चांद के पार – भाग 2 : जया के जीवन में अकेलापन ही क्योंं बना रहा

अब जब भी शिव शाम को सैर के लिए निकलते, जया को साथ लेना न भूलते. जया भी तैयार हो कर उन की बाट जोहती. बोलतेबतियाते, एकदूजे के सुखदुख बांटते वे बहुत दूर निकल जाते. रास्तेभर शिव जया का खयाल रखते और जया भी उन के अपनेपन की ठंडी फुहार में भीगती रहती. कभी गगनचुंबी पेड़ों के नीचे बैठ कर वे अपनी थकान मिटाते तो कभी  झील के किनारे बैठ पानी में तैरने वाले पक्षियों से बच्चों की तरह खेलते.

न जाने कितनी बार शिव ने जया के दिवंगत को जानने के लिए उसे कुरेदा होगा पर उस की पलकों पर उतर आए खामोशियों के साथ को ही समेट कर इतना ही जान सके कि 30 साल पहले उस के पति की मृत्यु कार दुर्घटना में हुई थी. अपने बेटे यश को उन्होंने अपने बलबूते पर इतना काबिल बनाया है. जहां पर शिव अपनी पत्नी पद्मा को याद कर विह्वल हो जाते थे वहीं पर जया

अपने पति की स्मृति से उदासीन थी. उस की असहजता को देखते हुए उन्होंने उस के अतीत की चर्चा फिर कभी नहीं की. कुछ ही दिनों में जया और शिव के बीच की औपचारिकताएं न के बराबर रह गईं. घर के सदस्यों को अपने गंतव्य की ओर जाते ही या तो शिव जया के पास आ जाते या जया उन के घर चली जाती. दिनभर का लंबा साथ उन दोनों को ताजगी से भर देता. फिर देश भी ऐसा कि जहां किसी को किसी और को देखने की फुरसत नहीं होती है. बहुत हुआ, तो हायहैलो कहकह कर आगे बढ़ गए.

ऊंचेनीचे कटे चट्टानों पर उगे जंगलों के बीच बने आलीशान महलों को निहारते समय शिव हमेशा जया की कलाई को थामे रहते. जया को थोड़ा सा भी लड़खड़ाना शिव को बेचैन कर देता. जिस तत्परता से शिव उसे अपनी बांहों में समेटते, उतनी सहजता से जया उन की बांहों में सिमट आती, फिर सकपका कर अलग हो जाती. वहां पर किसी को किसी से मतलब ही कहां कि ऐसी छोटीछोटी बातों को तूल दे. ऐसे ही मधुयामिनी बने उन दोनों के दिन गुजरते रहे.

बारिश और धूप की आंखमिचौली शिव और जया के बीच की दूरियां समाप्त करती रही. एकदूसरे में वे ऐसे खोए कि विगत की सारी खट्टीमीठी यादें विस्मृत हो गई थीं. जया के सघन घने बाल शिव के कंधे पर कब लहराने लगे, कब शिव जया को अपनी भुजाओं में समेटने लगे, यह सोचने के लिए उन दोनों को होश ही कहां था.

एकदूसरे में समाहित होने की व्यग्रता को उन का मर्यादित विकल मन अथक प्रयास को  झेलता रहा. स्वयं के परिवर्तित रूप पर दोनों आश्चर्यचकित थे. 5 दिनों के साथ के बाद सप्ताहांत के अंतिम 5 दिनों में जब दोनों के परिवार घर में रहते थे, तो इस उम्र में भी वे एकदूजे के सान्निध्य को तड़प उठते थे.

हमेशा अकेलेपन का रोना रोने वाली उदासी की प्रतिमूर्त बनी जया के चेहरे पर छाई खुशियों की लालिमा उन के बेटे यश और बहू अणिमा से छूटी नहीं रही. जया को खुश देख कर यश की प्रसन्नता का कोई ओरछोर नहीं था. यश ने जब से होश संभाला, उस ने जया को हमेशा ही उदास और सहमा हुआ पाया. अपने पापा की गरजती आवाज से डर कर हमेशा वह जया की गोद में छिप जाया करता था. दूसरों के समक्ष अकारण ही मम्मी को तिरस्कृत करना, उन के कामों में नुक्स निकालना, उन के मायके वालों को अनुचित बातें कहना, सभी अपनों के साथ अप्रिय आचरण करना आदि पापा की बेशुमार असहनीय आदतें थीं.

औफिस हो या घर, शायद ही कोई उन्हें पसंद करता था. उसे याद नहीं कि उन्होंने अपने इकलौते बेटे को गोद में उठा कर कभी प्यार किया हो. बाद में उस ने जाना कि मम्मी का अपार सौंदर्य की स्वामिनी के साथ अति प्रतिभाशालिनी होना अतिसाधारण रंगरूप और अतिसाधारण शैक्षणिक योग्यता रखने वाले पापा को कभी न सुहाया. उन में  झूठी गलतियां निकाल, उन्हें अकारण तिरस्कृत कर के जब तक जीवित रहे अपने अहं को संतुष्ट करते रहे. आएदिन शराब के नशे में मम्मी को शारीरिक रूप से प्रताडि़त कर के अपनी खी झ उतारते रहे.

समझ आने पर जब भी उस ने मम्मी को बचाने की कोशिश की, पापा ने उसे रुई की तरह धुन कर रख दिया. पापा की इन्हीं गतिविधियों के कारण उन से प्यार करना तो दूर, वह कभी उन का यशोचित सम्मान भी न कर सका. उस के लिए सारे रिश्तों की पर्याय उस की मां ही बनी रही. कार दुर्घटना में हुई पापा की मृत्यु ने दुख के बदले आए दिनों की जिल्लतों से उन्हें मुक्ति ही मिली थी. मैथ्स विजार्ड कही जाने वाली उस की मम्मी ने कोचिंग सैंटर क्या जौइन किया कि घर में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की कतार लग कर उन की सारी आर्थिक समस्याओं का समाधान कर गया. आज वह जो कुछ भी है, अपनी मम्मी की अटूट साधनाओं व तपस्याओं के कारण ही.

