तारीफ: अपनी पत्नी की तारीफ क्यों कर पाए रामचरण

रामचरणबाबू यों तो बड़े सज्जन व्यक्ति थे. शहर के बड़े पोस्ट औफिस में सरकारी मुलाजिम थे और सरकारी कालोनी में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सुख से रहते थे. लेकिन उन्हें पकौड़े खाने का बड़ा शौक था. पकौड़े देख कर वे खुद पर कंट्रोल ही नहीं कर पाते थे. रविवार के दिन सुबह नाश्ते में पकौड़े खाना तो जैसे उन के लिए अनिवार्य था. वे शनिवार की रात में ही पत्नी से पूछ लेते थे कि कल किस चीज के पकौड़े बना रही हो? उन की पत्नी कभी प्याज के, कभी आलू के, कभी दाल के, कभी गोभी के, तो कभी पालक के पकौड़े बनाती थीं और अगले दिन उन्हें जो भी बनाना होता था उसे रात ही में बता देती थीं. रामचरण बाबू सपनों में भी पकौड़े खाने का आनंद लेते थे. लेकिन बरसों से हर रविवार एक ही तरह का नाश्ता खाखा कर बच्चे बोर हो गए थे, इसलिए उन्होंने पकौड़े खाने से साफ मना कर दिया था.

उन का कहना था कि मम्मी, आप पापा के लिए बनाओ पकौड़े. हमें तो दूसरा नाश्ता चाहिए. रविवार का दिन जहां पति और बच्चों के लिए आराम व छुट्टी का दिन होता, वहीं मिसेज रामचरण के लिए दोहरी मेहनत का. हालांकि वे अपनी परेशानी कभी जाहिर नहीं होने देती थीं, लेकिन दुख उन्हें इस बात का था कि रामचरण बाबू उन के बनाए पकौड़ों की कभी तारीफ नहीं करते थे. पकौड़े खा कर व डकार ले कर जब वे टेबल से उठने लगते तब पत्नी द्वारा बड़े प्यार से यह पूछने पर कि कैसे बने हैं? उन का जवाब यही होता कि हां ठीक हैं, पर इन से अच्छे तो मैं भी बना सकता हूं.

मिसेज रामचरण यह सुन कर जलभुन जातीं. वे प्लेटें उठाती जातीं और बड़बड़ाती जातीं. पर रामचरण बाबू पर पत्नी की बड़बड़ाहट का कोई असर नहीं होता था. वे टीवी का वौल्यूम और ज्यादा कर देते थे. रामेश्वर रामचरण बाबू के पड़ोसी एवं सहकर्मी थे. कभीकभी किसी रविवार को वे अपनी पत्नी के साथ रामचरण बाबू के यहां पकौड़े खाने पहुंच जाते थे. आज रविवार था. वे अपनी पत्नी के साथ उन के यहां उपस्थित थे. डाइनिंग टेबल पर पकौड़े रखे जा चुके थे.

‘‘भाभीजी, आप लाजवाब पकौड़े बनाती हैं,’’ यह कहते हुए रामेश्वर ने एक बड़ा पकौड़ा मुंह में रख लिया.

‘‘हां, भाभी आप के हाथ में बड़ा स्वाद है,’’ उन की पत्नी भी पकौड़ा खातेखाते बोलीं.

‘‘अरे इस में कौन सी बड़ी बात है, इन से अच्छे पकौड़े तो मैं बना सकता हूं,’’ रामचरण बाबू ने वही अपना रटारटाया वाक्य दोहराया.

‘‘तो ठीक है, अगले रविवार आप ही पकौड़े बना कर हम सब को खिलाएंगे,’’ उन की पत्नी तपाक से बोलीं.

‘‘हांहां ठीक है, इस में कौन सी बड़ी बात है,’’ रामचरण बड़ी शान से बोले. ‘‘अगर आप के बनाए पकौड़े मेरे बनाए पकौड़ों से ज्यादा अच्छे हुए तो मैं फिर कभी आप की बात का बुरा नहीं मानूंगी और यदि आप हार गए तो फिर हमेशा मेरे बनाए पकौड़ों की तारीफ करनी पड़ेगी,’’ मिसेज रामचरण सवालिया नजरों से रामचरण बाबू की ओर देख कर बोलीं.

‘‘अरे रामचरणजी, हां बोलो भई इज्जत का सवाल है,’’ रामेश्वर ने उन्हें उकसाया.

‘‘ठीक है ठीक है,’’ रामचरण थोड़ा अचकचा कर बोले. शेखी के चक्कर में वे यों फंस जाएंगे उन्हें इस की उम्मीद नहीं थी. खैर मरता क्या न करता. परिवार और दोस्त के सामने नाक नीची न हो जाए, इसलिए उन्होंने पत्नी की चुनौती स्वीकार कर ली.

‘‘ठीक है भाई साहब, अगले रविवार सुबह 10 बजे आ जाइएगा, इन के हाथ के पकौड़े खाने,’’ उन की पत्नी ने मिस्टर और मिसेज रामेश्वर को न्योता दे डाला. सोमवार से शनिवार तक के दिन औफिस के कामों में निकल गए शनिवार की रात में मिसेज रामचरण ने पति को याद दिलाया, ‘‘कल रविवार है, याद है न?’’

‘‘शनिवार के बाद रविवार ही आता है, इस में याद रखने वाली क्या बात है?’’ रामचरण थोड़ा चिढ़ कर बोले.

‘‘कल आप को पकौड़े बनाने हैं. याद है कि भूल गए?’’

‘‘क्या मुझे…?’’ रामचरण तो वाकई भूल गए थे.

‘‘हां आप को. सुबह थोड़ा जल्दी उठ जाना. पुदीने की चटनी तो मैं ने बना दी है, बाकी मैं आप की कोई मदद नहीं करूंगी.’’ रामचरण बाबू की तो जैसे नींद ही उड़ गई. वे यही सोचते रहे कि मैं ने क्या मुसीबत मोल ली. थोड़ी सी तारीफ अगर मैं भी कर देता तो यह नौबत तो न आती. रविवार की सुबह 8 बजे थे. रामचरण खर्राटे मार कर सो रहे थे.

‘‘अजी उठिए, 8 बज गए हैं. पकौड़े नहीं बनाने हैं क्या? 10 बजे तो आप के दोस्त आ जाएंगे,’’ उन की मिसेज ने उन से जोर से यह कह कर उन्हें जगाया. मन मसोसते हुए वे जाग गए. 9 बजे उन्होंने रसोई में प्रवेश किया.

‘‘सारा सामान टेबल पर रखा है,’’ कह कर उन की पत्नी रसोई से बाहर निकल गईं.

‘‘हांहां ठीक है, तुम्हारी कोई जरूरत नहीं मैं सब कर लूंगा,’’ कहते हुए रामचरण बाबू ने चोर नजरों से पत्नी की ओर देखा कि शायद वे यह कह दें, रहने दो, मैं बना दूंगी. पर अफसोस वे बाहर जा चुकी थीं. ‘जब साथ देने की बारी आई तो चली गईं. वैसे तो कहती हैं 7 जन्मों तक साथ निभाऊंगी,’ रामचरण भुनभुनाते हुए बोले. फिर ‘चल बेटा हो जा शुरू’ मन में कहा और गैस जला कर उस पर कड़ाही चढ़ा दी. उन्होंने कई बार पत्नी को पकौड़े बनाते देखा था. उसे याद करते हुए कड़ाही में थोड़ा तेल डाला और आंच तेज कर दी. पकौड़ी बनाने का सारा सामान टेबल पर मौजूद था. उन्होंने अंदाज से बेसन एक कटोरे में निकाला. उस में ध्यान से नमक, मिर्च, प्याज, आलू, अजवाइन सब डाला फिर पानी मिलाने लगे. पानी जरा ज्यादा पड़ गया तो बेसन का घोल पतला हो गया. उन्होनें फिर थोड़ा बेसन डाला. फिर घोल ले कर वे गैस के पास पहुंचे. आंच तेज होने से तेल बहुत गरमगरम हो गया था. जैसे ही उन्होंने कड़ाही में पकौड़े के लिए बेसन डाला, छन्न से तेल उछल कर उन के हाथ पर आ गिरा.

‘‘आह,’’ वे जोर से चिल्लाए.

‘‘क्या हुआ?’’ उन की पत्नी बाहर से ही चिल्लाईं और बोलीं, ‘‘गैस जरा कम कर देना वरना हाथ जल जाएंगे.’’

‘‘हाथ तो जल गया, ये बात पहले नहीं बता सकती थीं?’’ वे धीरे से बोले. फिर आंच धीमी की और 1-1 कर पकौड़े का घोल कड़ाही में डालने लगे. गरम तेल गिरने से उन की उंगलियां बुरी तरह जल रही थीं. वे सिंक के पास जा कर पानी के नीचे हाथ रख कर खड़े हो गए तो थोड़ा आराम मिला. इतने में ही उन का मोबाइल बजने लगा. देखा तो रामेश्वर का फोन था. उन्होंने फोन उठाया तो रामेश्वर अपने आने की बात कह कर इधरउधर की बातें करने लगे.

‘‘अजी क्या कर रहे हो, बाहर तक पकौड़े जलने की बास आ रही है,’’ उन की मिसेज रसोई में घुसते हुए बोलीं. रामचरण बाबू ने तुरंत फोन बंद कर दिया. वे तो रामेश्वर से बातचीत में इतने मशगूल हो गए थे कि भूल ही गए थे कि वे तो रसोई में पकौड़े बना रहे थे. दौड़ कर उन की मिसेज ने गैस बंद की. रामचरण भी उन की ओर लपके, पर तब तक तो सारे पकौड़े जल कर काले हो चुके थे. पत्नी ने त्योरियां चढ़ा कर उन की ओर देखा तो वे हकलाते हुए बोले, ‘‘अरे वह रामेश्वर का फोन आ गया था.’’

तभी ‘‘मम्मी, रामेश्वर अंकल और आंटी आ गए हैं,’’ बेटी ने रसोई में आ कर बताया.

‘‘अरे रामचरणजी, पकौड़े तैयार हैं न?’’ कहते हुए रामेश्वर सीधे रसोई में आ धमके. वहां जले हुए पकौड़े देख कर सारा माजरा उन की समझ में आ गया. वे जोरजोर से हंसने लगे और बोले, ‘‘अरे भई, भाभीजी की तारीफ कर देते तो यह दिन तो न देखना पड़ता?’’

‘‘जाइए बाहर जा कर बैठिए. मैं अभी दूसरे पकौड़े बना कर लाती हूं. बेटा, पापा की उंगलियों पर क्रीम लगा देना,’’ मिसेज रामचरण ने कहा. उस के आधे घंटे बाद सब लोग उन के हाथ के बने पकौड़े खा रहे थे. साथ में चाय का आनंद भी ले रहे थे.

‘‘क्यों जी, कैसे बने हैं पकौड़े?’’ उन्होंने जब रामचरण बाबू से पूछा तो, ‘‘अरे, तुम्हारे हाथ में तो जादू है. लाजवाब पकौड़े बनाती हो तुम तो,’’ कहते हुए उन्होंने एक बड़ा पकौड़ा मुंह में रख लिया. सभी ठहाका मार कर हंस दिए.

मोह के धागे: क्यों पति का घर छोड़ने पर मजबूर हो गई वृंदा

दरवाजे की घंटी बजी तो वृंदा ने सोचा कौन होगा इस वक्त? घड़ी में 8 बज रहे थे. पैरों में जल्दी से चप्पलें फंसा कर चलतेचलते पहनने की कोशिश करते हुए दरवाजा खोला तो सामने मानव खड़ा था. ‘‘ओह, तुम?’’ धीरे से कह कर रास्ता छोड़ दिया.

अचानक कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया था. टेबल पर रखे गिलास में पानी भरते हुए पूछा, ‘‘कैसे आना हुआ?’’ ‘‘वह… मां का देहांत हो गया… आज… मैं ने सोचा… शायद… तुम घर आना चाहो.’’

वृंदा के हाथ थमे से रह गए, ‘‘ओह, आई एम सौरी,’’ कह कर पलकें झुका लीं. आंखों में आंसू भर आए थे. फिर से एक लंबी चुप्पी पसर गई थी. ‘‘तो… कल मैं… इंतजार करूंगा,’’ कह कर मानव उठा और दरवाजे तक पहुंच कर फिर मुड़ा, ‘‘आई विल वेट फौर यू.’’

वृंदा ने हामी में सिर हिलाते हुए नजरें झुका लीं. मानव के सीढि़यां उतरने की आवाज धीरेधीरे दूर हो गई तो वृंदा ने दरवाजा बंद कर लिया और आ कर सोफे पर ही लेट गई. उस की आंखें अब भी नम थीं. 9 वर्ष बीत गए… वृंदा ने गहरी सांस ली… खाने का वक्त हो गया, मगर भूख न जानें कहां चली गई थी. अपार्टमैंट की बत्तियां बुझा धीमी रोशनी में बालकनी में आ खड़ी हुई. तेज रफ्तार से दौड़ती गाडि़यां मानो एकदूसरे का पीछा कर रही हों.

वृंदा का मन बोझिल सा हो गया था. कपड़े बदले, पानी पीया और बिस्तर में लेट गई. आंखें बंद कीं तो आवाजें कानों में गूंजने लगीं… ‘‘वृंदा, मां को खाना दे दो.’’

‘‘हां, बस बन गया है.’’ मानव थाली निकाल मां का खाना ले कर उन के कमरे की तरफ चल दिया.

‘‘सुनो, मैं दे रही हूं.’’ ‘‘रहने दो,’’ कह कर, मानव चला गया.

‘‘वृंदा, देखो मां क्यों खांस रही हैं.’’ ‘‘अरे, ऐसे ही आ गई होगी.’’

मानव ने दवा निकाली और मां के कमरे में चला गया. वृंदा सुबह भागभाग कर काम निबटा रही थी. मानव के औफिस का वक्त हो रहा था.

