family story in hindi
family story in hindi
बात मेकअप की हो या फेशियल की, अगर सही स्टैप्स फौलो न किए जाएं तो वह निखार नहीं आ पाता, जो आना चाहिए था. कई बार महिलाएं बिजी शैड्यूल होने के कारण पार्लर नहीं जा पातीं और घर पर ही क्लींजिंग या फेशियल करना शुरू कर देती हैं. लेकिन जानकारी के अभाव में गलत स्टैप्स अप्लाई कर के परिणाम अच्छा न आने पर सोचती हैं कि बैस्ट कंपनी का प्रोडक्ट यूज करा था फिर भी रिजल्ट अच्छा क्यों नहीं आया?
दरअसल, कमी प्रोडक्ट में नहीं, बल्कि आप द्वारा प्रोडक्ट पर लिखे इंस्ट्रक्शन को फौलो न करने और स्किन संबंधी कुछ चीजों को इग्नोर करने के कारण हुई है.
आप से इस तरह की मिस्टेक्स न हों, इस के लिए स्किन मिरैक्ल ला मैरिनियर (फ्रांस) के टैक्निकल स्किन ऐक्सपर्ट, गुलशन द्वारा बताई बातों को फौलो करना न भूलें.
स्किन पर कुछ भी अप्लाई करने से पहले अपनी स्किन का टाइप चैक कर लिया जाए जैसे:
– अगर आप की स्किन नौर्मल है, तो फेस सौफ्ट दिखने के साथसाथ उस पर औयल भी नजर नहीं आएगा.
– औयली स्किन की निशानी है कि आप की नाक, फोरहैड और चीक्स पर औयल साफ दिखेगा.
– ड्राई स्किन में स्किन को जितने औयल की जरूरत होती है वह नहीं मिल पाता, जिस से स्किन रूखीरूखी नजर आती है.
– कौंबिनेशन स्किन में औयल ‘टी जोन’ यानी नाक और फोरहैड पर जमा रहता है.
– सैंसिटिव स्किन यानी एकदम से स्किन का रैड हो जाना. ऐसी स्किन पर किसी भी प्रोडक्ट का इस्तेमाल बहुत सोचसमझ कर करना पड़ता है.
– जब आप को अपनी स्किन का टाइप पता चल जाए तो फिर उसी के हिसाब से क्लींजिंग या फेशियल करवाएं.
इस बात का खास ध्यान रखना होगा कि फेशियल तभी अच्छा होगा जब क्लींजिंग सही होगी वरना रिजल्ट ठीक नहीं मिलेगा.
क्लींजिंग
क्लींजिंग हर फेस के लिए जरूरी है, क्योंकि चाहे घर हो या बाहर रोज हमारा संपर्क धूलमिट्टी से होता ही है. अत: क्लींजिंग द्वारा फेस पर न दिखने वाली गंदगी रिमूव होने से फेस शाइन करने लगता है. इस से स्किन के अंदर बाकी प्रोडक्ट्स को पहुंचाने में भी आसानी होती है.
क्लींजिंग क्रीम फेस के हिसाब से यूज करें. 10-15 मिनट तक फेस की क्लींजिंग कर के टिशू पेपर से फेस को साफ कर लें.
ऐक्सपर्ट के अनुसार, एएचए यानी अल्फा हाइड्रौक्सी ऐसिड, जो डिफरैंट पील ऐसिड का कौंबिनेशन होता है, करने से पहले स्किन को तैयार किया जाता है और दूसरा उस का पीएच लैवल मैंटेन किया जाता है, जो क्लींजिंग के द्वारा ही संभव है.
एएचए का कार्य स्किन की ब्लौकेज को खत्म करना होता है. वैसे तो यह कई रूपों में मिल जाता है लेकिन सब से ज्यादा ग्लाइसोलिक ऐसिड में पाया जाता है. यह स्किन की ऊपरी परत पर काम कर के कोशिकाओं को हैल्दी बनाता है.
इसी तरह स्किन के पीएच लैवल का मतलब है पोटैंशियल औफ हाइड्रोजन. अगर आप की बौडी का पीएच लैवल 7 है, तो इस का मतलब है कि आप की स्किन बेसिक है. लेकिन अगर पीएच लैवल 5.5 से थोड़ा भी कम है, तो इस का मतलब है कि स्किन की स्थिति सही नहीं है.
स्किन के पीएच लैवल का सही होना इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह बौडी व स्किन में बैक्टीरिया को प्रवेश करने से रोकता है. आप को पीएच लैवल को नौर्मल लाने के लिए स्किन प्रौब्लम्स जैसे खुजली या ड्राई स्किन आदि समस्या को पहले कंट्रोल करना होगा. इस के लिए आप पीएच बैलेंस्ड स्किन केयर प्रोडक्ट्स का यूज करें और फेस को कुनकुने पानी से धोएं.
ऐंजाइम मास्क
क्लींजिंग के बाद दूसरा स्टैप है ऐंजाइम मास्क को फेस पर लगाना. इस का स्किन से डैड सैल्स को हटाने में अहम रोल होता है. इसे फेस पर 10 मिनट के लिए अप्लाई करें फिर हलकी मसाज कर के हटा लें.
ऐंजाइम मास्क लगाने की शुरुआत हमेशा फोरहैड से करनी चाहिए. फिर फेस पर लगाएं. लेकिन हटाते वक्त हमेशा उलटी प्रक्रिया यानी पहले फेस से और फिर फोरहैड से हटाएं. ऐंजाइम मास्क का इस्तेमाल सैंसिटिव स्किन पर भी किया जा सकता है.
अल्फा हाइड्रौक्सी ऐसिड पीलिंग
मास्क हटाने के बाद अल्फा हाइड्रौक्सी ऐसिड से फेस की पीलिंग करें. यह प्रक्रिया स्किन के टैक्स्चर को इंपू्रव करने के साथसाथ उसे कोमल भी बनाती है.
शुरुआत हलके से करें यानी पहले एएचए का अनुपात 10% फिर 20% फिर 30% फिर 40% करें. इस से आप को स्किन को समझने का मौका मिलेगा.
इसे बनाने की प्रक्रिया
10% के लिए 3 ड्रौप पानी में 1 ड्रौप एएचए. 20% के लिए 2 ड्रौप पानी में 2 ड्रौप एएचए. फिर 30% के लिए 3 ड्रौप पानी में 3 ड्रौप एएचए.
सब से पहले टी जोन से शुरू करें. एएचए लगाने के 10-15 सैकंड के बाद यह देखना है कि स्किन पर कुछ महसूस हो रहा है या नहीं. इसे 3 मिनट से ज्यादा फेस पर नहीं रखना है.
एएचए का इस्तेमाल करने के बाद चेहरे को कोल्ड कंप्रैशन देना न भूलें. इस से चेहरे पर आई रैडनैस, सूजन वगैरह खत्म होती है. कोल्ड कंप्रैशन के लिए बर्फ का इस्तेमाल, टौवेल को ठंडे पानी में डुबो कर कुछ देर के लिए फेस पर रख दें. इस से चेहरे को ठंडक मिलती है.
स्क्रब
एएचए के बाद 3 मिनट के लिए फेस पर स्क्रब करें. स्क्रब करतेकरते स्टीम भी दें. इस का फायदा यह है कि रोमछिद्र ओपन होते हैं और डैड स्किन रिमूव होती है. फिर ड्राई टिशू से फेस को क्लीन कर लें. ध्यान रहे कि आंखों के ऊपर स्क्रब का इस्तेमाल न करें.
बीटा हाइड्रौक्सी ऐसिड
बीएचए यानी बीटा हाइड्रौक्सी ऐसिड. इस के कण थोड़े बड़े होते हैं. यह भी एएचए की तरह स्किन की ऊपरी परत पर काम करता है. इस का मुख्य कार्य डैड स्किन को रिमूव कर के स्किन को हैल्दी बनाना है.
अगर आप को मुंहासे हैं या फिर ब्लैकहैड्स, व्हाइटहैड्स हैं, तो यह काफी फायदेमंद साबित होता है. इस प्रक्रिया को हमेशा लास्ट में करना चाहिए ताकि स्किन में जो भी इन्फैक्शन हो वह खत्म हो जाए. इस से आप के फेस पर काफी निखार आएगा और स्किन जवांजवां नजर आएगी.
इन बातों को न करें इग्नोर
– यदि स्किन सैंसिटिव है, तो एएचए पीलिंग यूज न करें.
– 21दिन से पहले न तो क्लींजिंग और न ही फेशियल दें.
– फेस पर ब्लीच का इस्तेमाल न करें.
– फेस को नमी देने के लिए ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं.
– पौष्टिक डाइट लें.
अगर फेस पर कोई ऐलर्जी हो रही है, तो ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने की गलती न करें, क्योंकि इस से ऐलर्जी बढ़ने का खतरा रहता है.
घर आ कर उस ने किसी को कुछ नहीं बताया, क्योंकि जानती थी कि उस का घर से निकलना बंद करवा दिया जाता. हो सकता था कि उस का स्कूल भी छुड़वा दिया जाता. इसलिए उसे चुप रहना ही बेहतर लगा. लेकिन आज सोचती है तो लगता है कि गलत किया. मारना चाहिए था पकड़ कर उसे, शोर मचाना चाहिए था, ताकि लोगों को पता तो चलता कि वह कितना गंदा इनसान है?
