Holi 2023: होली अपने घर पर बनाएं मावा गुझिया

होली के त्योहार पर घर में गुझिया न बने ऐसा हो ही नहीं सकता .गुझिया एक बहुत ही पारम्परिक मिठाई है जिसे होली के अवसर पर जरूर बनाया जाता है. वैसे तो गुझिया बनाना कोई कठिन काम नहीं है पर हाँ इसे बनाने में समय जरूर लगता है.

गुझिया में कलौरी भरपूर मात्रा में होती है. इसलिए इसे खाने के साथ साथ अपनी सेहत का ख्याल जरूर रखें .

वैसे तो गुझिया बहुत तरह की बनायीं जाती है पर आज हम बनायेंगे मावा और मेवा की गुझिया .जो स्वादिष्ट होने के साथ साथ सेहत से भरपूर है.चलिए बनाते है मावा गुझिया-

हमें चाहिए (25-30 गुझिया के लिए)-

मैदा – 2 कप (250 ग्राम)

घी – 1/4 कप (60 ग्राम)

मावा – 250  ग्राम

चिरौंजी -2 बड़े चम्मच

बूरा या पिसी हुई चीनी – 3/4 कप (150 ग्राम)

बादाम – 10 से 12 (बारीक कटे हुए)

काजू – 10 से 12 (बारीक कटे हुए)

सूखा नारियल – 1/3 कप (कद्दूकस किया हुआ)

किशमिश – 1 टेबल स्पून

इलायची – 6 से 7

घी या रिफाइंड  – तलने के लिए

बनाने का तरीका-

1- गुझिया बनाने के लिए सबसे पहले एक थाली में मैदा  और हल्का गरम (पिघला)  घी लें .घी को मैदे में अच्छे से मिलाकर हथेली से रगड़े .घी को मैदे में अच्छे से मिलाने के बाद आप देखेंगे की मैदे को मुट्ठी में भरने से लड्डू जैसा बंध जायेगा .यह इस बात की पहचान है की मोयन एकदम सही मात्रा में है.अब  पानी डालकर थोड़ा सख्त आटा गूंथ लें. 15 मिनट के लिए सूती गीले कपड़े से आटे को ढककर रख दें.

2-अब एक कटोरी में एक बड़ा चम्मच मैदा लेकर उसमे एक बड़ा चम्मच पानी मिलाकर पतला घोल तैयार कर लीजिये .मैदे के इस घोल को हम गुझिया को बन्द करने में इस्तेमाल करेंगे.

stuffing के लिए

1-फीलिंग बनाने के लिए एक नॉनस्टिक पैन में खोया डालकर 3 मिनट के लिए  भूनें ले . फिर इसे ठंडा होने के लिए एक साइड रख दें.अब इसी पैन में घिसे हुए नारियल को भी 1 मिनट के लिए भून लें .

2 -इसके बाद इसमें चीनी का बूरा ,बारीक कटा हुआ बादाम,काजू,किसमिस,चिरौंजी ,इलाइची और भुना हुआ नारियल डाल कर अच्छे से मिला लें .

3-अब मैदे की छोटी-छोटी लोईयां बनाकर पूरियों के आकार में बेल लें. अब इसके बीच में तैयार की हुई फीलिंग भरकर किनारों पर तैयार किया हुआ घोल  लगाकर अच्छे से बंद कर दें और गुजिया की शेप दें.(आप चाहे तो पूरी की शेप में बिली हुई लोई को साचे के बीच में रखकर इसके चारों तरफ मैदे का घोल लगाकर बीच में फिलिंग भरकर सांचे को बन्द कर दे .फिर सांचे को अच्छे से दबाने के बाद सांचा खोल कर उसमे से गुझिया निकाल ले .)

4 –इसी प्रकार से सभी गुझिया को भरकर बना लें.एक बात का और ध्यान रखे की भरी हुई गुझिया को हलके गीले कपडे से ढककर रखें जिससे गुझिया सूखे नहीं.

5-अब एक कढाई में धीमी आंच पर रिफाइंड या घी गरम करें.अब इसमें हलके से 3-4 गुझिया डाले .ज्यादा गुझिया एक साथ डालने की जरूरत नहीं है.

6-अब गुझिया को घी में डालने के बाद उसे धीरे से पलटे .  गुझिया को गोल्डन ब्राउन होने तक डीप फ्राई करें.

7-तली हुई गुझिया को किचन पेपर पर निकाल लें.तैयार है स्वादिष्ट गुझिया.

8 – जब गुजिया पूरी तरह ठंडी हो जाए तो इसे आप एयरटाइट कंटेनर में भरकर रख सकते हैं.

Women’s Day: श्यामली- जब श्यामली ने कुछ कर गुजरने की ठानी

‘श्यामली बुटीक’ लखनऊ शहर में किसी परिचय का मुहताज नहीं था. होता भी क्यों, क्योंकि श्यामलीजी के जीवन का मोटो था कि अपने काम में परफैक्शन. इसी लक्ष्य के कारण कुछ वर्षों में ही उन का बुटीक शहर का सब से अच्छा बुटीक बन गया.

श्यामलीजी की मीठी, मधुर आवाज और चेहरे पर खिली मुसकान के साथ कस्टमर की पसंद को समझते हुए समय पर काम पूरा कर के वे उन्हें खुश कर देती थीं.

अब तो उन की बेटी राशि भी फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर के आ गई थी और बुटीक में उन का हाथ बंटा रही थी. बेटा शुभ अमेरिका पढ़ने गया तो वहीं का हो कर रह गया.

सोम उन के बुटीक के मैनेजर बन गए थे. उन के बालों की चांदनी, आंखों में चश्मा और थकती काया उन से रिटायरमैंट का इशारा करती दिखाई देती थी.

रात के 8 बजने वाले थे. श्यामलजी बुटीक बंद करवाने की सोच ही रही थीं कि दौड़तीहांफती वन्या उन के सामने आ कर खड़ी हो गई. फिर बोली, ‘‘मैम, मेरा लहंगा रैडी है?’’

‘हां…हां… आप ट्रायल कर लो, तो मैं फिनिशिंग करवा दूं.’

वन्या ट्रायलरूम में लहंगा पहन कर बाहर आते ही उन से लिपट कर बोली, ‘‘थैंक्यू मैम, आप के हाथ में जादू है.’’

वन्या की मां प्रज्ञा ने अपने बैग से कार्ड निकाला और फिर उन्हें देती हुए बोलीं, ‘‘दी, आप को शादी में जरूर आना है.’’

श्यामलीजी ने कार्ड को खोल कर देखते हुए कहा, ‘‘वैरी नाइस कार्ड.’’

‘‘7 दिसंबर… वाह जरूरी आऊंगी.’’

7 दिसंबर तारीख देखते ही श्यामलीजी अपने अतीत में खो गईं. पुरानी यादें चलचित्र की तरह उन की आंखों के सामने सजीव हो उठीं…

लखनऊ के पास सुलतानपुर एक छोटा सा शहर है. वे वहां रहती थीं. 3 बहनों और 2 भाइयों में वे सब से बड़ी थीं. पढ़ाई से अधिक सिलाईकढ़ाई में रुचि थी. जब वे छोटी थीं, तभी मां के दुपट्टे या साड़ी से अपनी गुडि़या के लिए तरहतरह के डिजाइनर लहंगे और दूसरी पोशाकें बनाया करती थीं.

ये सब देख कर मां कहतीं कि तुम्हें फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करवा देंगे. बीए पास करने के बाद फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर लिया. पापा को शादी की फिक्र होने लगी थी. उन के पास दहेज देने के लिए बड़ी रकम तो थी नहीं. वे नैट पर लड़कों का प्रोफाइल देखने में लगे रहते थे.

श्यामली का चेहरा गोल था, रंग गेहुंआ, लेकिन कटीले नैननक्श की वे नाजुक सी आकर्षक लड़की थीं. चचंल चितवन और प्यारी सी मुसकराहट सब को आकर्षित कर लेती. वे खाना बहुत अच्छा बनातीं इसलिए अपने पापा की अन्नपूर्णा थीं.

पापा को सोम का प्रोफाइल पसंद आया था. उन्होंने उन का बायोडाटा और छोटा सा फोटो उन के पिता के पास भेज दिया. सोम के पिता का लखनऊ के अमीनाबाद में खूब चलता हुआ बड़ा सा मैडिकल स्टोर था. अच्छाखासा संपन्न परिवार और साथ में इकलौता बेटा तो सोने में सुहागा जैसा था.

सोम के पिता केशवजी के फोन ने उन के घर में खुशियों की हलचल मचा दी. उन्होंने मेल आईडी मांगी. बस फिर शुरू हो गई थी सोम के साथ चैटिंग. सोम की प्यारभरी मीठीमीठी बातों ने श्यामलीजी के दिल के तार झंकृत कर दिए.

जल्दी ही शादी की शहनाइयां बज उठीं. वे अपने मन में सुनहरे भविष्य के रंगबिरंगे सपने संजो कर सोम का हाथ पकड़ कर उन की बड़ी सी कोठी में प्रवेश कर गईं. वे खुशी से फूली नहीं समा रही थीं.

सोम की बांहों के घेरे में सिमट कर वे विश्वास ही नहीं कर पा रहीं थीं कि उन की दुनिया इतनी हसीन भी हो सकती है.

श्यामली सोम के प्यार में डूबी थीं, लेकिन उन का रवैया कुछ समझ नहीं आ रहा था. 1-2 महीनों में उन्हें थोड़ा बहुत इशारा मिल गया कि सोम दुकान पर केवल पैसा लेने जाते और फिर दोस्तों के साथ सिगरेट, शराब और लड़कियों की संगत में ऐश की लाइफ जीने के शौकीन हैं.

सोम बातबात पर उन्हें डांट देते थे, इसलिए वे उन से डरने लगी थीं. एक शाम सोम ने उन से क्लब चलने के लिए तैयार होने को कहा. वे अपने कमरे में तैयार हो रही थीं. तभी उन्हें सोम की पापा के साथ जोरजोर की कहासुनी की आवाजें सुनाई देने लगीं.

सोम के चेहरे पर तनाव देख कर उन्होंने उन से पूछा भी था कि क्या बात है? पापा क्यों नाराज हो रहे थे? इस पर सोम का जवाब था कि अपने काम से काम रखा करो.

उस दिन श्यामलीजी बड़े मन से तैयार हुई थीं. ब्लैक साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही थीं.

ट्रैफिक में फंस जाने के कारण वे लोग क्लब काफी देर से पहुंचे. वहां कौकटेल पार्टी चल रही थी. सैक्सी ड्रैसेज पहनी महिलाओं के हाथ में डिं्रक के गिलास थे. श्यामली घबरा कर सोम के पीछे छिपने लगी थीं. उन के लिए वहां का माहौल एकदम से नया और अजीब सा था.

सोम के मित्र अतुल ने उन्हें ड्रिंक का गिलास औफर किया. श्यामलीजी ने घबरा कर कहा, ‘‘मैं ड्रिंक नहीं करती.’’

