाहती हैं. अब इन्हीं मुश्किलों के चलते हास्य पैदा होता है.

लेखन निर्देशनः

इस बार राज शांडिल्य ने लेखन में नरेश कथूरिया की मदद ली है. इसके बावजूद पटकथा व संवाद अति कमजोर हैं.पर फूहड़ संवाद भरे पड़े हैं. राज शांडिल्य ने फिल्म में गंगा जमुनी तहजीब परोसते हुए भारतीय संस्कृति का जमकर माखौल उड़ाया है. श्रीलंका के आर्थिक संकट से लेकर बूढ़े इंसान की उम्र तक पर जिस तरह का अति फूहड़ व घटिया मजाक उड़ाया गया है,उससे यह लगता है कि राज शांडिल्य भारत में नही बल्कि उस देश के निवासी हैं,जहां रिश्तों व मानवता की कोई कद्र नही है. कई दृष्यों में लेखक व निर्देशक की असंवेदन शीलता नजर आती है. फिल्मकार ने पटकथा की कमी को छिपाने के लिए फिल्म में परेश रावल, अन्नू कपूर और राजपाल  यादव से लेकर मनोज जोशी, सीमा पाहवा, विजय राज, अभिषेक बनर्जी, मनजोत सिंह जैसे हास्य कलाकारों की पूरी बरात जमा कर ली,पर फिल्म अच्छी न बना सके. फिल्म के क्लायमेक्स में जब परी नाव पर यमुना नदी से अपनी बारात लेकर आती हैं,वह दृश्य अवश्य खूबसूरत लगता है.

फिल्म का गीत संगीत भी स्तरहीन ही है. मजेदार बात यह है कि इस फिल्म में भी ‘गदर 2’ का गाना ‘में गड्डी लेके निकला..’ को बैकग्राउंड में डाला गया है. ऐसा क्यों यह तो निर्माता व निर्देशक ही जाने?

अभिनयः

करम व पूजा का किरदार निभाने वाले तथा खुद को ‘गृहशोभा मैन’ कहने वाले अभिनेता आयुश्मान खुराना शुरू से ही अलग तरह का सिनेमा कर लोकप्रियता हासिल करते आए हैं,मगर पिछले कुछ समय से उनकी फिल्में असफल हो रही हैं और उनके अभिनय में भी कमी नजर आने लगी है. फिल्म ‘ड्रीं गर्ल’ में वह पूजा के रूप में काल सेंटर में सिर्फ लड़की की आवाज में बात करते थे.

लेकिन ‘ड्रीम गर्ल 2’ मे तो वह पूजा नामक लड़की बने हैं और इस बार उनके दिमाग सिर्फ यही था कि उन्हे लड़की बनना है.वैसे आयुष्मान खुराना ने अपनी तरफ से नारी सुलभ भाव व नखरों से लोगों को आकर्षित करने का प्रयास करते हुए नजर आते हैं,मगर वह शास्त्रीय नृत्य के जानकर नही है. इसके अलावा उन्हे पटकथा व संवादो का भी आपेक्षित सहयोग नही मिला,इसलिए वह मार खा गए.

आयुश्मान खुराना को याद रखना चाहिए था कि उनकी तुलना ‘चाची 420’ के कमल हासन के संग भी की जा सकती है. उनके कमजोर अभिनय ने फिल्म का बंटाधार कर दिया. इस फिल्म की कमजोर कड़ी में परी का किरदार निभाने वाली अदाकारा अनन्या पांडे हैं. जो कि महज नेपोटिजम के भरोसे फिल्में पा रही हैं. मगर वह परदे पर उनके अभिनय का जादू नजर नही आता. परदे पर अनन्या को देखकर अहसास होता है कि वह संवादों को याद रखने के चक्कर में उनका ध्यान अभिनय से भटक रहा है. कलाकार के तौर पर वह दृश्य की जरुरत  और अपने संवादों की गहराई समझ ही नही पा रही हैं. शायद निर्देषक भी उन्हे समझाने में असफल रहे हैं. अपने अभिनय को निखारने के लिए अनन्या पांडे को अभी बहुत मेहनत करने की जरुरत है.अन्नू कपूर,राजपाल यादव,सीमा पाहवा,विजय राज,परेश रावल,मनोज जोशी,मनजोत सिंह व अभिषेक बनर्जी ने अपनी तरफ से बेहतर अभ्निय करने का प्रयास किया है.मगर यदि पटकथा व संवाद ही गड़बड़ हो तो यह क्या करते?

