दुविधा – भाग 1 : किस कशमकश में थी वह?

एमबीए करते ही एक बहुत बड़ी कंपनी में मेरी नौकरी लग गई. हालांकि यह मेरी वर्षों की कड़ी मेहनत का ही परिणाम था फिर भी मेरी आशा से कुछ ज्यादा ही था. हाईटैक सिटी की सब से ऊंची इमारत की 15वीं मंजिल पर, जहां से पूरा शहर दिखाई देता है, मेरा औफिस है. एक बड़े एयरकंडीशंड हौल में शीशे के पार्टीशन कर के सब के लिए अलगअलग केबिन बने हुए हैं. आधुनिक सुविधाओं तथा तकनीकी उपकरणों से लैस है मेरा औफिस.

मेरे केबिन के ठीक सामने अकाउंट्स विभाग का स्टाफ बैठता है. उन से हमारा काम का तो कोई वास्ता नहीं है लेकिन हमारी तनख्वाह, भत्ते, अन्य बिल वही बनाते तथा पास करते हैं. कंपनी में पहले ही दिन अपनी टीम के लोगों से विधिवत परिचय हुआ लेकिन शेष सब से परिचय संभव नहीं था. सैकड़ों का स्टाफ है, कई डिवीजन हैं. उस पर ज्यादातर स्टाफ दिनभर फील्ड ड्यूटी पर रहता है.

मेरे सामने बैठने वाले अकाउंट्स विभाग के ज्यादातर कर्मचारी अधेड़ उम्र के हैं. बस, ठीक मेरे सामने वाले केबिन में बैठने वाला अकाउंटैंट मेरा हमउम्र था. वैसे उस से कोई परिचय तो नहीं हुआ था, बस, एक दिन लिफ्ट में मिला तो अपना परिचय स्वयं देते हुए बोला, ‘‘मैं सुबोध, अकाउंटैंट हूं. कभी भी अकाउंट्स से जुड़ी कोई समस्या हो तो आप बेझिझक मुझ से कह सकती हैं,’’ बदले में मैं ने भी उसे अपना नाम बताया और उस का धन्यवाद किया था जबकि वह मेरे बारे में सब पहले से जानता ही था क्योंकि अकाउंट्स विभाग से कुछ छिपा नहीं होता है. उस के पास तो पूरे स्टाफ की औफिशियल कुंडली मौजूद होती है.

इस संक्षिप्त से परिचय के बाद वह जब कभी लिफ्ट में, सीढि़यों में, डाइनिंग हौल में या रास्ते में टकरा जाता तो कोई न कोई हलकाफुलका सवाल मेरी तरफ उछाल ही देता. ‘औफिस में कैसा लग रहा है?’, ‘आप का कोई बिल तो पैंडिंग नहीं है न?’, ‘आप अखबार और पत्रिका का बिल क्यों नहीं देती?’, ‘आप ने अपनी नई मैडिकल पौलिसी के नियम देख लिए हैं न?’ वगैरहवैगरह. बस, मैं उस के सवाल का संक्षिप्त सा उत्तर भर दे पाती, हर मुलाकात में इतना ही अवसर होता.

मुझे यहां काम करते 2-3 महीने बीत चुके थे. अभी भी अपनी टीम के अलावा शेष स्टाफ से जानपहचान नहीं के बराबर थी. वैसे भी दिनभर सब काम में इतना व्यस्त रहते हैं कि इधरउधर की बात करने का कोई  मौका ही नहीं मिल पाता. हां, काम करतेकरते जब कभी नजरें उठतीं तो सामने बैठे सुबोध से जा टकराती थीं. ऐसे में कभीकभी वह मुसकरा देता तो जवाब में मैं भी मुसकरा कर फिर अपने काम में लग जाती. लेकिन जैसेजैसे दिन बीत रहे थे, मैं ने एक बात नोटिस की कि जब कभी भी मैं अपनी गरदन उठाती तो सुबोध को अपनी तरफ ही देखते हुए पाती. अब वह पहले की तरह मुसकराता नहीं था बल्कि अचकचा कर नीचे देखने लगता था या न देखने का बहाना करने लगता था.