सोम ने गिलास ले कर जबरदस्ती उन के मुंह में लगा दिया, ‘‘छोड़ो भी यह बी ग्रेड देहाती मैंटेलिटी. अब तुम रईसों वाले शौक करो और ऐश की जिंदगी जीयो.’’

श्यामलीजी की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी. वे कोने में जा कर बैठ गईं. नौनवैज खाना देख खाने के पास भी नहीं गईं.

उस दिन उन के कारण सोम को अपनी बेइजती महसूस हुई थी. वे सारे रास्ते उन्हें भलाबुरा कहने के साथसाथ गालियां भी देते रहे थे.

इतनी गालीगलौज के बाद भी वे श्यामलीजी के तन को रौंदना नहीं भूले थे. वे रातभर सिसकती रही थीं. समझ नहीं पा रही थीं कि उन्हें ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए. अगली सुबह सब कुछ उलटपुलट कर उन के जीवन में अघटित घट गया. पापाजी रात में सोए तो उन्होंने सुबह आंखें ही नहीं खोलीं. सब कुछ बदल चुका था. मम्मीजी श्यामलीजी को अपशगुनी कहकह कर रो रही थीं. उन की शादी को अभी मात्र 2 महीने ही हुए थे.

नातेरिश्तेदारों की भीड़ के सामने मम्मीजी का एक ही प्रलाप जारी रहता कि बिना दानदहेज की तो बहू लाए और वह भी ऐसी आई कि मेरी जड़ ही खोद दी. इस ने तो हमें बरबाद कर दिया.

यह ठीक था कि सोम दुखी थे, लेकिन वे मम्मीजी को चुप भी तो करा सकते थे, परंतु नहीं. वे उन से खिंचेखिंचे से रहते, लेकिन रात में उन के शरीर पर उन का पूरा अधिकार होता. उन की इच्छाअनिच्छा की परवाह किए बिना वे अपनी भूख मिटा कर करवट बदल कर खर्राटे भरने लगते.

श्यामलीजी उदास और परेशान रहतीं, क्योंकि वहां उन का अपना कोई न था, जिस से वे अपने मन का दर्द कह सकें.

उन्हीं दिनों उन के शरीर के अंदर नवजीवन का स्फुरण होने लगा. वे समझ नहीं पा रही थीं कि हंसे या फूटफूट कर रोए. विद्रोह करने की न ही प्रवृत्ति थी और न ही हिम्मत. वे अपनी शादी को टूटने नहीं देना चाहती थीं. वे रिश्तों को निभाने में विश्वास रखती थीं. दोनों की इज्जत का समाज में मजाक नहीं बनने देना चाहती थीं. सोम मैडिकल स्टोर में बिजी हो गए थे. वे कभी नहीं सोच पाए कि श्यामलीजी का भी कोई अरमान या इच्छा होगी. वे भी प्यार और सम्मान की चाहत रखती होंगी. वे तो स्वचालित मशीन बन गई थीं,  जिस का काम था- मम्मीजी और सोम को हर हाल में खुश रखना. कोई आएजाए जो उस का आदरसम्मान और सेवा करना.

उन्होंने सुबह से शाम तक अपने को घर के कामों में झोंक दिया था. जो भी खाना बनातीं सोम को पसंद नहीं आता. कहते कि यह क्या खाना बनाया है? मुझे तो मटरपनीर की सब्जी खानी है. फिर वे थके कदमों से रात के 11 बजे सब्जी बनाने में जुट जातीं.

जब भी मम्मीपापा उन से मिलने को आए या घर ले जाने की बात की तो मम्मीजी ने ऐसा लाड़प्यार और उन की अनिवार्यता दिखाई कि उन लोगों को यह महसूस हुआ कि वे लोग धन्य हैं, जिन की बेटी को इतना संपन्न और प्यार करने वाला पति और परिवार मिला है.

वे अपनी मां के कंधे पर अपना सिर रख कर अपना मन हलका करना चाहती थीं, लेकिन मम्मीजी और सोम ने ऐसा जाल बिछाया कि एक पल को भी उन्हें मां के साथ अकेले नहीं बैठने दिया.

गोद में राशि के आने के सालभर बाद ही शुभ आ गया. उन की व्यस्तता जिम्मेदारियों के कारण बढ़ गई थी. वे घरगृहस्थी और बच्चों में उलझती गई थीं.

जब कभी सोम उन का अपमान करते या भलाबुरा कहते तो उन्हें अपने पर बहुत क्रोध आता कि क्यों वे ये सब सह रही हैं. क्या बच्चे केवल उन के हैं? आखिर बीज तो सोम का ही है.

सोम के लिए तो अब वे मात्र तन की भूख मिटाने की जरूरत बन कर रह गई थीं. सोम ने स्टोर पर कुछ काम बढ़ा लिया था. मैन काउंटर की डिस्ट्रीब्यूटरशिप ले ली थी. इसलिए और ज्यादा बिजी रहने लगे थे.

स्टोर पर कंप्यूटर का काम करने के लिए एक लड़की, जिस का नाम नइमा था, उसे रख लिया था. वह काफी खूबसूरत और फैशनेबल थी. जल्दी ही सोम उस के प्यार में पड़ गए. वे नइमा को साथ ले कर क्लब जाने लगे. वहां पौप म्यूजिक की धुन पर डांस और ड्रिंक के गिलास खनकते. वहां वह सोम का बखूबी साथ देती. जल्द ही नइमा सोम की जरूरत और जिंदगी बन गई.

एक दिन स्टोर के मैनेजर महेश ने मम्मीजी को अपना नाम न बताने की शर्त पर बताया कि सोम बहक गए हैं. नकली दवा बेचने लगे हैं. वे कई बार ऐक्सपायरी दवा भी ग्राहकों को दे देते हैं. ड्रग्स सप्लाई का काम भी करना शुरू कर दिया है. किसी भी समय मुसीबत में पड़ सकते हैं.

अब मम्मीजी को श्यामलीजी की याद आई कि श्यामली, सोम को कंट्रोल करो. वह तो अपनी तो अपनी, हम सब की बरबादी के रास्ते पर भी चल निकला है.

मम्मीजी की हिम्मत ही नहीं थी कि वे सोम से दुकान के विषय में बात कर सकें. उन्होंने जब भी कुछ पूछताछ या टोकाटाकी की तो सोम गालीगलौच पर उतर आते.

सोम के साथ उन का औपचारिक सा रिश्ता रह गया था. अब वे बच्चों के लिए महंगेमहंगे खिलौने लाते. उन के और मम्मीजी के लिए भी कीमती तोहफे ले कर आते. वे देर रात लौटते. उन के मुंह से रोज शराब की दुर्गंध आती. लेकिन श्यामलीजी लड़ाई से बचने के लिए चुप रहतीं.

उन्हें महंगे तोहफे, कीमती साडि़यों की चाह नहीं थी. वे तो पति के प्यार की भूखी थीं. वे उन की बांहों में झूलती हुईं प्यार भरी बातें करना चाहती थीं.

नियति ने स्त्री को इतना कमजोर क्यों बना दिया है कि वह घर न टूटने के डर से अपने वजूद की कुरबानी देती रहती है?

अब तो सोम के लाए हुए तोहफों को वे खोल कर भी नहीं देखती थीं.

एक दिन सोम चिढ़ कर बोले कि इतनी महंगी साडि़यां ला कर देता हूं, लेकिन तुम्हारा उदास और मायूस चेहरा मेरा मूड खराब कर देता है.

मैं तुम्हें मार रहा हूं? गाली दे रहा हूं? क्या कमी है?

श्यामलीजी हिम्मत कर के प्यार से, बच्चों का वास्ता दे कर उन से शराब पीने और क्लब जाने को मना करने लगीं तो सोम बेशर्मी से बोले कि मैं ये सब न करूं तो क्या करूं? मैं तुम से संतुष्ट नहीं हूं, न तो शारीरिक रूप से न ही मानसिक रूप से. मेरा और तुम्हारा मानसिक स्तर बिलकुल अलग है. हम दोनों कभी एक नहीं हो सकते.

मैं तुम्हारा खर्च उठा रहा हूं, तुम्हारे बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा रहा हूं. तुम्हें महंगेमहंगे गिफ्ट, जेवर, कपड़े ला कर देता हूं. गाड़ी है, ड्राइवर है. बड़ी कोठी में रह रही हो. इस से अधिक तुम्हें और क्या चाहिए?

पत्नी हो, पत्नी बन कर रहो. यदि यहां नहीं रहना है तो चली जाओ अपने गांव. लेकिन एक बात अच्छी तरह समझ लो कि मेरे बच्चे यहीं रहेंगे.

इतनी बातें कहसुन कर सोम क्लब या न जाने कहां चले गए. वे सहम कर चुप हो गई थीं. बच्चे तो उन की जान थे. वही तो उन के जीवन का संबल और आधार थे. उन्हीं के लिए तो वे जी रही थीं. उन की चुप्पी और सहनशीलता को देख सोम का हौसला बढ़ता गया. अब एक लड़की नइमा के साथ वे खुल्लमखुल्ला घूमने लगे थे. कई बार उसे वे घर भी ले कर आ जाते. कई बार वे रात में भी घर न आते.

श्यामलीजी चुप रहतीं, उन की पीड़ा आंसू बन कर आंखों से बहती. एकांत उन के हर दुख का साक्षी रहता. विद्रोह करना उन का स्वभाव नहीं था. वे समझ रही थीं कि यदि वे कुछ भी बोलेंगी तो उन का घरौंदा टूट जाएगा. उन के बच्चे अनाथ हो जाएंगे. अपनी बेचारगी पर वे कई बार स्वयं को धिक्कारती भी थीं, परंतु घर टूट जाने के डर से वह हिम्मत नहीं जुटा पाती थीं. नन्हीं राशि जब उन के आंसू पोंछती और उन्हें चुप हो जाने को कहती, तो उन को अपने आंसू रोकने मुश्किल हो जाते.

बुजुर्ग मैनेजर ने उन के पास भी 2-3 बार फोन कर के कहा कि सोम नकली दवाइयों का कारोबार बढ़ाते जा रहे हैं, साथ ही ड्रग्स का धंधा भी.

यदि इसी तरह से चलता रहा तो जल्द ही किसी मामले में फंस जाएंगे. वे चिंतित हो उठी थीं. उन के अपने प्यारे बच्चों और स्वयं का भविष्य दांव पर लगा था. उन्होंने दूसरे सेल्समैन लड़कों से बात कर के पता किया तो मालूम हुआ कि सच में सोम रास्ता भटक गए हैं.

आखिर एक दिन एक हादसा हो ही गया. उन के स्टोर से खरीदी नकली दवा से एक बच्चे की मौत हो गई. मामले ने तूल पकड़ा. वे लोग लाठियां ले कर आ गए और फिर दुकान में तोड़फोड़ कर दी. सोम की भी खूब पिटाई की. पुलिस आ गई. पुलिस को कुछ लेदे कर किसी तरह मामला शांत करवाया. पर इसी बीच बच्चे के पिता ने ‘ड्रग्स कंट्रोल डिपार्टमैंट’ में मेल कर दिया था. और वहां की टीम रेड करने आ गई. इस अचानक हमले का किसी को कोई अनुमान या तैयारी नहीं थी. नकली और ऐक्सपायरी दवा के साथसाथ ड्रग्स का भी स्टौक पकड़ा गया.