अनुपमा में आया ट्विस्ट, पाखी अधिक को छोड़ थामेगी रोमिल का हाथ

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ को लेकर दर्शकों के बीच खासी दिवानगी देखने को मिलती है. जबसे ‘अनुपमा’ टेलीकस्ट हुआ है तभी से टीआरपी में आगे हैं. रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ में फुल ऑन ड्रामा चल रहा है. टीवी सीरियल में अब ढेर सारे ट्विस्ट आने वाले हैं, जिससे अनुपमा की जिंदगी में फिर से हंगामा होगा. आइए आपको सीरियल अपकमिंग एपिसोड के बारे में ट्विस्ट बताते हैं.

अधिक पाखी को मरेगा

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ में अधिक का असली चेहरा सब जान गए हैं, जिस वजह से वह पखी के साथ अच्छा बर्ताव कर रहा है. वहीं शो में जल्द ही अधिक फिर से पाखी के साथ मारपीट करेगा.

पाखी रोमिल का हाथ थामेगी

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ के बीते एपिसोड में रोमिल ने पाखी को समझाया था कि वह अधिक का टेस्ट ले. वह पाखी का साथ देने की बात करता है. कहानी में आगे रोमिल ही पाखी के साथ खड़ा होगा.

अधिक पर अनुपमा-अनुज भड़केंगे

एक बार फिर से पाखी के साथ मारपीट को लेकर अधिक पर अनुपमा और अनुज का गुस्सा फुटेगा. अनुपमा के गुस्से से अधिक को कोई नहीं बचा पाएगा.

डिंपल से दूर होगा समर

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ में एंटरटेनमेंट का डोज यहीं खत्म नहीं होता. शो में आगे देखने को मिलेगा कि डिंपल घर में काफी ज्यादा चिढ़-चिढ़ करने लगेगी. इस वजह से उसका झगड़ा समर से भी बढ़ जाएगा. समर अब डिंपल को दो बातें सुनाना शुरू कर देगा. ऐसे में दोनों के बीच दूरी आएगी.

रोमिल और बरखा में होगी लड़ाई

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में देखने को मिलेगा कि रोमिल से बरखा पंगा लेती है. वह आधी रात को रोमिल को ताने सुनाएगी. जो अनुपमा सुन लेगी. तब अनुपमा बरखा की बोलती बंद करेगी

आखिर किस गलतफहमी की वजह से एल्विश यादव से नहीं मिल पाई मनीषा रानी

बिग बॉस ओटीटी 2 की धकाड़ कंटेस्टेंट मनीषा रानी सबकी चाहेती रही है. शो में उन्हें काफी लोकप्रियता मिली है. उन्हें शो में जनता से खूब प्यार मिला. मनीषा का हंसमुख और अच्छे स्वभाव हर किसी का दिल जीत लिया. शो में उनकी दोस्ती एल्विश यादव के साथ काफी गहरी थी जो हमेशा चर्चा में रहती थी. शो के बाहर या अंदर दोनों का नाम अक्सर छोड़ा जाता है. हालिए एक इंटरव्यू में मनीषा रानी ने एल्विश यादव से मिलने को लेकर एक बात कही.

मनीषा ने बताया- गलतफहमी की वजह से नहीं मिल पाई एल्विश से

बिग बॉस ओटीटी सीजन 2 की दूसरी रनर-अप मनीषा रानी ने बिग बॉस के घर के बाहर एल्विश यादव के साथ अपने रिश्ते के बारे में बताया. मनीषा ने कहा, “मैं अभी भी एल्विश के संपर्क में हूं और उसने शुरू में मुझे मिलने के लिए व्हाट्सएप पर मैसेज भी किया था. हालांकि, मेरा व्हाट्सएप तीन दिनों तक बंद था, इसलिए हम मिल नहीं  सके, और मैंने उसे एक बार कॉल भी किया.