‘‘वृंदा, मेरा नाश्ता? उफ, ये सब तुम बाद में भी कर सकती हो,’’ मुंह बना कर मुड़ गया. मां के कपड़े धोना, प्रैस करना, उन का खाना, नाश्ता, दूध, फ्रूट काटना, जूस देना और भी कई छोटेछोटे काम करते वृंदा थक जाती.

शाम को मानव घर लौटा, तुम मां का खयाल नहीं रखतीं… बूढ़ी हैं वे… सब कामवाली पर छोड़ रखा है.’’

सुन कर वृंदा अवाक रह गई. गुस्सा आने लगा था उसे. मानव और उस के बीच जो मीठा सा प्रेम था वह मर सा गया था. क्या यह वही आदमी है जो जरा सा रूठते ही मनाने लगता था. मेरी छोटीछोटी बातों का भी ध्यान रखता था. अब मां के सिवा उसे कुछ नजर ही नहीं आता. मां पर भी गुस्सा आने लगा था कि इतना करने के बावजूद कभी कोई आशीर्वाद या तारीफ का शब्द उन के मुंह से न निकलता. फिर भी मानव पर प्यार आ जाता बारबार. शायद वृंदा का प्रेम मोह में बदल गया था. खुद पर गुस्सा आ रहा था. चाह कर भी मानव को समझा नहीं पा रही थी कि वह भी मां की परवाह करती है, प्यार करती है, देखभाल करती है… जाने कैसा चक्र सा बन गया था. मानव मां की ओर झुकता जाता. वृंदा को गुस्सा आता तो कुछ भी बोल देती. बाद में अफसोस होता. मगर मानव उन शब्दों को ही सही मान कर मां के लिए और परेशान रहता.

वृंदा को लगता मानव कहीं दूर चला गया है. अजनबी सा बन गया था. वृंदा उठ कर बिस्तर में बैठ गई. एसी चलने के बावजूद पसीना आ रहा था. पानी पीया और फिर लेट गई. रोज झगड़ा होने लगा. वृंदा इंसिक्योर होती गई. धीरेधीरे डिप्रैशन में जाने लगी. मानव बेखबर रहा. मां भी मूकदर्शक बनी रही. तनाव सा रहने लगा घर में.

एक दिन वृंदा ने मां को मानव से कुछ कहते सुना. वृंदा सामने आ गई, ‘‘मां… मेरे ही घर में मेरे खिलाफ बातें?’’

मानव बोला, ‘‘मां हैं मेरी इज्जत करो… बूढ़ी हैं,’’ वृंदा बूढ़ी हैं… बूढ़ी हैं सुनसुन कर तंग आ चुकी थी. बोली, ‘‘जानती हूं मैं,’’ चीखने लगी थी वह, ‘‘मैं किस के लिए हूं… अगर मैं ही प्रौब्लम हूं तो मैं ही चली जाती हूं.’’

‘‘जाना है तो जाओ… निकलो,’’ मानव ने कहा. वृंदा ने घर छोड़ दिया. मानव ने कोई खबर न ली. वृंदा ने भी गिरतेपड़ते राह खोज ली. आंसू भर आए थे. जख्म फिर हरे हो गए थे. वृंदा फफकफफक कर रो पड़ी थी.

सुबह मानव के घर में मां का क्रियाकर्म चलता रहा. मानव सफेद कुरतापाजामा पहने नजरों के सामने से गुजरता रहा. कितना जानापहचाना सा था सबकुछ. वृंदा भी हाथ बंटाती रही. 15 दिन बीत गए. मानव एक बार फिर उस के दरवाजे पर खड़ा था, ‘‘वृंदा… घर लौट आओ… अब तो मां नहीं रही.’’

वृंदा ने मानव की ओर देखा, ‘‘मानव, तुम आज तक समझ ही नहीं पाए… इट वाज नैवर अबाउट योर मदर… मैं तुम से उम्मीद करती थी कि तुम मेरी भावनाओं को समझोगे… जिस के लिए मैं अपना सब कुछ छोड़ आई थी… कितनी आसानी से उस घर से निकलने को कह दिया… मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी. तुम्हारा प्यार पाना चाहती थी… मां के सामने तुम मुझे देख ही नहीं पाए… मैं ने खुद को तुम्हारे प्रेम में खो दिया था. अच्छा किया जो तुम ने मुझे बेसहारा छोड़ दिया. मैं ने अपने पैरों पर खड़ा होना सीख लिया. अपना आत्मविश्वास पा लिया. अब जो पाया है उसे फिर नहीं खोना चाहती. अच्छा होगा तुम फिर यहां न आओ.’’ मानव धीरे से उठा और बोझिल कदमों से चलता हुआ दरवाजे से निकल गया. वृंदा ने दरवाजा बंद किया और बंद हो गईं वे आवाजें जो उस का पीछा करती रहीं… वे मोह के धागे जो उसे बांधे हुए थे और कमजोर बना रहे थे आज तोड़ दिए थे और एक नए अध्याय की शुरुआत की थी.

Mother’s Day Special: वह मेरे जैसी नहीं है

मैं ने तो यही सुना था कि बेटियां मां की तरह होती हैं या ‘जैसी मां वैसी बेटी’ लेकिन जब स्नेहा को देखती हूं तो इस बात पर मेरे मन में कुछ संशय सा आ जाता है. इस बात पर मेरा ध्यान तब गया जब वह 3 साल की थी. उसी समय अनुराग का जन्म हुआ था. मैं ने एक दिन स्नेहा से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारा बेड अलग तैयार कर दूं, तुम अलग बेड पर सो पाओगी?’’ स्नेहा तुरंत चहकी थी, ‘‘हां, मम्मी बड़ा मजा आएगा. मैं अपने बेड पर अकेली सोऊंगी.’’

मुझे थोड़ा अजीब लगा कि जरा भी नहीं डरी, न ही उसे हमारे साथ न सोने का कोई दुख हुआ. विजय ने कहा भी, ‘‘अरे, वाह, हमारी बेटी तो बड़ी बहादुर है,’’ लेकिन मैं चुपचाप उस का मुंह ही देखती रही और स्नेहा तो फिर शाम से ही अपने बेड पर अपना तकिया और चादर रख कर सोने के लिए तैयार रहती.

स्नेहा का जब स्कूल में पहली बार एडमिशन हुआ तो मैं तो मानसिक रूप से तैयार थी कि वह पहले दिन तो बहुत रोएगी और सुबहसुबह नन्हे अनुराग के साथ उसे भी संभालना होगा लेकिन स्नेहा तो आराम से हम सब को किस कर के बायबाय कहती हुई रिकशे में बैठ गई. बनारस में स्कूल थोड़ी ही दूरी पर था. विजय के मित्र का बेटा राहुल भी उस के साथ रिकशे में था. राहुल का भी पहला दिन था. मैं ने विजय से कहा, ‘‘पीछेपीछे स्कूटर पर चले जाओ, रास्ते में रोएगी तो उसे स्कूटर पर बिठा लेना.’’ विजय ने ऐसा ही किया लेकिन घर आ कर जोरजोर से हंसते हुए बताया, ‘‘बहुत बढि़या सीन था, स्नेहा इधरउधर देखती हुई खुश थी और राहुल पूरे रास्ते जोरजोर से रोता हुआ गया है, स्नेहा तो आराम से रिकशा पकड़ कर बैठी थी.’’

मैं चुपचाप विजय की बात सुन रही थी, विजय थोड़ा रुक कर बोले, ‘‘प्रीति, तुम्हारी मम्मी बताती हैं कि तुम कई दिन तक स्कूल रोरो कर जाया करती थीं. भई, तुम्हारी बेटी तो बिलकुल तुम पर नहीं गई.’’ मैं पहले थोड़ी शर्मिंदा सी हुई और फिर हंस दी.

स्नेहा थोड़ी बड़ी हुई तो उस की आदतें और स्वभाव देख कर मेरा कुढ़ना शुरू हो गया. स्नेहा किसी बात पर जवाब देती तो मैं बुरी तरह चिढ़ जाती और कहती, ‘‘मैं ने तो कभी बड़ों को जवाब नहीं दिया.’’ स्नेहा हंस कर कहती, ‘‘मम्मी, क्या अपने मन की बात कहना उलटा जवाब देना है?’’

अगर कोई मुझ से पूछे कि हम दोनों में क्या समानताएं हैं तो मुझे काफी सोचना पड़ेगा. मुझे घर में हर चीज साफ- सुथरी चाहिए, मुझे हर काम समय से करने की आदत है. बहुत ही व्यवस्थित जीवन है मेरा और स्नेहा के ढंग देख कर मैं अब हैरान भी होने लगी थी और परेशान भी. अजीब लापरवाह और मस्तमौला सा स्वभाव हो रहा था उस का. स्नेहा ने 10वीं कक्षा 95 प्रतिशत अंक ला कर पास की तो हमारी खुशियों का ठिकाना नहीं था. मैं ने परिचितों को पार्टी देने की सोची तो स्नेहा बोली, ‘‘नहीं मम्मी, यह दिखावा करने की जरूरत नहीं है.’’

मैं ने कहा, ‘‘यह दिखावा नहीं, खुशी की बात है,’’ तो कहने लगी, ‘‘आजकल 95 प्रतिशत अंक कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, मैं ने कोई टौप नहीं किया है.’’ बस, उस ने कोई पार्टी नहीं करने दी, हां, मेरे जोर देने पर कुछ परिचितों के यहां मिठाई जरूर दे आई. अब तक हम मुंबई में शिफ्ट हो चुके थे. स्नेहा जब 5वीं कक्षा में थी, तब विजय का मुंबई ट्रांसफर हो गया था और अब हम काफी सालों से मुंबई में हैं.

10वीं की परीक्षाओं के तुरंत बाद स्नेहा के साथ पढ़ने वाली एक लड़की की अचानक आई बीमारी में मृत्यु हो गई. मेरा भी दिल दहल गया. मैं ने सोचा, अकेले इस का वहां जाना ठीक नहीं होगा, कहीं रोरो कर हालत न खराब कर ले. मैं ने कहा, ‘‘बेटी, मैं भी तुम्हारे साथ उस के घर चलती हूं,’’ अनुराग को स्कूल भेज कर हम लोग वहां गए. पूरी क्लास वहां थी, टीचर्स और कुछ बच्चों के मातापिता भी थे. मेरी नजरें स्नेहा पर जमी थीं. स्नेहा वहां जा कर चुपचाप कोने में खड़ी अपने आंसू पोंछ रही थी, लेकिन मृत बच्ची का चेहरा देख कर मेरी रुलाई फूट पड़ी और मैं अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाई. मुझे स्वयं को संभालना मुश्किल हो गया. स्नेहा की दिवंगत सहेली कई बार घर आई थी, काफी समय उस ने हमारे घर पर भी बिताया था.

स्नेहा फौरन मेरा हाथ पकड़ कर मुझे धीरेधीरे वहां से बाहर ले आई. मेरे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. हम दोनों आटो से घर आए. कहां तो मैं उसे संभालने गई थी और कहां वह घर आ कर कभी मुझे ग्लूकोस पिला रही थी, कभी नीबूपानी. ऐसी ही है स्नेहा, मुझे कुछ हो जाए तो देखभाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ती और अगर मैं ठीक हूं तो कुछ करने को तैयार नहीं होगी. मैं कई बार उसे अपने साथ मार्निंग वाक पर चलने के लिए कहती हूं तो कहती है, ‘‘मम्मी, टहलने से अच्छा है आराम से लेट कर टीवी देखना,’’ मैं कहती रह जाती हूं लेकिन उस के कानों पर जूं नहीं रेंगती. कहां मैं प्रकृतिप्रेमी, समय मिलते ही सुबहशाम सैर करने वाली और स्नेहा, टीवी और नेट की शौकीन.

5वीं से 10वीं कक्षा तक साथ पढ़ने वाली उस की सब से प्रिय सहेली आरती के पिता का ट्रांसफर जब दिल्ली हो गया तो मैं भी काफी उदास हुई क्योंकि आरती की मम्मी मेरी भी काफी अच्छी सहेली बन चुकी थीं. अब तक मुझे यही तसल्ली रही थी कि स्नेहा की एक अच्छी लड़की से दोस्ती है. आरती के जाने पर स्नेहा अकेली हो जाएगी, यह सोच कर मुझे काफी बुरा लग रहा था. आरती के जाने के समय स्नेहा ने उसे कई उपहार दिए और जब वह उसे छोड़ कर आई तो मैं उस का मुंह देखती रही. उस ने स्वीकार तो किया कि वह बहुत उदास हुई है, उसे रोना भी आया था, यह उस की आंखों का फैला काजल बता रहा था. लेकिन जिस तरह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख कर उस ने मुझ से बात की उस की मैं ने दिल ही दिल में प्रशंसा की. स्नेहा बोली, ‘‘अब तो फोन पर या औनलाइन बात होगी. चलो, कोई बात नहीं, चलता है.’’