मामला संगीन था. लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने के आरोप में सोम गिरफ्तार हो गए और मैडिकल स्टोर को सील कर दिया गया. वकीलों पर पैसा पानी की तरह बहाया गया.

बेल होने में लगभग 3 महीने लग गए. घर खर्चे की दिक्कत होने लगी. एकएक कर सारे नौकर हटा दिए गए. यहां तक कि बच्चों के लिए दूध की भी परेशानी होने लगी थी. सामान बेच कर कुछ दिन काम चला.

इतनी विषम परिस्थिति कभी होगी, इस का उन्हें कतई अनुमान भी नहीं था. जब सोम जमानत के बाद घर आए, तो उन को पहचानना मुश्किल था. रंग काला पड़ गया था और शरीर कृषकाय हो चुका था. वे किसी का सामना नहीं करना चाहते थे. यहां तक कि बच्चों से भी बात नहीं करते थे. चुपचाप अपने कमरे में लेट कर छत को निहारते रहते.

सोम नया रास्ता तलाशने के बजाय निराशा के गर्त में डूब कर डिप्रैशन का शिकार बन गए. जख्मों को कुरेदने के लिए सांत्वना के नाम पर रिश्तेदारों और परिचितों के ताने और उलटेसीधे व्यंग्य वाणों के कारण सब का जीना दूभर हो गया था.

अब यह श्यामलीजी के लिए परीक्षा की घड़ी थी. अब आवश्यक हो चुका था कि वे स्वयं आगे बढ़ कर घर के हालात को सुधारने के लिए कुछ करें.

एक ओर नैराश्य में जकड़ा हुआ सोम दूसरी ओर 12 वर्ष की राशि तो 11 वर्ष का शुभ, ऐसे कठिन समय में घर का मोरचा संभाला. वे सोम का हौसलाअफजाई करतीं. बच्चों का भी उन्होंने पूरा ध्यान रखा.

मित्रों के सहयोग से एक नामी बुटीक में ड्रैस डिजाइनर की नौकरी मिल गई. जल्द ही बुटीक की मालकिन कल्पनाजी ने उन की प्रतिभा को पहचान लिया, उन के डिजाइन किए हुए कपड़े कस्टमर को पसंद आने लगे. 1 साल में ही बुटीक का बिजनैस काफी बढ़ गया, साथ में उन की सैलरी भी बढ़ गई.

जीवन पटरी पर लौटने लगा था. उन्हें नौकरी करते हुए लगभग 2 वर्ष हो चुके थे. अब वे अपना बुटीक खोलना चाह रही थीं. लेकिन पैसे की कमी बाधा बनी हुई थी.

उन्होंने ‘महिला गृह उद्योग’ योजना के अंतर्गत बैंक से लोन के लिए आवेदन किया और जल्दी ही घर के एक कमरे में अपना बुटीक शुरू कर दिया. 4 सिलाई मशीनें और कुछ कारीगर लड़कियों को रख कर काम शुरू कर दिया. देखते ही देखते उन की मेहनत और क्रिएटिविटी की क्षमता ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए.

आज उन के बुटीक की शहर में 2 ब्रांच और खुल गई हैं. करीब 40 लोगों को उन्होंने रोजगार दे रखा है.

राशि की आवाज ने उन की तंद्रा भंग कर दी, ‘‘मां, आज कहां खो गई हैं? घर नहीं चलना है क्या?’’

वे वर्तमान में लौटी ही थीं कि उन का मोबाइल बज उठा, ‘‘मैडम श्यामली?’’

‘‘यस.’’

‘‘महिला दिवस पर ‘विषम परिस्थितियों में स्वयं को सिद्ध करने के लिए’ आप को ‘विजय नगरम् हाल’ में मेयर के द्वारा सम्मानित किया जाएगा. कल हम लोग निमंत्रणपत्र ले कर आप के पास आएंगे.’’

‘‘धन्यवाद,’’ कहते हुए श्यामलीजी भावुक हो उठी थीं. चूंकि फोन स्पीकर पर था, इसलिए सभी ने इस खबर को सुन लिया था.

सोम भी भावुक हो उठे थे. उन्होंने प्यार से बांहों के घेरे में उन्हें ले लिया, ‘‘श्यामली, तुम्हें मैं वह प्यार और सम्मान नहीं दे पाया, जिस के योग्य तुम थीं. इसलिए अब पूरा लखनऊ शहर तुम्हें सम्मानित करेगा.’’

आज बरसों बाद सोम के प्यार भरे आलिंगन से वे अभिभूत हो उठी थीं. उन्होंने भी प्यार से सोम को अपनी बांहों में कैद कर लिया. बेटी राशि पर निगाह पड़ते ही उन का मुखमंडल शर्म से लाल हो उठा.

सोम फोन पर श्यामलीजी के मम्मीपापा को निमंत्रण दे रहे थे. आज उन के सारे विषाद धुल गए थे.

जानें सिंगल रहने के 10 फायदे

सक्सैसफुल कैरियर वूमन आजकल सिंगल रहना पसंद कर रही हैं. उन के फ्यूचर प्लान में शादी शब्द के लिए जैसे कोई स्थान ही नहीं रह गया है. लड़कियां अपनी सक्सैस, पावर, पैसा और आजादी को खुल कर ऐंजौय कर रही हैं. बेशक युवतियों में लेट मैरिज या नो मैरिज वाले सिंड्रोम से समाज या परिवार पर पड़ने वाले नकारात्मक असर को ले कर मातापिता, समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक व डाक्टर चिंतित हैं, लेकिन युवतियां खुश हैं. वाकई बड़े फायदे हैं सिंगल रहने के. यकीन न हो तो आगे पढ़ लीजिए:

1. कैरियर में ऊंचा मुकाम

अपनी रिलेशनशिप को बरकरार रखने के लिए काफी प्रयास, ऊर्जा व समय खर्च करने की जरूरत होती है. जाहिर सी बात है कि अगर आप सिंगल हैं तो आप को ये सब करने की जरूरत नहीं है और आप अपनी सारी ऐनर्जी, समय, अटैंशन, काबिलीयत को अपने प्रोफैशन, कैरियर पर फोकस करती हैं, जिस से आप की प्रोडक्टिविटी बढ़ती है. साथ ही, आप लेट नाइट मीटिंग, बिजनैस डिनर और औफिशियल टूर के लिए भी हमेशा तत्पर रहती हैं. अपनी कंपनी, औफिस के लिए भी पूरी तरह समर्पित रहती हैं. तो जाहिर सी बात है कि आप के लिए प्रमोशन की राह आसान हो जाती है.

2. जो चाहें वह करें

चूंकि आप को हर पल यह नहीं सोचना पड़ता कि आप का पार्टनर क्या पसंद करता है और क्या नहीं, आप बड़ी आसानी से वह सब कर सकती हैं, जो आप करना चाहती हैं. जिंदगी के हर पल को जी भर कर जी सकती हैं और वह भी बिना किसी अपराधबोध के. जैसे आप कालेज गर्ल की तरह अपने गर्ल गैंग को घर बुला कर पाजामा पार्टी कर सकती हैं, अपनी मरजी से ड्रैसअप हो सकती हैं, अपने पेरैंट्स, रिलेटिव्स को अपने घर अपने साथ रख सकती हैं. इस मेरी मरजी वाले टौनिक से आप ज्यादा खुश, रिलैक्स रहेंगी और यह सब जानते ही हैं कि एक खुश, संतुष्ट व्यक्ति ही औरों की दुनिया में खुशियां बिखेर सकता है.

3. फिट, यंग व खूबसूरत

आप अपने आप पर ज्यादा ध्यान देती हैं. आप का खयाल रखने वाला दूसरा कोई नहीं होने से अपनी डाइट, हैल्थ, ब्यूटी ऐंड बौडी केयर सब आप की जिम्मेदारी हो जाती है और आज कैरियर गर्ल के लिए फिट, ग्लैमरस व प्रेजैंटेबल बने रहना जरूरी भी है व फायदेमंद भी. इसीलिए सिंगल गर्ल अन्य के मुकाबले लंबे समय तक न सिर्फ यंग नजर आती है, बल्कि बौडी भी शेप में रखती है और प्रभावशाली व्यक्तित्व की मालकिन होती है.

4. पूरी तरह से इंडीपैंडैंट

किसी रिलेशनशिप में न होने का मतलब है कि आप को अपनी जिंदगी के हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की जरूरत है. आप को पैंपर करने के लिए, डेली रूटीन को आसान बनाने के लिए किसी मर्द का कुशन न होने से आप की सीखने की क्षमता बढ़ती जाती है. हालात का मुकाबला आप अन्य महिलाओं से बेहतर करती हैं. यह आत्मनिर्भरता आप का आत्मविश्वास भी बढ़ाती है.

5. हर चुनौती स्वीकारती हैं

सिंगलहुड आप को मानसिक रूप से मजबूत बनाती है. दिनबदिन आप यह सीखती हैं कि स्ट्रैसफुल सिचुएशन में और अचानक आ पड़ी मुसीबत का सामना कैसे करना है. अलगअलग शख्सीयत, मिजाज वाले व्यक्तियों व कौंप्लैक्स पर्सनैलिटी वाले लोगों से आप को कैसे डील करना है, बिना उन के ईगो को ठेस पहुंचाए, यह आप बेहतर समझती हैं. और जबजब आप यह करने में कामयाब होती हैं तबतब आप अलौकिक खुशी और संतुष्टि पाती हैं.

6. ब्यूटी स्लीप भरपूर

आप के पास भरपूर मी टाइम होता है, जिस के लिए विवाहित महिलाएं तरसती हैं. आप अपने डेली रूटीन, स्लीपिंग रूटीन अपनी बौडी, वर्क और जरूरत के मुताबिक सैट कर सकती हैं, साथ ही पार्टनर का रुठनामनाना, बच्चों व ससुराल की चिंता भी आप के सिर पर नहीं होती है. इसी वजह से आप के लिए हर रोज प्रौपर, स्ट्रैसफ्री ब्यूटी स्लीप को प्राप्त करना आसान हो जाता है. रातभर की अच्छी नींद न सिर्फ आप की खूबसूरती, फिजिकलमैंटल हैल्थ के लिए बेहद आवश्यक होती है, बल्कि इस से आप का दिमाग भी सक्रिय होता है और आप की कार्यक्षमता, एकाग्रता, स्किल में इजाफा होता है.

7. खुद का लाइफस्टाइल

आप किसी और के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, इस वजह से आप के पास काफी समय, ऊर्जा और रिर्सोसेज होते हैं कि आप हैल्दी रूटीन फौलो कर सकें. अपने लाइफस्टाइल, ईटिंग हैबिट्स, ऐक्सरसाइज शैड्यल में बदलाव ला सकती हैं और अपनी लाइफ को बोरिंग होने से बचा सकती हैं.

