कैसी हो सर्दियों की सनस्क्रीन

विंटर में धूप में बैठना सभी को अच्छा लगता है, लेकिन इस मीठीमीठी धूप के लालच में हम अपनी स्किन के साथ खिलवाड़ कर बैठते हैं, जिस की वजह से स्किन को सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावायलेट रेज का सामना करना पड़ता है और वह बेजान और रफ लगने लगती है. इसलिए जरूरत है विंटर में भी स्किन को यूवी किरणों से बचाने की. तो आइए जानते हैं कि इस दौरान कौनकौन से प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करें ताकि स्किन विंटर के मौसम का भी मजा ले सके और उसे कोई नुकसान भी न पहुंचे.

ग्रीनबेरी और्गैनिक्स सनस्क्रीन स्प्रे लोशन

इस लोशन में एसपीएफ होने के कारण यह स्किन को विंटर्स की सूर्य की तेज किरणों से बचाने का काम करता है. इसे नैचुरल ऐंटीऔक्सीडैंट्स व कीवी ऐक्सट्रैक्ट से बनाया  जाता है, जो फ्रीरैडिकल्स से स्किन को प्रोटैक्ट करने के साथसाथ स्किन सैल्स को नैचुरली हाइड्रेट करने का काम भी करते हैं. यह पैराबेन व सल्फेट फ्री भी है. यह लोशन खासतौर से ड्राई स्किन को ध्यान में रख कर बनाया जाता है.

न्यूट्रोजेना हाइड्रो बूस्ट सनस्क्रीन

यह सनस्क्रीन हाइड्रो बूस्ट फौर्मूला से लैस है, जिस में ह्यालूरोनिक ऐसिड और ग्लिसरीन जैसे पावरफुल इन्ग्रीडिएंट्स होते हैं. यह एक विंटर की शुष्क हवा से स्किन को प्रोटैक्ट करने का काम करता है. इस में हाइड्रो बूस्ट एसपीएफ फौर्मूला स्किन को यूवी प्रोटैक्शन देने का भी काम करता है. स्किन को विंटर्स में ऐक्स्ट्रा प्रोटैक्शन देने के लिए अगर आप हुमेक्टैंट्स युक्त सीरम के बाद इस सनस्क्रीन को अप्लाई करती हैं, तो यह आप की स्किन को प्रोटैक्ट करने के साथसाथ हैल्दी, सौफ्ट व स्मूद भी बनाने का काम करता है. इस सनस्क्रीन की खास बात यह है कि यह सभी स्किन टाइप पर सूट करेगा.

द बौडी शौप विटामिन ई

मौइस्चराइजिंग क्रीम: विंटर्स में यह विटामिन ई युक्त क्रीम स्किन को हाइड्रेट रखने का काम तो करती ही है, साथ ही यह स्किन को फुल प्रोटैक्शन भी देती है. असल में इस का ह्यालूरोनिक ऐसिड युक्त फौर्मूला स्किन को ऐक्स्ट्रा हाइड्रेशन देने के साथसाथ इस में ऐंटीऔक्सीडैंट रिच रैस्पबेरी ऐक्सट्रैक्ट स्किन को ऐक्सफौलिएट करने के साथसाथ सुपर स्मूद बनाने में भी मदद करता है. इस में विटामिन ई की खूबियां स्किन को यूवी प्रोटैक्शन से बचाने के साथ स्किन टैन, डार्क पैचैज और रिंकल्स से बचाने में मदद भी करती हैं.

बोटनिका विटामिन सी सनस्क्रीन

इस में विटामिन सी और एसपीएफ दोनों होने के कारण यह स्किन के लिए काफी मैजिक का काम करता है. इस का क्विक स्किन अब्सौर्बिंग फौर्मूला स्किन की लेयर्स में डीपली जा कर उसे स्मूद बनाने के साथसाथ उसे पूरे दिन सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाने का भी काम करता है. इस में जिंक और टाइटेनियम औक्साइड होने के साथ यह स्किन के पीएच लैवल को बैलेंस में बनाने का काम करता है. चाहे आप को पूरा दिन बीच पर बैठ कर ऐंजौय करना हो या फिर विंटर्स में धूप का मजा लेना हो, यह परफैक्ट सनस्क्रीन है.

अल्ट्रा रिपेयर प्योर मिनरल

सनस्क्रीन मौइस्चराइजर: जहां विंटर का मौसम दिल को छू जाता है, वहीं अगर इस मौसम में स्किन की प्रौपर केयर नहीं की जाती है तो स्किन रैड, ड्राई, फ्लैकी होने के साथसाथ कई बार स्किन टैन की भी समस्या हो जाती है. ऐसे में इस सनस्क्रीन युक्त मौइस्चराइजर में ओटमील की खूबियां होने के कारण यह स्किन पर इचिंग व जलन से तो बचाने का काम करता ही है, साथ ही स्किन पर डैड स्किन सैल्स, औयल को भी रिमूव करने का काम करता है. इस का यूवी ब्लौकर फौर्मूला सन प्रोटैक्शन दे कर स्किन को मौइस्चराइज करने के साथसाथ ग्लोइंग बनाने का भी काम करता है.

केटाफिल 30 एसपीएफ मौइस्चराइजर

यह 30 एसपीएफ वाला फेशियल मौइस्चराइजर स्किन पर ग्लो देने के साथसाथ स्किन की हर लेयर को प्रोटैक्शन देने का भी काम करता है. इस की खास बात यह है कि इस में ओलियोसम टैक्नोलौजी का इस्तेमाल किया गया है, जिस में सनस्क्रीन फिल्टर्स का कम इस्तेमाल होने के कारण यह स्किन को बिना इरिटेट करे सुपर हाइड्रेट करने का काम करता है. यह सैंसिटिव स्किन के लिए एकदम परफैक्ट है.

बड़े काम के ये खिलौने

खिलौने बच्चों के विकास में अहम भूमिका अदा करते हैं. बस जरूरत होती है कि सही उम्र में बच्चों को सही खिलौने दिए जाएं. खिलौने ऐसे हो जिन के साथ खेलते समय बच्चे खेल में पूरी तरह लिप्त हो सकें और खेलखेल में अपने व्यक्तित्व विकास के बारे में सीख सकें.

रिमोट और बैट्री वाले खिलौनों की जगह वे खिलौने सीखने में मदद करते है जिन से बच्चे खुद खेलते हैं. बहुत सारे ऐसे खिलौने भी होते हैं जो सस्ते होने के बावजूद बच्चों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं. पेरैंट्स को चाहिए कि खिलौनों की कीमत को ले कर स्टेटस सिंबल न बनाएं. केवल यह देखें कि वे बच्चों के लिए कितने उपयोगी हैं और बच्चे उन्हें कितना पसंद करते हैं.

हम जब भी बच्चों को सम?ाने का प्रयास करते हैं तो कोशिश यही रहती है कि हम उन के अनकहे शब्दों को भी समझ जाएं. हमारा प्रयास यही रहता है कि किसी तरह उन की दुनिया में पहुच जाएं. वह दुनिया जहां एक माचिस का डब्बा उड़ता हुआ जहाज लगे, जहां छोटेछोटे खिलौनों से कई बड़े सपने सजे हों और घंटों खुद से ही बात करते रहना. कभी गाडि़यों के पहियों से तो कभी जोड़जोड़ के माचिस से महल खड़ा करना. किसी खिलौने के टूटने से घंटों आंसू बहाना या नए खिलौने मिलने पर जैसे कोई खजाना मिल जाना जैसी खुशी का इजहार करना.

भविष्य के विकास की नींव

वह बचपन ही क्या जिस में खिलौनों की यादें न हों. मगर क्या आप यह जानते हैं कि खिलौनों से खेलना सिर्फ एक क्रिया ही नहीं बल्कि इस से एक सुनहरे भविष्य के विकास की नींव भी तैयार होती हैं. खेलखिलौनों से आत्म जागरूकता, स्वयं के संबंध दूसरों से, आत्मविकास और आत्म अभिव्यक्ति जैसी बहुत सी बातें सीखते हैं जो सही व्यक्तित्व विकास के लिए बेहद जरूरी है.

चाइल्ड, अडोलसैंट ऐंड पेरैंटल हैंडलिंग ऐक्सपर्ट साइकोलौजिस्ट डाक्टर सोनल गुप्ता कहती हैं कि कई बार जो बातें बच्चे अपने अभिभावकों से नहीं कह पाते उन्हें वे खिलौनों के जरीए कह पाते हैं. अत: पेरेंट्स के लिए यह जरूरी है कि वह कुछ समय बच्चों के साथ खेल में बिताएं और उन की दुनिया का हिस्सा बनें. मनोवैज्ञानिक इसी प्रक्रिया से ‘प्ले थेरैपी’ के जरीए बच्चों की दुनिया में प्रवेश करते हैं और उन की कई उलझनों को सुलझने का प्रयास करते हैं.

महंगे खिलौने जरूरी नहीं

आमतौर पर पेरैंट्स यह सोचते हैं कि महंगे खिलौने बच्चों को अधिक पसंद आएंगे. यह पूरा सच नहीं है. कई बार देखा जाता है कि बच्चे सस्ते किस्म के खिलौने देख कर ज्यादा आकर्षित होते हैं. उन के खिलौने खरीदते समय उन की पसंद पर ध्यान दें. उम्र के हिसाब से बच्चों को क्या सिखाना चाहिए इस बात को ध्यान में रखते हुए खिलौने खरीदें.

