हाट बाजार- भाग 3: दो सरहदों पर जन्मी प्यार की कहानी

रुखसार रात को वहीं रुक गई और हाटबाजार के अगले पड़ाव तक वहीं रही. 4 दिन बाद जब बाजार में गई तो जमाल गुस्से से लालपीला हो रहा था, ‘‘तुम आखिर चाहती क्या हो? क्यों अपने साथ मेरी जिंदगी भी खतरे में डाल रही हो. अगर इश्क किया है तो या तुम भारत जाओ या उसे बंगलादेश ले जाओ. यों चूहेबिल्ली का खेल बंद करो.’’

‘‘जमाल तुम जानते हो कि यह मुमकिन नहीं है. शाहिद कोशिश कर रहा है, लेकिन इस में समय कितना लगेगा यह हमें भी नहीं पता. पता नहीं ऐसा हो भी पाएगा या नहीं.’’

‘‘तो तब तक तुम…’’ जमाल कुछ सोचने लगा. फिर बोला, ‘‘मेरी राय है कि यहीं रहो. जब तक तुम्हें भारत की नागरिकता नहीं मिल जाती यहां तुम पूरी तरह से महफूज हो. बस तुम्हें इन चारदीवारी में रहना होगा. मैं सब से कह दूंगा कि तुम चटगांव में किसी कारखाने में काम कर रही हो.’’

‘‘लेकिन…’’ रुखसार कुछ कहना चाह रही थी मगर जमाल ने उसे इशारे से रोक दिया और कहा, ‘‘देखो रुखसार, यह थोड़े दिनों की ही परेशानी है. कप्तान साहब और अन्य गांव वालों की मदद से तुम्हें जल्दी ही भारत की नागरिकता मिल जाएगी. फिर सब ठीक हो जाएगा.’’ समय अपनी गति से बढ़ता गया और हाटबाजार का काम भी अपनी गति से बढ़ता गया. सरकार काम में हो रही प्रगति से संतुष्ट थी और इंसपैक्शन के दौरान सरकार ने काम में आ रही बाधाओं के मद्देनजर 6 महीने की अवधि और बढ़ा दी. उधर रुखसार को मानो एकाकी जीवन जीने की आदत सी पड़ गई थी. कभीकभी जमाल स्टोर में सामान लेने व रखने आता, तो वह उत्कंठा से गांव का हालचाल पूछती. इस के अलावा तो वह बिलकुल तनहा थी. शाहिद के आने से उस के होंठों पर मुसकान फैल जाती. शाहिद रुखसार को देखता तो उसे बहुत दुख होता. कई बार उसे आत्मग्लानि भी होती. उसे लगता कि जो कुछ भी हुआ सब का कुसूरवार वही है. एक दिन उस के चेहरे के भाव देख कर रुखसार ने उस से कहा, ‘‘तुम खुद को दोषी क्यों मानते हो? यही हमारा जीवन है, यही हमारी नियति है.’’

‘‘लेकिन सारा दिन तुम अकेली वक्त गुजारती हो. यह जिंदगी मैं ने दी है तुम्हें. मैं बता नहीं सकता कि मुझे कैसा लगता है. मैं कभी भी खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा.’’

‘‘तुम खुद को बिलकुल कुसूरवार मत समझो. यह फैसला सिर्फ तुम्हारा ही नहीं था. मैं भी इस में बराबर की हिस्सेदार थी. और मैं अकेली कहां हूं? दिन भर मूर्तियां बनाती हूं, उन्हें सजाती हूं, संवारती हूं, जिस से मानसी मां को 4 पैसे मिल जाते हैं.’’ फिर कुछ सोच कर धीरे से बोली, ‘‘क्या हुआ मेरी भारत की नागरिकता का?’’

‘‘मैं कोशिश कर रहा हूं, लेकिन सरकारें अभी बहुत सख्त हो गई हैं. थोड़ा इंतजार करना पड़ सकता है.’’

‘‘मैं तो इंतजार कर सकती हूं, शायद तुम भी कर सकते हो मगर वह जो आने वाला मेहमान है उस के बारे में सोचती हूं तो रूह कांप जाती है कि क्या होगा उस का?’’

एक रात सायंसायं करती हवा और हिंसक पशुओं की तरह झूमते पेड़ों की कर्कश आवाज से रुखसार की घबराहट से आंख खुली. शाहिद अभी नहीं आया था, लेकिन एक साया स्टोर की तरफ जा रहा था. रुखसार का दिल बैठ गया. चीख मानो हलक में ही अटक गई. धीरेधीरे साया कुछ साफ हुआ…वह जमाल था.

‘‘तुम…तुम इस वक्त यहां क्या कर रहे हो?’’ रुखसार की आवाज में तल्खी थी.

‘‘कुछ नहीं… तुम सो जाओ, मैं कुछ सामान रख कर चला जाऊंगा.’’

‘‘मगर आज तो कोई हाट नहीं था. क्या सामान रखने आए हो तुम?’’ रुखसार की आवाज और सख्त हो गई थी.

जमाल ने भी लगभग उसी अंदाज में जवाब दिया, ‘‘तुम चुपचाप यहां अपने दिन गुजारो. समझ लो यह मेरी खामोशी की कीमत है. मैं जब चाहूं बिना रोकटोक के यहां आ जा सकता हूं. अगर तुम ने कोई चालाकी दिखाने की कोशिश की तो, भयानक अंजाम के लिए तैयार रहना.’’ रुखसार को काटो तो खून नहीं, ‘‘जमाल, तो इसलिए तुम ने मुझे यहां रहने के लिए उकसाया था और मैं अनाड़ी नादान अब तक यह समझ रही थी कि मेरा भाई अपना प्यार मुझ पर उड़ेल रहा है. तुम ने मेरी हालत का, मेरे भरोसे का गलत फायदा उठाने की कोशिश की है. लेकिन मैं तुम्हारे मंसूबे कामयाब नहीं होने दूंगी. मेरे लिए दोनों मुल्क मेरे अपने हैं. तुम जानते हो मैं अगर कोई फैसला करती हूं तो अंजाम का सामना करने को तैयार रहती हूं.’’

‘‘तुम तो नाहक ही परेशान हो रही हो,’’ जमाल ने पैतरा बदला.

‘‘मैं कल सुबह सारा सामान यहां से ले जाऊंगा. तुम बेफिक्र हो कर सो जाओ.’’

‘‘इसी में तुम्हारी भलाई है और मेरी भी,’’ रुखसार ने धीरे से कहा.

रुखसार की आंखों में नींद का नाम न था. आने वाली विपत्तियों के बारे में सोचसोच कर वह परेशान हो रही थी. किसी अनिष्ट की आशंका से भयभीत रुखसार को थोड़ा चैन तब मिला जब उस ने शाहिद को आते देखा. आते ही वह बोला, ‘‘मानसी मां यहां आने की जिद पकड़े बैठी हैं और अगर वे यहां आती हैं तो खतरा और बढ़ जाएगा. बीएसएफ वाले तो शायद फिर भी मान जाएं मगर बंगलादेशी गार्ड्स मौके को हाथ से जाने नहीं देंगे. मगर और कोई उपाय भी नहीं नजर आ रहा. ऐसी परिस्थिति में अगर सरेंडर भी करते हैं, तो भी समस्या का कोई हल नहीं निकलेगा, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे एक गुमनाम मौत मरना होगा.’’

इसी उधेड़बुन में रात बीत गई और इसी तरह कई दिन और कई रातें बीत गईं. कुदरत मेहरबान थी कि मानसी की उपस्थिति का अभी तक किसी को आभास नहीं हुआ. काम की गहमागहमी में सब कुछ छिपा रह गया. कहते हैं, जब हालात विपरीत हों तो कुरदत को भी हालात के शिकार लोगों पर तरस आ ही जाता है. बच्चे का जन्म समय से पहले हो गया था. इस के बावजूद बच्चा स्वस्थ और सुंदर हुआ था. मानसी ने सारा इंतजाम और व्यवस्थाएं धीरेधीरे कर ली थीं ताकि ऐन मौके पर किसी चीज के लिए परेशानी न हो और मन ही मन दुआ कर रही थी की कुदरत का रहम बना रहे और सब कुछ ठीकठाक हो जाए.

दिन भर तो काम के शोर में बच्चे के रोने की आवाज दब जाती मगर रात के सन्नाटे में यह काम मुश्किल हो जाता. शाहिद और रुखसार ने यह फैसला किया की किसी भी तरीके से गैरकानूनी ढंग से ही सही शिलौंग या अगरतला से होती हुई दिल्ली की तरफ चली जाएगी और अवैध रूप से रह रहे बंगलादेशियों की भीड़ का एक हिस्सा बन जाएगी. लेकिन तभी वह हुआ जिस का रुखसार को डर था. जमाल ने धीरेधीरे अपनी गतिविधियां और भी तेज कर ली थीं और रुखसार को समझ में आ रहा था कि जमाल किसी बड़े गैरकानूनी गिरोह के लिए काम कर रहा है.

‘‘क्या है इस गट्ठर में?’’ रुखसार ने एक दिन सामान उतरवाते हुए जमाल से सख्ती से पूछा, तो जमाल की त्योरियां चढ़ गईं.

‘‘सूखी मछलियां हैं. तुम तो शाकाहारी हो. नहीं तो तुम्हारे लिए 5-10 छोड़ देता.’’

‘‘मैं खाती नहीं पर इतना तो जानती हूं की सूखी मछलियां इतनी भारी नहीं होतीं कि उन का गट्ठर आदमियों से भी मुश्किल से उठे.’’

‘‘हां इस में कुछ और भी है. लेकिन जो भी है वह भारत को अंदर तक खोखला कर देगा और इसलाम को मजबूत.’’

‘‘चुप रहो,’’ रुखसार गरजी, ‘‘इसलाम इतना कमजोर नहीं कि वह पाकिस्तान का बाजू थामे. पाकिस्तान एक कुंठित मुल्क है. भारत से मिल रही लगातार हार से परेशान हो कर वह यह सब कर रहा है. मगर तुम तो एक बंगलादेशी हो. भूल गए कि भारत के हम पर कितने एहसान हैं. पाकिस्तान के दबाव में आ कर एहसान फरामोश बंगलादेशियों की भीड़ में अपनेआप को शामिल मत करो मेरे भाई. आज अगर हम जिंदा हैं तो इन्हीं हिंदुस्तानियों की बदौलत वरना पाकिस्तान ने तो हमें गुमनामी के गर्त में धकेलने में कोई कमी नहीं रखी थी.’’

बंटवारा- भाग 2: क्या थी फौजिया की कहानी

विभाजन के समय बेबे 13-14 साल की बच्ची थी और राजस्थान के एक गांव में रहती थी. उसे अपने गांव का नाम व पता तो अब याद नहीं है लेकिन इतना ज़रूर याद है कि उस के गांव में मोर  बहुत थे और उसी बात के लिए उस का गांव मशहूर था. परिवार में अम्मा, बापू के अलावा 3 भाई और 1 बहन थी. बहन व भाइयों के नाम उसे आज भी  याद हैं- बंसी, सरजू और किसना 3 भाई और बहन का नाम लाली.l  उस का बापू कालूराम गांव के ज़मींदार के खेतों में काम करता था और अम्मा भी कुंअरसा ( ज़मींदार ) के घर में पानी भरने व कपड़ेभांडी धोने का काम करती थी. अपने छोटे बहनभाइयों को लक्ष्मी (बेबे) संभालती थी. बापू ने  पास के गांव में लक्ष्मी का रिश्ता तय कर दिया था. लक्ष्मी का होने वाला बिनड़ा चौथी जमात में पढ़ता था और उस की परीक्षा के बाद दोनों के लगन होने की बात तय हुई थी.