जीवन में हर स्त्री को सुयोग्य जीवनसाथी की कल्पना होती है. मम्मी को वह कभी नहीं मिला. पूरा जीवन अपनी आशाओं, आकांक्षाओं और कामनाओं के दहकते रेगिस्तान में नंगेपैरों वह दौड़ती रही. उस के राह की सारी बाधाओं को अपने पलकों से चुनती रही. क्या पता शिव अंकल के साथ ने इस उम्र में वर्षों की उन की मुराद पूरी कर दी हो. जयाजी के उच्चारण से शिव अंकल की जबान भी तो नहीं थकती. कितने खिल उठते हैं वे मम्मी को देख कर ही. उसे, अणिमा और अंश पर भी बड़े अधिकार से स्नेह बरसाते रहते हैं.

अपनी मां के जीवन में खुशियां लाने के लिए निम्न जाति से आने वाले शिव अंकल की याचना भी करनी पड़ी तो उसे रंचमात्र भी मलाल न होगा. उसे पूरा विश्वास है कि वे मम्मी को बहुत पसंद करते हैं. पिया भी उस की मम्मी को मानसम्मान देने के साथ उन्हें कितना चाहती है. उस की मम्मी है ही ऐसी कि उन के मोहपाश में सभी बंध जाएं. वह पिया से बात करेगा, ऐसा सोच कर यश खुशियों से भर उठा.

शिव के साथ जया के घिसटने वाले दिन पंख लगा कर उड़ते रहे. 5 महीने पहले उस रोज वक्त की शाख से जिंदगी के कुछ बरस उस ने तोड़े तो याद आया कि न जाने कितने बरस हुए उसे जिए हुए. अब तक के सफर में दौड़तेभागते जाने कितने बरस फिसलते रहे. लेकिन उसे इतना भी वक्त न मिला कि अपनी खुशियों के बारे में वह कभी सोच सके.

काले सघन बरसते बादलों के बीच मचलती हुई दामिनी के साथ शिव ने उस की कलाई को क्या थामा कि उस के भीतर मानो सालों सूखे पर सावन की कुछ बूंदें बरस उठीं. उस के मन की दुनिया का खाली और उदास कोना अचानक जैसे भर गया हो. शिव के अपनेपन से उस की आंखें ऐसे छलकीं कि कठिनाइयों और दुखों से भरे उस के अतीत के सारे बरस बह गए. माना कि प्यार के फूल उम्र की शाखाओं पर नहीं खिलते पर ऐसा भी तो होता है कि दुनिया की हर रीत, हर रस्म से बहुत दूर खिलता है प्यार का कोईर् फूल और महक उठती है पूरी धरती.

दुनिया के किसी भी कोने में, उम्र के किसी भी मोड़ पर प्यार आ कर थाम लेता है कलाई और टूट जाती है सारी रवायतें. शिव के बिना जया जीने की कल्पना से कांप उठी. अपार सौंदर्य और प्रतिभाशालिनी जया को यश के साथ ही अपनाने के लिए कितनों ने हाथ बढ़ाया था, कितनों ने प्रणय याचना की थी, पर पाषाण बनी जया सारे प्रस्तावों को बड़ी निर्ममता से ठुकराती रही.

GHKKPM: पत्रलेखा को हराएंगे विराट, सौतन की खातिर जान कुरबान करेगी सई

नील भट्ट और आयशा सिंह  स्टारर शो “गुम है किसी के प्यार में” मीडिया की सुर्खियों  बना हुआ है. शो में आए नए मोड़ शो को दिन पर दिन एंटरटेनिंग बना रहे है.

इन दिनों शो में पत्रलेखा और विराट के बीच खूब प्यार के फूल खिल रहे हैं, तो वहीं सई की जिंदगी में परेशानियां बढ़ती जा रही हैं. बीते दिन भी ‘गुम है किसी के प्यार में’ में दिखाया गया था कि सई अपनी शादी के दिन को विराट के सामने मनहूस बताती है. वहीं पत्रलेखा सई के सामने एक आदर्श बहू साबित होती है.लेकिन, आयशा सिंह के ‘गुम है किसी के प्यार में’ में आने वाले मोड़ यहीं खत्म नहीं होते हैं.

 

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आपको बता दें कि शो में आगे दिखाया जाएगा कि एक गेम में जहां पत्रलेखा अपने पति विराट की सारी पसंद बता देती है लेकिन जब विराट की बारी आती है तो वह फेल हो जाते है. वह  दो सवालों के सही जवाब दे पाता है, जिससे बाकी बच्चों के पैरेंट्स उसका मजाक बनाना शुरू कर देते हैं. इस बात से पत्रलेखा काफी नाराज हो जाती है.

फूट-फूट कर रोई पत्रलेखा

बता दें, ये गेम पिकनिक के दौरान खेला जाता है.प्रिंसिपल मैम के हाथ में सवि के मां-पापा की चिट आती है, जिससे पत्रलेखा घबरा जाती है. दूसरी तरफ सई भी गेम में जाने से मना कर देती है और तो और सवि को भी डांट देती है.लेकिन अपनी बेटी की खुशी की खातिर विराट खेलने के लिए तैयार हो जाते है.गेम में सई गलत जवाब देने की कोशिश करती है, लेकिन इसके बाद भी उसके सारे जवाब सही हो जाते हैं.दूसरी तरफ ये सब देखकर पत्रलेखा फूट-फूट कर रोती है.

 

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अपनी जान कुरबान करेंगी सई

शो यही खत्म नहीं होता है शो में आगे दिखाया जाता है कि हादसे में सई, विराट और पाखी की खातिर अपनी जान कुरबान कर देगी. दरअसल, बस में जहां एक तरफ पाखी लटकी होगी तो वहीं दूसरी तरफ सई लटकी होगी, जिससे विराट असमंजस में पड़ जाएगा कि वह पहले किसे बचाए. ऐसे में सई हैंडल का ग्रिप छोड़ देगी, जिससे विराट पाखी को बचा सकेंगे.

Bigg Boss 16: निमृत और साजिद की दोस्ती में आई दरार, टास्क में की यें हरकत

कलर्स टीवी का रियलिटी शो बिग बॉस16 ने सभी शो को पछाड़ दिया है टीआरपी की रेस में बग बॉस16 टॉप पर चल रहा है. घर के सदस्यों के बीच नई दोस्ती और खटास लोगों को काफी एंटरटेन कर रही है. जी हां, ऐसे में दो दोस्त बिछड़ते नजर आए है.