लेकिन एक डर कि उस की बदनामी हो जाएगी. हमारे समाज में दोषी वह नहीं होता, जो लड़की के साथ छेड़छाड़ करता है, उस का बलात्कार करता है, बल्कि दोषी तो लड़की होती है, क्योंकि उसे घर से नहीं निकलना चाहिए था. हमारे समाज में दोषी आजाद घूमते हैं और निर्दोष को घर में कैद कर दिया जाता है.
दरवाजे की घंटी से स्नेहा अतीत से वर्तमान में आ गई. दरवाजा खोला।तो सामने वरुण खड़ा मुसकरा रहा था.
“आ गए तुम…? और ये हाथ में क्या है?” वरुण के हाथ में लाल पन्नी से लपेटा एक पैकेट देख कर स्नेहा चिहुक उठी.
“अब अंदर भी आने दोगी या यहीं खड़ेखड़े सवालजवाब करोगी,” वरुण ने कहा, तो स्नेहा जरा साइड हो गई.
“खोल कर देखो तो इस में क्या है,” लाल पन्नी से लपेटा पैकेट स्नेहा की ओर बढ़ाते हुए वरुण उस के चेहरे के आतेजाते भावों को पढ़ने लगा.
“वाउ वरुण… इस में तो आईफोन है… मेरे लिए?” स्नेहा ने पूछा, तो आंखों के इशारे से वरुण बोला की हां ये फोन उस के लिए ही है.
‘‘ओह्ह, आई लव यू सो मच वरुण,” कह कर उस ने वरुण के गालों को चूम लिया.
“लेकिन, यह मोबाइल तो बहुत महंगा लगता है?कितने का आया है बताओ?”
“तुम आम खाओ न, गुठली क्यों गिनती हो ?” वरुण ने कहा.
“गिनूंगी, बताओ कहां से आए इतने पैसे…?” स्नेहा तो वरुण के पीछे ही पड़ गई कि आखिर अचानक से उस के पास इतने सारे पैसे कहां से आ गए?
“बोलो न वरुण, नहीं तो मुझे नहीं चाहिए यह मोबाइल… रखो अपना मोबाइल अपने पास,” स्नेहा ने मुंह बनाया.
“अरे भई, एरियर मिला था, उसी पैसे से ले कर आया हूं. तुम बोल रही थी न कि तुम्हारा मोबाइल ठीक से काम नहीं कर रहा है. बात करतेकरते कट जाता है, तो इसलिए नया ले आया और अगले महीने तुम्हारा जन्मदिन भी तो आ रहा है न, तो गिफ्ट समझ कर रख लो,” वरुण ने कहा, तो स्नेहा उस से लिपट गई यह बोल कर कि वह उस का कितना खयाल रखता है.
“हम और तुम… बातबात पर मुझे गालियां देती रहती हो. जरा किसी लड़की को देख क्या लेता हूं, आंखें दिखाने लगती हो, जबकि जानती हो कि मैं तुम से कितना प्यार करता हूं. मैं तो एक नारी ब्रहचारी हूं.“
“अच्छा ठीक है, मैं तुम्हें नहीं डाटूंगी, लेकिन तुम भी ऐसीवैसी हरकतें मत किया करो,” बोल कर स्नेहा हंस पड़ी.
स्नेहा जानती है कि वरुण उसे कभी धोखा नहीं दे सकता. लेकिन डर इस बात का है कि कोई उसे बेवकूफ न बना दे. कितनों को देखा है, लड़कियों के चक्कर में कंगाल बनते हुए.
सुबह वरुण को औफिस भेज कर रोज की तरह वह अपने काम में लग गई.
“सर, मे आई कम इन… वरुण के कैबिन के बाहर खड़ी एक महिला बोली.
वरुण किसी से फोन पर बात करने में व्यस्त था, इसलिए बिना देखे ही उस ने इशारों से उसे अंदर आने को बोल दिया.
“थैंक यू सर,” उस महिला की मधुर खनकती आवाज जब वरुण के कानों में पड़ी और उस ने अपनी नजरें उठा कर देखा तो बला की खूबसूरत उस महिला पर वरुण की नजर टिक गई. उस ने अपनी जिंदगी में पहली बार इतनी खूबसूरत महिला देखी थी. बड़ीबड़ी कजरारी नशीली आंखें, गुलाब की पंखुड़ियों से रसभरे होंठ, रेशमी बाल, जो उस के गोरेगोरे मुखड़े पर अठखेलियां करते हुए कभी उस की आंखों को, कभी गालों को तो कभी उस के गुलाब सी पंखुड़ियों से अधरों को छू रही थी और जिसे वह बारबार अपने कोमल हाथों से हटाने का असफल प्रयास कर रही थी.
“सर, मैं रूपम व्यास हूं,” जब उस महिला ने अपना नाम बताया, तो वरुण की सुस्ती तुरंत फुरती में बदल गई.
“बोलिए मैडम, मैं आप की क्या सहायता कर सकता हूं?‘‘ रूपम के चेहरे पर से नजरें हटाते हुए वरुण ने कहा.
“सर, मुझे अपना ब्यूटीपार्लर खोलने के लिए बैंक से 10-12 लाख रुपए का लोन चाहिए,” रूपम बोले जा रही थी और वरुण उस की मादक और मोहक खुशबू में सराबोर हुए जा रहा था. उस का मन कर रहा था कि वह यों ही बोलती रहे और वह ऐसे ही उसे निहारता रहे.
“सर, क्या मुझे बैंक से लोन मिल सकता है?”
‘‘हां… हां, क्यों नहीं मैडम. हम यहां बैठे किसलिए हैं, आप की सेवा में… मेरा मतलब कि आप जैसों की सेवा के लिए ही न,” उस की आंखों में झांकते हुए वरुण बोला, “वैसे, लोन तो आप को मिल जाएगा, कोई समस्या नहीं है. लेकिन इस के लिए गारंटर का होना जरूरी है. ऐसे हम किसी को लोन नहीं दे सकते,” लेकिन रूपम कहने लगी कि वह इस शहर में अभी कुछ महीने पहले ही रहने आई है. यहां किसी को ज्यादा नहीं जानती.
रूपम आगे और कुछ बोलती कि वरुण बीच में ही बोल पड़ा, “आप की बात सही है मैडम, लेकिन यह तो बैंक का रूल है. हम बिना गारंटर के किसी को भी लोन नहीं दे सकते,“ बोल कर वह हंस पड़ा.
“ठीक है सर, तो फिर मैं चलती हूं,” खड़ी होती हुई रूपम बोली. वह समझ गई कि इस बैंक में उसे लोन नहीं मिलने वाला, इसलिए उसे अब किसी दूसरे बैंक का रुख करना पड़ेगा.
“क्या बात है, आज बड़े चुपचुप लग रहे हो, सब ठीक तो है न?” खाना खाते समय वरुण को चुप देख कर स्नेहा ने पूछा, तो वह यह बोल कर कमरे की तरफ बढ़ गया कि आज औफिस में काम ज्यादा था, इसलिए जरा थकावट हो रही है.
‘बेचारा, औफिस में पूरे दिन खटता रहता है और मैं पागल फिर भी इस से लड़ती रहती हूं. कितनी बुरी हूं मैं भी,’ अपने मन में ही सोच स्नेहा ग्लानि से भर उठी. लेकिन वरुण यह सोच कर गुस्से से भर उठा कि वह भी न, एक नंबर का गधा है. इतनी सुंदर औरत खुद चल कर उस के पास आई और वह उसे इतनी आसानी से जाने दिया. हाऊ केन? और कुछ भी तो नहीं जानता वह उस के बारे में कि वह कौन है, कहां रहती है? अरे, कम से कम उस का फोन नंबर तो ले लिया होता,‘ लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत. और गारंटर का क्या है, अपने किसी दोस्त को बना देता या खुद मैं भी तो बन सकता था न? अरे, कौन सा वह बैंक के पैसे ले कर भाग जाती? सही कहती है स्नेहा, मैं ने पिछली रोटी खाई है, तभी मेरा दिमाग सही समय पर काम नहीं करता,’ अपने मन में ही सोच वरुण पछतावे से भर उठा. रात में कितनी देर तक उसे नींद नहीं आई. फिर जाने कब उस की आंख लग गई. सुबह स्नेहा ने उठाया तब जा कर उस की आंख खुली.
‘‘क्वैक, क्वैक,’’ चित्रा के कानों में मोनाल पक्षी की आवाज पड़ी. वह कमरे से निकल बालकनी में जा खड़ी हुई. सायंकाल आसपास के पेड़ों पर अनेक पक्षी आ कर बैठते. चित्रा को ओक के पेड़ पर बैठा मोनाल और उस की सुरीली आवाज बहुत भाती थी. चित्रा ऊंचे पहाड़ों, पेड़ों, पौधों, फूलों और पक्षियों से नाता जोड़ उन के साए में प्रसन्न रहने का पूरा प्रयास कर रही थी. उस के लिए पहाड़ों की जीवनशैली नई थी. 2 मास पहले ही वह कसौली आई थी.
नई जगह, नया घर, नई नौकरी. चित्रा जीवन को नई दिशा दे कर अपने दुख को कम करने के प्रयास में लगी थी. पुराना सब भूल जाए, इसलिए ही तो सुदूर हिमाचल प्रदेश के कसौली शहर में नौकरी करने आ गई, जहां कोई उस से पूछने वाला नहीं होगा कि शादी हुई या नहीं? हुई तो पति के साथ क्यों नहीं हो? वह तलाक शब्द सब के सामने बारबार दोहरा कर लोगों के चुभते सवालों का सामना नहीं करना चाहती थी.
