फैमिली के लिए बनाएं बेसन की सब्जी

अगर आप लंच में कुछ टेस्टी और हेल्दी सब्जी बनाना चाहती हैं तो बेसन की सब्जी आपके लिए बेस्ट औप्शन है. बेसन हेल्दी के साथ-साथ टेस्टी भी होता है. आप इसे अपनी फैमिली को लंच या डिनर में खिला सकते हैं.

 हमें चाहिए

– बेसन (100 ग्राम)

– लाल मिर्च (1/4 चम्मच)

– गरम मसाला (1/2 चम्मच)

– हरी मिर्च  (01 बारीक कटी हुई)

– इमली (20 ग्राम)

– भुना जीरा (01 छोटा चम्मच)

– शक्कर (01 छोटा चम्मच)

– तेल (1/2 छोटा चम्मच)

– काला नमक (1/2 छोटा चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

बेसन की सब्जी बनाने की विधि :

– सबसे पहले इमली को रात भर के लिए एक कटोरी पानी में भि‍गो दें.

– इसके बाद एक कटोरे में गुनगुने पानी में बेसन को अच्छी तरह से फेंट लें.

– फिर लाल मिर्च, गरम मसाला, हरी मिर्च और नमक मिला लें.

– इसके बाद घोल को एक बार फिर अच्छी तरह फेंट लें.

– अब एक कड़ाही में बेसन के घोल को डालें और मीडियम आंच पर पकायें.

– घोल को लगातार चम्मच से चलाते रहें, जिससे बेसन में गुठलियां ने पड़ने पायें.

– बेसन के घोल को 10-12 मिनट पकायें, इससे वह गाढ़ा हो जाएगा.

– अब एक में थाली में 1/2 चम्मच तेल लगाकर उसकी सतह को चिकना कर लें.

– फिर बेसन के घोल को थाली में पतला पतला फैला दें और ठंडा होने दें.

– घोल ठंडा होने पर घोल जम जायेगा.

– जमने पर बेसन की पर्त को छोटे-छोटे साइज में काट लें.

– अब भीगी हुई इमली को अच्छे से मसल कर उसका पानी छान लें.

– इमली के रस में एक बड़ा कटोरा पानी और मिला लें.

– इस पानी में हल्का सा काला नमक, भुना हुआ जीरा और एक चम्मच शक्कर मिला लें.

– अब बेसन के टुकड़ों को इमली के घोल में डाल दें और थोड़ी देर के लिये रख दें.

– आप चाहें तो इसे थोड़ा सा पका भी सकते हैं.

– अब आपकी स्वादिष्ट राजस्‍थानी पतोड़ तैयार है.

इसे सर्विंग प्‍लेट में निकालें और गर्मा-गरम रोटियों / पराठों के साथ सर्व करें.

Summer Special: बच्चों को खिलाएं चावल के शकरपारे और ड्रमस्टिक लीव्स फ्रिटर्स

 चावल के शकरपारे

सामग्री

  •   1 कप चावल
  •   1 कप गुड़
  •   1/2 कप नारियल का पाउडर
  •   2 बड़े चम्मच बादाम और काजू के टुकड़े
  •   1 बड़ा चम्मच तिल तलने के लिए तेल.

विधि

चावलों को धो कर सुखा लें. एक कड़ाही में चावलों को धीमी आंच पर भून लें. हलका ठंडा कर मिक्सी में पाउडर बना लें. गुड़ में 1/2 कप पानी डाल कर 1/2 घंटे के लिए रख दें. गुड़ घुल जाएगा. गुड़ के पानी से चावलों का आटा, नारियल का पाउडर, बादामकाजू के टुकड़े और तेल को अच्छी तरह से मिला कर गूंध लें. चाहें तो इस की गोलियां बना कर चपटा कर तल लें या प्लास्टिक की परत के बीच से बेल कर शकरपारे बना लें. कड़ाही में तेल गरम कर शकरपारे तल लें.

  1. ड्रमस्टिक लीव्स फ्रिटर्स

सामग्री

  •   1/2 कप ड्रमस्टिक लीव्स
  •   1/2 कप चने की दाल
  •   2 बड़े चम्मच लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च कटी
  •   1 प्याज कटा
  •   1 हरीमिर्च कटी
  •   तलने के लिए तेल
  •   नमक स्वादानुसार.

विधि

  • चने की दाल को 2-3 घंटों के लिए पानी में भिगो दें. फिर मिक्सी में पीस लें.
  • इस में प्याज, हरीमिर्च, सभी शिमलामिर्च, ड्रमस्टिक लीव्स और नमक डाल कर अच्छी तरह फेंट कर इस के गरम तेल में छोटेछोटे पकौड़े तल चटनी के साथ गरमगरम परोसें

3. ब्रोकन व्हीट पैन केक

सामग्री

  • 1 कप दलिया
  • 1 प्याज बारीक कटा
  • 1 टमाटर बारीक कटा
  • 2 बड़े चम्मच लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च कटी
  • 1/2 कप लौकी घिसी
  • 1/2 कप पनीर कसा
  • 1-2 हरीमिर्चें कटी
  • थोड़ी सी धनियापत्ती कटी
  • 3 बड़े चम्मच तेल
  • नमक स्वादानुसार.

विधि

  1. दलिए को अच्छी तरह धो कर पानी डाल कर 1 घंटा भिगोए रखें. फिर मिक्सी में पेस्ट बना लें.
  2. एक बाउल में निकाल कर इस में सारी सब्जियां, स्वादानुसार नमक, हरीमिर्चें व धनियापत्ती मिला लें.
  3. तवा गरम कर चम्मच से दलिए के मिश्रण को गरम तवे पर फैलाएं.
  4. दोनों तरफ से तेल लगा कर सेंक लें. पैन केक चटनी के साथ गरमगरम परोसें.

मुझे मीठा खाने से दांतों में झनझनाहट भी महसूस होती है, ऐसे में क्या रूट कैनाल ट्रीटमैंट कराना सही है?

सवाल

मेरी उम्र 25 साल है. मेरे दांतों में कीड़ा लग गया है, जिस कारण दर्द तो होता ही है, साथ ही मीठा खाने से दांतों में झनझनाहट भी महसूस होती है. डैंटिस्ट ने मुझे रूट कैनाल ट्रीटमैंट कराने की सलाह दी है. क्या यह ट्रीटमैंट लेना सही रहेगा?

जवाब

चूंकि आप के दांतों में दर्द के साथसाथ झनझनाहट भी होती है, इसलिए आप के लिए रूट कैनाल ट्रीटमैंट कराना आवश्यक है. डाक्टर ने यह सलाह जांच के बाद ही दी है. अत: बिना किसी संदेह के यह ट्रीटमैंट ले सकते हैं.

रूट कैनाल ट्रीटमैंट में सूजन या संक्रमण वाले पल्प को हटा दिया जाता है. इस पल्प को हटाने के बाद वहां की खाली जगह को पहले साफ किया जाता है और फिर उसे सही आकार दे कर भरा जाता है. इस में दांत को सुन्न कर प्रक्रिया को पूरा किया जाता है. इस प्रक्रिया को ऐक्सरे के बाद ही शुरू किया जाता है.

पहले दांत में कीड़ा लगने पर उस दांत को निकाल दिया जाता था या वहां धातू भर दी जाती थी. यह प्रक्रिया काफी दर्दनाक होती थी. लेकिन अब नई तकनीक व ऐनेस्थीसिया की मदद से दर्द न के बराबर होता है और इलाज भी आसानी से पूरा हो जाता है. इस प्रक्रिया में दांत को निकाले बिना उसे सुरक्षित कर दिया जाता है.

सवाल

मैं 22 वर्षीय कामकाजी महिला हूं. मुझे पायरिया की समस्या है, जिस की वजह से दांत बहुत पीले हो गए हैं और खून भी ज्यादा निकलता है. क्या घरेलू उपायों से इस का इलाज संभव है?

जवाब

पायरिया दांतों का वह रोग है, जो मसूढ़ों को भी प्रभावित करता है. दांतों की ठीक से सफाई न करने और जबतब खाने की आदत के कारण उन में पायरिया हो जाता है. मसूढ़ों से खून और मवाद आना, सांस से बदबू आना, दांतों में दर्द होना, उन का पीला पड़ना सब पायरिया के ही लक्षण हैं. पायरिया का सही समय पर इलाज कराना बेहद जरूरी है अन्यथा बाद में यह बड़ी समस्या बन जाती है, जिस में दांत निकलने शुरू हो जाते हैं.