आपको बता दे, कि घर में किसी न किसी बात पर कंटेस्टेंट्स लड़ते रहते हैं. शो में साजिद खान और निमृत कौर के बीच काफी अच्छा बॉन्ड देखने को मिला है. लेकिन, अब दोनों के बीच भी खटास आती दिख रही है. बीते एपिसोड में कुछ ऐसा देखने को मिला, जिससे साफ हो गया कि साजिद खान, निमृत कौर से थोड़ा नाराज हुए हैं और उन्होंने निमृत के खेल पर भी सवाल उठाए हैं.

 

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बीते एपिसोड में दिखाया गया कि कैप्टेंसी टास्क हुआ और ये पूरा टास्क साजिद खान और उनके करीबियों के हाथ में रहा. कैप्टेंसी की रेस में प्रियंका चहर चौधरी, शालीन भनोट, सुंबुल तौकीर खान, टीना दत्ता और सौंदर्य शर्मा शामिल थीं. वहीं, बाकी कंटेस्टेंट्स को बताना था कि वह किन तीन को कैप्टन बनाना चाहते हैं. इस प्रक्रिया में साजिद खान आखिर में जाना जाते थे लेकिन निमृत लास्ट में जाने पर अड़ गई थीं. वहीं, अंकित गुप्ता भी लास्ट में जाना जाते थे क्योंकि जो भी लास्ट में जाएगा.  उसी के हाथ में पूरी गेम होगी. इस टास्क में एक लंबी बहस के बाद निमृत ही लास्ट में सौंदर्या, सुंबुल और टीना का नाम लेते हुए उन्हें कैप्टन बनाती हैं.

डबल ढोलकी है निमृत कौर

इस पूरे टास्क के बाद साजिद खान अपने दोस्त शिव ठाकरे से कुछ बात करते हुए नजर आए थे, जिसमें उन्होंने निमृत को डबल ढोलकी कहा. साथ ही उन्होंने यह भी माना कि निमृत गेम को हमेशा आगे रखेंगी. साजिद खान शिव ठाकरे से यह कहते हुए नजर आए कि वह टास्क में लास्ट में जाना नहीं चाहते थे. लेकिन उस समय वह सिर्फ निमृत का टेस्ट ले रहे थे. आज उन्हें समझ आ गया कि निमृत हमेशा ही खेल को आगे रखेंगी. वह हम लोगों के साथ हैं लेकिन गेम में वह हमारी नहीं हैं.साजिद की इस बात से साफ है कि अब उन दोनों के बीच भी तकरार आना शुरू हो गया है.

 

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मिनी का वैक्सीनेशन : जब घर से बाहर निकली मिनी तो क्या हुआ?

बड़ी मुश्किल से मुंबई से दूर एक अस्पताल में मिनी ने कोरोना के वैक्सीन का रजिस्ट्रैशन क्या कराया, सालभर बाद ऐसे लगा जैसे घर में कोई उत्सव का माहौल हो. महीनों बाद मिनी घर में गाना गाते हुए झूम रही थी.

लौकडाउन के दौरान अपने घर में बंद, औफिस के औनलाइन काम की वजह से अकसर तनाव में रहने वाली मिनी के लिए यह कोई आम खुशी भी नहीं थी. यह बहुत दिनों बाद घर से निकलने की खुशी थी, भले ही मकसद अस्पताल जाना ही क्यों न हो. एक युवा लड़की ठाणे से 1 घंटे की दूरी पर अस्पताल के लिए निकलने पर इतना खुश है, तो एक मां को तो आश्चर्य होगा ही. उस पर यह कि दोस्तों के साथ जाने का प्रोग्राम अचानक बन भी गया.

मिनी ने फरमाया, ”मां, वापस आते हुए मुझे थोड़ी वीकनैस या घबराहट हो सकती है न, तो रोहित को बोल दिया है कि वह मेरे साथ चलेगा. कार वही चला लेगा.”

मेरे कान खड़े हो गए. मां हूं उस की, समझ गई कि आउटिंग का प्रोग्राम बन रहा है दोस्तों के साथ.

मैं ने कहा, ”पर अभी किसी से मिलना ठीक है क्या?”

”मां, वह भी कोरोना को ले कर उतनी ही सावधानियां बरत रहा है जितनी हम. और उसे तो पहला डोज लग भी चुका है. वह सब के लिए फेसशील्ड ले कर आएगा और हम चारों कार में भी डबल मास्क लगा कर रखेंगे.‘’

देखा, मैं सही थी. मिनी यों ही गाना और डांस नहीं कर रही थी.

मैं ने उसे अपनी स्पैशल मांबेटी की अच्छी बौंडिंग वाली स्माइल देते हुए कहा, ”बदल दिया न अपने वैक्सीनेशन को एक पिकनिक में… सब जाओगे न? इतने लोगों को देख कर पुलिस वाले रोकेंगे तो?”

”अरे मां… बहुत बढ़िया प्रोग्राम बन गया है. कोई भी नहीं निकला न इतने दिनों घर से. रोहित मेरी कार चलाएगा, कोई रोकेगा तो हम कहेंगे कि वैक्सीन लगवाने जा रहे हैं. पूजा को भी जा कर पता करना है वैक्सीन का. जय को तो 2 महीने पहले कोरोना हो चुका है, बोल देंगे, फौलोअप के लिए जा रहा है.

“मां, सब इतने ऐक्साइटैड हैं न… हमलोग लगभग 4 महीने बाद मिलने वाले हैं. ओह, मां, वी आर सो ऐक्ससाइटैड…’’और फिर मिनी जोर से हंस पड़ी, ”मां, पता है, रोहित और पूजा ने तो अभी से सोचना शुरू कर दिया है कि वे क्या पहनेंगे.

“मैं तो अपनी स्लीवलैस ड्रैस पहन जाउंगी, एक बार भी नहीं पहनी थी कि लौकडाउन लग गया. चलो, जल्दी से अपना कल का काम निबटा लेती हूं, नहीं तो मेरा बौस कल मुझे ऐंजौय नहीं करने देगा. और मैं ने रिमी को भी कहा है साथ चलने के लिए…’’

”अरे, रिमी…उस के पेरैंट्स को तो कोरोना हुआ है न? वे तो अस्पताल  में भरती हैं ?”