कभी दिल्ली के एक फाइवस्टार होटल में जौब थी, इसलिए कसौली जैसे छोटे नगर के थ्रीस्टार में फ्रंट डैस्क की नौकरी पाना आसान रहा, लेकिन बीते समय से दूर हो पाना इतना आसान कहां?
दूर पगडंडी पर बस्ता उठाए 2 बच्चों को जाते देख उसे अपना बचपन याद आने लगा.
2 साल बड़े इकलौते भाई मोहित से हमेशा उसे कमतर आंका जाता था. बचपन में अध्यापक मातापिता से शिकायत करते कि मोहित जैसे प्रतिभावान भाई की बहन इतनी साधारण क्यों?
न परीक्षा में वाहवाही पाने योग्य प्रदर्शन कर पाती है और न ही किसी अन्य क्षेत्र में कोई कमाल कर सकी है. छठी, 7वीं कक्षा तक आतेआते यह भी स्पष्ट होने लगा कि गणित और साइंस में ट्यूशन टीचर की सिरखपाई के बावजूद वह साधारण अंक ले कर ही उत्तीर्ण हो पा रही है. पिता ने इस बात पर जब उसे फटकार लगाई तो सुबकती हुई चित्रा मां के पास पहुंच गई.
‘‘मोहित सब कर लेता है, तो फिर तू क्यों नहीं? जरूर तेरे भाग्य में कुछ अड़चन है. कल बाबा को बुला कर बात करती हूं.’’
मां की दृष्टि में प्रत्येक समस्या का समाधान बाबा चंदनदास ही थे. जबतब वे उन के घर आता और बड़े रोब से अपनी सेवा करवाते. चित्रा अनमनी हो जाती. मेवा डली खीर, पूरी, साग, भाजी बना कर परोसते हुए मां उसे एक दासी सरीखी लगती थीं.
चंदनदास सदैव भविष्य में किसी अनहोनी की ओर इशारा कर मां को आतंकित करते थे. इस का उपाय दानदक्षिणा बता कर खूब खर्चा करवाते. मां का उन पर अडिग विश्वास था. उन का मानना था कि बाबाजी के पावन चरण जब भी घर में पड़े हैं कुछ शुभ ही हुआ है. मां की इतनी श्रद्धा होने पर भी चित्रा को न जाने क्यों बाबा का मुसकरा कर देखना अच्छा नहीं लगता था. जब भी वह मां के कहने पर उन को प्रणाम करने जाती तो बाबा की आंखें उसे अपने शरीर पर फिसलती सी लगती थीं. चित्रा को उन की एक अन्य आदत बहुत खटकती थी. मोहित भैया के प्रणाम करने पर वे सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देते, जबकि उसे अपने सीने से लगा कर दुलार करते.
उस ने मां से एक बार यह कहा भी मां ने उलटा उसे ही लताड़ दिया, ‘‘पापा डांटें तब भी तुम्हें दिक्कत है और बाबाजी प्यार करें तो भी परेशानी है. दिमाग को एक तरफ रखा करो.’’
चित्रा की अनिच्छा के बाद भी मां ने फोन कर बाबाजी को उस की पढ़ाई वाली समस्या बताई और घर बुला लिया. इस बार चंदनदासजी ने उसे भी मोहित के समान सिर पर हाथ रख आशीष दिया तो चित्रा को कुछ राहत मिली, लेकिन अगले ही पल जब सुना कि वे उसे अपने मठ में बुलाएंगे वह अनमनी, बेचैन सी हो गई.
‘‘बाबाजी आप यहीं कह दें मुझे जो कहना है,’’ चित्रा हिम्मत जुटा कर बोली.
‘‘यह तो बिलकुल बेवकूफ है, आप बुरा न मानिएगा,’’ मां बाबाजी के समक्ष हाथ जोड़ कर खड़ी हो गईं.
वे कुछ और भी कहना चाह रही थीं कि चंदनदास ने मुसकराते हुए हाथ के इशारे से रुकने को कहा. चित्रा को संबोधित करते हुए वे बोले, ‘‘बेटा, तुम्हारी स्मरणशक्ति विकसित नहीं हो रही. मैं कुछ मंत्र वहां अपने सामने पढ़वा कर कंठस्थ करवाऊंगा. इस से 2 लाभ ये होंगे कि एक तो तुम कुछ भी पढ़ कर मस्तिष्क में रखना सीखोगी, दूसरा मंत्रशक्ति के प्रभाव से जीवन में सफलता प्राप्त करोगी.’’
अगले दिन चित्रा को मां के साथ बाबा के मठ जाना पड़ा. चंदनदास के एक शिष्य ने कुछ मंत्र लिख कर दिए और कहा कि इन को कंठस्थ करने का प्रयास करे. चित्रा को बारबार पढ़ कर भी 1-2 मंत्र ही याद हुए. चंदनदास ने सुन कर संतुष्टि दर्शाई और चित्रा को घर भेज दिया. यह सिलसिला 4 दिन चला. चित्रा का डर धीरेधीरे कम हो रहा था.
उस दिन अकेले ही मठ जाने को तैयार हो गई. इस बार शिष्य ने उसे सीधा चंदनदास के पास भेज दिया. चंदनदास मखमली बिस्तर पर तकिए का सहारा लिए बैठे थे. हाथ में कोई पेयपदार्थ लिए घूंटघूंट पीते हुए चित्रा की ओर एक लंबी मुसकान फेंकने के बाद चंदनदास ने उसे अपने पास बैठने का इशारा किया. कुटील मुसकराहट और चंदनदास के मुख पर आई वासना की भंगिमा चित्रा को असहज करने लगी. कमरे में सुनहरे बल्बों के चकाचौंध उजाले में चित्रा की धड़कनें असामान्य होने लगीं, कंठ सूख रहा था. वह संभलते हुए चंदनदास के निकट जा कर बैठी तो बाबा की आंखों में तैर रही लोलुपता स्पष्ट दिखने लगी.
‘‘मैं कल आऊंगी, सिर में दर्द हो गया अचानक,’’ चित्रा उठ कर जाने लगी.
मगर उस के कमरे के द्वार तक पहुंचने से पहले ही बत्तियां बुझ गईं. अकबका कर अंधेरे में दौड़ी तो दीवार से टकरा कर गिर पड़ी. चंदनदास ने उसे कस कर भींच लिया. कमरे में फैली अगरबत्ती की महक थी या चंदनदास ने कोई इत्र लगाया हुआ था, चित्रा को उबकाई आने लगी. कुछ. देर बाद उस के अनावृत शरीर के नीचे नर्म गद्देदार बिस्तर था और ऊपर कठोर, घृणित दानव. चित्रा का दम घुट रहा था. असहनीय पीड़ा से उस की चीख निकल गई. इस के बाद नहीं पता उसे कि क्या हुआ? जब चेतना लौटी तो वह मठ के एक कमरे में थी. मां सिरहाने बैठी थीं. सफेद कपड़े पहने एक महिला उस की तीमारदारी कर रही थी.
‘‘बिजली चली गई तो डर के मारे यह दौड़ पड़ी थी… थोड़ीबहुत चोट आई. कुछ दिनों बाद ठीक हो जाएगी,’’ उजले परिधान वाली मां से कह रही थी.
उस दिन घटी घटना ने चित्रा को भीतर तक तोड़ दिया. दिनरात उसे भय सताता था कि बाबा ने मां को फुसला कर यदि फिर उसे बुला लिया तो क्या करेगी. मगर चित्रा को चंदनदास का सामना दोबारा नहीं करना पड़ा. उस के पिता का ट्रांसफर लखनऊ हो गया.
चित्रा उस घटना को भूल तो नहीं सकती थी लेकिन प्रयास अवश्य करती थी. अपना ध्यान हटाने के लिए उस ने पढ़ाई को अधिक से अधिक समय देना शुरू किया तो खोया आत्मविश्वास फिर से लौटने लगा. 12वीं के बाद होटल मैनेजमैंट की प्रवेश परीक्षा में अच्छा रैंक आ गया. आईएचएम लखनऊ में दाखिला ले कर डिगरी पूरी करने के बाद दिल्ली के एक फाइवस्टार होटल में प्लेसमैंट भी हो गई.
एक ओर अपनी नई नौकरी को ले कर उत्साहित थी तो दूसरी ओर इस बात की शंका थी कि मां फिर से चंदनदास कांड न आरंभ कर दें. दिल्ली में मां के साथ उन की एक सहेली के घर ठहरी चित्रा की यह चिंता जल्द ही दूर हो गई. उसे पता लगा कि चंदनदास का डेरा वहां से उखड़ चुका है. एक दिन मां की सखी को यह कहते सुना, ‘‘जितने मुंह उतनी बातें. कोई कहता है बाबाजी तपस्या के लिए कहीं दूर निकल गए हैं तो कोई यह भी कह रहा था कि पुलिस के डर से कहीं छिप गए हैं.’’
मां यह सुन कर उदास हो गईं तो चित्रा ने चैन की सांस ली. जौब करते हुए चित्रा को 1 साल ही बीता था कि उस के लिए रिश्ता ढूंढ़ा जाने लगा. चित्रा इस बात को ले कर भयभीत रहती कि चंदनदास ने उस के साथ जबरन जो संबंध बनाया था, उस के विषय में पति को कुछ पता तो नहीं लग जाएगा? कहीं उसे ही चरित्रहीन न समझने लगे भावी पति. मातापिता जोरशोर से मैट्रिमोनियल साइट्स खंगाल रहे थे.