क्यों नहीं मिल पाई एल्विश से मनीषा ने बताया

उन्होंने आगे कहा, “एक गलतफहमी के कारण हम मिल नहीं सके, लेकिन अब भी, जब वह दिल्ली में थे और मैंने एक प्रैंक कॉल किया, तो उन्होंने तुरंत कॉल का जवाब दिया. तो, हम दोस्ती साझा करते हैं, लेकिन निस्संदेह, वह भी काफी व्यस्त है, और मैं भी व्यस्त हूं. इसलिए, हम इस समय इतनी बात नहीं करते. हालांकि, मेरा मानना ​​​​है कि कुछ दिनों के बाद, जब चीजें थोड़ी शांत हो जाएंगी, हम दोनों फिर से बातचीत करेंगे.

एल्विश यादव की गर्लफ्रेंड पर मनीषा रानी ने प्रतिक्रिया दी

इंटरव्यू के दौरान मनीषा से पूछा गया कि क्या उन्हें एल्विश यादव की गर्लफ्रेंड होने का दावा करने वाली एक एक्ट्रेस के बारे में पता है और क्या वह उनकी असली गर्लफ्रेंड से मिल चुकी हैं. मनीषा ने कहा, ”नहीं, मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. मैं वास्तव में अभी जान रही हूं बाहर क्या हो रहा है मुझे नहीं पता कि उसकी गर्लफ्रेंड कौन है. और अभी, यह एक ऐसी स्थिति है जहां अगर कोई गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के रिश्ते में नहीं है, वह आकर कहेगा, ‘मैं मनीषा का बॉयफ्रेंड हूं, मैं एल्विश की गर्लफ्रेंड हूं,’ तो ऐसी चीज हो सकती है. इसलिए मुझे उसकी गर्लफ्रेंड के बारे में कुछ नहीं पता. मैंने कभी उससे इस बारे में नहीं पूछा.”

तुम्हारी कोई गलती नहीं: भाग 1- रिया के साथ ऐसा क्या हुआ था

ड नंबर 8 के मरीज की दवाओं और इंजैक्शन के बारे में नर्स को समझ कर रिया जनरल वार्ड से निकल कर प्राइवेट वार्ड की ओर चल दी. स्त्रीरोग विभाग में 16 प्राइवेट कमरे थे, जिन में से 11 इस समय भरे हुए थे. उन में औपरेशन, डिलीवरी, गर्भपात आदि के पेशैंट थे. 1-1 पेशैंट का हालचाल पूछते हुए जब डा. रिया सब से आखिरी पेशैंट को देख कर रूम से बाहर निकली, तो बहुत थक गई थी. नर्सों के ड्यूटीरूम में जा कर उस ने हैड नर्स को कुछ पेशैंट्स के उपचार संबंधी निर्देश दिए और डाक्टर्स ड्यूटीरूम की ओर चल दी.

ड्यूटीरूम में डा. प्रशांत और डा. नीलम बैठे थे.

‘‘क्या बात है रिया, काफी थकी हुई लग रही हो? लो, कौफी पी लो,’’ कह डा. प्रशांत ने 1 कप रिया की ओर बढ़ा दिया.

‘‘थैंक्स डा. प्रशांत,’’ रिया ने आभार प्रकट करते हुए कौफी ले ली.

‘‘सच में रिया तुम्हारा चेहरा काफी डल लग रहा है. तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

डा. नीलम ने पूछा.

‘‘तबीयत तो ठीक है. बस थोड़ा थक गई हूं, इसलिए सिर थोड़ा भारी है,’’ रिया ने जवाब दिया, ‘‘ओह, 4 बज गए, आज मुझे जरा जल्दी घर जाना है. मैं डा. अश्विन को बता कर घर चली जाती हूं,’’ रिया ने घड़ी देखते हुए कहा.

‘‘डा. अश्विन तो ओ.टी. में होंगे, तुम आशा मैडम को रिपोर्ट कर के चली जाओ,’’ नीलम ने कहा और फिर चुटकी लेते हुए पूछ ही लिया, ‘‘वैसे काम क्या है, जो आज अचानक जल्दी जा रही हो? घर में खास मेहमान आ रहे हैं क्या?’’