मिनी थोड़ी उदास हुई,”हां, मां, वह आजकल अपने मामामामी के साथ रह रही है. अब जब बाहर जा ही रहे हैं तो उसे भी ले जाती हूं.‘’

अभी तक वहीं चुपचाप बैठे सारी बात सुन रहे अनिल ने मिनी के जाने के बाद कहा, ”यार, रश्मि, क्या बच्चे हैं आजकल के… ऐसा लग रहा है कि वैक्सीन के लिए नहीं, बल्कि पिकनिक पर जाने का प्रोग्राम बन रहा है.”

”हां, यार… बच्चे कैसे तरस रहे हैं एकदूसरे से मिलने के लिए. यह छोटी सी खुशी आज इन के लिए कितनी बड़ी बात हो गई है. बेचारी रातदिन लैपटौप पर बैठी काम ही कर रही है. आज कितने दिनों बाद खुश दिख रही है.

“ओह, कोरोना ने तो इन बच्चों को बांध कर रख दिया, बेचारे सच में कब से नहीं निकले हैं.”

गजब की तैयारियां हो रही थीं. सुबहसुबह ही हेयर मास्क लगाया गया, स्किन केयर हुई, शैंपू से बाल धोए गए, ड्रैस के साथ स्टाइलिश शूज निकाले गए, जो सालभर से डब्बे में ही बंद थे. तय हुआ कि मिनी ही सब को ले कर निकलेगी फिर ठाणे से बाहर जा कर रोहित कार चलाएगा.

यहां पर बाकी मम्मियों के उत्साह की भी दाद देनी पड़ेगी. मिनी ने बताया, ”एक बात बहुत अच्छी हो गई मां, सब आंटी ने कह दिया है कि बहुत दिनों बाद निकल रहे हो, तो अच्छी तरह घूमफिर कर आना, जब निकल ही रहे हो तो और ऐंजौय कर लेना.”

लगे हाथ मैं ने भी मिनी को छेड़ा, ”क्या पता, बाकी मांओं को भी एक ब्रेक इस बहाने आज अपने बच्चों से मिल ही जाए.‘’

जैसी उम्मीद थी, ठीक वैसे ही घूरा मिनी ने मुझे इस बात पर. बोली, ”हम  1 बजे निकलेंगे, 3 से 5 का टाइम है, मेरा डिनर मत बनाना, कुछ खुला होगा तो मैं अपनी पसंद का कुछ पैक करवा कर लाऊंगी,’’ फिर उस ने अभी किए गए मेरे मजाक का बदला भी हाथ के हाथ उतार दिया, ”एक ब्रेक चाहिए मुझे भी घर के खाने से, हद हो गई है रातदिन घर का खाना खाते हुए.”

मुझे हंसी आ गई. मिनी चली गई, वहां जा कर फोन किया, ‘’1,100 लोगों का अपौइटमैंट था, लंबी लाइन है. धूप भी बहुत तेज है, रोहित को कार काफी दूर पार्क करनी पड़ी है और यहां मैं अब अकेली ही लाइन में हूं, पर अच्छा लग रहा है.”

हर समय एसी के लिए शोर मचाने वाली मिनी दोपहर के 3 बजे लाइन में खड़ी है और उसे अच्छा लग रहा है, आवाज में कोई झुंझलाहट नहीं, खिलखिलाती सी आवाज. दरअसल, यह दोस्तों के साथ का असर है जो लगातार चैट कर रहे होंगे अब. जानती हूं मैं इन बच्चों को, डायरी ऐंट्री की तरह चारों हर समय एकदूसरे को अपनी बातें बताते रहते हैं.

वैक्सीन मिनी को लग गई. फोन आ गया, ”सब हो गया मम्मी, अब थोड़ा खानेपीने की अपनी पसंद की जगहें देख लें. काश, कुछ तो खुला हो.”

हालांकि मैं ने उसे बिस्कुट और पानी दिया था, कहा था,”कुछ खा लेना.‘’

”अरे, मम्मी, यह पूजा की मम्मी ने तो उसे छोटेछोटे जूस के पैकेट्स, स्नैक्स दिए हैं, उन्हें भी यही लग रहा था कि हम आज पिकनिक पर जा रहे हैं और रोहित और जय की मम्मी ने भी ऐसे ही कुछकुछ बैग में रख दिया था. हम तो बारबार कुछ न कुछ खाते ही रहे, मां, बहुत मजा आ रहा है…चलो, अब आ कर बात करते हैं.‘’

मेरी मिनी एक अरसे बाद आज खुश थी, चहक रही थी. मेरे लिए इतना बहुत था. दिल भर सा आया. कैसा टाइम आ गया है कि दोस्तों से मिलने के लिए तरस गए सब. कहां हर तरफ, हर जगह युवा मस्ती करते दिखते थे, जहां नजर जाती थी एक मस्ती सी दिखती थी, अब कहां बंद हो गए बेचारे.

इन की क्या बात करूं, मैं ही मिनी के दोस्तों का घर आना कितना मिस करती हूं. कैसे हंसीमजाक का दौर हुआ करता था, कैसी रौनक रहा करती थी, लेकिन अब? अब कैसा अकेलापन सब के मन पर छाया रहता है, कितना डिप्रैसिंग माहौल है.

शाम को घर की घंटी बजी. मिनी आई थी. आते ही आजकल सब सामान सैनिटाइज कर के सीधे वाशरूम ही जाना होता है.

”नहा कर आती हूं मां, ”कह कर मिनी वाशरूम की तरफ चली गई. मैं ने महसूस कर लिया कि वह फिर उदास और चुप है. नहा कर निकली तो बोली,”कुछ दुकानें खुली थीं, कुछ पैक करवा कर लाई हूं, चलो, आप लोग खा लो.‘’

”तुम? भूख लगी होगी?”

फिर वही बुझी सी आवाज,” मैं ने दोस्तों के साथ खा लिया था, अब भूख नहीं है.‘’

मैं ने उसे अपने साथ लिपटा लिया, ”अरे, मिनी, फिर उदास हो गईं?अच्छा, यह बताओ, रिमी कैसी है? उस के पेरैंट्स कैसे हैं?”