इंदौर का रहने वाला अभिषेक उन को पसंद आ गया. अभिषेक ने बीबीए के बाद एमबीए किया था और किसी कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्य कर रहा था. अभिषेक व उस के परिवार वाले चाहते थे कि चित्रा नौकरी छोड़ दे क्योंकि रुपएपैसों की कोई कमी नहीं थी. उन को समझदार, सुंदर लड़की की तलाश थी. चित्रा असमंजस में थी. अंत में उस ने विवाह करने के पक्ष में निर्णय ले लिया. सोच रही थी कि मातापिता को कब तक टालेगी? पति को प्रेम भी करेगी और दोस्त भी मानेगी. संभव है तब कोई समस्या न आए. वह चाहती थी कि अभिषेक के साथ विवाहपूर्व कुछ समय साथ बिता ले जिस से आपस में बनी झिझक की दीवार गिरने लगे.
चित्रा का यह प्रस्ताव न उस के मातापिता को पसंद आया और न ही अभिषेक ने शादी से पहले मिलने में रुचि दिखाई. चित्रा ने मन को सम?ा लिया कि नौकरी तो शादी के बाद करनी नहीं, ऐसे में अभिषेक के साथ समय बिताने का भरपूर अवसर मिलेगा. विवाह के बाद सर्वस्व लुटा दूंगी उस पर. मखमली सपने देखते हुए वह अभिषेक की पत्नी बन गई.
विवाह की पहली रात को कमरा सुगंधित पुष्पों से सजा था. शैंडलेयर्स का तीव्र प्रकाश, फूलों की महक और नर्म बिस्तर. चित्रा का अवचेतन मन बरसों पुरानी घटना को याद कर भय से कांप उठा. अभिषेक ने कमरे में आ कर
2 गिलासों में सौफ्ट ड्रिंक डाल एक गिलास चित्रा की ओर बढ़ा दिया. अभिषेक के हाथ में गिलास और तकिए के सहारे बैड पर उसे अधलेटा देख चित्रा को उस में चंदनदास की छवि दिखने लगी. घबराहट के कारण उसे चक्कर आने लगा. जब अभिषेक ने उसे अपने पास खींचा तो वह चिल्ला उठी. नाराजगी दिखा कर डांटते हुए अभिषेक ने उस के मुंह पर अपना हाथ रख नियंत्रण में रहने को कहा. चित्रा का दम फूलने लगा. अभिषेक उस रात चुपचाप सो गया.
3 रातें बीत गईं. अभिषेक नाराज ही रहा. दिन में चित्रा उस के साथ खुल कर बातें करने का प्रयास करती, प्यार जताती, लेकिन अभिषेक मुंह फेर लेता. रात को उस के पास लेटे हुए चित्रा चिंता में घुलती रहती. अभिषेक कभी क्रोध से बड़बड़ाते हुए तो कभी भावभंगिमाओं के सहारे अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करता.
कभीकभी वरुण का व्यवहार स्नेहा के लिए इतना एम्ब्रेसिंग हो जाता है कि वही शर्म से गड़ जाती है. अब वह कोई बच्चा तो है नहीं, जो दोचार थप्पड़ लगा कर समझा दिया जाए? उस दिन अपने दोस्त की वेडिंग एनिवर्सरी में कैसे वह उस खूबसूरत महिला के साथ शराब के नशे में झूमने लगा था. यह भी नहीं सोचा कि उस की इस हरकत से स्नेहा को कितना बुरा लग रहा होगा. और वह औरत भी कितनी बेशर्म थी, जो वरुण की बांहों में लिपटी मजे से थिरक रही थी. कौन थी वो औरत? जो भी हो, पर उसे देख कर लग नहीं रहा था कि वह शादीशुदा है. वैसे, अब कहां पता चल पाता है कि उक्त महिला शादीशुदा है या नहीं. क्योंकि सिंदूर, चूड़ियां और मंगलसूत्र पहनना तो अब बीते जमाने की बात हो गई.
आज की महिलाएं काफी मौडर्न बन चुकी हैं. वैसे, इस बात से स्नेहा को भी कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वह खुद शादी का टैग लगा कर घूमना पसंद नहीं करती. लेकिन हां, जब उसे किसी पार्टी में जाना होता है तो कभीकभार स्टाइल के लिए मांग में जरा सा सिंदूर भर लेती है. वैसे भी, करीना कपूर हो, दीपिका पादुकोण या अनुष्का शर्मा, सभी शादीशुदा हीरोइनें बस फैशन के लिए ही तो मांग में सिंदूर भरती हैं.
वैसे, वरुण को भी इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता. वह तो खुद कहता है, जरूरत क्या है यह सब करने की. खुल कर जियो यार. बचा हुआ खाना फ्रिज में रखते हुए स्नेहा सोचने लगी कि वरुण की हर बात सही है, पर उस का औरतों को घूरना, उस के साथ फ्लर्ट करना उसे जरा भी नहीं पसंद. तभी पीछे से आ कर वरुण ने उसे पकड़ लिया और कान में फुसफुसाते हुए बोला,
‘मेरी जान, चलो न. कितनी देर लगा रही हो. तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही है मुझे,’ अचानक से वरुण की पकड़ से स्नेहा सिहर उठी. मन तो उस का भी मचला, पर एकदम से उस ने अपना रुख बदल लिया.
“ऊंह… छोड़ो मुझे. और मेरे पास क्यों आए हो…?जाओ न अपनी उन महिला दोस्तों के पास, जिन के साथ हमेशा मोबाइल में चिपके रहते हो?” बोल कर स्नेहा ने कुहनी मारी, तो वरुण ने और कस कर उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया.
“छोड़ो न वरुण, मुझे नहीं अच्छा लगता ये सब. तुम बड़े वो हो…” लेकिन उस की बात पूरी होने से पहले ही वरुण ने उस के मुंह पर उंगली रख दी और उसे अपनी गोद में उठा कर कमरे में ले गया और स्नेहा कुछ न बोल पाई.
सुबह स्नेहा के चेहरे पर न तो कोई गुस्सा था और न ही कोई शिकवाशिकायत, बल्कि वह तो गुनगुनाते हुए अपने वरुण के लिए अदरकइलायची वाली चाय बना रही थी. अपनी प्यार भरी बातों से आज फिर वरुण ने अपनी भोलीभाली पत्नी को शीशे में उतार लिया था.
वरुण को औफिस भेज कर स्नेहा किचन के बाकी काम निबटाने लगी. तब तक कमला भी आ गई. कमला चुप नहीं रह सकती कभी भी. काम करते हुए ही पटरपटर बोलते रहना उस की आदत है.
कमला, कमला नहीं, बल्कि एक चलताफिरता टेपरेकौर्डर थी. आसपड़ोस के घरों में क्या हो रहा है, किस पतिपत्नी के बीच मनमुटाव चल रहा है, किस सासबहू में टंटा हुआ, किस की बेटी भाग गई? सब रेकौर्ड कर के रखती है और जाजा कर दूसरे घरों में सुनाती है. काम करते हुए ही रस लेले कर वह आसपड़ोस के घरों की कहानियां बोलती रहती है और सब बड़े प्यार से सुनते हैं.
कमला काम करने के तो पैसे लेती ही है, रसीली खबरें सुनाने के भी उसे कुछ न कुछ मिल ही जाता है. खुश हो कर कोई उसे अपनी अच्छीभली साड़ियां, सूट दे देती हैं, तो किसी के घर से पुरानी लिपस्टिक, नेल पालिश या मेकअप का सामान मिल जाने पर वह झूम उठती है. अब दे भी क्यों न, जब बिना मेहनत किए दूसरेतीसरे घरों का ‘आंखोंदेखा हाल’ जो सुनने को मिल जाता है तो… इनसानों की फितरत में है दूसरों के घरों में ताकझांक करना. लोग क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कैसे रहते हैं, उन की दिनचर्या क्या है? जानने की लोगों में बड़ी उत्सुकता रहती है. लेकिन खुद के घरों में क्या हो रहा है, यह उन्हें खुद पता नहीं होता है.
स्नेहा भी कमला के आने का बेसब्री से इंतजार करती, ताकि आसपड़ोस की चटपटी खबरें सुनने को मिल सकें.अपनी आदत के अनुसार आते ही कमला शुरू हो गई.
“क्या बात कर रही है कमला? मिश्राइन चाची का अपनी बहू से झगड़ा हुआ? अच्छा… बहू उन्हें अब अपने साथ नहीं रखना चाहती? हाय, क्या जमाना आ गया है देखो तो… लेकिन, वह तो अपनी बहू की बड़ाई करते नहीं थकती थी. जब देखो, मेरी बहू ये, मेरी बहू वो,” स्नेहा ने मुंह बिचकाया, तो कमला कहने लगी, “अरे दीदी, वह सब तो दिखावा था, असल में सासबहू एकदूसरे का मुंह तक देखना नहीं चाहती हैं. सास कहती है कि निकल जा इस घर से… और बहू कहती है कि तू निकल बुढ़िया, हम क्यों निकलें?
“सच कहूं दीदी, सही हुआ है उस मिश्राइन चाची के साथ… उस बुढ़िया ने अपनी बड़ी बहू का जीना हराम कर रखा था, तो देखो, मिल गया न सेर को सवा सेर.