इस का इलाज घर पर मुमकिन है. नियमितरूप से दांतों की सफाई करें. रात को सोने से पहले ब्रश अवश्य करें. ब्रश के बाद कुछ भी न खाएं. सरसों के तेल में नमक मिला कर रोज इसे अच्छी तरह दांतों पर मलें. जामुन की छाल का काढ़ा बना कर रख लें और फिर खाने के बाद इस का प्रयोग कुल्ला करने के लिए करें. जितनी बार कुल्ला कर सकें करें. हफ्ते में कम से कम 3 बार नीम की दातुन करें. नीम का तेल भी पायरिया में लाभदायक साबित होता है. रोज नीम के तेल को दांतों पर 2 मिनट लगाए रखें, फिर पानी से धो लें. ये सब करने से दांतों से पीलापन भी दूर हो जाएगा और पायरिया की परेशानी से भी छुटकारा मिल जाएगा.

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Summer Special: गर्मी में कैसे पाएं स्‍मूथ अंडरआर्म्‍स, अपनाएं ये 5 होम रेमेडीज

हम अधिकतर यह देखते हैं कि मॉडल और सेलेब्रिटीज के आर्मपिट्स स्मूथ और फेयर होते हैं.लेकिन, हममें से अधिकतर लोगों के अंडरआर्म्स स्मूथ और फेयर नहीं होते. लेकिन, स्लीवलेस कपड़े पहनने के लिए अंडरआर्म्स का ख्याल रखना जरूरी है. इसके लिए आपको पार्लर में घंटों समय बिताने की जरूरत नहीं है. कुछ होम रेमेडीज से ही आप इस समस्या से राहत पा सकते हैं और आराम से स्लीवलेस कपड़े पहन सकते हैं. गर्मी के मौसम में पाएं स्‍मूथ अंडरआर्म्‍स पाने के लिए ये होम रेमेडीज आपके बहुत काम आने वाली हैं. आइए जानें गर्मियों में आर्मपिट्स को स्मूथ बनाने के लिए होम रेमेडीज के बारे में.

स्‍मूथ अंडरआर्म्‍स पाने के लिए होम रेमेडीज

स्मूथ अंडरआर्म्स के लिए होम रेमेडीज से पहले यह जानकारी जरूरी है कि अंडरआर्म्स का काला होना बेहद सामान्य है. ऐसे में इस बारे में आपको किसी भी तरह की हीन भावना अपने मन में नहीं लानी चाहिए. अगर बात करें स्मूथ अंडरआर्म्स की, तो इसके लिए होम रेमेडीज इस प्रकार हैं:

  1. बेकिंग सोडा-

एक चम्मच बेकिंग सोडा और थोड़ा सा एप्पल साइडर विनेगर का इस्तेमाल कर के आप इस समस्या से राहत पा सकते हैं. इन दोनों को मिला कर एक पेस्ट बनाएं और अंडरआर्म्स पर लगा कर दस मिनट्स तक ऐसे ही रहने दें. इसके बाद इसे धों दें. हफ्ते में दो बार इस तरीके के इस्तेमाल से आपको लाभ होगा.

2. खीरा-

खारे में बेहतरीन ब्लीचिंग और स्किन व्हाइटनिंग प्रॉपर्टीज होती हैं, जिससे अंडरआर्म स्किन आसानी सॉफ्ट हो जाती है. इसके इस्तेमाल से डेड स्किन सेल्स आसानी से रिमूव हो जाते हैं. आप खीरे को अपनी स्किन पर रगड़ें और उसके बाद उसके बाद इसे धो दें.

3. आलू-

आलू के इस्तेमाल से भी आपके अंडरआर्म्स सॉफ्ट और लाइट हो सकते हैं. इसलिए आप आलू का इस्तेमाल भी कर सकते हैं.

4. मॉइस्चराइजर-

चेहरे की तरह अंडरआर्म्स में मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल करना स्किन को सॉफ्ट बनाता है. लेकिन, रोजाना इसका इस्तेमाल करना जरूरी नहीं है.

5. एलोवेरा-

एलोवेरा स्किन को मॉइस्चराइजेशन प्रदान करता है, जिससे स्किन सॉफ्ट बनती है. आप एलोवेरा और टमाटर का एक पेस्ट बनाएं और इसका इस्तेमाल अंडरआर्म्स पर करें. कुछ देर इसे लगाने के बाद ड्राई होने दें और बाद में इसे धो दें. कुछ दिन इसका इस्तेमाल करने से आपको जल्द ही फर्क नजर आएगा.

हेल्दी रहने के साथ ही अंडरआर्म्स को स्मूथ और लाइट बनाने के लिए आपका हाइड्रेट रहना भी बेहद जरूरी है. इसके साथ ही कभी भी ड्राई स्किन पर शेव न करें. ऐसा करना भी स्किन को हार्ड बनाता है.

तरक्की: श्वेता को क्या तोहफा मिला था

श्वेता एक सीधीसादी लड़की थी. कम बोलना, बेवजह किसी को फालतू मुंह न लगाना उस की आदत में ही शामिल था. दफ्तर के मालिक मनोहर साहब जब भी उसे बुलाते, वह नजरें झुकाए हाजिर हो जाती.

‘‘श्वेता…’’

‘‘जी सर.’’

‘‘तुम काम खत्म हो जाने पर फुरसत में मेरे पास आना.’’

‘‘जी सर,’’ कहते हुए श्वेता दरवाजा खोलती और बाहर अपने केबिन की तरफ बढ़ जाती. उस ने कभी भी मनोहर साहब की तरफ ध्यान से देखा भी नहीं था कि उन की आंखों में उस के लिए कुछ है.

अगले महीने तरक्की होनी थी. पूरे दफ्तर में मार्च के इस महीने का सब को इंतजार रहता था.

मनोहर साहब अपने दफ्तर में बैठे श्वेता के बारे में ही सोच रहे थे कि शायद 2 साल के बाद वह उन से गुजारिश करेगी. पिछले साल भी उन्होंने उस की तरक्की नहीं की थी और न ही तनख्वाह बढ़ाई थी, जबकि उस का काम बढि़या था.

इस बार मनोहर साहब को उम्मीद थी कि श्वेता के कहने पर वे उस की तरक्की कर उसे अपने करीब लाएंगे, जिस से वे अपने मन की बात कह सकेंगे, पर श्वेता की तरफ से कोई संकेत न मिलने की वजह से वे काफी परेशान थे. आननफानन उन्होंने मेज पर रखी घंटी जोर से दबाई.

‘‘जी साहब,’’ कहता हुआ चपरासी विपिन हाजिर हो गया.

‘‘विपिन, देखना श्वेता क्या कर रही है? अगर वह खाली हो तो उसे मेरे पास भेज दो.’’

मनोहर साहब ने बोल तो दिया, पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि उस से क्या कहेंगे, कैसे बात करेंगे. वे अपनी सोच में गुम थे कि तभी श्वेता भीतर आई.

मनोहर साहब उस के गदराए बदन को देखते हुए हड़बड़ा कर बोले, ‘‘अरे, बैठो, तुम खड़ी क्यों हो?’’

‘‘जी सर,’’ कहते हुए श्वेता कुरसी पर बैठ गई.

मनोहर साहब बोले, ‘‘देखो श्वेता, तुम काबिल और समझदार लड़की हो. तुम इतनी पढ़ाईलिखाई कर के टाइप राइटर पर उंगलियां घिसती रहो, यह मैं नहीं चाहता.

‘‘मैं तुम्हें अपनी सैक्रेटरी बनाना चाहता हूं.’’

‘‘क्या,’’ इस शब्द के साथ श्वेता का मुंह खुला का खुला रह गया. वह अपने भीतर इतनी खुशी महसूस कर रही थी कि मनोहर साहब के चेहरे पर उभरे भावों को देख नहीं पा रही थी.

‘‘ठीक है सर. कब से काम संभालना है?’’ यह पूछते हुए श्वेता के चेहरे पर बिखरी खुशी की लाली उस की खूबसूरती में निखार ला रही थी, जिस का मजा उस के मनोहर साहब भरपूर उठा रहे थे.