मिनी इस बात पर सुबक उठी, ”वह तो डरी हुई है. बता रही थी कि हर पल उसे यही डर लगा रहता है कि उस के मम्मीपापा को कुछ हो न जाए. फोन की हर घंटी पर डरती है. उस का मन तरस रहा है कि कब उस के मम्मीपापा ठीक हो कर घर आएं तो वह उन के साथ अपने घर जाए.

“बता रही थी कि न उसे नींद आती है, न भूख लगती है, उस का वेट भी कम है गया है. हमारी जिद पर चली तो गई हमारे साथ पर पूरा दिन एक बार भी उस का चेहरा खिला नहीं. इतनी उदास, परेशान और डरी हुई है कि क्या बताऊं…

“हम ने सोचा था कि हमारे साथ थोड़ा उस का मन बहलेगा, फोन पर भी रोती ही रहती है, पर कोई बात उसे तसल्ली नहीं दे पा रही. एक डर में जी रही है वह. और मम्मी, मुझे भी आज एक लेसन मिला.‘’

“क्या?”

”यही कि मैं तो अपने औफिस के एक छोटे से स्ट्रैस पर सारा दिन परेशान होती हूं, सारा दिन चिढ़चिढ़ करती हूं, जबकि आज के टाइम में तो परेशानियां इतनी बड़ीबड़ी हैं. लोग क्याक्या झेल रहे हैं, न जाने कितने दुख देख रहे हैं और मैं घर में आराम से बैठी अपने काम को रातदिन कोस रही हूं. मुझे काम ही तो ज्यादा है मगर कोई दुख तो नहीं न…फिर भी मैं सारा दिन ऐसे उदास होती हूं कि जैसे पता नहीं क्या हो गया है.

“हमारी रिमी कितने बड़े दुख से सामना कर रही है, उसे तो पता भी नहीं कि उस के मम्मीपापा अस्पताल  से ठीक हो कर आ भी पाएंगे भी या नहीं… बेचारी कितने डर में जी रही है रात दिन और मैं कितनी छोटी बात पर दुखी रहती हूं.’’

”हां, बेटा, सही कह रही हो. यह तो सचमुच समझने वाली बात है.’’

‘’मैं आज समझ गई कि अपनी छोटीछोटी परेशानियों को नजरअंदाज करूंगी, इतनी शिकायतें ठीक नहीं,’’ उस की आंखें सचमुच भर गईं, ”कितना अच्छा लगा आज सब को देख कर, अब पता नहीं कब मिलेंगे, इतनी बातें करते रहते हैं फोन पर, मगर मिल कर तो मन ही नहीं भर रहा था.”

मैं ने उसे पुचकारा,”अरे, पूजा का वैक्सीनेशन बाकी है न? और जय का भी तो? 2 पिकनिक तो तय हैं. फिर जाना सब एकसाथ.”

मैं ने इस तरह कहा कि उसे हंसी आ गई. बोल पड़ी, ”अच्छा, चलो, फिर खाते हैं, देखो, क्याक्या ले कर आई हूं. अब तो इंतजार ही कर सकते हैं कि अगला वैक्सीनेशन किस का होगा.‘’

हम मुसकरा दिए थे और मैं लगातार सोच रही थी कि यह सचमुच कोई आम दिन नहीं था. मिनी को एक सबक मिला था जो उस की लाइफ में उस के बहुत काम आएगा.

शायद बर्फ पिघल जाए

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मेरे पति का लिवर फेल हो चुका है, क्या लिवर ट्रांसप्लांट कराना सही है?

सवाल

मेरे पति का लिवर फेल हो चुका है. डाक्टर ने लिवर ट्रांसप्लांट कराने के लिए कहा हैलेकिन मैंने सुना है लिवर ट्रांसप्लांट की सफलता दर बहुत कम है?

जवाब

हमारे देश में लिवर ट्रांसप्लांट की सफलता दर अत्यधिक विकसित देशों के समान ही है. लिवर ट्रांसप्लांट के 90-95% मामलों में मरीज ट्रांसप्लांट के बाद स्वस्थ्य और सामान्य जीवन जी सकते हैं और कुल लिवर ट्रांसप्लांट के मामलों में से 70-80% में लोग 5 साल या उससे अधिक जीते हैं.

लिवर ट्रांसप्लांट के बाद हम देखते हैं कि लिवर फेल्योर से मृत्यु के मामले लगभग न के बराबर होते हैं. मृत्यु का कारण बुढ़ापाहृदय रोग या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं.

 

-डा. संजय गोजा

प्रोग्राम डायरेक्टर ऐंड क्लीनिकल लीड – लिवर ट्रांसप्लांटएचपीबी सर्जरी ऐंड रोबोटिक लिवर सर्जरीनारायणा हौस्पिटलगुरुग्राम. 

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नींद: मनोज का रति से क्या था रिश्ता- भाग 1

उस ने दो, तीन बार पुकारा रमा… रमा, पर कोई जवाब नहीं.

‘‘हुंह… अब यह भी कोई समय है सोने का,‘‘ वह मन ही मन बड़बड़ाया और किचन की तरफ चल दिया. वहां देखा कि रमा ने गरमागरम नाश्ता तैयार कर रखा था. सांभर और इडली बन कर तैयार थीं.

‘‘कमाल है, कब बनाया नाश्ता?‘‘ वह सोचने लगा. तभी उसे याद आया कि रति का फोन आया था और वह बात करताकरता छत पर चला गया था. उस ने फोन उठा कर काल टाइम चैक किया. एक घंटा दस मिनट. उस ने हंस कर गरदन हिलाई और मुसकराते हुए अपना नाश्ता ले कर टेबल पर आ गया.

रमा ने लस्सी बना कर रखी थी. उस ने बस एक घूंट पिया ही था कि भीतर से रमा की आवाज आई, ‘‘मनोज, मेरे फिर से तीखा पीठदर्द शुरू हो गया है. मैं दवा ले कर सो रही हूं. फ्रिज से नीबू की चटनी जरूर ले लो.‘‘

‘‘हां… हां, बिलकुल खा रहा हूं,‘‘ कह कर मनोज ने उस को आश्वस्त किया और चटखारे लेले कर इडलीसांभर खाता रहा. वह मन ही मन बुदबुदाया, ‘‘चलो कोई बात नहीं. अगर सो भी रही है तो क्या हुआ, कम से कम सुबहरात थाली तो लगी मिल ही रही है. बाकी अपनी असली जिंदगी में रति जिंदाबाद.‘‘ अपनेआप से यह कह कर मनोज नीबू की चटनी का मजा लेने लगा.

