अपने एक्टिंग करियर को लेकर क्या कहती हैं ‘जामतारा 2’ की ‘गुड़िया’, पढ़ें इंटरव्यू

मॉडल और अभिनेत्री मोनिका पंवार, मुख्य रूप से हिंदी वेब सीरीज और फिल्म इंडस्ट्री में काम करती हैं. वह नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज़ जामतारा – सबका नंबर आएगा में ‘गुड़िया’ की भूमिका निभाने के लिए जानी जाती हैं. उनकी जामतारा 2 भी ओटीटी पर रिलीज हो चुकी है, जो साइबर क्राइम पर आधारित थी, जिसे करने में मोनिका कोबहुत सारे वर्कशॉप में भाग लेने पड़े. उन्हें इस तरह की बहुत काम्प्लेक्स और लेयर्ड करैक्टर करना पसंद है.उन्हें बचपन से अभिनय की इच्छा थी, लेकिन नए चेहरे को कितना काम मिलेगा, इस पर उन्हें थोड़ी चिंता थी, इसलिए उन्होंने थिएटर से अभिनय शुरू किया और धीरे-धीरे ओटीटी पर अपनी साख फैलाई. हंसमुख और विनम्र मोनिका से उनके कैरियर को लेकर बात हुई, पेश है कुछ खास अंश.

मिली प्रेरणा

मोनिका पवार कहती है कि मैं बहुत ही हम्बल बैकग्राउंड से हूं, जहाँ एक्टिंग बहुत दूर की बात होती है. उनके लिए पर्दे, टीवी या हाल में फिल्म देखना तक काफी रहा. पढाई के अलावा एक्स्ट्रा करीकुलर में भाग लेना भी जरुरी नहीं था. मुझे पढाई में रूचि नहीं थी, लेकिन सभी मेरी हाइट देखकर कहते थे कि मैं मॉडल या एक्ट्रेस बन सकती हूं. चंडीगढ़ में पढ़ते हुए मुझे थिएटर के बारें में थोड़ा पता चला. जब एनएसडी के बारें में जानकारी मिली, तो पता चला, इरफ़ान खान, ओमपुरी नसीरुद्दीन शाह आदि कई-कई बड़ी हस्तियों ने वही से पढ़कर एक्टिंग के क्षेत्र में नाम कमाया है. मुझे भी उस क्षेत्र में जाने की इच्छा होने लगी. मैं हिंदी फिल्में देखती थी, लेकिन तब एक्टिंग के बारें में नहीं सोची थी. अंग्रेजी फिल्म ‘गॉडफादर’ देखने पर मैंने महसूस किया कि इस फिल्म में कुछ अलग हो रहा है, जो मुझे बहुत अधिक समझ में नहीं आ रही थी. इसके बाद मैंने कई विदेशी कई फिल्में देख ली. इससे मुझे मुंबई आकर ऐसी ही गहरी अभिनय वाली फिल्म करने की इच्छा पैदा हुई. तब मैंने सही तरीके से अभिनय सीखकर परिपक्वता के साथ मुंबई आई थी.

पहला ब्रेक

मैं उत्तराखंड की टिहरी गढ़वाल से हूं,पंजाब युनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद मुझे नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में चुनी गयी और तीन साल एक्टिंग की कोर्स करने के बाद 2018 में मुंबई आ गई और एक अलग तरह की भूमिका हमेशा निभाने की इच्छा रखती थी. वर्ष 2018 में मैं आई और 7 महीने तक लगातार ऑडिशन देने के बाद भी मुझे जामतारा के लिए ऑफर मिला और गुडिया की भूमिका के लिए चुन ली गई.

एक्टिंग प्रतिभा को जाने

मोनिका कहती है कि केवल एक सुंदर चेहरा और महंगे कपडे पहनकर लेकर मुंबई आना ठीक नहीं, बल्कि कुछ सीखकर मुंबई एक्टिंग के लिए आना पड़ता है, क्योंकि यहाँ हुनर की कद्र भले ही देर से हो, लेकिन होती अवश्य है. जिनके पास अभिनय की प्रतिभा नहीं है, उन्हें मुंबई कभी नहीं आनी चाहिए, क्योंकि उनकी जिंदगी ख़राब हो जाती है, इसलिए पूरी ट्रेनिंग के बाद ही अभिनय के बारें में सोचें.

संघर्ष रहता है

मोनिका ने अभिनय में आने के लिए बहुत संघर्ष किये, मसलन 30 सेकंड की एक क्लिप या बहुत छोटी रोल जो भी मिला करती गयी. वह कहती है कि मुंबई आने पर आपको पता होता है कि क्या करना है, लेकिन सही दिशा पता नहीं होता. वहां पर बड़े और नामचीन प्रोडक्शन हाउस में जाना मुमकिन नहीं होता, क्योंकि मैंने कई बार देखा है कि बड़ी रोल की बात कहकर बुलाया जाता है और एक छोटी सी भूमिका जो मुश्किल से 2 दिन की होती है, उसे थमा दिया जाता है. मैंने उसे भी एन्जॉय किया, क्योंकि यह मेरे जर्नी की एक पार्ट थी. छोटी होने पर भी मैंने उस बड़ी कहानी में भाग लिया है. हर क्षेत्र में ऐसे अनुभव कमोवेश नए लोगों के लिए रहते है. अभी जो मुझे अभिनय मिल रहे है उसमे मुझे एक्टिंग करने का बहुत मौका मिल रहा है और मैं बहुत खुश हूं.

सही नेटवर्किंग जरुरी

मोनिका आगे कहती है कि शुरू में एक्टिंग फुल टाइम जॉब नहीं होता है, इसलिए शुरू में मुझे जो भी मिला मैं करती गयी, ताकि मेरी नेटवर्किंग अच्छी हो. जब मैंने अपनी एक फ्रेंड के साथ गॉडफादर फिल्म देखी, तो मेरी सोच बदल गयी. इसके बाद मैंने एक्टिंग सीखी और मेरी एक्टिंग की जर्नी शुरू हुई. ओटीटी ने मेरे अभिनय की प्रतिभा को एक मंच दिया है. ओटीटी की वजह से नए कलाकारों को अपनी प्रतिभा को आगे लाने में बहुत मदद मिली है. इसे मैं एंटरटेनमेंट का गोल्डन ऐज कहना पसंद करुँगी. इसके अलावा मुझे जितना भी काम मिलता है उसे करते रहने से मुझे खुद को बड़े पर्दे पर देखने और उसे जीने का मौका मिलता है. जामतारा में अभिनय के बाद मैंने ये महसूस किया कि जो भी अभिनय मैंने उसमे किया है और अच्छा कर सकती थी. मैं हमेशा खुद की आलोचक रही हूं, लेकिन इस वेब सीरीज के बाद मुझे और अधिक सुधार और नए स्तर पर काम को ले जाने की इच्छा है. अभी मुझे नयी-नयी भूमिका मिल रही है, इसलिए अब मैं छोटी भूमिका नहीं करती. आगे मुझे ड्रामा और कॉमेडी फिल्में करने की इच्छा है,जिसकी मैं तलाश कर रही हूं. इसके अलावा हॉरर और क्राइम फिल्मे भी पसंद करती हूं, पर ड्रामा फिल्मों से खुद को रिलेट करना आसान होता है.

बेटी की धूमधाम से शादी करेगी Anupama, फिर बदलेंगे पाखी के तेवर!

Anupama Latest Update In Hindi: टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ की टीआरपी पहले नंबर पर बनी हुई है. वहीं मेकर्स शो में नए-नए ट्विस्ट लाते दिख रहे हैं. हालांकि इन ट्विस्ट में अनुपमा की जिंदगी में परेशानियां बढ़ती हुई नजर आने वाली है. दरअसल, बेटी को बहू बनाकर कपाड़िया हाउस में लाने वाली अनुपमा अब नई परेशानियों का सामना करने वाली है, जिसमें सबसे बड़ी मुसीबत बनेगा पाखी का तेवर. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

अनुज को ब्लैकमेल करेगी पाखी

हाल ही में सीरियल अनुपमा का अपकमिंग एपिसोड का प्रोमो सामने आया है, जिसमें बड़े घर की बहू बनने के बाद पाखी के तेवर बदलते दिखने वाले हैं. दरअसल, अपकमिंग एपिसोड के प्रीकैप में कपाड़िया और शाह फैमिली अधिक और पाखी की दोबारा शादी करवाने के लिए राजी हो जाएगी. वहीं अनुपमा कहेगी कि बापूजी चाहते हैं कि उनकी पोती की शादी शाह हाउस से होगी. लेकिन पाखी एक बार फिर अपने तेवर दिखाते हुए शादी के लिए एक ग्रैंड वेन्यू की डिमांड करेगी, जिसपर अनुपमा उसे ताना मारती है, “भागने से पहले यह नहीं सोचा था?”. मां का ये जवाब सुनकर पाखी, अनुज को ब्लैकमेल करने की कोशिश करेगी. लेकिन अनुपमा उसे रोक लेगी.