खिलौने बच्चों के जीवन से जुड़े सब से मीठे अनुभव होते हैं पर यह जरूरी नहीं कि वह खिलौना महंगा ही हो. ध्यान दें कि कहीं खिलौने से विकास की जगह बच्चे की जिद्द और अहम का द्वार न खुल जाए. खिलौने तो बच्चे की कल्पना का प्रतीक हैं, फिर भले ही वह एक कागज की नाव हो या सूखी लकडि़यों से बना आधुनिक विज्ञान से परिपक्व एक आसमान में उड़ता जहाज. आवश्यकता यह है कि क्या इस कल्पनाओं के शहर में आप की जगह है?

खिलौने बताते हैं बच्चों की रुचि

साइकोथेरैपिस्ट डाक्टर नेहा आनंद कहती हैं कि खिलौनों के साथ जब बच्चा खेलता है तो उस के स्वभाव के विषय में पता चलता है. कई बार इस समय ही यह पता चलता है कि बच्चे का कस दिशा में रु?ान है. एक क्रिकेट खेलने का शौक रखने वाला बच्चा किस तरह से क्रिकेटर बन जाता है देखने वाली बात है. खिलौने खेलने के तरीके से बच्चे के व्यवहारका पता चलता है. कई बच्चे खेलने के समय ही ऐसे गुस्से वाले काम करते हैं जिन से उन के गुस्से वाले स्वभाव को सम?ा कर उस का निदान किया जा सकता है.

बच्चे जब बौल को कैच करने वाला खेल खेलते हैं तो वह खेल सीधा सरल दिखता है. असल में बौल को कैच करने वाले इस खेल में शारीरिक ऐक्सरसाइज के साथ ही साथ मैंटल ऐक्सरसाइज भी होती है. बच्चों में एकाग्रता बढ़ती है. इस के साथ ही साथ उन्हें बौल की स्पीड का अंदाजा लगाना आ जाता है. पेपर को फाड़ना, दीवार पर बच्चे का पैंसिंल से लिखना कई बार पेरैंट्स को बच्चों का खराब व्यवहार लगता है. असल में यह भी बच्चों के लिए एक खेल है जिस के माध्यम से वे तमाम चीजें सीखते हैं.

छोटे बच्चों के साथ खेलने में अगर पेरैंट्स भी अपना समय दें तो यह उन के विकास में बहुत उपयोगी होगा.

खिलौने बच्चों को बहकाने का जरीया नहीं

ज्यादातर पेरैंट्स यह सोचते हैं कि खिलौने बच्चों को बहकाने का जरीया हैं. ऐसे में वे बच्चे को महंगे से महंगे और अच्छे से अच्छे खिलौने खरीद कर देते हैं पर वे उस के विकास में सहायक नहीं होते. पेरैंट्स के इस व्यवहार से बच्चे में जिद करने की आदत पड़ जाती है. वह जिद कर के अपने लिए खिलौने खरीदवाने लगता है.

अगर कोई बच्चा रिमोट से उड़ने वाले हैलीकौप्टर से खेल रहा है तो उसे केवल रिमोट का बटन दबाना ही आएगा. उसे यह लगेगा कि बटन दबाने से प्लेन उड़ता है. अगर कोई साधारण प्लेन उड़ाता है तो उसे उस के पहिए, पंख सब की जरूरतों की जानकारी होगी. उसे पता होगा कि प्लेन को उड़ाने के लिए समतल सड़क भी चाहिए. यही वजह है कि रिमोट वाले खिलौनों के बजाय नौर्मल खिलौनों से बच्चों को ज्यादा सिखाया जा सकता है.

आज के समय में जब भी बच्चा रोता है मां उस को अपना मोबाइल या घर में रखा कोई मोबाइल पकड़ा देती है. बच्चा उस से खेलने लगता है. धीरेधीरे यह उस की आदत बन जाती है. साइकोथेरैपिस्ट डाक्टर नेहा आनंद कहती हैं कि ब्लू स्क्रीन का नशा बच्चों के मन पर बुरी तरह प्रभाव डालता है. यह उन की लत में बदल जाता है. पेरैंट्स दिखावे के लिए महंगे फोन बच्चों को दे देते हैं. जैसेजैसे स्क्रीन बड़ी होती जाती है उस का प्रभाव बढ़ता जाता है. पेरैंट्स को चाहिए कि खिलौनों की जगह मोबाइल बच्चों को न दें. इस का प्रभाव बहुत आगे तक बच्चों के मन पर रहता है

लग्जरी बाथरूम का शाही अंदाज

पुराने समय में शौचालय और स्नानघर घर से बाहर आंगन के एक कोने में बने होते थे, जिस के सामने सुबहसुबह सब अपनीअपनी बारी का इंतजार करते थे. कोई इस के इंतजार में आंगन की सीढि़यों पर बैठा होता तो कोई शौचालय के बाहर खड़ा होता.

घर की महिलाएं तो सुबह बहुत जल्दी उठ कर नित्यक्रिया से मुक्त हो लेती थीं ताकि 8 और 9 बजे का वक्त जब घर के पुरुष दफ्तर आदि जाने के लिए तैयार हों तो उन को शौचालय और स्नानागार खाली मिले.

इन शौचालयों में उकड़ूं बैठने की व्यवस्था होती थी, हालांकि आज भी अधिकांश लोग इसी को बेहतर मानते हैं क्योंकि इस से पैरों और घुटनों का व्यायाम भी अच्छा होता है और पेट भी ठीक से साफ होता है. तब के शौचालयों में बस एक नल और एक छोटा डब्बा रहता था. नित्यक्रिया से फारिग हो कर हाथ धोने के लिए बाहर लगे वाशबेसिन का ही इस्तेमाल किया जाता था. इसी तरह स्नानागार में 1 या 2 नल, एकाध बालटी एक मग और कोने में बनी छोटी सी ताक पर साबुन वगैरह रखने का इंतजाम होता था. पीछे की दीवार पर एक खूंटी होती थी, जिस पर तौलिया, कपड़े लटकाते थे. बुजुर्गों के नहाने के लिए एक छोटा स्टूल रख दिया जाता था.

जब घर में आंगन खत्म होने शुरू हुए और घरों के साइज भी छोटे और दोमंजिला होने लगे तो शौचालयस्नानागार घर की सीढि़यों के नीचे बनने लगे. तब इन की ऊंचाई व साइज और भी छोटे हो गए. हाथमुंह धोने के लिए वाश बेसिन बाथरूम से बाहर ही रहा.

नए जमाने के बाथरूम

मगर अब महानगरों में ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों में भी फ्लैट सिस्टम बढ़ रहा है, जहां शौचालय और स्नानागार मुख्य कमरे के बाहर नहीं, बल्कि उसी के साथ अटैच्ड हो गए हैं. यही नहीं, घर के हर बैडरूम के साथ अटैच लैट्रिनबाथरूम बनने लगे हैं, जिस से नित्यक्रिया के लिए अब लाइन लगाने की जरूरत नहीं रह गई है. सुबह बैड से उठो और बाथरूम में आंख खोलो, बस इतनी ही दूरी है.

पहले जहां बाथरूम से जल्दी निकलने की मजबूरी थी, वहीं अब जब सब के कमरे से जुड़ा बाथरूम है तो जल्दीबाजी भी खत्म हो गई है. जितनी देर चाहो उतनी देर पौट पर बैठे रहो और अच्छी तरह हलके हो. अब हाथमुंह धोने के लिए वाशबेसिन भी अंदर ही है और स्नान के लिए बाथ टब भी पूरी सज्जा के साथ आमंत्रण देता नजर आता है.

अब तो बहुतेरे लोग सुबह का अखबार भी बाथरूम में पढ़ते हैं तो मोबाइल फोन पर गूगल सर्च और व्हाट्सऐप चैट सब पौट पर बैठेबैठे हो रहा है. एकाध घंटा बाथरूम में कब गुजर जाए पता ही नहीं चलता.

इंटीरियर हो खास

पुराने जमाने के घरों में जहां फीकी रोशनी देने वाला बल्ब बाथरूम में लगा दिया जाता था, वहीं नए जमाने के बाथरूम एलईडी लाइट से चमचमाते हैं. हम भले अपने बाथरूम में सुबह का थोड़ा समय व्यतीत करते हैं, लेकिन वहां काम अनेक होते हैं. हाथमुंह धोना, शौच, स्नान, शेविंग, मेकअप, हेयर कलर, हेयर ड्रैसिंग सबकुछ अब बाथरूम में ही होता है.

तो ऐसी जगह जहां नित्यक्रिया के बाद आप हलकाफुलका महसूस करते हैं, बाथटब का खुशबूदार स्नान आप को तरोताजगी से भर देता है, गरम और ठंडे पानी की व्यवस्था के साथ शावर का सुख आप ले सकती हैं, दीवार पर लगा आईना आप के सौंदर्य में वृद्धि करता है, उस जगह को क्यों न थोड़ा लग्जरी लुक दिया जाए?

घर के कुल बजट का कुछ हिस्सा अगर बाथरूम पर खर्च कर के उसे और आरामदायक और सुख प्रदान करने वाला बनाया जाए, तो क्या बुरा है? जब आप अपना पूरा घर अपनी सुरुचि के अनुरूप सजासंवार कर रखती हैं तो बहुत जरूरी है कि आप के घर का यह हिस्सा भी शानदार तरीके से चमके. इस के लिए सब से पहले बाथरूम के इंटीरियर पर ध्यान दें. बाथरूम के इंटीरियर में लाइट, कलर, फ्लोरिंग आदि महत्त्वपूर्ण हैं.

