शादी के 7 महीने में पेरेंट्स बने आलिया-रणबीर, शेयर किया पोस्ट

प्रैग्नेंसी को लेकर सुर्खियों में रहने वाली एक्ट्रेस आलिया भट्ट और एक्टर रणबीर कपूर पेरेंट्स बन गए हैं. मां बनने का इंतजार करने वाले फैंस को एक्ट्रेस के सोशलमीडिया पर एक पोस्ट के जरिए बेटी के पैदा होने की जानकारी दी है. इसके अलावा पोती के जन्म की खुशी जाहिर करते हुए एक्ट्रेस नीतू सिंह का रिएक्शन सामने आया है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

बेटी के पेरेंट्स बनें आलिया-रणबीर

 

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फैंस के लिए पोस्ट शेयर करते हुए एक्ट्रेस आलिया भट्ट ने लिखा, “और हमारी लाइफ की बेस्ट न्यूज कि हमारी बेटी आ गई है… वह एक मैजिकल बच्ची की तरह है. हम ऑफिशियली तौर पर प्यार मिल रहा है…ब्लेस्ड और ऑबसेस्ड पैरेंट्स…लव लव लव…आलिया और रणबीर”. एक्ट्रेस के इस पोस्ट पर बौलीवुड से लेकर टीवी सेलेब्स और फैंस अपना प्यार लुटाते हुए दिख रहे हैं. इसके अलावा दोनों के स्वस्थ रहने की शुभकामनाएं भी दे रहे हैं.

 

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आलिया भट्ट के मां बनने और नीतू कपूर (Neetu Kapoor Video) ने दादी बनने की खुशी मीडिया के सामने जाहिर की है. हाल ही में सोशमलीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रही है, जिसमें एक्ट्रेस से जब पूछा गया कि बिटिया आलिया या रणबीर में से किस पर गई है, तो उन्होंने बड़े प्यार से  कहा कि अभी तो वह बहुत छोटी है. इसलिए अभी तो कह नहीं सकती. वहीं आलिया की तबीयत के बारे में उन्होंने अपडेट देते हुए उन्होंने कहा कि वह एक दम फर्स्ट क्लास है.

 

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बता दें, एक्ट्रेस आलिया भट्ट और रणबीर कपूर की शादी इसी साल यानी अप्रेल 2022 में हुई थी, जिसके कुछ ही महीने बाद एक्ट्रेस ने प्रैग्नेंसी की खबर फैंस को दी थी. वहीं शादी के अब 7 महीने बाद ही एक्ट्रेस ने बेटी को जन्म दिया है, जिसे लेकर लोग हैरान हैं और कह रहे हैं कि एक्ट्रेस आलिया भट्ट शादी से पहले प्रैग्नेंट थी. हालांकि इस पर एक्ट्रेस का कोई रिएक्शन सामने नहीं आया है.

रिश्ते: क्यूं हर बार टूट जाती थी स्नेहा की शादी- भाग 2

‘‘हां मम्मी मैं तंग आ गया हूं बचपन से गरीबी में रहकर. अब मैं खुली हवा में सांस लेना चाहता हूं. दीदी की शादी की उम्र अब वैसे भी गुजर चुकी है. उनके लिए तुम्हें कहां रिश्ता मिलने वाला है? जो जैसा है उसे वैसा ही रहने दो. ‘‘अरे हां, ध्यान से सुनो, हम दोनों शादी के बाद सीधे अपने नए घर में चले जाएंगे. हमने अपने लिए घर भी देख रखा है, मु?ासे किसी बात की उम्मीद मत रखना. अब हम चलते हैं. सीमा को उसके घर छोड़ कर मु?ो किसी काम से जाना है,’’ बात खत्म करते भाई अपनी मंगेतर सीमा के साथ वहां से चलने को हुआ.

वे दोनों कमरे से बाहर आए तो स्नेहा को वहां खड़ी देख कर आंखें चुरा कर निकल गए. भाई को इस तरह से जाते देख कर स्नेहा निढाल सी सोफे पर गिर पड़ी. उसे जिंदगी की सारी खुशियां हाथों से छूटती नजर आईं. अपने लोगों का इस तरह रंग बदलना उसके मन में एक सवालिया निशान छोड़ गया.

जिस दिन भाई घर से निकला, उस रात कोई भी नहीं सो सका. मम्मी पापा से कह रही थीं, ‘‘कैसे रहेंगे अब? बेटे ने तो पल्ला ?ाड़ लिया, वह हमारे बुढ़ापे का सहारा था. बेटी की शादी कैसे करेंगे अब. हमारे पास तो पैसा भी नहीं ंहै…’’

‘‘हमारे यहां खाने के लाले पड़े हैं, नौकरी है नहीं और तुम्हें बेटी की शादी की पड़ी है. भूल जाओ अब उसकी शादी. जिंदगी जिस रफ्तार से चल रही है उसे वैसे ही चलने दो… उम्र गुजर गई है स्नेहा की शादी की. ‘‘हर बार लड़का ही सहारा हो यह जरूरी तो नहीं. लड़की भी तो घर का सहारा बन सकती है, बेटी को पालना अगर हमारा फर्ज है तो उसका भी फर्ज है कि हमारा सहारा बने…’’ कह कर उन्होंने करवट बदली पर सामने स्नेहा को देख कर वे चौंक गए, ‘‘अरे मैं तो बस यों ही गुस्से में कह रहा था- आज बेटे ने साथ छोड़ा है तो जरा सा मायूस हूं. लेकिन तू फिक्र मत कर सब ठीक ही होगा. एक दिन तुम्हें भी विदा करूंगा, मैं कुछ न कुछ सोचता हूं…’’ पापा ने बात संभाल तो ली पर उनके कौन से रूप पर भरोसा करें, स्नेहा सम?ा नहीं पाई. घर के खर्चे अब काफी कम हो गए थे. स्नेहा की तनख्वाह बढ़ गई थी. मम्मी थोड़े-थोड़े पैसे जमा करती रहीं. पिता को हो न हो पर मां को अपनी बेटी की जरूर फिक्र थी. एक दिन लड़के वाले स्नेहा को देखने आए. लड़के-लड़की ने एक-दूसरे को पसंद किया, बात आगे बढ़ती गई. शादी की तारीख भी तय हो गई. पर अचानक एक दिन लड़के वालों ने शादी तोड़ने का संदेश भेज दिया. ‘‘आखिर बात क्या है? आप उनके पास जाकर मिल आइए न,’’ मां ने बेचैन होकर पापा से कहा.

‘‘रिश्ता तोड़ते समय ही उन्होंने मिलने से मना कर दिया था. खैर, जाने दो हमारी बेटी को इससे भी अच्छा लड़का मिलेगा…’’ पापा ने उन दोनों को सम?ाते हुए कहा. इसके बाद दो बार स्नेहा का रिश्ता जुड़ा और फिर टूट गया. मन का बो?ा बढ़ गया था. उसकी जिंदगी जैसे एक ही ढर्रे पर चल रही थी, जिसमें कोई रोमांचक मोड़ नहीं था. सालभर तक तो यही सब चलता रहा और तभी अचानक कंपनी ने स्नेहा का उसी शहर की दूसरी ब्रांच में ट्रांसफर कर दिया. स्नेहा एक ही जगह काम कर के ऊब गई थी सो वह भी खुशी-खुशी दूसरी ब्रांच में चली गई.

नई ब्रांच में आना जैसे स्नेहा के लिए फायदेमंद साबित हुआ. यहां की आबोहवा उसे अच्छे से रास आई. कंपनी का ऑफिस घर से दूर था, लेकिन बस सेवा उपलब्ध थी, इसलिए स्नेहा को कोई परेशानी नहीं थी.