 

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बरखा सच सामने लाने की करेगी कोशिश

 

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अब तक आपने देखा कि अनुपमा (Anupama) बापूजी के कहने पर पाखी और अधिक को कपाड़िया हाउस में रहने की इजाजत देती है, जिससे बरखा गुस्से में नजर आती है. हालांकि अनुपमा दोनों को माफ नहीं करती. वहीं पाखी, अनुपमा को इमोशनल ब्लैकमेल करते हुए उसे गले लगाने की बात कहती है, जिससे अनुपमा पिघल जाती है. दूसरी तरफ, अधिक के प्लान को एक्सपोज करने के लिए बरखा उससे सच उगलवाने की कोशिश करती है और रिकॉर्डिंग करने का प्लान बनाती है. लेकिन अधिक उसकी चालाकी समझ जाता है और उसे कुछ ना करने की सलाह देता है. साथ ही पाखी से सच में प्यार करने की बात कहता है.

मिशन भाग-3: क्यों मंजिशी से नाखुश थे सब

बैठक के बाद, कांफ्रेंस कमरे से बाहर आ कर, मंजिशी और उन्नाकीर्ती के साथ चारों की टीम, अनिच्छा से, अपना यान देखने के लिए बढ़ चली.रास्ते में, दोरंजे ने उन्नाकीर्ती से पूछा, “अंतरिक्ष यान पर कब से काम चल रहा है?”

इस अंतरिक्ष यान को एलएलवी राकेट के अंदर फिट किया जाना था. इस अंतरिक्ष यान की संरचना चंद्रयान की संरचना से काफी भिन्न थी, क्योंकि इस में मानव जाने वाले थे, जबकि चंद्रयान मिशन इनसानरहित मिशन थे.

उन्नाकीर्ती ने जवाब दिया, “पिछले 2 सालों से. इस में सौ वैज्ञानिकों की टीम जुटी हुई है.”सतजीत बोला, “ क्या इस यान का कोई नाम रखा गया है?”उन्नाकीर्ती बोले, “भारतीय लूनर मिशन–1. लेकिन उस पर काम कर रही टीम उसे भालूमि ही कहती है.”

पद्मनाभन ने कहा, “सौ लोगों की टीम एलएलवी राकेट पर, और सौ लोगों की टीम भालूमि यान पर काम रही थी और हम लोगों को पता तक नहीं चला.”इस पर उन्नाकीर्ती बोले, “उन को सख्त आदेश थे कि अपने परिवार वालों से भी इन के बारे में चर्चा न करें. न तो एलएलवी राकेट के बारे में, न ही भालूमि यान के बारे में.”

राजेश ने मंजिशी की ओर देख कर कहा, “लेकिन, तुम को तो इन दोनों की पूरी जानकारी दिखती है.”उन्नाकीर्ती बोले, “इसीलिए तो मंजिशी इस मिशन की लीडर है. उस को एलएलवी और भालूमि, दोनों का प्रशिक्षण है.”कुछ देर में सभी ‘स्पेसक्राफ्ट इंटीग्रेशन यूनिट’ पहुंचे, जहां पर भालूमि के हिस्सों को जोड़ कर यान तैयार था और उस के अंतिम परीक्षण किए जा रहे थे.

चारों ने हैरानी से भालूमि को देखा. यान इतना बड़ा तो नहीं था, लेकिन उस में तीन कोए थे, जिस से जाहिर होता था कि यान 3 अंतरिक्ष यात्रियों को ध्यान में रख कर बनाया गया है. हर एक कोया अपनेआप में परिपूर्ण था. दिखता भी वह रेशम के कीड़े के कोए की तरह ही. फर्क सिर्फ इतना था कि अंतरिक्ष कोया खुला हुआ था, ताकि उस में अंतरिक्ष यात्री प्रवेश कर सके.

राजेश बोला, “सिर्फ 3…?”उन्नाकीर्ती ने कहा, “बीच का कोया मंजिशी का है. यान को नियंत्रित करने के प्रमुख उपकरण उस के हाथों में रहेंगे, बाकी के सबसिस्टम्स 2 अन्य अंतरिक्ष यात्रियों के हाथ में रहेंगे.”

निश्चित दिन, काउंटडाउन के पश्चात, एलएलवी राकेट, भालूमि में लेटे हुए 3 अंतरिक्ष यात्रियों को ले कर आकाश में उड़ चला.राजेश और सतजीत को मंजिशी के अगलबगल वाले कोए दिए गए. पद्मनाभन और दोरंजे को बैकअप मान कर धरती पर ही रखा गया.

उन्नाकीर्ती के साथ पद्मनाभन और दोरंजे ने तीनों अंतरिक्ष यात्रियों के साथ वार्तालाप करने की जिम्मेदारी उठा ली. दोनों को कोई अफसोस नहीं हुआ, क्योंकि वैसे भी शून्यकोर-1 में राजेश और सतजीत व शून्यकोर-2 में पद्मनाभन और दोरंजे को भेजना तय किया गया था.

एलएलवी के पहले चरण ने राकेट को धरती से लगभग 70 किलोमीटर ऊपर उठा लिया. पहले चरण में सब से शक्तिशाली इंजन थे, क्योंकि इस में ईंधन से पूरी तरह भरे हुए राकेट को जमीन से उठाने का चुनौतीपूर्ण काम था. इस के बाद यह स्टेज राकेट से अलग हो कर नीचे महासागर में गिर गई. दूसरे चरण ने राकेट को वहां से लगभग धरती की कक्षा में पहुंचा दिया. तीसरे चरण ने भालूमि अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया और इसे चंद्रमा की ओर धकेल दिया. पहले 2 चरण, राकेट से अलग होने के बाद समुद्र में गिरे. तीसरा चरण अंतरिक्ष में रह गया. भालूमि अंतरिक्ष यान को ले जा रहे एलएलवी राकेट के 3 चरण थे. प्रत्येक चरण के अपनेअपने इंजन तब तक जले, जब तक उन का ईंधन समाप्त न हो गया और ईंधन समाप्त होने के बाद वे राकेट से अलग हो गए. एक चरण के अलग होने के पश्चात अगले चरण का इंजन योजनानुसार प्रज्वलित हुआ, और राकेट की उड़ान अंतरिक्ष में जारी रही.

3 दिन और कुछ घंटों के पश्चात, बिना किसी घटना के, भालूमि अंतरिक्ष यान अपनी तीनों सवारियों को ले कर चंद्रमा तक सुरक्षित पहुंच गया. एलएलवी के तीसरे चरण द्वारा पृथ्वी की कक्षा के बाहर भेजे जाने के पश्चात, अंतरिक्ष यात्रियों ने भालूमि को तीसरे चरण से अलग कर दिया, और 3 दिन और चंद घंटों में पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की यात्रा को तय कर के चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश किया. चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश कर, भालूमि चंद्रमा के चारों ओर चक्कर खाने लगा. भालूमि के पीछे हिस्से में ‘पराक्रम’ यान था. ‘पराक्रम’, किसी ग्रह या चंद्रमा की सतह पर उतरने के लिए बनाया गया एक अंतरिक्ष यान था. भालूमि में स्वयं से यह काबिलीयत नहीं थी कि वह चंद्रमा की सतह पर उतर सके. चंद्रयान-2 में भी चंद्रमा की सतह पर उतरने का काम ‘विक्रम’ लैंडर ने किया था. ‘पराक्रम’ लैंडर की डिजाइन, ‘विक्रम’ लैंडर से मेल खाती थी. लेकिन चंद्रयान-2 के ‘विक्रम’ लैंडर में अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की सतह तक ले जाने की काबिलीयत नहीं थी, जबकि भालूमि के साथ जुड़े ‘पराक्रम’ लैंडर में यह क्षमता थी. ‘पराक्रम’ लैंडर बड़ा था, जिस से अंतरिक्ष यात्री उस में बैठ कर भालूमि से निकल कर चंद्रमा की सतह पर आ सके.

भालूमि अंतरिक्ष यान के 3 भाग थे : एक कमांड मौड्यूल, जिस में 3 अंतरिक्ष यात्रियों के लिए एक केबिन था; एक सेवा मौड्यूल, जिस का काम कमांड मौड्यूल को संचालक शक्ति प्रदान करना था यानी विद्युत शक्ति देना था और औक्सीजन और पानी कमांड मौड्यूल तक पहुंचाना था; और एक चंद्र मौड्यूल. चंद्र मौड्यूल में 2 चरण थे- चंद्रमा पर उतरने के लिए एक अवरोही चरण और अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा से उठा कर चंद्र कक्षा में भालूमि तक वापस लाने के लिए एक आरोहण चरण. अगर मिशन कामयाब हो जाता था, तो तीनों भागों में से केवल एक भाग–अंतरिक्ष यात्रियों के केबिन वाला कमांड मौड्यूल ही वापस धरती पर लौटने वाला था. बाकी दोनों मौड्यूल, सेवा मौड्यूल और चंद्र मौड्यूल, उन का काम पूरा हो जाने पर अतिरिक्त बोझ बन जाते और उन की आवश्यकता नहीं रहती थी, इसीलिए पृथ्वी पर लौटने वाला एकमात्र भाग कमांड मौड्यूल ही होता.

जैसे ही भालूमि अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा के चक्कर लगाने शुरू किए, मंजिशी और राजेश कमांड मौड्यूल से निकल कर चंद्र मौड्यूल में आ गए, क्योंकि उन के चंद्रमा पर उतरने का समय आ चुका था.