उसी दौरान देश का विभाजन होने की खबर आई और चारों तरफ हड़कंप सा मचने लगा. उस के गांव से भी कुछ मुसलमान परिवार पाकिस्तान जाने की तैयारी करने लगे. लक्ष्मी के बापू ने उस की ससुराल वालों से हालात सुधरने के बाद लगन करवाने के लिए कहा, तो लक्ष्मी के होने वाले ससुर ने कहा कि ब्याह बाद में कर देंगे, पर सगाई अभी ही करेंगे.

सगाई वाले दिन हाथों में मेंहदी लगा व नया घाघराचोली पहन कर लक्ष्मी तैयार हुई. अम्मा ने फूलों से चोटी गूंथी तो लक्ष्मी घर के एकलौते शीशे में बारबार जा कर खुद को निहारने लगी. आंगन में ढोलक बज रही थी और आसपास की औरतें बधाइयां गा रही थीं. फिर उस की होने वाली सास ने लक्ष्मी को चांदला कर के हंसली व कड़े पहनाए और हाथों में लाललाल चूड़ियां पहना कर उस को सीने से लगा लिया. घर में गानाबजाना चल रहा था, तब मां की आंख बचा कर लक्ष्मी अपने गहने व कपड़े सहेलियों को दिखाने के लिए झट से बाहर भाग गई व दौड़ती हुई खेतों की तरफ चली गई. बहुत ढूंढा, पर उसे वहां कोई भी सहेली खेलती हुई नहीं मिली. हां, खेतों के पास से कई खड़खडों  में भर कर लोगों की भीड़ कहीं जाती हुई ज़रूर दिखाई दी.

लछमी वापस लौटने लगी, तभी किसी ने उसे पुकारा. उस ने पलट कर देखा. उस की सहेली फातिमा एक खड़खड़े में बैठी उसे आवाज़ दे रही थी. लक्ष्मी दौड़ कर उस के पास गई और उस से पूछने लगी कि वह कहां जा रही है? फातिमा ने बताया कि वह पाकिस्तान जा रही है और अब वहीं रहेगी. लक्ष्मी अपनी सहेली से बिछुड़ने के दुख से रोने लगी. तभी फातिमा के अब्बू जमाल चचा ने लक्ष्मी को झट से हाथ पकड़ कर अपने खड़खड़े में बैठा लिया और कहा कि जब तक चाहे वह अपनी सहेली से बात कर ले, फिर वह उसे नीचे उतार देंगे. खड़खड़ा चल पड़ा और दोनों सहेलियां बातें करते हुए गुट्टे खेलती रहीं. बीचबीच में जमाल बच्चियों को गुड़ के लड्डू खिलाता जा रहा था. इन्हीं सब में वक्त का पता ही न चला और घर जाने का ख़याल लक्ष्मी को तब आया जब जमाल चचा ने उसे अपने खड़खड़े से उतार कर दूसरी ऊंटगाड़ी में बैठा दिया.

उस ने चारों तरफ निगाह घुमाई, तो देखा कि वह अपने गांव से बहुत दूर रेगिस्तानी रास्ते में है और वहां ढेर सारी भीड़ गांव से उलटी दिशा में चली जा रही है. लक्ष्मी यह देख कर ऊंटगाड़ी से कूदने लगी, तो  गाड़ी में बैठे दाढ़ी वाले आदमी ने उस का हाथ कस कर पकड़ लिया और फिर एक रस्सी से उस के हाथपैर बांध कर अपनी अम्मा के पास बैठाते हुए बोला कि वह उस को अपने साथ पाकिस्तान ले जा रहा है क्योंकि उस ने जमाल को पूरे 30 रुपए दे कर लक्ष्मी को खरीदा है और अब वह उस की  बीवी है. लाचार लक्ष्मी पूरे रास्ते रोती रही. पर न उस आदमी को रहम आया, न ही उस की बूढी अम्मा को.

गफूर नामक वह आदमी भी राजस्थान के किसी गांव से ही आया था.  पकिस्तान पहुंच कर इस गांव में उस ने अपना डेरा डाल दिया और धीरेधीरे अच्छा पैसा कमाने लगा. आते ही गफूर ने यह मकान और कुछ खेत यह सोच कर  ख़रीद लिए कि उस की गिनती गांव के रईसों में होने लगेगी और लोग उस की इज्ज़त करेंगे. मगर जिसे अपना असली मुल्क समझ कर वह आया था वहां, तो उसे हमेशा परदेसी का ही दर्जा दिया गया और अपनी इस घुटन व झुंझलाहट को वह अमीरन यानी लक्ष्मी पर उतारता था.

दिनभर उस की मां अमीरन को मारतीपीटती रहती और रात को गफूर अपना तैश उस बच्ची पर निकालता. उस की सास ने पहले तो उसे डराधमका कर गोश्त पकाना सिखाया और उस से भी मन नहीं भरा, तो मांबेटे ने कई दिनों तक भूखा रख कर उसे ज़बरदस्ती  गोश्त खिलाना भी शुरू कर दिया और आखिर उस को लक्ष्मी से अमीरन बना कर ही दम लिया. जब तक अमीरन 20 वर्ष की हुई तब तक 3 बच्चे जन चुकी थी. धीरेधीरे खानदान बढ़ता गया और अमीरन  के अंदर की लक्ष्मी मरती गई.

अमीरन (लक्ष्मी) के बच्चे छोटेछोटे थे, तभी गफूर की मौत हो गई और लक्ष्मी की परेशानियां और भी बढ़ गईं क्योंकि अकेली औरत जान कर गांव वालों ने उस के खेतों पर कब्ज़ा करने की कोशिश तो शुरू कर ही दी, साथ ही, कई लोगों ने उस को अपनी हवस का शिकार भी बनाना चाहा. और जब एक दिन खेत में काम करते समय बगल के खेत वाले अब्दुल ने उस को धोखे से पकड़ कर उस के साथ ज़बरदस्ती करनी चाही  तो अमीरन के अंदर की राजस्थानी शेरनी जाग गई और उस ने घास काटने वाले हंसिए से अब्दुल की गरदन काट डाली.

गांव में उस की इस हरकत से हंगामा मच गया और उस को पंचायत में घसीट कर ले जाया गया. लेकिन लक्ष्मी डरी नहीं. उस ने साफ़साफ़ कह दिया कि जो भी उस के खेतों की तरफ या उस की तरफ बुरी नज़र डालेगा उस का वह यही हश्र करेगी. कुछ लोग उस की इस जुर्रत के लिए उसे पत्थरों से मारने की सज़ा देने की बात करने लगे और कुछ लोगों ने गांव से निकाल देने की सलाह दी. लेकिन गांव के सरपंच, जो एक बुजुर्गवार थे, ने फैसला अमीरन के हक़ में करते हुए गांव वालों को चेतावनी दी कि कोई भी इस अकेली औरत पर ज़ुल्म नहीं करेगा वरना उस आदमी को सज़ा दी जाएगी.

सरपंच की सरपरस्ती के कारण लक्ष्मी अपनी मेहनत से अपने बच्चों को पालने लगी. बड़ा बेटा अकरम जब खेतों में अम्मी की मदद करने लायक हो गया तो लक्ष्मी को थोड़ा आराम मिला. लेकिन उसे हमेशा इस बात का अफ़सोस रहा कि उस के अपने बच्चों ने भी कभी अपनी अम्मी का साथ नहीं दिया. कितनी बार उस ने अपने बेटों की खुशामद की कि एक बार उसे हिंदुस्तान ले जा कर उस के भाइयों से मिलवा दें लेकिन उन लोगों की निगाहों में तो अम्मी के नाते वाले सब काफिर थे और काफिरों से नाता रखना उन के मज़हब के खिलाफ है. इसलिए हर बार बेटों ने उस के अनदेखे परिवार वालों को दोचार गालियां देते हुए लक्ष्मी (अमीरन) को काफिरों के पास जाने की जिद छोड़ देने को कहा.

सूरजमुखी: भाग 3- राज ने ऐसा क्या किया कि छाया खुश हो गई

‘‘आप को इस तरह लैक्चर देने का मुझे कोई हक नहीं बनता. सौरी, पर ऐसी ही नादानी मैं स्वयं कर चुका हूं इसलिए अपनेआप को रोक नहीं पाया,’’ कुछ देर चुप रहने के बाद डाक्टर राज बोला.

‘‘एक शर्त पर यदि आप मुझे आला और अपने बारे में सब कुछ बताएं,’’ छाया अपने पर काबू कर बोल उठी.

‘‘बताने को कुछ खास नहीं. आला को जन्म देने के बाद उस की मां किसी हादसे में हमें छोड़ कर चली गई. मैं अपने दुख में इस कदर डूब गया कि अपने दुख के सामने इस बिन मां की नन्ही सी जान का भी ध्यान न रख पाया, भूल ही गया कि इस मासूम, निरीह ने भी तो अपनी मां को खोया है.

‘‘मेरी लापरवाही की सजा मेरी बच्ची को मिली, वह मरतेमरते तो बच गई पर पोलियो ने इस का एक पैर छीन लिया. उसी दिन से आला मेरे जीने का बहाना बन गई, उस का खोया हुआ पैर तो मैं वापस नहीं ला सकता, पर और बच्चों को जिंदगी दे सकूं, बस इसलिए अपनेआप को इन बच्चों की सेवा में समर्पित कर दिया. कई बड़े लोगों के सहयोग से एक अस्पताल बनाया है बच्चों के लिए. जो लोग अपने बच्चों का इलाज अच्छे अस्पतालों में नहीं करा सकते, उन के लिए. नन्हेनन्हे बच्चों की हंसी ने ही मेरा सुकून मुझे लौटाया है… यह मेरा अपना ऐक्सपीरियंस है… अपने दुख पर विजय पा कर दूसरों के लिए शुरू कर दें तो अपना दुख खुदबखुद कम हो जाता है.’’

सारी रात छाया सो नहीं पाई. आला के पिता के शब्द कानों में गूंजते रहे कि तुम सचमुच सूरजमुखी हो जो खिलने के लिए सूरज की किरणों की मुहताज है. अपनेआप में कुछ भी नहीं. कितना सताया है उस ने मम्मापापा को अपने इस व्यवहार से, डाक्टर तो लोगों की पीड़ा हरते हैं और वह तो अपनों को ही पीड़ा दे बैठी…

सुबह उठी तो मन शांत था. सब कुछ भुला कर जिंदगी का अब तक तयशुदा लक्ष्य पाना ही उस का मकसद था. वह जल्द से जल्द अपने घर लौट जाना चाहती थी. अब अपनी फील्ड में वह इतना काम करेगी कि उस के पिछले खोए वक्त की भरपाई हो सके. मामा भी हैरान थे छाया के इस नए रूप को देख कर. इसीलिए रोका नहीं. सुबह सारा सामान पैक कर आला से मिलने निकली तो दरवाजे पर निशीथ को देखा.

‘‘तुम यहां कैसे?’’ चकित सी छाया आगे कुछ न पूछ पाई.

‘‘2 दिन के लगातार सफर के बाद तुम तक पहुंचा हूं. क्या अंदर आने के लिए भी

न कहोगी?’’

‘‘पर निशीथ मैं यह अध्याय बहुत पहले ही हमेशा के लिए बंद कर चुकी हूं.’’

‘‘तो तुम्हें यह बात अपने घर वालों को बतानी चाहिए थी, जिन्होंने अपनी बेटी के दुखों का वास्ता दे कर मुझे यहां भेजा,’’ छाया के अनापेक्षित जवाब से निशीथ चिढ़ गया.