एक दिन अचानक स्नेहा की स्वनिल से मुलाकात हो गई, जो वहां मैनेजर था. पहले उन दोनों की दोस्ती हुई और फिर दोस्ती चाहत में बदल गई. स्नेहा अपने ही खयालों में खोई थी कि अचानक ड्राइवर ने बस को जोर से ब्रेक लगाया और वह हकीकत में लौट आई.

स्नेहा घर पहुंची, तो मम्मी चाय बना रही थीं और पापा टेलीविजन देख रहे थे. स्नेहा कपड़े बदल कर आई और मम्मी का हाथ बंटाने लगी. चाह कर भी वह मम्मी से शादी की बात नहीं कर पाई. इसी ऊहापोह में अगला दिन भी निकल गया. स्वनिल के आने से पहले उसका घर में बात करना जरूरी था. स्नेहा जब शाम को ऑफिस से घर पहुंची, तो पापा तैयार बैठे थे और मां अच्छी सी साड़ी पहने आईने के सामने शृंगार कर रही थी.

‘‘सुनो अब बेटी के लिए चाय बनाने मत बैठ जाना, देर हो रही है. जल्दी करो भई,’’ पापा ने मम्मी को आवाज लगाई. ‘‘सुनो बेटा, मैं और तुम्हारे पापा फिल्म देखने जा रहे हैं. तुम चाय बनाकर पी लेना और हां रात के लिए रोटी भी सेंक लेना. हम 10 बजे तक वापस आ जाएंगे,’’ कहते हुए मम्मी ने चप्पल पहनी और बाहर निकल गईं.

जान न पहचान ये मेरे मेहमान

मेरा शहर एक जानामाना पर्यटन स्थल है. इस वजह से मेरे सारे रिश्तेदार, जिन्हें मैं नहीं जानता वे भी जाने कहांकहां के रिश्ते निकाल कर मेरे घर तशरीफ का टोकरा निहायत ही बेशर्मी से उठा लाते हैं. फिर बड़े मजे से सैरसपाटा करते हैं. और हम अपनी सारी, यानी गरमी, दीवाली व क्रिसमस की छुट्टियां इन रिश्तेदारों की सेवा में होम कर देते हैं.

एक दिन मेरे बाप के नाना के बेटे के साले का खत आया कि वे इस बार छुट्टियां मनाने हमारे शहर आ रहे हैं और अगर हमारे रहते वे होटल में ठहरें तो हमें अच्छा नहीं लगेगा. लिहाजा, वे हमारे ही घर में ठहरेंगे.

मैं अपने बाल नोचते हुए सोच रहा था कि ये महाशय कौन हैं और मुझ से कब मिले. इस चक्कर में मैं ने अपने कई खूबसूरत बालों का नुकसान कर डाला. पर याद नहीं आया कि मैं उन से कभी मिला था. मेरी परेशानी भांपते हुए पत्नी ने सुझाव दिया, ‘‘इन की चाकरी से बचने के लिए घर को ताला लगा कर अपन ही कहीं चलते हैं. कभी कोई पूछेगा तो कह देंगे कि पत्र ही नहीं मिला.’’

‘‘वाहवाह, क्या आइडिया है,’’ खुशी के अतिरेक में मैं ने श्रीमती को बांहों में भर कर एक चुम्मा ले लिया. फिर तुरतफुरत ट्रैवल एजेंसी को फोन कर के एक बढि़या पहाड़ी स्टेशन के टिकट बुक करवा लिए.

हमारी दूसरे दिन सुबह 10 बजे की बस थी. हम ने जल्दीजल्दी तैयारी की. सब सामान पैक कर लिया कि सुबह नाश्ता कर के चल देंगे, यह सोच कर सारी रात चैन की नींद भी सोए. मैं सपने में पहाड़ों पर घूमने का मजा ले रहा था कि घंटी की कर्कश ध्वनि से नींद खुल गई. घड़ी देखी, सुबह के 6 बजे थे.

‘सुबहसुबह कौन आ मरा,’ सोचते हुए दरवाजा खोला तो बड़ीबड़ी मूंछों वाले श्रीमानजी, टुनटुन को मात करती श्रीमतीजी और चेहरे से बदमाश नजर आते 5 बच्चे मय सामान के सामने खड़े थे. मेरे दिमाग में खतरे की घंटी बजी कि जरूर चिट्ठी वाले बिन बुलाए मेहमान ही होंगे. फिर भी पूछा, ‘‘कौन हैं आप?’’

‘‘अरे, कमाल करते हैं,’’ मूंछ वाले ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, ‘‘हम ने चिट्ठी लिखी तो थी…बताया तो था कि हम कौन हैं.’’

‘‘लेकिन मैं तो आप को जानता ही नहीं, आप से कभी मिला ही नहीं. कैसे विश्वास कर लूं कि आप उन के साले ही हैं, कोई धोखेबाज नहीं.’’

‘‘ओए,’’ उन्होंने कड़क कर कहा, ‘‘हम को धोखेबाज कहता है. वह तो आप के बाप के नाना के बेटे यानी मेरी बहन के ससुर ने जोर दे कर कहा था कि उन्हीं के यहां ठहरना, इसलिए हम यहां आए हैं वरना इस शहर में होटलों की कमी नहीं है. रही बात मिलने की, पहले नहीं मिले तो अब मिल लो,’’ उस ने जबरदस्ती मेरा हाथ उठाया और जोरजोर से हिला कर बोला, ‘‘हैलो, मैं हूं गजेंद्र प्रताप. कैसे हैं आप? लो, हो गई जानपहचान,’’ कह कर उस ने मेरा हाथ छोड़ दिया.

मैं अपने दुखते हाथ को सहला ही रहा था कि उस गज जैसे गजेंद्र प्रताप ने बच्चों को आदेश दिया, ‘‘चलो बच्चो, अंदर चलो, यहां खड़ेखड़े तो पैर दुखने लगे हैं.’’

इतना सुनते ही बच्चों ने वानर सेना की तरह मुझे लगभग दरवाजे से धक्का दे कर हटाते हुए अंदर प्रवेश किया और जूतों समेत सोफे व दीवान पर चढ़ कर शोर मचाने लगे. मेरी पत्नी और बच्चे हैरानी से यह नजारा देख रहे थे. सोफों और दीवान की दुर्दशा देख कर श्रीमती का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था, पर मैं ने इशारे से उन्हें शांत रहने को कहा और गजेंद्र प्रताप व उन के परिवार से उस का परिचय करवाया. परिचय के बाद वह टुनटुन की बहन इतनी जोर से सोफे पर बैठी कि मेरी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई. सोचा, ‘आज जरूर इस सोफे का अंतिम संस्कार हो जाएगा.’

पर मेरी हालत की परवा किए बगैर वह बेफिक्री से मेरी पत्नी को और्डर दे रही थी, ‘‘भई, अब जरा कुछ बढि़या सी चायवाय हो जाए तो हम फ्रैश हो कर घूमने निकलें. और हां, जरा हमारा सामान भी हमारे कमरे में पहुंचा देना. हमारे लिए एक कमरा तो आप ने तैयार किया ही होगा?’’

हम ने बच्चों के साथ मिल कर उन का सामान बच्चों के कमरे में रखवाया.

उधर कुढ़ते हुए पत्नी ने रसोई में प्रवेश किया. पीछेपीछे हम भी पहुंचे. शयनकक्ष में अपने पैक पड़े सूटकेसों पर नजर पड़ते ही मुंह से आह निकल गई. मेहमानों को मन ही मन कोसते सूटकेसों को ऐसा का ऐसा वापस ऊपर चढ़ाया. ट्रैवल एजेंसी को फोन कर के टिकट रद्द करवाए. आधा नुकसान तो यही हो गया.