आजकल बाजार में बाथरूम को सजानेसंवारने के लिए ऐसी अनेक चीजें उपलब्ध हैं जो कम पैसे में आप के बाथरूम को लग्जरी लुक दे सकती हैं.

लाइट्स

बाथरूम की रौनक तो लाइट से ही है. उपयुक्त तरीके से लगी लाइटें जगह को जगमगा देती हैं, इसलिए सब से पहले बाथरूम की लाइटिंग पर ध्यान दें. अपने बाथरूम में एक मेन एलईडी लगवाएं. व्हाइट लाइट से बाथरूम चमकदार दिखेगा. आईने में आप का चेहरा भी साफ दिखेगा और इस रोशनी में हर कोने की सफाई भी अच्छी तरह से हो सकेगी. इस के अलावा दीवार पर कलात्मक लैंप लगाए जा सकते हैं जो बेहद सुंदर और रिच लुक देते हैं. बाथरूम मिरर के ऊपर अगर मिरर को फोकस करने वाली लाइट लगी हो तो इस से ओवरऔल लुक आकर्षक लगता है.

अगर आप के बाथरूम में बाथ टब है और आप उस में बैठ कर रिलैक्स करती हैं तो बाथ टब के ऊपर यलो लाइट वाला लैंप शेड लगवाएं ताकि पानी में रिलैक्स करते वक्त सिर्फ इसी को जला कर डिम रोशनी में सुकून पाया जा सके.

फ्लोरिंग

बाथरूम की फ्लोरिंग में आप चाहे टाइल्स लगवाएं या पत्थर, वह चमकने वाला होना चाहिए. वाशबेसिन वाले एरिया के काउंटर में भी आप चमकता हुआ पत्थर लगवा सकती हैं. आजकल ब्लैक कलर या ब्लैक डिजाइन की फ्लोरिंग चलन में है जो बाथरूम को स्टाइलिश बना देती है. अगर आप के बाथरूम का साइज छोटा है तो इसे बड़ा लुक देने के लिए आप लाइट कलर से फ्लोरिंग करवाएं. बाथरूम को रिच लुक देने के लिए वुडन डैकोर का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है. इस थीम के अंतर्गत, वुडन शेल्व, रिलैक्सिंग स्टूल, चेयर आदि का इस्तेमाल भी हो रहा है.

आईना

शीशा बाथरूम की रौनक में चार चांद लगा देता है. यह बाथरूम की जरूरत भी है. वाशबेसिन के ऊपर सिल्वर या गोल्डन लाइनिंग वाला स्टाइलिश आईना और उस पर ?ाका हुआ सिल्वर या गोल्डन लैंप आप के बाथरूम को बहुत रिच लुक देगा. बाजार में मिरर में बहुत सारी वैरायटीज मौजूद हैं. अपने बाथरूम के फर्श और दीवारों से मैच कर के आप आईने का चुनाव कर सकती हैं. कलात्मक सज्जा वाले आईने, फूलों और बेलबूटों से सजे आईने जब आप के सामने होंगे तो उन में आप का चेहरा दमक उठेगा.

बाथ टब

यदि आप का बाथरूम स्पेशियस है तो उस में लगा बाथ टब बाथरूम को पूरी तरह लग्जरी लुक देता है. एक बड़ा टब जो आप के कंफर्ट लैवल के मुताबिक हो, आप अपने बाथरूम में लगवाएं. जिस में ठंडे और गरम पानी की व्यवस्था हो, साथ ही हैंड शावर भी हो. बाजार में ब्लैक, व्हाइट, मैरून, ब्लू अनेक रंगों में बाथ टब मौजूद हैं जो बाथरूम को लग्जरी लुक देते हैं.

क्लासी टच देने के लिए आप वुडन फिनिश का बाथटब भी लगवा सकती हैं. चाहें तो ग्लास से बना बाथ क्यूबिकल लगवाएं जिस का सब से बड़ा लाभ यह है कि नहाते समय पानी पूरे बाथरूम में नहीं फैलता और बाथरूम की साफसफाई में अतिरिक्त समय खर्च नहीं होता.

वुडन लुक

आप अपने बाथरूम को वुडन लुक भी दे सकती हैं. उस में ऐसी अलमारियां बनाएं जिन में आप सामान भी रख सकें. साथ ही वे देखने में भी स्टाइलिश नजर आएं. इस के लिए आप एक कोना तय करें जो पानी से दूर रहे व दीमक लगने का डर न हो. वहां आप सनमाइका लगा कर एक अलमारी बनवाएं, जिस में जरूरत का सामान रखा जा सके.

बाथरूम की सफाई में इस्तेमाल होने वाला वाइपर, फ्लोर ब्रश, पोंछा, क्लीनर, हार्पिक, सोप आदि के लिए एक कैबिन अलग से होना चाहिए ताकि यह सामान बाथरूम के किसी कोने में सामने पड़ा दिखाई न दे. सबकुछ व्यवस्थित रखने के लिए कोने में अलमारियां लगवाएं. ये आप के फेस वाश, टायलैटरीज और टूथब्रश को पूरे सिंक में बिखरने से बचाती हैं.

ग्लास बनाए खास

बाथरूम को लग्जरी अंदाज देने के लिए पत्थर की दीवार की जगह ग्लास यानी शीशे का इस्तेमाल बेहतरीन विकल्प है. इस से विजन तो क्लीयर रहता ही है, साथ ही साफसफाई के लिहाज से भी इसे अच्छा माना जाता है. यही नहीं अगर आप के घर का आकार ज्यादा बड़ा नहीं है तो जाहिर है कि बाथरूम भी छोटा ही होगा, ऐसे में ग्लास की मदद से आप बाथरूम को स्पेशियस बना सकते हैं.

ग्लास से बने वाशबेसिन, शावर स्टाल या पार्टीशिन को बाथरूम में जगह दे सकती हैं. खिड़ेकियों और काउंटरटौप्स के लिए आप के पास फ्रास्टेड ग्लास के विकल्प हैं. ग्लास थीम हो तो आप टिंटेड ग्लास का भी बखूबी इस्तेमाल कर सकती हैं. इस में ज्यादा से ज्यादा एक से दो रंगों का इस्तेमाल एक समय पर किया जा सकता है. ग्लास थीम का इस्तेमाल करते हुए यदि क्रोम फिनिश के नल और फिक्सचर्स का इस्तेमाल किया जाए तो बाथरूम और भी खूबसूरत दिखता है. पौधों से करें सजावट लोगों को अकसर लगता है कि बाथरूमका माहौल ऐसा नहीं होता है कि वहां पौधे रखे जाएं, जबकि सच तो यह है कि बाथरूम की सब से अच्छी सजावट पौधों से ही होती है. बाथरूम में ह्यूमिडिटी ज्यादा रहती है तोऐसे में कोई ऐसा प्लांट चुनें जो इस तरह के माहौल में एडजस्ट कर पाए. आर्किड्सऔर लिली इस तरह के माहौल के लिएपरफैक्ट हैं. लेकिन अगर ज्यादा पत्तेदार प्लांट चाहिए

तो फर्न या पोथोस प्लांट भी अच्छे हैं. पौधे बाथरूम के इंटीरियर डिजाइन को एक नया और आकर्षक लुक देते हैं. बर्ड्स नेस्ट फर्न, पोथो, टिलैंडसिया/एयर प्लांट, ऐलोवेरा, स्टैग हार्न फर्न जैसे पौधे प्रकृति का एक स्पर्श जोड़ते हैं. पौधों के कारण आप खुद को प्रकृति के नजदीक महसूस करेंगी और तरोताजा रहेंगी. पौधों को छोटे सुंदर कलात्मक पौट में रखें.

त्रिकोण- भाग 2 : शातिर नितिन के जाल से क्या बच पाई नर्स?

दोनों बच्चों को पता था कि मम्मीपापा के बीच सब कुछ नौर्मल नहीं था.
पर जिंदगी फिर भी कट ही रही थी.
यह सब सोचतेसोचते सोनल की आंख ना जाने किस पहर में लग गई थी. उसे एक बेहद अजीब सपना आया जिस में नितिन के हाथ खून से रंगे हुए थे. अचकचा कर सोनल उठ बैठी, उस का शरीर भट्टी की तरह तप रहा था. बुखार चैक किया 102 था. चाह कर भी वह उठ ना पाई और ऐसे ही गफलियत में लेटी रही.

सुबह किसी तरह से औक्सिमीटर का इंतजाम हो गया था. सोनल ने जैसे ही नापा तो उस का औक्सीजन लैवल
85 था. उस ने फोन कर के नितिन को बोला तो नितिन भी थोड़ा परेशान हो गया और बोला,”सोनल, प्रोन
पोजीशन में लेटी रहो.”

इधरउधर नितिन ने हाथपैर मारने शुरू किए. सब जगह पैसों के साथसाथ सिफारिश चाहिए थी. नितिन
के हाथ खाली थे. किसी तरह श्रेया की फ्रैंड की मदद से सोनल को अस्पताल तो मिल गया था पर दवाओं और टैस्ट के पैसे कौन देगा?
तभी कौरिडोर में एक सांवली मगर गठीली शरीर की नर्स आई और नितिन से मुखातिब होते हुए बोली,”सर, दवाएं यहां फ्री नहीं हैं.”

नितिन मायूसी से बोला,”जानता हूं पर घर में सब लोगों को कोविड है और मांपापा को कैसे ऐसे छोड़ देता, उसी चक्कर में सबकुछ लग गया. 2 बच्चे भी हैं, आप ही बताओ क्या करूं? बिजनैस में अलग से घाटा चल रहा है.”