पिताजी को पीछे आता देख छाया उन से लिपट गई. कहनेसुनने को बहुत कुछ था, पर निशीथ को देख चुप हो गई.

पुरानी छाया को देख पिताजी हैरान थे. पर उस से भी ज्यादा छाया के निशीथ से न विवाह करने के फैसले से. उस दिन निशीथ के घर वालों से मिलने के बाद इस रिश्ते से वे कदापि खुश नहीं थे पर अपनी इकलौती लड़की की खुशियों के लिए ही उन्होंने उन लोगों की शर्तों के सामने अपने घुटने टेके थे.

मुंबई वापसी से पहले छाया ने पिताजी को आला और डा. राज से मिलवाया.

डा. राज का प्रस्ताव उसे चौंका गया, ‘‘डा. छाया, इस वक्त मेरे अस्पताल को एक गायनिक की सख्त जरूरत है. पुरानी डाक्टर

2 महीने की लीव पर है. यदि शहर, घर जाने का मोह छोड़ सको तो अस्पताल जौइन कर लो कुछ दिनों के लिए. इतनी खूबसूरत डाक्टर अपने बीच पा कर मेरे बच्चे शायद अपना दुख भूल जाएं.’’

राज का प्रस्ताव न मानने की कोई गुंजाइश नहीं थी. फिर यह शहर, यहां के लोग आला, डा. राज सब ने मिल कर न जाने क्या जादू कर दिया था छाया पर कि वह स्वयं ही उन सब से दूर जाने में डर रही थी. पिताजी की स्वीकृति और मां के भी छाया के पास आ जाने से सब कुछ जैसे बहुत खूबसूरत हो चला था.

छोटेछोटे बच्चों के बीच कब डाक्टर से बच्ची बन जाती और खुशी से चहकने लगती.

उस दिन की ही तो बात है. आला को सारे अस्पताल में ढूंढ़तेढूंढ़ते वह रेस्टरूम में चली आई, वहां का नजारा देखा तो दंग रह गई. डा. राज बहुत सारे बच्चों के बीच बैठे उन्हें कोई मजेदार किस्सा सुना रहे थे. पास जा कर देखा तो दिल दहल गया. सभी अपनेअपने आर्टीफिशियल अंगों को अलग रख अपने सामान्य रूप में थे. किसी का हाथ नहीं तो किसी का का पैर नहीं. शारीरिक रूप से बेबस उन बच्चों के चेहरों पर कोई गिलाशिकवा नहीं. सपनों से सजी आंखें, संतुष्टि से चमकते चेहरे और उन सब को संभालते राज. छाया का परिचय जैसे किसी दूसरी दुनिया से हुआ.

डा. राज से नजरें मिलीं तो बस सम्मोहित सी उन्हें देखती चली गई. राज एक समर्पित ईमानदार इंसान, नहीं एक पूर्ण पुरुष नहीं, नहीं अपने कमिटमैंट को समर्पित इंसान जिसे कोई भी लड़की अपना जीवनसाथी बना ले… जाने ऐसी ही कितनी उपमाएं, विचार छाया के मन में कई दिनों तक खलबली मचाते रहे. तो क्या उसे डा. राज से प्यार हो गया? या उस के आदर्शों, बिन मां की बच्ची आला से सहानुभूति? या स्वयं पर हावी वह गिल्टी? क्या था वह जो उसे राज के मोहपाश में बांध रहा था? पर ऐसा ही खिंचाव कभी उसे निशीथ के लिए भी महसूस किया था. तो क्या उसे अपनी जिंदगी को भावनाओं के हवाले कर राज से शादी कर यहीं सैटल हो जाना चाहिए? बहुत सोचा छाया ने, पर निशीथ ने ही उसे किसी फैसले पर पहुंचने में मदद की.

उस दिन शिमला में ही उस से मिलने आया था अपनी नवेली पत्नी के साथ हनीमून पर. राज के सामने ही उसे चिढ़ाने के लिए अपनी मां की पसंद लड़की और उस से मिली खुशियों का बढ़चढ़ कर एलान करने लगा.

एक बार तो छाया कमजोर पड़ गई. निशीथ को खोने का गम… मंजिल की ओर बढ़ते कदम लड़खड़ाने लगे और मजबूर सी उस ने अपना सिर राज के कंधे पर रख दिया.

राज कुछ देर निशब्द खड़े रहे. फिर धीमे स्वर में बोले, ‘‘जिंदगी को भावनाओं का गुलाम नहीं बनाना चाहिए छाया. मैं हर वक्त तुम्हारे साथ हूं पर मैं चाहता हूं कि मेरे प्रति अपने आकर्षण को वक्त की कसौटी पर कसना तुम्हारे लिए जरूरी है. अत: मुंबई लौट जाओ और जीवन को नए सिरे से सहेजना शुरू करो.’’

छाया अपने घर लौट गई थी. आसान नहीं था उस के लिए भी ऐसा करना पर जल्द ही जान गई थी कि प्यार, शादी को अपनी मंजिल मान कर अपने लक्ष्य से बेईमानी करने को उस का जमीर कभी इजाजत नहीं देगा. दिनरात काम उसे सुकून देने लगा था.

5 साल के छोटे से पीरियड में ही आज डा. छाया का नाम भारत के सफलतम गिनेचुने गायनिकों में शुमार है. पर डा. राज और आला ने उस के लिए जो किया उन के प्रति अपने जज्बातों को भी छाया कभी झुठला न सकी. तभी तो राज को पत्र लिख बैठी कि अपनी तमाम कमजोरियों से लड़ कर आज अपनी मंजिल मैं ने पा ली है, जाने कहां से इतनी ताकत आ गई मुझ में. तुम्हारे शब्दों का असर है कहूं या वक्त की ठोकरों का नहीं जानती, पर राज हमेशा स्ट्रौंग बन कर नहीं जी पाऊंगी, टुकड़ों में बंटी आधीअधूरी जिंदगी. किसी के प्यार की आंच, अनेक रिश्तों की गरमाहट से भी तो इंसान का अंतर खिल उठता है. बहुत सोच लिया… जान गई हूं कि आप के सिवा मैं ने प्यार किसी से किया ही नहीं. अत: राज अपने अंतस को खिलने के लिए वह गरमाहट, वह बंधन आप से जोड़ना चाहती हूं. क्या मेरे सूरज बनोगे?

जबां से शायद कभी नहीं कह पाती, इसलिए खत में लिख कर पोस्ट करने के बाद छाया शिमला जाने की तैयारी में जुट गई.

बंटवारा- भाग 1: क्या थी फौजिया की कहानी

चूल्हे पर रोटियां सेंकते सेंकते फौजिया सामने फर्श पर बैठे पोतेपोतियों को थाली में रोटी और रात का बचा सालन परोसती जा रही थी, साथ ही, बगल में रखी टोकरी में भी रोटियां रखती जा रही थी ताकि शौहर और बेटों के लिए समय से खेत पर खाना भेज सके. तभी उस की सास की आवाज़ सुनाई पड़ी, “अरी खस्मनुखानिये, आज मैनू दूधरोट्टी मिल्लेगी कि नै?”

सास की पुकार पर फौजिया ने जल्दी से पास रखे कटोरदान में से 2 बासी रोटियां निकाल कर एक कटोरे में तोड़ कर गुड़ में मींसीं और उस में थोड़ा पानी व गरम दूध डाल कर अपनी बगैर दांत वाली सास के खाने लायक लपसी बना कर पास बैठी बेटी को कटोरा थमा दिया, “जा, दे आ बुड्ढी नू.” कटोरा तो पकड़ लिया रज़िया ने, लेकिन जातेजाते अम्मी को ताना ज़रूर दे गई, “जब तू तज्ज़ी रोटी सेंक रही है हुण बेबे नू बस्सी रोटी किस वास्ते दें दी?”

फौजिया ने कोई जवाब न दे कर गुस्से से बेटी को घूरा और वहां से जाने का इशारा किया, तो रजिया बड़बड़ाती हुई चली गई.  फौजिया ने अपनी बड़ी बहू सलमा को आवाज़ दे कर खेत में खाना पंहुचाने को कहा और जल्दीजल्दी सरसों का साग व कच्ची प्याज फोड़ कर रोटियों के साथ टोकरी में रख कर टोकरी एक तरफ सरका दी.

रज़िया को अपनी दादी के प्रति अम्मी के दोगले व्यवहार से बहुत चिढ़ है. लेकिन उस का कोई वश नहीं चलता, इसीलिए हर रोज़ अपनी अम्मी से छिपा कर वह दादी के लिए कुछ न कुछ खाने का ताज़ा सामान ले जा कर चुपचाप उसे खिला देती है और दादी भीगी आंखों व भरे गले से अपनी पोती को पुचकारती रहती हैं. आज जब रज़िया नाश्ते का कटोरा ले कर बेबे के पास गई तो वह अपनी फटी कथरी पर बैठी अपने सामने एक पुरानी व मैली सी पोटली खोल कर उस में कुछ टटोल रही थी पर उस की आंखें अपनी पोती के इंतज़ार में दरवाज़े की तरफ ही गड़ी हुई थीं.

रजिया ने रोटी का कटोरा बेबे  को पकड़ा कर अपने दुपट्टे के खूंट में बंधे 3-4 खजूर निकाल कर झट से तोड़ कर कटोरे में डाले और बेबे  को जल्दी से रोटी ख़त्म करने को कहा. बेबे  की बूढ़ी आंखों में खजूर देख कर चमक आ गई और उस ने कटोरा मुंह से लगा लिया. तभी रजिया की नज़र खुली पोटली पर पड़ी जिस में किसी बच्ची की लाख की चूड़ियां, चांदी की पतली सी हसली और पैरों के कड़े एक छींटदार घाघरे व चुनरी में लिपटे रखे हुए थे. बेबे ने एक हाथ से पोटली पीछे सरकानी चाही, तो रज़िया ने पूछा, “बेबे, आ की?”

पोती के सवाल को पहले तो बेबे ने टालना चाहा  मगर रजिया के बारबार पूछने पर  लाख की लाल चूड़ियों को सहलाती हुई बोली, “ये म्हारी सचाई, म्हारो बचपण छे री छोरी.”

दादी को अलग ढंग से बात करते सुन रजिया को थोड़ी हैरानी हुई और उस ने हंस कर पूछा, “अरी बेबे, आज तू केसे गल्लां कर दी पई?” बेबे ने चेहरा उठाया, तो आंखों में आंसू डबडबा रहे थे. कुछ देर रुक कर बोली, “आज मैं तैनू सच्च दसां पुत्तर.” और फिर बेबे ने जो बताया उसे सुन कर रज़िया का कलेजा कांप उठा और वह बेबे से लिपट कर रोते हुए बोली, “बेबे, मैं तैनू जरूर त्वाडे असली टब्बर नाल मिल्वाइन. तू ना घबरा.” और अपने आंसू पोंछती हुई वह खाली कटोरा ले कर आंगन में आ गई.

रज़िया 18-19 साल की एक संजीदा और समझदार लड़की है जो अपने अनपढ़ परिवार की मरजी के खिलाफ जा कर अपनी एक सहेली की मदद से 8वीं तक की पढ़ाई कर चुकी है और अब उसी सहेली अफशां के स्मार्टफोन के ज़रिए  फेसबुक व व्हाट्सऐप जैसी आधुनिक दुनिया की बातों के बारे में भी जान गई है. यों तो रज़िया के अब्बू और तीनों भाई उस का घर से निकलना पसंद नहीं करते पर अफशां चूंकि गांव के सरपंच अजीबुर्रहमान की बेटी है, इसलिए उस के घर जाने की बंदिश रजिया पर नहीं है. अफशां लाहौर के एक कालेज में पढ़ती है और छुट्टियों में ही घर आती है. इसलिए उस से मिल कर शहरी फैशन और वहां के रहनसहन के बारे में जानने की उत्सुकता रज़िया को अफशां के घर ले जाती है.