श्रीमती चाय ले कर पहुंची तो चाय देखते ही बच्चे इस तरह प्यालों पर झपटे कि 2 प्याले तो वहीं शहीद हो गए. अपने टी सैट की बरबादी पर हमारी श्रीमती अपने आंसू नहीं रोक पाई तो व्यंग्य सुनाई पड़ा, ‘‘अरे, 2 प्याले टूटने पर इतना हंगामा…हमारे घर में तो कोई चीज साबुत ही नहीं मिलती. इस तरह तो यहां बातबात पर हमारा अपमान होता रहेगा,’’ उठने का उपक्रम किए बिना उस ने आगे कहा, ‘‘चलो जी, चलो, इस से तो अच्छा है कि हम किसी होटल में ही रह लेंगे.’’

मुझ में आशा की किरण जागी, लेकिन फिर बुझ गई क्योंकि वह अब बाथरूम का पता पूछ रही थीं. साबुन, पानी और बाथरूम का सत्यानाश कर के जब वे नाश्ते की मेज पर आए तो पत्नी के साथ मेरा भी दिल धकधक कर रहा था. नाश्ते की मेज पर डबलरोटी और मक्खन देख कर श्रीमतीजी ने नौकभौं चढ़ाई, ‘‘अरे, सिर्फ सूखी डबलरोटी और मक्खन? मेरे बच्चे यह सब तो खाते ही नहीं हैं. पप्पू को तो नाश्ते में उबला अंडा चाहिए, सोनू को आलू की सब्जी और पूरी, मोनू को समोसा, चिंटू को कचौरी और टोनी को परांठा. और हम दोनों तो इन के नाश्ते में से ही अपना हिस्सा निकाल लेते हैं.’’

फिर जैसे मेहरबानी करते हुए बोले, ‘‘आज तो आप रहने दें, हम लोग बाहर ही कुछ खा लेंगे और आप लोग भी घूमने के लिए जल्दी से तैयार हो जाइए, आप भी हमारे साथ ही घूम लीजिएगा. अनजान जगह पर हमें भी आराम रहेगा.’’

हम ने सोचा कि ये लोग घुमाने ले जा रहे हैं तो चलने में कोई हरज नहीं. झटपट हम सब तैयार हो गए.

बाहर निकलते ही उन्होंने बड़ी शान से टैक्सी रोकी, सब को उस में लादा और चल पड़े. पहले दर्शनीय स्थल तक पहुंचने पर ही टैक्सी का मीटर 108 रुपए तक पहुंच चुका था. उन्होंने शान से पर्स खोला, 500-500 रुपए के नोट निकाले और मेरी तरफ मुखातिब हुए. ‘‘भई, मेरे पास छुट्टे नहीं हैं, जरा आप ही इस का भाड़ा दे देना.’’

भुनभुनाते हुए हम ने किराया चुकाया. टैक्सी से उतरते ही उन्हें चाय की तलब लगी, कहने लगे, ‘‘अब पहले चाय, नाश्ता किया जाए, फिर आराम से घूमेंगे.’’

बढि़या सा रैस्तरां देख कर सब ने उस में प्रवेश किया. हर बच्चे ने पसंद के अनुसार और्डर दिया. उन का लिहाज करते हुए हम ने कहा कि हम कुछ नहीं खाएंगे. उन्होंने भी बेफिक्री से कहा, ‘‘मत खाइए.’’

वे लोग समोसा, कचौरी, बर्गर, औमलेट ठूंसठूंस कर खाते रहे और हम खिसियाए से इधरउधर देखते रहे. बिल देने की बारी आई तो बेशर्मी से हमारी तरफ बढ़ा दिया, ‘‘जरा आप दे देना, मेरे पास 500-500 रुपए के नोट हैं.’’

200 रुपए का बिल देख कर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया और सोचा कि अभी नाश्ते में यह हाल है तो दोपहर के खाने, शाम की चाय और रात के खाने में क्या होगा?

फिर वही हुआ, दोपहर के खाने का बिल 700 रुपए, शाम की चाय का 150 रुपए आया. रात का भोजन करने के बाद मेरी बांछें खिल गईं. ‘‘यह तो पूरे 500 रुपए का बिल है और आप के पास भी 500 रुपए का नोट है. सो, यह बिल तो आप ही चुका दीजिए.’’

उन का जवाब था, ‘‘अरे, आप के होते हुए यदि हम बिल चुकाएंगे तो आप को बुरा नहीं लगेगा? और आप को बुरा लगे, भला ऐसा काम हम कैसे कर सकते हैं.’’

दूसरे दिन वे लोग जबरदस्ती खरीदारी करने हमें भी साथ ले गए. हम ने सोचा कि अपने लिए खरीदेंगे तो पैसा भी अपना ही लगाएंगे और लगेहाथ उन के साथ हम भी बच्चों के लिए कपड़े खरीद लेंगे. पर वह मेहमान ही क्या जो मेजबान के रहते अपनी गांठ ढीली करे.

सर्वप्रथम हमारे शहर की कुछ सजावटी वस्तुएं खरीदी गईं, जिन का बिल 840 रुपए हुआ. वे बिल चुकाते  समय कहने लगे, ‘‘मेरे पास सिर्फ

500-500 रुपए के 2 ही नोट हैं. अभी आप दे दीजिए, मैं आप को घर चल कर दे दूंगा.’’

फिर कपड़ाबाजार गए, वहां भी मुझ से ही पैसे दिलवाए गए. मैं ने कहा भी कि मुझे भी बच्चों के लिए कपड़े खरीदने हैं, तो कहने लगे, ‘‘आप का तो शहर ही है, फिर कभी खरीद सकते हैं. फिर ये बच्चे भी तो आप के ही हैं, इस बार इन्हें ही सही. फिर घर चल कर तो मैं पैसे दे ही दूंगा.’’

3 हजार रुपए वहां निकल गए. अब वे खरीदारी करते थक चुके थे. दोबारा 700 रुपए का चूना लगाया. इस तरह सारी रकम वापस आने की उम्मीद लगाए हम घर पहुंचे.

घर पहुंचते ही उन्होंने घोषणा की कि वे कल  जा रहे हैं. खुशी के मारे हमारा हार्टफेल होतेहोते बचा कि अब वे मेरे पैसे चुकाएंगे, लेकिन उन्होंने पैसे देने की कोई खास बात नहीं की.

दूसरे दिन भी वे लोग सामान वगैरह बांध कर निश्ंिचतता से बैठे थे और चिंता यह कर रहे थे कि उन का कुछ सामान तो नहीं रह गया. तब हम ने भी बेशर्म हो कर कह दिया, ‘‘भाईसाहब, कम से कम अपनी खरीदारी के रुपए तो लौटा दीजिए.’’

उन्होंने निश्ंिचतता से कहा, ‘‘लेकिन मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं.’’

आश्चर्य से मेरा मुंह खुला रह गया, ‘‘पर आप तो कह रहे थे कि घर पहुंच कर दे दूंगा.’’

‘‘हां, तो क्या गलत कहा था. अपने घर पहुंच भिजवा दूंगा,’’ आराम से चाय पीते हुए उन्होंने जवाब दिया.

‘‘उफ…और वे आप के 500-500 रुपए के नोट?’’ मैं ने उन्हें याद दिलाया.

‘‘अब वही तो बचे हैं मेरे पास और जाने के लिए सफर के दौरान भी कुछ चाहिए कि नहीं?’’

हमारा इस तरह रुपए मांगना उन्हें बड़ा नागवार गुजरा. वे रुखाई से कहते हुए रुखसत हुए, ‘‘अजीब भिखमंगे लोग हैं. 4 हजार रुपल्ली के लिए इतनी जिरह कर रहे हैं. अरे, जाते ही लौटा देंगे, कोई खा तो नहीं जाएंगे. हमें क्या बिलकुल ही गयागुजरा समझा है. हम तो पहले ही होटल में ठहरना चाहते थे, पर हमारी बहन के ससुर के कहने पर हम यहां आ गए, अगर पहले से मालूम होता तो यहां हमारी जूती भी न आती…’’

वह दिन और आज का दिन, न उन की कोई खैरखबर आई, न हमारे रुपए. हम मन मसोस कर चुप बैठे श्रीमती के ताने सुनते रहते हैं, ‘‘अजीब रिश्तेदार हैं, चोर कहीं के. इतने पैसों में तो बच्चों के कपड़ों के साथ मेरी 2 बढि़या साडि़यां भी आ जातीं. ऊपर से एहसानफरामोश. घर की जो हालत बिगाड़ कर गए, सो अलग. किसी होटल के कमरे की ऐसी हालत करते तो इस के भी अलग से पैसे देने पड़ते. यहां लेना तो दूर, उलटे अपनी जेब खाली कर के बैठे हैं.’’