‘‘कल से ही तुम यह काम संभाल लो,’’ यह कहते हुए मनोहर साहब को ध्यान भी नहीं रहा कि अभी इस महीने में 5 दिन बाकी हैं, उस के बाद पहली तारीख आएगी.

मनोहर साहब के ‘कल से’ जवाब के बदले में श्वेता ने कहा, ‘‘ठीक है सर…’’ और जाने के लिए कुरसी छोड़ कर खड़ी हो गई, पर सर की आज्ञा का इंतजार था.

थोड़ी देर बाद मनोहर साहब बोल पड़े, ‘‘ठीक है, तुम जाओ.’’

श्वेता को मानो इसी बात का इंतजार था. वह अपनी इस खुशी को अपने परिवार में बांटना चाहती थी. वह अपना पर्स टटोलते हुए अपने केबिन में पहुंची और वहां सभी कागज वगैरह ठीक कर के घर के लिए चल पड़ी.

श्वेता अपने परिवार के पसंद की खाने की चीजें ले कर घर पहुंची. रास्ते में उस के जेहन में वे पल घूम रहे थे, जब 3 साल पहले उस के पिताजी की मौत हो गई थी. एक साल तक मां ही परिवार की गाड़ी चलाती रही थीं.

श्वेता ने बीए पास करते ही नौकरी शुरू कर दी थी, ताकि उस की दोनों छोटी बहनें पढ़ सकें. एक छोटा भाई सागर था, जो अभी तीसरी क्लास में था.

श्वेता के 12वीं के इम्तिहान के बाद ही सागर का जन्म हुआ था. तीनों बहनों का लाड़ला था सागर, पर पिता का प्यार उसे नहीं मिल सका था.

श्वेता को अपनी सोच में गुम हुए पता न चला कि घर आ चुका था.

‘‘रोको भैया, रोको, मुझे यहीं उतरना है,’’ कहते हुए श्वेता ने पैकेट संभाले हुए आटोरिकशा का पैसा चुकता किया और घर की सीढि़यों पर चढ़ते ही घंटी बजाई.

छोटी बहन संगीता ने दरवाजा खोला. सब से छोटी बहन सरोज भी उस के साथ थी. दीदी के हाथों में पैकेट देख कर दोनों बहनें हैरान थीं.

अभी वे कुछ कहतीं, उस से पहले श्वेता बोल पड़ी, ‘‘लो सरोज, आज हम सब बाहर का खाना खाएंगे.’’

इस के बाद वे तीनों भीतर आ कर मां के पास बैठ गईं.

मां भी श्वेता कोे देख रही थीं, तभी वह बोली, ‘‘मां, आज मैं बहुत खुश हूं. अब आप को चिंता नहीं करनी पड़ेगी. आप खुले हाथों से खर्च कर सकती हैं. अब मुझे 10,000 रुपए तनख्वाह मिला करेगी.’’

श्वेता की बातें सुन कर मां और ज्यादा हैरान हो गईं.

श्वेता ने आगे कहा, ‘‘मैं अपनी बहनों को इंजीनियर और डाक्टर बनाऊंगी. अब इन की पढ़ाई नहीं रुकेगी,’’ कहते हुए श्वेता के चेहरे पर ऐसे भाव आ गए जो पिता की मौत के बाद कालेज छोड़ते हुए आए थे.

श्वेता की तरक्की से पूरा दफ्तर हैरान था. काम्या तो इस बात से हैरान थी कि श्वेता ने कैसे मनोहर साहब से अपनी तरक्की करवा ली. अगर उसे पता होता कि ‘मनोहर साहब’ भी मैनेजर जैसे हैं, तो वह अपना ब्रह्मपाश मनोहर सर पर ही चलाती. वह फालतू ही मैनेजर के चक्कर में पड़ गई. उसे अपनेआप पर गुस्सा आ रहा था.

काम्या चालबाज लड़की थी. उस ने आते ही मैनेजर को अपने मायाजाल में फांस कर अपनी तरक्की करा ली थी, पर यह सब दफ्तर का कोई मुलाजिम नहीं जानता था. वह वहां सामान्य ही रहती थी, भले ही अपनी पूरी रात मैनेजर के साथ बिताती थी.

एक दिन काम्या ने श्वेता से कह दिया कि बहुत लंबा तीर मारा है तुम ने सीधीसादी बन कर, पर श्वेता उस का मतलब न समझ पाई.

4 महीने बीत चुके थे. एक दिन किसी समारोह में श्वेता भी मनोहर साहब के साथ गई. साहब बहुत खुश नजर आ रहे थे. दफ्तर का ही कार्यक्रम था. श्वेता से उन की खुशी छुपी नहीं रही. उस ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, आज कोई खास बात है क्या?’’

‘‘हां श्वेता, तुम्हारे लिए खुशखबरी है,’’ कहते हुए वे मुसकराने लगे.

‘‘मेरे लिए क्या…’’ हैरान श्वेता देखती रह गई.

समारोह खत्म होने पर ‘तुम साथ चलना’ कहते हुए श्वेता का जवाब जाने बिना मनोहर साहब दूसरी तरफ चले गए. पर वह विचलित हो गई कि आखिर क्या बात होगी?

समारोह तकरीबन 4 बजे खत्म हुआ और साहब के साथ गाड़ी में चल पड़ी, वह राज जानने जो उस के साहब को खुश किए था और उसे भी कोई खुशी मिलने वाली थी. एक फ्लैट के सामने गाड़ी रुकी और साहब ताला खोलने लगे.

अंदर हाल में दीवान बिछा था, सोफे भी रखे थे. ऐसा लग रहा था कि यहां कोई रहता है. सभी चीजें साफसुथरी लग रही थीं.

‘‘बैठो,’’ मनोहर साहब ने कहा तो वह भी बैठ गई और साहब की तरफ देखने लगी.

‘‘देखो श्वेता, तुम बहुत ही समझदार लड़की हो. अब मैं जो भी कहने जा रहा हूं, उसे ध्यान से सुनना और समझना. अगर तुम्हें मेरी बातें या मैं बुरा लगूं तो तुम मेरा दफ्तर छोड़ कर आराम से जा सकती हो. अब मेरी बातें बड़े ही ध्यान से सुनो…’’

श्वेता मनोहर साहब की बातें समझ नहीं पा रही थी कि वे क्या कहना चाहते हैं और उस से क्या चाहते हैं. कानों में मनोहर साहब की आवाज पड़ी, ‘‘सुनो श्वेता, मैं तुम से पतिपत्नी का रिश्ता बनाना चाहता हूं. तुम मुझे अच्छी लगती हो. तुम में वे सारे गुण मौजूद हैं, जो एक पत्नी में होने चाहिए. मेरा एक 3 साल का बेटा है, उसे मां की जरूरत है. अगर तुम मेरी बात मान लोगी तो यहां जिंदगीभर राज करोगी. सोचसमझ कर मुझे अभी आधे घंटे में बताओ. तब तक मैं कुछ चायकौफी का इंतजाम करता हूं,’’ कहते हुए वे कमरे से बाहर जा चुके थे.

श्वेता क्या करे, इनकार की गुंजाइश बिलकुल नहीं थी. दूसरी नौकरी तलाशने तक घर तबाह हो जाएगा, हां कहती है तो बिना जन्म दिए मां का ओहदा मिल जाएगा. तरक्की के इतने सारे अनचाहे उपहारों को वह संभाल पाएगी. उस ने अपनेआप से सवाल किया.

‘‘लो, चाय ले लो,’’ कहते हुए वे उस के करीब बैठ चुके थे और उस की पीठ पर हाथ फेरने लगे. उस ने विरोध भी नहीं किया. उसे अपनी बहनों को डाक्टर और इंजीनियर जो बनाना था.

शरीर की हलचल पर काबू न रखते हुए वह मनोहर साहब की गोद में लुढ़क गई. आखिर उसे भी तो कुछ देना था साहब को, उन की इतनी मेहरबानियों की कीमत.

थोड़े देर में वे दोनों एकदूसरे में डूब गए. श्वेता को कुछ भी बुरा नहीं लग रहा था.