8. मनी रिलेटेड इश्यू कम

आज के वर्किंग कपल के बीच मेरा पैसा, तेरा पैसा यानी मनी को ले कर होने वाले वादविवाद काफी स्ट्रैस पैदा करते हैं. खासतौर पर पत्नियां अपने पैसे का क्या करती हैं या उन को क्या करना चाहिए, यह अकसर पति तय करते देखे जाते हैं. लेकिन सिंगल होने का मतलब है कि आप को अपनी मनी को कहां, किस तरह से खर्च करना है, किस पर करना है या कितनी सेव करनी है, इन सब बातों को ले कर किसी को जवाब नहीं देना है. आप का पैसा पूरी तरह आप का है. आप शौपिंग करें, स्पा जाएं या इन्वैस्ट करें, आप की मरजी. यही फाइनैंशियल इंडीपैडैंस और फाइनैंशियल सिक्युरिटी आप को मजबूत बनाती है, आप का कौन्फिडैंस बढ़ाती है और सच्चे अर्थों में आप को मर्द के बराबर ला खड़ा करती है.

9. अलग पहचान बना सकती हैं

कैरियर में सैट होने के बाद अपनी हौबी को पुनर्जीवित कर सकती हैं, जो वक्त या पैसे की कमी के चलते अधूरी रह गई थी. जौब से लौटने के बाद बचे वक्त में थिएटर, स्क्रिप्ट राइटिंग, क्ले पेंटिंग या संगीत के प्रति अपने पैशन को नई दिशा दे सकती हैं. अपनी खुद की एक अलग पहचान बना सकती हैं. किसी भी तरह का रचनात्मक कार्य, क्रिएटिविटी आप के दिलदिमाग को सुकून पहुंचाएगी.

10. जब चाहें हौलिडे पर जाएं

सिंगल होने का एक और बड़ा फायदा यह है कि आप अपनी मरजी, मूड और पसंद के मुताबिक हौलिडे प्लान कर सकती हैं. वह डैस्टिनेशन चुन सकती हैं जहां जाना आप की हमेशा ख्वाहिश रही है. पार्टनर की मरजी के हिसाब से कंप्रोमाइज करना, अपना मन मारना, जोकि अमूमन महिलाएं करती हैं, ये सब आप को नहीं करना पड़ेगा. चाहें तो बर्फीली पहाडि़यों की ऊंचीऊंची चोटियों को निहारें या फिर समंदर किनारे रेत पर नंगे पैर चलें, आप ताजा दम हो कर सकारात्मक ऊर्जा में सराबोर हो कर ही घर लौटेंगी.

Women’s Day: अकेली महिला रोज बनाएं मनचाहा खाना

आज स्त्री पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही है. उस स्थिति में स्त्री के गुणों में भी परिवर्तन आया है. सब से बड़ा बदलाव है. आज की लड़कियों का पाक कला के प्रति बढ़ता रुझान है. पहले भी औरत के गुणों में पाक कला की निपुणता थी, पर आज उस की क्लालिटी बदल गई है.

युवतियों ने घर से बाहर की ओर कदम बढ़ाए हैं. आज एकल रहना आम होता जा रहा तो सब से पहले वे सही खाना बनाने की घर से चली आ रही आदत को छोड़ रही हैं. सीए इला को अपनी सर्विस के कारण घर व मातापिता से दूर रहना पड़ रहा है. वह अपनी जौब पूरे कमिटमैंट से करती हुई आगे बढ़ रही है. मगर पीछे छूट गईर् तो खुद खाना बना कर खाने की आदत, जिस के कारण वह आधा वक्त बाहर से खा कर काम चलाती है तो आधा वक्त भूखी ही रहती है, पर खुद खाना नहीं बनाती.

पेशे से वकील रजनी 32 साल की ही है पर तलाकशुदा है. वह अपनी निजी प्रैक्टिस करती है. उस का कहना है, ‘‘मैं पहले खाना बनाती थी पर अकेले के लिए क्या खाना बनाऊं. बाहर से मंगाती हूं व खाती हूं कोई परेशानी नहीं होती. मेरा काम चल ही जाता है.’’

किन कारणों के चलते एक एकल रहने वाली स्त्री खाना बनाने से बचने लगती है?

अकेलापन: एक अकेली युवती को अपने जीवन में कहीं न कहीं एक बात कचोटती रहती है कि वह अकेले जीवन जी नहीं रही बल्कि काट रही है. इस वजह से उस के मन से सब से पहली आवाज यही आती है कि वह खाना क्यों और किस के लिए बनाए? दूसरा कोई साथ हो तभी खाना बनाना अच्छा लगता है और जरूरी भी पर मैं तो अकेली हूं कैसे भी मैनेज कर लूंगी.’’ इस मैनेज शब्द के साथ ही रसोई से वह अपना नाता तोड़ देती है.

थकावट: एकल युवती होने के कारण यह भी लाजिम है कि दिनभर की भागदौड़ खुद करने के बाद वह इतना अधिक थकी होती है कि उस के पास थकावट के कारण इतनी हिम्मत नहीं बचती कि रसोई की ओर रुख करे. थकावट चुपकेचुपके उस से कहती है कि रसोई की तरफ मत जा बाजार से कुछ मंगा, खा और खा कर सो जा.

अहम: एकल रह रही युवती को रसोई में आने से रोकता है उस का अहम, जो उसे बारबार यही एहसास कराता है कि जब तू पुरुषों की तरह हजारों रुपए कमा रही है और बड़ी सम  झदारी व हिम्मत से अकेले निडर हो कर रह रही है तो तु  झे रसोई में जा कर इतना खपने की जरूरत ही क्या है. शान से पैसा फेंक बढि़या खाना और्डर कर और खा कर मस्त रह.

समय: एकल महिला के पास समय की कमी का पाया जाना भी एक मुख्य कारण है जोकि उसे विवश करता है कि नहीं तू खाना मत बना क्योंकि जितनी देर में सब्जी लाएगी, ग्रौसरी जमा करेगी, खाना बनाएगी उतनी देर में तो अपना एक और जरूरी काम पूरा कर लेगी. समय सीमा में बंधी स्त्री मजबूरीवश भोजन बनाना न चाहते हुए भी छोड़ देती है.

ये वे मुख्य कारण हैं जिन के चलते एकल रह रही महिला अपने लिए खाना नहीं बनाना चाहती पर कई वजहें हैं जिन के कारण एकल रह रही स्त्री को अपने लिए खाना बनाना ही चाहिए:

सेहत: कहते है ‘जान है तो जहान है’ इस कहावत को अगर एकल महिला मूलमंत्र मान ले तो वह कभी भी खाना बनाने से कतराएगी नहीं क्योंकि घर में बना खाना जितना शुद्ध होता है उतना बाहर का बना खाना नहीं. घर के खाने में जहां कम घी, तेल, मिर्चमसालों को वरियता दी जाती है वहीं बाहर के खाने में इस का उलटा ही होता है यानी चिकनाई व मिर्चमसालों की भरमार.  इसलिए एकल स्त्री अपना खाना स्वयं बनाए और सेहतमंद रहे.

बचत: आज आसमान छूती महंगाई में जहां जीवन की जरूरतों को पूरा करना कठिन हो चला है उस स्थिति में अगर एकल महिला घर पर स्वयं ही खाना बनाएगी तो पूंजी की काफी बड़ी मात्रा में बचत कर पाएगी. उदाहरण के तौर पर अगर बाजार में खाना 100-200 रुपए में मंगाती है तो घर पर वही खाना 30-40 रुपए खर्च कर आसानी से बना कर बड़ी मात्रा में धन हानि को रोक सकती है. क्लाइंड किचनों का वैसे भी भरोसा नहीं कि क्लालिटी क्या होगी. बाहर से मंगाया खाना हमेशा ज्यादा पोर्शन वाला होता है और फिर ज्यादा खाया जाता है.

समय: कई बार एकल युवतियां बोरियत व खाली समय जैसे शब्दों से भी घिरी होती हैं. उन की अकसर यह शिकायत होती है कि खाली वक्त को कैसे कम करें तो उस के लिए एक ही विकल्प है कि जब भी आप को लगे कि आप खालीपन के कारण बोर हो रही हैं तो उस वक्त रसोई में जा कर अपने लिए कोई बढि़या डिश तैयार कर मजे से खाए और अपने खालीपन का सदुपयोग करे.

मेजबान बने: एकल युवती के पास एक कारण होता है कि किस के लिए बनाए तो इस बात की काट भी खुद ही करे यानी एक अच्छी कुक व मेजबान बन कर अपनी सहेलियों को खाने पर आमंत्रण दे. उन के लिए दिल से अच्छा भोजन स्वयं बनाए और उन्हें भी खिलाए व खुद भी खाए यानी मेजबानी करना सीखे. पौटलक का आयोजन करती रहे चाहे अकेली लड़कियों व लड़कों के साथ चाहे विवाहित दोस्तों के साथ.

सामंजस्य: एकल रहना किसी भी युवती के लिए आसान कार्य नहीं है क्योंकि कई बार युवती मजबूरी से एकल रहती है तो कभी परिस्थितिवश. कारण कोई भी हो पर एकल रहना आसान नहीं होता. उन परिस्थितियों में एकल युवती को चाहिए कि वह अपनी परिस्थिति को सम  झे और अपने दिल और दिमाग से एकल शब्द को निकाल कर अपना खाना स्वयं जरूर बनाए और खाए.

खुद को खुद ही चेलैंज करे कि जब तू सब कार्य एकल करने में सक्षम है तो खाना बनाने में पीछे क्यों रहे. इस तरह की सकारात्मक सोच ही एक एकल युवती को खाना बनाने के लिए प्रेरित कर सकती है. यानी एकल महिला का आत्मविश्वास ही उसे रसोई तक ले जाने की क्षमता रख सकता है.

मनोचिकित्सकों के अनुसार कितनी युवतियां होती हैं जिन्हें यही समस्या होती कि चूंकि वे अकेले रह रही हैं तो उन का अपने लिए कुछ खाने की चीजें बनाना तो दूर रसोई की तरफ देखने की भी इच्छा नहीं होती है तो क्या करें. इस पर उन्हें यही सलाह है कि अकेले रहते हुए जैसे वे बाकी कार्यों को बखूबी पूरा कर रही हैं वैसे ही अपने लिए भोजन भी जरूर बनाएं.

अपनी आदत को बनाए रखने के लिए

1 सप्ताह का मैन्यू बना कर रखें और उस के अनुसार ही डेवाइज भोजन बनाएं. इस से उन्हें एक नहीं अनेक लाभ मिलेंगे जैसे समय पर सही ताजा भोजन मिलेगा, समय का उपयोग हो कर खालीपन दूर होगा, पैसे की बचत होगी और सब से जरूरी आप को अपना जीवन सजीव लगेगा.

तो सभी एकल महिलाओं को चाहिए कि वे अपना भोजन रोज व स्वयं बनाएं. अगर नहीं बनाती हैं तो बनाने की आदत डालें और जीवन को पूर्णता व सजीवता के साथ जीएं क्योंकि एकल होना जीवन में आ रही परिस्थिति का ही एक हिस्सा है अभिशाप का नहीं. इसलिए एकल हो कर भी खुल कर जीएं.