रिया मुसकरा दी, ‘‘नहींनहीं, ऐसी बात नहीं है. शौपिंग करने जाना है,’’ रिया दोनों को बाय कर के आशा मैडम के कैबिन की ओर चली दी. वैसे डिपार्टमैंट के हैड डा. अश्विन थे, लेकिन चूंकि वे सर्जन थे, इसलिए उन का अधिकांश समय औपरेशन थिएटर में ही गुजरता था. उन के बाद डा. आशा थीं, जो उन की अनुपस्थिति में विभाग का काम संभालती थीं. रिया ने उन के पास जा कर अपनी प्रौब्लम बताई और छुट्टी ले कर अपनी गाड़ी से घर की ओर चल दी.

नीलम ने सही सोचा था कि रिया के यहां खास मेहमान आने वाले हैं. सचमुच वह आज इसीलिए जल्दी जा रही थी कि लड़के वाले उसे देखने आ रहे हैं. लड़का नीरज भी डाक्टर है. लंदन से कैंसर पर रिसर्च कर के आया है. उस के पिताजी का भोपाल में स्वयं का क्लीनिक है, लेकिन वह कैंसर हौस्पिटल में कार्यरत है. नीरज के पिता और्थोपैडिक सर्जन हैं और मां ने रिटायरमैंट के बाद प्रैक्टिस छोड़ दी है.

रिया 5 बजे अपने घर पहुंची. सारे रास्ते वह अनमनी सी रही. घर पहुंचते ही देखा मां दरवाजे पर ही खड़ी थीं.

‘‘कितनी देर लगा दी बेटी,’’ आते ही उन्होंने रिया को प्यार भरा उलाहना दिया.

‘‘सौरी मां, राउंड लेते हुए लेट हो गई थी,’’ रिया ने मां के गले में बांहें डाल कर मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा चल, हाथमुंह धो कर चाय पी ले,’’ मां ने कहा.

‘‘नहीं मां, मैं कौफी पी कर आई हूं. वे लोग कितने बजे आएंगे?’’ रिया ने झिझकते हुए पूछा.

‘‘6 बजे तक आने को कह रहे थे,’’ मां ने घड़ी की ओर देखते हुए कहा.

रिया ने अपने जीवन का यही ध्येय बनाया था कि डाक्टर बन कर लोगों की सेवा करेगी. वह हर रिश्ते के लिए मना कर देती थी, क्योंकि वह भलीभांति जानती थी कि उस के अतीत के बारे में पता लगते ही हर कोई मना कर देगा. डाक्टर लड़की के लालच में बहुत से लोग अपने बेटे का रिश्ता ले कर आए, लेकिन रिया ने किसी से भी मिलने से इनकार कर दिया. लेकिन नीरज के पिता रिया के पिता से एक पार्टी के दौरान मिले, तो रिया से मिलने की जिद ही कर बैठे. हार कर रिया के पिता को उन्हें घर पर आमंत्रित करना ही पड़ा.

6 बजने में 5 मिनट थे, जब रिया पलंग से उठी. सिर थोड़ा हलका लग रहा था. बाथरूम में जा कर उस ने मुंह पर पानी के छींटे मारे तो थोड़ी ताजगी आई. उस ने एक साधारण सा सूट निकाला और पहन लिया. पता था रिश्ता तो होना नहीं, तो क्यों बेकार अपना प्रदर्शन करे? माथे पर बिंदी लगाई, केशों की चोटी बनाई और नीचे मां के पास आ गई. उस ने जरा भी मेकअप नहीं किया था, लेकिन वह सुंदर ही इतनी थी कि उसे किसी भी तरह का मेकअप करने की जरूरत ही नहीं थी. उस के खिले हुए रंग पर उस के सूट का गुलाबी रंग उसे एक स्वाभाविक गुलाबी आभा प्रदान कर रहा था. उस के कानों में छोटेछोटे सोने के टौप्स थे.

मां ने उसे देखा तो टोका नहीं, क्योंकि उन्हें पता था कि वह अन्य लड़कियों की तरह बननेसंवरने में विश्वास नहीं करती. उन्होंने केवल अपनी चैन निकाल कर उसे पहना दी और उस के खाली हाथों में 1-1 चूड़ी पहना दी. रिया ने विरोध नहीं किया.