‘‘अरे दीदी, इस मिश्राइन चाची को छोड़ो. मेनका मैडम के बारे में सुनो. अरे वही, पार्लर वाली.‘‘
“हां… हां, बता न क्या हुआ उस के साथ?” स्नेहा ने सांस रोक कर पूछा.
“दीदी, सुना है कि उस के फेशियल से किसी को रिएक्शन हो गया. चेहरा सूज कर लाल हो गया बेचारी का. वह औरत तो मेनका मैडम को पुलिस में ले जाने की धमकी देने लगी.‘‘
“ये क्या कह रही है तू कमला? पर तुझे यह सब कैसे पता चला?” हैरानी से स्नेहा बोली.
“आप को तो पता ही है कि मेनका मैडम ने मुझ पर पार्लर से सामान चोरी करने का इलजाम लगाया था? हां, तो तभी से मैं ने उन के घर काम करना छोड़ दिया. लेकिन मेरी ही बस्ती की एक औरत उस के घर काम करने जाती है. उस ने ही बताया कि वह महिला मेनका मैडम पर केस करने जा रही थी. फिर मेनका मैडम ने उस औरत के सामने हाथपैर जोड़े, अपने बच्चों का वास्ता दिया, तब जा कर वह रुकी. पता नहीं, कुछ पैसे भी दिए होंगे शायद उसे. तभी तो वह पुलिस के पास नहीं गई. अच्छा हुआ, सारी बेईमानी एक बार में निकल गई. सच कहती हूं दीदी बड़ा मजा आया सुन कर कि उस की सारी अकड़ टांयटांय फुस हो गई,” एक लंबी सांस छोड़ते हुए विजयी मुसकान के साथ कमला बोली, “हम्म… अपनेआप को बड़ी श्रीदेवी समझती थी,” कमला की बात पर स्नेहा की हंसी छूट गई.
वैसे, स्नेहा को भी खूब मजा आ रहा था मेनका की बुराई सुन कर. उस के घमंडी व्यवहार के कारण ही तो स्नेहा ने उस का पार्लर जाना छोड़ दिया था.
“और मेनका मैडम के पति तो एकदम गिरा हुआ इनसान है,” कमला फिर शुरू हो गई, “आज सुबह जब मैं काम पर आ रही थी, तब वह मुझे ऐसे घूरने लगा कि क्या कहूं. ऐसा लग रहा था जैसे खा ही जाएगा. मैं भी उस के सामने थू कर आगे बढ़ गई. अच्छा किया न दीदी? ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए,” बोल कर कमला जिस तरह से हंसने लगी, स्नेहा को अच्छा नहीं लगा.
“सच कहूं, ये मर्दजात बड़े छिछोरे होते हैं. औरत या लड़की देखी नहीं कि इन के मुंह से लार टपकने लगती है.‘‘
“अच्छा… अच्छा, चुप हो जा अब, बहुत बोलती है तू,” स्नेहा ने डपटा, तो वह चुप हो गई. लेकिन स्नेहा का सिर भारी होने लगा.
“सुन, तेरा काम पूरा हो जाए तो एक कप चाय बनाती जाना. मेरा सिर भारी हुआ जा रहा है,” बोल कर स्नेहा किताब उठा कर उस के पन्ने पलटने लगी. लेकिन उस के चेहरे के आगे उस स्कूटी वाली लड़की का चेहरा नाचने लगा, जिसे वरुण गंदी नजरों से घूर रहा था और वह उस से बचने की कोशिश कर रही थी.
‘उस लड़की का मन भी तो वरुण के मुंह पर थूकने का कर रहा था?’ सोच कर स्नेहा शर्म से गढ़ गई. अपनी जिंदगी में हर एक लड़की को एक न एक बार इस सिचुएसन से गुजरना ही पड़ता है. कभीकभी तो करीबी दोस्त या परिवार का ही कोई सदस्य लड़कियों का शोषण करता है और वह कुछ बोल नहीं पाती है. एकाएक स्नेहा को वर्षों पुरानी बात याद हो आई और उस का मन कड़वाहट से भर उठा.
वह और उस की दोस्त मालती एक ही स्कूल में साथ पढ़ती थीं. दोनों का साथ आनाजाना, पढ़ना होता था. चूंकि दोनों का घर आसपास ही था, तो अकसर दोनों एकदूसरे के घर भी आयाजाया करती थीं. लेकिन उसे बुरा लगता, जब मालती का भाई उसे गंदी नजरों से घूरता. वह तो उसे अपने भाई की तरह मानती थी, लेकिन वह उस पर गंदी नजर रखता था.
एक बार अकेले पा कर वह स्नेहा के साथ गंदी हरकतें करने लगा. उसे यहांवहां छूने लगा. स्नेहा चिल्लाती रही, ‘भैया छोड़ो मुझे,’ मगर वह उस के स्तन को दबाता रहा. तब स्नेहा 15 साल की थी. कितनी मुश्किल से वह वहां से अपनी जान बचा कर भागी थी, वही जानती है.
युवतियों को बराबर की शिक्षा और रोजगार के बल पर लड़कों के समान सामाजिक और आर्थिक अवसर व ईनाम मिलने का कानूनन हक है. लेकिन जमीनी हकीकत इस से कोसों दूर है, फिर चाहे वह भारत में हो या फिर अफ्रीका में, हौलीवुड में हो या आस्ट्रेलिया की संसद में. इसी असमानता के कारण युवतियों को कई बार विरोध करना पड़ता है, अपने लिए आवाज उठानी पड़ती है. आज की युवती अपने लिए केवल शिक्षा और रोजगार ही नहीं, युवकों के बराबर आजादी भी मांग रही है.
नीति आयोग के अध्यक्ष का कहना है कि 10 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के लिए देश में ह्यूमन डैवलैपमैंट इंडैक्स में सुधार होना चाहिए जिस में भारत 180 देशों में 130वें स्थान पर है. इस इंडैक्स में बराबरी को भी एक मानक माना जाना है.
विश्वभर में यौन अधिकारों को मानवाधिकारों से जोड़ कर देखा जाता है. एक लड़की पहले एक मानव है और उस के भी बराबर के अधिकार हैं. कहने को तो हम कह देते हैं कि हमारे यहां युवतियां युवकों के बराबर हैं, लेकिन जब बात युवतियों को उन की पसंद, उन के अपने शरीर पर हक देने की आती है तो क्या उन को मनमरजी करने का अधिकार मिलता है? इस विषय की असलियत जानने के लिए समाज के अलगअलग पहलुओं से जुड़ीं कुछ महिलाओं के विचार जानने की कोशिश करते हैं.
महिला सशक्तीकरण की बात
पुणे की सिंबायोसिस इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी की प्रोफैसर डा. सारिका शर्मा बताती हैं, ‘‘कहने को तो हम सब कहते हैं कि हमारे लिए बेटों और बेटियों में कोई फर्क नहीं है, लेकिन जब बात जमीनी सचाई की आती है तब युवकयुवतियों के लिए अलग नियम होते हैं. युवतियों के लिए अकसर कुछ अनकहे नियम होते हैं, जिन का उन्हें पालन करना होता है. जैसा कि फिल्म ‘पिंक’ में दिखाया गया कि युवकयुवतियों द्वारा किए गए एक ही काम के लिए समाज का नजरिया बदल जाता है. उदाहरणस्वरूप, युवक सिगरेट पिएं तो सिर्फ उन के स्वास्थ्य की हानि की चिंता होती है, वहीं अगर युवती सिगरेट पिए तो उस के चालचलन तक बात पहुंच जाती है.’’
जहां तक सारिका का मां की हैसियत से प्रश्न है, वे बेटी को उस का कैरियर चुनने का, अपनी इच्छा के मुताबिक कपड़े पहनने का या फिर बाहर आनेजाने का पूरा अधिकार देती हैं. लेकिन यदि उन की बेटी उन्हें अपने बौयफ्रैंड से मिलवाए तो उस के लिए वे तैयार नहीं हैं.
वे मानती हैं कि महिला सशक्तीकरण के कई रास्ते हैं. आज युवतियां फौज में जा रही हैं, हवाईजहाज उड़ाने के साथसाथ सड़क पर ट्रक भी दौड़ा रही हैं और फाइटर जैट तक उड़ा रही हैं. लेकिन सैक्स की मनमानी का अधिकार देना उन की दृष्टि में आजादी नहीं है.
डा. सारिका कहती हैं, ‘‘अभी हमारा समाज इस स्तर तक नहीं पहुंचा है जहां युवतियों की शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति को हम सहज स्वीकार सकें. यदि इस समय हम अपनी बेटियों को ऐसी आजादी देंगे तो समाज में उन्हें कई मुसीबतें झेलनी पड़ सकती हैं.’’
नोएडा के एक स्कूल में अंगरेजी की अध्यापिका व फ्रीलांस क्विजीन ऐक्सपर्ट साक्षी शुक्ला बेबाकी से कहती हैं, ‘‘आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां महिला सशक्तीकरण एक अहम मुद्दा है. ऐसे में युवतियों को सैक्स के बारे में जागरूक करना चाहिए. एक ओर सैक्स एजुकेशन की बात होती है, जबकि दूसरी तरफ घर के अंदर इस विषय पर बात करने में भी मातापिता हिचकिचाते हैं. परंतु यदि सच में समाज में बदलाव लाना है, तो युवतियों को उन के अपने शरीर पर अधिकार की अनुमति देनी होगी.