वुमंस डे पर दें अपनी महिला मित्र को दें ये अनोखे ​गिफ्ट

किसी खास अवसर पर जब हमें अपनी बहन, फ्रैंड, गर्लफ्रैंड, औफिस की ​कलिग या फिर अपनी पत्नी को कोई गिफ्ट देना होता है तो हम कई गिफ्ट देखने के बाद ही उन में से एक बैस्ट चुनते हैं, उस वक्त हम सोचते हैं कि हम उन्हें कुछ ऐसा गिफ्ट दें, जिसे देखने के बाद उन के मुंह से बस यही निकले कि इस से अच्छा गिफ्ट और कुछ नहीं हो सकता. यह सब तो ठीक है लेकिन क्या कभी आप ने कुछ ऐसे गिफ्ट्स के बारे में सोचा है जो उन्हें खुशी दे, उन्हें सम्मान दे. यकीनन आप ने नहीं सोचा होगा, आइए इस महिला दिवस उन्हें कुछ ऐसे ही गिफ्ट्स देते हैं.

1 गंदे और भद्दे चुटकुलों को कहें ना

महिला हो या पुरुष मस्ती मजाक सभी को अच्छा लगता है, लेकिन इस का भी एक दायरा होता है. कई पुरुष जानबूझकर औफिस में व सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं से संबंधित भद्दे व गंदे जोक्स मारते हैं. ग्रुप में जब भी बात करते हैं तो ​महिलाओं को सैंटर टौपिक में रखते हैं और ठहाके मार के हंसते हैं. हर वक्त बस लड़कियों में कमी निकालते रहते हैं. अगर आप भी ऐसा करते हैं तो अपनी इस आदत को बदल डालिए. सिर्फ यही नहीं बल्कि अगर आप के सामने भी कोई ऐसा करता है तो मूक दर्शक बन कर न देखते रहें बल्कि उसे भी समझाएं.

2 टैलेंट पर न करें शक

कुछ पुरुषों की आदत होती है कि वे ​महिलाओं को प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें बारबार कहते रहते हैं कि तुम से नहीं हो पाएगा तुम रहने दो. कई बार तो औफिस में यह भी देखने को मिलता है कि अगर महिलाएं किसी काम को करने के लिए आगे आती हैं तो बौस तक कह देते हैं ‘आरती तुम रहने दो इस काम को लड़के अच्छे से कर लेंगे, रोहित तुम इस काम को कर लो’. आप ऐसा व्यवहार करना छोड़ दें बल्कि अगर वे कोई काम करना चाहती हैं तो उन्हें प्रोत्साहित करें, न कि उन के टैलेंट पर शक कर के उन्हें पीछे खींचे.

3 न ढूंढ़े टचिंग का बहाना

अक्सर पुरुष भीड़ की आड़ में महिलाओं को टच करने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं, मौका मिला नहीं कि हाथ साफ करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं. लेकिन क्या आप को पता है ऐसा कर के आप महिलाओं के साथ ‘लिटिल रेप’ करते हैं. जी हां, आज ईव टीजिंग भी लिटिल रेप से कम नहीं है इसलिए अपनी इस तरह की आदतों को छोड़िए और महिलाओं को सम्मान देना शुरू करिए.

4 न दें कैरेक्टर सर्टिफिकेट

महिलाओं को पूरी आजादी है कि वे क्या पहनना चाहती हैं और क्या नहीं, कहां जाना चाहतीं हैं और कहां नहीं, किस से बात करना चाहती हैं और किस से नहीं. आप इस आधार पर कभी भी किसी महिला का कैरेक्टर डिसाइड न करें कि वह कैसी है.

5 न करें कमैंट

पुरुष कितनी भी रफ ड्राइविंग करें लेकिन जब महिलाएं डाइविंग करते हुए थोड़ी सी भी गलती करतीं हैं तो ताने मारने लगते हैं कि समझ नहीं आता कि महिलाएं क्यों ड्राइव करती हैं, उन के लिए तो पिछली सीट ही ठीक है. आप इस तरह के कमैंट करना छोड़ दें बल्कि अगर वे गलती करते दिखें तो कमैंट के बजाय समझाएं.

आजकल एड में बीबी ग्लो के बारे में बताया जाता है, क्या यह सचमुच स्किन के लिए अच्छा है?

सवाल

आजकल एड में बीबी ग्लो के बारे में बताया जाता है. क्या यह सचमुच स्किन के लिए अच्छा है?

जवाब

बीबी ग्लो एक ऐसा ट्रीटमैंट है जिस में आप की स्किन के अंदर एक मशीन के द्वारा अकौर्डिंग टू योर स्किन न्यूट्रिएंट्स डाल दिए जाते हैं. ये स्किन के अंदर जा कर स्किन को स्ट्रैच करते हैंरिंकल फ्री करते हैं और ग्लो देते हैं. इस के साथसाथ बीबी ग्लो में आप की स्किन के अनुसार एक फाउंडेशन स्किन के अंदर डाल दिया जाता हैजिस से आप की स्किन के ऊपर एक हलका मेकअप आ जाता हैजो करीब 20 से 30 दिन तक रहता हैसाथ में आप की फेस को शेप देने के लिए कंटूरिंग और ब्लशर भी डाल दिया जाता है जिस से फेस की बहुत खूबसूरत शेप आ जाती है. यह एक बहुत ही अच्छा ट्रीटमैंट है जिस से आप की स्किन ग्लो भी करती हैसाथ में शेप भी आ जाती है और 20 से 30 दिन के लिए मेकअप भी आ जाता है.

 

Women’s Day: अकेली लड़की- कैसी थी महक की कहानी

” बेटे आप दोनों को गिफ्ट में क्या चाहिए? ” मुंबई जा रहे लोकनाथ ने अपनी बच्चियों पलक और महक से पूछा.

12 साल की पलक बोली,” पापा आप मेरे लिए एक दुपट्टे वाला सूट लाना.”

” मुझे किताबें पढ़नी हैं पापा. आप मेरे लिए फोटो वाली किताब लाना,” 7 साल की महक ने भी अपनी फरमाइश रखी.

“अच्छा ले आऊंगा. अब बताओ मेरे पीछे में मम्मी को परेशान तो नहीं करोगे ?”

“नहीं पापा मैं तो काम में मम्मी की हैल्प करूंगी.”

“मैं भी खूब सारी पेंटिंग बनाऊंगी. मम्मी को बिल्कुल तंग नहीं करूंगी. पापा मुझे भी ले चलो न, मुझे मुंबई देखना है,” मचलते हुए महक ने कहा.

” चुप कर मुंबई बहुत दूर है. क्या करना है जा कर? अपने बनारस से अच्छा कुछ नहीं,” पलक ने बहन को डांटा.

” नहीं मुझे तो पूरी दुनिया देखनी है,” महक ने जिद की.

” ठीक है मेरी बच्ची. अभी तू छोटी है न. बड़ी होगी तो खुद से देख लेना दुनिया,” लोकनाथ ने प्यार से महक के सर पर हाथ फिराते हुए कहा.

पलक और महक दोनों एक ही मां की कोख से पैदा हुई थीं मगर उन की सोच, जीवन को देखने का नजरिया और स्वभाव में जमीन आसमान का फर्क था. बड़ी बहन पलक जहां बेहद घरेलू और बातूनी थी और जो भी मिल गया उसी में संतुष्ट रहने वाली लड़की थी तो वहीं महक को नईनई बातें जानने का शौक था. वह कम बोलती और ज्यादा समझती थी.

पलक को बचपन से ही घर के काम करने पसंद थे. वह 6 साल की उम्र में मां की साड़ी लपेट कर किचन में घुस जाती और कलछी चलाती हुई कहती,” देखो छोटी मम्मी खाना बना रही है.”

तब उस के पिता उसे गोद में उठा कर बाहर निकालते हुए अपनी पत्नी से कहते,” लगता है हमें इस की शादी 18 साल से भी पहले ही करनी पड़ेगी. इसे घरघर खेलना ज्यादा ही पसंद है. ”

18 तो नहीं लेकिन 23 साल की होतेहोते पलक ने शादी की सहमति दे दी और एक बड़े बिजनेसमैन से उस की अरेंज मैरिज कर दी गई. इधर महक बड़ी बहन के बिलकुल विपरीत शादीब्याह के नाम से ही कोसों दूर भागती थी. उसे ज्ञानविज्ञान और तर्कवितर्क की बातों में आनंद मिलता. वह जीवन में दूसरों से अलग कुछ करना चाहती थी. जॉब कर के आत्मनिर्भर जीवन जीना चाहती थी.

जल्द ही उसे एक एडवरटाइजिंग कंपनी में कॉपी एडिटर की जॉब भी लग गई. वक्त गुजरता गया. पलक अब तक 32 साल की हो चुकी थी मगर जब भी घर वाले शादी की बात उठाते वह कोई न कोई बहाना बना देती. शादी में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती. इस बीच एक एक्सीडेंट में उस के मम्मीपापा की मौत हो गई. यह वक्त महक के लिए बहुत कठिन गुजरा. अब उसे खुद को अकेले संभालना था. शुरू में तो कुछ समय तक वह पलक के घर में रही. पर बहन की ससुराल में ज्यादा लंबे समय तक रहना अजीब लगता है इसलिए वह अपने घर लौट आई और अकेली रहने लगी.

अकेले रहने की आदी न होने के कारण उसे शुरू में अच्छा नहीं लगता. रिश्तेदार बहुत से थे मगर सब अपने जीवन में व्यस्त थे. इसलिए समय के साथ उस ने ऐसे ही जीने की आदत डाल ली. मांबाप की मौत ने उस के अंदर गहरा खालीपन भर दिया था. यह ऐसा समय था जब वह खुद को अंदर से कमजोर महसूस करने लगी थी. ऐसे में उसे पलक का सहारा था. पलक उसे सपोर्ट देती थी मगर यह बात कहीं न कहीं पलक के घरवालों को अखरती थी.

उस के जीजा नवीन पलक से अक्सर कहा करते,” तुम्हारी बहन शादी क्यों नहीं करती? क्या जिंदगी भर तुम्हारा आंचल पकड़ कर चलेगी? समझाती क्यों नहीं कि बिना शादी के जीना बहुत कठिन है.”

तब पलक हंस कर कहती,” मैं ने उसे आंचल पकड़ाया ही कहां है? वैसे भी उसे जो करना होता है वही करती है. मेरे समझाने का कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.”

अकेली लड़की की जिंदगी में परेशानियां कम नहीं आतीं. लोगों की बुरी नजरों से खुद को बचाते हुए अपने दम पर परिस्थितियों का सामना करना महक धीरेधीरे सीख रही थी.