कमांड मौड्यूल का पायलट अब सतजीत था, जिस का काम राजेश और मंजिशी के चंद्रमा की सतह पर उतरने के पश्चात, अकेले ही चंद्र कक्षा में भालूमि के कमांड मौड्यूल को उड़ाना था.

मंजिशी और राजेश जब तक चंद्रमा की सतह पर रह कर अपना काम पूरा नहीं कर लेते, तब तक भालूमि का नियंत्रण सतजीत के हाथों में था.

मंजिशी और राजेश चंद्र मौड्यूल में बैठ कर नीचे चंद्रमा पर उतर कर, अपना काम कर के, वापस चंद्र मौड्यूल में आ कर, चंद्रमा से बाहर निकल कर पुन: भालूमि तक नहीं पहुंच जाते, तब तक सतजीत को भालूमि को चंद्रमा के चारों ओर चक्कर खिलाते रहना था. किसी एक को यह काम करना ही था, सतजीत को इस से कोई आपत्ति नहीं थी. चंद्रमा के इतने नजदीक पहुंचने पर भी चंद्रमा की सतह पर उतरने का मौका उसे नहीं मिल रहा था, इस का उसे कोई अफसोस नहीं था. मंजिशी और राजेश को चंद्रमा तक उतारने, और उन का काम खत्म हो जाने पर जब चंद्र मौड्यूल वापस आ जाए, तो उन दोनों को चंद्र मौड्यूल से भालूमि के भीतर वापस सुरक्षित लाने का जिम्मा सतजीत का ही था. इसीलिए, जब तक चंद्र कक्षा में चक्कर लगा रहे भालूमि यान तक मंजिशी और राजेश वापस नहीं पहुंच जाते, तब तक चंद्रमा के जटिल और अनजान गुरुत्वाकर्षण में भालूमि को सुरक्षित उड़ाते रहने के लिए वह उत्तरदायी था.

मंजिशी और राजेश ने चंद्र मौड्यूल को सावधानीपूर्वक चंद्रमा की सतह पर उतारा. चंद्र मौड्यूल उस जगह पर उतरा, जो धरती के अंटार्कटिक महाद्वीप की तरह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर था. फर्क सिर्फ इतना था कि धरती के अंटार्कटिक क्षेत्र पर बर्फ ही बर्फ थी, जबकि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव वाले इलाके में चंद्र-मिट्टी के गड्ढे ही गड्ढे थे. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव बर्फीला नहीं था. नासा के चंद्रमा तक पहुंचने वाले सभी अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा की केवल उन्हीं सतहों का अन्वेषण किया था, जो चंद्रमा की भूमध्यरेखा के पास स्थित है, जहां पर पहुंचना सब से आसान और सुरक्षित है. इस ने, उन अंतरिक्ष यात्रियों के द्वारा लाए गए चंद्रमा के नमूनों के बारे में वैज्ञानिकों की समझ को एकतरफा कर दिया था – यह बताना मुश्किल हो गया था कि क्या चंद्रमा से लाए गए इन सभी नमूनों में कोई ऐसी विशेषता है, जो चंद्रमा की सतह में सार्वभौमिक है या केवल यह विशेषता इसलिए कि यह इसे भूमध्य क्षेत्र से लाया गया है.

मिशन भाग-6: क्यों मंजिशी से नाखुश थे सब

विक्रम लैंडर और प्रज्ञान घुमंतू का कुल मिला कर वजन 1,500 किलोग्राम था. उन के बहुत से यांत्रिक टुकड़े बहुत बड़े क्षेत्र में फैले थे. लेकिन यांत्रिक टुकड़े अलग ही दिखते थे. आज उन यांत्रिक टुकड़ों से मंजिशी और राजेश को कोई मतलब नहीं था.

राजेश ने 2 छोटे गड्ढों के बीच परछाईं से ढके एक हिस्से पर गौर किया. एक डब्बी जैसी चीज उसे नजर आई. राजेश ने उसे उठा लिया. उस ने मंजिशी को दिखाया. मंजिशी के शरीर में जैसे खुशी की लहर दौड़ पड़ी. उस ने जोर से हामी भरी.

दुर्भाग्यवश, तब तक चीनी अंतरिक्ष यात्री भी उन के पास आ पहुंचा था. दोनों को खुश देख वह मामला समझ गया. मनुष्यता के सामान्य शिष्टाचार छोड़ कर वह क्रुद्ध हो कर राजेश की तरफ लपका और उस से ह-3 की डब्बी छीनने का प्रयास करने लगा.

मंजिशी ने जैसे ही दोनों में हाथापाई होते देखी, वह तुरंत चीनी अंतरिक्ष यात्री के पास आई और अपनी पूरी शक्ति से उसे जोर से धक्का दिया. चीनी यात्री नीचे गिर गया. चीनी यात्री व्यायाम करने वाले हट्टेकट्टे दिखने वाले 6 फुट का इनसान था. वह तुरंत उठ खड़ा हुआ.मंजिशी ने बात बिगड़ते देखी, तो जोर से राजेश से चिल्ला कर कहा, “राजेश, तुम चंद्र मौड्यूल पर वापस जाओ और उस के इंजन शुरू करो. मैं पहले इस से निबटती हूं.”

राजेश को कुछ भी नहीं सूझा. ह-3 डब्बी की रक्षा करना उस का प्राथमिक उद्देश्य था. वह डब्बी को ले कर अपने चंद्र मौड्यूल की ओर भागा. चीनी यात्री उस के पीछे दौड़ा, लेकिन मंजिशी ने छलांग लगा कर उस के पैर पकड़ कर उसे गिरा दिया. चीनी यात्री के गिरने से राजेश को मौका मिल गया और वह काफी दूर निकल गया.

अपने रास्ते का रोड़ा बनी इस भारतीय नारी को चीनी यात्री ने आगबबूला हो कर निहारा. उसे समझ आ गया कि जब तक इस स्त्री से वह पीछा नहीं छुड़ा लेता, तब तक ह-3 यंत्र उस के हाथ नहीं लगेगा.उस चीनी यात्री ने एक बार फिर राजेश के पीछे जाने की कोशिश की, लेकिन मंजिशी ने लपक कर उसे फिर जोर से पकड़ लिया.

चीनी यात्री ने अपनेआप को छुड़ाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन मंजिशी ने अपना पूरा जोर लगा कर उसे पकड़े ही रखा.राजेश चंद्र-मौड्यूल तक पहुंच चुका था. उस ने पीछे मुड़ कर देखा. मंजिशी और चीनी यात्री दूर आपस में भिड़े हुए थे.

राजेश ने मौड्यूल में प्रवेश कर उस के इंजन शुरू किए. चंद्र मौड्यूल वापस अपनी उड़ान भरने के लिए तैयार था.चंद्रमा के चक्कर लगा रहे सतजीत के भालूमि यान से मिलने के लिए तैयार था. बस मंजिशी के वापस आने की देर थी.

चंद्र मौड्यूल के इंजन से निकलती आग को देख कर चीनी यात्री को ज्ञात हो गया कि ह-3 की डब्बी भारतीयों के हाथों लग गई है और अब उसे प्राप्त करना बहुत ही मुश्किल काम होगा.अपने मिशन को असफल होते देख बेहद क्रोध में चीनी यात्री ने मंजिशी पर वार करने की कोशिश की. इस गुत्थमगुत्था में दोनों के हेलमेट आपस में टकराए, और दोनों के ही हेलमेट से तड़कने की आवाज आई.

यह देख चीनी यात्री घबरा गया. उसे पता था कि हेलमेट में दरार पड़ना यानी चंद सेकंड के भीतर ही मौत. वह तनिक पीछे हटा. मंजिशी को मौका मिला. मंजिशी ने चीनी यात्री के हेलमेट पर अपने हाथों से जबरदस्त मुक्का मारा. चीनी यात्री का हेलमेट मंजिशी के मुक्के की मार को सहन न कर सका और कड़कदार आवाज के साथ उस के हेलमेट की दरारें तेजी से बढ़ने लगीं. चंद सेकंड में ही चंद्रमा के निष्ठुर वातावरण में सीधे संपर्क में आने से चीनी यात्री के शरीर की त्वचा का पानी और शरीर का खून वाष्पीकृत हो गया और वह वहीं गिर गया. लेकिन मौत की नींद में जाने से पहले उस ने मंजिशी के अंतरिक्ष सूट को कस कर पकड़ लिया, जिस से मंजिशी का सूट एकदो जगहों से फट गया.

मंजिशी ने अपने फटे हुए सूट को देखा और हेलमेट में दरार को महसूस किया और डूबती हुई सांसों से अपने हेलमेट के अंदर के ट्रांसमीटर से राजेश से कहा, “राजेश, तुम निकल जाओ… मेरा हेलमेट… टूट चुका है… सूट भी फट गया है …” मंजिशी की सांसें अचानक तेज हो गईं.

दूसरे छोर पर राजेश को यह सुन कर विश्वास ही नहीं हुआ. धरती पर उन्नाकीर्ती, रामादुंडी और टीम के बाकी सदस्यों ने भी मंजिशी के ये शब्द सुने.मंजिशी ने उखड़ती सांसों महसूस किया और शक्तिपीठ पर मौजूद विक्रम लैंडर के उस टुकड़े को हाथ में लिया, जिस पर भारतीय तिरंगा झंडा था. झंडे को अपनी आंखों के सामने रखते हुए उस ने अपने आखिरी शब्द कहे, “जय हिंद …” और वहीं मौत की आगोश में सो गई.