‘‘सैक्स एक कुदरती प्रक्रिया है. एक महिला का सम्मान, उस की इज्जत सिर्फ उस की सैक्सुऐलिटी में ही नहीं है. समय आ गया है कि समाज अपनी इज्जत महिला के जननांगों में नहीं, बल्कि उस के बौद्धिक विकास में ढूंढ़े, उस के फैसले लेने की क्षमता में खोजे.’’
साक्षी आचार्य चाणक्य से सहमत हैं कि 5 वर्षों तक बच्चों को लाड़ करो, किशोरावस्था तक उन पर कड़े नियम लगाओ और फिर उस के मित्र बन जाओ. साक्षी कहती हैं, ‘‘आज हमें ‘मेरा शरीर मेरे नियम’ जैसे कैंपेन का हिस्सा बनना चाहिए, क्योंकि यदि लोग खुद इस का हिस्सा नहीं बनेंगे तो बदलते हालात में युवतियां बागी होने को मजबूर हो जाएंगी.
‘‘किशोरावस्था में गर्भधारण और फिर गर्भपात, यौनशोषण या यौनउत्पीड़न आदि से युवतियों को सही समय पर यौन संबंधी जानकारी दे कर बचाया जा सकता है और इस का सही समय तभी आरंभ हो जाता है जब युवतियां किशोरावस्था में कदम रखती हैं.’’
बराबर के हों नियम
फिनलैंड की एक बहुद्देशीय कंपनी में कार्य कर चुकीं रिंपी नरूला कहती हैं, ‘‘महिला होने के नाते मैं यह अनुभव करती हूं कि हमारे समाज में युवकों की तुलना में युवतियों को कम आजादी मिलती है.
‘‘मातापिता को अपने घर की चारदीवारी के अंदर युवकयुवतियों में फर्क नहीं करना चाहिए. उन्हें दोनों के लिए समान नियम लागू करने चाहिए. यदि एक घर में युवक को देररात तक बाहर आनेजाने की इजाजत है तो युवती को भी होनी चाहिए. और यदि युवतियों की इज्जत को खतरा लगता है तो फिर युवकों को भी देररात बाहर नहीं निकलने दिया जाना चाहिए.
‘‘आखिर युवकों के कारण ही तो युवतियों की इज्जत को खतरा होता है न. यदि नियम हों तो बराबर के हों. कुछ लोगों की ऐसी सोच होती है कि यदि युवतियों को पूरी आजादी दे दी जाएगी तो वे बिगड़ जाएंगी, यह सोच गलत है.
‘‘युवतियों पर भरोसा रखें, उन्हें संस्कार के साथ प्यार, विश्वास और इज्जत दें. उन में आत्मविश्वास जगाएं और फिर नतीजा देखें. युवतियों को घरेलू संस्कार देना हर परिवार अपना कर्तव्य समझता है, क्योंकि उन्हें गृहस्थी संभालनी होती है. लेकिन एक युवती की कुछ अपनी इच्छाएं भी हो सकती हैं. तो वह भी परिवार की जिम्मेदारी है कि वह युवतियों को अपनी ऐसी इच्छाओं को सुरक्षा के साथ कैसे पूरा करना है, यह सिखाए.
‘‘आजादी देने से युवतियां बिगड़ जाएंगी, यह जरूरी नहीं है. हां, वे अपनी सोच को अंजाम जरूर देंगी और इस के लिए जैसे समाज युवकों को स्वीकारता है वैसे ही उसे युवतियों को भी स्वीकारना होगा.’’
जिम्मेदारीभरी आजादी
मुंबई के टिस्स (टाटा इंस्ट्टियूट औफ सोशल साइंसैस) की मनोवैज्ञानिक मोना उपाध्याय अपने बेटाबेटी में पूरी तरह बराबरी रखती हैं. ऐसा वे एक सजग मां होने के नाते करती हैं. जब उन का बेटा कालेज में पढ़ने गया तब, और फिर जब बेटी दूसरे शहर कालेज गई तब उन्होंने अपने दोनों बच्चों से निजी वार्त्तालाप किया जिस में उन्होंने दबेढके रूप से यह बात उठाई कि दूसरी जगह, परिवार से दूर रहने पर, उम्र की इस दहलीज पर हो सकता है कि बच्चों के दिल को कोई भा जाए और उन के कदम बहक जाएं.
ऐसे में उन्हें यह यकीन होना चाहिए कि उन का परिवार उन के फैसले में साथ रहेगा, लेकिन साथ ही उन्हें यह एहसास भी होना चाहिए कि उन के जीवन के प्रति उन का कर्तव्य है कि वे सही फैसला लें. जो भी फैसला वे लेंगे उस का खमियाजा उन्हें खुद अपने जीवन में भुगतना होगा. उस के लिए परिवार के सदस्य उन की कोई सहायता नहीं कर सकेंगे.
मोना यह जानने को भी आतुर हैं कि यदि कदम आगे बढ़े तो उस की वजह क्या रही? एक मनोवैज्ञानिक होने के नाते वे मानती हैं कि सैक्स एक कुदरती प्रक्रिया है और उसे भावनात्मक बनाना जरूरी नहीं है. फि र भी दिल टूटता है तो उसे जोड़ना खुद ही होता है. वे अपनी बेटी को टूटे दिल को संभालने के गुर जरूर सिखाना चाहेंगी. दिल टूटने का मतलब जीवन का अंत नहीं.
मोना अपनी बेटी को बेटे के समान आजादी देने के पक्ष में हैं. साथ ही, वे यह भी चाहती हैं कि बेटी अपने जीवन में भावनाओं में बह कर कोई गलत फैसला न ले. इस से निबटने का हथियार है बच्चों से बातचीत. यदि परिवार में बातचीत है तो कोई ठोस कदम उठाने से पहले बच्चे मातापिता से अपने दिल की बात कहने में हिचकिचाएंगे नहीं. परिवार की महिला का यह कर्तव्य है कि वह पूरे परिवार में खुली बातचीत का माहौल कायम करे. फिर चाहे वह बेटी को पीरिएड्स में पैड्स की जरूरत की बात हो या अपने दिल का हाल सुनाने की.
डेल कंपनी की सीनियर कंसल्टैंट पल्लवी बताती हैं, ‘‘विदेशों में बेटे की गर्लफ्रैंड हो या बेटी का बौयफ्रैंड, दोनों को घर आने की आजादी होती है. अंतर्राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य संगठन सैक्सुअल अधिकार को मानवाधिकार के रूप में देखता है. सैक्स हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है, लेकिन इतना भी महत्त्वूपर्ण नहीं कि सारी जिंदगी उस के आसपास ही डोलें और न इतना हलका होता है कि उस के बारे में सोचा भी न जाए.’’
सैक्सुअल अधिकार अपने शरीर पर अधिकार की एक खास भावना है. पल्लवी अपने बच्चों को उन के शरीर पर अधिकार देने के पक्ष में हैं. अपने शरीर पर अपना अधिकार एक बड़ा कौंसैप्ट है जो जितनी जल्दी समझ में आए उतना ही बेहतर है. यह जीवन में आगे चल कर बच्चों को भावनात्मक रूप से ताकतवर बनाता है और इस के चलते वे जिंदगी के कई अहम फैसले लेने में सक्षम होते हैं जो उन्हें शारीरिक व मानसिक तौर पर प्रभावित करते हैं.
जागरूक बेटियों को दें आजादी
दिल्ली के द्वारका कोर्ट में पारिवारिक मामलों की वकालत कर रहीं रजनी रानी पुरी कहती हैं, ‘‘कैसे दोहरे मापदंड हैं हमारे समाज में, जहां युवतियों को बौयफ्रैंड रखने पर बदचलन कहा जाता है जबकि युवकों को गर्लफ्रैंड रखने पर मर्द कहा जाता है. मेरी सहेली के बेटे की गर्लफ्रैंड घर आती है, कमरे का दरवाजा बंद कर वे दोनों घंटों बिता देते हैं और घर वाले हंस कर छेड़ते हैं कि चाय की जरूरत है क्या. लेकिन उसी सहेली की बेटी ने जब अपने बौयफ्रैंड को परिवार से मिलवाना चाहा तो हंगामा मच गया.
‘‘उस सहेली से जब मैं ने इस दोहरे मापदंड पर सवाल किया तो उस के पास एक ही सवाल था, लड़की के साथ घर की इज्जत जुड़ी होती है. माना कि कुदरती रूप से युवती सैक्स के मामले में कमजोर है, क्योंकि उस की बात पकड़ में आ सकती है जबकि युवक आसानी से बच जाता है, लेकिन इस से बचने के लिए हमें अपनी बेटियों को यौनशिक्षा देनी चाहिए, उन्हें उन के यौन अधिकारों से परिचित करवाना चाहिए.
‘‘हमारा पुरुषप्रधान समाज युवकों को शौर्ट्स पहनने पर कूल कहता है जबकि युवतियों को चरित्रहीन. उन्नति की ओर बढ़ते हमारे समाज की करनी और कथनी में बहुत अंतर है. समाज की कट्टर सोच को ध्यान में रखते हुए युवतियों को समान अधिकार पाने के लिए बहुत होशियारी के साथ जीवन के फैसले लेने होंगे. इस के लिए उन्हें बचपन से ही जागरूक करना मातापिता की जिम्मेदारी है.’’