रज़िया के अब्बा 4 भाई और 3 बहनें थीं जिन में से सब से बड़ी बहन का पिछले साल इंतकाल हो गया. बाकी 2 बहनें अपनेअपने परिवारों के साथ आसपास के गांवों में रहती हैं और चारों भाई इसी गांव में पासपास घर बना कर रहते हैं. हालांकि इन की बीवियां एकदूसरे को ज़रा भी पसंद नहीं करती हैं मगर खेतों का बंटवारा अभी तक नहीं हुआ है. इसलिए सभी भाई एकसाथ खेतों में काम करते हैं और उन की बीवियों को जगदिखाई के लिए अपनेपन का नाटक करना पड़ता है.

सभी भाइयों के बच्चे अंगूठाछाप हैं क्योंकि उन के खानदान में पढ़ाईलिखाई को बुरा माना जाता है. रज़िया ने अफशां की मदद से जो थोड़ी किताबें पढ़ लीं हैं उस की वजह है रज़िया का मंगेतर जहीर, जो चाहता था कि निकाह से पहले रजिया थोड़ा लिखनापढ़ना सीख ले. वह खुद भी 12वीं पास कर के पास ही के कसबे में नौकरी करता है और साथ ही, आगे की पढ़ाई भी कर रहा है. वह हमेशा रज़िया को आगे और पढ़ने के लिए कहता रहता है. लेकिन रजिया के अब्बू उसे किसी स्कूल में भेजने के खिलाफ हैं, इसलिए अफशां से ही जो भी सीखने को मिल जाता है उसी से रजिया तसल्ली कर लेती है.

आज बेबे की बातें सुनने के बाद रजिया ने मन ही मन तय किया कि वह हर हाल में अपनी बेबे को उस के अपनों से मिलवा कर रहेगी. इस के लिए चाहे उसे अपने खानदान से लड़ाई ही क्यों न करनी पड़े. मगर सिर्फ तय कर लेने से तो काम बनेगा नहीं, उस के लिए कोई राह भी तो निकालनी पड़ेगी. तभी रजिया को अफशां के फोन पर देखे फेसबुक के देशविदेश के लोगों का ख़याल आया और वह तुरंत अफशां के घर की तरफ लपक ली.

सुबह-सुबह रजिया को आया देख कर हैरान अफशां ने आने की वजह पूछी, तो रजिया उस के कंधे पर सिर रख कर सिसकने लगी. अफशां उसे अपने कमरे में ले गई और आराम से बैठा कर उस की परेशानी की वजह पूछी. तब रजिया ने अपनी बेबे का पूरा इतिहास उस के सामने रख दिया. “बाजी,  बेबे हिंदुस्तानी हैं.” रजिया की यह बात सुन कर अफशां ने हंस कर कहा कि पाकिस्तान में बसे आधे से ज़्यादा लोग हिंदुस्तानी ही हैं क्योंकि बंटवारे के वक्त वे लोग यहां आ कर बसे हैं. “ना बाजी, बेबे साडे मज़हब दी नहीं हैगी” और फिर रजिया ने बेबे की पूरी आपबीती अफशां को सुनाई.

तीज स्पेशल: 12 साल छोटी पत्नी- भाग 1-सोच में फर्क

”आज टाइम से आ जाना, अमोली. कोई बहाना नहीं चलेगा. कोरोना टाइम ने तो वैसे ही बोर कर के रख दिया है, अब बड़ी मुश्किल से आज गेटटुगेदर का प्रोग्राम बना है, मिस मत करना. सोमा बता रही थी कि उस ने तुझे पिछले हफ्ते भी अपने बेटे के जन्मदिन पर बुलाया था और तू गई नहीं थी. वैसे, तू गई क्यों नहीं थी?’’

मैं ने एक ठंडी सांस ली और कहा, ”तू तो जानती है जयराज के प्रोग्राम. उन्हें अपने क्लब का प्रोग्राम अटैंड करना था और मुझे भी हमेशा की तरह टांग कर ले गए. यार, जा कर बड़ी बोर हुई. वहां क्लब की औरतें जो भजनकीर्तन शुरू कर देती हैं, मन करता है कि वहां से भाग खड़ी होऊं, पर बैठी रहती हूं. और पता है, वहां औरतें क्या करती हैं, एकदूसरे के बच्चों की शादी में इतनी रुचि लेती हैं कि पूछो मत. मुझे उन लोगों की बातों पर बहुत गुस्सा आता है.’’

“तू जीजाजी को साफसाफ कह क्यों नहीं देती कि तुझे भजनमंडली में कोई रुचि नहीं है? क्यों अपना मन मारती है?’’

“कभीकभी कह भी देती हूं तो वे मुंह लटका लेते हैं, कहते कुछ नहीं. पर अपनी नाराजगी दिखा देते हैं.’’

“यार, सच में पति अगर 12 साल बड़ा हो, तो निभाना आसान नहीं है न. कितना फर्क होता है शौकों में.’’

मेरी दोस्त आशी ने फोन रख दिया, तो मैं यों ही अपने फ्लैट की बालकनी में रखी चेयर पर आ कर बैठ गई. मुझ से 12 साल बड़े हैं जयराज. बहुत अच्छे इनसान हैं, हमारा विवाह घर वालों ने वैसे ही तय किया था, जैसे कि पुराने जमाने की सोच वाले पैरेंट्स तय करते थे, मैं 5 भाईबहनों में तीसरे नंबर की थी, जयराज अच्छा कमाते हैं, अच्छा खातापीता परिवार. बस और क्या देखना था, हो गई शादी. 2 बच्चे भी हो गए, दोनों अब विदेश में पढ़ रहे हैं, जयराज को मेरा नौकरी करना पसंद नहीं था तो नहीं कर पाई. ऊपरऊपर से देखने में सब को लगता है कि मुझ से सुखी औरत दुनिया में कोई दूसरी नहीं होगी, पर ये जो जयराज और मेरी उम्र में 12 साल का अंतर है न, इस ने मेरे जीवन पर अजीब सा प्रभाव डाला है. धीरगंभीर जयराज जैसे मुसकराना भी नहीं जानते, हंसीठहाके दूर की बात है. मेरे सजनेसंवरने में उन्हें कोई रुचि नहीं. हर गलती पर ऐसे टोकते हैं, जैसे कोई टीचर हों. हर समय ज्ञान. हर बात पर ज्ञान. हमारे जीवन में कोई रोमांस, रोमांच नहीं. सपाट दौड़ता गया है जीवन. उन्हें पूजापाठ में रुचि है, बस. मैं उन से बिलकुल उलटी. मुझे हर समय मजाक, हंसी, मस्ती सूझती है, पर करूं किस से? कभी कोई जोक मारती हूं तो ऐसे देखते हैं जैसे कितनी बकवास कर दी है. कभीकभी मैं चिढ़ कर कह भी देती हूं, “यार, जोक मारा है, थोड़ा मुसकरा सकते हो?’’

तो वे कहते हैं, “क्या बचकानी बातें कर रही हो? और फिर मुझ से उम्मीद करती हो कि मैं हंसू भी?’’
क्या किया जाए, जयराज और मेरी उम्र में जो अंतर है, वो तो है ही, हमारे स्वभाव, व्यवहार में भी बहुत अंतर है. कभीकभी सोचती हूं कि कैसे 2 बिलकुल अलगअलग लोग जीवन साथ काट जाते हैं, यह आजीवन कैद जैसा जीवन नहीं होता?

उस दिन रविवार था. मैं ने सुबह ही कह दिया था कि बहुत दिन हो गए हैं, आज शाम को चाट खाने चलेंगे. हम गए भी, वहां जा कर एक कोने में खड़े हो कर बोले, “तुम्हारे साथ आ तो गया हूं, पर कुछ खाऊंगा नहीं.’’

“क्यों…?’’

“मुझे अपनी हेल्थ का ध्यान रखना है. तुम्हारा क्या है, तुम्हें तो सब हजम हो जाता है, सबकुछ खाती घूमती हो.’’

यह सुन कर मेरा मन खराब हो गया. इस से अच्छा तो मैं किसी फ्रैंड को ले कर आ जाती, ये दूर खड़े अपने फोन में व्यस्त हो गए, मैं अकेली गोलगप्पे खाने लगी. उस दिन सिर्फ तीखे पानी से मेरी आंखों से आंसू नहीं निकले थे, अजीब से क्षोभ से भरे आंसू थे वे. कभीकभी मुझे अपने पैरेंट्स पर बहुत गुस्सा आता है कि बस निबटाने के चक्कर में मेरी शादी करवा दी. कुछ भी तो नहीं मिलता हम में. कुछ भी तो एकजैसा नहीं है.

अभी कुछ सालों से तो जयराज ने क्लब ज्वाइन कर लिया है और साथ में मेरी मैंबरशिप भी ले ली है, अब यह क्लब वो क्लब नहीं हैं, जहां वीकेंड में जा कर मस्ती की जाती है, इन का ग्रुप क्लब में जा कर सत्संग, भजन करता है. ये चाहते हैं कि मैं भी आंखें बंद कर तालियां बजाते हुए भक्ति रस में डूबी रहूं, पर मुझे श्रृंगार रस और हास्य रस सूझता है, मूवी देखने का मन करता है, खिलखिलाने का मन करता है, शारीरिक रूप से सब ठीक ही चल रहा है, पर मन की भी तो एक जरूरत है, मानसिक स्तर पर भी तो संगसाथ चाहिए होता है. आजकल हम दोनों सुबह की सैर पर एकसाथ जाने लगे हैं, वहां जा कर ये उन लोगों में शामिल हो जाते हैं, जो लाफ्टर योगा के नाम पर बहुत जोरजोर से हंसते हैं, ये वही लोग हैं, जिन पर मैं अब तक मन ही मन हंसती थी कि यहां झूठेमूठे हंस रहे हो, घर जा कर कभी घर वालों से हंसीठट्ठा कर लो, तो इस की जरूरत नहीं पड़ेगी, घर में तो ऐसे सड़े मूड में रहेंगे, यहां आ कर पता नहीं क्यों होहो करना है. अब क्या, जयराज भी तो यही कर रहे हैं, इस से अच्छा तो मेरे जोक्स पर हंस सकते हैं. हुंह.

मैं अभी मन ही मन अपने खयालों में डूबी हुई थी कि जयराज का औफिस से फोन आ गया, ”क्या कर रही हो?’’

“आप के बारे में सोच रही थी.’’

“क्या? बताओ तो जरा.’’

“नहीं, कुछ खास नहीं.’’

“अच्छा, सुनो, इस वीकेंड सुनील ने क्लब में एक पार्टी रखी है. उन की मैरिज एनिवर्सरी है. पहले पूजा है, फिर डिनर.’’

“तो, मैं डिनर के टाइम ही जाऊंगी.’’

“अमोली, ऐसा नहीं कहते, पूजा में भी बैठना चाहिए.’’

“मुझे वीकेंड में मूवी देखनी है.’’

“फिर से कोरोना का नया वैरिएंट सुनने में आ रहा है, भीड़ से बचना चाहिए.’’

“क्लब में आप की भजन पार्टी में भीड़ नहीं होती क्या?’’

“अरे, वो तो धर्मकर्म की चीज है.’’

मैं कुछ नहीं बोली, फिर थोड़ा ज्ञान आया, “अमोली, मना मत किया करो, सोशल सर्किल जरूरी है.’’