ऐसा नहीं है कि वह कठोर दिल की है या उसे किसी से आंतरिक लगाव नहीं है. मैं जानती हूं कि वह बहुत प्यार करने वाली, दूसरों का बहुत ध्यान रखने वाली लड़की है. बस, उसे अपनी भावनाओं पर कमाल का नियंत्रण है और मैं बहुत ही भावुक हूं, दिन में कई बार कभी भी अपने दिवंगत पिता को या अपने किसी प्रियजन को याद कर के मेरी आंखें भरती रहती हैं. जैसेजैसे मैं उसे समझ रही हूं, मुझे उस पर गुस्सा कम आने लगा है. अब मैं इस बात पर कलपती नहीं हूं कि स्नेहा मेरी तरह नहीं है. उस का एक स्वतंत्र, आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्तित्व है. डर नाम की चीज उस के शब्दकोश में नहीं है. अब वह बी.काम प्रथम वर्ष में है, साथ ही सी.पी.टी. पास कर के सी.ए. की तैयारी में जुट चुकी है. हमें मुंबई आए 9 साल हो चुके हैं. इन 9 सालों में 2-3 बार लोकल टे्रन में सफर किया है. लोकल टे्रन की भीड़ से मुझे घबराहट होती है. हाउसवाइफ हूं, जरूरत भी नहीं पड़ती और न टे्रन के धक्कों की हिम्मत है न शौक. मेरी एक सहेली तो अकसर लोकल टे्रन में शौकिया घूमने जाती है और मैं हमेशा यह सोचती रही हूं कि कैसे मेरे बच्चे इस भीड़ का हिस्सा बनेंगे, कैसे कालिज जाएंगे, आएंगे जबकि विजय हमेशा यही कहते हैं, ‘‘देखना, वे आज के बच्चे हैं, सब कर लेंगे.’’ और वही हुआ जब स्नेहा ने मुलुंड में बी.काम के लिए दाखिला लिया तो मैं बहुत परेशान थी कि वह कैसे जाएगी, लेकिन मैं हैरान रह गई. मुलुंड स्टेशन पर उतरते ही उस ने मुझे फोन किया, ‘‘मम्मी, मैं बिलकुल ठीक हूं, आप चिंता मत करना. भीड़ तो थी, गरमी भी बहुत लगी, एकदम लगा उलटी हो जाएगी लेकिन अब सब ठीक है, चलता है, मम्मी.’’

मैं उस के इस ‘चलता है’ वाले एटीट्यूड से कभीकभी चिढ़ जाती थी लेकिन मुझे उस पर उस दिन बहुत प्यार आया. मैं छुट्टियों में उसे घर के काम सिखा देती हूं. जबरदस्ती, कुकिंग में रुचि लेती है. अब सबकुछ बनाना आ गया है. एक दिन तेज बुखार के कारण मेरी तबीयत बहुत खराब थी. अनुराग खेलने गया हुआ था, विजय टूर पर थे. स्नेहा तुरंत अनुराग को घर बुला कर लाई, उसे मेरे पास बिठाया, मेरे डाक्टर के पास जा कर रात को 9 बजे दवा लाई और मुझे खिला- पिला कर सुला दिया. मुझे बुखार में कोई होश नहीं था. अगले दिन कुछ ठीक होने पर मैं ने उसे सीने से लगा कर बहुत प्यार किया. मुझे याद आ गया जब मैं अविवाहित थी, घर पर अकेली थी और मां की तबीयत खराब थी. मेरे हाथपांव फूल गए थे और मैं इतना रोई थी कि सब इकट्ठे हो गए थे और मुझे संभाल रहे थे. पिताजी थे नहीं, बस हम मांबेटी ही थे. आज स्नेहा ने जिस तरह सब संभाला, अच्छा लगा, वह मेरी तरह घबराई नहीं.

अब वह ड्राइविंग सीख चुकी है. बनारस में मैं ने भी सीखी थी लेकिन मुंबई की सड़कों पर स्टेयरिंग संभालने की मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई और अब मैं भूल भी चुकी हूं, लेकिन जब स्नेहा मुझे बिठा कर गाड़ी चलाती है, मैं दिल ही दिल में उस की नजर उतारती हूं, उसे चोरीचोरी देख कर ढेरों आशीर्वाद देती रहती हूं और यह सोचसोच कर खुश रहने लगी हूं, अच्छा है वह मेरी तरह नहीं है. वह तो आज की लड़की है, बेहद आत्मविश्वास से भरी हुई. हर स्थिति का सामना करने को तैयार. कितनी समझदार है आज की लड़की अपने फैसले लेने में सक्षम, अपने हकों के बारे में सचेत, सोच कर अच्छा लगता है.

दूध की धुली

पृथ्वी सड़क के किनारे चुपचाप चल रहा है. संगीता हरे रंग का सूट पहने हुए है, उस का चेहरा पीला पड़ गया है. हाथों में जेवर की पोटली और किताबों का बैग है. संगीता चलतचलते सरसरी निगाह से पृथ्वी को देख रही है. जब बाजार समाप्त हो गया, तो दोनों पासपास आ गए और एक रिकशे में बैठ कर स्टेशन की ओर चल दिए. संगीता बोली, ‘‘मुझे बहुत डर लग रहा है.’’

पृथ्वी बोला, ‘‘जब मैं हूं तब किस बात का डर. एक बात बताओ, रास्ते में तुम्हें कोई जानने वाला तो नहीं मिला?’’ संगीता ने कहा, ‘‘नहीं, एक लड़की मिली थी. परंतु तब तुम मेरे से दूर थे. मातापिता परेशान होंगे, मैं उन से कह कर आई थी कि कालेज जा रही हूं. न जाने दिल क्यों इतना घबरा रहा है?’’

पृथ्वी ने आश्वासन दिया, ‘‘डरने की क्या बात है, ट्रेन में बैठ कर सीधे मुंबई पहुंच जाएंगे. एक दिन का तो सफर है. वहां बिलकुल अपरिचित लोग होंगे. बस, मैं और तुम. वहां जा कर एक होटल में ठहर जाएंगे. वैसे भी हमारे घर वालों को, हम पर किसी तरह का शक थोड़े ही हुआ होगा. संगीता घबराती हुई बोली, ‘‘मुझे घर पर न पा कर मम्मीपापा कितने परेशान होंगे, बहुत डर लग रहा है. पता नहीं क्यों?’’

पृथ्वी हंसते हुए बोला, ‘‘सब से पहले तो तुम्हारे कालेज में पूछताछ होगी. बहरहाल, यह गहने कैसे ले कर आ पाई?’’ ‘‘मुझे जगह पता थी. रात को ही अलमारी खोल कर निकाल लिए थे. अलमारी का ताला बंद कर दिया है,’’ संगीता ने बताया.

रिकशा वाला सब सुन रहा था. उन्होंने स्टेशन के लिए 50 रुपए में रिकशा तय किया था. जब स्टेशन आया तो रिकशा वाला हेकड़ी से बोला, ‘‘मैं तो 500 रुपए लूंगा.’’ ‘‘500 रुपए,’’ दोनों एकसाथ बोले, ‘‘500 रुपए किस बात के?’’

‘‘चुपचाप 500 रुपए दे दो वरना अभी पुलिस को बुलाता हूं,’’ रिकशे वाले ने कहा. पृथ्वी ने चुपचाप जेब से 500 रुपए निकाल कर दे दिए. संगीता घबरा रही थी. जल्दीजल्दी पृथ्वी ने मुंबई के फर्स्टक्लास के 2 टिकट ले लिए. टिकट ले कर तेजी से दोनों ट्रेन के फर्स्टक्लास के डब्बे में जा कर बैठ गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

संगीता ने रोते हुए कहा, ‘‘अब तो मुझे और भी ज्यादा डर लग रहा है.’’ पृथ्वी ने समझाया, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. फियर इंस्टिंक्ट एक चीज है. लिखने वाले ने तो यह भी लिखा है कि… मगर… खैर छोड़ो… हां, तुम्हारी जरा सी घबराहट ने रिकशा वाले को 500 रुपए का फायदा करा दिया. यदि तुम रिकशे में यह बात न बोलती तो ऐसा कुछ भी न होता. मुझे कुछ नहीं कहना. मगर दुख है तो सिर्फ इस बात का कि मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी और रिकशे वाला मुझे लूट कर चला गया.’’

बाहर दरवाजे पर खटखट हुई, दोनों ने एकदूसरे को डरते हुए देखा. पृथ्वी बोला, ‘‘साले ने 500 रुपए ले कर भी पुलिस को खबर कर दी.’’ संगीता घबराहट के मारे कांप रही थी, वह बोली, ‘‘अब क्या होगा?’’

‘‘चुपचाप देखती रहो, मुझ पर विश्वास रखो. पीछे के दरवाजे से उतर कर किसी दूसरे डब्बे में बैठ जाते हैं,’’ कह कर पृथ्वी ने पिछला दरवाजा खोला और दोनों उतर कर चल दिए. परंतु दूसरे किसी डब्बे में नहीं बैठ पाए, क्योंकि किसी भी डब्बे का दरवाजा खुला हुआ नहीं था. दोनों चुपचाप प्लेटफौर्म पर चलने लगे. ‘‘अपना किताबों का यह बैग तो छोड़ दो,’’ पृथ्वी ने संगीता से कहा.

एक सिपाही घूमता हुआ उधर ही आ रहा था. संगीता ने जल्दी से अपना बैग एक मालगाड़ी के डब्बे में रख दिया. सिपाही इतने में पास आ कर पृथ्वी से बोला, ‘‘आप लोग कहां जाएंगे?’’ पृथ्वी बोला, ‘‘हम तो ऐसे ही घूमने चले आए हैं. अब जा रहे हैं.’’

‘‘मगर आप की गाड़ी तो छूटने वाली है. आप ने फर्स्टक्लास का टिकट बुक कराया था,’’ सिपाही अपनी बात पर जोर देते हुए बोला. ‘‘ऐ मिस्टर, मैं ने कहीं का भी टिकट बुक कराया हो आप को इस से क्या लेनादेना. बोलो, क्या कर लोगे तुम? कौन होते हो यह सब पूछने वाले?’’

‘‘अरे भाई, गुस्सा क्यों होते हो? मैं तो सेवक हूं आप का. जब 50 रुपए की जगह 500 रुपए रिकशे वाले को दे सकते हो, तो हुजूर, थोड़ा सा ईनाम हमें भी मिल जाए.’’ पृथ्वी पूरी बात समझ गया. उसे 500 रुपए का नोट देते हुए बोला, ‘‘हांहां, तुम भी लो.’’ सिपाही रुपए ले कर चला गया. संगीता बोली, ‘‘हमारे मन में चोर है न, इसलिए हम हर बात से डरते हैं. चलो, फिर वापस चलते हैं.’’

‘‘बेकार में डरडर कर इधरउधर भटकते रहें, क्या फायदा,’’ पृथ्वी ने खीझते हुए कहा, ‘‘बेकार ही कंपार्टमैंट से आए. चलो, वापस वहीं चलते हैं.’’ दोनों तेजी से दौड़े परंतु कंपार्टमैंट में घुसने से पहले ही एक और पुलिस वाला आया और बोला, ‘‘अरे, झगड़ा बढ़ाने से क्या फायदा, हम सब को 1000-1000 रुपए दो और मौज करो,’’ और हाहा कर हंसने लगा.

संगीता तो डर के मारे बुरी तरह से कांप रही थी. पृथ्वी बोला, ‘‘मैं कोई ईनाम वगैरा नहीं दूंगा. मैं ने कोई दानखाता खोल रखा है क्या? मैं आप लोगों की फितरत समझ रहा हूं.’’ ‘‘देखिए साहब, आप पढ़ेलिखे मालूम पड़ते हैं. आओ, पहले डब्बे में बैठ जाएं. यहां भीड़ इकट्ठी हो जाएगी और आप की बदनामी होगी. जब दोनों कंपार्टमैंट में चढ़ गए तो पुलिस वाला भी पीछेपीछे पहुंच गया और बोला, ‘‘थोड़ी देर के लिए आप थाने चलिए.’’

‘‘मैं किसी थानेवाने नहीं जाऊंगा. मेरी गाड़ी छूट जाएगी,’’ गुस्से से पृथ्वी ने कहा. ‘‘देखिए भाईसाहब, अब आप इस गाड़ी से तो नहीं जा सकते. मैं ने तो पहले ही आप से कहा था कि आप हमारे साहब की सेवा में 1000 रुपए दे दीजिए.’’ अब की बार साहब भी उसी कंपार्टमैंट में आ गए, बोले, ‘‘क्यों बे शकीरा के बच्चे, जाओ, हथकड़ी ले कर आओ. यह लड़का इस लड़की को भगा कर लिए जा रहा है. इस को गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दो.’’

पृथ्वी ने 2-2 हजार रुपए के 5 नोट निकाल कर उन के हाथ में थमा दिए. बड़े साहब उन नोटों को जेब में रखते हुए बोले, ‘‘अच्छा सर, चलिए, बिना हथकड़ी लगाए ही आप को ले कर चलते हैं.’’

अब पृथ्वी बोला, ‘‘अब मैं थाने क्यों जाऊं. मैं ने 10,000 रुपए किस बात के दिए हैं?’’ ‘‘देखो लड़के, यह 10,000 रुपए मैं ने सिर्फ इस बात के लिए हैं कि तुम्हें थाने हथकड़ी डाल कर न ले कर जाऊं.’’

संगीता बहुत देर से साहस जुटा रही थी, बोली, ‘‘देखिए, मैं अपनी मरजी से जा रही हूं. आप बेकार में हमें परेशान मत कीजिए.’’ ‘‘हांहां मुन्नी, मैं भी तो यही कह रहा हूं, थाने चल कर थोड़ी देर बैठिएगा. वहीं आप के मम्मीपापा को बुलाया जाएगा. तब जैसा होगा, कर दिया जाएगा और उस सूरत में आप इसी ट्रेन से शाम को जा सकते.’’ तभी पहला सिपाही भी आ गया और बैग देते हुए बोला, ‘‘संगीताजी, आप का बैग. आप ने मालगाड़ी में छोड़ दिया था.’’

संगीता ने बैग हाथ में ले लिया. उस के बाद दोनों चुपचाप नीचे प्लेटफौर्म पर उतर गए. पृथ्वी ने पुलिस अफसर से इजाजत मांगी कि वह संगीता से एकांत में कुछ बात कर ले. उस पर पुलिस वाले ने कहा, ‘‘हांहां, जरूर कर लीजिए.’’ और थोड़ी दूर जा कर खड़ा हो गया. आसपास काफी भीड़ इकट्ठी हो गई थी. पृथ्वी काफी परेशान था, बोला, ‘‘अब क्या होगा?’’

‘‘मुझे मेरे घर या कालेज भेज दीजिए,’’ संगीता ने रोते हुए कहा. ‘‘घर मैं भी जाना चाहता हूं, लेकिन ये कमीने आसानी से पीछा नहीं छोड़ रहे.’’