समाज बदल रहा है और युवतियों को आजादी मिलने लगी है, कहीं कम तो कहीं ज्यादा. लेकिन आजादी मुफ्त नहीं होती, उस की कीमत अदा करनी पड़ती है और वह कीमत होती है जिम्मेदारी. केवल आजादी के नारे लगाने से आजादी नहीं मिल सकती. जिन्हें आजादी की गुहार लगानी आती है, उन्हें आजादी मिलने से पहले अपनी जिम्मेदारी भी निभानी होगी. यह जिम्मेदारी है अपने जीवन के प्रति, अपने परिवार की खुशियों और ख्वाहिशों के प्रति, ताकि आगे चल कर समाज को अपने बदलने पर कोई पछतावा न हो.
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खास दिन पर खास दिखने के लिए आप मेकअप करती होंगी और पार्लर के चक्कर लगाती होंगी. फिर चाहे वह खास दिन कोई त्योहार हो या आपका जन्मदिन. और इन सब से भी ज्यादा खास है 15 अगस्त. कौन भारतीय यह दिन भूल सकता है जब हमें आजादी मिली थी. बेशक इस दिन आप और भी खास दिखना चाहेंगी.
खास दिखने के लिए आप कई तरह के मेकअप का प्रयोग करेंगी. लेकिन क्या आप जानती हैं कि मेकअप करते समय हमें कई सावधानियों को ध्यान में रखना पड़ता है. एक छोटी सी गलती आपके लुक को खराब कर सकती है.
तो इस स्वतंत्रता दिवस खास दिखने के लिए कुछ ऐसे करें मेकअप.
नैचुरल लुक के लिए लगाएं कंसीलर
चेहरे को फ्रेश और नैचुरल लुक देने के लिए कंसीलर का इस्तेमाल करें. इसके लिए कंसीलर के दो शेड का इस्तेमाल करें. लाइट कंसीलर को आंखों के पास लगाएं और डार्क कंसीलर को चेहरे के बाकी हिस्सों पर एप्लाई करें. इसके बाद बाकी के मेकअप को एप्लाई करें.
फेस और होठों के मेकअप का रखें ध्यान
अगर चेहरे की खूबसूरती को निखराना चाहती हैं तो हमेशा ध्यान रखें कि लिप्स पर डार्क लिपस्टिक लगाएं और चेहरे का मेकअप हल्का रखें.
आंखों का मेकअप
आपकी आंखें आपके चेहरे की पहचान होती हैं इसलिए इनका मेकअप करते समय खास ख्याल रखें. सबसे पहले लाइट कलर के फाउंडेशन से बेस तैयार कर लें. इसके बाद हल्के ग्रे कलर की आईलाइनर पेंसिल से ऊपर से नीचे की ओर लाइनर लगाएं. बाद में इसे उंगलियों की सहायता से स्मज कर दें. इससे स्मोकी लुक आता जाता है. इसके बाद मस्कारा लगाएं.
लिप्स को बनाएं ड्रामाटिक
अपने लिप्स को सुंदर और बोल्ड दिखाने के लिए सबसे पहले लिप्स पर कंसीलर लगाएं. उसके बाद जिस कलर की लिपस्टिक आप लगाने जा रही हैं उसी कलर के लिपलाइनर से होठों की आउटलाइनिंग करें. ऐसा करने से आपके लिप्स बहुत आकर्षक लगेंगे और आपकी लिपस्टिक लंबे समय तक टिकी रहेगी.
अगर आपके होंठ पतले हैं तो उनकी वास्तविक शेप से हटकर लाईनिंग करें और होठों को भरा हुआ दिखाने के लिप ग्लास का इस्तेमाल करें. इससे लिप्स बड़े और सुंदर लगते हैं.
बालों के लिए
थोड़ी सी फेस क्रीम लगाने से बालो में चमक आ जाएगी और बाल फटाफट सेट हो जाएंगे. ऐसा करने से रूखे बाल भी सही दिखने लगते हैं. आप चाहें तो रूखे बालों के लिए सीरम या फिर जेल लगाकर भी बालों को सेट कर सकती हैं. कोई नई हेयर स्टाइल बनाने से अच्छा है कि आप बालों को खुला ही रहने दें.
इस स्वतंत्रता दिवस अपने परिवार और दोस्तों के साथ आप खास जगहों की यात्रा के लिए जा सकती हैं, जहां पहुंचकर आप देशभक्ति के रंग में सरोबर हो जाएंगी. तो जानिए कौन-कौन सी हैं वो जगह जहां आप स्वतंत्रता दिवस मना सकती हैं.
लाल किला
स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने के लिए दिल्ली के लाल किले से अच्छी जगह और क्या होगी. सबसे पहले यहां सुबह-सुबह तिरंगा झंडा फहराया जाता है. शहीदों को सत्-सत् नमन कर अन्य रंग बिरंगे कार्यक्रमों का आयोजन होता है. स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों द्वारा पेश किए जाने वाले देशभक्ति कार्यक्रम सबसे ज़्यादा दर्शकों का मान मोहते हैं.
इंडिया गेट
इंडिया गेट का नाम सुनते ही अलग से रूह में देशभक्ति की भावना उमड़ पड़ती है. यहां स्थित अमर जवान ज्योति, जो भारतीय सैनिकों का मंदिर है लोगों में देश प्रेम की भावना को और बढ़ा देती है. आपको कई देशभक्ति फिल्मों में इंडिया गेट के नजारे देखने को जरूर मिलेंगे. रंग दे बसंती का वो सीन तो आप सबको याद ही होगा जब सारे दोस्त इंडिया गेट से गुज़रते हुए इंडिया गेट को सलामी देते जाते हैं.
राज घाट
यमुना नदी के किनारे स्थित राज घाट, महात्मा गांधी के यादों का स्मारक है. इसके साथ ही जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री के स्मारक भी विजय घाट के नाम से स्थित हैं. हर साल यहां आजादी के दिन इन महान व्यक्तियों को याद कर श्रद्धांजलि दी जाती है.
वाघा बार्डर
वाघा बार्डर, पाकिस्तान और भारत के बीच की इकलौती सड़क सीमा है, जहां हर साल 15 अगस्त के दिन लोगों का हुजूम उमड़ता है यहां के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए. दोनो देश इसी सीमा पर एक दूसरे को आजादी की बधाई देते हैं. देशभक्ति गीतों पर लोग नाचते गाते मौज मानते हैं. इस दिन यहां लोगों का जोश देखने लायक होता है.
जलियांवाला बाग
जलियांवाला नरसंहार भारत का सबसे बड़ा और दुखद नरसंहार था, जिसे पूरा देश कभी नहीं भूल सकता. 13 अप्रेल 1919 बैसाखी वाले दिन ही अमृतसर शहर के जलियांवाला बाग में रोलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी, जिसमें अंग्रेजी आफिसर जनरल डायर ने गोलियां चलवा दीं. इस क्रूर हत्याकांड के निशान अब भी वहां मौजूद हैं.
अल्फ्रेड पार्क
अल्फ्रेड पार्क जिसे कंपनी गार्डेन के नाम से भी जाना जाता है, वही जगह है जहां चंद्रशेखर आजाद ने देश के लिए लड़ाई लड़ते हुए अपनी जान गंवाई थी. इसे चंद्र शेखर आजाद पार्क के नाम से भी जाना जाता है. इलाहाबाद का यह सबसे बड़ा पार्क है जहां चंद्रशेखर आजाद का स्मारक स्थापित है.
साबरमती आश्रम
गुजरात के अहमदाबाद शहर में साबरमती नदी के किनारे स्थित साबरमती आश्रम का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका है. सत्याग्रह आंदोलन और दांडी मार्च की शुरुआत यहीं से हुई थी.
झांसी का किला
झांसी का किला जहां से झांसी की रानी हमारे देश की सबसे वीर महिला ने देश की आजादी के लिए लड़ाई आरंभ की थी. आज भी हर साल झांसी का महोत्सव इसे किले में ही मनाया जाता है.
बैरकपोर बाग
बैरकपोर बाग, पश्चिम बंगाल में स्थित बाग है जिसे मंगल पांडे बाग के नाम से भी जाना जाता है. इस बाग में अंग्रेजों का विरोध करने वाले कई भारतीय सैनिकों को सन् 1857 में फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था.
नेताजी भवन
पश्चिम बंगाल के कोलकाता में स्थित नेताजी भवन, एक स्मारक सभागार और संग्रहालय है, जहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी को उनके ही घर में बंदी बनाकर रखा गया था.
तिहाड़ जेल
तिहाड़ जेल अंडमान निकोबार के पोर्ट ब्लेर में स्थित अंग्रेजी शासकों का जेल है, जहां देश की आजादी के लिए लड़ने वाले देशभक्तों को कैदी बना कर रखा गया था. यहां उन्हें कई जटिल यातनाओं का सामना करना पड़ा था.
धीरेधीरे किशोर उस के दिल में जगह बनाता चला गया और प्यार की प्यासी सौम्या उस प्यार के सैलाब में बहती चली गई. अब अकसर ही सौम्या अपना कालेज बंक कर के किशोर से साथ लौंग ड्राइव पर निकल जाती थी. कई बार दोनों कईकई घंटे शहर से दूर निर्जन रिसोर्ट पर एकसाथ अकेले बिताने लगे थे. किशोर का जादू सौम्या के सिर चढ़ कर बोलने लगा था. मगर सुधा इस तरफ से बिलकुल लापरवाह थी. उस ने सौम्या के बहकने के अंदेशे के कारण ही उस से लगभग दोगुनी उम्र के किशोर को ड्राइवर रखा था, मगर यहीं वह गलत निकली. वह भूल गई थी कि स्त्रीपुरुष का रिश्ता हर जाति, धर्म और उम्र से परे होता है और फिर सौम्या जैसी लड़की के लिए तो फिसलना और भी आसान था क्योंकि उस ने तो पहली बार ही किसी पुरुष का संसर्ग पाया था.