कुछ देर के बाद हतप्रभ राजेश ने चंद्र मौड्यूल की उड़ान भरी. कुछ ही देर में चंद्र मौड्यूल सफलतापूर्वक ऊपर चक्कर लगा रहे भालूमि यान से जा मिला. चंद्र मौड्यूल से निकल कर जब राजेश, भालूमि में अपने कोए में वापस आया तो उस ने अपने और सतजीत के बीच के कोए को बेहद खाली महसूस किया और जोर से फूटफूट कर रोने लगा.

मिशन भाग-5: क्यों मंजिशी से नाखुश थे सब

चीनी यान चंद्रमा पर उतर चुका था. काफी दूरी पर था. किसी भी वक्त अब उस में से चीनी अंतरिक्ष यात्री निकल सकते थे. मंजिशी ने अपनी तलाश जारी रखते हुए राजेश से कहा, “ह-3, चंद्रमा पर मौजूद हीलियम-3 के स्त्रोतों का पता लगाने वाला उपकरण है.”

राजेश ने एक पल के लिए सिर उठा कर मंजिशी को देखा, “हीलियम-3…?” फिर अपने ज्ञान को खंगोला और सोचते हुए कहा, “चंद्रमा की सतह की ऊपरी परत में अंतर्निहित है, प्रचुर मात्रा में है. पृथ्वी को उस का चुम्बकीय क्षेत्र सुरक्षित रखता है, लेकिन चंद्रमा पर ऐसा नहीं होने से सौर्य हवा ने बड़ी मात्रा में हीलियम-3 की बमबारी चंद्रमा पर कर दी है.”

मंजिशी ने चीनी यान को देखा. अभी तक उस में से कोई नहीं निकला था, “और तुम को तो पता ही होगा कि चुटकीभर हीलियम-3 से हमारे पूरे देश की ऊर्जा की समस्या का समाधान हो सकता है.” राजेश ने एक गड्ढे से निकल कर दूसरे गड्ढे में तलाशते हुए कहा, “वह तो मुझे पता ही है. लेकिन मुझे नहीं पता था कि ह-3 खोजने वाला उपकरण भी चंद्रयान-2 मिशन पर लगा हुआ है.”

मंजिशी बोली, “नहीं. हमारी तरफ से यह कभी घोषित ही नहीं किया गया. किसी को इस की जानकारी नहीं दी गई थी. सिर्फ ह-3 की डब्बी बनाने वाले वैज्ञानिक को इस की जानकारी थी.” राजेश ने गौर से मंजिशी को देखा, “और तुम्हें भी…”

मंजिशी ने हामी भरी और स्वीकार किया, “और मुझे भी. हमारे इस चंद्र मिशन का यही उद्देश्य है. उस ह-3 उपकरण को वापस सुरक्षित भारत लाना.” दूसरे यान में से एक अंतरिक्ष यात्री अपना अंतरिक्ष सूट पहने यान से उतरता नजर आया.

मंजिशी और राजेश ने दूर से उसे उतरते हुए देखा. राजेश ने मंजिशी से कहा, “तुम चिंता मत करो. मैं उन लोगों को समझा दूंगा. हमारा उपकरण है, तो हम ही रखेंगे.”इस पर मंजिशी हंस दी और बोली, “तुम ने उन लोगों को बेवकूफ समझा है क्या? यही लेने के लिए तो वे यहां आए हैं. तुम को लगता है कि तुम्हारे तर्कवितर्क से तुम्हारी बात मान कर वो बिना वह चीज लिए वापस चले जाएंगे. जिस चीज को लेने के लिए उन्होंने भी अरबों की राशि खर्च की है? वो यहां पर हम से बात करने या बहस करने नहीं आए हैं, हमारा ह-3 उपकरण लेने के लिए आए हैं.”

राजेश ने अविश्वास से पूछा, “जब किसी को भी नहीं पता था, तो उन को कैसे पता चल गया कि चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर के उपकरणों में ह-3 की खोज करने वाला उपकरण भी था?”मंजिशी ने अपनी तलाश में तेजी ला दी थी, “क्योंकि विक्रम लैंडर के टूट कर यहां गिर जाने के बाद ‘शक्तिपीठ’ के ऊपर से न केवल अमरीकी यान ‘मून रीकौन और्बिटर’ गुजरा है, बल्कि इजरायली यान ‘बेरेशीट’ और चीनी यान ‘छांग-ई-5’ भी गुजरे हैं. जाहिर है कि उन्होंने ‘शक्तिपीठ’ की जो तसवीरें खींची हैं, उस में उन्हें कुछ संदिग्ध नजर आया है.”

चंद्रमा के ऊपर से अंतरिक्ष से खींची हुई तसवीरों में से जानकारी प्राप्त करना बेहद मुश्किल काम था. चंद ही देशों को यह महारत हासिल थी.दूसरे यान का अंतरिक्ष यात्री अब कंगारुओं की तरह उछलता हुआ पास आता दिखाई दिया.

राजेश ने उत्सुकता से पूछा, “चीनियों के पास नहीं है क्या हीलियम-3 उपकरण?”मंजिशी कुंठित हो गई, “मुझे नहीं मालूम… मेरा मिशन सिर्फ इतना है कि हमारा उपकरण चीनियों के हाथों में नहीं लगना चाहिए. वैसे भी अगर उन के पास यह उपकरण होता, तो हमारा लेने के लिए वे लोग अरबों रुपए खर्च कर के यहां क्यों आते?”

चीनी अंतरिक्ष यात्री अब बेहद करीब आ गया था.राजेश ने कुछकुछ याद करते हुए कहा, “अब मुझे सबकुछ अच्छी तरह समझ में आ रहा है.”मंजिशी ने पलभर के लिए उस की ओर देखा, “क्या…?”

राजेश बोला, “यही कि हमारा यह मिशन इतना गोपनीयता भरा क्यों था कि किसी को भी भनक तक नहीं पड़ी. और इतनी तेजी से सबकुछ क्यों किया गया कि बिना प्रशिक्षित अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की नौबत आ गई.”

चीनी अंतरिक्ष यात्री अब कुछ ही मीटर के फासले पर था. नजदीक आते ही उसे यह बात समझ आ गई कि भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को हीलियम-3 उपकरण नहीं मिला है. उस ने अपने भारीभरकम जूतों से पास ही के गड्ढों में से मिट्टी को रौंदना शुरू कर दिया और उपकरण की तलाश करने लगा. अचानक ही वह जैसे खुशी से उछल पड़ा. उस ने अपने पैरों से हटाई मिट्टी में दबे एक इलेक्ट्रौनिक सी दिखनी वाली चीज को अपने हाथ में दबाया और वापस अपने यान की ओर दौड़ पडा.

राजेश ने डूबते ह्रदय से उसे विक्रम लैंडर का एक हिस्सा ले जाते हुए देखा.मंजिशी ने राजेश को राहत दिलाई, “चिंता मत करो. ढूंढ़ते रहो. जो इलेक्ट्रौनिक सर्किट बोर्ड वह ले कर गया है, वह स्पेक्ट्रोमीटर का सर्किट बोर्ड है. शायद उसे परख नहीं है या उन लोगों को पता नहीं है कि हीलियम 3 उपकरण कैसा दिखता है.”

विक्रम लैंडर के साथ प्रज्ञान घुमंतू भी चंद्रयान-2 का हिस्सा था. स्पेक्ट्रोमीटर, प्रज्ञान घुमंतू पर मौजूद 2 उपकरणों में से एक था. स्पेक्ट्रोमीटर के सर्किट बोर्ड चीनी अंतरिक्ष यात्री के हाथ पड़ने से यह साफ हो गया था कि न केवल विक्रम लैंडर के टुकड़े हो चुके हैं, बल्कि प्रज्ञान घुमंतू भी चंद्र-सतह पर तेजी से गिरने से टूट चुका है और उस के टुकड़े भी इसी इलाके में बिखरे पड़े हैं.

कुछ ही देर में चीनी अंतरिक्ष यात्री वापस आता दिखाई दिया. उस के स्पेस हेलमेट के अंदर से उस का गुस्से से  तमतमाता चेहरा दिख रहा था. पास आते ही उस ने अपने काम में तेजी ला दी. कुछ ही देर में उसे एक और उपकरण मिला. यह उपकरण ले कर वह फिर से अपने यान की ओर गया.

मंजिशी बोली, “उसे प्रज्ञान घुमंतू के हिस्से मिल रहे हैं. जो दूसरा उपकरण वह ले कर गया है, वह प्रज्ञान घुमंतू का दूसरा उपकरण है.”राजेश बोला, “वह उपकरण लेले कर अपने यान की ओर क्यों जा रहा है?”

मंजिशी बोली, “शायद, वह अकेला ही है. उन की कल्पना में भारत की ओर से इतने जल्दी किसी अंतरिक्ष यात्री को चंद्रमा पर भेजने की संभावना शून्य है. इसीलिए वह यान के अंदर लगे अपने कैमरे से धरती पर मौजूद चीनी टीम के सदस्यों को उपकरण दिखा कर उन की राय ले रहा है. हम लोग अपनी खोज जारी रखते हैं.”