नर्स का नाम ललिता था. वह 32 वर्ष की थी. उसे नितिन से थोड़ी सहानुभूति सी हो गई. उस ने कहा,”अच्छा सर, मैं कोशिश करती हूं.”

नितिन ने अचानक से ललिता का हाथ अपने हाथों में ले कर हलके से थपथपा दिया. ललित हक्कीबक्की रह गई थी. नितिन धीरे से बोला,”आई एम सौरी ललिता, पर तुम्हें पता है ना इंसान ऐसे पलों में कितना कमजोर पड़ जाता है.”

ललिता को लगा कि नितिन कितना केयरिंग है. अपने घरपरिवार को ले कर और एक उस का पहला पति था
एकदम निक्कमा. काश, मेरा पति भी इतना केयरिंग होता तो मुझे अपनी जान हथेली पर रख कर यह नौकरी नहीं करनी पड़ती.

नितिन विजयी भाव के साथ घर आया. उसे लग रहा था कि उस ने दवाओं का इंतजाम फ्री में ही कर दिया है. थोड़े से घड़ियाली आंसू बहा कर वह ललिता को पूरी तरह अपने शीशे में उतार लेगा.

नितिन के पास यही हुनर था, औरतों की भावनाओं को हवा दे कर उन को उल्लू बनाना. औरतों की झूठी
तारीफें करना और खुद अपना उल्लू सीधा करना.

ललिता ने सोनल की दवाओं का इंतजाम कर दिया था. नितिन ने नहा कर ब्लू कलर की शर्ट और जींस
पहनी. उसे पता था वह इस में कातिल लगता है. दोनों बच्चों को बुलाकर दूर से ही बोला,”बेटा, मैं मम्मी के पास जा रहा हूं, तुम लोग रह लोगे क्या अकेले?”

श्रेया डबडबाई आवाज में बोली,”पापा, मम्मी ठीक हो जाएंगी ना?”

नितिन इतना स्वार्थी था कि उसे अभी भी ललिता दिख रही थी. झुंझलाता हुआ बोला,”अरे भई, इसलिए तो वहां
जा रहा हूं, तुम क्यों रोधो रही हो?”

आर्यन श्रेया को चुप कराते हुए बोला,”दीदी, हम लोग हिम्मत नहीं हारेंगे, पापा आप जाओ.”

नितिन हौस्पिटल तो गया पर सोनल के पास जाने के बजाए घाघ लोमड़ी की तरह ललिता के बारे में
इधरउधर से पता लगाता रहा था. यह पता लगते ही कि ललिता का अपने पति से तलाक हो गया है नितिन
की बांछें खिल गई थीं. उधर सोनल का औक्सीजन लैवल डीप कर रहा था. हौस्पिटल में इतनी मारामारी थी
कि अगर मरीज का तीमारदार ध्यान ना दे तो मरीज की कोई सुधबुध नहीं लेता था.

नितिन बाहर से ही सोनल को देख रहा था. उस का बिलकुल भी मन नहीं था अंदर जाने का. तभी नितिन ने दूर से ललिता को आते हुए देखा, नितिन भाग कर अंदर सोनल के पास गया. नितिन ने देखा कि सोनल का
औक्सीजन लेवल 70 पहुंच चुका था. वह भाग कर ललिता के पास गया और घड़ियाली आंसू बहाते हुए
बोला,”ललिता, मेरी सोनल को बचा लो. घर पर बच्चों के लिए खाने का इंतजाम करने गया था.”

ललिता भागते हुए सोनल के पास पहुंची तो देखा औक्सीजन मास्क ठीक से लगा हुआ नहीं था. उस ने ठीक किया तो सोनल का औक्सिजन लैवल बढ़ने लगा. नितिन ललिता के करीब जाते हुए बोला,”ललिता, तुम मेरे लिए फरिश्ता बन कर आई हो.”

ललिता को नितिन से सहानुभूति सी हो गई थी. नरम स्वर में बोली,”आप चिंता मत करें, यह मेरा पर्सनल नंबर है. अगर जरूरत पड़े तो कौल कर लीजिएगा.”

नितिन को ललिता से और बात करनी थी, इसलिए बोला,”यहां कोई कैंटीन है, सुबह से कुछ नहीं खाया है. तुम्हें अजीब लग रहा होगा पर पापी पेट तो नहीं मानता ना.”

ललिता बोली,”आप मेरे साथ चलो…”

कैंटीन में बैठेबैठे 1 घंटा हो गया था. नितिन जितना झूठ बोल सकता था, उस ने बोल दिया था. ललिता जब
कैंटीन से बाहर निकली तो उसे लगा कि वह नितिन के बेहद करीब आ गई है. ललिता ने नितिन की मदद करने के उद्देश्य से अपनी ड्यूटी भी उस वार्ड में लगवा ली जिस में सोनल ऐडमिट थी. वह आतेजाते आंखों ही आंखों में नितिन को साहस देती रहती थी. नितिन को ललिता में अपना अगला शिकार मिल गया था. वह बेहया इंसान यहां तक सोच बैठा था कि अगर सोनल को कुछ हो गया तो वह ललिता को अपनी जिंदगी में शामिल कर लेगा. ललिता अकेली रहती है और अच्छाखासा कमाती है. दिखने में भी आकर्षक है और सब से बड़ी बात ललिता उसे पसंद भी करने लगी है.

अब नितिन का रोज का यह काम हो गया था, ललिता के साथ कैंटीन में खाना खाना और अपनी दुख की
कहानी कहना. ललिता को नितिन का आकर्षक रूपरंग और उस का अपने परिवार के लिए समर्पण आकर्षित
कर रहा था. उसे सपने में भी भान नहीं था कि नितिन इंसान के रूप में एक भेड़िया है.

महुए की खुशबू – भाग 1

पोस्टमैन ने हाथ में पकड़ा दिया एक भूरा लिफ़ाफ़ा. तीसचालीस साल पहले इसे सरकारी डाक माना जाता था. लिफ़ाफ़ा किस दफ़्तर से आया? कोने में एक शब्द ‘प्रेषक’ लिखा दिखाई दे रहा था. आगे कुछ लिखा तो है पर अस्पष्ट है.

सरकारी मोहर ऐसी ही होती थी. उस के मजमून से ही भेजने वाले दफ्तर का पता चलता. उत्सुकता से लिफ़ाफ़ा खोला औऱ खुशी से उछल पड़ा.

सुदूर गांव की प्राइमरी पाठशाला में मुझे शिक्षक की नियुक्ति और तैनाती देने की बाबत आदेश था और अब भूरा सरकारी लिफ़ाफ़ा मुझे रंगीन नज़र आने लगा.

‘गांव की पाठशाला…’ एक पाठ था बचपन में. साथ में अनेक चित्र दिए थे उस पाठशाला के ताकि  शहर के बच्चों को पाठ की वस्तुस्थिति सचित्र दिखाई जा सके. वे सभी चित्र अब मेरी आंखों के सामने आ गए…

साफसुथरा स्कूल.  छोटा सा मैदान. उस में खेलतेदौड़ते बच्चे. 2 झूले भी, जिन पर बालकबालिकाएं झूलती दिख रही होतीं. वहीं सामने लाइन से बने खपरैल वाले क्लास के 4 कमरे, अंदर जूट की लंबीलंबी रंगीन टाटपट्टियां. ऊपर घनी छांव डालते नीम और आम के पेड़. ध्यान से देखने पर एकदो चिड़िया भी बैठी दिख गईं डाल पर. एक क्लास तो पेड़ के नीचे ही लगी थी.

तिपाये पर ब्लैकबोर्ड था. मोटे चश्मे में सदरी डाले माटसाब पढ़ा रहे थे.स्कूल का घंटा पेड़ की एक डाल से ही लटका था जिसे एक सफेद टोपी लगाए चपरासी बजा रहा होता. ईंटों पर रखा मटका और पानी पीती एक बच्ची.

कक्षा के दरवाज़े से अंदर दिखतेपढ़ाते गुरुजी और ध्यान लगा कर पढ़ते बच्चे. कमीजनिक्कर में लड़के और लाल रिबन लगाए बच्चियां, सब गुलगोथने और लाललाल गाल वाले प्यारेप्यारे.

दूर पीछे  गांव के खेत, तालाब और झोपड़ियां दिख रही थीं, जिनके आगे भैंसगाय हरा चारा खा रही होतीं. गांव की तरफ़ एक सड़क मोड़ ले कर आती दिख रही थी. आकाश में सफ़ेद कपास के जैसे उड़ते बादल और साथ में एक पक्षियों की टोली.

शायद हवा पुरवाई चल रही होगी, पर तसवीरों में पता नहीं चलता हवा के रुख का. सरकारी किताब थी, इसलिए सबकुछ ठीकठाक ही नहीं, अत्यंत मनमोहक दिखाना मजबूरी थी चित्रकार की शायद. असलियत दिखा कर भूखे थोड़े ही मरना था.

गांव के स्कूल की वही पुरानी किताबी तसवीरें मन में उतारे मैं बस में बैठ गया. गांव में रहनेखाने का क्या होगा, अख़बार मिलेगा या नहीं, कितने बच्चे होंगे, सहशिक्षक, प्रिंसिपल, क्लर्क,  चपरासी  आदि सोचते हुए मेरा सिर सीट पर टिक गया था.

‘ए बाबू साहब, मटकापुर आय गवा, उतरो,’  कंडक्टर ने कंधा पकड़ कर उठाया. मेरे एक बक्सा, झोला और होल्डाल ले कर सड़क पर टिकते  ही बस धुआंधूल उड़ाती आगे निकल गई.मेरे साथ ही एक सवारी और उतरी थी, एक महिला, उस के साथ 2 बच्चे. उन्हें लेने 2 मर्द साइकिलों से आए थे. एक साइकिल पर बच्चे और दूसरी पर पीछे वह महिला बैठ गई.