मेरे शरारती मन ने अंगड़ाई सी ली, कहा, “वहां कोई मुझ पर मरमिटा तो…?’’

“फिर तुम ने फालतू बातें शुरू कर दीं?’’

थोड़ी देर मुझे समझा कर जयराज ने फोन रख दिया. पर, अब मुझे शरारत सूझ चुकी थी, मुझे नहीं जीनी है बोरिंग लाइफ. कुछ तो थ्रिल होना ही चाहिए.

15 अगस्त स्पेशल: कपड़ों में जकड़ी आजादी

पितृसत्तात्मक समाज की चालाकी और लालच आज भी महिलाओं का अस्तित्व उस के शरीर से आगे स्वीकार करने को तैयार नहीं है और उस की देह पर अपना कब्जा जमाए रखने के लिए वह औरत को कपड़ों की जकड़ व आभूषणों की बेडि़यों में कसे रखना चाहता है. इन बेडि़यों को काटे बिना औरत की गति नहीं है. इस षड्यंत्र को समझना और इस से मुक्त होने के रास्ते औरत को ही निकालने होंगे.

अकसर देखा गया है कि किसी बिल्ंिडग में आग लगने पर हताहतों की संख्या में औरतों की संख्या मर्दों से ज्यादा होती है क्योंकि वे अपने कपड़ों के कारण जल्दी भाग नहीं पातीं, पुरुषों की तरह तीनतीन सीढि़यां फलांग कर उतर नहीं पातीं. खिड़की के रास्ते कूद नहीं पातीं. उन के लबादेनुमा कपड़े इस में बाधक बन जाते हैं. उन की साड़ी या दुपट्टा आग पकड़ लेता है और वे उस आग में घिर कर झुलस जाती हैं या मर जाती हैं.

दुर्घटना के वक्त ज्यादातर औरतों के कपड़े ही उन की जान जाने का कारण बनते हैं. इस के उलट मर्द जोकि पैंट या निक्कर में होते हैं, तेजी से बच कर भाग निकलते हैं. पैंट, जिस में चलनाफिरना आसान है, लगातार पहनते रहने के कारण उन को आदत होती है तेज चलने या भागने की, लिहाजा वे तेजी से सीढि़यां फलांग लेते हैं, खिड़कियों से कूद जाते हैं. वहीं सलवारकुरता या साड़ी में औरतों को धीमे चलने की ट्रेनिंग यह समाज देता है, लिहाजा दुर्घटना के वक्त भी उन के पैरों में गति नहीं आ पाती, और दूसरी ओर उन के पहने गए कपड़े भी रुकावट पैदा करते हैं. ऐसे समाचार भी अकसर सुनने को मिल जाते हैं कि बाइक या स्कूटर पर पीछे बैठी महिला का दुपट्टा उस के गले और बाइक के टायर के बीच फंस कर उस की मौत का कारण बन गया.

अकसर देखा गया है कि बलात्कार, हिंसा, उत्पीड़न और छेड़छाड़ की शिकार वे महिलाएं ही ज्यादा होती हैं जो सलवारसूट या साड़ी में होती हैं. ये कपड़े उन को मानसिक व शारीरिक रूप से इतना कमजोर और लाचार बना देते हैं कि वे अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का विरोध भी नहीं कर पाती हैं. अत्याचारी के चंगुल से निकल कर भाग नहीं पाती हैं. ये दब्बूपना, डर, आतंरिक कमजोरी और लाचारी की भावना उन को उन पर थोपे गए कपड़ों से मिलती है. जबकि जींसटीशर्ट पहनने वाली महिला को कोई अपराधी तत्त्व जल्दी छेड़ने की हिम्मत नहीं करता है क्योंकि वे पलटवार करती हैं. तेजी से बच निकलती हैं. ये हिम्मत और निडरता उन को उन के कपड़ों से मिलती है.

अकसर देखा गया है कि पैंटशर्ट या जींस पहनने वाली महिलाएं कहीं आनेजाने के लिए किसी पर आश्रित नहीं होती हैं. वे खुद स्कूटर या बाइक चला कर निकल जाती हैं. उन्हें कहीं जाने के लिए पति, पिता या भाई का रास्ता नहीं देखना पड़ता है, बस या रिकशा का इंतजार नहीं करना पड़ता है. वे खुद सक्षम हैं, यह आत्मविश्वास उन को उन के कपड़ों से मिलता है.

जींसटीशर्ट या पैंटशर्ट पहनने वाली महिलाएं, साड़ी या सलवारसूट पहनने वाली महिलाओं के मुकाबले ज्यादा चुस्त, ऊर्जावान, शारीरिक रूप से फिट, खूबसूरत, आत्मविश्वास से भरी हुई और तेजी से काम निबटाने वाली होती हैं. कार्यालयों में उन की पूछ भी ज्यादा होती है. इस में दोराय नहीं कि यह चुस्तीफुरती उन को उन के कपड़ों से मिलती है.

सवाल यह उठता है कि जो कपड़े स्त्री को संबल, निडरता, ताकत, ऊर्जा और गति देते हैं, उन को पहनने के बजाय वे क्यों खुद को 6 गज लंबे कपड़े में लपेटे रखना चाहती हैं? क्यों इधरउधर लटके रहने वाले, मशीनों में फंस कर ऐक्सिडैंट कराने वाले कपड़े पहनती हैं? आखिर क्यों अपनी गति को बाधित करती हैं? दुनिया का हर घर चलाने वाली औरत, मर्द के मुकाबले दोगुना काम करने वाली औरत, घर और कार्यालय एकसाथ संभालने वाली औरत क्यों अपने मूवमैंट के लिए जीवनभर दूसरों की दया पर निर्भर रहती है?

सवाल यह भी उठता है कि क्यों फैशन वर्ल्ड, कपड़ा उद्योग, मनोरंजन की दुनिया में उन ड्रैसों का प्रचारप्रसार, दिखावा और ट्रैंड में होने का विज्ञापन ज्यादा है जो महिलाओं की आजादी और गति को बाधित करता है? दरअसल, यह पितृसत्तात्मक सोच है जो औरत को गुलाम बनाए रखने की कोशिश में आदिकाल से लगी है. औरत के वस्त्र हों या आभूषण अथवा अन्य साजशृंगार, ये सभी औरत को मर्द की दासी घोषित करने वाले प्रतीक माने जाते हैं.

जिस दिन पति अपनी पत्नी के गले में मंगलसूत्र बांधता है, उस दिन वह उस को अपनी दासी घोषित करता है, क्योंकि आभूषण अगर धर्म, संबंध, धन और वैभव के प्रतीक के रूप में स्त्री को पहनाए जाते हैं, तो इस धर्म, संबंध, धन और वैभव का प्रदर्शन फिर पुरुष भी क्यों नहीं करता? भारी पायल सिर्फ स्त्री के पैरों में ही क्यों सजाई जाती है? सिर्फ इस उद्देश्य से ताकि उस की गति को रोका जा सके और पायल की छम्मछम्म से उस के मूवमैंट का पता चलता रहे. ये आभूषण नहीं स्त्री के शरीर पर बांधे गए झुनझुने हैं जो घर के पुरुष को पलपल इस बात की जानकारी देते रहते हैं कि उस की स्त्री किस जगह है और क्या कर रही है. शृंगार और कपड़ों के जरिए औरत को गुलाम बनाने की कोशिश सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि दुनियाभर में कमोबेश एक जैसी ही रही है.

पश्चिमी समाज की गुलाम स्त्री

पहनावे की शैलियों का फर्क दुनियाभर के मर्दों और औरतों के बीच हमेशा से रहा है. विक्टोरियाई इंग्लैंड में महिलाओं को बचपन से ही आज्ञाकारी, खिदमती, सुशील व दब्बू होने की शिक्षा दी जाती थी. उन के पितृसत्तात्मक समाज में आदर्श नारी वही थी जो दुखदर्द सह सके. जहां मर्दों से धीरगंभीर, बलवान, आजाद और आक्रामक होने की उम्मीद की जाती थी, वहीं औरतों को क्षुद्र, छुईमुई, निष्क्रिय व दब्बू माना जाता था.

पहनावे में, रस्मोरिवाज में भी यह फर्क दिखाई देता था. छुटपन से ही लड़कियों को सख्त फीतों से बंधे और शरीर से चिपके कपड़ों में कस कर रखा जाता था. मकसद यह था कि उन के जिस्म का फैलाव न हो, उन का बदन इकहरा रहे. थोड़ी बड़ी होने पर लड़कियों को बदन से चिपके कौर्सेट पहनने होते थे. टाइट फीतों से कसी पतली कमर वाली महिलाओं को आकर्षक, शालीन व सौम्य समझा जाता था. इस तरह विक्टोरियाई महिलाओं की अबला दब्बू छवि बनाने में उन के कपड़ों ने अहम भूमिका निभाई.

महिलाओं ने इन तौरतरीकों को अपने बचपन से देखा. बच्ची ने देखा कि उस की मां कैसे कपड़े पहनती है, तो उस ने भी वही कपड़े अपनाए. उन कपड़ों को पहनने पर उसे अपने पुरुष पिता की ओर से शाबाशी और स्नेह मिला तो उस ने इस बारे में सोचा ही नहीं कि वह ऐसे कपड़े क्यों पहन रही है, जिस को पहन कर न तो वह खेल सकती है और न ही भागदौड़ कर सकती है.

उस ने कभी यह सवाल ही नहीं उठाया कि वह अपने पिता की तरह के कपड़े क्यों नहीं पहन सकती है. विक्टोरिया काल में आदर्श नारी की इस परिभाषा को बहुत सारी महिलाएं मानती थीं. यह संस्कार उन के माहौल में, उस हवा में जहां वे सांस लेतीं,  किताबें जो वे पढ़तीं, जो वह उन किताबों के चित्रों में देखतीं और घर व स्कूल में जो शिक्षा उन्हें दी जाती थी, सर्वव्याप्त था. बचपन से ही उन्हें घुट्टी पिला दी जाती थी कि पतली कमर रखना उन का नारीसुलभ कर्तव्य है. सहनशीलना महिलाओं का जरूरी गुण है. आकर्षक दिखने के लिए उन का शरीर से चिपका, कमर पर कसा और एड़ी तक लंबा कौर्सेट पहनना जरूरी था. इस के लिए शारीरिक कष्ट या यातना भोगना मामूली बात मानी जाती थी.

हालांकि कालांतर में इन मूल्यों को सभी औरतों ने स्वीकार नहीं किया. 19वीं सदी के दौरान कुछ विचार बदले. इंग्लैंड में 1830 के दशक तक महिलाओं ने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ना शुरू कर दिया. महिलाओं ने आंदोलन किया और पोशाक सुधार की मुहिम भी चल पड़ी. महिला पत्रिकाओं ने बताना शुरू कर दिया कि तंग कपड़े और कौर्सेट पहनने से युवतियों में कैसीकैसी बीमारियां और जटिलताएं आ जाती हैं. ऐसे पहनावे शारीरिक विकास में बाधा पहुंचाते हैं, इन से रक्तप्रवाह भी अवरुद्ध होता है. मांसपेशियां अविकसित रह जाती हैं और रीढ़ की हड्डी भी झुक जाती है.

पत्रिकाओं में इंटरव्यू के जरिए डाक्टरों ने बताया कि महिलाएं आमतौर पर कमजोरी की शिकायत ले कर आती हैं, बताती हैं कि शरीर निढाल रहता है, जबतब बेहोश हो जाया करती हैं.