खैर, मेरे पास यह सब सोचने का समय ही कहां था? मेरे सपनों के साकार होने का समय पलपल करीब आने लगा था. घर में मेरे और प्रखर के विवाह की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं. प्रखर और मैं कालेज में साथसाथ पढ़ते थे. वहीं हमारी दोस्ती हुई फिर पता ही नहीं लगा कब हमारी दोस्ती इतनी आगे बढ़ गई कि हम दोनों ने जीवनसाथी बनना तय कर लिया.

घर वालों से बात की तो उन्होंने भी इस रिश्ते के लिए हां कर दी लेकिन शर्त यही थी कि पहले हम दोनों अपनीअपनी पढ़ाई पूरी करेंगे, अपना भविष्य बनाएंगे. फिर शादी की सोचेंगे. पढ़ाई पूरी होते ही प्रखर को भी एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई थी.

एक दिन सुबह सुबोध लिफ्ट में फिर मिल गया. लिफ्ट में हम दोनों ही थे. बिना एक पल भी गंवाए उस ने और दिनों से हट कर सवाल पूछा था, ‘‘आप के घर में कौनकौन है?’’

मुझे उस से ऐसे सवाल की आशा नहीं थी. पूछा, ‘‘क्यों, क्या करेंगे जान कर?’’ मेरा उत्तर भी उस के अनुरूप नहीं था.

‘‘यों ही. सोचा, मां को आप के बारे में क्या बताऊंगा, जब मुझे ही आप के बारे में कुछ पता नहीं है?’’

‘‘क्यों, सब कुछ तो है आप के पास औफिस रिकौर्ड में नाम, पता, ठिकाना, शिक्षा वगैरह,’’ कहते हुए मैं हंस दी थी और वह मुझे देखता ही रह गया.

लिफ्ट हमारी मंजिल पर पहुंच चुकी थी. हम दोनों उतरे और अपनेअपने केबिन की ओर बढ़ गए.

अपनी सीट पर आ कर बैठी तो एहसास हुआ कि सुबोध क्या पूछ रहा था और नादानी में मैं ने उसे क्या उत्तर दे दिया. सब सोच कर इतनी झेंप हुई कि दिनभर गरदन उठा कर सामने बैठे हुए सुबोध को देखने का साहस ही नहीं हुआ. हालांकि उस की नजरों की चुभन को मैं ने दिनभर अपने चेहरे पर महसूस किया था. पता नहीं वह क्या सोच रहा था.

अगले दिन मैं जानबूझ कर लंच के लिए देर से गई ताकि मेरा सुबोध से सामना न हो जाए. उस समय तक डाइनिंग हौल लगभग खाली ही था. मैं ने जैसे ही प्लेट उठाई, अपने पीछे सुबोध को खड़ा पाया. उसी चिरपरिचित मुसकान के साथ, खाना प्लेट में डालते हुए वह धीमे से बोला, ‘‘कल आप ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया?’’

‘‘मम्मी को बताना क्या है, अगले महीने की 20 तारीख को मेरी शादी है. उन्हें साथ ले आइएगा, मिलवा ही दीजिएगा.’’

बेटी को बहू बनाकर कपाड़िया हाउस ले जाएगी Anupama, बरखा का बढ़ेगा पारा

Anupama Written Update In Hindi: रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) स्टारर सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupama) में इन दिनों दीवाली सेलिब्रेशन में पाखी की शादी के कारण बवाल मचता दिख रहा है. जहां एक तरफ बेटी पाखी की करतूत ने वनराज का सिर झुका दिया है तो वहीं अब बरखा का गुस्सा भी पाखी और अधिक पर बरसने वाला है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

पाखी पर बरसा वनराज

अब तक आपने देखा कि बेटी के धोखे से टूटा वनराज गुस्से में पाखी और अधिक को शाह हाउस से बाहर कर देता है. हालांकि अनुपमा और पूरी फैमिली उसे समझाने की कोशिश करते हैं. लेकिन वह नहीं मानता. वहीं पाखी सोचने लगती है कि क्या उसने जल्दबाजी में गलत फैसला तो नहीं ले लिया.