उस दिन महक ऑफिस से घर लौटी तो तबीयत काफी खराब लग रही थी. बुखार नापा तो 102 डिग्री बुखार था. कुछ करने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वह क्रोसिन खा कर सो गई. अगले दिन बुखार और भी ज्यादा बढ़ गया. उसे डॉक्टर के पास जाने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी. तब उस ने पलक को फोन लगाया. पलक ने उसे अपने घर बुला लिया. घर के पास ही एक डॉक्टर से दवाइयां लिखवा दीं. महक को टाइफाइड था. ठीक होने में 10- 12 दिन लग गए. फिर जब तक महक पूरी तरह ठीक नहीं हो गई तब तक वह पलक के ही घर रही. पलक उस के खानेपीने का अच्छे से प्रबंध करती रही. महक की वजह से उस के काम काफी बढ़ गए थे. कई बार उस की वजह से पलक को पति की बात भी सुननी पड़ जाती. तब पलक उसे समझाती कि शादी कर ले।

ठीक होते ही महक अपने घर आ गई. एक दिन रात में 8 बजे महक ने पलक को फोन कर कहा,” मेरे घर के सामने दो अनजान युवक बहुत देर से खड़े बातें कर रहे हैं. मुझे उन की मंशा सही नहीं लग रही. बारबार मेरे ही घर की तरफ देख रहे हैं.”

” ऐसा कर तू सारी खिड़कियांदरवाजे बंद कर और लाइट ऑफ कर के सोने का नाटक कर. वे खुद चले जाएंगे ,” पलक ने सलाह दी.

उस दिन तो किसी तरह मामला निपट गया मगर अब यह रोज की दिनचर्या बन गई थी. लड़के उस के घर की तरफ ही देखते रहते. पलक को असहज महसूस होता. वह घर से निकलती तब भी वे लड़के उसे घूरते रहते.

कुछ समय से वह वर्क फ्रॉम होम कर रही थी मगर आसपड़ोस में काफी शोरगुल होता रहता था. इसलिए वह ठीक से काम नहीं कर पाती थी. उस के घर के ऊपरी फ्लोर पर नया परिवार आया था. ये लोग हर 2 -4 दिन के अंतर पर घर में कीर्तन रखवा देते. माइक लगा कर घंटों भजन गाए जाते. कीर्तन और घंटियों की आवाजें सुनसुन कर उस के दिमाग की नसें हिल जातीं. तब उस ने तय किया कि वह घर शिफ्ट कर लेगी मगर जल्दी ही उसे समझ आ गया कि अकेली लड़की के लिए अपनी पसंद का फ्लैट खोजना भी इतना आसान नहीं है. उस ने 2- 3 सोसाइटीज पसंद कीं जहां उस ने घर लेने की कोशिश की तो पता चला कि वहां बैचलर्स को घर नहीं दिया जाता. इस बात को ले कर महक कई दिनों तक परेशान रही.

उस की परेशानियों के मद्देनज़र उस के जीजा एक ही बात कहते,” शादी कर लो. जीवन में आ रही सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी.”

पलक भी उसे समझाती,” अकेले रहने में समस्याएं तो आएंगी ही. हम हर समय तुम्हारी मदद के लिए खड़े नहीं रह सकते. अपना परिवार बनाओ और चैन से रहो. देख मैं कितनी निश्चिन्त हूँ. जो भी चिंता करनी होती है वह तेरे जीजा करते हैं.”

यह बात तो महक को भी समझ आती थी मगर वह ऐसे ही किसी से शादी करने को तैयार नहीं थी. वह शादी तभी करना चाहती थी जब कोई उसे पसंद आए और उस के लायक हो. तब उस के लिए जीजा ने एक रिश्ता सुझाया और उस के साथ महक की मीटिंग फिक्स कर दी. वह लड़का महक के जीजा के पुराने जानपहचान का था इसलिए वह चाहते थे कि महक शादी के लिए हां कह दे. मगर महक को वह जरा भी पसंद नहीं आया. ठिगना कद और बारहवीं पास वह लड़का महक की सोच के आगे कहीं भी नहीं टिकता था.

भले ही उस लड़के के पास धनदौलत और शानोशौकत की कोई कमी नहीं थी. वह एक शानदार बंगले और कई गाड़ियों का मालिक भी था. मगर महक को जीवनसाथी के रूप में कोई अपने जैसा पढ़ालिखा और काबिल इंसान चाहिए था. महक उसे इंकार कर के चली आई. इस बात पर जीजा और भी ज्यादा भड़क गए.

पलक को सुनाते हुए बोले,” खबरदार जो अब महक के लिए कुछ भी किया या उस की मदद करने की कोशिश भी की. उसे खुद की काबिलियत और शिक्षा पर बहुत घमंड है न. देखता हूं, अकेली लड़की कितने समय तक अपने बल पर जी सकेगी. हर काम में तो उसे हमारी मदद चाहिए होती है. हमारे बिना 4 दिन भी रह ले तो बताना. ”

” यह तो सच है कि उसे हर समय हमारी मदद चाहिए होती है मगर जब कोई सलूशन बताओ तो मानती नहीं. मैं खुद उस से तंग आ गई हूं. ”

इस के बाद दोनों पतिपत्नी ने तय कर लिया कि वह महक को अपनी जिंदगी से दूर रखेंगे. इस बात को 4- 6 महीने बीत गए. पलक ने महक को खुद से दूर कर दिया था. महक सब समझ रही थी मगर उस ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी जंग जारी रखी.

एक दिन पलक ने रोते हुए फोन किया,” महक तेरे जीजा जी का एक्सीडेंट हो गया है. वे छत से गिर गए हैं. सिर पर चोट आई है. खून बह रहा है. मुझे तो कुछ सूझ नहीं रहा कि क्या करूं. निक्कू भी एग्जाम देने गया हुआ है और गोकुल (नौकर) 2 दिन से आ ही नहीं रहा. घर में कोई नहीं है. पापा जी भी जानती ही है, पैरों में तकलीफ की वजह से चल नहीं सकते.”

” कोई नहीं पलक दी मैं आ रही हूं,” महक ने बहन को हिम्मत दी.

बिजली की सी फुर्ती से महक घर से निकली. रास्ते में ही उस ने एंबुलेंस वाले को फोन कर दिया था. आननफानन में उस ने एंबुलेंस में जीजा को हॉस्पिटल पहुंचाया. पलक से उस ने इंश्योरेंस के कागजात भी रखने को कह दिया था. हॉस्पिटल पहुँचते ही उस ने जीजा को एडमिट कराने की सारी प्रक्रिया फटाफट पूरी कराई और उन्हें एडमिट करा दिया. बड़े से बड़े डॉक्टरों से बात कर अच्छे इलाज का पूरा प्रबंध भी करा दिया. कुछ देर में जीजा को होश आ गया. माथे पर गहरी चोट लगी थी सो सर्जरी करनी पड़ी.

इस बीच पलक ने बताया कि इंश्योरेंस वालों ने किसी वजह से क्लेम कैंसिल कर दिया है. महक तुरंत सारे कागजात ले कर भागी और सब कुछ सही कर के ही वापस लौटी.

महक के प्रयासों से सब कुछ अच्छे से निबट गया. कुछ दिन हॉस्पिटल में रख कर जीजा को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. जीजा इतने दिनों में महक को बाहरभीतर की सारी जिम्मेदारियां निभाते देख काफी प्रभावित हो गया था. पलक भी अपनी बहन की तारीफ किए बगैर नहीं रह सकी, ” सच महक अब मुझे यकीन हो गया है कि तू अकेले भी खुद को बहुत अच्छे से संभाल सकती है. अकेली हो कर भी तू कमजोर नहीं है. खुद में पूर्ण है. ”

” दीदी जिंदगी में एक पल ऐसा जरूर आता है जब कोई भी इंसान खुद को अकेला या कमजोर महसूस करता है. जैसे आप की जिंदगी में भले ही सब कुछ है. पति है, बेटा है, घरपरिवार है, मगर सोचिए जब पूरे दिन परिवार के लिए काम करने के बाद रात में जीजाजी आप को किसी कारण से बात सुना कर बाहर चले जाते हैं, निक्कू अपने मोबाइल में और अंकल टीवी में बिजी रहते हैं, तब क्या आप को नहीं लगता कि आप बहुत अकेली हो. इसी तरह मुझे भी कभीकभी लगता है कि मैं बहुत अकेली हूं. मगर जब चुनौतियों को हरा कर कुछ अच्छा करती हूं तो दिल का खालीपन भर जाता है. आखिर अपनी जिंदगी अपनी पसंद के अनुसार हम खुद चुनते हैं. इस में सही या गलत नहीं होता. बस परिस्थितियां ही सही या गलत होती हैं. ”

पलक ने बहन को गले लगाते हुए कहा,” मैं समझ गई हूं महक तू मेरे जैसी नहीं पर मुझ से कम भी नहीं. तेरी सोच अलग है मगर कमजोर नहीं. बहुत स्ट्रॉन्ग है तू. आज तेरा लोहा सिर्फ मैं ने ही नहीं तेरे जीजा ने भी मान लिया है. मेरी प्यारी बहन मुझे तुझ पर गर्व है, ” पलक से अपनी तारीफ सुन कर महक की आंखों में विश्वास भरी चमक उभर आई थी.

अमेरिकन बहू- भाग 3: समाज को भाने लगी विदेशी मीरा

राहुल पढ़ाई पूरी कर के अमेरिका में ही बहुत ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी भी करने लगा. पर शादी की बात सुजाता ने उस से जब भी छेड़ी वह टाल गया. अंत में हुआ वही जिसका डर उन्हें पूरे 3 सालों से सता रहा था. कोविड के दिनों में वे उस के अभाव को ?ोलते रहे. गनीमत यह रही कि न कुमार, न सुजाता और न ही राहुल कोविड की चपेट में आए.

राहुल उन के मन के हर कोने में छिपी भावनाओं से परिचित था. इतना सम?ाना उस के लिए कठिन नहीं था कि मां को जान कर कितना आघात लगेगा कि वह एक अमेरिकन युवती से विवाह करना चाहता था. इस खुशखबरी को डैडी को देने में ही सम?ादारी होगी. यही उस ने किया भी. पिता की खुली सोच से वह परिचित था ही. कुमार उस की अकादमिक सफलताओं के कारण हमेशा से उस पर गर्व करते आते थे. ‘अपने विषय में जो भी निर्णय लेगा वह बहुत सोचसम?ा कर ही लेगा…’ इस का उन्हें भरोसा था और राहुल को डैडी पर. इसलिए मां को पहले यह खबर देने के लिए फिर सम?ाबु?ा कर राजी कर लेने के लिए उस ने डैडी का ही सहारा लिया.

एक दिन देर रात तक फोन पर उस ने विस्तार में पिता को बताया कि कैसे एक पार्टी में मीरा से उस की मुलाकात हुई थी. मीरा ने कालेज में ‘भारतीय इतिहास और संस्कृति’ विषय पर एक कोर्स किया था और इस के बाद भारत में उस की रुचि बढ़ती ही गई थी. यह रुचि केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रही थी. उसे हिंदू वर्णव्यवस्था की खामियों, दानपुण्य के ढकोसलोंकी भी पूरी जानकारी थी.

औफिस की एक पार्टी में भारत के प्रति उस का यह ?ाकाव ही उसे राहुल के इतना करीब ले आया था. जोरजोर से बज रहे संगीत के माहौल में चिल्लाचिल्ला कर उन्होंने एकदूसरे को अपना नाम बताया था. जब उस का नाम मीरा ले कर मुसकराते हुए राहुल ने कहा था कि यह तो एक विशुद्ध भारतीय नाम है तो उस ने हंस कर कहा था, ‘‘आई नो, बट राहुल, डोंट यू इमैजिन यू आर कृष्णा. यू बेटर रिमैन राहुल.’’