अमेरिका में भी पूर्वी तट के गोरे प्रवासी लोगों के बीच ऐसा ही आंदोलन चला. पारंपरिक महिला कपड़ों को कई कारणों से बुरा बताया गया. कहा गया कि लंबे स्कर्ट, घाघरा, लहंगा आदि झाड़ू की तरह फर्श को बुहारते हुए चलते हैं और अपने साथसाथ कूड़ा व  धूल बटोरते हैं जो कई गंभीर बीमारियों का कारण है. फिर औरतों की स्कर्ट इतनी विशाल होती थी कि संभलती ही नहीं थी और चलने में परेशानी होने के कारण औरतों का काम करना  व जीविका कमाना मुश्किल था. कपड़ों में सुधार करने से महिलाओं की स्थिति में बदलाव आएगा, ऐसी बातों की लहर चलने लगी. कहा गया कि कपड़े अगर आरामदेह हों तो औरतें बाहर निकल कर कामधंधा कर सकती हैं, स्वतंत्र भी हो सकती हैं.

1870 के दशक में, श्रीमती स्टैंटन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय महिला मताधिकार संघ और अमेरिकी महिला मताधिकार एसोसिएशन के नेतृत्व में लुसी स्टोन ने ड्रैस सुधार के लिए बहुत प्रचार किया. उद्देश्य था पोशाक को आसान बनाना, स्कर्टों को छोटा करना और शरीर से कसे हुए कौर्सेट छोड़ना. उन का कहना था, ‘कपड़ों को सरल बनाओ, स्कर्ट छोटी करो और कौर्सेट का त्याग करो.’ इस तरह अटलांटिक के दोनों तरफ आसानी से पहने जाने वाले कपड़ों की मुहिम चल पड़ी.

सामाजिक मूल्यों में बदलाव तुरंत नहीं हुए

पाश्चात्य देशों में स्त्री पहनावे को ले कर कई आंदोलन हुए मगर पितृसत्तात्मक समाज से अपनी मांगें मनवाने में महिलाएं फौरन कामयाब नहीं हुईं. उन्हें उपहास और दंड दोनों झेलने पड़े. दकियानूसी तबकों ने हर जगह परिवर्तन का विरोध किया. उन का प्रलाप यह होता था कि पारंपरिक शैली की ड्रैसें नहीं पहनने से महिलाओं की खूबसूरती खत्म हो जाएगी. यही नहीं, उन की शालीनता भी गायब हो जाएगी. इन लगातार हमलों से त्रस्त हो कर कई महिला सुधारकों ने अपने कदम वापस घरों में खींच लिए और एक बार फिर पारंपरिक कपड़े पहनने लगीं.

फिर भी, 19वीं सदी के अंत तक हवा का रुख काफी बदल गया. कई तरह के दबावों में आ कर सौंदर्य के विचार और पहनावे की शैलियों में बुनियादी बदलाव आए. नए वक्त के साथ नए मूल्य भी चलन में आए. नए दौर में मध्य और उच्च वर्ग की महिलाओं के पहनावे में कई बड़े बदलाव आए और उन की स्कर्ट से लंबी झालरें गायब हो गईं.

प्रथम विश्व युद्ध ने औरत की पोशाक बदली

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान महिलाएं भी ब्रितानी हथियार फैक्ट्री में काम करने के लिए घरों से बाहर निकलीं. तब इसी पितृसत्ता ने, जो उन्हें लंबे लबादों में शालीन और सुंदर मानती थी, अपने मतलब के लिए उन के पहनावे में बदलाव को सहर्ष स्वीकार कर लिया. इस वक्त सहज गति की जरूरत के चलते महिलाओं के कपड़ों में बड़ा परिवर्तन आया और कार्यस्थलों पर महिलाएं पुरुषों की तरह के कपड़े करने लगीं.

ब्रिटेन में 1917 तक आतेआते करीब 70 हजार औरतें हथियार की फैक्ट्रियों में काम कर रही थीं. वे फैक्ट्री में ब्लाउज व पैंट वाली वर्दी पर स्कार्फ पहनने लगीं. बाद में इस वर्दी में स्कार्फ की जगह टोपी ने ले ली. जंग लंबी खिंची, शहीद मर्दों की संख्या बढ़ने लगी तो घरेलू महिलाओं के कपड़ों का भी चटख रंग गायब होने लगा. वे हलके रंग के सादे और सरल कपड़ों में आ गईं. स्कर्ट तो छोटी हुई ही, ट्राउजर भी जल्द ही पाश्चात्य महिला की पोशाक का अहम हिस्सा बन गया. इस से उन्हें चलनेफिरने की बेहतर आजादी हासिल हुई और सब से जरूरी बात, सहूलियत की खातिर औरतों ने बाल भी छोटे रखने शुरू कर दिए.

20वीं सदी आतेआते कठोर और सादगीभरी जीवनशैली गंभीरता और प्रोफैशनल अंदाज का पर्याय हो गई. बच्चों के स्कूलों में सादी पोशाक पर शोर दिया गया और तड़कभड़क को हतोत्साहित किया गया. लड़कियों के पाठ्यक्रम में जिमनास्टिक व अन्य खेलों का प्रवेश हुआ. खेलनेकूदने में उन्हें ऐसे कपड़ों की दरकार थी, जिस से उन की गति में बाधा न आए. उसी तरह काम के लिए बाहर जाने के वक्त उन्हें आरामदेह और सुविधाजनक कपड़ों की जरूरत हुई.

महिलाओं ने भारीभरकम, बेहद तंग और उलझाऊ वस्त्रों को 1870 के दशक तक धीरेधीरे त्याग दिया. कपड़े अब हलके, छोटे और पतले होने लगे. लेकिन फिर भी 1914 तक तो महिलाओं के कपड़े एड़ी तक होते ही थे और यह लंबाई 13वीं सदी से बदस्तूर चली आ रही थी. लेकिन अगले साल, 1915 में ही, स्कर्ट का पायंचा उठ कर अचानक पिंडलियों तक सरक आया.

दरअसल, यह बड़ा परिवर्तन विश्व युद्ध के कारण आया जब यूरोप में ढेर सारी औरतों ने जेवर और बेशकीमती कपड़े पहनने छोड़ दिए. उच्चवर्ग की महिलाएं अन्य तबकों की महिलाओं से घुलनेमिलने लगीं जो अपने कामधंधे के दौरान पिंडलियों तक की स्कर्ट पहनती थीं. उन की देखादेखी उच्चवर्ग की महिलाओं ने भी अपनी स्कर्ट छोटी की. इस से सामाजिक सीमाएं भी टूटीं और महिलाएं एकसी दिखने लगीं.

इस तरह औरत के कपड़ों का इतिहास समाज के वृहत्तर इतिहास से गुंथा रहा. पितृसत्ता ने अपने मतलब के लिए जब भी औरत की शारीरिक व मानसिक शक्ति का इस्तेमाल किया, उस ने उस के पहनावे में बदलाव को भी स्वीकार कर लिया. खूबसूरती की परिभाषा जरूरत के मुताबिक बदल ली जाती रही. मगर अधिकांश देशों में और खासतौर पर मुसलिम देशों में औरत को घर की चारदीवारी में समेटे रखने की मानसिकता के चलते उस के शरीर पर वजनी और गतिरोधक लबादे डाल कर रखे गए, जो आज तक बदस्तूर जारी है.

अरब देश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत हर जगह औरतों की हालत लगभग एकजैसी है. उन्हें सुंदर, शालीन, संस्कारी जैसी तारीफों के मकड़जाल में फंसा कर कपड़ों और जेवरों की बेडि़यों में जकड़ दिया गया है. कितनी हैरत की बात है कि धन की देवी लक्ष्मी को पूजने वाले अपने घर की बेटी लक्ष्मी को धनसंपत्ति में कोई अधिकार नहीं देना चाहते. वह एकएक पैसे के लिए घर के मर्दों के आगे भिखारी की तरह हाथ फैलाती है.

ज्ञान की देवी सरस्वती की आराधना करने वाले घर की ‘सरस्वतियों’ को स्कूल नहीं भेजना चाहते, उस को उच्च शिक्षा नहीं लेने देते, बल्कि उस के गले में एक मर्द से मंगलसूत्र बंधवा कर उस को उस की दासी घोषित करना अपना सब से बड़ा धर्म व गर्व समझते हैं. कहानियों में, लोककथाओं में, धार्मिक किताबों में, पूजा स्थलों में नारी को नर से आगे रखने वाले वास्तविक जीवन में नारी की गति और आजादी को बांध कर उसे हमेशा पीछे धकेले रखना चाहते हैं.

बंगलादेश में रेडीमेड कपड़ों की दुकानों पर नजर डालें, तो वहां पुरुषों के लिए शर्ट, पैंट, टाई या कुरता, पायजामा तो है, लेकिन महिलाओं के लिए बुर्के की तरह लंबी पोशाक है. सिर ढकने के लिए हिजाब भी है. कहींकहीं महिलाएं साड़ी के ऊपर बुर्के की जगह गाउन पहनती हैं. साड़ी पहनने पर पूरी बांह वाले ब्लाउज पहनने का चलन है. बंगलादेश में भीषण गरमी पड़ती है. फिर भी महिलाओं को लबादे पर लबादा ओढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है. गरम मुसलिम इलाकों में बुर्के और हिजाब का चलन लागू करना धर्म के नाम पर उस की गति रोकने का वही तरीका है, जिसे औरत शताब्दियों से भुगत रही है.

दरअसल, पुरुष खुद अपने को बंधनमुक्त रख कर महिलाओं को संस्कारों के नाम पर बांधे रखना चाहता है ताकि महिलाओं को अपने बारे में सोचने की ही फुरसत न मिले. महिलाओं को भी अपनी उस पारंपरिक और तथाकथित पवित्र छवि से मोह हो गया है जो उन के लिए पुरुषों ने गढ़ी है. जबकि वे काम की जगहों पर अपने कपड़ों की वजह से पिछड़ रही हैं, अपने कपड़ों के कारण कई तरह की मुसीबतों का सामना कर रही है. वे खुद यह भी मानती हैं कि कपड़ा किसी के चरित्र का मापदंड नहीं होता है. वे सवाल भी उठाती हैं कि जहां महिलाएं घूंघट या बुर्के में रहती हैं, वहां क्या उन का बहुत सम्मान किया जाता है? क्या उन्हें वहां बराबरी के सारे अधिकार हासिल हैं? क्या कपड़े हमारे चरित्र का पैमाना हैं? बावजूद इन तमाम सवालों के, महिलाएं खुद आगे बढ़ कर गतिरोधक कपड़ों की बेडि़यां उतारना नहीं चाहतीं.

नजर से गिरने का थोथा डर

कपड़ों में बदलाव न करने की सब से बड़ी वजह है डर. यह डर है अपनों की नजरों से गिरने का. सिर से पल्ला हटाया तो ससुर क्या कहेगा? देवर कैसी नजरों से देखेगा? जेठ के सामने से कैसे निकलूंगी? सास ताने मारेगी. महल्ले वाले बातें बनाएंगे. कैसी असंस्कारी, असभ्य, निर्लज्ज बहू है, ऐसी बातों के बाण मारेंगे. मनचले छेड़ेंगे. यही डर बेटियों को है कि जींसटौप पहना, तो पापा गुस्सा होंगे, भाई चिल्लाएगा. इस डर का मुकाबला कर के इस को हरा कर जो लड़कियां आगे बढ़ गईं, जीवन उन के लिए आसान हो गया. जीवन में गति आ गई, आजादी और आत्मनिर्भरता आ गई, खुद में आत्मविश्वास जागा.