‘‘कोई ऐसी तरकीब निकालें, जिस से पिताजी को पता न चले,’’ संगीता ने पृथ्वी से घबराते हुए कहा. ‘‘कोशिश तो ऐसी ही करूंगा. मेरा विचार है कि जितना भी रुपया है, इन्हें दे दिया जाए और यहां से वापस चलते हैं. यहां अगर हमें किसी ने पहचान लिया तो मुसीबत हो जाएगी.’’ इस बीच, सिपाही बोला, ‘‘चलिए साहब, थाने.’’

‘‘इंस्पैक्टर साहब, हम से गलती हुई है. अब हम वापस जा रहे हैं,’’ संगीता ने इंस्पैक्टर साहब को अपनी पोटली दे दी. पृथ्वी का साथ दम तोड़ चुका था. संगीता निर्जीव सी सब कार्य कर रही थी. इसी झगड़े में 11 बज गए. संगीता एक रिकशे पर बैठ कर कालेज चली गई. पृथ्वी दूसरे रिकशे पर बैठ कर अपने घर चला गया. शकीरा ने इंस्पैक्टर से पूछा, ‘‘अगर इन लोगों ने अपने मांबाप को बता दिया तो क्या होगा?’’

‘‘तू गधा है. क्या वे अपने मांबाप को यह बताएंगे कि हम भाग रहे थे. फिर मैं तो उन को जानता भी नहीं. हमें कोई कुछ क्यों बताएगा या देगा?’’ शाम को 4 बजे जब संगीता घर पहुंची तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. फिर भी वह हंस रही थी. कहने लगी, ‘‘मम्मी, आज तो कालेज में यह हुआ वह हुआ.’’ उस के बाद कमरे में अकेली जा कर लेट गई और सोचने लगी, ‘अब क्या होगा, कैसे होगा?’

संगीता को कड़वा लग रहा था. उस ने अधिक नहीं खाया. बस, एक ही सवाल उस के जेहन में घूम रहा था, ‘कैसे होगा?’

अलमारी की तरफ अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया था. कैसे होगा? शाम को उस की सहेली आ गई थी. उस ने बताया, ‘‘आज उस के कालेज में फिजिक्स के पीरियड में सब लड़कियां खिड़कियों पर चढ़ गईं और जब फिजिक्स की टीचर आईं, तो उन के कहने पर नीचे उतरीं.’’ संगीता ने कुछ नहीं सुना. बस, उस का दिल घबरा रहा था, ‘अब क्या होगा, कैसे होगा?’

रात को उसे नींद भी नहीं आई. पुलिस, भीड़, रेलवे स्टेशन, बैग, गहने, पोटली बराबर दिमाग में घूम रहे थे और एक ही सवाल बारबार दिमाग में हथियार के जैसे प्रहार कर रहा था, अब कैसे होगा?’ 2 बजे रात चुपके से संगीता उठी. उस ने छिपाई हुई चाबी को हाथ में ले कर अलमारी का दरवाजा खोल दिया. बचे हुए गहनों को तितरबितर कर दिया. एक हार पोटली में से जमीन पर डाल दिया. कपड़े आंगन में फैला दिए. दरवाजे की चटकनी खोल दी और फिर जा कर अपने बैड पर लेट गई. दिमाग में एक ही बात हथौड़े जैसे प्रहार कर रही थी कि अब क्या होगा?

सुबह होते ही अड़ोसपड़ोस में शोर मचा हुआ था कि रामप्रकाश के घर में चोरी हो गई. चोर अलमारी खोल कर कुछ लाख रुपए और गहने ले गए हैं. शायद किसी आवाज से डर गए थे. इसलिए सारे गहने ले कर नहीं गए. रामप्रकाश ने लोगों को बताया कि बड़े कमाल की बात है. उन चोरों ने बाहर का दरवाजा कैसे खोला? समझ में नहीं आ रहा है. मैं तो रात को सबकुछ देख कर सोता हूं और सब से बड़ी बात, वे सारे गहने ले कर नहीं गए. यों समझो कि भारी नुकसान होने से बच गए. चोरी की सूचना पुलिस को दी गई. वहां से एक इंस्पैक्टर और 2 सिपाही जांचपड़ताल के लिए आए. उन्होंने दरवाजे को गौर से देखा. वह अलमारी भी देखी. अलमारी की चाबी भी देखी. लेकिन संगीता को देखते ही पहचान गए. संगीता भी उस पुलिस औफिसर और सिपाही को पहचान गई. तब पुलिस वाले ने संगीता की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘यह काम तो किसी घर वाले का ही लगता है.’’

इस पर संगीता की आंखें, पुलिस वाले की आंखों से जा मिलीं. उन में याचना थी. पुलिस वाले ने घर के चारों और देखा और बोला, ‘‘कोई किराएदार ऊपर रहता है क्या?’’ ‘‘नहीं साहब,’’ राम प्रकाश ने कहा.

‘‘यह घर के आदमी का काम नहीं हो सकता. मेरा एक लड़का 8 साल का है. एक लड़की है, जो दूध की जैसी धुली हुई है. मैं हूं. मेरी पत्नी है. यह सच्ची बात है कि दरवाजा बाहर से ही खुला है. मगर कमाल है, साहब,’’ राम प्रकाश बोला. पुलिस वाले ने कहा, ‘‘चोरी का पता लगाने की पूरी कोशिश की जाएगी. मगर मेरी सलाह मानिए, आप अपना जेवरपैसा. अब अलमारी में न रख कर, बैंक में रखें. हो सकता है चोर दोबारा चोट करे.’’

पुलिस वाले ने वहीं बैठ कर रिपोर्ट तैयार की. वहां उपस्थित लोगों के हस्ताक्षर लिए. पुलिस वाले के साथ आए सिपाही ने जाते हुए सरकारी निगाह से संगीता की तरफ देखा और बोला, ‘दूध की धुली’ और लंबी सी डकार लेता हुआ दरवाजे से बाहर निकल गया.

Vegan Diet को हेल्दी बनाएंगे प्रोटीन से भरपूर ये 5 Food

क्या है वीगन डाइट

वीगन डाइट जिसे वीगानिज़्म भी कहा जाता है, एक ऐसी डाइट है, जिसमें मांस, अंडा, दूध, दही या पशु से बनने मिलने वाले उत्पादों को नहीं खाया जाता. बल्कि वीगन डाइट में सबसे अधिक पेड़पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों को खाया जाता है.  इस डाइट में कच्चे ऑर्गेनिक आहार का अधिक सेवन किया जाता है. साबुत फल, सब्जियां और अनाज इस डाइट की विशेषता हैं.  इसे शुद्ध शाकाहारी आहार या प्लांट बेस्ड डाइट भी कहा जाता है.

अब ऐसे में सवाल उठता है कि वीगन डाइट में मांस, अंडा, दूध, दही जैसे खाद्य पदार्थ न होने की वजह से प्रोटीन की कमी को कैसे पूरा किया जाए? इस संबंध में पल्लवबिहानी बोल्डफ़िट के फाउंडर ऐसे सुपरफूड्स के बारे में बताएंगे, जिनके सेवन से आप वीगन डाइट को फॉलो करते हुए प्रोटीन का भरपूर सेवन कर सकते हैं.

वीगन डाइट में प्रोटीन के स्रोत –

शाकाहारी लोगों में प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए बहुत से खाद्य उत्पाद हैं.  उच्च गुणवत्ता वाले शाकाहारी प्रोटीन स्रोतों की कमी नहीं है, लेकिन बता दें कि सबसे अधिक सोया से बने उत्पादों में प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है. बता दें कि टोफू, दालें, बीन्स, अनाज सभी में प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है.  जैसे-

  • दाल एक कप18 ग्राम प्रोटीन
  • काले राजमा एक कप15 ग्राम प्रोटीन
  • चना एक कप12 ग्राम प्रोटीन
  • 114ग्राम टोफू में 11 ग्राम प्रोटीन
  • क्विनोआ एक कप9 ग्राम प्रोटीन

इसके अतिरिक्त नट, नट बटर, कई प्रकार की फलियों और अनाज में भी प्रोटीन पाया जाता है. वीगन डाइट में प्रोटीन की कमी पूरी करने के लिए वेजीटेरियन प्रोटीन पाउडर या वेगन प्लांट प्रोटीन का भी स्मूदी में मिलाकर सेवन किया जा सकता है. इसमें कार्ब की मात्रा बहुत कम होती है, शुगर शून्य के बराबर और यह कीटो फ्रेंडली भी होता है.

वीगन डाइट के लिए प्रोटीन से भरपूर 5 सुपरफूड्स –  

आपने सुना होगा कि वीगन डाइट को फॉलो करने के दौरान प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ या मल्टी विटामिन्स से भरपूर डाइट लेना जरूरी होता है. आइए जानते हैं वीगन डाइट के लिए प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ कौन से हैं.

टोफू टोफू पनीर या चीज का वीगन स्वरूप है.  टोफू डेयरी उत्‍पादों के बेहतरीन विकल्‍प के रूप में इस्‍तेमाल होता है.  हालांकि इसका स्‍वाद पनीर से थोड़ा अलग होता है. प्रोटीन से भरपूर टोफू का इस्‍तेमाल कई व्‍यंजनों को बनाने में किया जा सकता है. वीगन डाइट में टोफू को शामिल करके आप प्रोटीन की कमी को आसानी से दूर कर सकते हैं. इसके अलावा टोफू में अमीनो एसिड के नौ सभी जरूरी तत्‍व शामिल होते हैं.  इसमें आयरन, कैल्शियम और कई मिनरल्स जैसे मैंगनीज और फास्फोरस होता है. टोफू मैग्नीशियम, कॉपर, जिंक और विटामिन बी1 से भी भरपूर होता है.  ये सभी मल्टीविटामिन शरीर को सुचारू रूप से चलाने में मदद करते हैं.

फ्लैक्सीड्स–  फ्लैक्सीड्स यानि अलसी के बीज.  फ्लैक्सीड्स प्रोटीन, फाइबर और ओमेगा -3 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं. फ्लैक्सीड्स को दिनभर में किसी भी वक्त स्नैक्स के रूप में या स्मूीदी में मिलाकर या डेजर्ट के रूप खा सकते हैं. ये न सिर्फ कुछ समय के लिए भूख को शांत करेगा बल्कि इससे शरीर को आवश्यक प्रोटीन भी प्राप्त होता है. 100 ग्राम फ्लैक्सीड्स में 18 ग्राम प्रोटीन शामिल होता है. इसके अलावा इसमें विटामिन बी1, विटामिन बी6, फोलेट, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस,पोटेशियम जैसे शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व शामिल होते हैं.

दाल हम सभी जानते हैं कि दालों में उच्‍च मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है. दाल चावल भारत में दोपहर के भोजन में बहुत मशहूर हैं. इसके सेवन से आप पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन का सेवन करते हैं. दालें कई प्रकार की हैं आप अपनी पसंद के मुताबिक किसी भी दाल का सेवन करके प्रोटीन की कमी को दूर कर सकते हैं.  इसके अलावा इनमें कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, आयरन, सेलेनियम और फोलेट होता है, जोकि शरीर को आवश्यक पोषण देने का काम करता है.

बीन्स  अगर आप वीगन डाइट को खास बनाने के लिए कुछ अलग सोर्स की तलाश कर रहे हैं तो बीन्स से बेहतर कुछ नहीं. राजमा, काले चने, छोले, इनमें से किसी को भी उबाल कर सलाद के तौर पर खाया जा सकता है. ये ना सिर्फ प्रोटीन से भरपूर होते हैं बल्कि ये एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो कि शरीर में फ्री रेडिकल्स के प्रभाव से लड़ते हैं , इसके अलावा इनमें फोलेट, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम,फाइबर जैसे आवश्यक तत्व भी होते हैं.

एडामे: एडामे एक प्रकार की फली है, जिसमें सोयाबीन पाया जाता है.  ये फली भी मटर के समान दिखती है और हरी सब्जियों के परिवार से संबंधित है. यह एशिया और जापान में बहुत लोकप्रिय है. एडामे को उबालकर इसमें और थोड़ा नमक डालकर और अपनी पसंद के कई तरह के मसालों को मिलाकर इसे खाया जाता है. एडामे में उच्च स्तर का प्रोटीन भी होता है जो शरीर के संपूर्ण विकास में मदद करता है. एडामे फोलेट, विटामिन-के और फाइबर से भी भरपूर होता है. कम कैलोरी होने के कारण ये न सिर्फ वजन घटाने, बल्कि कॉलेस्ट्रॉफल को नियंत्रि‍त करने और कैंसर से लड़ने में भी मददगार साबित होता है.

ऐसी स्थिति में जरूरी होते हैं सप्लीमेंट्स

आमतौर पर देखा गया है कि वीगन डाइट फॉलो करने वाले लोगों में विटामिन बी 12, विटामिनडी, आयोडीन, ओमेगा-3डीएचए और ईपीए, विटामिन के2, जिंक, सेलेनियम, मैगनीशियम की कमी हो जाती है.  ऐसे में लोगों को प्रोटीन और अन्य विटामिन्स से भरपूर खाद्य पदार्थ लेने की सलाह दी जाती है, लेकिन किन्हीं कारणों से जब खाद्य पदार्थों के माध्यम से विटामिन और मिनरल्स की कमी पूरी नहीं होती तो उन्हें वीगन एसेंशियल न्यूट्रिशन से भरपूर सप्लीमेंट्स लेने की सलाह दी जाती है.

औरत को पुरूष की जरुरत नहीं- टीवी एक्ट्रेस गौरी प्रधान

‘नूरजहां’,‘कुटुंब’,‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’,‘मेरी आषिकी तुमसे’ और ‘तू आषिकी’ जैसे सीरियलों की चर्चित अदाकारा गौरी प्रधान अपने 25 वर्ष के अभिनय कैरियर के बाद अब पहली बार फिल्म ‘‘ ए विंटर टेल एट शिमला’’ में अभिनय करते हुए नजर आने वाली हैं,जो कि मैच्योर प्रेम कहानी के साथ ही नारी अस्मिता,नारी के सपनों,पति की पितृसत्तात्मक सोच से लेकर नारी उत्थान की बात करती है.