मिशन भाग-4:क्यों मंजिशी से नाखुश थे सब

भारतीय अंतरिक्ष संस्थान के वैज्ञानिकों को पता था कि चंद्रमा के भूविज्ञान की पूरी तसवीर बनाने के लिए विभिन्न चंद्र लैंडिंग साइटों का चयन करना महत्वपूर्ण है. दक्षिणी ध्रुव में विशेष रूप से उन की दिलचस्पी इसीलिए थी कि यहीं पर चंद्रयान-2 मिशन के पूर्ववर्ती, चंद्रयान -1 के और्बिटर पर लगे उपकरणों ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास हमेशा छायादार बने संघात गड्ढों में दबे पानी की बर्फ के स्लैब का पता लगाया था. चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर जहां उतरने वाला था, वहां हुडप्रभा और त्रिजोनी नामक दो संघात गड्ढे थे. चंद्रमा की सतह पर लाखों संघात गड्ढे थे, जो धरती से भी दिखाई देते थे. मंजिशी और राजेश ने अपने चंद्र मौड्यूल को हुडप्रभा और त्रिजोनी से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर, ‘शक्तिपीठ’ नामक जगह पर उतारा.

राजेश को भी नहीं बताया गया था कि चंद्र मौड्यूल कहां उतरने वाला था. सिर्फ मंजिशी को ही इस बात की जानकारी थी कि चंद्रमा की सतह पर चंद्र मौड्यूल को कहां उतारा जाएगा.

चंद्र मौड्यूल के चंद्रमा पर बराबर ढंग से स्थापित हो जाने पर सब से पहले मंजिशी ने उस में से बाहर निकल कर चंद्रमा की सतह पर कदम रखा. मंजिशी के पीछेपीछे राजेश ने चंद्र मौड्यूल से निकल कर चंद्रमा को छुआ.

राजेश ने आश्चर्य से चंद्रमा की इस कुछकुछ अंतराल पर गड्ढों से भरी सतह को देखा और मंजिशी से अनायास ही पूछा, “यह जगह क्यों चुनी है हम ने उतरने के लिए?”

मंजिशी ने अपने स्पेस हेलमेट के भीतर से ही जवाब दिया, “यहीं से एक किलोमीटर की दूरी पर, विक्रम लैंडर, हुडप्रभा और त्रिजोनी संघात गड्ढों के नजदीक उतरने वाला था. लेकिन, मंजिशी ने अपने पैरों के नीचे की जमीन की तरफ इशारा कर के कहा, “यहां पर आ गिरा. इसे ‘शक्तिपीठ’ कहते हैं. यहां पर विक्रम लैंडर के अनेकानेक टुकड़े गिरे पड़े हैं.”

विक्रम लैंडर, चंद्रमा पर भारत के चंद्रयान-2 मिशन का हिस्सा था, जिसे जुलाई 2019 में लौंच किया गया था. यदि चंद्रयान-2 सहीसलामत चंद्रमा की सतह पर पहुंच गया होता, तो भारत चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लैंडर लगाने वाला चौथा देश होता. लेकिन सतह से 3 किलोमीटर से भी कम ऊंचाई पर, विक्रम, नियोजित अवरोही पथ से भटक गया और रेडियो संपर्क से बाहर हो गया. चंद्रमा की सतह पर, जहां उसे लैंड करना चाहिए था, वहां से एक किलोमीटर की दूरी पर गिर कर उस के टुकड़ेटुकड़े हो गए और सतह पर बिखर गए.

भगवान शंकर की पत्नी, और दक्ष की पुत्री, सती, पिता दक्ष द्वारा न बुलाए जाने पर और भोलेनाथ शंकर के रोकने पर भी अपने पिता के द्वारा किए जा रहे ‘बृहस्पति सर्व’ नामक यज्ञ में भाग लेने चली गई थीं.यज्ञस्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से अपने पति को न आमंत्रित करने का कारण पूछा और उन का विरोध किया.

इस पर सती के पिता ने महादेव को अपशब्द कहे. इस अपमान से पीड़ित हो कर सती ने यज्ञ के अग्निकुंड में कूद कर अपनी प्राणाहुति दे दी थी. तत्पश्चात, संपूर्ण विश्व को शिवजी के क्रोध से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई टुकड़ों में काट दिया. वे टुकड़े जिन जगहों पर गिरे, वे स्थान ‘शक्तिपीठ’ कहलाए.

विक्रम लैंडर के टूटने की कहानी भी यही थी. इसीलिए विक्रम लैंडर जहां टूट कर गिरा, उस स्थान को ‘शक्तिपीठ’ नाम दे दिया गया.मंजिशी ने चंद्र मौड्यूल को ‘शक्तिपीठ’ पर ही उतारा था, और राजेश को इस बात का पता यहां पहुंच कर ही चला.

राजेश के आश्चर्य की सीमा नहीं थी. सबकुछ गोपनीय रखा गया था. न तो उसे, न ही सतजीत को इस मिशन की अधिक जानकारी थी. प्रशिक्षित अंतरिक्ष यात्री होने की वजह से उन्हें मंजिशी के साथ भेजा गया था. अगर मंजिशी को अकेले ही चंद्रमा तक भेज पाना संभव होता, तो शायद रामादुंडी और उन्नाकीर्ती ऐसा ही करते. लेकिन इतने बड़े और दूरस्थ मिशन में बहुत सारी अभियांत्रिक प्रणालियों को नियंत्रित रखना एक व्यक्ति के बस की बात नहीं होती है.

मंजिशी और राजेश के स्पेस हेलमेट के अंदर फिट रिसीवर में धरती पर उन से संपर्क बनाए हुए उन्नाकीर्ती की उत्साहित आवाज आई, “आप लोग चंद्रमा पर उतर गए?”मंजिशी ने राहत भरी आवाज में उत्तर दिया, “जी …”, लेकिन मंजिशी के उत्तर देने की देर थी कि दूर कहीं किसी अन्य यान के उतरने की आवाजें आनी शुरू हो गईं.

मंजिशी ने उन्नाकीर्ती से जल्दीजल्दी कहा, “सर, समय बहुत कम है. वे लोग पहुंच चुके हैं. हम लोग अपना काम शुरू कर देते हैं.”राजेश ने हैरतअंगेज निगाहों से उस ओर देखा, जहां पर दूसरा अंतरिक्ष यान लैंड करने वाला था. दूर कहीं उसे चंद्रमा की मिट्टी उड़ती हुई दिखाई दी. उतरता हुआ दूसरा यान, अपने नीचे की चंद्रमा की मिट्टी को उड़ा रहा था.

राजेश हक्काबक्का हो गया, “दूसरा यान…? ये किस का हो सकता है?”मंजिशी ने राजेश से शीघ्रता से कहा, “राजेश, हमारे पास समय बहुत ही कम है. विक्रम लैंडर के इन टुकड़ों में एक छोटा सा उपकरण है. उस के ऊपर ह-3 लिखा हुआ है. बिलकुल माचिस की डब्बी जितना है. उसे फटाफट खोजो.”

राजेश की उलझनें बढ़ गई थीं. उस ने तुरंत यहांवहां देखते हुए मंजिशी से पूछा, “ये दूसरा यान क्या हमारा ही है? ऐसे कैसे दोदो यान एक ही समय पर चंद्रमा की एक ही जगह पर आ गए हैं? ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं है.”मंजिशी ने ह-3 की डब्बी खोजते हुए उतावलेपन से कहा, “यह यान चीन का है. जैसे ही यह सफलतापूर्वक चंद्रमा पर उतरेगा, उस में से चीनी अंतरिक्ष यात्री निकलेंगे. वे भी इसी डब्बी को लेने आए हैं.”

राजेश ने नीचे झुक कर चंद्रमा की मिट्टी को यहांवहां धकेला और तलाश जारी रखते हुए दृढ़ता से कहा, “लेकिन डब्बी तो हमारी है. वे क्यों इसे लेने आए हैं?”मंजिशी ने खीझते हुए कहा, “दूसरों की चीजें कोई बलपूर्वक या छल से क्यों लेता है?”

राजेश की समझ में आ गया कि चीनी अंतरिक्ष यात्रियों के इरादे नेक नहीं थे. वे विक्रम लैंडर से निकले हिंदुस्तान के उपकरण को हथियाने आए थे. इस से पहले कि वे अपने नापाक इरादों में कामयाब होते, राजेश और मंजिशी को वह डब्बीरूपी उपकरण ढूंढ़ लेना था.

राजेश ने एक छोटे गड्ढे में मिट्टी को अव्यवस्थित करते हुए तलाशा और तलाशते हुए पूछा, “इस छोटी डब्बी की ऐसी क्या विशेषता है कि उस को लेने के लिए अरबों रुपयों का मिशन हम को खड़ा कर देना पड़ा? इस को तो हम दोबारा से अपने अनुसंधान केंद्रों में भी बना सकते थे.”

मंजिशी को पता था कि इस प्रश्न का उत्तर तो उसे राजेश को कभी न कभी देना ही पड़ेगा. अब वह वक्त आ गया था, जब राजेश को उस के प्रश्नों के उत्तर दिए जाएं. पूरे समय तक राजेश और उस की पूरी टीम को अंधेरे में रखा गया था.