मुझे ऐसा आभास हुआ कि महिला साथ आए पुरुष को मेरी तरफ़ इशारा कर के कुछ बता रही थी. पुरुष ने एक उचटती सी नज़र मुझ पर मारी, सिर हिलाया और साइकिल पर बैठ कर पैडल मारता चल दिया.

‘होगा कुछ,’ मैं ने मन ही मन सोचा और रूमाल से चेहरा पोंछ कर चारों तरफ नज़र दौड़ाई. दूरदूर तक गांव का कोई निशान नहीं था. इकलौती  पगडंडी सड़क से उतर कर खेतों की तरफ जाती सी लगी. मैं उसी पर बढ़ लिया और मुझे चित्र की ग्रामीण सड़क याद आ गई. पता नहीं वह कौन सा गांव था, यह वाला तो पक्का नहीं था.

कभी इतना बोझा मैं ने उठाया नहीं था. ऊपर से मंज़िल और रास्ते की लंबाई भी अज्ञात थी व दिशा अनिश्चित. तभी सामने से गमछा डाले एक आदमी साइकिल पर आता दिखाई दिया. मैं कुछ कहता, इस के पहले ही वह खुद पास आ गया, साइकिल से उतरा और सवाल दाग दिया, ‘कौन हो, कौन गांव जाए का है?’ गांव में आप को परिचय देना नहीं पड़ता, आप से लिया जाता है.

रास्तेभर में मेरा पूरा नाम, जाति, जिला, पिताजी, बच्चे, परिवार आदि की पूरी जानकारी साइकिल वाले को ट्रांसफर हो चुकी थी. बीसपचीस कच्चे और दोतीन मकान पक्के यानी छत पक्की वाले दिखने लगे. मेरी पोस्टिंग वाला गांव आ चुका था- मटकापुर.

यह वह तसवीर वाला गांव नहीं ही था.  समझ आने लगा कि चित्रकार के रंगों का गांव हक़ीक़त से कितना अलग होता है. वह कभी मटकापुर आया नहीं होगा. कूची भी झूठ बोलती है. गांव के स्कूल का नया ‘मास्टर’ आया है, यह ख़बर जंगल की आग बन गांव में फ़ैलने लगी. बड़ेबूढ़े जुटने लगे. कौन हैं, कौन गांव, जिला, पूरा नाम, जाति सब बारबार पूछा और बताया जा रहा था.

मेरे नाम का महत्त्व नाम के साथ दी गई अनावश्यक  जानकारी के आधार पर ही लगाया जाने लगा. किसी को समझ आया, कुछ सिर हिला रहे थे, ‘पता नहीं को है, किते से आए.’ ख़ैर, मैं जो भी था, प्रारंभिक आवभगत में कमी नहीं हुई. गांव में जो व्यक्ति मेरी बिरादरी के सब से क़रीब साबित हुए, उन का ही धर्म बन गया मुझे आश्रय देने का. खाना हुआ और सोने के लिए खटिया डाल दी गई.

मैं अनजाने में और घोर अनिच्छा से पहले ही दिन गांव के लोगों के एक धड़े में जा बैठा था. गांव मे न्यूट्रल कुछ नहीं होता. हर आदमी होता है इस तरफ का या दूसरी तरफ  या ऊंचा या नीचा. चुनो या न चुनो. एक पाले की मोहर तो लग ही जाएगी, मतलब  लगा दी जाएगी आप की शख्सियत के लिफ़ाफ़े पर.

यह मोहर सरकारी वाली नहीं, सामाजिक होती है जो दूर से ही दिख जाती है. इस का छापा जन्मभर का होता है.

बिग बॉस 16 में आया नया ट्विस्ट, टीना दत्ता और निमृत कौर के बीच छिड़ी जंग

सलमान खान शो बिग बॉस16 हर साल की तरह ही मीडिया की सुर्खियो में बना हुआ है शो टीआरपी की रेस में भी आगे चल रहा है. शो में हो रही लडाईया और दोस्ती फैंस का खूब दिल जीत रही है. नए-नए कैप्टन सी टास्क फैंस को काफी पसंद आ रहे है वही नए पुराने रिश्तो और दोस्ती बदलती नज़र आ रही है.

आपको बता दे, कि कभी निमृत कौर और टीना दत्ता अच्छे दोस्त हुआ करते थे, लेकिन अब दोनो एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हो गए है. दोनो के बीच दरार आ चुकी है हाल में बिग बॉस के घर में एक टास्क हुआ था. टास्ट में निमृत को घरवालों को उनके योगदान पर रैकिंग देनी थी.इस टास्क के दौरान शो  खूब बवाल हुआ. जिसमें टीना दत्ता और निमृत कौर आमने-सामने आ गए.

 

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इसी बीच बिग बॉस 16 का एक प्रोमो वीडियो सामने आया है जो कि सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हओ रहा है. ये प्रोमो वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है, जिसमें टीना और निमृत एक दूसरे से लड़ते हुए नज़र आ रहे है. अपकमिंग एपिसोड़ में बिग बॉस के घर में जमकर हंगामा होगा. इसी दौरान शिव ठाकरे सभी घरवालों की क्लास लगाते हुए दिखाई देंगे. दरअसल, शो में इस बार बर्तन धोने को लेकर घमासान होगा.

वाइल्ड कार्ड एंट्री किसी

बता दें, कि हाल ही में बिग बॉस16 के घर में वाइल्ड कार्ड एंट्री हुई है. गोल्डन ब्यॉज ने इस शो में धमाकेदाकर एंटी की है बताया जा रहा कि अगले हफ्ते कई और सेलेब्स बिग बॉस के घर में एंट्री करते नज़र आएंगे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घर में कार्तिक आर्यन और अलाया फर्नीचरवाला, सलमान खान के साथ खूब मस्ती करने वाले है. हालांकि अभी इस बात कि पुष्टि नहीं हुई है कि ये वाइल्ड कार्ड एंट्री है, क्योकि ये दोनों अपनी फिल्म फ्रेडी को प्रमोट करने आएंगे.

नॉमिनेट सदस्य

 

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बता दें, कि इस हफ्ते के लिए शालीन भनोट,टीना दत्ता, साजिद खान, सुंबुल तौकीर खान, एमसी स्टेन, शिव ठाकरे और प्रिंयका चौधरी नॉमिनेट है.

आशा का दीप- भाग 1: किस उलझन में थी वैभवी

आप हैं मिस वैभवी, सीनियर मार्केटिंग मैनेजर,’’ शाखा प्रबंधक ने वैभवी का परिचय नए नियुक्त हुए सेल्स एवं डिस्ट्रिब्यूशन औफिसर विनोद से कराते हुए कहा.

वैभवी ने तपाक से उठ कर हाथ मिलाया. विनोद ने वैभवी के हाथ के स्पर्श में गर्मजोशी को स्पष्ट महसूस किया. उस ने वैभवी की तरफ गौर से देखा. वह उस के चुस्त शरीर, संतुलित पोशाक और दमकते चेहरे पर बिखरी मधुर मुसकान से प्रभावित हुआ.

वैभवी ने भी विनोद का अवलोकन किया. सूट के साथ मैच करती शर्ट और नेक टाई, अच्छी तरह सैट किए बाल, क्लीनशेव्ड, दमकता चेहरा पहली नजर में प्रभावित करने वाला व्यक्तित्व.

‘‘आप हैं मिस्टर विनोद, आवर न्यू सेल्य एंड डिस्ट्रिब्यूशन मैनेजर.’’

वैभवी से परिचय के बाद शाखा प्रबंधक महोदय विनोद को सिलसिलेवार सभी केबिनों में ले गए. विनोद ने केबिन में अपनी सीट पर बैठ कर मेज के एक तरफ रखा लैपटौप औन किया.

थोड़े समय में ही सेल्स, डिस्ट्रिब्यूशन और मार्केटिंग इंटररिलेटिड वैभवी और विनोद की नियमित बैठकें होने लगीं. फिर धीरेधीरे अंतरंगता बढ़ती गई.

दोनों ही अविवाहित थे. दोनों अपने लिए उपयुक्त जीवनसाथी की तलाश में भी थे. बढ़ती अंतरंगता की परिणति उन की मंगनी में बदली और विवाह की तिथि तय की गई.

दोनों के परिवार जोशोखरोश से विवाह की तैयारियां कर रहे थे. एक रोज बड़े डिपार्टमैंटल स्टोर से शौपिंग कर वैभवी बाहर आ रही थी, सामने से आती एक प्रौढ़ा स्त्री उस से टकराई. उस के हाथों का पैकेट वैभवी के वक्षस्थल से टकराया.

दर्द की तीव्र लहर वैभवी के वक्ष स्थल पर फैल गई. बड़ी मुश्किल से चीखने से रोक पाई वैभवी अपनेआप  को. पर लौट कर कपड़े बदलते हुए उस ने वक्षस्थल पर हाथ फिराया तो एक हलकी सी गांठ उस को दाएं वक्षस्थल पर महसूस हुई. गांठ दबाने पर हलकाहलका दर्द उठा.

औफिस से थोड़ी देर की छुट्टी ले कर वह अपने परिचित डाक्टर के पास गई. जांच करने के बाद डाक्टर गंभीर हो गए.

‘‘आप को कुछ टैस्ट करवाने होंगे,’’ डाक्टर साहब ने गंभीरता से कहा.