आर्मी बैकग्राउंड में पली बढ़ी और 2000 में सीरियल ‘नूरजहां’ से अभिनय कैरियर की शुरूआत करने वाली गौरी प्रधान की दूसरे सीरियल ‘कुटुंब’ की शूटिंग के दौरान अभिनेता हितेन तेजवानी से मुलाकात हुई. और दोनो ने 2004 में शादी कर ली. यह गौरी प्रधान की पहली शादी थी,जबकि हितेन तेजवानी की यह दूसरी शादी थी. लेकिन गौरी को हितेन की यह बात पसंद आयी थी कि हितेन ने पहली मुलाकात में ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका अपनी पत्नी से ग्यारह माह बाद ही तलाक हो गया था.

बहरहाल,गौरी प्रधान व हितेन तेजवानी की शादी के 19 वर्ष हो चुके हैं. दोनों के जुड़वा बच्चे हैं. गौरी व हितेन दोनों के बीच बराबरी का संबंध है. मगर फिल्म ‘ए विंटर टेल एट शिमला’ में पति पत्नी के बीच बहुत अलग रिश्ता है.

प्रस्तुत है गौरी प्रधान से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश.

हर इंसान पर उसकी परवरिश का असर होता है. आपकी परवरिश आर्मी पृष्ठभूमि में हुई. तो फिर कला से नाता कैसे बना? –

मैं बचपन से ही बहुत ही ज्यादा कलात्मक व रचनात्मक रही हॅूं. मेरी रूचि पेंटिंग, ड्ाइंग, स्कैचिंग आदि में रही है. इसके अलावा मेरे माता पिता ने मुझे हमेषा छूट दी. मैने जो करना चाहा,उसमें कभी रोक टोक नहीं की. उनकी एक ही शर्त थी कि मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी है. इसलिए मैंने पढ़ाई पूरी करने के बाद ‘मिस इंडिया’ मंे हिस्सा लिया. उसके बाद मुंबई आकर में माॅडलिंग कर रही थी. माॅडलिंग से बोर होकर मैं पुनः पुणे वापस जाकर उच्च षिक्षा हासिल करना चाहती थी. उससे दो दिन पहले ही एक पार्टी में किसी ने मुझे देखा और उन्होने मुझसे कहा कि दूरदर्षन के लिए ‘नूरजहां’ नामक सीरियल बन रहा है.

निर्माता अब तक दो सौ लड़कियों का आॅडीशन ले चुके हैं,पर नूरजहां के लिए सही लड़की नही मिली. उस इंसान की सलाह पर मैने आॅडीशन दिया और मेरा चयन हो गया. यह दूरदर्षन और बीबीसी का कोलेब्रेशन था. इसे उर्दू और अंग्रेजी में बनाया गया था. इसके लिए हमें उर्दू भाषा की ट्ेनिंग भी दी गयी. हम हर सीन की षूटिंग पहले उर्दू में और फिर अंग्रेजी में करते थे. इस सीरियल में अभिनय करना बहुत अच्छा अनुभव था. इस तरह मेरे अभिनय कैरियर की षुरूआत हुई.

 

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आपके कैरियर के टर्निंग प्वाइंट्स क्या रहे?

पहला टर्निंग प्वाइंट तो सीरियल ‘‘नूरजहां’’ ही था,जिससे मेरे अभिनय कैरियर की षुरूआत हुई थी. उसके बाद जब मैने ‘बालाजी’ के लिए सीरियल ‘कुटुंब’ किया,तो यह भी बहुत बड़ा टर्निंग प्वाइंट्स था. इसके बाद टर्निंग प्वाइंट रहा-‘‘क्यांेकि सास भी कभी बहू थी’’,जो कि आठ वर्ष से भी अधिक लंबे समय तक चला था. उसके बाद तो कई सीरियल किए. लेकिन अब मेरे कैरियर में सबसे बड़ा और अहम टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘‘ए विंटर टेल एट षिमला’ है. यह मेरे कैरियर की पहली फिल्म है,जो कि 12 मई को सिनेमाघरों में पहुॅचने वाली है.

आपने 25 वर्ष के अभिनय कैरियर में हमेशा छोटे परदे से जुडी रहीं,तो अब फिल्म ए विंटर टेल एट षिमलाकरने की क्या खास वजह रही?

-सच तो यही है कि मुझे टीवी पर इतना काम मिल रहा था कि मेरे पास कुछ और सोचने का वक्त ही नहंी था. ऐसा नही है कि मुझे फिल्मों के आफर नही मिल रहे थे,मिल रहे थे,पर मेरेे पास वक्त नही था. 11 नवंबर 2009 को जब मै एक बेटे व एक बेटी की जुड़वा मां बनी,तो मैने चार वर्ष का ब्रेक लिया था. क्योंकि मुझे अपने बच्चों पर ध्यान देना था. 2019 तक टीवी में व्यस्त रही. फिर कोविड के कारण सभी को ब्रेक लेना पड़ा. उसी दौरान मेरे पास योगेश वर्मा जी अपनी फिल्म ‘‘ए विंटर टेल एट षिमला’’ का आफर लेकर आ गए. अमूमन हर फिल्म पुरूष प्रधान होती हैं. मगर यह फिल्म नारी प्रधान फिल्म है. पूरी फिल्म के केंद्र में नारी व उसकी सोच है.

जब मैने पटकथा व किरदार सुना,तो मुझे लगा कि यह फिल्म मेरे लिए ही लिखी गयी है. इसलिए मंैने इस फिल्म को करने का फैसला लिया. यह फिल्म वैदेही के बारे में है.

अपने किरदार को लेकर क्या कहना चाहेंगी?

-मैने इसमें वैदेही का किरदार निभाया है,जो कि डीआईजी यानी कि पुलिस अफसर की पत्नी है. उसकी अपनी बेटी है. कभी उसे चिंतन नामक युवक से प्यार हुआ था,पर कुछ कारणों से चिंतन के संग विवाह नहीं हो पाया था. वैदेही अपनी पारिवारिक जिंदगी में मस्त है. लेकिन बीस वर्षों बाद जब फिर से चिंतन की उसकी मुलाकात होती है,तो उसे अहसास होता है कि वास्तव में उसकी जिंदगी क्या बनकर रह गयी है. वह तो अपने पति के लिए महज ‘सेक्स गुलाम’ ही है. तो फिल्म की षुरूआत से अंत तक वैदेही की ही कहानी चलती है.

फिल्म में दो अलग अलग वैदेही हैं. एक युवा वैदेही है,जिसका किरदार एक अन्य लड़की ने निभाया है. यह फुल आफ लाइफ व फन लविंग है. मगर दूसरी वैदेही षादी के बाद की है,जिसे मैंने निभाया है. इस वैदेही को परिस्थितियों ने गढ़ा है. उसकी आदतें बदलती हैं, उसका व्यक्तित्व बदलता है. उसके पति की वजह से उसकी जिंदगी से ‘फन लिविंग’ जा चुका है. अब वह समझौतावादी और त्याग करने वाली नारी बन चुकी है. अब उसके लिए पति की खुशी ही उसकी खुशी बन चुकी है.

युवावस्था में वह बहुत रचनात्मक हुआ करती थी, जो कि अब उसकी जिंदगी से गायब हो चुकी है. अब उसे भी अहसास है कि उसका व्यक्तित्व बहुत बोरिंग हो गया है. पर जब फिर से चिंतन मिलता है,तो वैदेही को अहसास दिलाता है कि उसने क्या खो दिया है. तब वह कैसे अपने आपको पुनः बदलती है और जकड़न से खुद को छुड़ाती है.

हर लड़की शादी के बाद अपने परिवार को संभालने के लिए समझौते करते हुए खुद को बदलती है. ऐसा ही वैदेही के साथ हो रहा था या कोई अन्य वजह रही?

-वैदेही को अपनी बेटी की खतिर समझौते करने पड़ते हैं. उसका पति नामचीन इंसान है. डीआईजी है. लेकिन इंसान के तौर पर वह बेहतर इंसान नही है. वैदेही ने अपनी जिंदगी के जो सपने देखे थे,उससे उसके पति का दूर दूर तक कोई नाता नही है. इसलिए वह अपनी जिंदगी में बहुत मायूस हो गयी है. अब उसकी जिंदगी पति की सुविधाओं का ध्यान रखना,घर को संवारने,पेड़ पौधों की देखभाल करने में ही गुजरने लगी है. इसके अलावा अब उसकी जिंदगी में कुछ बचा नही है. यह सब वह सिर्फ अपनी बेटी के लिए कर रही है. वह चाहती है कि पति की रिप्युटेशन खराब न हो और बेटी को हर सुविधा व अच्छी षिक्षा मिल सके,यही अब उसका मकसद है.लेकिन चिंतन उसे अहसास दिलाता ैहै कि वह अपनी जिंदगी मंे क्या ‘मिस’ कर ही है,तब वह बदलती है.

 

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फिल्म के ट्रेलर में एक संवाद है जहां वैदेही अपने पति से कहती है कि उसने उसे सेक्स स्लेवबना रखा है. यह क्या है?

-इस बारे में सब कुछ बताना उचित नही है,फिल्म देखें तो समझ में आएगा.  सेक्स स्लेव वह अपने पति को कहती है. उसके पति के लिए वह रात में महज ‘सेक्स’ के लिए यानी कि ‘भोग्या’ है. कहने का अर्थ यह कि वैदेही का पति उसे ‘सेक्स स्लेव्स’ की ही तरह उपयोग करता है. उसके पति ने उसे एक ‘ट्ाफी वाइफ’ बनाकर रख दिया है. वह डीआईजी है,इसलिए अपने अफसरों के सामने या पार्टीयों में अपनी पत्नी को ट्राफी की तरह लेकर जाए,लोगों को दिखाए. इसके अलावा वैदेही की उसके पति की जिंदगी में कोई महत्व नही है. उसके पति ने उससे महज इसीलिए शादी की है और बेटी पैदा की है. यही उसका काम है.

तो फिल्म ‘‘ए विंटर टेल एट शिमला’’ में पितृसत्तात्मक सोच व नारी स्वतंत्रता की बात की गयी है?

-मेरी समझ से पितृसत्तात्मक सोच बहुत पुराना ख्याल हो गया. अब यह बात सभी की समझ में आ गयी है कि पुरूष जो काम कर सकता है, वह काम नारी नही कर सकती. अब तो औरतें हर क्षेत्र में बढ़चढ़कर हिस्सा ले रही हैं. महिलाएं एथलिट भी हैं,घर की जिम्मेदारी भी संभालती हैं. सेना में भी नौकरी करते हुए दुष्मनों के दांत खट्टे कर रही हैं. क्या आप वायुसेना की जांबाज सिपाही गुंजन सक्सेना की दिलेरी को किसी पुरूष से कम आंक सकते हैं? सिक्किम की पुलिस अफसर इक्षा केरूंग को कौन नही जानता. मेरी कॉम को कम आंक सकते हैं.

अब औरतें उद्योगपति हैं,राजनेता हैं. सब कुछ हैं. कुछ मौकों पर आप शारीरिक ताकत के मामले में भले ही कम आंक सकते हैं,पर इसकी मूल वजह यह है कि औरतें हमेशा भावुक होती हैं. आज की औरतें ज्यादा आत्मनिर्भर हैं. वह जो हासिल करना चाहती हैं,उसे हासिल कर लेती हैं.

हमारी इस फिल्म में मूल मुद्दा यह है कि पति महज अपनी अकड़ व अपने स्वाभिमान के चलते अपनी पत्नी की भावनाओं, उसकी इच्छा,उसके सपनों की कद्र करने की बजाय उन्हे दबाता है. यह सब आज भी हमारे समाज में महज छोटे परिवारों,छोटे शहरों या गांवो की ही नहीं,बल्कि बड़े घरानों व उच्च पदस्थ पुरूषों की वस्तुस्थिति है. अपने साथ ‘शो पीस’ की तरह अपनी पत्नी को पार्टी में ले जाना किसी भी पुरूष की महानता नहीं हो सकती. मैं नारी उत्थान की बात करने की बजाय पुरूष और नारी दोनों को समान रूप से देखने की बात करती हूं.

वुमन इम्पावरमेंट तभी आता है. जिस दिन हर पुरूष, औरत के साथ बराबरी का व्यवहार करने लगेगा, उस दिन वुमन इम्पावरमेंट की जरुरत ही नहीं पड़ेगी. जहा तक हमारी फिल्म ‘‘ए विंटर टेल एट शिमला’’ में ओमन इम्पावरमेंट का मुद्दा बहुत अलग तरीके से उठाया गया है. फिल्म में जब वैदेही को अहसास होता है कि वह अपनी जिंदगी से समझौता क्यों कर रही है? उसे समझौते करने की जरुरत नही है. जब उसे पुनः अहसास होता है कि वह खुद भी रचनात्मक व प्रतिभाशाली नारी है.

वह स्वतंत्र तरीके से जिंदगी जी सकती है. वह महज अपनी बेटी के कारण एक रिश्ते में बंधी हुई है,तो बेटी के सेटल होने के बाद वह अपनी जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र है. यदि कोई औरत स्वतंत्र है,आत्म निर्भर है,तो उसे पुरूष की जरुरत नही होती. वह अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीते हुए खुश रह सकती है. फिल्म में जब वैदेही की बेटी खुद अपनी मां के लिए खड़ी होती है,तो वहां भी वुमन इम्पावरमेंट’ की बात सशक्त तरीके से कही गयी है. इस पूरे वाकिए को फिल्म में देखेंगें, तो ही बेहतर होगा.

हाल ही में मैने एक दिग्गज अभिनेत्री से बात की थी,उनका मानना है कि हर नारी को जिंदगी में किसी न किसी मोड़ पर पुरूष की जरुरत पड़ती ही है?