मनोहर साहब की पत्नी मर चुकी थी. वे किसी ऐसी लड़की की तलाश में थे, जो उस के बच्चे को अपना कर उसे प्यार दे सके. श्वेता में उसे ये गुण नजर आए, वरना उस की औकात ही क्या थी.

3 हफ्ते में दोनों की शादी हो गई. शादी में पूरा दफ्तर मौजूद था. सभी मनोहर साहब की तारीफ कर रहे थे कि चलो रिश्ता बनाया तो निभाया भी, वरना आजकल कौन ऐसा करता है.

काम्या भीतर ही भीतर हाथ मल रही थी और पछता रही थी. उस से रहा नहीं गया. श्वेता के कान में शब्दों की लडि़यां उंड़ेल दीं. ‘‘श्वेता, लंबा हाथ मारा है, नौकर से मालकिन बन बैठी.’’

श्वेता के चेहरे पर हलकी सी दर्द भरी मुसकान रेंग गई. वह खुद नहीं समझ पा रही थी कि ‘लंबा हाथ मारा है’ या ‘लुट गई है’.

‘‘मम्मी, गुड इवनिंग,’’ यह आवाज एक मासूम बच्चे सौरभ की थी, जो बहुत ही प्यारा था. मनोहर साहब उस का हाथ पकड़े खड़े थे. शायद मांबेटे का एकदूसरे से परिचय कराने के लिए, पर बिना कुछ पूछे श्वेता ने सौरभ को उठा कर अपने सीने से लगा लिया, क्योंकि उसे अपनी तरक्की से कोई गिला नहीं था. उसे तरक्की में मिले तोहफों से यह तोहफा अनमोल था.

लेखिका- डा. पुष्पा सिंह विसेन

जुआरी: बड़े भैया की वसीयत में क्या लिखा था

‘जिंदगी क्या इतनी सी होती है?’ बड़े भैया अपने बिस्तर पर करवटें बदलते हुए सोच रहे थे और बचपन से अब तक के तमाम मौसम उन की धुंधली नजर में तैरने लगे. अंत में उन की नजर आ कर उन कुछ करोड़ रुपयों पर ठहर गई जो उन्होंने ताउम्र दांत से पकड़ कर जमा किए थे.

कितने बड़े परिवार में उन्होंने जन्म लिया था. बड़ी बहन कपड़े पहना कर बाल संवारती थी, बीच की बहन टिफिन थमाती थी. जूते पहन कर जब वह बाहर निकलते तो छोटा भाई साइकिल पकड़ कर खड़ा मिलता था.

‘भैया, मैं भी बैठ जाऊं?’ साइकिल बड़े भाई को थमाते हुए छोटा विनम्र स्वर में पूछता.

‘चल, तू भी क्या याद रखेगा…’ रौब से यह कहते हुए साइकिल का हैंडल पकड़ कर अपना बस्ता छोटे भाई को पकड़ा देते फिर पीठ पर एक धौल मारते हुए कहते, ‘चल, फटाफट बैठ.’

छोटा साइकिल की आगे की राड पर मुसकराता हुआ बैठता. तीसरा जब तक आता उन की साइकिल चल पड़ी होती.

अगले दिन साइकिल पर बैठने का नंबर जब तीसरे भाई का आता तो दूसरे को पैदल ही स्कूल जाना पड़ता. इस तरह तीनों भाई भागतेदौड़ते कब स्कूल से कालिज पहुंच गए पता ही नहीं चला.

कितनी तेज रफ्तार होती है जिंदगी की. कालिज में आने के बाद उन की जिंदगी में बैथिनी क्या आई, वह अपने ही खून से अलग होते चले गए. बैथिनी का भाई सैमसन उन के साथ कालिज में पढ़ता था. ईसाई धर्म वाले इस परिवार का उन के ब्राह्मण परिवार से भला क्या और कैसा मेल हो सकता था. पढ़ाई पूरी होतेहोते तो बैथिनी के साथ उन की मुहब्बत की पींगें आसमान को छूने लगीं. सैमसन का नेवी में चुनाव हो गया तो उन का आर्मी में. वह जब कभी भी अपने प्रेम का खुलासा करना चाहते उन का ब्राह्मण होना आडे़ आ जाता और उन की बैथिनी इस ब्राह्मण घर की दहलीज नहीं लांघने पाती. पिताजी असमय ही काल का ग्रास बन गए और वह आर्मी की अपनी टे्रनिंग में व्यस्त हो गए.

फौज की नौकरी में वह जब कभी छुट्टी ले कर घर आते उन के लिए रिश्तों की लाइन लग जाती और वह बड़े मन से लड़कियां देखने जाते. कभी मां के साथ तो कभी बड़ी बहनों और उन के पतियों के साथ.

पिताजी ने काफी नाम कमाया था, सो बहुत से उच्चवर्गीय परिवार इस परिवार से रिश्ता जोड़ना चाहते थे पर उन के मन की बात किसे मालूम थी कि वह चुपचाप बैथिनी को अपनी हमसफर बना चुके थे. वह मां के जीतेजी उन की नजर में सुपुत्र बने रहे और कपटी आवरण ओढ़ लड़कियां देखने का नाटक करते रहे. वैसे भी पिताजी की मृत्यु के बाद घर में उन से कुछ पूछनेकहने वाला कौन था. 4 बड़ी बेटियों के बाद उन का जन्म हुआ था. उन के बाद 3 छोटे भाई और सब से छोटी एक और बहन भी थी. सो वह अपने ‘बड़ेपन’ को कैश करना बचपन से ही सीख गए थे. चारों बड़ी बहनों का विवाह तो पिताजी ही कर गए थे. अब बारी उन की थी, सो मां की चिंता आंसुओं में ढलती रहती पर न उन्हें कोई लड़की पसंद आनी थी और न ही आई.

छोटे भाइयों को भी अपने राम जैसे भाई का सच पता नहीं था, तभी तो भारतीय संस्कृति व परिवार की डोर थामे वे देख रहे थे कि उन का बड़ा भाई सेहरा बांधे तो उन का भी नंबर आए.

वह जानते थे कि जिस ईसाई लड़की को उन्होंने अपनी पत्नी बनाया है उस का राज एक न एक दिन खुल ही जाएगा, अत: कुछ इस तरह का इंतजाम कर लेना चाहिए कि घर में बड़े होने की प्रतिष्ठा भी बनी रहे और उन की इस गलती को ले कर घर व रिश्तेदारी में कोई बवाल भी न खड़ा हो.

इस के लिए उन्होंने पहले तो सेना की नौकरी से इस्तीफा दिया फिर बैथिनी को ले कर इंगलैंड पहुंच गए. हां, अपने विदेश जाने से पहले वह एक बड़ा काम कर गए थे. उन्होंने इस बीच, सब से छोटी बहन का ब्याह कर दिया था. अब 3 भाई कतार में थे कि बड़े भैया ब्याह करें तो उन का नंबर आए. 70 साल की मां की आंखों में बड़े के ब्याह को ले कर इतने सपने भरे थे कि वह पलकें झपकाना भी भूल जातीं. आखिर इंतजार का यह सिलसिला तब टूटा जब उन से छोटे ने अपना जीवनसाथी चुन कर विवाह कर लिया. मां को  इस प्रकार चूल्हा फूंकते हुए भी तो जवान बेटा नहीं देख सकता था. वह भी तब जब बड़ा भाई विदेश चला गया हो.

घर में आई पहली बहू को मां इतना लाड़दुलार कभी नहीं दे पाईं जितना उन्होंने बड़े की बहू के लिए अपनी झोली में समेट कर रखा था. उस बीच बड़े के गुपचुप ब्याह की खबर हवा में तैरती हुई मां के पास न जाने कितनी बार पहुंची लेकिन वह तो बड़े के खिलाफ कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं थीं. बहू दिशा यह सोच कर कि वह अपना फर्ज पूरा कर रही है, अपने में मग्न रहने का प्रयास करती. मां से बडे़ की अच्छाई सुनतेसुनते जब उस के कान पक जाते तो उन की उम्र का लिहाज कर वह खुद ही वहां से हट जाती थी. संस्कारी, सुशिक्षित परिवार की होने के कारण दिशा बेकार की बातों पर चुप्पी साध लेना ही उचित समझती.