इन सब बातों से क्षुब्ध हो कर मैं ने भी संकल्प किया कि अब चाहे कोई भी आए, अपने घर पर किसी को नहीं रहने दूंगा. देखता हूं, मेरा यह संकल्प कब तक मेरा साथ देता है.

Winter Special: फैमिली के लिए बनाएं करेला विद चना दाल

करेले की कई तरह की रेसिपी आपने ट्राय की होंगी. लेकिन क्या आपने कभी करेला विद चना दाल की ये रेसिपी फैमिली के लिए बनाई है. ये हेल्दी और टेस्टी रेसिपी है, जिसे आसानी से फैमिली के लिए बना सकते हैं.

सामग्री

– 250 ग्राम मुलायम छोटे करेले

– 1/2 कप चना दाल

– 1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

– 2 छोटे चम्मच धनिया पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच मिर्च पाउडर

– 1 छोटा चम्मच सौंफ पाउडर

– 1 छोटा चम्मच गरममसाला

– 1 तेजपत्ता

– 2 बड़ी इलायची

– 2 लौंग

– 4 कालीमिर्च

– 1 बड़ा चम्मच टोमैटो प्यूरी

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– 1/4 कप प्याज बारीक कटा

– 1 छोटा चम्मच अदरक व लहसुन पेस्ट

– रिफाइंड औयल

– थोड़ी सी धनियापत्ती कटी

– नमक स्वादानुसार.

विधि

करेलों को खुरच कर गोलगोल काट कर थोड़ा सा नमक व हलदी पाउडर लगा कर 1/2 घंटा रखें. दाल को भी 1/2 घंटा भिगो दें. करेलों को 1/2 घंटे बाद साफ पानी से धो कर तौलिए पर थपथपा लें. गरम तेल में डीप फ्राई कर लें. एक प्रैशर पैन में 1 बड़ा चम्मच तेल गरम कर सभी खड़े मसालों का तड़का लगा कर दाल छौंक दें. हल्दी पाउडर व नमक डालें. पानी दाल के बराबर ही डालें. 1 सीटी आने तक पकाएं. जब भाप निकल जाए तो प्रैशर पैन खोलें. दाल कम गली हो तो फिर गला लें. सभी मसाले व टोमैटो प्यूरी भी डाल दें. जब दाल गल जाए तब उस में फ्राई किए करेले के टुकड़े मिला दें. 1 मिनट और आंच पर रखें. फिर गरमगरम करेला दाल सर्विंग बाउल में पलटें. धनियापत्ती से सजा कर सर्व करें.

Winter Special: क्या आपको भी आता है बार बार बुखार

कई बार बदलता मौसम और आपकी जीवनशैली में होने वाली कमी की वजह से आपको वायरल फीवर या बार-बार बुखार आता है. इसके कई कारण होते हैं. बदलते मौसम में तापमान के उतार-चढ़ाव से शरीर को कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर थोड़ सा फर्क तो पड़ता ही है.

बार-बार आने वाले इस बुखार से बचने के लिए आपको दवाआयों की दुकानों पर कई सारी अलग-अलग प्रकार की दवाईयां मिल जाऐंगी. लेकिन हम आपको ये बताना चाहते हैं कि अगर आप बुखार के लिए कुछ घरेलू उपाय भी अपनाएंगे तो इस बुखार से जल्दी राहत पा सकेंगे.

तो यहां हम आपको कुछ घरेलू उपाय बता रहे हैं, इन चीजों की मदद से आपको शीघ्र बुखार से निजात पाने में मदद मिल सकती है..

सूखे अदरक का मिश्रण

अदरक अनगिनत गुणों से भरपूर होता है. स्वास्थ्य संबंधी दोषों में अदरख बेहद लाभकारी होता है. अदरक में एन्टी- इन्फ्लैमटोरी और एन्टी-ऑक्सिडेंट सर्वाधिक मात्रा में होते हैं और ये दोनों ही तत्व आपको बुखार के लक्षणों से राहत दिलाते हैं.

आप सूखा अदरक, थोड़ा सा हल्दी और एक छोटा चम्मच काली मिर्च का पाउडर बना लें. अब इस पाउडर में थोड़ा-सा चीनी और एक कप पानी डालकर उबालें. इस मिश्रण को तब तक उबालें जब तक ये सूखकर आपके पास आधा बचे. अब इस मिश्रण को दिन में चार बार पीएं. ऐसा 3-4 दिनों तक लगातार करें. ये उपाय आपको बुखार से तुरंत राहत देगा.

मेथी

आपके वायरल फीवर के लिए रामबाण होता है मेथी. मेथी अधिकांश औषधिय गुणों से भरपूर होता है. जब भी आरको बुखार की समस्या होती है, तब एक कप पानी में, एक बड़ा चम्मच मेथी के दाने भिगोकर रख दें और रात भर उसे ऐसे ही रखे रहने दे. अब अगले दिन सुबह इसको छानकर थोड़े-थोड़े समय में पीते रहें.

इसके अलावा सुबह-सुबह मेथी के दाने में नींबू का रस और शहद मिलाकर, इसका सेवन करने से बुखार कुछ हद तक ठीक हो जाता है.

धनिया चाय

धनिया, फाइटोनूट्रीअन्ट और विटामिन जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होता है. धनिया वाली चाय अपने आप बार-बार आने वाले बुखार से प्राकृतिक तरीके से लड़ने में मदद करता है. इसको रोजाना खाया जाए तो इससे प्रतिरक्षी या प्रतिरोधी तंत्र भी ठीक रहता है.

इसका इस्तेमाल करने के लिए, एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच धनिए के दाने डालकर थोड़ा उबाल लें अब उसके बाद इसे कप में छानकर, अपने स्वादानुसार थोड़ा दूध और चीनी डालकर पी लीने से आपको बुखार से राहत मिलेगी.

राइस स्टार्च

फीवर से बचने के लिए आप राइस स्टार्च का भी सेवन कर सकते हैं. ये चावल आपके शरीर से दूषित पदार्थों को शरीर से बाहर निकाल देता है, जिसके कारण प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जो आपको विभिन्न वायरसों से लड़ने की शक्ति देती है. पूरी तरह पौष्टिक पदार्थों से भरपूर राइस स्टार्च को रोज खाने से रोगों से बचने की शक्ति मिलती है.

तुलसी

बुखार पर तुरंत असरकारी तुलसी में स्वाद के साथ-साथ कई गुण भी होते हैं. जब भी आपको बुखार आए, अठारह से बीस ताजा तुलसी के पत्तों को लेकर लगभग एक लीटर पानी के साथ, एक चम्मच लौंग पावडर मिलाकर उबालें. इन तीनों को तब तक उबालें जब तक ये उबलकर आधा न हो जाये. अब इसके बाद इसे छानकर हल्का ठण्डा कर दिन में हर दो घंटे में पाते रहें. एक हफ्ते लगातार ऐसा करने से बुखार से बचा जा सकता है.

तुलसी में एन्टी बायोटीक और एन्टी बैक्टिरीअल गुण होते हैं जो कि वायरल फीवर या मौसम के बदलने पर आने वाले बुखार के लक्षणों से राहत दिलाता है.