राहुल ने जोरदार ठहाका तो लगाया था पर साथ ही उस की भारत के विषय में इतनी जानकारी देख कर बेहद प्रभावित भी हुआ था. इस के बाद पार्टी के शोरगुल से ऊपर उठ कर सुकून से बातें कर पाएं इस के लिए वे टैरिस पर आ गए थे. वहां मीरा देर तक उस से भारत के विषय में बहुत सारे  पूछती रहीं. उस ने राहुल को यह भी बताया कि उस के नाम का सही उच्चारण अमेरिकन ढंग से तो मायिरा होना चाहिए था पर जब किसी से मीरा के कृष्णप्रेम के बारे में सुन कर उस ने उन के बारे में विस्तार में पढ़ा था तभी से उस ने अपने नाम का भारतीय उच्चारण ‘मीरा’ ही अपना लिया था.

उस पार्टी के बाद राहुल और मीरा की मुलाकातें अकसर

होने लगी थीं. दोनों का एक ही कंपनी में कार्यरत होना इस में बड़ा सहायक सिद्ध हुआ था. मीरा पढ़ाई, प्रशिक्षण और व्यवसाय से तो इंजीनियर थी पर भारतीय इतिहास और दर्शन में उस की रुचि इतनी गहरी थी कि उस के प्रश्नों के उत्तर दे पाने के लिए राहुल को खुद अपने देश के बारे में बहुत कुछ पढ़ना पड़ा. पर इस का यह अर्थ नहीं था कि राहुल और मीरा अपना जीवन गुरुकुल में पढ़ने वाले छात्रों की तरह बिताना चाहते थे.

पार्टी, पब, सैरसपाटा भी उन की फितरत में था. मीरा के दादा स्वीडन से आ कर अमेरिका में बस गए थे. मीरा अच्छे कदकाठी की, छरहरी, चमकती आंखों और सुनहरे बालों की वजह से स्वीडिश युवती की तरह दिखती थी. गोरी त्वचा के प्रति एक आम भारतीय की स्वाभाविक कमजोरी राहुल में थी ही. ऊपर से सुंदरता के हर मानदंड पर मीरा पूरी तरह से खरी उतरती थी.

उधर भारतीय प्रोफैशनल्स के अमेरिका में बढ़ते हुए दबदबे, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उन की कार्यनिष्ठा और जिम्मेदारी की बढ़ती हुई इज्जत के चलते राहुल भी मीरा के लिए एक बेहद आकर्षक नवयुवक था. सब से अच्छा यह था कि  मीरा को भारत में दिलचस्पी थी.

कुल मिला कर दोनों तरफ से आग बराबर लगी और 3 महीने बीततेबीतते मीरा की तरफ से राहुल को अपने दादाजी के घर पर आने का बुलावा भी मिल गया. उस के अपने पिता तो उस की मां को तलाक देने के बाद अपनी दूसरी पत्नी को भी त्याग कर तीसरी के साथ ब्याह रच चुके थे और उस की मां अपने दूसरे पति के साथ उस के टैक्सास स्थित रेंच पर रहने चली गई थी. पर मीरा के दादा और दादी 50 सालों से भी अधिक पुराने अपने विवाहित जीवन की आदर्श मिसाल कायम करते हुए न्यूजर्सी के एक उपनगर में रहते थे. मीरा दादादादी की बहुत प्यारी पोती थी.

राहुल उन से मिलने गया तो वे इतने प्यार से उस से मिले कि उसे अपने बचपन की याद आ गई. उस के बाद अधिक समय नहीं लगा था राहुल को यह निर्णय लेने में कि वही इस अमेरिकी मीरा का कृष्ण था. पर अपनी मम्मी को मीरा के विषय में आश्वस्त कर पाना उस के लिए टेढ़ी खीर थी.

एक सम?ादार और प्रतिभाशाली बेटे की हर इच्छा पर कुरबान होने वाले कुमार ने पहले तो राहुल को सम?ाया कि मां को खुश देखना है तो वह किसी भारतीय लड़की का चुनाव करे पर एक तो राहुल की अपनी इच्छा उन के लिए सब से महत्त्वपूर्ण थी, ऊपर से स्वीडिश रक्त वाली इस अमेरिकन लड़की के भारत

के बारे में अद्भुत बातें सुनसुन कर वे इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने सुजाता को राजी करने की जिम्मेदारी ले ही ली. उन्होंने राहुल को आश्वस्त कर दिया कि वह मीरा से विवाह कर पाएगा. उन्हें पता था कि सुजाता को राजी करने में सब से अधिक आसानी होगी मीरा की इस ख्वाहिश से कि वह भारत आ कर परंपरागत ढंग से भारतीय शादी रचाना चाहती थी.

 

मीरा के भारतीयता के प्रति रुचि का विस्तार में खाका खींचने के बाद जब अंत में

उस की इस ख्वाहिश का जिक्र कुमार ने किया तो सुजाता के मन से जैसे सैकड़ों मन का बो?ा हट गया. अपनी कूटनीतिक सफलता का जश्न मनाने के अंदाज में कुमार ने फिर राहुल को स्काइप पर बुला कर मां का स्नेह भी दिला दिया. इसी के अगले दिन राहुल ने मां को फिर लैपटौप के सामने खड़ा कर दिया. फिर उस खूबसूरत स्वीडिश अमेरिकन युवती ने जब मुसकरा कर ‘‘नैमेस्टे मम्मीजी,’’ कहा तो सुजाता का वात्सल्य खुशी के आंसुओं में बदल कर उन की आंखों में बह निकला.

उस पहली मुलाकात के बाद तो समय

जैसे पंख लगा कर उड़ने लगा. यह तय हो गया कि मीरा और राहुल दोनों साल के अंत में भारत आ जाएंगे और उसी सप्ताह में बाजेगाजे, धूमधड़ाके के साथ उन की पहले तो कानून के अनुसार शादी होगी और फिर भारतीय रीतिरिवाजों के बीच लंहगे और शेरवानी में हंसीमजाक व नाचगाना होगा.

शादी के बाद 1 सप्ताह और भारत में बिता कर वे वापस जाएंगे. हनीमून मनाने के लिए मीरा के ही आग्रह पर उदयपुर की ?ाल के बीच खड़े भव्य और सब से महंगे होटल में कमरा बुक करा दिया गया. मीरा के पिता या दादाजी नहीं आ सके तो कुमार साहब के सब से घनिष्ठ मित्र को यह किरदार निभाने के लिए कह दिया गया. ग्रैंड इंडियन वैडिंग हो यह सास और बहू दोनों की हार्दिक इच्छा थी.

सास की तमन्ना थी की दूरदूर से इकट्ठा हुए सारे रिश्तेदारों को अमेरिकन बहू के शुद्ध भारतीय संस्कार देख कर गर्व हो. सुजाता को विश्वास था कि खुशी के इस मौके पर उन के कुछ रिश्तेदार जो छोटे और मं?ोले शहरों से आने वाले थे, कोई कोताही नहीं करेंगे.

उस ने मन में गांठ बांध ली थी कि अपनी अमेरिकन बहू के भारतीय ढंग दिखा कर वे सब को चमत्कृत कर देंगी, सब के मुंह बंद करा देंगी. उस के बाद से ही स्काइप की सारी मुलाकातें मीरा के पूर्ण भारतीयता में खर्च होने लगी.

तुम आज भी पवित्र हो– भाग 2

क्षितिजा के पूछने पर कि उस की पत्नी और बच्चे कहां हैं तो कोल्डड्रिंक्स का गिलास उस के हाथ में पकड़ाते हुए उस का बौस नरेश कहने लगा कि खाने का सारा अरैंजमैंट उस की पत्नी ने ही किया है,

पर अचानक से उस के किसी दूर के रिश्तेदार, जो इसी शहर में रहते थे उन की मौत हो गई तो उसे फौरन वहां जाना पड़ा. वह बस आती ही होगी.

‘‘क्षितिजा यह सोच कर धीरेधीरे कोल्डड्रिंक्स के घूंट भरने लगी कि जब उस की पत्नी आ जाएगी तब सब साथ में ही खाना खाएंगे. मगर उसे इस बात की चिंता भी हो रही थी कि मां उस के लिए परेशान हो रही होंगी. अपने फोन की बैटरी लो होने के कारण, जब वह बौस के फोन से मुझे फोन लगाने लगी तो यह कह कर नरेश ने उस के हाथ से फोन ले लिया कि अब वह कोई छोटी बच्ची नहीं रही जो हर बात की खबर अपनी मां को देती रही.

‘‘अरे, अब तो वह शादी कर के अपने पिया के घर चली जाएगी तो क्या फिर भी मां को हर बात की जानकारी देती रहेगी? उस की बातों पर क्षितिजा भी मुसकरा पड़ी.

लेकिन उसे एहसास होने लगा कि उस की आंखें बोझिल होने लगी हैं. कुछ समझबोल पाती, उस से पहले ही वह वहीं सोफे पर लुढ़क गई.

‘‘सुबह जब उस की आंखें खुलीं तो उस ने खुद को एक बड़े से बैड पर पाया. उस का पूरा बदन दर्द के मारे टूट रहा था. लग रहा था जैसे किसी ने उस के शरीर को मचोड़ कर रख दिया हो. मगर हैरान तो वह तब रह गई जब उस ने अपने को बिलकुल वस्त्रहीन पाया. फिर अचानक उसे मेरा खयाल आया और जैसे ही वह बैड पर से उठने की कोशिश करने लगी. नरेश सामने आ कर खड़ा हो गया. उस के हाथ में शराब से भरा गिलास था.’’

‘‘एक बड़ा सा घूट भरते हुए वह बोला कि आराम से… आराम से… वैसे ठीक तो हो न?’’ वह कुछ समझबूझ पाती नरेश उसे घूरते हुए बोला बहुत मजा आया सच में… तुम ने मेरी रात रंगीन कर दी. इस रात को मैं हमेशा याद रखूंगा. बोल कर वह जोर से हंसा और फिर शराब से भरा गिलास एक बार में ही गटक गया.

‘‘नरेश को इस रूप में देख और उस की बातें सुन कर क्षितिजा की आंखें हैरानी से फैल गई. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि नरेश ने उस के साथ ये सब कुछ किया? चादर से ही अपने नंगे बदन को किसी प्रकार ढकती हुई बोली कि तो तुम ने मेरे साथ…धोखे से अपने घर बुला कर तुम ने मेरा बलात्कार किया? और वहां मेरी मां…

‘‘क्षितिजा की बातों पर वह जोर से हंसा और फिर बोला कि तो क्या अपनी मरजी से तुम मेरे साथ सोने के लिए राजी हो जाती? और मां… हा…हा…हा…

कर वह ठहाके लगाने लगा.’’

‘‘उस की बेशर्मी देख गुस्से से क्षितिजा की आंखें लाल हो गईं. ललकारते हुए बोली कि ठीक है अब देखो मैं क्या करती हूं.