वह जब भी विदेश से आते, मां उन के विवाह का ही राग अलापती रहतीं, जबकि कई बार अनेक माध्यमों से उन के कान में बडे़ बेटे के विवाह की बात आ चुकी थी. बाकी सब चुप ही रहते. वही गरदन हिलाहिला कर मां के प्यार को कैश करते रहते. अपने मुंह से उन्होंने ब्याह की बात कभी न कही, न स्वीकारी और पिताजी के बाद तो साहस किस का था जो उन से कोई कुछ पूछाताछी करता. बडे़ भाई के रूप में वह महानता की ऐसी विभूति थे जिस में कोई बुराई हो ही नहीं सकती.

धीरेधीरे सब भाइयों ने विवाह कर लिया. कब तक कौन किस की बाट देखता? सब अपनीअपनी गृहस्थी में व्यस्तत्रस्त थे तो मां की आंखों में बड़े के ब्याह के सपने थे, जबकि वह विदेश में अपनी प्रेयसी पत्नी के साथ मस्त थे. वह जब भी हिंदुस्तान आते तो अकेले. दिखावा इतना करते कि हर भाई को यही लगता कि बडे़ भैया बस, केवल उसी के हैं पर भीतर से निर्विकार वे सब को नचा कर  फिर से उड़ जाते. जब भी उन के हिंदुस्तान आने की खबर आती, सब के मन उड़ने लगते, आंखें सपने बुनतीं, हर एक को लगता इस बार बड़े भैया जरूर उसे विदेश ले जाने की बात करेंगे. आखिर यही तो होता है. परिवार का एक सदस्य विदेश क्या जाता है मानो सब की लाटरी निकल आती है.

लेकिन उन्होंने किसी भी भाई की उंगली इस मजबूती से नहीं पकड़ी कि वह उन के साथ हवाई जहाज में बैठ सके. शायद उन्हें भीतर से कोई डर था कि घर के किसी भी सदस्य को स्पांसर करने से कहीं उन की पोलपट्टी न खुल जाए. गर्ज यह कि वह अपनी प्रिय बैथिनी के चारों ओर ताउम्र घूमते रहे. जब घूमतेघूमते थक जाते तो कुछ दिनों के लिए भारत चले आते थे.

मां की मौत के बाद ही वह बैथिनी को ले कर घर की दहलीज लांघ सके थे. पर अब फायदा भी क्या था? सब के घर अलगअलग थे, सब की अपनी सोच थी और सब के मन में विदेश का आकर्षण, जो बड़े भैया को देखते ही लाखों दीपों की शक्ल में उजास फैलाने लगता.

वर्ष गुजरते रहे और परिवार की दूसरी पीढ़ी की आंखों में विदेश ताऊ के पास जा कर पैसा कमाने के स्वप्न फीके पड़ते रहे. भारत में उन्होंने अपना ‘एन आर आई’ अकाउंट खुलवा रखा था सो जब भी आते बैंक में जा कर रौब झाड़ते. उन के व्यवहार से भी उन के डालर और पौंड्स की महक उठती रहती.

इंगलैंड में भी उन का अच्छाखासा बैंक बैलेंस था. औलाद कोई हुई नहीं. जब तक काम किया, उस के बाद एक उम्र तक आतेआते उन्हें देश की याद सताने लगी. बैथिनी को भारत नहीं आना था और उन्हें विदेश में नहीं रहना था, सो जीवन की गोधूलि बेला में वह एक बार भाई के बेटे के विवाह में विदेश से देश क्या आए वापस न जाने की ठान ली.

भाइयों के पेट में प्रश्नों का दर्द पीड़ा देने लगा. जिस औरत के साथ बड़े भाई ने पूरा जीवन बिता दिया उसे इस उम्र में कैसे छोड़ सकते हैं? अब वह भाइयों के पास ही रहने लगे थे और क्रमश: वह और बैथिनी एकदूसरे से दूर हो गए थे.

अब परिवार के युवा वर्ग की आशा निराशा में बदल चुकी थी. बस, अब तो यह था कि जो उन की सेवा करता रहे, उसी को लड्डू मिल जाए. पर वह तो जरूरत से ज्यादा ही समझदार थे.  अपने हाथों में भरे हुए लड्डुओं की खुशबू जहां रहते वहां हवा में बिखेर देते और जब तक लड्डू किसी को मिलें उन्हें समेट कर वह वहां से दूसरे भाई के पास चल देते.

अब कुछ सालों से उन का स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था, सो उन्हें एक भाई के पास जम कर रहना ही पड़ा. शायद वह समझ नहीं पा रहे थे या मानने को तैयार नहीं थे कि उन्हें अपने शरीर को छोड़ कर जाना होगा. एक ‘एन आर आई’ की अकड़ में वह रहते… ‘एन आर आई’ होने के भ्रम में वह बरसों तक इसी खौफ में सांसें गिनते रहे कि कोई उन्हें लूट लेगा. बैथिनी को कितनीकितनी बार उन की बीमारी की खबर दी गई पर उस का रटारटाया उत्तर रहता, ‘उस को ही यहां पर आना होगा, मैं तो भारत में आने से रही.’ सो न वह गए और न बैथिनी आई.

आज वह पलंग पर लेटेलेटे अपने जीवन को गोभी के पत्तों की तरह उतरता देख रहे हैं. उन्हें आज परत दर परत खुलता जीवन जैसे नंगा हो कर खुले आकाश के नीचे बिखेर रहा है और उन के हाथ में पकड़े लड्डू चूरचूर हो रहे हैं पर उन की बंद मुट्ठी किसी को उस में से एक कण भी देने के लिए तैयार नहीं है.

यों तो हमसब ही शून्य में अपने ऊपर आरोपित तामझामों का लबादा ओढ़े खडे़ हैं, सब ही तो भीतर से नंगे, अपनेआप को झूठे आवरणों में छिपाए हुए हैं. कोई पाने के लालच में सराबोर तो कोई खोने के भय से भयभीत. जिंदगी के माने कुछ भी हो सकते हैं.

बडे़ भैया अब गए, तब गए, इसी ऊहापोह में कई दिन तक छटपटाते रहे पर उन की मुट्ठियां न खुलीं. ‘एन आर आई’ के तमगे को लिपटाए एक शख्स अकेलेपन के जंगल से गुजरता हुआ बंद मुट््ठियों को सीने से लगाए एक दिन अचानक ही शांत हो गया. फिर बैथिनी को बताया गया. फोन पर सुन कर बैथिनी बोली, ‘‘जितनी जल्दी हो सके मुझे डैथ सर्टिफिकेट भेज देना,’’ इतना कह कर फोन पटक दिया गया. भली मानस उस की मिट्टी तो सिमट जाने देती.

खैर, अब बडे़ भैया की अटैचियां खुलने की बारी थी. शायद उन में ही कहीं लड्डू छिपा कर रख गए हों. सभी भाई, भतीजे, बहुएं, बड़े भैया के सामान के चारों ओर उत्सुक दृष्टि व धड़कते दिल से गोल घेरे में बैठेखडे़ थे.

‘‘लो, यह रही वसीयत,’’ एक पैक लिफाफे को खोलते हुए छोटा भाई चिल्लाया.

‘‘लाओ, मुझे दो,’’ बीच वाले ने छोटे के हाथ से लगभग छीन कर पढ़ना शुरू किया…आखिर में लिखा था, ‘मेरी सारी चल और अचल संपत्ति मेरी पत्नी बैथिनी को मिलेगी और इंगलैंड व भारत का सब अकाउंट मैं पहले ही उस के नाम कर चुका हूं.’

अब सभी भाई व उन के बच्चे एक- दूसरे की ओर चोर नजरों से देख कर हारे हुए जुआरियों की भांति पस्त हो कर सोफों में धंस गए थे और शून्य में वहीं बडे़ भैया की ठहाकेदार हंसी गूंजने लगी थी.

मेरा बेटा मोटापे के कारण हीनभावना का शिकार होता जा रहा है, मैं क्या करूं?

मेरा बेटा 14 साल का है और उस का वजन 66 किलोग्राम है. मोटापे के कारण वह हीनभावना का शिकार होता जा रहा है. इतनी सी उम्र में डायबिटीज जांच में उसे प्री डायबिटिक कंडीशन बताई गई है. मुझे अपने बच्चे को ले कर बहुत चिंता रहती है. क्या करूं?