‘‘क्या कुछ सीरियस है?’’ आशंकित स्वर में वैभवी ने पूछा.

‘‘टैस्ट रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है. वैसे क्या आप के परिवार में किसी, मेरा मतलब आप की माताजी या पिताजी या दादीनानी को ऐसी तकलीफ हुई थी,’’ डाक्टर साहब ने धीरेधीरे बोलते हुए गंभीर स्वर में पूछा.

इस सवाल पर वैभवी गंभीर हो गई. उस की मम्मी को कई साल पहले, जब वह किशोरावस्था में थीं, ब्रेस्ट कैंसर हुआ था. लंबे समय तक तरहतरह के इलाज के बाद और वक्षस्थल से एक वक्ष काटने के बाद इस समस्या से छुटकारा मिला था. क्या उसे भी वक्षस्थल यानी ब्रेस्ट कैंसर है?

‘‘क्या टैस्ट आप के यहां होंगे?’’

‘‘जी नहीं, ये सब बड़े अस्पताल में होते हैं. एक टैस्ट से स्थिति स्पष्ट न होने पर दूसरे कई टैस्ट करवाने पड़ सकते हैं.’’

‘‘बाई द वे, आप का अंदाजा क्या है?’’ वैभवी के इस सवाल पर डाक्टर गंभीर हो गए, ‘‘मिस वैभवी, अंदाजे के आधार पर चिकित्सा नहीं हो सकती. प्रौपर डायग्नोसिस किए बिना बीमारी का इलाज नहीं हो सकता.’’

‘‘आप ने फैमिली बैकग्राउंड पर सवाल किया था. मेरी मम्मी को कई साल पहले ब्रेस्ट कैंसर हुआ था. सर्जरी द्वारा उन के वक्ष को काटना पड़ा था. कहीं मु झे भी…’’

‘‘मिस वैभवी, हैव फेथ औन योरसैल्फ. कभीकभी सारा अंदाजाअनुमान गलत साबित होता है,’’ यह कहते डाक्टर साहब ने अपने लैटर पर एक बड़े अस्पताल का नाम लिखते उस पर परामर्श लिखा और कागज वैभवी की तरफ बढ़ा दिया.

औफिस में अपनी सीट पर बैठी वैभवी गंभीर सोच में थी. हर रोज वह अपने सहयोगियों के साथ कंपनी के किसी नए उत्पादन और उस की मार्केटिंग पर डिस्कशन करती थी, मगर आज वह खामोश थी.

विनोद भी अपनी मंगेतर को गंभीर देख कर उल झन में था.

‘‘हैलो वैभवी, हाऊ आर यू?’’ साइलैंट मोड पर रखे सैलफोन की स्क्रीन पर एसएमएस चमका.

‘‘फाइन,’’ संक्षिप्त सा जवाब दे वैभवी ने फोन बंद कर दिया और उठ कर शाखा प्रबंधक के कमरे में चली गई.

‘‘सर, मु झे कुछ पर्सनल काम है, आज छुट्टी चाहिए.’’

बेटी को आज इतनी जल्दी आया देख कर मम्मी चौंक गईं. ‘‘वैभवी, कोई प्रौब्लम है?’’ पानी का गिलास थमाते मम्मी ने पूछा.

वैभवी खामोश थी. क्या बताए? कैंसर एक दाग सम झा जाता था. एक स्टिगमा. कैंसरग्रस्त व्यक्ति को अछूत के समान सम झ कर हर कोई उस से दूरी बनाए रखना चाहता है.

उस की मम्मी को भी कैंसर हुआ था 20 साल पहले. सर्जरी द्वारा उन का एक वक्ष काट दिया गया था. कैंसर जेनेटिक स्टेज की प्रथम स्टेज पर था. उस का फैलना थम गया था. 20 साल बाद उस की मम्मी नौर्मल लाइफ जी रही थीं. मगर सब जानकार, सभी संबंधी उन से एक दूरी बना कर रखते थे.

‘‘वैभवी, क्या बात है, कोई औफिस प्रौब्लम है?’’ सोफे पर बैठ कर वैभवी का चेहरा अपने हाथों में थामते मम्मी ने प्यार से पूछा.

वैभवी की आंखें भर आईं. वह हौलेहौले सुबकने लगी. इस पर मम्मी घबरा गईं. उन्होंने उस को अपनी बांहों में भर लिया. पानी का गिलास उस के होंठों से लगाया. चंद घूंट पीने के बाद वैभवी संयत हुई. उस ने स्थिर हो मम्मी को सब बताया.

वैभवी की मां गंभीर हो गईं. क्या कैंसर पुश्तैनी था? उन को कैंसर था. उन से पहले शायद उन की मां को भी. मगर दोनों अच्छी उम्र तक जीवित रही थीं.

अजीब पसोपेशभरी और दुखभरी स्थिति बन गई थी. वैभवी के विवाह होने को मात्र 15 दिन बाकी थे. अब यह दुखद स्थिति बताने पर रिश्ता टूटना तो था ही, साथ ही कैंसरग्रस्त परिवार है, यह दाग स्थायीतौर पर उन पर लग जाना था.

‘‘डाक्टर ने अभी अपना अंदाजा बताया है, साथ ही यह भी कहा है कि कई बार अंदाजा गलत भी साबित होता है,’’ मम्मी ने हौसला बंधाने के लिए आश्वासनभरे स्वर में कहा.

‘‘मगर हम विनोद और उस के परिवार को क्या बताएं?’’

वैभवी के इस सवाल पर मम्मी खामोश हो गईं. मां के बाद अब बेटी को कैंसर जैसे रोग की त्रासदी का सामना करना पड़ रहा था. मां को कैंसर विवाह के बाद 2 बच्चों को जन्म देने के बाद जाहिर हुआ था. परिणाम में वक्ष स्थल और बाद में गर्भाशय को निकालना पड़ा था.

मगर बेटी की त्रासदी मां से बड़ी थी. वह कुंआरी थी. विवाह दहलीज पर था. वरवधू दोनों पक्षों की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं.

विवाह की तारीख से पहले रिश्ता टूट जाना आजकल के जमाने में इतना असामान्य नहीं सम झा जाता. मगर कोई उचित कारण होना चाहिए.

मगर वैभवी की स्थिति एकदम असामान्य थी. कुदरत की मार कि इतनी त्रासदीभरे ढंग से उस पर पड़ी थी. ‘‘मैं अगर यह बात विनोद से छिपाती हूं तो विवाह के बाद इस बात के उजागर होने पर, कि मु झे डाक्टर द्वारा आगाह कर दिया गया था, मैं सारी उम्र उन से आंख नहीं मिला सकूंगी,’’ वैभवी ने सारी स्थिति की समीक्षा करते कहा.

‘‘मेरे बाद तुम्हारे कैंसरग्रस्त होने से तुम्हारी छोटी बहन अनुष्का के भविष्य पर भी प्रभाव पड़ेगा. उस का रिश्ता करना मुश्किल हो जाएगा,’’ मम्मी के स्वर में परेशानी  झलक रही थी.

वैभवी भी सोच में थी कि वह विनोद को कैसे बताए.

‘‘वैभ,’’ विनोद का फोन था. हर शाम विदा लेने के बाद दोनों एक या अनेक बार अपनेअपने सैलफोन से हलकीफुलकी चैट करते थे.

त्रिकोण- भाग 1 : शातिर नितिन के जाल से क्या बच पाई नर्स?

आज सोनल को दूसरे दिन भी बुखार था. नितिन अनमना सा रसोई में खाना बनाने का असफल प्रयास कर रहा था. सोनल मास्क लगा कर हिम्मत कर के उठी और नितिन को दूर से ही हटाते हुए बोली,”तुम जाओ, मैं करती हूं.”

नितिन सपाट स्वर में बोला,”तुम्हारा बुखार तो 99 पर ही अटका हुआ है और तुम आराम ऐसे कर रही हो,
जैसे 104 है.”

फीकी हंसी हंसते हुए सोनल बोली,”नितिन, शरीर में बहुत कमजोरी लग रही है, मैं झूठ नहीं बोल रही हूं.”

तभी 15 वर्षीय बेटी श्रेया रसोई में आई और सोनल के हाथों से बेलनचकला लेते हुए बोली,”आप जाइए, मैं बना लूंगी.”

तभी 13 वर्षीय बेटा आर्यन भी रसोई में आ गया और बोला,”मम्मी, आप लेटो, मैं आप को नारियल पानी देता हूं और टैंपरेचर चेक करता हूं.”

सोनल बोली,”बेटा, तुम सब लोग मास्क लगा लो, मैं अपना टैंपरेचर खुद चैक कर लेती हूं.”

नितिन चिढ़ते हुए बोला,”सुबह से जब मैं काम कर रहा था तो तुम दोनों का दिल नहीं पसीजा?”

श्रेया थके हुए स्वर में चकले पर किसी देश का नक्शा बेलते हुए बोली,”पापा, हमारी औनलाइन क्लास थी, 1
बजे तक.”

आर्यन मास्क को ठीक करते हुए बोला,”पापा, एक काम कर लो, कहीं से औक्सिमीटर का इंतजाम कर लीजिए, मम्मी का औक्सीजन लैवल चैक करना जरूरी है.”

नितिन बोला,”अरे सोनल को कोई कोरोना थोड़े ही हैं, पैरासिटामोल से बुखार उतर तो जाता है, यह वायरल
फीवर है और फिर कोरोना के टैस्ट कराए बगैर तुम क्यों यह सोच रहे हो?”