ठीक साढ़े 6 बजे नीरज अपने मातापिता के साथ आ गया. वे लोग काफी सहज थे. रिया के मातापिता को थोड़ा तनाव था, लेकिन जल्द ही नीरज और उस के मातापिता के सहजसरल स्वभाव ने माहौल को एकदम सहज बना दिया. जल्द ही रिया भी औपचारिकता और झिझक छोड़ कर उन लोगों से घुलमिल गई.

नीरज की मां सीधेसादे स्वभाव की लगीं. पिताजी काफी हंसमुख थे. बातबात पर वे ठहाके लगा रहे थे. नीरज स्वयं गंभीर स्वभाव का था, परंतु उस के चेहरे पर एक सरल स्वाभाविकता थी, जिस ने सब को काफी प्रभावित किया. चायनाश्ते के बाद सब के कहने पर नीरज और रिया बाहर लौन में चले गए.

नीरज का व्यवहार और बातचीत का तरीका बेहद शालीन था. रिया को ऐसा लगा ही नहीं कि वह उस से पहली बार बात कर रही है. डाक्टरी से ले कर बगीचे के फूलों तक विभिन्न विषयों पर उस ने रिया से बात की. रिया उस से काफी प्रभावित हुई. नीरज ने उसे अपना मोबाइल नंबर दिया.

रात घिरने लग गई, तब वे दोनों अंदर आ गए. कुछ देर बाद नीरज के पिताजी जाने के लिए उठ खड़े हुए. बाहर निकलते वक्त उन्होंने रिया और उस के मातापिता को चौंका दिया.

वे कार में बैठने से पहले बोले, ‘‘भई,

हमें तो रिया बहुत पसंद आई. हम ने उसे अपनी बहू बनाने का फैसला कर लिया है. हमारी ओर से यह रिश्ता पक्का है. अब आप लोग हमें अपना फैसला बता दीजिएगा,’’ और वे चले गए.

उन के जाने के बाद रिया और उस के मातापिता 2 मिनट तक तो अवाक से वहीं खड़े रह गए. उन्हें इतनी जल्दी हुए फैसले पर यकीन ही नहीं हो रहा था.

अंदर आ कर रिया की मां ने रिया के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘रिया बेटा, सोच ले, नीरज बहुत अच्छा लड़का है और परिवार भी अच्छा है. सारी बातें भूल कर एक नई जिंदगी की शुरुआत कर ले बेटा,’’ उन की आवाज में मां के दिल का दर्द उमड़ आया.

रिया हौले से आश्वासन की मुद्रा में मुसकरा दी तो मां थोड़ी आश्वस्त हो गईं.

Cook Book special: खुशबू कश्मीर की

कश्मीरी दम आलू बहुत ही फेमस रेसिपी है. आप भी अपनी फैमिली के लिए डिनर में बनाएं कश्मीरी दम आलू. घर में सभी उंगलियां चाटते रह जाएगे. आज ही घर पर बनाएं कश्मीरी दम आलू. आइए बताते है इसकी रेसिपी.

  1. कश्मीरी दम आलू

सामग्री

1.  1 बड़ा चम्मच औयल 

   2. 400 ग्राम छोटे आलू उबले

   3. 1 बड़ा चम्मच सौंफ 

   4. 3-4 लौंग

    5.  3-4 इलायची

    6. 1/4 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

     7. 1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर

      8.  1/2 कप दही

      9. 2 छोटे चम्मच कश्मीरी चिली पाउडर

      10. 2 कप पानी में भिगोया 

      11. गार्निशिंग के लिए थोड़ी सी धनियापत्ती कटी.

विधि

एक नौनस्टिक पैन में घी गरम कर आलू फ्राई करें. आलू जब सुनहरे हो जाएं तो उन्हें एक तरफ रख दें. फिर उसी घी में सौंफ, लौंग व इलायची डाल कर चटकाएं. उस में हलदी और धनिया पाउडर डाल कर भूनें. अब इस में दही और पानी में भीगा चिली पाउडर डालें. फिर नमक और आलू डाल कर ढक कर पकने रख दें. पक जाने पर धनियापत्ती से गार्निश कर चावल के साथ सर्व करें.