पाखी को कपाड़िया हाउस ले जाएगी अनुपमा

अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि वनराज को अनुज समझाने और पाखी-अधिक को माफ करने की सलाह देगा. लेकिन वनराज उससे कहेगा कि वह पहले उसे अपने बच्चों का बाप नहीं बनने देना चाहता था. पर अब वह पाखी का पिता बन सकता है. दूसरी तरफ बापूजी, अनुज को पाखी और अधिक को कपाड़िया हाउस ले जाने की विनती करेंगे, जिसके चलते ना चाहते हुए भी अनुपमा, पाखी और अधिक को कपाड़िया हाउस ले जाने के लिए राजी हो जाएगी.

बरखा का बढेगा पारा

 

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इसके अलावा ‘अनुपमा’ (Anupama) के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि पाखी और अधिक कपाड़िया हाउस पहुंचेगे, जिसके चलते बरखा का गुस्सा बढ़ जाएगा और वह घर का सामान इधर-उधर फेंकने लगेगी. इसी के साथ वह पाखी और अधिक की शादी के एक साल भी ना होने की चेतावनी देती दिखेगी तो वहीं अनुपमा, अनुज को दोनों की जिम्मेदारी देते हुए कहेगी कि इन्हें संभालने की बात बापूजी ने उसे कही है. हालांकि देखना होगा कि अपकमिंग एपिसोड में शाह और कपाड़िया फैमिली के बीच कौनसा नया ड्रामा होगा.

संपेरन- भाग 3: क्या था विधवा शासिका यशोवती का वार

‘‘मैं ने आप को यहां आने का कष्ट इसलिए दिया जिस से अपने विधवापन का दंड मैं आप के मुख से ही सुन लूं. अपराधी आप के सम्मुख बैठा है न्यायाधीश महोदय, उस का दंड उसे सुना दीजिए.’’

‘‘राजमहिषी, मुझे लज्जित मत कीजिए. मैं आप से क्षमा चाहता हूं कि आप से एक बार भी भेंट किए बिना केवल सामाजिक व धार्मिक आधार पर मैं ने आप के विरुद्ध विषवमन किया.’’

‘‘पुरोहितजी, मैं तो आप के मुख से वही सब कुछ सुनना चाहती हूं जो अप्रत्यक्ष रूप से आप मुझे सुनाते आ रहे हैं. वही गालियां, अपशब्द, कटुवचन आदि.’’

कहतेकहते यशोवती ने पास में पड़ा घूंघट अपने मुख पर लपेट कर केवल अपने नेत्र खुले रहने दिए.

‘‘ओह,’’ चौंक कर कपिल बोला, ‘‘तो आप प्रतिदिन मेरे  प्रवचनों में देवालय में उपस्थित होती रही हैं? धिक्कार है मुझे कि मैं आप को पहचान भी नहीं पाया.’’

‘‘सचमुच आप का ज्ञान अपरिमित है. आप की कूटनीतिक बातों में गांभीर्य है. आप की नीतिज्ञता की मैं पुजारिन हूं. इसीलिए तो मैं आप से विवाह रचाना चाहती हूं.’’

‘‘जी…?’’ कपिल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ.

‘‘जी, हां…आप को मेरे वैधव्य और नारी होने से ही तो चिढ़ है? आप ही मेरे वैधव्य को मिटा सकते हैं. और मेरे पति के रूप में कश्यपपुर की गद्दी पर भी बैठ सकते हैं. मेरे इन हाथों, पैरों, माथे व मांग का सूनापन केवल आप ही दूर कर सकते हैं. कहिए, आप को मेरा प्रस्ताव स्वीकार है?’’