कहीं का नहीं छोडूंगी मैं तुम्हें. सब बताऊंगी पुलिस को कि किस तरह से तुम ने मुझे धोखे से अपने घर बुलाया और फिर कैसे मेरी बेहोशी का फायदा उठाया. बोल कर वह कमरे से निकलने लगी कि नरेश ने यह बोल कर उस का मुंह बंद कर दिया कि अगर उस ने ऐसा सोचा भी तो वह उस का न्यूड वीडियो जो उस ने बना लिया है उसे वायरल कर देगा. इसलिए उस की भलाई इसी में है कि अपना मुंह बंद रखे.’’

सारी बात सुन कर नमन का खून खौल उठा. मन तो किया उस का कि अभी जा कर उस नरेश का खून कर दे, पर उस ने अपने गुस्से पर कंट्रोल कर लिया और सोचने लगा कि अगर उस शख्स के खिलाफ पुलिस में शिकायत करे तो वह खबर तुरंत अखबारों और टीवी की सुर्खियां बन जाएगी और तब शायद क्षितिजा और अवसाद में चली जाएगी, हो सकता है बदनामी के डर से वह खुद को ही खत्म कर ले.

लेकिन अगर दोषी को सजा नहीं मिलती है तो भी खौफ में वह जी नहीं पाएगी.

क्या शादी के बाद बलात्कार को याद कर वह अपना वैवाहिक जीवन अच्छी तरह जी पाएगी कभी? ‘नहीं, मैं अपनी क्षितिजा को यों घुटघुट कर मरते नहीं देख सकता. मैं इसे इस अवसाद से बाहर निकाल कर ही रहूंगा और इस के लिए चाहे मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े मैं पीछे नहीं हटूंगा, और फिर मन ही मन नमन ने फैसला कर लिया कि अब उसे क्या करना है. नमन और क्षितिजा कालेज के समय से ही एकदूसरे से प्यार करते थे. उन की शादी से उन के परिवार वालों को भी कोई आपत्ति नहीं थी पर वे दोनों चाहते थे कि जौब लगने के बाद ही शादी के बंधन में बंधे. नौकरी लगते ही वादे के अनुसार दोनों ने शादी करने का फैसला ले लिया. कुछ दिन बाद ही दोनों की सगाई होनी थी और ये सब हो गया.

दिनप्रतिदिन क्षितिजा को और अवसाद में जाते देख उस के माता-पिता और नमन बहुत परेशान थे. सब ने अनेक प्रकार से उसे समझाने की कोशिश की, पर उसे तो जैसे काठ मार गया था. न तो वह किसी से ठीक से बात करती थी और न ही ठीक से कुछ खातीपीती थी. दिनबदिन शरीर और कमजोर होता जा रहा था. अंदर ही अंदर टूट रही थी. उस मंजर को याद कर कभी-कभी आधी रात में ही उठ जाती और फिर उसे संभालना काफी मुश्किल हो जाता था.

आज फिर वही भयानक दृश्य क्षितिजा को दहला गया और वह घबरा कर उठ बैठी. उस की आंखों से टपटप आंसू बहने लगे. उस की हथेलियों को अपने दोनों हाथों के बीच दबा कर नमन कहने लगा. ‘‘क्षितिजा, मेरी तरफ देखो, अकेली तुम ही एक लड़की नहीं हो इस दुनिया में जो इस दुख से गुजर रही हो. ऐसी कितनी लड़कियां होंगी जो इस दुख से गुजरी होंगी और गुजर रही होंगी, तो क्या सब ने हिम्मत हार दी होगी? जीना छोड़ दिया सब ने? अरे, गलती किसी और ने की है. फिर तुम क्यों खुद को सजा दे रही हो बोलो?

देखो अपनी मां की तरफ, क्या हालत हो गई है उन की और देखो मेरी आंखों में, क्या लगता है कि अब इन आंखों में तुम्हारी तसवीर नहीं है?

‘‘क्षितिजा,

तुम यह बिलकुल मत समझना कि किसी के छूने भर से तुम्हारा कौमार्य भंग हो गया या तुम अपवित्र हो गई या फिर पहले की तरह नहीं रही. फालतू की बातों को कभी अपने ऊपर हावी मत होने देना तुम. आज भी मेरे लिए तुम उतनी ही मासूम और पवित्र हो जितनी पहले थी और देखना, उस पापी को उसके किए की सजा एक दिन जरूर मिलेगी,’’ कह कर नमन ने क्षितिजा को अपने सीने से लगा लिया.

आगे पढ़ें- नमन किसी तरह उसे उस खौफ से बाहर निकालना

करना पड़ता है: धर्म ने किया दानिश और याशिका को दूर- भाग 1

‘क्यासोच रही हो मम्मी?’’

नौशीन ने एक ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘सोचने को तो अब बहुत कुछ है, बेटा. तुम ने तो बहुत गलत जगह दिल लगा लिया,’’ कहतेकहते वे अपने बेटे दानिश को देख कर परेशानी में भी मुसकरा दी जो उन का स्वभाव था.

दानिश गंभीर रहा, आजकल परेशान तो मांबेटा दोनों ही थे. दानिश को अपनी सहकर्मी यशिका से मुहब्बत हो गई थी और अब वह उस से शादी करना चाहता था. मुलुंड, मुंबई में नौशीन और दानिश, ये 2 ही थे घर में.

नौशीन के पति अब इस दुनिया में नहीं थे. नौशीन ने अपने बेटे की बहुत अच्छी परवरिश अकेले ही की थी. वे खुद भी एक अच्छी कंपनी में कार्यरत थीं. मांबेटा अब दोस्तों की तरह थे. दानिश ने जब पहली बार यशिका से उन्हें मिलवाया, वे उस से मिल कर खुश ही हुईं थीं. वैसे भी आजकल मांएं बच्चों की पसंद में अपनी सहमति खुशीखुशी दे देती हैं और नौशीन तो महानगर में ही पलीबढ़ी, खुली सोच वाली महिला थीं. उन का मायका, ससुराल सब मुंबई में ही थे पर नौशीन उन सब की पुरातनपंथी सोच से अलग थलग रहने में ही सुकून पातीं.

आज शनिवार था. नौशीन और दानिश की औफिस की छुट्टी थी. शाम के 5 बजे थे. डोरबैल हुई तो नौशीन ने दानिश से कहा, ‘‘जाओ, दरवाजा तुम ही खोलो. तुम्हारे लिए ही कोई आया होगा.’’

यह मांबेटे का खेल था कि दोनों कोशिश करते कि दरवाजा उसे न खोलना पड़े. सब्जी, दूध वाला आता तो दानिश हंसता, ‘‘जाओ, आप के लिए ही कोई आया है.’’

 

यह यशिका के आने का ही टाइम था. दोनों जानते थे. वह अकसर शनिवार की शाम

आती. कभी तीनों डिनर पर निकल जाते, कभी मूवी देखने चले जाते, कभी घर पर ही तीनों अच्छा हंसीमजाक कर टाइम पास करते. देखने में एकदम परफैक्ट फैमिली पिक्चर लगती पर अभी कहां. अभी तो इस मुहब्बत के सामने जाति की दीवार ऐसे खड़ी थी जिसे हटाने के लिए रोज नए मंसूबे बनते, धराशायी होते.

यशिका ही थी. आते ही उस ने हाथ सैनिटाइज किए, अपना बैग एक तरफ पटका, नौशीन के गले मिली और दानिश को ‘हाय’ कहते हुए नौशीन के पास बैठ गई. पहले आम हालचाल हुए फिर यशिका ने जोश से पूछा, ‘‘आंटी, आज तो बड़ी मुश्किल से घर से निकली. पापा पता नहीं क्यों आज फ्री थे. आज उन की कोई राजनीति वाली बैठक नहीं थी. घर में ही मु?ो पकड़ कर पूछने लगे कि शादी के बारे में क्या सोचा है. मैं ने कहा कि जब सोचूंगी, आप को ही बताउंगी तो बोले कि मु?ो बस इतना ही कहना है कि लड़का अपनी जाति का हो, बस यह ध्यान रखना. मैं ने सोचा, आज मौका मिला है तो मैं भी उन्हें कुछ हिंट दे देती हूं, मैं ने कहा कि पापा, किसी को पसंद करना अपने हाथ में थोड़े ही होता है. देखो, कौन पसंद आता है. कास्ट का क्या है, इंसान अच्छा होना चाहिए, बस, आंटी, पापा को जैसे करंट लगा. बोले कि ये सब फिल्मी बातें मत करो मु?ा से. जातबिरादरी से बाहर किसी को पसंद करने की सोचना भी मत.

‘‘तुम्हारा भी नुकसान होगा, उस लड़के का भी. इस धमकी पर मु?ो गुस्सा तो बहुत आया, पर चुप रह गई और मेरी मम्मी. क्या कहूं उन्हें. पापा की हर गलत बात को चुपचाप सहती हैं, कभी उन्हें किसी भी गलत बात का विरोध करते नहीं देखा और घरों में मांएं कम से कम अपने बच्चों के लिए तो खड़ी हो जाती हैं और मेरे घर में तो मेरी मम्मी ने मु?ो ही इस बात पर आंख दिखाई. आंटी, आप ही कुछ करो.’’

नौशीन हंस पड़ीं, ‘‘वाह, इश्क तुम लोग फरमाओ, समाधान मैं ढूंढूं. तुम्हारे नेता कट्टर पापा से मैं निबटूं?’’

दानिश ने कहा, ‘‘मां हो मेरी. कुछ तो आप को करना ही पड़ेगा. हमें नहीं पता, पर आप ही देखो, मम्मी, कैसे क्या करना है.’’

दोनों बच्चों को स्पेस देते हुए नौशीन ‘अभी आती हूं’ कह कर अपने रूम में चली गईं. दानिश की पसंद यशिका उन्हें भी पसंद थी. वे चाहती थीं कि जल्दी से उन की शादी हो जाए. पर यशिका के पापा कट्टर हिंदू थे, जो किसी भी तरह एक मुसलिम लड़के से अपनी बेटी का विवाह हरगिज न होने देते. लोकल न्यूजपेपर में उन की गतिविधियां नौशीन अच्छी तरह पढ़ चुकी थीं पर कुछ तो करना पड़ेगा. उन्होंने बैठेबैठे बहुत सोचा कि वे कैसे उन्हें इस विवाह के लिए मना सकती हैं, वे बहुत सुंदर, स्मार्ट और होशियार थीं. इस समस्या को सुल?ाने का समाधान उन्हें जब सू?ा तो मन ही मन खुद को शाबाशी दे बैठीं. खयाल ही ऐसा आया था कि उन्हें अपने आइडिया पर रोमांच भी हुआ और हंसी भी आई.

नौशीन लिविंग रूम में आईं, बच्चों को अपने आइडिया के बारे में अभी नहीं बताना चाहती थीं. धीरेधीरे आराम से हर कदम सोच कर आगे बढ़ाना चाहती थीं. दोनों टीवी पर कोई शो देख रहे थे, नौशीन ने पूछा,

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