समय देखा, दोपहर के पौने 12 बज रहे थे. अब उसे तुरंत फैक्टरी के लिए निकलना था. उस ने जैसे ही कार की चाबी उठाई, उस आवाज से चौकन्नी हो कर रमा ने कहा, ‘‘बाय मनोज हैव ए गुड डे.‘‘

‘‘बाय रमा, टेक केयर,‘‘ चलताचलता वह बोलता गया और सोचता भी रहा कि कमाल की नींद है इस की. मनोज कभी अपनी आंखें फैला कर तो कभी होंठ सिकोड़ कर सोचता रहा. पर, इस समय न वह भीतर जाना चाहता था और न ही उस की कमर में हाथ फिरा कर कोई दर्द निवारक मलहम लगाना चाहता था. उस ने खुद को निरपराध साबित करने के लिए अपने सिर को झटका दिया और सोचा कि अब यह सब ठेका उस ने ही तो नहीं ले रखा है, बाहर के काम भी करो, रोजीरोटी के लिए बदन तोड़ो और घर आ कर रमा के दुखते बदन में मलहम भी लगाओ. यह सब एक अकेला कब तक करे.

मनोज खुद अपना वकील और जज भी दोनों ही बन रहा था, पर सच बात तो यह थी कि वह यह सब नहीं करना चाहता था और जल्दी से जल्दी रति का चेहरा देखना चाहता था.

गाड़ी निकाल कर मनोज फैक्टरी के रास्ते पर था. मोबाइल पर नजर डाली तो उस में रति का संदेश आ रहा था.

वह हंसने लगा. कम से कम यह रति तो है उस की जिंदगी में. चलो रमा अब 50 की उम्र में बीमार है. अवसाद में है. जैसी भी है, पर निभ ही जाती है. जीवन चल ही रहा है.

यों भी पूरे दिन में मनोज का रमा से पाला ही कितना पड़ता है. पूरे दिन तो रति साथ रहती है. जब वह नहीं रहती, तब उस के लगातार आने वाले संदेश रहते हैं. रति है तो ऐसा लगता है जीवन में आज भी ताजगी ही ताजगी है, बहार ही बहार है. एक लौटरी जैसी रति उस को कितनी अजीज थी. पिछले 3 महीने से रति उस के साथ थी.

रति अचानक ही उस के सामने आ गई थी. वह अपनी फैक्टरी के अहाते में पौधे लगवा रहा था, तभी वह गेट खोल कर आ गई. वह रति को देख कर ठिठक गया था. ऐसे तीखे नैननक्श, इतनी चुस्त पोशाक और हंसतामुसकराता चेहरा. वह आई और आते ही पौधारोपण की फोटो खींचने लगी, तो मनोज को लगा कि शायद प्रैस से आई है. और यों भी पूरी दोपहर उस की खिलौना फैक्टरी में लोगों का तांता लगा रहता था, कभी शिशु विकास संस्थान, तो कभी बाल कल्याण विभाग. कभी ये गैरसरकारी संगठन, तो कभी वो समूह, यह सब लगा रहता था.

मनोज ने रति को भी सहज ही लिया. पौधारोपण पूरा होतेहोते शहर के लगभग 10 अखबारों से रिपोर्टिंग करने वाले प्रतिनिधि आ गए थे. मनोज ने देखा कि रति कोई सवाल नहीं पूछ रही थी. वह बस यहांवहां इधरउधर घूम रही थी, बल्कि रति ने चाय, कौफी, नाश्ता कुछ भी नहीं लिया था.

Wedding Special: वेडिंग सीजन में परफेक्ट हैं ये पौपुलर सिल्क साडियां

महिलाएं चाहे कितनी ही आधुनिक हो जाए, फिर भी कुछ ऐसे मौके होते हैं जब सिर्फ और सिर्फ साड़ी भी अच्छी लगती है . यही कारण है कि हर त्योहार और समारोह में लड़कियां साड़ी को ही प्राथमिकता देती हैं. आइए जानते हैं भारत के प्रमुख शहरों के बारे में जहां की सिल्क की साड़ियां पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है.

1. कांजीवरम

दक्षिण भारत का नाम आए और कोई कांजीवरम साड़ी की बात ना करें ऐसा कैसे हो सकता है दक्षिण भारत की कांजीवरम की खूबसूरत तथा भारी-भरकम साड़ियां महिलाओं की खास पसंद है. शायद इतना पढ़कर आपको बौलीवुड ऐक्ट्रेस रेखा, जयप्रदा, वैजयंती माला की याद आ जाए.

ट्रेडिशनल रिच कलर्स और इंडिया की सबसे ज्यादा मशहूर और महंगी साड़ियों में से हैं. कांजीवरम सिल्क ,तमिलनाडु के एक गांव के नाम पर है . जहां इस सिल्क को बनाया जाता है. बाकी सिल्क साड़ियों के मुकाबले ये साड़ियां काफी भारी होती हैं, क्योंकि इनमें इस्तेमाल होने वाले सिल्वर धागे गोल्ड में डिप होते हैं, वहीं मोटिफ्स मोर और तोते से इंसपायर्ड होते हैं. इस साड़ी का सबसे बेस्ट पार्ट होता है इसका पल्लू, जो अलग से बनाकर बाद में साड़ी से जोड़ा जाता है.

2. बनारसी साड़ी

बनारसी साड़ियों का नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. रेशम की साड़ियों पर बनारस में बुनाई के संग जरी के डिज़ाइन मिलाकर बुनने से तैयार होने वाली सुंदर रेशमी साड़ी को बनारसी साड़ी कहते हैं.  इसे सुहाग की निशानी भी माना जाता है. मल्टी बनारसी साड़ी, पौड़ी, पौड़ी नक्काशी, कतान अम्बोज, टिपिकल बनारसी जंगला, एंटिक बूटा, जामेवार, कतान प्लेन,कतान फैंसी, तनछुई बनारसी आदि कई वरायटीज़ में ये साड़ियां उपलब्ध हैं.