मिशन भाग-2: क्यों मंजिशी से नाखुश थे सब

लूनर मिशन का मतलब था चंद्रमा तक जाने का मिशन. राजेश बोला, “और सर, जहां तक मेरी जानकारी है, एलएलवी की डिजाइन सिर्फ कागजी है. उस के सभी सिस्टम्स की पूरी तरह से टेस्टिंग नहीं हुई है. अभी तो कम से कम एक साल और लगेगा एलएलवी को पूरी तरह से आपरेशनल होने में.”

सतजीत ने हामी भरी, “बिलकुल सही कहा. एलएलवी तो अभी लांच के लिए कतई तैयार नहीं है.”कांफ्रेंस में, कोने में, जहां अंधेरा था, वहां कुरसी लगा कर टाईकोट पहने हुए एक व्यक्ति बैठा था. उस ने हस्तक्षेप किया, “आप लोग भूल रहे हो कि हम लोग चंद्रयान मिशन द्वारा चंद्रमा तक जा चुके हैं.”

राजेश ने तुरंत कहा, “लेकिन, हमारे सभी चंद्रयान मिशन बिना किसी अंतरिक्ष यात्री को ले कर चंद्रमा तक गए हैं. इस बार हम अंतरिक्ष यात्री वाले मिशन की बात कर रहे हैं, जो हिंदुस्तान का सब से पहला ऐसा मिशन होगा. इस के लिए हम उसी राकेट का इस्तेमाल नहीं कर सकते, जो बिना किसी इनसान के मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है.”

टाईकोट वाले व्यक्ति ने सरलता से कहा, “बिलकुल कर सकते हैं. उसी राकेट में बहुत सारे परिवर्तन कर के,” फिर एक क्षण रुक कर वे बोले, “लेकिन, एलएलवी तो पूरी तरह से नया डिजाइन है. उस के लिए आप लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है.”

पद्मनाभन और भी परेशान था, “लेकिन सर, धरती से सिर्फ 300 किलोमीटर ऊपर जाने के लिए हम इतने भारी एलएलवी का इस्तेमाल क्यों करना चाहते हैं? एलएलवी तो चंद्रमा तक जाने के लिए है, जो धरती से 4 लाख किलोमीटर की दूरी पर है. हमारे 300 किलोमीटर की दूरी के लिए लोअर्थ राकेट ही उपयुक्त है. 4 लाख किलोमीटर वाली शक्ति वाला राकेट तो वैसे भी हमारे लिए बहुत बड़ा और वजनी हो जाएगा.”

निदेशक रामादुंडी ने सकुचाते हुए कहा, “हमारा मिशन चंद्रमा तक जाने का ही है…”राजेश चिढ़ कर खड़ा हो गया, “सर, कैसी बात कर रहे हैं आप? हमारा मिशन तो शून्यकोर मिशन है, जो धरती से सिर्फ 300 किलोमीटर ऊपर जा कर वापस आने वाला मिशन है. हम लोग तो सब से पहले सिर्फ यही देखना चाहते हैं न कि हिंदुस्तान में, और भारतीय अंतरिक्ष संस्था में, स्वयं से ही बनाए गए उपकरणों द्वारा हम सिर्फ धरती के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल कर इनसानों को वापस ला सकते हैं या नहीं. इस में चंद्रमा तक जाने की बात कहां आ गई?”

मंजिशी, जो अब तक शांत रह कर सब सुन रही थी, ने कहा, “जिस तकनीक का इस्तेमाल हम शून्यकोर मिशन के लिए कर रहे थे, वही सबसिस्टम्स चंद्रमा के मानव मिशन में भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं और सभी सुचारु रूप से काम कर रहे हैं. मैं ने खुद भी उन का निरीक्षण कर लिया है.”

राजेश का मानो सैलाब फूट पड़ा, “आप ने क्या खाक निरीक्षण कर लिया है. किसी रेलगाड़ी से 300 किलोमीटर सफर करना और 4 लाख किलोमीटर की दूरी तय करना, क्या ये दोनों बातें आप को एकजैसी लगती हैं…?”अगर दोनों बातें आप को एकजैसी लगती हैं, तो आप के जैसे इनसान को अंतरिक्ष वैज्ञानिक तो क्या, साधारण वैज्ञानिक भी नहीं होना चाहिए.”

मंजिशी ने बिना रोष प्रकट किए हुए कहा, “लेकिन, एक पैसेंजर रेलगाड़ी और एक सुपरफास्ट एक्सप्रेस, दोनों के अंजरपंजर एक ही समान रहते हैं, और दोनों की तकनीक व बनने की विधि भी एक ही रहती है.”राजेश ने गुस्से से अपने हाथ हिला दिए, “मुझे आप से बहस नहीं करनी. 300 किलोमीटर के शून्यकोर मिशन में अंतरिक्ष यात्रा कुछ घंटों में ही समाप्त हो जाएगी, जबकि चंद्रमा तक जाने में ही 4 दिन लग जाएंगे, और वापस आने में भी 4 दिन. इस के अलावा वहां पर बिताया गया समय. इस पूरी अवधि के लिए पता नहीं कितनी और किसकिस प्रकार की सामग्री लगेगी. इस की पूरी स्टडी करनी पड़ेगी. अमेरिका के चंद्रमा तक अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने वाले अपोलो मिशन का गहराई से अध्ययन करना पड़ेगा. उन से तकनीकी सहायता मांगनी पड़ेगी. शून्यकोर मिशन से काफी अलग मिशन होगा यह.”

टाईकोट वाला व्यक्ति उठ खड़ा हुआ. उस ने मुसकरा कर राजेश को संबोधित किया, “तुम उस की चिंता मत करो. पिछले एक साल से तकरीबन सौ वैज्ञानिकों की टीम दिनरात एक कर के इसी पर काम कर रही है, मजिशी के नेतृत्व में. मंजिशी को इस टीम और उन के कामों के बारे में समस्त जानकारी है.”

दोरंजे ने हिम्मत से टाईकोट पहने महत्वपूर्ण से दिखने वाले व्यक्ति से कहा, “सर, लेकिन मास्को के गागरिन अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण केंद्र में हमारा प्रशिक्षण सिर्फ चंद घंटों की अंतरिक्ष यात्रा के लिए हुआ है. हम 4 लोगों की यह टीम, 10 दिन की अंतरिक्ष यात्रा तो क्या, 24 घंटे की अंतरिक्ष यात्रा तक करने में बिलकुल असक्षम है.”

टाईकोट वाले व्यक्ति ने कहा, “मंजिशी के नेतृत्व में सब सफल हो जाएगा. रास्ते में क्या कैसे करना है, सब मंजिशी समझा देगी. उस को पूरा प्रशिक्षण है.”पद्मनाभन ने मजाक उड़ाने के लहजे में कहा, “सर, जब हिंदुस्तान में रह कर ही चंद्रमा तक जाने का अंतरिक्ष प्रशिक्षण मिल सकता है, तो मात्र 300 किलोमीटर के अंतरिक्ष प्रशिक्षण के लिए हमें रूस भेजने की क्या आवश्यकता थी?”

दोरंजे को भी यह बात गलत लगी, “हिंदुस्तान में ऐसी कौन सी जगह है, जहां गागरिन अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण केंद्र जैसा कोई प्रशिक्षण केंद्र है? मेरी नजर में तो ऐसा प्रशिक्षण केंद्र पूरे देश में कहीं नहीं है.”

प्रोजैक्ट लीडर उन्नाकीर्ती ने चारों का गुस्सा होना जायज समझा और शांत किंतु दृढ़ आवाज में कहा, “मंजिशी का चंद्रमा तक जाने का प्रशिक्षण अनुकारी पर हुआ है.”

अनुकारी प्रशिक्षण उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले वाहन, विमान और अन्य जटिल प्रणाली के संचालन की यथार्थवादी नकल प्रदान करने के लिए डिजाइन किए गए नियंत्रणों के समान सेट वाली एक मशीन थी.

राजेश ने उपहास किया, “वाह, मशीन पर प्रशिक्षण प्राप्त अनुकारी अंतरिक्ष यात्री के नेतृत्व में हम चंद्रमा तक जाएंगे.”राजेश ने अपने तीनों साथियों को संबोधित करते हुए कहा, “लो भई, अब तो वाकई पहुंच गए हम चंद्रमा तक.”

उन्नाकीर्ती ने बात बिगड़ते देख तुरंत कहा, “अनुकारी पर जितने प्रकार की परिस्थितियों को हल करने का प्रशिक्षण मंजिशी ने प्राप्त किया है, आप चारों ने कुल मिला कर उस का एक प्रतिशत भी नहीं किया है.”

मंजिशी ने हंस कर कहा, “किस बात का डर है तुम चारों को? ज्यादा से ज्यादा क्या होगा?”टाईकोट वाले व्यक्ति ने देशभक्ति की भावना से राजेश और उस की टीम के सदस्यों से पूछा, “सिर्फ प्रश्न यह है कि क्या तुम हिंदुस्तान के अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे सकते हो?”