कुसुम को पति की मौत के बाद जब सरकारी फैक्ट्री में उस की जगह काम करने का मौका मिला तो उस की ससुराल वालों ने सहर्ष हामी भर दी. बल्कि उस को पति की जगह काम दिलवाने की कोशिश तो घर वालों की सलाह से उस के जेठ ने ही की और कुसुम को काम मिल गया. 2 नन्हे बच्चों की विधवा मां कुसुम को ससुराल में रहने के लिए पैसे की जरूरत थी और ससुराल वालों को भी उस धन की लालसा जो वेतन के रूप में पहले बेटा लाता था और अब उस के मरने के बाद उन की बहू लाएगी.

कुसुम काम के लिए फैक्ट्री जाने लगी. वह रोज सुबह साड़ी लपेट कर सिर पर माथे तक पल्ला निकाल कर घर से निकलती थी, महल्ला पार करती, बस में सवार होती और आधे घंटे के सफर के बाद पसीने से लथपथ फैक्ट्री पहुंचती थी. फैक्ट्री पहुंच कर वह सिर से पल्ला उतार कर कमर में खोंस लेती ताकि मशीन पर खड़ी हो कर काम कर सके. लेकिन कुसुम की तारीफ घर और महल्ले में थी कि देखो, काम पर जाती है पर क्या मजाल कि सिर से एक इंच भी पल्ला खिसक जाए, कैसी संस्कारी बहू है. बस, यही संस्कारी बहू वाले तमगे ने उसे अपने कपड़ों में बदलाव से रोका हुआ है.

मशीन पर खड़े होते वक्त वह साड़ी के कारण परेशान होती रहती है, रास्तेभर यह 6 गज का कपड़ा उसे तेज चलने से रोकता है, गरमी के कारण आए पसीने में पेटीकोट बारबार दोनों पैरों के बीच चिपकता और फंसता है, मगर संस्कारी बहू इन परेशानियों को जीवनभर झेलती है और यही घुटनभरा संस्कार वह अपनी बेटियों को भी परोसती है.

पाकिस्तान में औफिस में काम करने वाली कितनी महिलाएं और कालेज जाने वाले लड़कियां जींसटौप के ऊपर बुर्का पहनती हैं, जो औफिस या कालेज पहुंचने के बाद उतर जाते हैं. महज इस कारण से कि कहीं उन की तथाकथित ‘शालीनता’ और ‘लज्जा’ पर सवाल न खड़े हो जाएं. यह बिलकुल ऐसा है जैसे मन गतिमान है, वह उड़ना चाहता है मगर सामाजिक तमगों के कारण औरतें खुद कपड़े पर कपड़ा ओढ़ कर उस गति को रोक देती हैं.

धर्म डालता है आजादी में बाधा

औरत को आजाद होने और गतिशील होने में सब से बड़ा बाधक है धर्म. धार्मिक स्थलों पर पुरुष तो पैंटशर्ट पहन कर जा सकता है मगर औरत नहीं. पुरुष अगर लुंगी या धोती पहने है तो अपनी लुंगी या धोती को घुटनों तक चढ़ा कर अपने पैरों का प्रदर्शन कर सकता है मगर औरत की साड़ी एड़ी तक होनी चाहिए. औरत को पल्लू से सिर भी ढांकना होगा. धार्मिक स्थल पर वह स्कर्ट पहन कर नहीं घुस सकती. सलवारकुरता पहने है तो लंबे दुपट्टे से सिर और छाती को ढकना होगा. हिंदू औरत पति के साथ पूजा में बैठती है, तो पूरे शरीर सहित उस का सिर और आधा चेहरा भी साड़ी के पल्लू से छिपा रहता है.

ये तमाम नियम धर्म और धर्म के ठेकेदारों ने औरतों पर थोपे हैं. ये नियम सभी धर्मों में हैं. ईसाई औरत लंबे गाउन पहनती है और सिर पर स्कार्फ या दुपट्टा बांध कर चर्च जाती है. मुसलमान औरतों को तो मसजिद में आना ही मना है, हालांकि वे आ सकती हैं, मगर उन के घरों से ही इजाजत नहीं मिलती. अन्य कामों से बाहर निकलती हैं तो उन को अपने सिर सहित पूरा शरीर लाबादेनुमा बुर्के में लपेटना होता है.

औरतें कैसे कपड़े पहनें, यह उन के धर्म और उस के ठेकेदार तय कर के उन के समाज और परिवार के माध्यम से उन पर लागू करवाते हैं. मगर यही धर्म और उस के ठेकेदार वहां चुप्पी साध लेते हैं जहां औरतें तपती धूप में खेतों या फैक्ट्रियों में काम करती हैं. जहां वे अपनी साडि़यों को धोती की तरह दोनों पैरों के बीच इस तरह पहन लेती हैं कि काम करने के लिए उन के पैर कपड़े में न अटकें. धोतीनुमा पहनी गई साड़ी कभीकभी उन की जांघों तक चढ़ आती है. आमतौर पर धान की रोपाई के वक्त पानी से भरे खेतों में औरतों को आप इसी पोशाक में पाएंगे. तब उन के सिर पर कोई घूंघट भी नहीं होता. तब क्योंकि, औरत से शारीरिक श्रम लेना है तो वहां कपड़ों के कारण शालीनता खोने या स्त्रियों के गुण खत्म होने का कोई सवाल पैदा नहीं होता है. वाह रे, दोमुंहा पितृसत्तात्मक समाज.

अनुपमा ने किया शाह हाउस का बंटवारा, समर और डिंपी को सिखाया सबक

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में होगा हाई वोल्टेज ड्रामा. शो के मेकर्स सीरियल को नंबर वन बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे है. टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में आए दिन नए-नए ट्विस्ट देखने को मिलते है. ‘अनुपमा’ के ट्विस्ट ने दर्शकों का दिमाग हिला रखा है. टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि शाह हाउस का होगा बंटवारा

अनुपमा डिंपी के जडे़गी थप्पड़

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड बेहद दिलचस्प है. शो के प्रोमो में दिखाया गया है कि डिंपल हमेशा की तरह ही बदतमीजी करेगी और तेज आवाज में अनुपमा से कहेगी- इस घर में रहने वाले सब के सब दोगले है और स्पेशल बा-बापूजी…. इससे पहले वह अपनी बात पूरी बोलती है, तब अनुपमा डिंपी को जोरदार थप्पड़ जड़ देती है. अनुपमा, बा-बापूजी के बारे में ऐसा सुनकर गुस्सा पर काबू नहीं कर पाएगी और वह समर-डिंपी से कहेगी- अभी के अभी अपना और अपने पति का सामान उठा और निकाल जा मेरे बा-बापूजी के घर से.

 

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अनुपमा ने किया किचन का बंटवारा

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में आगे देखने को मिलेगा कि डिंपल घर छोड़ने के लिए राजी नहीं होगी और कहेगी- ठीक है, एक घर में बाकी लोग और हम लोग अलग रहेंगे. लेकिन इस पर अनुपमा राजी हो जाती है और गुस्से में कहेगी- अब तुम दोनों के घर के ऊपर हिस्से में रहोगे, मैं रसोई अलग कर रही हूं, अलग, अलग मतलब सब कुछ अलग. वहीं अब अनुपमा में आगे कई सारे ड्रामा देखने को मिलेगा. ऐसे में संभावना है कि समर और डिंपल मालती देवी के पक्ष में हो जाएंगे.

Ankita Lokhande ने पति Vicky Jain के साथ दोबारा रचाई शादी, देखें फोटो

बॉलीवुड एक्ट्रेस अंकिता लोखंडे ने 2021 में विक्की जैन से शादी की और उनके इंस्टाग्राम अकाउंट उनकी खुशहाल जिंदगी का सबूत हैं. इस दिसंबर में दोनों के वैवाहिक जीवन के दो साल पूरे हो जाएंगे. इस जोड़े ने दोबारा शादी करने का फैसला किया और ठीक वैसे ही किया. एक्ट्रेस ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर तस्वीरें और वीडियो साझा किए. वीडियो में विक्की जैन को अंकिता के लिए घुटनों के बल बैठे देखा जा सकता है. शादी संपन्न होने के बाद, जोड़े ने Kiss किया और खुशी से एक साथ पोज दिया.

दूसरी शादी में अंकिता लोखंडे ने गुलाबी सीक्विन वाली साड़ी पहनी थी, जबकि विक्की जैन ने काले पतलून के साथ एक सफेद ब्लेज़र जोड़ा था और उन्होंने अपने लुक को पूरा करने के लिए मैचिंग बो टाई पहनी थी.

अंकिता-विक्की ने दोबारा की शादी

अंकिता लोखंडे ने 2021 में विक्की जैन से शादी की. एक बार फिर से उन्होंने विक्की जैन से शादी की. अंकिता ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया और तस्वीरें साझा की है. अंकिता ने अपनी पोस्ट के कैप्शन में लिखा है कि, “हमने फिर से शादी कर ली #watchtilltheend” और उन्होंने पोस्ट में एक ट्रैक सॉन्ग आई गेट टू लव यू लगाया है.

अंकिता लोखंडे ने दिसंबर 2021 में परिवार और दोस्तों की मौजूदगी में विक्की जैन से शादी की. बाद में उन्होंने भव्य रिसेप्शन समारोह आयोजित किया था.

यहां देखें अंकिता लोखंडे की तस्वीरे

कपल ने दूसरी शादी समारोह से और भी तस्वीरें साझा कीं. अपने पति विक्की जैन के साथ प्यारी तस्वीरें पोस्ट करते हुए, अंकिता लोखंडे ने लिखा, “मैंने एक सितारे से कामना की, मैं मुड़ी और वहां आप थे. मैं आपसे प्यार करती हूं मिस्टर जे.”

 

अंकिता ने अपनी खास तस्वीरें साझा कीं

एक्ट्रेस ने अपने पहनावे की स्टाइलिश तस्वीरें पोस्ट कीं – उन्होंने रचित खन्ना ब्रांड की सेक्विन वाली गुलाबी साड़ी पहनी थी, विक्की जैन ने मोटिफ ब्रांड का सूट पहना था. अंकिता लोखंडे ने पोस्ट को कैप्शन दिया, “अपना चेहरा हमेशा सूरज की रोशनी की ओर रखें और छाया आपके पीछे आ जाएगी.

 

 

तिहरे बोझ तले दबी कामकाजी महिलाएं

वर्तमान में नारी शक्ति अपने चरम पर है. समय के साथसाथ स्त्री की भूमिका में भी बहुत बदलाव आए हैं. महिलाएं घर से बाहर निकल कर अपनी एक वृहद पहचान बना चुकी हैं. उन की एक खासीयत यह भी है कि ज्यादातर महिलाएं मल्टीटास्किंग होती हैं जो अपने मैनेजमैंट द्वारा अपने कार्यों को बखूबी अंजाम दे रही हैं. आज हर क्षेत्र में महिलाएं अपने काम में दक्षता पूर्ण प्रदर्शन कर रही हैं. मगर लिंगभेद के विचारों की जड़ें आज भी समाज की खोखली मानसिकता से जकड़ी हुई हैं.

आज हम बात कर रहे हैं कामकाजी महिलाओं की, जिन पर दोहरा नहीं तिहरा बो?ा है. दफ्तर से कमा कर लाओ, घर चलाओ, बच्चों में संस्कारों का रोपण करो. इतना ही नहीं उस पर पूजापाठ, कर्मकांड को भी उतनी ही शिद्दत से पूर्ण करो. क्या यह न्यायसंगत है?