श्रेया खाना परोसते हुए बोली,”पापा, तो करवाएं? नितिन को लग रहा था कि क्यों कोरोना के टैस्ट पर ₹4,000 खर्च किया जाए. अगर होगा भी तो अपनेआप ठीक हो जाएगा. भला वायरस का कभी कुछ इलाज मिला है जो अब मिलेगा?”

जब श्रेया खाना ले कर सोनल के कमरे में गई तो सोनल दूर से बोली,”बेटा, यहीं रख दो, करीब मत आओ, मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण यह बुखार तुम्हे भी हो.”

नितिन बाहर से चिल्लाते हुए बोला,”तुम तो खुद को कोरोना कर के ही मानोगी.”

सोनल बोली,”नितिन, चारों तरफ कोरोना ही फैला हुआ है और फिर मुझे बुखार के साथसाथ गले में दर्द भी हो रहा है.”

श्रेया और आर्यन बाहर खड़े अपनी मम्मी को बेबसी से देख रहे थे. क्या करें, कैसे मम्मी का दर्द कम करें
दोनों बच्चों को समझ नहीं आ रहा था. सोनल को नितिन की लापरवाही का भलीभांति ज्ञान था. उसे यह भी पता था कि महीने के आखिर में पैसे ना के बराबर होंगे इसलिए नितिन टैस्ट नहीं करवा रहा है. सरकारी फ्री टैस्ट की स्कीम ना जाने किन लोगों के
लिए हैं, उसे समझ नहीं आ रहा था.
सोनल ने व्हाट्सऐप से नितिन को दवाओं की परची भेज दिया. नितिन मैडिकल स्टोर से दवाएं ले आया,
हालांकि मैडिकल स्टोर वाले ने बहुत आनाकानी की थी क्योंकि परची पर सोनल का नाम नहीं था.

दवाओं का थैला सोनल के कमरे की दहलीज पर रख कर नितिन चला गया. सोनल ने पैरासिटामोल खा ली
और आंखे बंद कर के लेट गई. पर उस का मन इसी बात में उलझा हुआ था कि वह कल औफिस जा पाएगी
या नहीं. आजकल तो हर जगह बुरा हाल है. एक दिन भी ना जाने पर वेतन कट जाता है. कैसे खर्च चलेगा
अगर उसे कोरोना हो गया तो? नितिन के पास तो बस बड़ीबड़ी बातें होती हैं, यही सोचतेसोचते उस के कानों
में अपने पापा की बात गूंजने लगी,”सोनल, यह तुझे नहीं तेरी नौकरी को प्यार करता है. तुझे क्या लगता है यह तेरे रूपरंग पर रिझा है?
तुझे दिखाई नहीं देता कि तुम दोनों में कहीं से भी किसी भी रूप में कोई समानता नहीं है…”

आज 16 वर्ष बाद भी रहरह कर सोनल को अपने पापा की बात याद आती है. सोनल के घर वालों ने उसे नितिन से शादी के लिए आजतक माफ नहीं किया था और नितिन के घर में रिश्तों का कभी कोई महत्त्व था ही नहीं. शुरूशुरू में तो नितिन ने उसे प्यार में भिगो दिया था, सोनल को लगता था जैसे वह दुनिया की सब से खुशनसीब औरत है पर यह मोहभंग जल्द ही हो गया था, जब 2 माह के भीतर ही नितिन ने बिना सोनल से पूछे उस की सारी सैविंग किसी प्रोजैक्ट में लगा दी थी.

जब सोनल ने नितिन से पूछा तो नितिन बोला,”अरे देखना मेरा प्रोजैक्ट अगर चल निकला तो तुम यह नौकरी
छोड़ कर बस मेरे बच्चे पालना.”

पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और तब तक श्रेया के आने की दस्तक सोनल को मिल गई थी. फिर धीरेधीरे नितिन
का असली रंग सोनल को समझ आ चुका था. जब तक सोनल का डैबिट कार्ड नितिन के पास होता तो सोनल पर प्यार की बारिश होती रहती थी. जैसे ही सोनल नितिन को पैसों के लिए टोकती तो नितिन सोनल से बोलना छोड़ देता था. धीरेधीरे सोनल ने स्वीकार कर लिया था कि नितिन ऐसा ही है. उसे मेहनत करने की आदत नही है. सोनल के परिवार का उस के साथ खड़े ना होने के कारण नितिन और ज्यादा शेर हो गया था. घरबाहर की जिम्मेदारियां, रातदिन की मेहनत और पैसों की तंगी के कारण सोनल बेहद रूखी हो गई थी.
सुंदर तो सोनल पहले भी नहीं थी पर अब वह एकदम ही रूखी लगती थी. सोनल मन ही मन घुलती रहती
थी. नितिन का इधरउधर घूमना सोनल से छिपा नहीं रहा था और ऊपर से यह बेशर्मी कि नितिन सोनल के पैसों से ही अपनी गर्लफ्रैंड के शौक पूरे करता था.

बड़बोला: भाग-4

हम विपुल के घर गए तो वहां घर के साथ वाला प्लाट खाली था, जहां खाने का प्रबंध था. शहरी वातावरण से बिलकुल उलट दरियों पर बैठ कर खाने का प्रबंध था. शादी का माहौल देख कर पूरा स्टाफ दंग रह गया. तभी बरात आ गई. आतिशबाजी के नाम पर बंदूक के दोचार फायर देखने को मिले.

भूख से बुरा हाल हुआ जा रहा था, इसलिए चुपचाप दरियोें पर बैठ गए, लेकिन सुषमा ने तो जैसे प्रण कर लिया था. वह अपने इरादे से नहीं पलटी. उस ने खाना तो दूर, पानी की एक बूंद भी नहीं ली. विपुल ने काफी आग्रह किया, लेकिन सब बेकार.

महेश का मन खाने से अधिक वापस जाने की जुगाड़ में लगा था. अत: गुस्से में भुनभुनाता बोला, ‘‘कसम लंगोट वाले की, ऐसी बेइज्जती कभी नहीं हुई. विपुल से ऐसी उम्मीद नहीं थी. सर, मुझे चिंता वापस जाने की है. यहां रहने का कोई इंतजाम नहीं है, रात को कोई बस भी नहीं जाती है. सुबह आफिस कैसे पहुंचेंगे. स्टाफ की लड़कियां परेशान हैं, उन के घर कैसे सूचना दें कि हम यहां फंस गए हैं.’’

हमारी बातें सुन कर साथ में बैठे वरपक्ष के एक सज्जन बोेले, ‘‘आप कितने व्यक्ति हैं, हमारी एक बस खाना खत्म होने के बाद वापस मेरठ जाएगी. हम आप को नवयुग सिटी के बाईपास पर छोड़ देंगे. शहर के अंदर बस नहीं जाएगी, क्योंकि वहां जाने से हमें देर हो जाएगी.’’

यह बात सुन कर पूरा स्टाफ खुशी से झूम उठा. जहां दो पल पहले खाने का एक निवाला गले के नीचे जाने में अटक रहा था, अब भूख से ज्यादा खाने लगे. ऐसा केवल खुशी में ही हो सकता है. वरपक्ष के उस सज्जन को धन्यवाद देते हुए हम सब बस में जा बैठे. यह उन का बड़प्पन ही था कि बस में जगह न होते हुए भी हम 8 लोगों को बस में जगह दी, स्टाफ की लड़कियों को सीट दी और खुद ड्राइवर के केबिन में बोनट पर बैठ गए.

रात के 1 बजे नवयुग सिटी के बाईपास पर बस ने हमें उतारा. चारों तरफ सन्नाटा, सब से बड़ी समस्या बस अड्डे जाने की थी, जहां हमारे स्कूटर खड़े थे. मन ही मन सब विपुल को कोस रहे थे कि कहां फंसा दिया, कोई आटो- रिकशा भी नहीं मिला. आधे घंटे इंतजार के बाद एक रोडवेज की बस रुकी, तब जान में जान आई. हालांकि बस ने पीछे से किराया वसूल किया. उस समय हम कोई भी किराया देने को तैयार थे, हमारा लक्ष्य केवल अपने घरों को पहुंचने का था.

अगले दिन गिरतापड़ता आफिस पहुंचा. पूरे आफिस में सन्नाटा. सिर्फ कंप्यूटर आपरेटर श्वेता ही आफिस में थी. मैं कुरसी पर बैठेबैठे कब सो गया, पता ही नहीं चला. दोपहर के 2 बजे महेश ने आ कर मुझे जगाया. बाकी समय हम दोनों सिर्फ शादी की बातें करते रहे. श्वेता के कान हमारी तरफ थे. हम ने तो अपनी भड़ास कह कर निकाल दी, लेकिन वज्रपात श्वेता पर हुआ, बेचारी के सारे सपने टूट गए. कहां तो उस ने एक राजकुमार से शादी का सपना संजोया था और वह राजकुमार फक्कड़ निकला.

बात को बढ़ाचढ़ा कर कहने की आदत तो बहुतों की होती है, लेकिन 1 का 500 विपुल बना गया. श्वेता इस आडंबरपूर्ण झूठ को सह नहीं सकी और उस ने 3-4 दिन बाद त्यागपत्र दे दिया. आफिस में सब विपुल के व्यवहार

से नाराज थे, लेकिन हम कर भी कुछ नहीं सकते थे. जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा वाली कहावत आखिर चरितार्थ हो गई.

एक दिन शाम को जब विपुल आफिस से निकला तो श्वेता के भाई ने अपने 3 दोस्तों के साथ उसे घेर लिया और हाकी से उस की जम कर पिटाई करने लगे. विपुल अपने बचाव में जोरजोर से चिल्लाने लगा, लेकिन ऐसे मौके पर लोग केवल तमाशबीन बन कर रह जाते हैं, कोई बचाने नहीं आता. तभी हम और महेश वहां से गुजरे तो भीड़ देख कर महेश रुक गया. विपुल की आवाज सुन कर महेश मुझ से बोला, ‘‘सर, यह तो अपना विपुल है.’’