-सभी का अपना नजरिया होता है. मैं ऐसा नही मानती. मैने पहले ही कहा कि आज की तारीख में जो काम पुरूष कर सकता है,वह सारे काम औरत भी कर रही है. ऐसे में किसी औरत को पुरूष की कहीं जरुरत नजर नहीं आती. इमोशनल सपोर्ट के लिए भले ही पुरूष की जरुरत हो सकती है,पर वह पर्सन टू पर्सन निर्भर करता है. लेकिन अन्य किसी भी बात के लिए नारी को पुरूष की जरुरत नही होना चाहिए.

 

 

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निजी जिंदगी में क्या आपके पति और आपके बीच बराबरी का मसला है?

जी हां!देखिए,मैने पहले ही बताया कि मुझे टीवी इंडस्ट्री से ही मेरा पति मिला. मेरे पति हितेन तेजवानी अभिनेता है. हम देानों ने एक साथ टीवी सीरियल ‘कुटुंब’ में अभिनय किया था और एक दूसरे के करीब आए थे. 2004 में हमने विवाह किया. पर मैने अभिनय करना जारी रखा. 2009 में मैं एक बेटे व एक बेटी यानी कि जुड़वा बच्चों की मां बनी. तब मैने स्वयं चार वर्ष केवल अपने बच्चों को देने का निर्णय लिया था. अन्यथा लगातार अभिनय कर रही हॅूं. मैं अपने शौक को पूरा करते हुए ‘पोर्सलीन पेंटिंग’ भी करती हॅूं. मेरे पति मुझे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने के लिए पूरी छूट देते हैं. हम दोनों मिलकर एक दूसरे की जिंदगी आदि को लेकर निर्णय लेते हैं. हर निर्णय हम दोनों मिलकर ही लेते हैं.

निजी जिंदगी में आप एक बेटे व एक बेटी की मां है. फिल्म में भी आप एक बेटी की मंा वैदेही के किरदार में हैं. किसी दृष्य के फिल्मांकन के दौरान आपको अपनी निजी जिंदगी की कोई घटना याद आयी थी?

-ऐसा नही हुआ. इसकी वजह यह है कि निजी जिंदगी में मेरी बेटी बहुत छोटी है. जबकि फिल्म में बेटी किषोरावस्था में पहुच चुकी है. उसका अपना प्रेमी है. मतलब वह ज्यादा उम्र की है. तो फिल्म के अंदर मां बेटी के बीच जिस तरह की बातें होती हैं,वैसी बाते अभी तक निजी जिंदगी में मेरी बेटी के साथ मेरी नही हुई हैं. लेकिन जब मेरी बेटी उस उम्र की हो जाएगी,तो मैं उसके साथ उस तरह की बाते जरुर करना चाहूंगी. हमारी इस फिल्म में वैदेही और उाकी बेटी के बीच जिस तरह के रिष्ते का चित्रण है,वैसा रिष्ता अभी तक किसी भी फिल्म में मां बेटी के बीच नहीं दिखाया गया है. बहुत ही मीठा रिष्ता है. दोनों एक दूसरे को समझते हैं. फिल्म में बेटी को जब अपनी मां की जिंदगी में कुछ गलत लगता है,तो वह अपनी मां से कहती है. उसी तरह मां भी अपन बेटी से हर बात कहती है. मैं खुद निजी जीवन में अपनी बेटी के साथ उसी तरह का रिष्ता रखना चाहूंगी.

 

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आप लोग दावा कर रहे हैं कि इस फिल्म में क्लासिक प्यार की बात की गयी है. पर जिस तरह से समाज बदला है, उसमें तो अब प्यार काफी डे से षुरू होता है और काफी डे पर ही जाकर खत्म हो जाता है?

-जी हां! समाज में ऐसा ही हो रहा है. पर हम लोगों को बताना चाहते है कि ‘काफी डे से शुरू और काफी डे पर खत्म होने वाला प्यार’ हकीकत मे प्यार नही है. वह तो महज एक आकर्षण का नतीजा है. यह आकर्षण अलग अलग लड़की व लड़के के बीच उनकी अपनी सोच के चलते अलग अलग हो सकता है. वर्तमान में जो कुछ हो रहा है, उसकी एक वजह यह भी है कि आज औरतें आत्मनिर्भर हो गयी हैं, उन्हें पुरूषों की जरुरत नही है. आज हर लड़की व औरत को उनके हिसाब से, उनकी शर्तों पर प्यार मिलता है, तो उन्हे चाहिए, अन्यथा नही चाहिए.

सोशल मीडिया पर आप कितना सक्रिय हैं?

पहले मुझे सोशल मीडिया पसंद नहीं था,पर अब थोड़ा बहुत सक्रिय हो गयी हूं. आज की तारीख में कलाकार के लिए सोशल मीडिया पर रहना अनिवार्य सा हो गया है.

मेरी स्किन टोन डार्क है, मुझे समझ नहीं आता मैं किस रंग की लिपस्टिक लगाऊं, कृप्या सलाह दें?

सवाल

मेरा रंग सांवला है और मुझे सम नहीं आता मैं किस रंग की लिपस्टिक लगाऊं जो मु पर सब से ज्यादा समय सुंदर लगे?

जवाब

सांवला रंग आजकल ज्यादा पसंद किया जाता है. इसे सैक्सी और ग्लैमरस कहा जाता है. ऐसे रंग पर ब्राइट रैड कलर की लिपस्टिक बहुत अच्छी लगती है. आप चाहें तो औरेंज और फुसिआ लिपस्टिक भी लगा सकती हैं. सावले रंग पर डीप ब्राउन जैसेकि सिनेमन व चौकलेट ब्राउन लिपस्टिक बहुत अच्छी लगती हैं. रोज पिंक से ले कर मोव तक सभी अच्छी लगती हैं. मैरून वाली भी अच्छी लगती है पर ब्राउनी मैरून को अवौइड करें. पर्पल शेड वाली लिपस्टिक सांवले रंग पर भी अच्छी लगती है, लेकिन डीप पर्पल लिपस्टिक को अवौइड करें. सांवले रंग पर न्यूड शेड की लिपस्टिक को अवौयड करने चाहिए.

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सवाल

मेरी उम्र 32 साल है. मेरे पैरों की स्किन पर कई जगह काले धब्बे हैं. इन्हें रिमूव करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

उम्र की मैच्योरिटी के साथ स्किन के रिजुविनेशन होने की क्षमता कम होती जाती है और सनलाइट के अधिक कौंटैक्ट में आने के कारण स्किन में लेंटिगो सोलारिस नामक छोटेछोटे धब्बे बनने लगते हैं. ये स्पौट हलके भूरे रंग से काले रंग के होते जाते हैं. हालांकि हारमोनल उतारचढ़ाव के कारण भी चेहरे पर दागधब्बे पैदा हो जाते हैं. सनलाइट के अधिक कौंटैक्ट में आने पर ऐस्ट्रोजन और प्रोजेस्टोरोन हारमोन स्किन को मैलेनिन के अत्यधिक उत्पादन को प्रेरित करते हैं. जिस कारण स्किन पर धब्बे पड़ जाते हैं. इन धब्बों को हटाने के लिए पपीते के टुकड़ों को पीस कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को काले धब्बों पर लगा कर सूखने के लिए छोड़ दें. पेस्ट के सूखने के बाद त्वचा को पानी से धो लें या आलू को छोटे टुकड़ों में काट कर थोड़ा भिगो लें. उन टुकड़ों को कद्दूकस कर लें. फिर उस में शहद मिला कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को अपने काले धब्बों पर 10 से 20 मिनट तक लगा कर रखें. इस के बाद अपनी स्किन को कुनकुने पानी से धो लें.

समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

गुलदस्ता- भाग-3: गलत पते पर आखिर क्यों गुलदस्ता आता था?

अचानक अमन को कुछ याद आया, ‘‘उठ ही गया हूं तो चल के उस फूल वाले को पकड़ते हैं पहले. भेजने वाले का हुलिया पता करते हैं, वह कब आता है उस के पास… पुलिस की धमकी दे कर उगलवाते हैं. वैसे भी कोई बदमाश हो सकता है. फिर कोई कांड ही न हो जाए लड़की के साथ और हम सोचते रहें कि पहले क्यों नहीं ध्यान दिया. चलचल…’’

‘‘यार अभी भी खोजबीन में लगा रहता है. तुझे तो सीबीआई, विजिलैस में होना चाहिए था या समाज सुधारक एनजीओ का बाबाजी. फूल देतेदेते तुझे कहीं प्यारव्यार तो नहीं हो गया उस से जो इतना कंसर्न दिखा रहा है अब समझ, सही में तू…’’ संचित हंसा.

‘‘बकवास मत कर… चल उठ.’’

‘‘देख बता दे कुछ गलत नहीं होता यह जैसा तेरे दिमाग में भरा हुआ है… प्रेम, प्यार, आकर्षण यह तो नैचुरल इंस्टिंग्ट है, मानव की प्रकृति है. अगर किसी के साथ अच्छा महसूस होता है, कोई अच्छा लगता है तो यह नौर्मल बात है. मर्द या औरत की इस में कोई तौहीन नहीं, यह लज्जा का विषय नहीं न ही जबरदस्ती का. यार समझ समझकर थक गया तुझे…’’

‘‘बाबाजी मत बन… बस चल उठ.’’

‘‘मूवी के लिए लेट हो जाएंगे…’’

‘‘अगला शो देखते हैं न… पहले चल…’’

‘‘तुझे परेशानी क्या है अंकलआंटी को पसंद है और जहां तक मैं समझ रहा हूं तुझे भी…’’

दोनों बाइक से निकल पड़े एक फूल वाले से दूसरे फूलवाले…

‘‘यार पास के फूल वाले तो यही 2-3 हैं… यहां तो कोई दूसरा ही बैठा है.’’

‘‘अरे घर चल तैयार हो मूवी के लिए निकलते हैं… तू बेकार के चक्करों में पड़ा हुआ है.

‘‘भेजने वाला बड़ा चालाक है. शायद पीछे वाली कालोनी से लाता होगा कि पता न चले…’’ उस ने बाइक घुमा ली.

‘‘वह देख फूल वाला उधर…’’ संचित ने दिखाया.

‘‘देखा मिल गया न… वही है…’’ अमन खुश हुआ.

‘‘साहब आप? गुलदस्ता चाहिए कि ये

ताजे गुलाब… अभी लाया ही हूं… बिलकुल ताजाताजा हैं.’’

‘‘पहले बताओ कि कौन है जो तुम्हें

40 नंबर में फूल भिजवाता है तुम से? कहां से आता है? सवारी से आता है या पैदल? कैसा दिखता है, क्या पहनता है? पैंट, जींस या निकर? तुम से कहा था न उस का पता पूछ के रखना…’’

‘‘साहबजी पूछा था पर उन्होंने बताया नहीं…’’ वह घबरा कर इधरउधर देखने लगा.

‘‘झठ… उस के साथ मिल कर कुछ कांड करने वाले हो? मैं पुलिस में खबर दे दूंगा वरना सच सच बता दो.’’

‘‘नहींनहीं साहबजी ऐसा मत करना… वह वैसा बिलकुल नहीं पर उन्होंने कुछ भी बताने को मना किया है साहबजी,’’ वह हाथ जोड़ने लगा.

‘‘कितने पैसे दिए हैं बदमाश ने तुम्हें?’’

‘‘गुलदस्ते के पैसों के अलावा हजार रुपये महीना… एडवांस,’’ वह डर गया.

‘‘देखा, शातिर बदमाश है फिर तो… देखा लड़कियों को जाल में कैसे फांसते हैं लोग…’’ अमन ने संचित को देखते हुए कहा.

‘‘छोटे बाल हैं या बड़े?’’ फूल वाले लड़के से पूछा.

‘‘लंबे… पोनी… कभी खुले.’’

‘‘मतलब मौर्डन मजनू… पूछा न, पैंट, निकर, जींस क्या पहनता है?’’

‘‘इन में से कुछ नहीं साहब… छोड़ो न साहब दर्द हो रहा है.’’

‘‘मतलब?’’ वह उस की बाजू कस के पकड़े हुए था.

‘‘वह तो सलवार, कभी चूड़ीदार… चुन्नी.’’

‘‘अबे मतलब लड़की… खोदा पहाड़ निकली चुहिया…’’ संचित अमन की पीठ पर कस कर धौल जमाते हुए जोर से हंस पड़ा.

‘‘मगर सवाल यह है कि लड़की एक लड़की को हर हफ्ते फूल क्यों भेजेगी?’’

‘‘दोस्त होगी… सता कर सरप्राइज करना चाहती होगी और क्या… अब चल बस… आज पहली है तीसरी को अंजू आ जाएगी… इसी संडे देख सकते हैं यार.’’

‘‘दोस्त नहीं, पूरा गैंग होगा इन का जिस में लड़कियां भी शामिल होंगी और

वह मैडम अकेले रहती है कुछ बुरा न हो जाए उस के साथ… पैसे देने कब आती है?’’ अमन ने लड़के से फिर पूछा.

‘‘आज ही तो साहब… पहली तारीख को… लो वह आ गईं दूर… काला चश्मा लगाए हुए.’’

‘‘बहुत खूब… सूरत,’’ संचित के मुंह से निकल ही गया. अमन ने घूर कर देखा और संचित को पेड़ों के ?ारमुट के पीछे खींच लिया. शर्म कर, भाभी का तो खयाल किया कर… श… श… मुझे समझने दे…’’

‘‘हां भाभी…’’ संचित ने शरारत से आ

रही लड़की की ओर इशारा किया. तो उस ने

फूल वाले और संचित दोनों को चुप रहने का इशारा किया.

‘‘लड़की पास आ गई तो अमन हैरान हो गया. यह तो 40 नंबर वाली ही लड़की है… उसे कोई धोखा तो नहीं हो रहा,’’ अमन संचित के कान में फुसफुसाया.

फिर वह हिम्मत कर के किसी इंस्पैक्टर की तरह अकड़ कर बाहर निकल आया, ‘‘यह क्या माजरा है मैडम?’’