2. कुलथ की दाल

सामग्री

1.  1 बड़ा चम्मच घी 

 2. थोड़ा सा अदरक कटा

  3.  2-3 हरीमिर्चें बीच से कटी 

   4. 1 कप उबली कुलथ की दाल

    5. 1 चम्मच अनारदाना पाउडर पानी में भीगा 

    6. गार्निशिंग के लिए थोड़ी सी धनियापत्ती 

7. दही और प्याज के छल्ले.

विधि

एक पैन में घी गरम कर अदरक और हरीमिर्चें डाल कर भूनें. कुलथ की दाल डाल कर ढक कर 20-25 मिनट पकने दें. इसी दौरान इस में नमक और अनारदाना पाउडर भी डाल दें. दाल के पक जाने पर धनियापत्ती, दही और प्याज के छल्लों से सजा कर रोटी या चावल के साथ सर्व करें.

3. अम्बाल

सामग्री

1.  1 बड़ा चम्मच घी 

  2. 1 छोटा चम्मच जीरा

   3. 1 बड़ा चम्मच मेथी दाना 

   4. 2-3 लालमिर्चें बड़ी 

    5. 400 ग्राम कद्दू छिला 

    6. 1/4 छोटा चम्मच हलदी पाउडर 

     7. 1/2 छोटा चम्मच मिर्च पाउडर 

     1 छोटा चम्मच अनारदाना पाउडर.

विधि

एक नौनस्टिक पैन में घी गरम कर जीरा, मेथीदाना व लालमिर्च डाल कर चटकाएं. अब इस में कद्दू डाल कर 2 मिनट फ्राई करें. फिर हलदी पाउडर, मिर्च पाउडर, नमक और 1/2 कप पानी डाल कर ढक कर धीमी आंच पर पकने दें. पक जाने पर अनारदाना पाउडर डाल कर फिर 3-4 मिनट पकाएं और चावल के साथ सर्व करें.

4. जंगली गोश्त

सामग्री

1.  2 बड़े चम्मच घी या औलिव औयल

 2.  3-4 लालमिर्चें कुटी द्य थोड़ा सा अदरक कद्दूकस किया 

  3. थोड़ा सा लहसुन पेस्ट

  4.  500 ग्राम गोश्त 

  5. नमक स्वादानुसार.

विधि

कुकर में घी डाल कर गरम करें. फिर लहसुन, अदरक व नमक डाल कर अच्छी तरह से भूनें. भुन जाने पर इस में गोश्त डाल कर अच्छी तरह मिक्स कर 5 मिनट पकने दें. अब इस में 1 कप पानी डाल कर कुकर में स्टीम लगाएं. इसे रोटी या चावल के साथ सर्व करें.

रक्षाबंधन पर ड्रेस के साथ ज्वेलरी कैरी करें कुछ ऐसे

भाई-बहनों का त्यौहार रक्षाबंधन देशभर में बड़े धूमधाम से हर साल मनाया जाता है. इस त्यौहार पर बहने अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी लंबी उम्र की कामना करती हैं. ये त्यौहार भाई – बहन के बीच के रिश्ते को अधिक मजबूत और प्यारा बनाती है. जहां एक तरफ बेस्ट राखी खरीदने को लेकर बहनें पहले से ही मार्केट में खोजना शुरू कर देती हैं, वहीं अपने आउटफिट और लुक को लेकर भी बहुत कन्फ्यूज रहती हैं. इस बारें में महालक्ष्मी ज्वेलर्स के स्टाइलिश विवेक अग्रवाल कहते है कि इस बार इस त्यौहार को कुछ अलग और यादगार बनाने के लिए ऐसे स्टाइलिंग आइडियाज शेयर कर रहे हैं, जिससे उस दिन आपकी लुक होगी एकदम अलग और खूबसूरत.

वे आगे कहते है कि रक्षाबंधन पर ड्रेस और ज्वेलरी को लेकर कन्फ्यूज होने की जरुरत नहीं है, इन टिप्स को आप आसानी से फोलो कर सकती है.