ज्यादातर बच्चों में मोटापा आनुवंशिक कारणों तथा जंक फूड खाने व फिजिकल ऐक्टिविटी न करने के कारण होता है. यदि आप की फैमिली हिस्ट्री में मोटापे की बीमारी है तो बच्चे का खास ध्यान रखने की जरूरत है क्योंकि अधिक बीएमआई बढ़ने पर डायबिटीज का खतरा भी दोगुना हो जाता है. प्रीडायबिटिक होने का मतलब है उस का ग्लूकोस लैवल सामान्य से थोड़ा अधिक और डायबिटीज के स्तर से थोड़ा नीचे है. इसलिए आप को बच्चे की जीवनशैली में स्वास्थ्यवर्धक भोजन व ऐक्सरसाइज को शामिल करना बहुत जरूरी है. यदि फिर भी वजन नियंत्रित नहीं होता है तो बच्चे की बैरिएट्रिक सर्जरी करवाने का भी एक विकल्प है क्योंकि मोटापे के कारण आगे चल कर अन्य कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं.

-डा. कपिल अग्रवाल

डाइरैक्टर, हैबिलाइट सैंटर फौर बैरिएट्रिक ऐंड लैप्रोस्कोपिक सर्जरी

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गर्मियों में बनाएं अचारी चीला रायता और वेज रायता

गर्मियों ने अपना प्रकोप दिखाना प्रारम्भ कर दिया है इन दिनों में धूप और गर्मी के प्रभाव से हमारे शरीर का तापमान भी बढ़ जाता है और शरीर को ठंडा रखने के लिए आहार विशेषज्ञ शीतल पदार्थों के सेवन की सलाह देते हैं.

इन दिनों में पना, शरबत और ज्यूस के साथ साथ रायते भी बहुत स्वास्थ्यप्रद होते हैं. रायते को दही से बनाया जाता है जिसमें पाया जाने वाला लेक्टोवेसिलस बैक्टीरिया पाचन तन्त्र को दुरुस्त रखने का काम करता है.

इसके साथ ही रायते को फल और सब्जी के साथ बनाते हैं जिससे इसकी पौष्टिकता और अधिक हो जाती है. कम केलोरी होने के कारण यह वजन कम करने में भी मददगार होते हैं.

कैसा हो दही

रायता बनाने के लिए घर का जमा दही सर्वोत्तम होता है. दही जमाने के लिए 1 लीटर गुनगुने दूध में 1/2 टीस्पून जामन अर्थात दही डालकर अच्छी तरह चलायें. इसे ढककर गर्म स्थान पर रखें, गर्मियों में 5-6 घंटे में दही जमकर तैयार हो जाता है. फ्रिज में रखे और खट्टे दही की अपेक्षा ताजे दही से रायता बनाना अधिक स्वास्थ्यप्रद होता है यदि आपको रायता बनाने के लिए गाढ़ा दही चाहिए तो महीन छलनी को एक कटोरे के ऊपर रख दें और इसमें दही डाल दें 4-5 घंटे के बाद पानी कटोरे की तली में आ जायेगा और गाढे दही को छलनी से निकालकर इससे आप मनचाहा रायता बना सकतीं हैं.

  1. अचारी चीला रायता
  • कितने लोगों के लिए 6
  • बनने में लगने वाला समय 30 मिनट
  • मील टाइप वेज
  • सामग्री (चीला के लिए)
  • बेसन 1 कप
  • सूजी 1/4 कप
  • नमक 1/4 टीस्पून
  • अदरक हरी मिर्च पेस्ट 1/4 टीस्पून
  • तेल 1 टीस्पून
  • सामग्री(रायते के लिए)
  • ताजा दही 500 ग्राम
  • मिर्च के अचार का मसाला 1 टीस्पून
  •  चाट मसाला                         1/4 टीस्पून
  • बारीक कटा हरा धनिया 1 टीस्पून
  • सामग्री (बघार के लिए)
  • सरसों का तेल 1/4 टीस्पून
  • करी पत्ता 4-5 पत्ती
  • राई के दाने 1/8 टीस्पून

विधि

चीले की समस्त सामग्री को एक बाउल में अच्छी तरह घोल लें. अब एक नॉनस्टिक पैन में चिकनाई लगाकर एक बड़ा चम्मच चीले का मिश्रण फैलाएं. धीमी आंच पर सुनहरा होने तक सेंक लें. इसी प्रकार सारे चीले तैयार कर लें. तैयार चीलों को 1 इंच के छोटे टुकड़ों में काट लें. दही को अचार का मसाला, और चाट मसाला डालकर अच्छी तरह चलाएं और चीले के कटे टुकड़े डालकर हरा धनिया डालकर सर्व करें.

  1. मिक्स वेज रायता

कितने लोगों के लिए               6

बनने में लगने वाला समय         30 मिनट

मील टाइप                             वेज

सामग्री

  • ताजा दही                           500 ग्राम
  • बारीक कटी लाल, पीली, हरी शिमला मिर्च 1कप
  • बारीक कटा प्याज 1
  • बारीक कटा हरा धनिया 1 टीस्पून
  • बारीक कटी हरी मिर्च 2
  • उबला कटा आलू 1
  • कटा पत्तागोभी          1/4 कप
  • तेल 1/2 टीस्पून
  • राई के दाने 1/8 टीस्पून
  • काला नमक 1/2 टीस्पून
  • काली मिर्च पाउडर 1/4 टीस्पून
  • भुना जीरा पाउडर 1/4 टीस्पून

सामग्री (बघार के लिए)

  • सरसों का तेल 1/2 टीस्पून
  • जीरा 1/4 टीस्पून
  • हींग 1 चुटकी
  • विधि

एक नॉनस्टिक पैन में तेल डालकर राई के दाने डालें और आलू छोड़कर सभी सब्जियां डाल दें. नमक डालकर बिना ढके 4-5 मिनट तक चलाएं जैसे ही सब्जियां हल्की सी नरम हो जाएं तो गैस बंद कर दें. जब सब्जियां पूरी तरह ठंडी हो जाएं तो फेंटे दही में मिलाएं. उबला आलू, काली मिर्च, भुना जीरा और काला नमक मिलाएं. तड़का पैन में तेल गरम करें हींग, जीरा तड़काकर रायते में मिलाएं. बारीक कटे हरे धनिए से गार्निश करके सर्व करें.

रखें इन बातों का भी ध्यान

  • रायते के लिए सदैव ताजे दही का ही प्रयोग करें.
  • पाइनएप्पल का रायता बनाते समय या तो बाजार में उपलब्ध टिंण्ड पाइनेपल का प्रयोग करें अथवा पाइनएप्पल को चीनी डालकर उबाल लें फिर रायता बनाएं कच्चा पाइनएप्पल दही में डाले जाने पर दही को कड़वा कर देता है.
  • फ्रूट रायता बनाने के लिए हंग कर्ड का प्रयोग करना बेहतर होता है.
  • रायते में नमक सर्व करते समय ही डालें अन्यथा रायता सर्व करते समय तक खट्टा हो जाएगा.
  • खट्टे और रखे दही को हंग कर्ड बनाकर प्रयोग करें इससे उसका खट्टापन काफी हद तक कम हो जाएगा, इसे पतला करने के लिए पानी का प्रयोग करें.
  • यदि आपका रायता अधिक मात्रा में बच गया है तो इसमें सूजी मिलाकर इड्ली या उत्तपम बना लें.

Summer Special: 6 टिप्स- गर्मी में नवजात की देखभाल करें ऐसे

नवजातों के लिए गर्मी का मौसम बेहद असहनशील होता है, क्योंकि पहली बार वे ऐसे माहौल से रूबरू होते हैं. तेज आवाज में और लगातार रोने, खूब पसीना निकलने, बाल गीले होने, लाल गाल और तेज सांस लेने जैसे लक्षण इस बात के संकेत हैं कि बच्चा अत्यधिक गर्मी से परेशान हो रहा है. ओवर हीटिंग गर्मी में डायरिया का प्रत्यक्ष कारण होता है, जो कई नवजातों के लिए घातक भी हो सकता है.