मिशन भाग 1: क्यों मंजिशी से नाखुश थे सब

राजेश ने अपकेंद्रित्र यानी सेंट्रीफ्यूज से बाहर कदम रखा और एक गहरी सांस भर कर उसे देखा. गागरिन अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण केंद्र में अंतरिक्ष यात्रा का प्रशिक्षण ले रहे चार सदस्यों के भारतीय दल का कप्तान था वह. बाकी के लोग उसे कप्तान राजेश कह कर संबोधित करते थे.

आज प्रशिक्षण का अंतिम दिन था. रूस के प्रशिक्षकों के मुताबिक चारों ने सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा कर लिया था और वापस भारत लौटने के लिए वे चारों तैयार थे.

भारतीय अंतरिक्ष संस्था के अगले मिशन में बारीबारी से दोदो की टीमों में इन चारों को भेजा जाने वाला था. राजेश ने तीनों को इकट्ठा किया और उन से अपनी वापस भारत यात्रा की तैयारी के बारे में पूछा. सभी तैयार थे.कुछ घंटों बाद, अपने सामान सहित, चारों अंतरिक्ष यात्रियों के इस दल ने मोस्को से बेंगलुरु की उड़ान भरी और हिंदुस्तान पहुंचे.

उस दिन आराम करने के बाद, अगले दिन प्रारंभिक पूछताछ के पश्चात अंतरिक्ष यात्रा विभाग के निदेशक रामादुंडी ने उन्हें अपने कमरे में बुलाया.निदेशक रामादुंडी को इसी संस्था में काम करते हुए 30 से भी अधिक वर्ष हो गए थे.

निदेशक रामादुंडी ने चारों को बिठाया और यहांवहां की दोचार बातें करने के बाद कहा, “मिशन की तारीख आ चुकी है.”चारों मानो खुशी से उछल गए. उन्होंने कभी सपने में भी इस बात की उम्मीद नहीं की थी.निदेशक रामादुंडी ने चारों को गंभीर निगाहों से देख कर कहा, “सिर्फ एक बात मैं तुम को बताना चाहता हूं”, फिर कुछ रुक कर उन्होंने संकोच से कहा, “इस मिशन का नेतृत्व मंजिशी जोबला करेंगी.”

यह सुन कर चारों भौंचक्के से रह गए. कप्तान राजेश को मानो काटो तो खून नहीं.राजेश ने हैरानी से कहा, “सर, लेकिन उस ने तो अंतरिक्ष यात्रा का हमारे साथ कोई प्रशिक्षण भी नहीं लिया है.”इस पर निदेशक रामादुंडी बोले, “मंजिशी पूरी तरह से प्रशिक्षित है.”

राजेश को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था, “लेकिन, हम में से किसी ने भी यह नाम कभी सुना नहीं है. किसी मंजिशी जोबला ने कभी लड़ाकू विमान का पायलट बनने का भी प्रशिक्षण लिया है क्या?”

निदेशक रामादुंडी ने उन्हें शांतिपूर्वक समझाया, “उसे अलग से प्रशिक्षण दिया जा रहा था.”थोड़ी देर बाद, बैठक के समाप्त होने पर चारों कैंटीन  में आ गए. सतजीत, दल के दूसरे सदस्य, ने गरम हो कर कहा, “ऐसे कैसे किसी को भी उठा कर टीम के नेतृत्व का जिम्मा उसे सौंप दिया?”

पद्मनाभन, तीसरे सदस्य ने जोर दे कर कहा, “अब एक महिला से आदेश लेने पड़ेंगे हमें?”दोरंजे, चौथे सदस्य ने भी चिंता व्यक्त की, “मैं तो सारे शून्यकोर मिशन पर काम करने वाले अभियांत्रिकों को जानता हूं. ऐसा कोई नाम तो मैं ने पहले कभी नहीं सुना.”

शून्यकोर, अंतरिक्ष में भेजा जाने वाला अगला मिशन था, जिस में दोदो की टीमों में इन चारों को भेजा जाने वाला था. ‘शून्यक की ओर’ अर्थात, ‘शून्यकोर’, भारत के अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष के शून्यक में भेजा जाने वाला यान था.

शून्यकोर-1 में राजेश व सतजीत और शून्यकोर-2 में पद्मनाभन और दोरंजे को भेजना तय था. लेकिन अब मंजिशी का नाम बीच में आ गया था. चारों के मन में यह भी आशंका बैठ गई कि हो सकता है कि मंजिशी उन चारों में से किसी एक का स्थान ले ले, और किसी एक को अंतरिक्ष में जाने का मौका ही न मिले.

राजेश ने गंभीरता से कहा, “उस को टीम का सदस्य बनाना एक बात थी. लेकिन सीधे कप्तान बना दे रहे हैं उस को?”जाहिर है कि रूस प्रशिक्षित इस माहिर टीम का नेतृत्व सिर्फ वही व्यक्ति कर सकता था, जो खुद इन लोगों से ज्यादा निपुण हो.

पद्मनाभन बोला, “हमारी सारी ट्रेनिंग इस बात को ध्यान में रख कर दी गई थी कि राजेश इस टीम की अगुआई करेंगे. अब पूरी टीम की डायनामिक्स ही परिवर्तित हो जाएगी.”2 दिन बाद एग्जीक्यूटिव कांफ्रेंस रूम में इस 4 सदस्यीय दल की मुलाकात मंजिशी जोबला से हुई.

मंजिशी, साढ़े 5 फुट ऊंची, किसी कुश्ती खेलने वाली महिला खिलाड़ी की तरह दिखती थी. दिखने में वह साधारण थी, लेकिन ऐसा लगता था कि वह कुछ करने के लिए तत्पर है.

कांफ्रेंस में मौजूद निदेशक रामादुंडी ने अपने साथ आए हुए व्यक्ति का परिचय देते हुए सभी लोगों को बताया, “ये मिस्टर उन्नाकीर्ती हैं. ये प्रोजैक्ट लीडर हैं. धरती पर आप का संपर्क इन्हीं से रहेगा.”

मिस्टर उन्नाकीर्ती, छोटे, नाटे कद का वैज्ञानिक था, जिस ने स्पेस कम्यूनिकेशन में महारत हासिल कर ली थी. इसी वजह से उसे प्रोजैक्ट लीडर बना दिया गया था.उन्नाकीर्ती ने समय न जाया करते हुए कहा, “लांच की सारी तैयारियां अणकोल के लांच सेंटर में जोरों से हैं. काउंटडाउन शुरू हो चुका है. एक हफ्ते बाद ही एलएलवी की लांच तारीख तय कर दी गई है.”

मंजिशी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन राजेश और उस के साथी मानो अपनी कुरसियों से ही गिर पड़े. दोरंजे ने हैरानी से कहा, “सर, इतनी जल्दी लांच…? सिर्फ एक हफ्ते बाद?”

सतजीत और भी भौंचक्का था, “सर, हमारा एलएलवी तो लूनर लांच व्हीकल है… हमारा प्रशिक्षण तो धरती से मात्र 300 किलोमीटर ऊपर के अंतरिक्ष तक ही सीमित है. उस के लिए हम अपने साधारण राकेट, लोअर्थ राकेट का इस्तेमाल करने वाले थे. लूनर लांच व्हीकल तो लूनर मिशन के लिए डिजाइन किया गया है.”

Winter Special: शाम के नाश्ते में बनाएं चटपटे पौप्स

शाम के नाश्ते के लिए अगर आप चटपटी रेसिपी ढूंढ रहे हैं तो चटपटे पौप्स की ये हैल्दी रेसिपी ट्राय करें.

सामग्री

–  10-15 मशरूम

–  1 छोटा चम्मच अदरक व लहसुन का पाउडर

–  1 छोटा चम्मच प्याज का पाउडर

–  1 कप बै्रडक्रंब्स

–  1 छोटा चम्मच लहसुन बारीक कटा

–  1 नीबू

–  1 बड़ा चम्मच कौर्नफ्लोर

–  तेल आवश्यकतानुसार

–  1/4 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर

–  1 बड़ा चम्मच शहद

विधि

मशरूम को आधाआधा काट लें. ब्रैडक्रंब्स एक प्लेट में निकाल लें. बाकी सारी सामग्री को एक बड़े बरतन में डालें. थोड़ा सा पानी डाल कर मैरिनेशन तैयार कर लें. इस तैयार मैरिनेशन में मशरूम मिला कर अच्छी तरह मिक्स कर लें. अब 1-1 मशरूम उठा कर ब्रैड क्रंब्स में लपेट लें. सारे तैयार मशरूम एक ट्रे में रख कर 1-2 घंटों के लिए फ्रिज में रख दें. तेल में तल कर चटनी के साथ परोसें.

बिदाई- भाग 1: क्यों मिला था रूहानी को प्यार में धोखा

‘‘मां मैं ने ठान लिया है कि मैं अभिनेत्री ही बनूंगी. अच्छा होगा आप और पापा भी मेरे इस निर्णय में मेरा साथ दो. वैसे भी जब मैं ने निर्णय ले ही लिया है तो करूंगी तो मैं वही,’’ रूहानी का सुर सख्त था. वह शुरू से अडि़यल रही थी. बड़ा होने के साथ, जल्द से जल्द पैसा और शोहरत पाने की धुन ने उसे और भी कठोर बना दिया था. मातापिता का उस के निर्णय में साथ देने या न देने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था. जब से उस की एक सहेली ने उसे एक एजेंट से मिलवाया था और उस एजेंट ने रूहानी को टैलीविजन पर उच्च कोटि की अभिनेत्री बनवाने के सुनहरे ख्वाब दिखाए थे, तब से रूहानी लगातार वही सपना देख रही थी. वह एजेंट भी लगभग रोज ही उसे फोन करता और जल्दी नोएडा पहुंचने को कहता. रूहानी भी उसी समय अपने मातापिता से जिद करने लगती.