  1. बनारसी साड़ी के साथ गोल्ड ज्वेलरी  

रक्षाबंधन पर मैरिड विमन्स अधिकतर साड़ी पहनना पसंद करती हैं, जिसके साथ ज्वेलरी पर खास ध्यान देना चाहिए, जो आपकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है. अगर आप अपने लिए बनारसी साड़ी चुन रही हैं, तो इसके साथ प्योर गोल्ड चोकर नेकलेस सबसे बढ़िया लगते हैं. कान में झुमकी और मांगटीका लुक को कम्पलीट कर देगा.

2. नेट की साड़ी के साथ डायमंड ज्वेलरी

रक्षाबंधन पर नेट की साड़ी पहनना एक बढ़िया ऑप्शन है. इस फैब्रिक की साड़ी के साथ आप डायमंड नेकलेस आराम से मैच कर सकती हैं. लाइट वेट हीरे के हार के साथ आप मैचिंग अमेरिकन डायमंड ईयररिंग्स, मांगटीका और ब्रेसलेट पेअर कर सकती हैं. इसका खास ध्यान रखें कि हर एक ज्वेलरी पीस का स्टाइल एक जैसा हो.

3. गोल्ड ज्वेलरी के ट्रेंडी डिजाइन्स भी करें ट्राई

आज के दौर की लड़कियों को अक्सर पीले रंग की गोल्ड जवेलरी पहनना आउट ऑफ फैशन लगता है. ऐसे में कुंदन डिजाइन वाले नेकलेस भी खरीद सकती हैं. इसे सिर्फ रक्षाबंधन पर ही नहीं, बल्कि दूसरे फेस्टिवल पर भी एथनिक आउटफिट के साथ आराम से मैच कर सकती हैं.

4. शॉर्ट कुर्ती और पैंट्स के साथ कलरफुल आर्टिफिशियल जवेलरी

गर्मी का मौसम है और ऐसे में अगर आप एकदम कम्फर्टेबल क्लोद्स कैरी करना चाहती हैं, तो शॉर्ट कुर्ती से बढ़िया ऑप्शन नहीं हो सकता. रक्षाबंधन पर पहनने के लिए हल्के फ्लोरल प्रिंट वाले कॉटन कुर्ते के साथ आर्टिफिशियल स्टोनवर्क ज्वेलरी कैरी किया जा सकता है. स्टोन्स वाले नेकलेस और ईयररिंग्स के कई बढ़िया कलर कॉम्बिनेशन मार्केट में भी मिल जाते हैं.

5. चिकनकारी सूट और पेंडेंट नेकलेस

अगर आपका बजट हेवी ज्वेलरी खरीदने का नहीं है, तो आप पेंडेंट नेकलेस भी ले सकती हैं. जिसके साथ आपको ज्यादातर लटकन ईयररिंग्स मिलते हैं, जिन्हें आप चिकनकारी सूट या इंडो-वेस्टर्न के साथ भी कैरी कर सकती हैं. मिड लेंथ के ये नेकलेस काफी सुंदर और अलग लुक देते हैं.

6. इंडो-वेस्टर्न के साथ ज्वेलरी

इस रक्षाबंधन पर अगर आप इंडो-वेस्टर्न आउटफिट पहन रही हैं, तो इसके साथ  लॉन्ग गोल्ड चेन नेकलेस कैरी कर सकती हैं. ये आपके लुक को परफेक्ट बना देगा. अगर आप लुक को थोड़ा हैवी रखना चाहती हैं, तो लेयर्ड सेट ले सकती हैं.

7. आउटफिट के अनुसार रखें सिंपल ज्वेलरी

गोल्ड ज्वेलरी हो या आर्टिफिशियल, इसे पहनते वक्त इस बात का जरूर ध्यान रखें कि आप जितना अपने लुक को सिंपल रखेंगी, उतना लोगों का ध्यान आपकी तरफ रहेगा. साड़ी, सूट या इंडो-वेस्टर्न कुछ भी हो, लेकिन त्यौहार पर हल्की ज्वेलरी ही आपके लुक को एन्हान्स करती है.

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