विपुल को पिटता देख कर हम दोनों उसे बचाने की कोशिश करने लगे. उस के बचाव के चक्कर में हम भी पिट गए. हमारे कपड़े भी फट गए. हमें देख कर भीड़ में से कुछ लोग बचाव को आगे बढ़े तो हमलावर भाग गए. विपुल की बहुत पिटाई हुई थी. आंखें सूज गईं, शरीर पर जगहजगह नीले निशान पड़ गए थे. उसे पास के नर्सिंगहोम में इलाज के लिए ले गए, जहां उसे 2 दिन रहना पड़ा.

‘‘देख लिया अपने बड़बोलेपन का नतीजा, इतनी सुंदर सुशील कन्या का दिल तोड़ दिया. क्याक्या सपने संजो कर रखे थे उस ने, सब बरबाद कर दिया. शुक्र कर हम वहां पहुंच गए वरना तेरा तो क्रियाकर्म आज हो जाता. मैं तो कहता हूं कि अब भी समय है, संभल जा और आज की पिटाई से सबक ले.’’

विपुल चुपचाप सुनता रहा. महेश का भाषण जले पर नमक का काम कर रहा था, लेकिन कड़वी दवा तो पीनी ही पड़ती है. ऐसा आदमी अपनी आदत से मजबूर होता है, फिर उसी रास्ते पर चल पड़ता है. कुछ दिन खामोश रहने के बाद विपुल की बोलने की आदत फिर शुरू हो गई, लेकिन अब स्टाफ के लोग उस की बातों को गंभीरता से नहीं लेते थे.

एक दिन विपुल मेरे केबिन में आया और बोला, ‘‘सर, आप की हेल्प की जरूरत है.’’

‘‘बोलो, विपुल, अगर मेरे बस में होगा तो जरूर करूंगा.’’

यहां नवयुग सिटी में सरकार ने प्लाट काटे हैं. डैडी ने नवगांव का मकान बेच कर यहां एक प्लाट खरीदा है और कोठी बनवानी है. आप को मालूम है कि ठेकेदार, मजदूरों के सिर पर बैठना पड़ता है, नहीं तो वे काम नहीं करते. सुबह कुछ देर से आने की इजाजत मांगनी है, शाम को देर तक बैठ कर आफिस का काम पूरा कर लूंगा, कोई काम पेंडिंग नहीं होगा. हम ने यहां किराए पर मकान ले लिया है, शाम को डैडी कोठी के कंस्ट्रेक्शन का काम देख लेंगे. बस, 1 महीने की बात है, सर.’’

मैं ने उस को इजाजत दे दी और सोचने लगा कि 1 महीने में कौन सी कोठी बन कर तैयार होती है, तभी महेश केबिन में आया.

‘‘विपुल अंगरेजों के जमाने का बड़बोला है, जिंदगी में कभी नहीं सुधरेगा.’’

‘‘अब क्या हो गया?’’

‘‘सर, सेक्टर 20 में तो 25 और 50 गज के प्लाट प्राधिकरण काट रहा है, वहां कौन सी कोठी बनवाएगा. मकान कहते शर्म आती है, इसलिए कोठी कह रहा है. यदि उस की 50 गज में कोठी है, तो सर, मेरा 100 गज का मकान तो महल की श्रेणी में आएगा.’’

मैं महेश की बातें सुन कर हंस दिया और जलभुन कर महेश विपुल को जलीकटी सुनाने लगा. खैर, विपुल ने 1 महीना कहा था, लेकिन लगभग 4 महीने बाद मकान बन कर तैयार हो गया. मकान के गृहप्रवेश पर विपुल ने पूरे स्टाफ को आमंत्रित किया, लेकिन स्टाफ ने कोई रुचि नहीं दिखाई. सब बड़े आराम से आफिस के काम में जुट गए. मेरे कहने पर सब ने एकजुट हो कर विपुल के यहां जाने से मना कर दिया.

‘‘महेश, बड़े प्रेम से विपुल ने गृहप्रवेश पर बुलाया है, हमें वहां जाना चाहिए.’’

‘‘सर, मुझे चलने को मत कहिए, उस की कोठी मैं बरदाश्त नहीं कर सकूंगा. मैं अपने झोंपड़े में खुश हूं.’’

‘‘महेश, आफिस से 2 घंटे जल्दी चल कर बधाई दे देंगे, उस की कोठी हो या झोंपड़ा, हमें इस से कुछ मतलब नहीं. वह अपनी कोठी में खुश और हम अपने झोंपड़े में खुश.’’

यह बात सुन कर महेश खुशी से उछल पड़ा और बोला, ‘‘कसम लंगोट वाले की, आप की इस बात ने दिल बागबाग कर दिया. अब आप का साथ खुशीखुशी.’’

शाम को 4 बजे हम आफिस से चल कर विपुल की कोठी पहुंचे. 50 गज के प्लाट पर दोमंजिला मकान था विपुल का. महेश ने चुटकी ली, ‘‘यार, कोठी के दर्शन करवा, बड़ी तमन्ना है, दीदार क रने की.’’

‘‘हांहां, देखो, यह ड्राइंगरूम, रसोई, बैडरूम…’’ अपनी आदत से मजबूर साधारण काम को भी बढ़ाचढ़ा कर बताने लगा कि कोठी के निर्माण में 50 लाख रुपए लग गए.

‘‘सुधर जा, विपुल, 5 के 50 मत कर.’’

‘‘नहींनहीं, आप को पता नहीं है कि हर चीज बहुत महंगी है. जिस चीज को हाथ लगाओ, लाखों से कम आती नहीं है,’’ विपुल आदत से मजबूर सफाई देने लगा.

‘‘विपुल, समय बड़ा बलवान है, इतना झूठ बोलना छोड़ दे, एक

दिन तेरा सच भी हम झूठ मानेंगे. सुधर जा.’’

‘‘बाई गौड, झूठ की बात नहीं है, बिलकुल सच है,’’ विपुल सफाई पर सफाई दे रहा था.

हम ने वहां से खिसकने में ही अपनी बेहतरी समझी. विपुल से बहस करना बेकार था. हम ने उसे शगुन का लिफाफा पकड़ाया और विदा ली.

मकान से बाहर आ कर हम दोनों के मुख से एकसाथ बात निकली :

‘‘विपुल कभी नहीं सुधरेगा. बड़बोला था, बड़बोला है और बड़बोला रहेगा.’

मंदिर नहीं अस्पताल जरूरी

अपना कोई अजीज बीमार हो और सरकारी औल इंडिया इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल’ जैसे सरकारी अस्पताल में जा पहुंचा हो और न डाक्टर बात करने को तैयार होन लैब असिस्टैंट तो कितनी घुटन और परेशानी होती है यह भुक्तभोगी ही जानते हैं. देशभर में सरकारी अस्पतालों का जाल बिछा है पर जहां मंदिर में जाने पर तुरंत प्रवेश मिल जाता है (या कुछ घंटों में सही) अस्पताल अभी भी इतने कम हैं कि उन में बैड मिलना और इलाज का समय निकालना ऐवरेस्ट पर चढ़ने के समान होता है.

दिल्ली एम्स ने सर्कुलर जारी किया है कि वहां कौरीडोरों में मरीजोंउन के रिश्तेदारों के अलावा जो भी हो उसे यूनिफौर्म और आईडी का डिस्पले करते रहना होगा क्योंकि कौरीडोर प्राइवेट लैबोंक्लीनिकों के एजेंटों से भरे हैं. ये लोग पहले मरीज की मदद करते हैं और फिर झांसा देते हैं कि सरकारी लैब में रिजल्ट सप्ताहों में आएगासर्जरी महीनों में होगीडाक्टर के लिए नंबर कई दिनों में आएगा तो क्यों न प्राइवेट जगह चला जाए.

यह देश की बहुत बड़ी दुर्गति है कि हर नागरिक को समय पर इलाज न मिल पाए. गरीब को अनाज मिलेसही इलाज मिले और जेब में पैसे हों या न होंइलाज हो हीयह तय करना सरकार का पहला काम है न कि फलां जगह मंदिर के लिए कौरीडोर बनाना और फलां जगह दूसरे धर्मस्थल को ले कर डिस्प्यूट खड़ा करना. सरकार को 4 लेन6 लेन सड़कें बनाने से ज्यादा अस्पतालों को ठीक करना होगा.

आज जो भी मैडिकल इलाज वैज्ञानिकों की शोध से मिल रहा हैवह कुछ को फाइवस्टार के पैसे देने पर ही मिलेदेश के लिए सब से ज्यादा दर्दनाक स्थिति है.

केंद्र सरकार अपनी नाक के नीचे एम्स को दलालों से मुक्त नहीं करा सकती तो ईडी (एनफोर्समैंट डाइरैक्टोरेट) सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) एनआईए (नैशनल इंवैस्टिगेशन ऐजेंसी) जैसी संस्थाएं जनता के लिए बेकार हैं. जब अपना कोई मर रहा होकराह रहा होसिर पर पैसे बनाने वाले दलाल चढ़े हों क्योंकि सरकारी इलाज न जाने कब मिलेगासरकार को ईडीफीडी पर गर्व नहीं करना चाहिएसरकारी अस्पतालों में घूम रहे दलालों पर शर्म से गड़ जाना चाहिए.  

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