‘‘मैं कहती हूं जी, यदि हम रूहानी को अपने साथ, अपने पास रखना चाहते हैं, तो हमें उस का साथ देना चाहिए वरना 18 वर्ष की तो वह हो ही गई है… घर छोड़ कर चली गई तो हम क्या कर पाएंगे?’’ उस की जिद के आगे मां ने हार मान ली थी. अब वे अपनी बेटी को खोना नहीं चाहती थीं, इसलिए उस के पिता को समझाबुझा रही थीं.

‘‘क्या तुम जानती नहीं हो कि वह कैसी दुनिया है… जितनी चकाचौंध है, उतना ही तनाव भी… जितना पैसा है, उतनी ही प्रतिस्पर्धा भी. जितनी जल्दी शोहरत मिलती है, उतना ही कठिन उस शोहरत को अपने पास बनाए रखना होता है. तुम्हें लगता है कि रूहानी इतनी कठिन जिंदगी जी पाएगी? और नोएडा यहां रखा है क्या? कितनी दूर है हमारे शहर से. वहां अकेली कैसे रहेगी वह?’’ पिता अब भी राजी न थे. लेकिन वयस्क बेटी की जिद के आगे कब तक टिक पाते?

रूहानी ने अपना बोरियाबिस्तर बांधा और निकल पड़ी घर से. पटरियों पर तेजी से दौड़ती ट्रेन से खिड़की से बाहर झांकते हुए, भागते हुए पेड़ों के साथ उस के मानसपटल पर अतीत के क्षण भी दौड़ने लगे…

कैसे उस एजेंट ने रूहानी को देखते ही 2-3 टीवी धारावाहिकों की बात कह डाली थी, ‘‘अरे रूहानी, तुम एक बार नोएडा आओ तो सही, औडिशन में तुम्हारा नंबर लगाना मेरा काम है… मैं दावे से कह सकता हूं कि तुम्हारा चयन हो जाएगा. फिर तुम्हें एक मैनेजर की आवश्यकता पड़ेगी… चलो, उस का इंतजाम भी कर दूंगा. अब बस, रातोंरात स्टार बनने की तैयारी कर लो, डार्लिंग.’’

ट्रेन में अकेले नोएडा जाते हुए वह सोचती जा रही थी, ‘आज मैं इस भीड़ का हिस्सा हूं. मुझे कोई नहीं जानता. मैं भी इन लोगों में, इन्हीं की तरह खो गई हूं, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब मैं इसी भीड़ की रोल मौडल होऊंगी,’ मन ही मन मुसकराती रूहानी पर किसी का ध्यान नहीं था.

आज वाकई वह इस भीड़ का हिस्सा थी. लेकिन भविष्य किस ने देखा है? शायद इसीलिए भविष्य के सपने सजानादिखाना आसान है. बहुत सी दुकानें इसी स्वप्निल भविष्य को बेच रही हैं… बहुत से लोग दूसरों के भविष्य को दिखा कर अपना वर्तमान सुधार रहे हैं.

नोएडा पहुंचते ही रूहानी ने उस एजेंट से संपर्क साधा. फिर उसी ने रूहानी को नोएडा से सटे एक सस्ते से गांव में पीजी में एक कमरा दिलवा दिया. रूहानी के साथ वहां 3 लड़कियां और रहती थीं.

कमरे की हालत देख रूहानी के सपने थोड़े चटकने लगे. बोली, ‘‘आप ने तो कहा था कि आप मुझे रातोंरात स्टार बना दोगे, पर यहां तो…’’

‘‘डोंट बी सिली रूहानी, स्टार बनने में मेहनत लगती है… पहले पेड़ उगाओ, फिर आम खाना. खैर, छोड़ो ये फुजूल की बातें, मैं ने कल तुम्हारे लिए एक औडिशन में नंबर लगाया है. ठीक 10 बजे पहुंच जाना इस पते पर,’’ वह उसे पता लिखा कागज पकड़ा गया.

सुबहसुबह तैयार हो रूहानी निश्चित समय पर निर्धारित स्थान पहुंच गई. नई जगह, नई संस्कृति. रूहानी थोड़ा असहज अनुभव कर रही थी. वहां लंबी कतार लगी थी. रूहानी का नंबर आतेआते तीसरा पहर आ गया.

भूखीप्यासी रूहानी थकान से बेहाल थी. अपना नाम पुकारे जाने पर चेहरा थोड़ा संवार कर वह अंदर पहुंची. जो लाइनें उसे दी गई थीं, उन्हें उस ने याद कर लिया था, किंतु पहली बार कैमरे के सामने बोलने के कारण उस के चेहरे पर कोई हावभाव न आ पाए. एक रोबोट की भांति उस ने लाइनें बोल दीं. जाहिर है वह उस औडिशन में नहीं चुनी गई. एक तो अनुत्तीर्ण होने का दुख, ऊपर से एजेंट से अच्छीखासी डांट सुननी पड़ी, वह अलग. एजेंट उसे अलगअलग जगह औडीशन पर भेजता, किंतु कैमरे के सामने आते ही पता नहीं रूहानी को क्या हो जाता. इसी भागदौड़ में 3 माह गुजर गए. घर से जो पैसे लाई थी, वे खत्म होने लगे थे. साथ रह रही अन्य लड़कियों का भी यही हाल था. सभी इस रुपहली दुनिया का हिस्सा बनने आई थीं, किंतु कामयाबी किसी के भी हाथ नहीं लग रही थी.

रूहानी के चेहरे का फायदा उठाने और कैमरे के प्रति उस की झिझक मिटाने हेतु एजेंट ने पहले उस से मौडलिंग करवाने की सोची. नियत समय पर रूहानी मालवीय नगर की गलियों में स्थित मौडलिंग एजेंसी पहुंच गई. वहां भी लड़कियों की लंबी कतार. वहां का एजेंट बेशर्मी से लड़कियों के बदन को छू रहा था. हर लड़की के बदन के हर हिस्से का नाप ले रहा था और जोरजोर से उसे दूसरे लड़के को बताता जा रहा था, जो उसे एक कागज पर लड़कियों के नाम के आगे लिखता जा रहा था.

हद तो तब हुई जब उस ने रूहानी के आगे खड़ी लड़की के नितंब दबा कर पूछा, ‘‘असली हैं?’’

रूहानी के लिए यह सब अप्रत्याशित था. लेकिन कहते हैं न भट्टी में तप कर ही सोना कंचन बनता है. धीरेधीरे रूहानी भी ऐसे कल्चर की आदी हो गई. उस की झिझक खुलने लगी. उस के हावभाव, उस की भावभंगिमा में खुलापन आ गया. छोटेमोटे विज्ञापन कर कुछ पैसा भी आने लगा था. इस शहर में रहना अब रूहानी के लिए संभव होता जा रहा था.

शायद रूहानी के एजेंट ने अपना लक्ष्य पाने को सही मार्ग अपनाया था. कुछ था उस की आंखों में, उस के चेहरे में जो उस एजेंट ने भांप लिया था. रूहानी को उस ने फिर एक टीवी धारावाहिक के औडिशन हेतु भेजा.

इस बार रूहानी के सपने सिर्फ हवाई नहीं थे. रूहानी को एक छोटा रोल मिल गया, लीड ऐक्ट्रैस की ननद की भूमिका निभाने का.

शुरू में रूहानी को यह काम भी और कामों जैसा ही प्रतीत हुआ जैसे दफ्तर जा रही हो. उतनी ही मेहनत, वैसी ही समयसारिणी, बल्कि छुट्टियां उस से कहीं कम. न कोई शनिवार, न कोई इतवार…चाहे बुखार ही क्यों न आ जाए. दवा फांको और चलो काम पर. किंतु जैसेजैसे उस धारावाहिक की टीआरपी बढ़ने लगी, लोग उस के किरदार को पहचानने लगे. रूहानी का मकानमालिक अब उस से तमीज से पेश आता. कभीकभार उस के बच्चे, अपने मित्रों सहित रूहानी के साथ सैल्फी लेने चले आते.

उसे अच्छा लगता जब उस का एजेंट उसे किसी भी वेशभूषा में बाजार जाने से मना करता, ‘‘अब तुम एक सैलिब्रिटी हो, डार्लिंग, यों उठ कर अब तुम मार्केट नहीं जा सकती हो… अपना सामान औनलाइन और्डर कर दिया करो.’’

धारावाहिक करतेकरते रूहानी को 1 साल होने को आ रहा था. इस बीच अपने मातापिता से उस का संपर्क बहुत ही कम रह गया था. क्या करती समय ही नहीं था उस के पास. जब कभी मिलना होता तब उस के मातापिता ही चले आते उस के पास. लेकिन तब भी वह उन के साथ बहुत ही कम समय व्यतीत कर पाती.

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