अमन को अचानक सामने देख कर थोड़ा सकपका गई थी. पहली बार अमन का यह रूप देखा था. यह क्या बात है. नजरें मिलीं तो अमन की रहीसही अकड़ फिर जाती रही.

वह नजरें चुराने लगा तो आराधना मुसकराते हुए शरारत से बोली, ‘‘अपनी दोस्त रिनी से कई बार आप के बारे में बातें हुईं, बहुत तारीफें भी की थीं मैं ने आप की, आप की शराफत और शरमीले स्वभाव की.’’

‘‘मगर आप तो… वह गरीब… हटी हुई?’’

‘‘उसी ने आप से ये सब झठ कहने के लिए कहा था… वह सच में गरीब है पर दिमाग, दिल, दौलत में कतई अमीर, अलबत्ता जहीन शायर भी है. एक दिन जब पहली बार उस ने आप को देखा, फिर क्या, अपना फड़कता शेर उस की जबान पर मचल उठा कि निगाहें नीची ही रखते हैं जो कभी बात भी नहीं करते, काश उन के हाथ कभी मुझे पेश दस्ता ए गुलाब करते.

‘‘बस मेरी सहेली रिनी ने आप को देख कर आह भरते हुए मजाक में कुछ यों शेर पढ़ा तो मेरे दिल में आप के लिए दबा प्यार बाहर आ ही गया. मैं ने भी उस से शेर के अंदाज में ही शर्त लगा डाली कि गुलाब क्या 10 गुलदस्ते भी उन से ले कर दिखा दूंगी. बातें भी करूंगी उन से, कुछ अपनी बातें भी बना लूंगी.’’

‘‘फिदा तो मैं पहले ही थी जनाब की शराफत पर, आंटीअंकल की मंशा जान कर मेरा हौसला और बढ़ गया. बस मैं ने ठान लिया कि हाथ थामूंगी तो बस आप का… आप में अपना सुखद मस्त भविष्य जो मुझे दिखने लगा…’’ कह वह मुसकराने लगी.

अमन किसी लड़की के अचानक इस बेबाक अंदाज से झेपने लगा. कान व गाल सुर्ख हो उठे.

संचित अमन को घबराता देख खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘‘हाय मरजांवा.’’

‘‘अब बोल मिस्टर सीबी आई…’’ संचित अमन की पीठ ठोंक कर मुसकराते हुए उस का चेहरा निहारने लगा जो लाल हुआ जा रहा था.

अमन मन ही मन मुसकरा भी रहा था, ‘‘क्या अजब

लड़की है.’’

‘‘वाह, बहुत अच्छा किया आप ने… मैडम जो आप ने अपनी सहेली से यह शर्त लगा ली… जिस से इस का भी किसी लड़की

को फूल न देने का प्रण आखिर टूट ही गया… बड़ा अकड़ता फिरता था हम सब से, इस बात

को ले कर कि तुम ही सब पड़े रहते हो लड़कियों के पीछे मैं तो घास भी न डालूं… वैसे सच तो यही है मैडम बड़ा शरमीला है मेरा यार… लड़कियों से जरा बात भी करनी पड़े तो घबरा उठता है. आप को प्यार करता है पर कह नहीं दे पाता. मगर सच यही है आप से प्यार है इसे इसीलिए तो आप को ले कर इतना पजैसिव है

कि आप की सुरक्षा के लिए आप पर ही गुस्सा करने लगा और इंस्पैक्टर बना फिर रहा है,’’ संचित खुलासा करने लगा था, ‘‘अब कैसे शरमा कर खिसियाए जा रहा है देखिए…’’

‘‘सारी बकवास बंद कर अपनी चलचल अब देर नहीं हो रही तुझे?’’ अमन ने खिसियाए हुए, बाइक को किक मारी और हंस रहे संचित के हड़बड़ी में किसी तरह आधेअधूरे बैठते ही फर्र से वह बाइक दूर भगा ले जाता उस से पहले संचित फूल वाले लड़के को चिल्लते हुए बोलता गया, ‘‘बेटा अब एक गुलदस्ता नहीं, जयमाला और मोगरे की लडि़यां इन भैया को दे जाना अगले महीने की 3-4 तारीख के बाद, जब तक मेरी मुहतरमा भी आ जाएंगी… मैं इन की शादी की तारीख तय होते ही बताता हूं तुझे. अब मैं तेरे को एडवांस पैसे दूंगा पूरे 5 हजार कुछ समझ?’’ वह हंसता ही जा रहा था.

अमन को शरमा कर जाने के लिए तेजी से पैर बढ़ाते देख आराधना भी खडी मस्त हो ताली पीट कर हंसे जा रही थी.

‘जाइए… आप कहां जाएंगे अपनी उसी बिल्डिंग में तो आएंगे…’ आराधना सोच कर गुनगुनाते हुए मुसकरा उठी.

‘‘भैया आज तो बस लाल गुलाबों का

ही गुलदस्ता वहां पहुंचा आना,’’ उस ने उत्साहपूर्वक खबर अपडेट के लिए रिनी को

फोन मिला दिया.

‘‘आ कर देख ले अपनी आंखों से तेरी सहेली शर्त आज शाम को ही जीतने वाली है… सच्ची… वह दस्ता ए गुलाब…’’

उधर अमन सोच रहा था कि काश वह लड़कियों से घबराता न तो शायद कब का इसे प्यार करता है, बता चुका होता और पहले झठी अकड़ दिखाने के लिए अपने दोस्तों से अपने बारे में कभी ऐसे बेतुके ऐलान भी नहीं करता… सही तो कहता है संचित प्यार ही तो है उसे आराधना से… कुबूल क्यों नहीं कर पाता… बन गया न आज पूरी तरह…’’

व्यू मिरर में संचित का हंसता चेहरा देख कर खिसियाहट, शर्म में उस ने झटके से

ऐक्सीलेटर कस के दबा दिया. शायद क्या यकीनन वह भी यही चाहता है कि आराधना जैसी खुशमिजाज जिंदादिल लड़की उस की जीवनसंगिनी बन जाए. प्यार करता है वह इस से तभी तो इस को ले कर इतना परेशान हो गया… मम्मी लोगों ने सही ही निर्णय लिया है. उस का मन अचानक बहुत हलका महसूस कर रहा था. दिमाग की टैंशन खत्म हो गई थी. उसे लगा उस की बाइक हवा में उड़ने लगी है.

अमन आराधना को पीछे मुड़ कर देखना चाहता था, किंतु चेहरे पर मुसकान के साथ गुलाबी हो रही शर्म ने उसे रोक दिया.

थोड़ा  झुक कर व्यू मिरर में संचित ने उस

के गुलाबी गालों को देख लिया था. ‘‘बेटा,

बहुत सही’’ के अंदाज में अंगूठा दिखा कर मुसकराते हुए उस की पीठ पर कस कर एक धौल जमा दी

बोझ: क्या 3 बच्चों का बोझ उठा पाई वह

मां ने फुसफुसाते हुए मेरे कान में कहा, ‘‘साफसाफ कह दो, मैं कोई बांदी नहीं हूं. या तो मैं रहूंगी या वे लोग. यह भी कोई जिंदगी है?’’ इस तरह की उलटीसीधी बातें मां

2 दिनों से लगतार मुझे समझा रही थी. मैं चुपचाप उस का मुख देखने लगी. मेरी दृष्टि में पता नहीं क्या था कि मां चिढ़ कर बोली, ‘‘तू मूर्ख ही रही. आजकल अपने परिवार का तो कोई करता नहीं, और तू है कि बेगानों…’’ मां का उपदेश अधूरा ही रह गया, क्योंकि अनु ने आ कर कहा, ‘‘नानीअम्मा, रिकशा आ गया.’’ अनु को देख कर मां का चेहरा कैसा रुक्ष हो गया, यह अनु से भी छिपा नहीं रहा.

मां ने क्रोध से उस पर दृष्टि डाली. उस का वश चलता तो वह अपनी दृष्टि से ही अनु, विनू और विजू को जला डालती. फिर कुछ रुक कर तनिक कठोर स्वर में बोली, ‘‘सामान रख दिया क्या?’’ ‘‘हां, नानीअम्मा.’’

अनु के स्वर की मिठास मां को रिझा नहीं पाई. मां चली गई किंतु जातेजाते दृष्टि से ही मुझे जताती गई कि मैं बेवकूफ हूं. मां विवाह में गई थी. लौटते हुए 2 दिन के लिए मेरे यहां आ गई. मां पहली बार मेरे घर आई थी. मेरी गृहस्थी देख कर वह क्षुब्ध हो गई. मां के मन में इंजीनियर की कल्पना एक धन्नासेठ के रूप में थी. मां के हिसाब से घर में दौलत का पहाड़ होना चाहिए था. हर भौतिक सुख, वैभव के साथसाथ सरकारी नौकरों की एक पूरी फौज होनी चाहिए थी. इन्हीं कल्पनाओं के कारण मां ने मेरे लिए इंजीनियर पति चुना था.

मां की इन कल्पनाओं के लिए मैं कभी मां को दोषी नहीं मानती. हमारे नानाजी साधारण क्लर्क थे, लेकिन वे तनमन दोनों से पूर्ण क्लर्क थे. वेतन से दसगुनी उन की ऊपर की आमदनी थी. पद उन का जरूर छोटा था किंतु वैभव की कोई कमी नहीं थी. हर सुविधा में पल कर बड़ी हुई मां ने उस वैभव को कभी नाजायज नहीं समझा. यही कारण था कि मेरे नितांत ईमानदार मास्टर पिता से मां का कभी तालमेल नहीं बैठा. मुझे अब भी याद है कि मैं जब भी मायके जाती, मां खोदखोद कर इन की कमाई का हिसाब पूछती. घुमाफिरा कर नानाजी के सुखवैभव की कथा सुना कर उसी पथ पर चलने का आग्रह करती, किंतु हम सभी भाईबहनों की नसनस में पिता की शिक्षादीक्षा रचबस गई थी. विवाह भी हुआ तो पति पिता के मनोनुकूल थे.

मां के इन 2 दिनों के वास ने मेरी खुशहाल गृहस्थी में एक बड़ा कांटा चुभो दिया. आज जब सभी अपने काम पर चले गए तो रह गई हैं रचना और मां की बातों का जाल. रचना को दूध पिला कर सुला देने के बाद मैं घर में बाकी काम निबटाने लगी. ज्यादातर काम तो अनु ही निबटा जाती है, फिर भी गृहस्थी के तो कई अनदेखे काम हैं. सब कामों से निबट कर जब मैं अकेली बैठी तो मां की बातें मुझे बींधने लगीं. ‘क्या हम ने गलत किया है? क्या मैं रचना और आशीष का हक छीन रही हूं? क्या उन की इच्छाओं को मैं पूर्ण कर पा रही हूं? मुझे अपने पति पर क्रोध आने लगा. सचमुच मैं मूढ़ हूं. कितनी लच्छेदार बातें बना कर मुझ से इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठवा दी. मुझे अपनी स्थिति अत्यंत दयनीय नहीं, असह्य लगने लगी. मां के आने से पूर्व भी तो परिस्थितियां यही थीं. सब बच्चे अनु, विनू और विजू साथ रहे किंतु आज उन का रहना असह्य क्यों लग रहा है?’

मन बारबार अतीत में भटकने लगा है. 3 साल पहले की घटना मेरे मनमस्तिष्क पर भी स्पष्ट रूप से अंकित थी. रचना तब होने वाली थी. होली की छुट्टियां हो चुकी थीं. उसी दिन हमें अपनी बड़ी ननद के यहां जाना था. किंतु वह जाना सुखद नहीं हुआ. उस दिन बिजली का धक्का लगने से उन्हें बचाते हुए जीजी और भाईसाहब दोनों मृत्यु के ग्रास बन गए. रह गए बिलखते, विलाप करते उन के बच्चे अनु, विनू और विजू, सबकुछ समाप्त हो गया. आज के युग में हर व्यक्ति अपने ही में इतना लिप्त है कि दूसरे की जिम्मेदारी का करुणक्रंदन मन को विचलित किए दे रहा था.

रात्रि के सूनेपन में मेरे पति ने मुझ से लगभग रोते हुए कहा, ‘आभा, क्या तुम इन बच्चों को संभाल सकोगी?’ मैं पलभर के लिए जड़ हो गई. कितनी जोड़तोड़ से तो अपनी गृहस्थी चला रही हूं और उस पर 3 बच्चों का बोझ.

मैं कुछ उत्तर नहीं दे पाई. अपना स्वार्थ बारबार मन पर हावी हो जाता. वे अतीत की गाथाएं गागा कर मेरे हृदय में सहानुभूति जगाना चाह रहे थे. अंत में उन्होंने कहा, ‘अपने लिए तो सभी जीते हैं, किंतु सार्थक जीवन उसी का है जो दूसरों के लिए जिए.’ अंततोगत्वा बच्चे हमारे साथ आ गए. घरबाहर सभी हमारी प्रशंसा करते. किंतु मेरा मन अपने स्वार्थ के लिए रहरह कर विचलित हो जाता. फिर धीरेधीरे सब कुछ सहज हो गया. इस में सर्वाधिक हाथ 17 वर्षीय अनु का था.

उन लोगों के आने के बाद हम पारिवारिक बजट बना रहे थे, तभी ‘मामी आ जाऊं?’ कहती हुई अनु आ गई थी. उस समय उस का आना अच्छा नहीं लगा था, किंतु कुछ कह नहीं पाई. ‘मामी,’ मेरी ओर देख कर उस ने कहा था, ‘आप को बजट बनाते देख कर चली आई हूं. अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही हूं, बुरा नहीं मानिएगा.’ ‘नहींनहीं बेटी, कहो, क्या कहना चाहती हो?’

‘आप रामलाल की छुट्टी कर दें. एक आदमी के खाने में कम से कम 2,000 रुपए तो खर्च हो ही जाते हैं.’ मेरे प्रतिरोध के बाद भी वह नहीं मानी और रामलाल की छुट्टी कर दी गई. अनु ने न केवल रामलाल का बल्कि मेरा भी कुछ काम संभाल लिया था.