निसंतान दंपती बच्चे को कैसे लें गोद, कानूनी प्रक्रिया भी समझें

शादी के बाद हर दंपती की चाहत संतानप्राप्ति की होती है. कुछ दंपती ऐसे होते हैं जिन की यह चाहत पूरी नहीं हो सकती. ऐसे में उन के पास एक विकल्प यह रहता है कि वे किसी बच्चे को गोद ले कर उसे अपने बच्चे के रूप में पालेंपोसें. किसी बच्चे को गोद लेने की एक कानूनी प्रक्रिया है. आइए, जानते हैं इस के विभिन्न पहलुओं को :

गोद लेने की प्रक्रिया के तहत कोई व्यक्ति किसी बच्चे को तभी गोद ले सकता है जबकि उस की अपनी जीवित संतान न हो, फिर भले ही वह संतान लड़का हो या लड़की. हां, किसी भी बच्चे को गोद लेने के लिए पतिपत्नी दोनों की सहमति आवश्यक है. यदि महिला या पुरुष अविवाहित, तलाकशुदा, विधवा है तो उस की अकेले की ही सहमति पर्याप्त है.

वैधानिक कार्यवाही

गोद लेने की प्रक्रिया आसान है. इस के लिए गोद लेने वाले और गोद देने वाले की सहमति ही पर्याप्त है. हां, यदि बच्चा किसी अनाथाश्रम से गोद लेना हो तो कुछ वैधानिक कार्यवाही अवश्य करनी पड़ती है. एक बार यदि आप ने किसी बच्चे को गोद ले लिया तो वैधानिक रूप से आप ही उस के मातापिता माने जाएंगे और पिता के रूप में गोद लेने वाले व्यक्ति का ही नाम मान्य होगा. लेकिन हां, उसे अपने मूल मातापिता और गोद लेने वाले मातापिता दोनों की संपत्ति में अधिकार मिलता है.

किसी भी निसंतान दंपती को बच्चा गोद ले का फैसला जल्दबाजी में नहीं, बल्कि धैर्यपूर्वक सोचसमझ कर लेना चाहिए. किसी भी बच्चे को गोद लेने के फैसले से पूर्व मनोवैज्ञानिक रूप से दंपती को तैयार होना चाहिए, न कि किसी के दबाव में आ कर यह निर्णय लेना चाहिए.

बच्चा गोद लेने से पूर्व दंपती को इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए कि उन्हें लड़का चाहिए या लड़की? जिस पर दोनों सहमत हों, उसे ही गोद लें.

इस बात पर भी विचार कर लेना जरूरी है कि बच्चा किसी निकट के रिश्तेदार से गोद लेना है या अनाथाश्रम से. यदि आप जाति, धर्म, वंश आदि में विश्वास रखते हैं तो बेहतर होगा कि उसी हिसाब से बच्चे को चुनें. यदि आप अनाथाश्रम से बच्चा गोद लेने का निर्णय लेते हैं तो इस के पीछे लावारिस बच्चे के लिए दयाभाव नहीं होना चाहिए और न ही यह सोचें कि आप किसी अनाथ बच्चे का उद्धार कर रहे हैं.

केंद्र सरकार देश में बच्चों को गोद लेने को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उस की प्रक्रिया को ज्यादा आसान बनाएगी, ऐसे संकेत हैं. इस के लिए इंतजार अवधि को एक साल से घटा कर कुछ माह करने तथा अनाथालयों के पंजीकरण को अनिवार्य किए जाने जैसे बड़े सुधार किए जाएंगे.

गोद लेना होगा आसान

भारत में करीब 50 हजार बच्चे अनाथ हैं. हर साल महज 800 से एक हजार बच्चे ही गोद लिए जाते हैं. इसे बढ़ावा देने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय बड़े सुधार करने की योजना बना रहा है. महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के अनुसार, ‘सभी अनाथालयों के पंजीकरण को अनिवार्य किया जाएगा और गोद लेने की प्रक्रिया सरल बनाई जाएगी.’

सुधारों का मकसद गोद लेने की प्रक्रिया की बाधाओं और भावी अभिभावकों की शंकाओं को दूर करना है. नए दिशार्निदेशों की रूपरेखा का प्रारूप तैयार किया जा रहा है. इस से गोद लेने के लिए इंतजार की अवधि महज कुछ महीने हो जाएगी. फिलहाल इस में एक साल तक का वक्त लगता है. मंत्रालय इसे किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) विधेयक में विशेषतौर पर पेश करने की दिशा में काम कर रहा है.

इस विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी  मिलने का इंतजार है. सुधार के तहत फोस्टर केयर (पालनपोषण) व्यवस्था की एक नई शुरुआत करने का विचार है. इस के तहत 6 या 7 साल की उम्र से ज्यादा के बच्चे को लोग बिना गोद लिए अपने घर ले जा सकेंगे. मंत्रालय का कहना है, ‘‘लोग गोद लेना भले नहीं चाहते हों, लेकिन ऐसे लोग हैं जो चाहते हैं कि घर में बच्चे हों और उन्हें स्कूल भेजा जाए. सरकार उन बच्चों का खर्च वहन करेगी.’’

देश में बेटों से ज्यादा बेटियां गोद ली जा रही हैं. सैंट्रल एडौप्शन रिसोर्स अथौरिटी यानी कारा की ताजा रिपोर्ट में यह बात सामने आई है. कारा के मुताबिक, 2014-15 में 2,300 लड़कियां गोद ली गईं. जबकि लड़कों का आंकड़ा 1,688 रहा. यानी लोगों ने बेटों के मुकाबले करीब 36 प्रतिशत ज्यादा बेटियों को चुना. और यह तब है जबकि बेटियों को गोद लेने के कानून ज्यादा सख्त हैं. मसलन, सिंगल फादर है तो बेटी नहीं मिलेगी.

गोद लेने वाले ज्यादातर लोग कहते हैं कि उम्रदराज होने पर बेटियों के साथ रहना ज्यादा सुरक्षित है. बेटे छोड़ देते हैं, पर बेटियां हमेशा साथ देती हैं.

अभिभावक बनी मां

देश में अब मां कानूनीरूप से बच्चे की अभिभावक बनने की अधिकारी हो गई है. महिलाएं अब बच्चे को गोद भी ले सकेंगी. अब तक सिर्फ पुरुषों को ही गोद लेने व संतान का अभिभावक होने का हक था. संसद ने निजी कानून (संशोधन) बिल 2010 पारित किया था. इस के तहत गार्जियंस ऐंड वार्ड्स एक्ट 1890 तथा हिंदू गोद प्रथा तथा मेंटिनैंस कानून 1956 में संशोधन किया गया है. राष्ट्रपति ने निजी कानून (संशोधन) बिल 2010 को मंजूरी दे दी. यह गजट में प्रकाशित हो चुका है.

हिंदू गोद प्रथा तथा मेंटिनैंस कानून 1956 में संशोधन किया गया. यह कानून हिंदू, जैन, बौद्ध व सिख पर प्रभावी होता है. संशोधन का मकसद विवाहित महिलाओं के लिए गोद लेने की राह से बाधाएं हटाना है.

अब तक अविवाहित, तलाकशुदा तथा विधवा महिलाओं को बच्चे को गोद लेने का हक था लेकिन जो महिलाएं अपने पति से अलग रहते हुए तलाक के लिए कानूनी लड़ाई में उलझती थीं, वे किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकती थीं. नए संशोधन के बाद पति से अलग रह रही विवाहित महिला को भी अपने पति की रजामंदी से बच्चे को गोद लेने का हक होगा. यह इजाजत तलाक की प्रक्रिया में भी मांगी जा सकती है. यदि पति अपना धर्म बदल लेता है या विक्षिप्त घोषित कर दिया जाए, तो उस की इजाजत जरूरी नहीं होगी.

भारत में हिंदू दत्तक व भरणपोषण अधिनियम लागू किया गया है. यह हिंदुओं के अलावा जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबियों पर लागू होता है. मुसलिमों में अपनी पुरानी परंपरा के अनुसार गोद लिया जा सकता है जबकि ईसाई व पारसी समुदायों में इस के लिए कोई धार्मिक कानून नहीं है, पर वे भी बच्चे गोद ले सकते हैं.