3. महाराष्ट्रियन साड़ी

महाराष्ट्र की पैठणी  एक खास तरह की साड़ी है . जो नौ गज लंबी होती है . यह पैठण शहर में बनती है. इस साड़ी को बनाने की प्रेरणा अजन्ता की गुफा में की गई चित्रकारी से मिली थी. इसे पहनने का अपना पारंपरिक स्टाइल है, जो महाराष्ट्र की औरतों को ही अच्छी तरह से आता है.

4. रौ सिल्क

रौ सिल्क साड़ियां गोंद से बनती है. इससे सिल्क निकालने के लिए लम्बी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है.

5. कोरा सिल्क

भारत के अधिकतर शहरों में कोटा सिल्क की साड़ियां आसानी से उपलब्ध होती है. ये साड़ी काफी हल्की होती है.  जिसे कई कलर्स और डिज़ाइन्स की कोरा सिल्क फैब्रिक से बुना जाता है. कोरा सिल्क का अपना अलग ही चार्म है.

6. महेश्वरी साड़ी

यह साड़ी खासकर मध्य प्रदेश में पहनी जाती है. यह रेशम से  बनाई जाती है. इसका इतिहास काफी पुराना है. होल्कर वंश की महान शासक देवी अहिल्याबाई ने 250 साल पहले गुजरात से लाकर महेश्वर में कुछ बुनकरों को बसाया था और उन्हें घर, व्यापार और अन्य सुविधाएं दी थीं. यही बुनकर महेश्वरी साड़ी तैयार करते थे.

7. चंदेरी साड़ी

विश्व प्रसिद्ध चंदेरी की साड़ियां आज भी हथकरघे पर ही बुनी जाती हैं . इन साड़ियों का अपना समृद्धशाली इतिहास  है. पहले ये साड़ियां केवल राजघराने में ही पहनी जाती थीं, लेकिन अब यह आम लोगों तक भी पहुंच चुकी हैं. एक चंदेरी साड़ी बनाने में एक बुनकर को साल भर का वक्त लगता है, इसीलिए चंदेरी साड़ियों को बनाते वक्त कारीगर इसे बाहरी नजरों से बचाने के लिए हर मीटर पर काजल का टीका लगाते हैं.

8. मैसूर सिल्क

सिल्क की साड़ियों की बात हो और मैसूर सिल्क का नाम नहीं आए यह कैसे हो सकता है? अगर आपको साड़ियों में  रिचनेस और ट्रेडिशनल टच चाहिए तो बस एक ही नाम है मैसूर सिल्क. ये साउथ इंडिया की कई मशहूर साड़ियों में गिनी जाती है. ये सिल्क मलबेरी सिल्क से बनता है, जो कर्नाटक में आराम से मिल जाता है.

9. नारायणपेट सिल्क

यह सिल्क साड़ी अपने अलग तरह के पैटर्न के लिए प्रसिद्ध है. साड़ी में एम्ब्रॉयडरी के साथ चेक्ड सरफेस पैटर्न होते हैं . जो मिलकर बॉर्डर या पल्लू पर बहुत ही खास डिज़ाइन का लुक बनाते हैं.  जैसे किसी मंदिर की आउटलाइन. इन साड़ियों की शुरुआत तेलंगाना के नारायणपेट डिस्ट्रिक से 1630 ईसा पूर्व में हुई थी. साड़ी के बॉर्डर पर छोटे ज़री डिज़ाइन्स से कंट्रास्ट लुक मिलता है . यह ब्राइड्स के लिए स्पेशल साड़ी है.

वुडन फ्लोरिंग : हर कदम का हमकदम

फ्लोरिंग आप के घर को ओवरआल लुक देती है. इन दिनों वुडन फ्लोरिंग ज्यादा चलन में है. यह डिफरैंट पैटर्न में मार्केट में उपलब्ध है. यदि आप अपने घर को अलग लुक देना चाहती हैं, तो वुडन फ्लोरिंग करवाएं.

कर्वड डिजाइन

इस पैटर्न में लकड़ी पर डिजाइनर नक्काशी होती है, जो बेहद खूबसूरत कला है. यह फ्लोरिंग लंबे समय तक आप के घर की शोभा बढ़ाएगी. इस लकड़ी का रंग सूरज की रोशनी में और भी रोशन हो जाता है.

परक्युट पैटर्न

फ्लोरिंग का यह पैटर्न आप के रूम को एक नया और वार्म लुक देगा. बौक्स डिजाइंड यह पैटर्न चैस बोर्ड की तरह लाइट और ब्राइट कलर कौंबिनेशन में होता है.

हीरिंगबोन पैटर्न

यह पैटर्न जिगजैग डिजाइन में मिलेगा. यह घर को एक रैंडम लुक देता है. लकड़ी का क्रीमिश कलर दीवारों के कलर पर भी खूब फबता है.

पेरिमीटर बौर्डर पैटर्न

यह पैटर्न आप के फ्लोर के बौर्डर को आउटलाइन करता है. इस से कमरे को फौर्मल लुक मिलता है. अगर बिना डिजाइन की फ्लोरिंग चाहती हैं, तो इस वुडन पैटर्न का इस्तेमाल कर सकती हैं.

लगाने में आसान

आजकल वुडन फ्लोरिंग ट्रैंड में है. ज्यादातर लोग इसे पसंद कर रहे हैं. अहम बात यह है कि वुडन फ्लोरिंग अपनी इंसुलेटिंग क्षमता के कारण लंबे समय तक खराब नहीं होती. इस की सब से खास बात यह है कि इसे मात्र 3-4 घंटों में ही लगाया जा सकता है, क्योंकि तख्तों को एकदूसरे के साथ एक विशेष बौंडिंग के साथ जोड़ते हुए इंटरलौक किया जाता है. इसे लगाना आसान है. इसे लगाने या लौक करने के लिए ‘टंग ऐंड गू्रव’ तकनीक या किसी चिपकाने वाले पदार्थ अथवा कीलों का प्रयोग करते हैं.