उस के बाद रचना का जन्म हुआ. रचना के जन्म पर अनु ने मेरी जो सेवा की उस की क्या मैं कभी कीमत चुका पाऊंगी? रचना के आने से खर्च का बोझ बढ़ गया. उसी दिन शाम को अनु ने आ कर कहा, ‘‘मम्मा, मेरी एक टीचर ने बच्चों के लिए एक कोचिंग सैंटर खोला है. प्रति घंटा 300 रुपए के हिसाब से वे अभी पढ़ाने के लिए देंगी. बहुत सी लड़कियां वहां जा रही हैं. मैं भी कल से जाऊंगी.’’

हम लोगों ने कितना समझाया पर वह नहीं मानी. अपनी बीए की पढ़ाई, घर का काम, ऊपर से यह मेहनत, किंतु वह दृढ़ रही. इन के हृदय में अनु के इस कार्य के लिए जो भाव रहा हो, पर मेरे हृदय में समाज का भय ही ज्यादा था. दुनिया मुझे क्या कहेगी? बड़े यत्न से अच्छाई का जो मुखौटा मैं ने ओढ़ रखा है, वह क्या लोगों की आलोचना सह सकेगा?

पर वह प्रतिमाह अपनी सारी कमाई मेरे हाथ पर रख देती. कितना कहने पर भी एक पैसा तक न लेती. यह देख कर मैं लज्जित हो उठती. विनू भी पढ़ाई के साथसाथ पार्टटाइम ट्यूशन करता. इन्होंने बहुत मना किया, पर बच्चों का एक ही नारा था- ‘मेहनत करते हैं, चोरी तो नहीं.’

3 साल देखतेदेखते बीत गए. आशीष और रचना दोनों की जिम्मेदारियों से मैं मुक्त थी. वह अपने अग्रजों के पदचिह्नों पर चल रहा था. कक्षा में वह कभी पीछे नहीं रहा. मेरी आंखों के सामने बारीबारी से अनु, विनू और विजू का चेहरा घूम जाता. उस के साथसाथ आशीष का भी. क्या इन बच्चों को घर से निकाल दूं? मेरा बाह्य मन हां कहता. 3 का खर्च तो कम होगा. किंतु अंतर्मन मुझे धिक्कारता. कल अगर हम दोनों नहीं रहे तो आशीष और रचना भी इसी तरह फालतू हो जाएंगे. मैं फफकफफक कर रोने लगी.

‘‘क्या बात है, मामी, रो क्यों रही हैं?’’ अनु के कोमल स्वर से मेरी तंद्रा भंग हो गई. शाम हो चुकी थी. मां ने कितना अत्याचार किया मात्र

2 दिनों में. आशीष और रचना को छिपा कर हर चीज खिलाना चाहती थी. बारबार बच्चों को उलटीसीधी बातें सिखाती. मैं अनु की ओर देखने लगी. मुझे लगा अनु नहीं, मेरी रचना बड़ी हो गई है और हम दोनों के अभाव में मां की दी हुई मानसिक यातनाएं भोग रही है.

मैं ने अनु को हृदय से लगा लिया. ‘‘नहींनहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी.’’ ‘‘मुझे आप से अलग कौन कर रहा है?’’ अनु ने हंस कर कहा.

‘‘किंतु इसे जाना तो होगा ही,’’ यह करुण स्वर मेरे पति का था. पता नहीं कब वे आ गए थे. ‘‘क्या?’’ मैं ने अपराधी भाव से पूछा.

‘‘अनु का विवाह पक्का हो गया है. मेरे अधीक्षक ने अपने पुत्र के लिए स्वयं आज इस का हाथ मांगा है. दहेज में कुछ नहीं देना पड़ेगा.’’ अनु सिर झुका कर रोने लगी. मेरे हृदय पर से एक बोझ हट गया. उसे हृदय से लगा कर मैं भी खुशी में रो पड़ी.

सरप्राइज: मां और बेटी की अनोखी कहानी- भाग 2

अजय से असलियत ज्यादा दिन छिपी न रह सकी. एक दिन अजय को उस का सहयोगी हार्दिक जबरदस्ती लंच के लिए बाहर ले गया. रेस्तरां में जाते ही उस ने एक कोने में किसी लड़के के साथ बैठी रिनी को देख लिया, हार्दिक ने भी देख लिया था, हार्दिक अजय का बहुत अच्छा दोस्त था. थोड़ी दूर एक कोने में बैठ कर अजय ने रिनी को फोन किया.

रिनी ने फोन उठाया.

‘‘रिनी, कहां हो?’’

‘‘एक फ्रैंड के घर.’’

‘‘घर कब तक आओगी?’’

‘‘देखती हूं.’’

फोन पर बात करते हुए अजय रिनी की टेबल पर जा कर खड़ा हो गया. उस का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था.

रिनी ने बेशर्मी से कहा, ‘‘अच्छा तो मेरी जासूसी हो रही है? तुम्हारी मां ने भेजा होगा?’’

‘‘शटअप.’’

‘‘इस से मिलो, यह है मेरा खास दोस्त, यश.’’

अजय ने कुछ कहने के लिए जैसी ही मुंह खोला, रिनी ने चेतावनी दी, ‘‘यहां तमाशा खड़ा कर के अपना ही नुकसान करोगे अजय.’’

अजय ने माहौल पर नजर डाली, लंचटाइम था, रेस्तरां पूरा भर चुका था.

‘‘मैं तुम से घर पर बात करूंगा, उठो, चलो.’’

‘‘नहीं मैं तो अभी लंच कर रही हूं. शाम को मिलते हैं.’’

रिनी की बेहयाई देख अजय का गुस्सा काबू के बाहर हो रहा था. हार्दिक उस का हाथ पकड़ उसे रेस्तरां से बाहर ले गया. पास के ही किसी और रेस्तरां में बैठ कर हार्दिक ने कहा, ‘‘जो हुआ, बुरा हुआ. ठंडे दिमाग से काम लेना, अजय. रिनी के तेवर मुझे ठीक नहीं लग रहे.’’

अजय फिर औफिस नहीं गया. सीधा घर आ गया. हार्दिक को ही उस ने

अपना सामान संभालने के लिए बोल दिया.

बेटे को असमय आए देख तनुजा चौंकी. अजय ने पूरी बात मां को बता दी. दोनों सिर पकड़ कर बैठे रह गए. रिनी घर में घुसी. मजाक उड़ाते हुए बोली, ‘‘मांबेटे ने पंचायत कर ली?’’

अजय दहाड़ उठा, ‘‘निकल जाओ यहां से.’’

पर्स सोफे पर पटकते हुए आराम से पसर गई रिनी, ‘‘कौन निकालेगा मुझे?’’ ज्यादा होशियारी की तो मांबेटे को ऐसी चक्की पिसवाऊंगी कि दोनों बाहर आने के लिए तरस जाओगे. मेरी लाइफ में दखलंदाजी न करना ही तुम दोनों के लिए अच्छा रहेगा.’’

‘‘तुम ने मुझ से शादी क्यों की थी? कोई जोरजबरदस्ती तो थी नहीं.’’

‘‘हां, मुझे कौन मजबूर कर सकता है. पति का नाम चाहिए था, घरपैसा चाहिए था, नौकरी करने का मुझे शौक नहीं… मेरे नखरे उठाने के लिए इतने बेवकूफ घूमते हैं. मैं बस ऐंजौय करती हूं,’’ फिर गुनगुनाते हुए अपने बैडरूम में चली गई.

तनुजा को बेटे पर बड़ा तरस आया. क्या करें… वे दोनों तो फंस गए थे. सारे अरमान चूरचूर हो गए थे. अजय ने रिनी से बात करना ही बंद कर दिया. इस के 10 दिन बाद ही अजय को 15 दिनों के लिए सिंगापुर जाना पड़ा. उस का तो वैसे ही आजकल दम घुट रहा था. सोचा, टूर पर रह कर आराम से सोचूंगा कि क्या किया जाए. मां को ढेर सारी हिदायतें दे कर अजय चला गया. रिनी की जैसे लौटरी निकल आई.

रातदिन तनुजा की आंखों के आगे बेटे का उदास चेहरा घूमता रहता. फोन

पर उस की गंभीर, उदास आवाज पर दिल रो उठता.

नहीं, ऐसे तो नहीं चलेगा. वह अपने बेटे का जीवन यों खराब होते नहीं देख सकती. रिनी के मातापिता से बात करनी चाहिए, इस से पहले उन से बहुत कम ही बात होती थी. उन के बात करने का ढंग तनुजा को कभी पसंद तो नहीं आया था पर अभी मजबूरी थी शायद कोई रास्ता निकले, यह सोच कर तनुजा ने रिनी की मम्मी दीप्ति को सब बता कर अपनी परेशानी का कोई हल बताने के लिए कहा तो तनुजा को हैरत का एक तेज झटका लगा जब दीप्ति ने कहा, ‘‘हमारी बेटी ऐसी ही है. एक के साथ बंधना उस का स्वभाव ही नहीं और हम पतिपत्नी तो बहुत बिजी रहते हैं… हमारा तो बड़ी मुश्किल से रिनी से पीछा छूटा है… आप जानें वह जानें. हां यह बात तो है कि कानून उस की ही सुनेगा इसलिए आप मांबेटा अपना मुंह बंद ही रखो तो अच्छा होगा.’’

इस चेतावनी के बाद फोन रख कर तनुजा सिर पकड़े बैठी रह गईं. समझ गईं उस के मातापिता ने अपनी बला उन के सिर टाल दी है.

दिनरात सोचने के बाद रातदिन रिनी की हरकतें देख तनुजा के मन में कई योजनाएं आ ही गईं, जिन पर अमल करने के लिए वे मन ही मन तैयार हो गईं. वे अपने बेटे के जीवन से यह धोखा देने वाली, झूठे इलजाम लगाने की धमकी देने वाली लड़की को भगा कर रहेंगी. यश, अरुण, ईशान और अनिल… में से एक समय पर एक ही आता था, रिनी के लिए ये सब गिफ्ट्स लाते, उसे बाहर घुमाने ले जाते, रिनी इन लड़कों को खूब मूर्ख बनाती है, समझ गई थीं तनुजा.

एक दिन तनुजा ने फोन पर सुन लिया कि ईशान रिनी को लेने 3 बजे नीचे आएगा. तनुजा जान गई थीं कि रिनी को टाइम पर तैयार रहने की आदत नहीं है. वह लेट करती है.

अपनी योजना को रूप देने के लिए मार्केट से घर के सामान का भारी बैग लाते हुए नीचे ही ईशान को मिल गईं, तनुजा को यह लड़का हमेशा कुछ भला सा लगता था. उन्हें देखते ही उस ने बाइक खड़ी की और पास आ कर बोला, ‘‘अरे आंटी, आप इतना सामान अकेले ला रही हैं?’’

‘‘और कौन लाएगा, बेटा? पिछली बार तो सब अनिल ले आया था… अब वह काफी दिन से आया नहीं. खैर, थैंक्स, बेटा.’’

‘‘कौन अनिल आंटी?’’

‘‘अनिल को नहीं जानते? जैसे रिनी के पास तुम आते हो, जैसे तुम दोस्त हो, वैसे ही अनिल, यश और अरुण भी तो हैं.’’

‘‘मैं समझा नहीं आंटी… ये लोग कौन हैं?’’

‘‘नहीं बेटा, सौरी, मेरे मुंह से निकल गया. प्लीज रिनी को मत बताना, उस ने कहा है कि मैं ने उस की कोई भी हरकत किसी को बताई तो वह मांबेटे को झूठे इलजाम में फंसा कर जेल भेज देगी.’’

ईशान सचमुच शरीफ  ही था. उसे तो रिनी ने अपने प्यार की दुहाई दे कर फंसाया था. उस के मन में पहले ही एक विवाहित लड़की से संबंध रखने का अपराधबोध था. युवा था, गलती कर बैठा था, रिनी के रूपजाल में फंस गया था पर अब एक सभ्य, संभ्रांत महिला के मुंह से जो भी सुना, धक्का लगा.

तभी रिनी नीचे उतर आई. माथे पर त्योरियां डाल कर तनुजा से पूछा, ‘‘आप यहां क्या कर रही हैं?’’

‘‘कुछ नहीं, घर का सामान लेने गई थी,’’ रिनी ईशान की बाइक पर बैठ कर बेशर्मी से बिना बात किए हंसती हुई चली गई. तनुजा ने नोट किया कि ईशान का चेहरा गंभीर है.

तनुजा ने फोन पर तो सुना था कि रिनी ईशान के साथ मूवी जाएगी पर 1 घंटे में ही रिनी पैर पटकते हुए वापस आई और सीधे अपने बैडरूम में चली गई. शायद ईशान पर तनुजा के कहे की कुछ प्रतिक्रिया हुई है, यह सोच कर तनुजा को बड़ी आशा बंधी कि वह कोशिश करेगी तो अपनी योजना में जरूर सफल होगी.

एक दिन अरुण ने घर के लैंडलाइन पर फोन कर दिया. फोन ये लड़क अकसर करते

रहते थे, कभी भी. रिनी देर तक सो रही होती थी और उस का फोन बंद होता था तो भी अकसर कोई न कोई लैंडलाइन पर फोन कर लेता था. तनुजा अब ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थी.

अरुण ने संकोचपूर्वक पूछा, ‘‘आंटी, रिनी कहां है?’’ फोन नहीं उठा रही है.

तनुजा अलर्ट हुईं. कहा, ‘‘बेटा, यश, अनिल या ईशान के साथ ही होगी.’’

‘‘ये लोग कौन हैं, आंटी? आप के रिश्तेदार हैं?’’

‘‘न… न… बेटा, जैसे तुम हो, ऐसे ही लोग हैं… उस की दोस्ती तो कई लोगों से है न, बेटा.’’

आगे पढ़ें- सच जानने के बाद क्या था अरूण का फैसला

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