किशोर अब सौम्या के लिए ‘किस्सू’ बन चुका था. एक दिन सौम्या ने किशोर के साथ अपने अंतरंग लमहों की कुछ सैल्फियां लीं. चलती गाड़ी में सौम्या वे सैल्फियां किशोर को व्हाट्सऐप पर भेज रही थी, मगर जल्दबाजी में कौन्टैक्ट नेम किस्सू की जगह केशव सिलैक्ट हो गया. जब तक सौम्या को अपनी इस ब्लंडर मिस्टेक का एहसास हुआ, एक फोटो केशव मामा को सैंड हो चुका था. उस ने हड़बड़ाहट में उसे कैंसिल करने की कोशिश की, मगर लेटैस्ट मोबाइल हैंडसैट और इंटरनैट पर 4जी की स्पीड, भला फोटो को अपलोड होते कोई देर लगती है.
और फिर वही हुआ जिस का डर था. सौम्या की फोटो देखते ही केशव का माथा ठनक गया. उस ने तुरंत सुधा को फोन कर के सौम्या की इस हरकत की जानकारी दी. मगर सुधा ने भाई को ही डांट दिया. वह मान ही नहीं सकती थी कि सौम्या जैसी हाई क्लास लड़की का एक ड्राइवर के साथ कोई संबंध हो सकता है. जब केशव ने उसे सौम्या की फोटो भेजी तब जा कर सुधा को मानना पड़ा कि पानी शायद सिर के ऊपर से गुजर चुका है. केशव ने उसे मामले की नजाकत और सौम्या की किशोरवय को देखते हुए अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी. मगर सुधा अपना आपा खो चुकी थी. उसे सौम्या का यह भटकाव अपनी परवरिश का अपमान लग रहा था. वह यह सोच कर तिलमिला उठी थी कि उस के रुतबे के सामने किशोर ने यह हिमाकत कर के उसे आईना दिखा दिया है.
तैश में आ कर सुधा ने किशोर को नौकरी से निकाल दिया. सुधा की इस हरकत ने सौम्या को और भी अधिक बागी बना दिया. उस ने घर में तांडव मचा दिया और खानापीना बंद कर दिया. राघव ने भी उसे किशोर के शादीशुदा और बालबच्चेदार होने का हवाला देते हुए समझाने की बहुत कोशिश की, मगर कहते हैं कि प्यार अंधा होता है. सौम्या ने किसी की एक न सुनी और एक दिन चुपचाप घर से कुछ रुपएगहने चुरा कर किशोर के साथ भाग गई.
सुधा को जब पता चला तो उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस ने आननफानन भाई लोकेश को फोन लगा कर सारी बात बताई. लोकेश ने सौम्या को तलाश करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी. उस ने कोलकाता के संबंधित थानाधिकारी से संपर्क कर के किशोर के फोटो हर थानाक्षेत्र में भिजवा दिए. साथ ही, दोनों को उन के मोबाइल नंबर की लोकेशन के आधार पर ढूंढ़ने की भी कोशिश की, मगर दोनों के मोबाइल स्विच औफ आ रहे थे. तब केशव की टीम ने किशोर के परिवार पर नजर रखनी शुरू की. किशोर की पत्नी से संपर्क करने पर पता चला कि वह स्वयं भी कभी इसी तरह उस के हनी ट्रैप का शिकार हुई थी.
पुलिस द्वारा किशोर की पत्नी और उस के मांबाप के फोन लगातार ट्रैस किए जा रहे थे. सौम्या के नाम को इस सारे घटनाक्रम में गुप्त ही रखा गया था. आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई और लगभग एक महीने की भागदौड़ के बाद सौम्या को किशोर के साथ भोपाल के रेलवेस्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया. सौम्या के साथ लाए पैसे जब खत्म हो गए तो किशोर ने उस के सारे गहने बेच दिए. सबकुछ खत्म होने के बाद अब वह सौम्या को ही बेचने की जुगाड़ में था कि पकड़ा गया. मामा को देखते ही घबराई हुई सौम्या दौड़ कर उस से लिपट गई. अब तक उस के सिर से भी किशोर के प्यार का बुखार उतर चुका था.
लोकेश सौम्या को ले कर कोलकाता पहुंचा और उसे सहीसलामत सुधा को सौंप दिया. बेटी को इतनी दयनीय हालत में देख कर सुधा को अपने मां होने पर शर्म आ रही थी. वह सौम्या की इस हालत की जिम्मेदार खुद को ही मान रही थी. बेटी तो सकुशल घर लौट आई मगर सुधा की मुसीबत खत्म नहीं हुई थी. उस ने अपना सिर पीट लिया जब उसे पता चला कि कुंआरी सौम्या किशोर के बच्चे की मां बनने वाली है.
सुधा को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. अगर यहां सोसाइटी में किसी को पता चल गया कि रूपचंदजी की पोती ने ये गुल खिलाए हैं तो बहुत बदनामी होगी. कहीं भी मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे. उस ने राघव से मशवरा कर के केशव से अपनी परेशानी साझा की. केशव ने उसे तुरंत सौम्या को बीकानेर लाने के लिए कहा. ज्यादा देर करना उचित न समझ कर सुधा दूसरे ही दिन सौम्या को ले कर बीकानेर रवाना हो गई.
केशव को आश्चर्य हुआ जब उस ने सुधा को स्लीपर क्लास के डब्बे से उतरते हुए देखा. सुधा ने अपनी झेंप मिटाते हुए कहा, ‘‘क्या करूं? मजबूरी थी. एसी में रिवर्जेशन मिला ही नहीं और आना कितना जरूरी था, यह तुम से बेहतर कौन समझ सकता है.’’
सौम्या मामा से नजरें भी नहीं मिला पा रही थी. केशव ने सुधा से कहा, ‘‘आप दोनों के रहने का बंदोबस्त मैं ने होटल में कर दिया है. घर जाने पर बेकार में ही बात खुलेगी और बच्ची की बदनामी होगी.’’ भाई की बात सुन कर सुधा ग्लानि से भर उठी. वह सोचने लगी, यही केशव है जिसे मैं ने सदा ही अपने से कमतर समझ कर दुत्कारा और इस का अपमान किया. आज यही मेरी बेटी की इज्जत का रखवाला बना है. सौम्या भी नजरें नीची किए अपनी गलती पर पछतावा करती आंसू बहा रही थी.
केशव उन्हें होटल में छोड़ कर घर चला गया. दूसरे दिन उस ने सौम्या को एक लेडी डाक्टर से मिलवाया और उस के सभी आवश्यक टैस्ट करवाए. दोपहर बाद रिपोर्ट आने पर शाम तक लेडी डाक्टर ने सौम्या को अनचाहे गर्भ से छुटकारा दिला दिया. 2 दिनों तक डाक्टर की देखरेख में रहने के बाद केशव ने होटल से ही सुधा और सौम्या को कोलकाता के लिए रवाना कर दिया. किसी को कानोंकान खबर भी नहीं हुई उन के बीकानेर आने और वापस जाने की.
सौम्या अभी तक इस सदमे से बाहर नहीं निकल सकी थी. केशव ने जब टूटी हुई सौम्या का हौसला बढ़ाने के लिए स्नेह से उसे अपने सीने से लगाया तो उस के भीतर जमी हुई सारी पीड़ा प्यार की गर्माहट पा कर पिघल गई. उस ने रोतेरोते केशव से कहा, ‘‘मैं भटक गई थी मामा. जिसे मैं प्यार की कच्ची धूप समझ रही थी वह जलता हुआ सूरज निकला. मैं उस में झुलस गई.’’
केशव ने सौम्या के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘बेटा, हीरा अगर गलती से कीचड़ में गिर जाए तो भी उस की कीमत कम नहीं होती. जो कुछ हुआ उसे एक ऐक्सिडैंट या बुरा सपना समझ कर भूल जाना. यह बात सिर्फ हम तीनों तक ही सीमित रहेगी, मैं तुम्हें इस का भरोसा दिलाता हूं. तुम बेफिक्र हो कर अपने आगे की जिंदगी जियो.’’
ट्रेन जब प्लेटफौर्म छोड़ने लगी तो सुधा से रहा नहीं गया. वह केशव से लिपट कर रो पड़ी. कहना तो बहुत कुछ चाह रही थी मगर गला अवरुद्ध हो गया. शब्द आंसुओं के साथ बहने लगे. केशव ने भी बहन को गले से लगा लिया. कुछ भी न कह कर दोनों ने सबकुछ कहसुन लिया. सारे गिलेशिकवे धुल गए. बादलों के बरसने के बाद जैसे आसमान साफ और धुलाधुला सा हो जाता है वैसे ही आज सुधा का दिल एकदम साफ हो गया था. उसे समझ आ गया था कि दुनिया में पैसा ही नहीं, बल्कि सच्चे रिश्ते और अपनों का प्यार भी खरी कमाई हैं.