जब बजट हो कम

अगर आप को लगता है कि रियल वुडन फ्लोरिंग आप के बजट में फिट नहीं बैठती, तो इस बात को ले कर अफसोस करने की जरूरत नहीं है कि आप अपने घर को खूबसूरत लुक नहीं दे पाएंगी. आधुनिक तकनीक की वजह से आज बाजार में ऐसी फ्लोरिंग उपलब्ध हैं, जो वुडन न होने के बावजूद उस जैसी लगती हैं. इसे लगा कर आप कम खर्च में हार्डवुड जैसा ऐलिगैंट लुक डैकोर में ला पाएंगी.

बेहतर विकल्प

विनायल प्लैंक फ्लोरिंग, पौली विनायल क्लोराइड (पीवीसी) से बनी होती है, जो बहुत उच्च क्वालिटी का प्लास्टिक होता है, जिस के पीछे चिपकाने वाला पदार्थ लगा कर फ्लोर पर चिपका दिया जाता है. देखने में बिलकुल हार्डवुड जैसी लगने के साथसाथ यह वाटरपू्रफ भी होती है और इस पर दीमक भी नहीं लगती. जो लोग केवल लिविंग या बैडरूम में ही नहीं, बल्कि अपने बाथरूम को भी वुडन टच देना चाहते हैं, उन के लिए यह बेहतर विकल्प है.

देखभाल

फर्श पर जमी धूलमिट्टी को साफ और सूखे कपड़े से ही पोंछें. हर 5-6 साल के अंतराल पर फर्श को पौलिश कराएं. अगर कमरे के फर्श पर धूप आती है, तो वहां परदे का इस्तेमाल करें, क्योंकि धूप से लकड़ी का रंग फीका पड़ सकता है. फर्श पर पानी इकट्ठा न रहने दें, क्योंकि इस से लकड़ी खराब हो सकती है.

क्या करें

– सभी फर्नीचर जो उस कमरे में हों उन के नुकीले सिरों के नीचे कौटनबौल या फर्नीचर पैड लगा दें.

– दरवाजे पर डोरमेट का उपयोग करें व इन की नियमित सफाई जरूरी है.

– वैक्यूम क्लीनर का उपयोग सौफ्ट ब्रश के साथ करें.

– अगर घर पर पेट्स हों, तो यह ध्यान रखें कि वे नाखूनों से फ्लोरिंग को न खुरचें.

– सही गुणवत्ता वाले फ्लोरिंग क्लीनर का उपयोग करें.

– फ्लोर की सफाई के लिए हमेशा अच्छे पैड का उपयोग करें.

क्या न करें

– भारी व ऊंची हील की सैंडिल, जूतों का उपयोग कम से कम करें.

– अमोनिया या अन्य किसी ऐसिड के प्रयोग से बचें.

– पानी का उपयोग फ्लोरिंग को धोने में न करें.

– भारी फर्नीचर को फ्लोरिंग पर घसीटें नहीं.

Winter Special: 15 टिप्स जो बचा खाना बनाएं लजीज

बचा खाना हम अकसर खराब समझ कर फेंक दिया करते हैं जबकि बचे खाने से भी स्वादिष्ठ रैसिपी तैयार की जा सकती है. अचानक घर में मेहमान आ जाएं और आप को झटपट कुछ बना कर देना हो तो घबराएं नहीं, बल्कि इन टिप्स पर गौर फरमाएं:

1. घर में पनीर बनाया है तो उस के पानी में पकौड़े के लिए बेसन घोलें. पकौड़े स्वादिष्ठ बनेंगे.

2. पनीर के पानी से आटा गूंधें अथवा सूप में भी इस का इस्तेमाल कर सकती हैं.

3. अचार का मसाला बच गया हो तो उस में लहसुन छील कर अथवा प्याज काट कर डाल दें. स्वादिष्ठ अचार तैयार हो जाएगा.

4. आम के अचार के बचे तेल व मसालों को बैगन, टिंडा, भिंडी या करेले में भर कर सब्जी बनाएं.

5. अधिक पका केला फेंकने के बजाय पुडिंग या कस्टर्ड में डालें अथवा स्मूदी या शेक में प्रयोग करें.

6. चावल के निकले मांड़ में हींग, जीरा, अदरक, नीबू का रस और हरीमिर्च का तड़का लगा दें. बढि़या स्वादिष्ठ सूप तैयार हो जाएगा.

7. चावल का बचा पानी दाल में डाल दें, तो दाल गाढ़ी हो जाएगी और मात्रा भी बढ़ जाएगी.

8. अगर चोकर को सूजी में डाल कर हलवा बनाएं तो वह और स्वादिष्ठ व पौष्टिक बनेगा.

9. पका पपीता फीका निकला हो तो दूध व थोड़ी चीनी डाल कर थिक शेक बना लें.

10. फीके पपीते को पके कद्दू की तरह छौंक कर सब्जी बनाएं. सब्जी स्वादिष्ठ होने के साथसाथ पौष्टिक भी होगी.

11. छोटी इलायची के छिलकों को फेंकें नहीं. इन्हें पीस कर चीनी में मिला दें. जब भी चाय के पानी में चीनी डालेंगी इलायची की महक आएगी.

12. जिन सब्जियों को कद्दूकस कर रही हैं उन से निकले पानी को फेंकें नहीं, बल्कि उस से आटा गूंध लें. अधिक विटामिन इसी रस में होता है.

13. सब्जियों के डंठलों को फेंकें नहीं. उन्हें अच्छी तरह धो कर कोई सब्जी मिला कर उबाल लें. फिर छान कर कालीमिर्च, नमक और नीबू का रस डालें. बढि़या सूप तैयार हो जाएगा. चाहे तो वैजिटेबल स्टौक की तरह प्रयोग में लाएं.

14. अनार के छिलकों को फेंकें नहीं, बल्कि उन्हें अच्छी तरह धो कर सुखा लें. मिक्सी में पीस कर पाउडर बनाएं. जब भी पेट में दर्द हो कुनकुने दूध के साथ 1 चम्मच फांक लें.

15. सूखी नारंगी के छिलकों को सुखा कर चूर्ण बनाएं. बेक करने वाली चीज पुडिंग में डाल कर उसे सुगंधित बनाएं.

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