  1. धूप से बचाएं

गर्मी के मौसम में नवजातों को धूप की सीधी किरणों से दूर रखें. 6 माह से कम उम्र के नवजातों की त्वचा में सूर्य की नुकसानदेह किरणों से सुरक्षा के लिए बहुत कम मैलानिन होता है. मैलानिन ऐसा पिगमैंट होता है, जो त्वचा, आंखों और बालों को रंगत प्रदान करता है. लिहाजा, मैलानिन के अभाव में सूर्य की किरणें त्वचा की कोशिकाओं को स्थाई रूप से भी क्षतिग्रस्त कर सकती हैं.

2. तेल मालिश करें

शरीर की मालिश बच्चे के विकास में मददगार होती है. उचित मालिश से बच्चे के टिशू और मांसपेशियां खुलती हैं और इस से उस का सही विकास होता है. बच्चे की नाजुक त्वचा को सब से अच्छी तरह सूट करने वाले तेल का चयन जहां अनिवार्य है, वहीं यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस से चिपचिपाहट न हो. तेल की जगह मसाजिंग लोशन और क्रीम भी इस्तेमाल की जा सकती है. नहलाते समय इस की पूरी मात्रा बच्चे के शरीर से धुल जाए, क्योंकि तेल बच्चे की स्वेदग्रंथि को अवरुद्ध कर सकता है.

3. टब में स्नान कराएं

गर्मी से छुटकारा पाने का सर्वोत्तम उपाय है स्नान कराना. वैसे हर बार स्नान कराने से बेहतर होता है कि बच्चे को गीले कपड़े से पोंछती रहें. लेकिन जब बच्चा तेज गर्मी के कारण व्याकुल हो रहा हो, तो उसे भरे टब में स्नान कराएं. इस में पानी का तापमान कुनकुना रहना चाहिए.

4. टैल्कम पाउडर

टब में नहलाने के बाद बच्चे के शरीर पर टैल्कम पाउडर लगाना अच्छा माना जाता है. जहां कुछ बच्चों को हीट रैश कम करने में टैल्कम पाउडर का इस्तेमाल उपयोगी होता है, वहीं कुछ में इस से स्थिति और बिगड़ जाती है. अत: अपनी हथेली पर थोड़ाथोड़ा पाउडर ले कर उस की त्वचा पर लगाएं, उस पर बुरकें नहीं.

5. नियंत्रित तापमान

बच्चे को 16 से 20 डिग्री तापमान के अंदर ही रखें. उस के कमरे को दिन में ठंडा रखने के लिए परदे लगा कर कमरे में अंधेरा करें. पंखा औन रखें. बच्चे को एअरकंडीशनर के सीधे संपर्क में कभी न रखें, क्योंकि इस से उसे जुकाम भी हो सकता है.

6. उपयुक्त पोशाक

मां अकसर दुविधा में रहती हैं कि बच्चे को कैसी पोशाक पहनाई जाए. मिथक के अनुसार नवजातों को खूब सारे गरम कपड़ों में रखना चाहिए, क्योंकि मान्यता है कि गर्भ से बाहर का तापमान अंदर के तापमान से ठंडा रहता है. लेकिन गर्मी के मौसम में उन के कपड़ों की परत कम करते हुए उन्हें हलके कपड़ों में रख सकती हैं. उन्हें ढीलेढाले सूती वस्त्र पहनाएं ताकि उन की त्वचा में हवा का प्रवाह बना रहे और वे आराम महसूस कर सकें. सूती वस्त्र बच्चों के लिए लाभकारी होते हैं, क्योंकि इन में हवा भी अच्छी तरह प्रवेश हो जाती है और ये पसीना भी सोखने की क्षमता रखते हैं. बच्चे को हीट स्ट्रोक से बचाने के लिए धूप में बाहर ले जाते समय उसे हैट जरूर पहनाएं.

– डा. कृष्ण यादव, पारस ब्लिस हौस्पिटल, पंचकूला 

आधी अधूरी प्रेम कहानी

लौक डाउन का दूसरा चरण देश में चल रहा था. नर्मदा नदी पुल पर बने जिस चैक पोस्ट पर मेरी ड्यूटी जिला प्रशासन ने लगाई थी,वह दो जिलों की सीमाओं को जोड़ती थी. मेरे साथ ड्यूटी पर पुलिस के हबलदार,एक पटवारी ,गाव का कोटवार और मैं निरीह मास्टर.आठ आठ घण्टे की तीन शिफ्ट में लगी ड्यूटी में हमारा समय सुबह 6 बजे से लेकर दोपहर के 2 बजे तक रहता.आठ घंटे की इस ड्यूटी में जिले से बाहर आने जाने वाले लोगों की एंट्री करनी पड़ती थी. यदि कोई कोरोना संक्रमण से प्रभावित क्षेत्रों से जिले की सीमा में प्रवेश करता,तो तहसीलदार को इसकी सूचना दी जाती और यैसे लोगों की जांच कर उन्हें कोरेन्टाईन में रखा जाता. म‌ई महिने की पहली तारीख को मैं ड्यूटी के लिए सुबह 6 बजे ककरा घाट पर बनी चैक पोस्ट पर पहुंच गया था.
नर्मदा नदी के किनारे एक खेत पर एक किसानअपनी मूंग की फसल में पानी दे रहा था . काम करते हुए उसकी नजर नदी की ओर ग‌ई ,तो उसे नदी में कोई भारी सी चीज बहती हुई किनारे की तरफ आती दिखाई दी. थोड़ा करीब जाने पर किसान ने एक दूसरे से लिपटे युवक युवतियों को देखा तो चैक पोस्ट की ओर जोर से आवाज लगाई
” मुंशी जी दौड़ कर आइए ,ये नदी में देखिए लड़का लड़की बहते हुये किनारे लग गये हैं”
मेरे साथ ड्यूटी कर रहे पुलिस थाना के हबलदार बैनीसिंह ने आवाज सुनकर पुल से नीचे की तरफ दौड़ लगा दी. सूचना मिलने पर पुलिस टीम भी मौक़े पर आ ग‌ई . आस पास के लोगों की भीड़ नदी किनारे इकट्ठी हो गई, मुझसे भी रह नहीं गया . तो मैं भी नदी के घाट परपहुंच गया . सबने मिलकर आपस में एक दूसरे से लिपटे दोनों लड़का-लड़की के शव को नदी से निकाल कर किनारे पर कर दिया . जैसे ही उनके चेहरे  पर मेरी नजर गई तो मैं दंग रह ग‌या.

दरअसल नर्मदा नदी में मिले ये दोनों शव दो साल पहले मेरे स्कूल में पढ़ने वाले सौरभ और नेहा के ही थे ,जो दिन पहले ही रात में घर से भागे थे. गाव में जवान लड़का, लड़की के भागने की खबर फैलते ही लोग तरह-तरह की बातें करने लगे थे. नेहा के मां वाप का तो‌‌ रो रोकर बुरा हाल था. गांव में जाति बिरादरी में उनकी इज्जत मुंह दिखाने लायक नहीं बची थी. हालांकि दो साल से चल रहे दोनों के प्रेम प्रसंग चर्चा का विषय बन गये थे.पुलिस लाशों के पंचनामा और अन्य कागजी कार्रवाई में जुटी थी और मेरे स्मृति पटल पर स्कूल के दिनों की यादें के एक एक पन्ने खुलते जा रहे थे.

सौरभ और नेहा स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही एक दूसरे को पसंद करने लगे थे. सौरभ बारहवीं जमात में और नेहा दसवीं जमात में पढते थे. स्कूल में शनिवार के दिन बालसभा में जीवन कौशल शिक्षा के अंतर्गत किशोर अवस्था पर डिस्कशन चल रहा था. जब सौरभ ने विंदास अंदाज़ में बोलना शुरू किया तो सब देखते ही रह गये.  सौरभ ने जब बताया कि किशोर अवस्था में लड़के लड़कियों में जो शारीरिक परिवर्तन होते हैं, उसमें गुप्तांगों के आकार बढ़ने के साथ बाल उग आते हैं.लड़को के लिंग में कड़ा पन आने लगता हैऔर लड़कियों के वक्ष में उभार आने लगते हैं .लड़का-लड़की एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने लगते हैं.  हमारे बुजुर्ग शिक्षक जो दसवीं जमात के विज्ञान का जनन वाला पाठ पढ़ाने में संकोच करते हैं ,वे बालसभा छोड़ कर चले गये. लड़को को सौरभ के द्वारा बताई जा रही बातों में मजा आ रहा था, तो क्लास की लड़कियों के शर्म के मारे सिर झुके जा रहे थे.  17साल की  नेहा को सौरभ की बातें सुनकर गुदगुदी हो रही थी, लेकिन जब उसका बोलने का नंबर आया तो उसने भी खडे होकर बता दिया-
“लड़कियों को भी किशोरावस्था में पीरियड आने लगते है”
सौरभ और नेहा के इन विंदास बोल ने उन्हें स्कूल का आयडियल बना दिया था.