कोल्हू के बैल की तरह जुतती हुई महिलाएं  2 पल सुकून के लिए तरसती रहती हैं. जिम्मेदारी के ओढ़े हुए लबादे उन्हें चैन से जीने नहीं देते हैं. संविधान भले ही महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिए हैं, किंतु पूर्वाग्रह और लिंगभेद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे उन से बाहर ही नहीं निकल पा रही हैं.  परिवर्तन समाज का नियम है तो क्या यह नियम सिर्फ महिलाओं पर ही लागू होना चाहिए? क्या यह समाज सिर्फ महिलाओं से बना है पुरुषों से नहीं?

ओछी मानसिकता का शिकार

आज 58त्न महिलाएं नौकरीपेशा हैं. महिलाएं अपनी सामर्थ्य के अनुसार परिवार में आर्थिक योगदान प्रदान कर रही है, लेकिन उन का जीवन संघर्षों से भरा होता है और उन की चुनौतियां खत्म होने का नाम नहीं लेती हैं.  परिवार की देखभाल, खाना बनाने, बच्चों को विद्यालय के लिए तैयार करने, पति के लिए टिफिन तैयार करने और साफसफाई इत्यादि के लिए सुबह जल्दी उठना पड़ता है. इन सब कामों को निबटा कर वे कार्यालय जाने के लिए तैयार होती हैं.

यदि काम के लिए किसी हैल्पर को रख ले तो उन्हें स्वयं ही इस से 2-4 होना पड़ता है. समय व पैसे की बचत के लिए कामकाजी महिलाएं स्वयं को पूर्णरूप से काम में लिप्त कर लेती हैं. घरपरिवार के साथसाथ कामकाजी महिलाओं को अपने औफिस में भी समाज के विचारों की दोगली मानसिकता का सामना करना पड़ता है.

डिंपल कामकाजी महिला हैं. तीक्ष्ण बुद्धि की डिंपल अपने घर से ही अपने काम को अंजाम देती हैं. एक मैडिकल स्टोर संभालती हैं, परिवार व कार्य का संतुलन बनाने में काफी हद तक सफल हैं. लेकिन समाज की घिसीपिटी जंजीरे उन का पीछा नहीं छोड़ती हैं. परिवार के लोगों से ले कर पासपड़ोसी तक उन की इस सफलता को पचा नहीं पाते. उस पर टीकाटिप्पणी की जाती है कि पूजापाठ करो, निर्जला व्रत भी करो व घर के लोगों के स्वादिष्ठ पकवान भी बनाओ. यह स्त्री का धर्म होता है. क्या सभी स्त्री धर्म ही हैं?

क्या कहता है सर्वे

एक सर्वे में पुरुष कर्मचारियों के विचार कुछ इस तरह थे- महिलाएं अपने महिला होने का फायदा उठाती हैं कि हमें जल्दी घर जाना है. सरकारी नौकरी में सरकार ने महिलाओं को छूट दे रखी है. अरे भई नौकरी मिल गई है तो क्या महिला होने का फायदा उठाएंगी? जब हमें छोटेछोटे गांवों में तबादला मिलता है तो उन्हें क्यों नहीं?

फिर उन से पूछा गया कि क्या घर जा कर आप अपनी पत्नी की मदद करते हैं आखिर वे भी नौकरी करती हैं? तो जवाब था कि हम ने नहीं कहा नौकरी करो, यह उन का चुनाव है. हम घर कमा कर लाते हैं, घर चलाते हैं, घर के काम के लिए नौकरानी है. हम क्यों करेंगे घर के काम?

अधिकारों की विभाजन रेखा

आखिर अधिकारों की विभाजन रेखा को किस ने गहरा किया है? किसी भी पुरुष को घर के कार्यों में मदद करने पर शर्म क्यों आती है? हालांकि समाज में 10त्न लोग ऐसे भी हैं जो खुल कर अपनी पत्नी का सहयोग करते हैं, लेकिन यह संख्या न के बराबर है. ऐसे लोगों को समाज जोरू का गुलाम कहता है.

अंकिता स्वयं एक बड़े पद पर सरकारी संस्था में कार्यरत है और उस के पति भी एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते हैं. अंकिता सुबह  तड़के उठ जाती है. नाश्ते से ले कर मांपिताजी की दवा बच्चों का टिफिन सब तैयार कर 10 बजे औफिस जाती है. यहां तक कि पूजापाठ का जिम्मा भी उस के हक में आता है. हर वर्ष वह अपने बच्चों के जन्मदिन पर पंडितों को बुला कर पूजाअर्चना कराती है.

अंकिता से जब पूछा गया तो उस का कहना था कि ये हमारे संस्कार हैं. हम अपने बच्चों और अपनों के लिए नहीं करेंगे तो कौन करेगा? यह मेरी सच्ची श्रद्धाभक्ति है जिस के कारण पूरे परिवार को खुशी मिलती है और यदि वह पूजापाठ न करे, तब परिवार में कोई दीपक जलाने वाला भी नहीं होता है. सास कहती हैं कि बहू बहू की तरह ही अच्छी लगती है. आखिर हम ने भी सब किया है.

उसी तरह प्रीति ने भी अपने परिवार की संपूर्ण जिम्मेदारी निभाने का बो?ा अपने कंधों पर ले रखा है. पूजापाठ इत्यादि में वह अपना शेष समय गुजारती है. परिवार की हर जिम्मेदारी के साथसाथ बच्चों का पढ़ाई का जिम्मा भी उस ने उठा रखा है. रात को थक कर जब बिस्तर पर निढाल पड़ती है तो अगले दिन की चिंता सोने नहीं देती है. यह हाल सिर्फ शहरों में ही नहीं गांवों में भी आधिपत्य जमा चुका है.

पत्नी के पैसों पर ऐश

मध्य प्रदेश के एक छोटे गांव में चंचल स्कूल की शिक्षिका है. पति को कोई कार्य करने का शौक नहीं है. पहले वह घर वालों के पैसों पर ऐश करता था. डाक्टर भाई की उस के क्लीनिक में मदद करता था. पढ़ाई खास की नहीं. अब परिवार से अलग हो कर पत्नी के पैसों पर ऐश करता है. मटरगश्ती के अलावा कोई काम नहीं आता और कोई उसे सम?ाने की कोशिश करता है  कि पत्नी कमा रही है उस की मदद ही कर दिया कर तो जवाब आता है कि मु?ा से काम नहीं होता है. लुगाई किसलिए ले कर आया है?

चंचल ने अपने परिवार को संभाला, बच्चों की शादी की, आर्थिक जिम्मेदारी भी अकेले ही उठाई, लेकिन पति का कोई सहयोग नहीं मिला. पति का सहयोग तो उसे उस के गृहकार्य में भी नहीं मिला. जब चंचल से कहा गया कि तुम अपने पति से क्यों नहीं कहती हो कि घर के काम में तो मदद करो? तो उस का कहना था कि उन्हें तो आता नहीं है और यदि कोई काम करें तो ऐसा करते हैं कि मेरे काम का बो?ा और बढ़ जाता है. इस से बेहतर है कि खुद ही जल्दी सब कर के चली जाऊं. बस मु?ा से पूजापाठ ही नहीं होता लेकिन जबरदस्ती करना पड़ता है.

हर क्षेत्र में आगे हैं महिलाएं

आज देश में बहुत कामकाजी महिलाएं हैं जो पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर कमा रही हैं. लेकिन जब बात घर के काम की जिम्मेदारियां की आती है तब वहां भी अपेक्षाओं के बादल अपना प्रचंड रूप दिखाते हैं. आखिर इन कार्यों की विभाजन रेखा को किस ने गहरा किया है? आखिर इस समस्या की जड़ कहां है जो समय के साथ उखड़ ही नहीं रही है?

निधि और मयंक दोनों ही कौरपोरेट जगत में साथ में नौकरी करते हैं. साथ में औफिस जाते हैं. घर आने के बाद मयंक बैग को एक तरफ फेंक कर टीवी चला कर सोफे पर आराम फरमाता है कि यार बहुत थक गया हूं कुछ खाने को दो साथ में चाय हो जाए. बहुत थक गया हूं और निधि भी खुशीखुशी दौड़ कर गरमगरम चाय नाश्ता बना लाती है और फिर अपना घर समेटती है. प्रेम इंसान से क्या न करवाए. उस का कहना है इसी में तो सुख है.

लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि वह भी तो औफिस जाती है उतना ही कमा कर आती है. लेकिन जब बात घर के काम की आती है तो ज्यादातर पति यह कहते हैं कि नौकरी करना उस का चुनाव है. हम ने नहीं कहा. वह नौकरी छोड़ दे घर संभाले. यह अंतिम ब्रह्मास्त्र कमोवेश हर महिला के समक्ष फेंका जाता है. अपने सपनों की तिलांजलि न देते हुए कामकाजी महिलाएं अपनी पीठ पर जिम्मेदारियों को लादती चली जाती हैं, जिन्हें हलका करने वाला कोई नहीं होता है.

असंतुलन और मानसिक तनाव

महिलाएं जिम्मेदारियों के बो?ा तले इतनी दब जाती हैं कि स्वयं के स्वास्थ्य व खानपान के प्रति लापरवाह हो जाती हैं. इस के चलते दांपत्य जीवन की मिठास भी खो जाती है. सैक्स के प्रति उदासीनता, अपने रखरखाव में कमी आ जाती है. महिला चाहे कितनी भी कठोर उद्यमी क्यों न हो उस की कमियां निकलना, उसे डांटना पुरुष अपना जन्मसिद्ध अधिकार सम?ाते हैं. उस की स्थिति 2 नावों में सवार व्यक्ति के समान होती है क्योंकि एक ओर कार्यालय में स्त्री होने के कारण अधिकारी वर्ग उसे दबाने की कोशिश में लगा रहता है. तो दूसरी तरफ परिवार व पति. इन में वह गेहूं में घुन की तरह पिसती है.

असंतुलन उसे मानसिक तनाव देता है जिस के चलते थकान, नींद पूरी न होना, चिड़चिड़ापन, नींद न आना, बीपी, शुगर जैसी बीमारियों से ग्रस्त होना पड़ता है. ऐसी दिनचर्या अनेक बीमारियों को न्योता देती है. समाज को नई दिशा प्रदान करने वाली महिलाएं दोहरेतिहरे बो?ा को ढोतढोते अपनी जिंदगी से इतनी थकित हो जाती है कि एक समय के बाद उन का शरीर व मन दोनों जवाब दे देते हैं.

आखिर कब तक लिंग, स्त्री व धर्म के नाम पर उन्हें ठगा जाएगा? जब सारे कार्य महिलाओं को ही करने हैं तो पुण्य भी सिर्फ उन्हें ही मिलना चाहिए.

आज हमें अपने विचारों में क्रांति की जरूरत है. सिर्फ मोबाइल या सोशल मीडिया में बड़ीबड़ी बातें करने से कुछ नहीं होगा. उसे व्यवहार में लाने की बेहद आवश्यकता है. यही परिवर्तन आगे सुखद भविष्य का निर्माण करेगा.

जीवनसाथी को अपने साथी से प्रेम से पेश आना चाहिए. पुरुष घरेलू कार्यों में अपनी पत्नियों का सहयोग करें. मदद करने से कोई छोटा नहीं होता है. परिवार में वूमन फ्रैंडली माहौल हो. सहयोग व प्रेम मन में सुरक्षा की भावना प्रदान करता है. छुट्टियों में परिवार के साथ क्वालिटी समय व्यतीत करें. लिंगभेद से ऊपर बढ़ कर सोचें. कामकाजी महिलाओं को अपनी समस्याएं  परिवार के साथ खुल कर बांटनी चाहिए. सोच बदलेगी तो महिलाओं की स्थिति के साथसाथ समाज भी बदलेगा.

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