कौन गोद ले किस को

यदि कोई पुरुष किसी लड़की को गोद ले चाहता है तो उस का उस लड़की से उम्र में 21 साल बड़ा होना आवश्यक है. इसी प्रकार यदि कोई महिला किसी लड़के को गोद लेना चाहती है तो उस का उस लड़के से 21 वर्ष बड़ा होना जरूरी है.

आप उसी बच्चे को गोद ले सकते हैं जो पहले से किसी के यहां गोद न गया हो अथवा जिस का अभी तक विवाह न हुआ हो. आमतौर पर 15 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चे को गोद नहीं लिया जा सकता. हां, यदि उस समाज में ऐसी प्रथा हो तो बात अलग है.

यदि आप अनाथाश्रम के बजाय किसी अन्य माध्यम या रिश्तेदारी से बच्चा गोद लेना चाहते हैं तो उस के मूल पिता की अनुमति आवश्यक है. हां, यदि पिता जीवित न हो, पागल हो या विधर्मी हो तो अकेली मां की अनुमति चल सकती है. यदि मांबाप दोनों मर गए हों या बच्चे को लावारिस हालत में छोड़ गए हों तो अदालती कार्यवाही के माध्यम से बच्चा गोद ले सकते हैं.

तालमेल: आखिर अभिनव में क्या थी कमी

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पति के अफेयर को कैसे सहन करुं, कोई तरीका बताएं?

सवाल-

मैं 25 वर्षीय विवाहिता हूं. विवाह को 5 साल हुए हैं. एक 3 वर्ष की बेटी है. कुछ महीनों से मेरे पति घरपरिवार से काफी उदासीन रहने लगे थे. मुझे लगा कि शायद औफिस में काम का अधिक बोझ होगा. फिर जब वे अकसर घर देर से लौटने लगे और बेवजह मुझ से लड़नेझगड़ने लगे तब मुझे शक हुआ. बारबार कुरेदने पर एक दिन सचाई उन की जबान पर आ ही गई. उन का अपनी एक सहकर्मी जो कुंआरी है, से चक्कर चल रहा है. जब से इस राज का पता चला है हमारा रोज झगड़ा होने लगा है. मन करता है कि आत्महत्या कर लूं पर बेटी की वजह से ऐसा नहीं कर सकती. क्या मेरी समस्या का कोई समाधान है?

जवाब-

आप की शादी को अभी ज्यादा समय नहीं बीता है, बावजूद इस के आप के पति आप से विमुख हो किसी और युवती के चक्कर में पड़ गए हैं. लगता है बेटी हो जाने के बाद आप उस के पालनपोषण में इतनी व्यस्त हो गईं कि पति की ओर से बिलकुल उदासीन होती गईं. यह सही है कि छोटे बच्चे की परवरिश भी काफी बड़ी जिम्मेदारी होती है पर इस के चलते पति की अनदेखी करना भी गलत है. जो हुआ सो हुआ. अब आप पति से लड़ाईझगड़ा करने के बजाय उन पर ध्यान दें. उन्हें भरपूर प्यार दें ताकि उन का उस युवती से मोहभंग हो जाए और वे आप के पास लौट आएं.

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शादी के बाद पतिपत्नियों को यह जानने में जरा भी देर नहीं लगती कि उन का साथी पहले जैसा नहीं रहा. आखिर इस मनमुटाव का क्या कारण है? दरअसल, अधिकांश केसों में पतिपत्नी के बीच झगड़े का मुख्य कारण अतृप्त सैक्स संबंध हैं. सैक्स संबंधों की वैवाहिक जीवन में पतिपत्नी दोनों को आवश्यकता होती है.

महिलाओं में शुरू से ही लज्जा, शर्म और संकोच होता है. वैवाहिक जीवन के बाद भी वे सैक्स संबंधों के बारे में खुल कर बात नहीं कर पातीं. यही कारण है कि स्त्री सैक्स का चरमसुख प्राप्त करने के बारे में स्वयं कुछ नहीं कहती. लेकिन सैक्स एक ऐसी आग है, जो भड़कने के बाद आसानी से शांत नहीं होती.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के साइड इफैक्ट्स

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

अम्मा बनते बाबूजी: मीनू और चिंटू के साथ क्या हुआ

छोटा सा ही सही, साम्राज्य है यह घर अम्मा का, हुकूमत चलती है यहां अम्मा की. मजाल है उन की इच्छा के बगैर कोई उन के क्षेत्र में प्रवेश कर जाता. हमें भी सख्त हिदायत रहती जो चीज जहां से लो, वहीं रखनी है ताकि अंधेरे में भी खोजो तो पल में मिल जाए. बाबूजी…वे कभी रसोई में घुसने का प्रयास भी करते तो झट अम्मा कह देतीं, ‘आप तो बस रहने ही दीजिए, मेरी रसोई मुझे ही संभालने दीजिए. आप तो बस अपना दफ्तर संभालिए.’

फिर जब कभी अम्मा किसी काम में व्यस्त होतीं और बाबूजी से कहतीं, ‘सुनिए जी, जरा गैस बंद कर देंगे?’ बाबूजी झट हंसते हुए कहते, ‘न भई, तुम्हारी राज्यसीमा में भला मैं कैसे प्रवेश कर सकता हूं.’

यह बात नहीं कि अम्मा को बाबूजी के रसोई में जाने से कोई परहेज हो, यह तो बहाना था बाबूजी को घर की झंझटों से दूर रखने का, चाहे बाजार से किराना लाना हो, दूध वाले या प्रैस वाले का हिसाब ही क्यों न हो. समझदार हैं अम्मा, वे जानती हैं कि दफ्तर में सौ झंझटें होती हैं, कम से कम घर में तो इंसान सुख से रहे. बाबूजी के नहाने के पानी से ले कर बाथरूम में उन के कपड़े रखने तक की जिम्मेदारी बड़े कौशल से निभातीं अम्मा. दफ्तर से आ कर बाबूजी का काम होता अखबार पढ़ना और टीवी देखना. बाबूजी के सदा बेफिक्र चेहरे के पीछे अम्मा ही नजर आतीं.

अम्मा का प्रबंधकौशल भी अनोखा था. सब की जरूरतों का ध्यान रखना, सुबह से ले कर शाम तक किसी नटनी की भांति एक लय से नाचतीं. न कभी थकतीं अम्मा और न ही उन के चेहरे पर कभी कोई झुंझलाहट ही होती. सदा होंठों पर मुसकान लिए हमारा उत्साह बढ़ातीं. मेरे और चिंटू के स्कूल से आने से पहले वे घर के सारे काम निबटा लेतीं, फिर हमारी तीमारदारी में लग जातीं. उसी तरह शाम को बाबूजी के दफ्तर से लौटने से पहले वे रसोई में सब्जी काट कर, आटा लगा कर गैस पर कुकर तैयार रखतीं ताकि बाबूजी के आने के  बाद उन के स्वागत के लिए वे तनावमुक्त रहें. रात के खाने का हमसब मिल कर आनंद लेते. पूरे घर को अपनी ममता और प्यार की नाजुक डोर से बांध कर रखा था अम्मा ने. उन के बगैर किसी का कोई अस्तित्व नहीं था.

हालांकि ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थीं वे, फिर भी रात को जब हम पढ़ने बैठते तो वे हमारे पास बैठतीं. उन की उपस्थिति ही हमारे लिए काफी होती. वे पास बैठेबैठे कभी उधड़े कपड़ों की सीवन करतीं तो कभी स्वेटर बुनतीं. काम में उन की लगन देख कर लगता मानो रिश्तों की उधड़न को सी रही हों.