सौरभ स्कूल की पढ़ाई के साथ ही सभी प्रकार के फंक्शन में भाग लेता और नेहा उसके अंदाज की दीवानी हो गई.स्कूल में पढ़ाई के दौरान नेहा और सौरभ एक दूसरे से मन ही मन प्यार कर बैठे. दोनों के बीच का यह प्यार इजहार के साथ जब परवान चढ़ा तो मेल मुलाकातें बढ़ने लगी और दोनों ने एक दूजे के साथ जीने मरने की कसमें खा ली . इसी साल सौरभ कालेज की पढ़ाई के लिए सागर चला गया तो नेहा का  स्कूल में मन ही नहीं लगता.मोबाइल फोन के जरिए सौरभ और नेहा  आपस में बात करने लगे. सौरभ जब भी गांव आता तो लुक छिपकर नेहा से मिलता और पढ़ाई पूरी होते ही शादी करने का बादा करता  .

कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिये लगे लौक डाउन के तीन दिन पहले कालेज की छुट्टियां होने पर सौरभ सागर से गांव आ गया था . गांव वालों की नजरों से बचकर नेहा और सौरभ जब आपस में मिलते तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता. नेहा सौरभ से कहती-” अब तुम्हारे बिना गांव में मेरा दिल नहीं लगता”
सौरभ नेहा को अपनी बाहों में भरकर दिलासा देता,” सब्र करो नेहा , मेरी पढ़ाई खत्म होते ही हम शादी कर लेंगे”. नेहा सौरभ के बालों में हाथ घुमाते हुए कहती-
” लेकिन सौरभ घर वालों को कैसे मनायेंगे” .
सौरभ नेहा के माथे पर चुंबन देते हुए कहता-
“नेहा घर वालों को भी मना लेंगे,आखिर हम एक ही जाति बिरादरी के हैं”
सौरभ के सीने से लिपटते हुए नेहा कहती

” सौरभ यदि हमारी शादी नहीं हुई तो मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगी”.
सौरभ ने उसके ओंठों को चूमते हुए आश्वस्त किया
“नेहा हमार प्यार सच्चा है हम साथ जियेंगे, साथ मरेंगे”
साथ जीने मरने की कसमें खाने वाले नेहा और सौरभ को एक दिन आपस में बात करते नेहा के पिता  ने देख लिया तो परिवार में बबाल मच गया .घर वालों ने समाज में अपनी इज्जत का वास्ता देकर नेहा को डरा धमकाकर समझाने की कोशिश की. नेहा ने घर वालों से साफ कह दिया कि वह तो सौरभ से ही शादी करेंगी.सौरभ के दादाजी को जब इसका पता चला तो दादाजी आग बबूला हो गये.कहने लगे” आज के लडंका लड़कियों में शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं है.ये शादी हरगिज नहीं होगी.जिस लड़की में लाज शरम ही नहीं है, उसे हम घर की बहू नहीं बना सकते.”
सौरभ को जब दादाजी के इस निर्णय का पता चला तो वह भी ‌तिलमिला कर‌रह गया.

अब घर परिवार का पहरा  नेहा और सौरभ पर गहराने लगा था. एक दूजे के प्यार में पागल दोनों प्रेमी घर पर रहकर तड़पने लगे .और एक रात उन्होंने बिना सोचे समझे घर से भाग जाने का फैसला कर लिया.  योजना के मुताबिक वे अपने घरों से रात के दो बजे  मोटर साइकिल पर सवार होकर गांव से निकल तो गये, लेकिन लौक डाउन में जगह-जगह पुलिस की निगरानी से इलाके से दूर न जा सके.

दूसरे दिन सुबह  जब नेहा घर के कमरे में नहीं मिली तो घर वालों के होश उड़ गए .  सौरभ के वारे में जानकारी मिलने पर पता चला कि वह भी घर से गायब है,तो उन्हें यह समझ आ गया कि दोनों एक साथ घर से गायब हुए हैं. गांव में समाज के मुखिया और पंचो ने बैठक कर यह तय किया कि पहले आस पास के रिश्तेदारों के यहां उनकी खोज बीन कर ली जाए , फिर पुलिस को सूचना दी जाए. शाम तक जब दोनों का कोई पता नहीं चला ,तो घर वालों ने पुलिस थाना मे गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

अपने वेटे की तलाश में जुटे सौरभ के पिता ने तीसरे दिन की सुबह अपने मोबाइल  पर आये सौरभ के मेसेज को देखा तो उन्हें कुछ आशा की किरण दिखाई दी. मैसेज बाक्स को खोलकर वे मैसेज पढ़ने लगे . मैसेज में सौरभ ने लिखा था
” मेरे प्यारे मम्मी पापा,
हमारी वजह से आपको बहुत दुःख हुआ है, इसलिए हम हमेशा के लिए आपसे दूर जा रहे हैं.   नर्मदा नदी के ककरा घाट के किनारे मोटर साइकिल ,और मोबाइल रखे हैं.इन्हे ले जाना अलविदा”.

तुम्हारा अभागा वेटा
सौरभ

उधर नेहा के भाई के मोबाइल के वाट्स ऐप पर नेहा ने गुड बाय का मैसेज  सेंड किया था. जब दोनों के घर वाले मैसेज में बताई गई जगह पर पहुंचे तो वहां  मोटरसाइकिल खड़ी थी . उसके पास दो मोबाइल, गमछा, चुनरी और जूते चप्पल रखे थे. पुलिस की मौजूदगी में वह सामान जप्त कर नदी के किनारे और नदी में भी तलाशी की गई, लेकिन नेहा और सौरभ का दूर दूर तक कोई पता नहीं था.
घर वाले और पुलिस टीम दोनों की तलाशी में रात दिन जुटे हुए थे ,तभी म‌ई की एक तारीख को सुबह सुबह दोनों के शव नदी में उतराते मिले थे.

” मास्साब यै लोग इंदौर से आ रहे हैं ,इनकी एंट्री करो” पटवारी की आवाज सुनकर मैने देखा एक कार चैक पोस्ट पर जांच के लिए खड़ी थी . यादों के सफर से मैं वापस आ गया था . झटपट कार का नंबर नोट कर मुंह और नाक पर मास्क चढाकर उसमें सवार लोगों के नाम पता नोट कर लिए थे . कार के जाते ही हाथों पर सेनेटाइजर छिड़क कर हाथों को अच्छी तरह रगड़ कर अपने काम में लग गया.
उधर पोस्ट मार्टम के बाद सौरभ और‌ नेहा के शव को गांव में अपने अपने घर लाया गया और उनके अंतिम संस्कार में पूरा गांव उमड़ पड़ा था.  अस्सी साल की उमर पार कर चुके सौरभ के दादाजी पश्चाताप की आग में जल रहे थे.अपनी झूठी शान की खातिर युवाओं के सपनों को चूर चूर कर जबरदस्ती समाज के कायदे कानून थोपने के अपने निर्णय से दुःख भी हो रहा था.

मुझे भी सौरभ और नेहा की इस अधूरी प्रेम कहानी ने दुखी कर दिया था.  स्कूल की बालसभा में बच्चों को किशोरावस्था में समझ और धैर्य से काम ‌लेने और सोच समझकर निर्णय लेने की शिक्षा देने के बावजूद भी जवानी के‌ जोश में होश खो देकर अपनी जीवन लीला खत्म करने वाले इस प्रेमी जोड़े के निर्णय पर वार अफसोस भी हो रहा था. मुझे लग रहा था कि  काम धंधा जमाकर पहले सौरभ अपने पैरों पर खड़ा होता  और‌ लौक डाउन खत्म होते ही नेहा के साथ  कानूनी तौर पर शादी करता तो शायद ये प्रेम कहानी आधी अधूरी न रहती.

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