ममता का प्रभाव था कि मैं और चिंटू सदैव स्कूल में अव्वल रहते. हमारे स्कूल यूनिफौर्म से ले कर स्कूलबैग और टिफिन में अम्मा का मातृत्व झलकता था. मेरे लंबे बालों को अम्मा बड़े जतन से तेल लगा कर, दो चोटी बना, ऊपर बांध देतीं ताकि किसी की नजर न लगे मेरे बालों को. बहुत पसंद हैं बाबूजी को लंबे बाल. उन की छोटीछोटी पसंद का खयाल रखतीं अम्मा.

पिं्रसिपल मैडम ने एक बार अम्मा को बुला कर कहा भी, ‘रियली आई एप्रीशिएट यू मिसेज सुलेखाजी. आप ने बच्चों को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं. आप गृहिणी हैं, आप की शिक्षा काम आई, इसीलिए तो कहते हैं कि परिवार में मां का पढ़ालिखा होना बहुत जरूरी है.’

अम्मा ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया. ‘मैडम, मैं ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं हूं, न ही मैं पढ़ा पाती हूं. मीनू और चिंटू के बस पढ़ते वक्त मैं हरदम उन के साथ रहती हूं.’ सुन कर पिं्रसिपल मैडम और भी प्रभावित हो गईं अम्मा की साफगोई से.

हरी दूब पर चलते से गुजर रहे थे दिन, सारे घर में मशीन की तरह फिरती अम्मा. एक दिन अचानक उस मशीन में खराबी आ गई. सारे घर का व्यापार ही थम गया. डाक्टर ने अम्मा को आराम करने की नसीहत दी. फिर भी अम्मा से जितना बन पड़ता, उठ कर समयसमय से कुछ कर लेतीं ताकि बाबूजी को और हमें कम परेशानी हो. बाबूजी के लिए तो यह परीक्षा की घड़ी थी. उन्हें तो यह भी नहीं पता था कि कुकर में दाल कितनी सीटी में पक जाती है, आटे में कितना नमक पड़ता है, भिंडी काटने से पहले धोई जाती है या बाद में.

न चाहते हुए भी अम्मा का साम्राज्य अस्तव्यस्त होता जा रहा था. कमजोरी दिनबदिन बढ़ती जा रही थी. अब तो डाक्टर ने उन्हें बिस्तर से न उठने की भी सख्त हिदायत दे दी. बाबूजी अम्मा का पूरा ध्यान रखते. मगर बहुत बदल गए थे वे. पहले हमारी छोटी सी गलतियों पर डांटने वाले बाबूजी अब बड़ी गलतियों पर भी चुप रहते. वे जान गए थे कि उन की डांट से बचाने वाला आंचल अब तारतार हो रहा है. दफ्तर के बाद उन का सारा समय अम्मा की तीमारदारी में बीत जाता.

बाबूजी से अपनी तीमारदारी कराते उन्हें खुशी नहीं होती थी. वे किसी मासूम बच्चे की तरह उदास हो कहतीं, ‘सुनिए जी, मैं ठीक तो हो जाऊंगी न. कितना परेशान कर दिया है मेरी बीमारी ने तुम्हें. और मेरे मासूम बच्चे, देखो, कितना उदास रहने लगे हैं.’

बाबूजी अम्मा का हाथ अपने हाथ में ले कर उन्हें हिम्मत बंधाते. मगर खुद भीतर ही भीतर कितना टूट रहे थे, वे ही जानते थे. उन्हें पता था कि अब अम्मा कभी अच्छी नहीं होने वाली. उन्हें ब्लडकैंसर हो गया था. न अम्मा इस बात को जानती थीं, न मैं, न ही चिंटू. इतना बड़ा पहाड़ बाबूजी अपने सीने पर अकेले ही झेलते रहे. अम्मा के सामने खुद को मजबूत करते. मगर अकेले में कई बार आंसू बहाते देखा था मैं ने उन्हें. अब रसोई बाबूजी के हाथों में आ गई थी. कच्चापक्का जैसे भी बनता, पकाते. कभी दालचावल तो कभी खाली खिचड़ी से हम पेट भर लेते. सब्जीरोटी कम ही बनती. अब चिंटू भी खाने को ले कर कुरकुरी भिंडी की मांग नहीं करता, न ही दूध के लिए अम्मा को सारे घर में दौड़ाता. अम्मा के हाथ से खाने की जिद भी नहीं करता, जानता था, अम्मा बहुत कमजोर हो गई हैं. जो बनता, हमसब चुपचाप खा लेते. घर में हमेशा गहरी उदासी छाई रहती. यह सब देख अम्मा कहतीं कुछ नहीं, बस, उन की आंखों की कोर से आंसू ढुलक जाते. शायद वे समझ गई थीं कि वे कभी ठीक नहीं हो पाएंगी.

बाबूजी अम्मा का पूरा खयाल रखते. उन के  नहाने, खाने, बाल बनाने तक, समयसमय पर जूस ला कर अम्मा के हाथ में देते. अपने और हमारे नहाने की बालटी से ले कर तौलिया और कपड़े तक बाबूजी ही रखते बाथरूम में. सुबह दूध, टिफिन दे कर हमें स्कूल की बस तक पहुंचाना… हां, अब मेरे लंबे बाल कटवा दिए गए क्योंकि बाबूजी के काम जो बहुत बढ़ गए थे. बहुत रोई थीं अम्मा उस रोज. उन की हालत दिनबदिन  खराब होती जा रही थी. अब तो उन्हें आंखों से भी कम दिखाई देने लगा था. बाबूजी ने उन्हें खुश रखने की हर संभव कोशिश की. मगर एक दिन अम्मा हमेशाहमेशा के लिए हम सब को छोड़ कर चली गईं. आधे रह गए थे बाबूजी अपनी अर्द्धांगिनी के चले जाने पर. एकांत में बैठे, छत निहारते रहते, मानो अम्मा से शिकायत कर रहे हों मझधार में छोड़ कर क्यों चली गईं?

कितना बदल जाता है वक्त और अपने साथ बदल देता है इंसान को. जो बाबूजी बैडटी के बगैर बिस्तर से नीचे कदम नहीं रखते थे, अब उठते ही हमारी देखभाल में व्यस्त हो जाते. हमें स्कूल भेज कर ही खुद चाय बनाते और पीते.

वक्त अपने तरीके से कट रहा था. इस महीने हमारे स्कूल का परीक्षा परिणाम आ गया. कल पेरैंट्स मीटिंग थी. बाबूजी नहीं जानते क्या होता है पेरैंट्स मीटिंग में. कई बार अम्मा ने कहा संग चलने को, मगर बाबूजी ने यह कह कर टाल दिया कि बच्चों की ट्यूटर तुम हो, जवाब तो तुम्हें ही देना है. फिर शरारत करते हुए कहते, ‘भई, मैं ने तो अपने हिस्से का स्कूल कर लिया, तुम रह गईं, सो तुम्हीं जाओ. मुझे बख्शो.’ वही हुआ जिस की संभावना थी, हमेशा अव्वल आने वाले हम पिछड़ गए थे. इस बार मैं 2 विषयों और चिंटू 4 विषयों में फेल हो गया. यह बात नहीं कि हम ने पढ़ने की कोशिश नहीं की, पुस्तकें खोल कर बैठते, पास में गुमसुम बाबूजी भी होते मगर पास अम्मा जो नहीं होतीं.

जैसे ही बाबूजी हमें ले कर क्लास में दाखिल हुए, दूसरे पेरैंट्स की कानाफूसी न चाहते हुए भी कानों में पड़ गई. अब तक मां थी, अब मां नहीं है न. कितना फर्क पड़ता है मां से. ये शब्द बाबूजी के भीतर किसी तेजाब सरीखे उतरते चले गए. अम्मा की कमी का एहसास उन से ज्यादा और किसे होगा. मगर लोगों के शब्द मानो उन्हें मुंह चिढ़ा रहे हों कि वे अम्मा की जगह नहीं ले सकते या फिर वे हमारी परवरिश में सफल नहीं हो पाए.

आज उन्हीं पिं्रसिपल ने बाबूजी को बुला कर कहा, ‘‘मिस्टर विकास, मैं आप की स्थिति समझ सकती हूं. मैं यह भी जानती हूं आप को इस परिस्थिति से उबरने में अभी वक्त लगेगा. किंतु बच्चों की भलाई के लिए यह कहने को विवश हूं कि अब आप को उन की ओर ज्यादा गंभीरता से ध्यान देना होगा. इस बार का परिणाम तो हम समझ सकते हैं लेकिन मैं समझती हूं आप भी नहीं चाहेंगे कि सुलेखाजी ने जिस मेहनत से बच्चों को तैयार किया है, वह जाया हो.

‘‘इस में कोई शक नहीं मीनू और चिंटू बहुत इंटैलिजैंट हैं. किंतु पिछले दिनों दोनों के सलवट भरी यूनिफौर्म और बिखरे बालों को ले कर बच्चे क्लास में उन का मजाक बना रहे थे. कल तो चिंटू की पैंट भी नीचे से उधड़ी हुई थी. मिस्टर विकास, आप समझ रहे हैं न. इस से बच्चे हतोत्साहित हो जाएंगे. एक बार उन का आत्मविश्वास कमजोर हो गया तो बड़ी मुश्किल होगी उन्हें संभालने में. सो, प्लीज, आप उन का खयाल रखिए.’’ बाबूजी चुपचाप सुनते रहे. कुछ नहीं बोले. वैसे भी, आजकल वे बोलते कम ही हैं. छोटीछोटी बातों में शरारत कर अम्मा से मजे लेने की आदत तो उन की अम्मा के साथ ही चली गई. उन्हें रेशारेशा टूटते, खुद को बदलते मैं ने देखा है

मानो उन्होंने अम्मा बनने की मुहिम चला रखी हो. भीतर ही भीतर ठान लिया हो कि वे अम्मा की मेहनत को जाया नहीं होने देंगे. उस दिन रविवार था. उन्होंने शाम को मुझे और चिंटू को तैयार किया. दूध और ब्रैड हाथ में थमाते हुए बोले, ‘‘मीनू बेटा, चिंटू को सामने पार्क में घुमा ला. तब तक मैं रसोई का काम निबटा लूं. फिर हम पढ़ाई करेंगे.’’

मैं कुछ ही देर में पार्क से लौट आई, मन नहीं लग रहा था. लौटी तो देखा रसोई में गैस पर रखे कुकर में सीटी आ रही थी, पास ही भिंडी तल कर रखी हुई थी. थाली में आटा लगा हुआ था, ठीक जैसे अम्मा रखती थीं. मगर बाबूजी, बाबूजी तो रसोई में नहीं हैं? कमरे में जा कर देखा तो सुईधागा लिए बाबूजी चिंटू की उधड़ी पैंट सिलने की कोशिश कर रहे थे. पैंट नहीं…उधड़े रिश्ते सी रहे थे… जैसे अम्मा सीया करती थीं. आज ऐसा लग रहा था अम्मा पूरी की पूरी बाबूजी में उतर आई हों.

बेबी की ऐसे करें कोमल देखभाल

शिशु का जन्म घरआंगन में खुशियों के साथसाथ जिम्मेदारी भी ले कर आता है. जिम्मेदारी नवजात की सही परवरिश और उस की कोमल देखभाल की. ऐसे में नई मांओं के सामने यह जिम्मेदारी किसी चुनौती से कम नहीं होती, क्योंकि शिशु की देखभाल से संबंधित कई अहम बातों की जानकारी उन्हें नहीं होती.

स्तनपान के जरीए नवजात के शरीर  का आंतरिक विकास तो सही ढंग से होता  रहता है, मगर उस की त्वचा को सेहतमंद व सुरक्षित रखने के लिए ज्यादा देखभाल की  जरूरत पड़ती है.

पेश हैं, कुछ सुझाव जो शिशु की त्वचा की कोमल देखभाल में आप के बेहद काम आएंगे:

बेबी बाथ

शिशु को नहलाते समय व नहलाने के बाद यहां बताई गई बातों का ध्यान रखें:

  1. शिशु के नहाने का पानी या तो साधारण तापमान पर या फिर कुनकुना होना चाहिए. उस के शरीर को हाथों की सहायता से धीरेधीरे पानी डालते हुए साफ करें.
  2. शिशु को नहलाने के लिए सौम्य बेबी सोप या लोशन का ही इस्तेमाल करें. किसी अन्य साबुन या लोशन का इस्तेमाल उस की नाजुक त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है.
  3. शिशु के बालों को साफसुथरा रखने के लिए बेबी शैंपू का ही इस्तेमाल करें. शैंपू को हथेलियों पर हलका सा रगड़ने के बाद शिशु के बालों में लगाएं. पानी से साफ करने के लिए शिशु को अपनी गोद में बैठा कर हथेलियों में पानी ले कर धीरेधीरे सिर के आगे से पीछे की तरफ शैंपू साफ करें. ऐसा करने से शैंपू शिशु की आंखों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा.
  4. नहलाने के बाद नरम तौलिए से थपथपा कर शिशु के शरीर को सुखाएं

बेबी मसाज

बच्चे के संपूर्ण विकास में उस की मालिश का सब से ज्यादा महत्त्व है. मालिश बच्चे की त्वचा के साथसाथ उस की हड्डियों को भी मजबूती व पोषण देती है. शिशु की मालिश के दौरान इन बातों का ध्यान रखें:

  1. शिशु की मालिश के लिए पोषणयुक्त, कैमिकलरहित बेबी मसाज औयल का ही इस्तेमाल करें.
  2. मालिश शुरू करने से पहले शिशु को आरामदायक स्थिति में लिटा लें. फिर हथेलियों पर तेल ले कर सब से पहले शिशु के पैरों की मालिश करें. इस के बाद हाथों व अन्य हिस्सों जैसे छाती व पीठ की मालिश करें.
  3. मालिश करते समय शिशु के शरीर पर दबाव न डालें.
  4. शिशु की मालिश हमेशा स्तनपान कराने से पहले ही करें.
  5. शिशु की हथेलियों और तलवों पर भी मसाज औयल जरूर लगाएं. इस के साथसाथ उस के हाथों और पैरों की अंगुलियों की भी हलके हाथों से मालिश करें.

बेबी स्किन केयर ऐंड हाइजीन

  1. शिशु की त्वचा की कोमलता बनाए रखने में इन बातों की भी बड़ी भूमिका है:
  2. शिशु के नाजुक अंगों की साफसफाई के लिए तौलिया इस्तेमाल करने के बजाय सौफ्ट बेबी वाइप्स का प्रयोग करें. तौलिया या अन्य किसी कपड़े का इस्तेमाल करने से शिशु की त्वचा पर रैशेज पड़ने का खतरा रहता है.
  3. नहलाने के बाद शिशु को कपड़े पहनाने से पहले उस के शरीर पर सौम्य बेबी पाउडर लगाएं. बेबी पाउडर की सुगंध बच्चे को ताजगी का एहसास देती है.
  4. बच्चे की नैपी को समयसमय पर चैक करती रहें ताकि गीलेपन की वजह से बच्चे के नाजुक अंगों को नुकसान न पहुंचे.
  5. बच्चे को नहलाने के बाद बेबी इयरबड्स की सहायता से उस के कानों में जमा शैंपू का पानी साफ करना न भूलें.

इन बातों का ध्यान रखने के साथसाथ शिशु के सही शारीरिक विकास के लिए हमेशा सौम्य बेबी प्रोडक्ट्स का ही चुनाव करें. शिशु की कोमल देखभाल का यह दौर आप के जीवन का सब से यादगार दौर होता है. इसलिए उस की कोमलता का ध्यान रखें.

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