कपिल को अपनी कूटनीतिज्ञता व राजनीतिक उपदेशों की होली जलती प्रतीत हुई. यशोवती ने सचमुच उस के गले में स्वादिष्ठ कबाब के साथ हड्डी अटका दी थी. न उसे निगलते बन रहा था, न उगलते.

‘‘आप मौन क्यों हैं? क्या आप मुझे अपने योग्य नहीं समझते हैं?’’ यशोवती ने मानो नहले पर दहला जड़ दिया.

‘‘नहीं, महादेवी, आप से विवाह रचाने वाला तो अपने जीवन को सफल ही मानेगा…पर मैं सोच रहा था कि…’’

‘‘विधवा से कैसे विवाह रचाया जाए, यही न?’’ यशोवती उसे बिना संभलने का अवसर दिए लगातार वार पर वार कर रही थी, ‘‘विधवा विवाह तो हमारे कश्मीरी समाज में पहले से होते रहे हैं. स्वयं आप को अपने धर्मग्रंथों में सहस्रों उदाहरण मिल जाएंगे.’’

‘‘मैं तो सोच रहा हूं कि आप से विवाह रचा कर क्या मेरी कूटनीतिक पराजय नहीं हो जाएगी?’’ कपिल का स्वर पश्चात्तापपूर्ण था.

‘‘ओह, तो आप को यह चिंता है कि लोग क्या कहेंगे? तो ठीक है आप यहीं राजमहलों में रहिए. मैं घोषणा करा देती हूं कि आप कश्यपपुर छोड़ कर कहीं चले गए हैं.’’

‘‘महादेवी, तब तो मेरी स्थिति उस कुत्ते जैसी हो जाएगी जो न घर का रहा, न घाट का. आप मुझे कुछ सोचने का अवसर दीजिए.’’

‘‘जैसी आप की इच्छा. आज से ठीक चौथे दिन अर्थात विधिवत राज्यारोहण से एक दिन पूर्व तक मैं आप के निर्णय की प्रतीक्षा करूंगी.’’

‘‘जी,’’ मन ही मन मुक्ति की संभावना से वह प्रसन्न हो उठा, ‘मूर्खा कहीं की, मुझ से टक्कर लेने चली है? यहां से बाहर निकल कर इसे ऐसा बदनाम कर डालूंगा कि जिंदगी भर नहीं भूलेगी.’

‘‘एक बात और. यदि विवाह कर आप मुझे कहीं अन्यत्र ले जाना चाहें तो मैं उस के लिए भी सहर्ष तैयार हूं. मेरा लक्ष्य राज्य सिंहासन प्राप्त करना नहीं, केवल आप के प्रेम में पगे रहना है. आप की बौद्धिक श्रेष्ठता ने मुझे अत्यधिक प्रभावित कर दिया है, इसलिए यह राज्य, इस से प्राप्त सम्मान, सब गौण हैं. आप को प्राप्त करने के लिए मैं सब को लात मार सकती हूं.’’

‘‘ओह, राजमहिषी, आप को प्राप्त कर मैं वास्तव में गौरव का अनुभव करूंगा,’’ कहतेकहते वह सहसा मौन हो गया. उस ने एक भरपूर दृष्टि यशोवती पर डाली. वैधव्य का सूनापन उस के मुख पर अंकित होते हुए भी यशोवती में एक अनोखी तेजस्विता, एक गर्वीला मान था. उस के सांचे में ढले मुख पर ओस में भीगे गुलाब की पंखडि़यों जैसी ताजगी थी.

उस की काली भौंहों, लंबी, काली व भारी केशराशि के अतिरिक्त उस के अधरों व गालों पर किसी चित्रकार की तूलिका से निर्मित स्वाभाविक लालिमा थी. अपने उन्नत यौवन व दूधिया तन के कारण वह बैठी हुई कोई जीवित प्रतिमा प्रतीत हो रही थी.

कपिल को विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई युवती इतनी सुंदर भी हो सकती है, जबकि कश्मीर में एक से एक सुंदर युवतियां उस के संपर्क में आ चुकी थीं. उसे अपना निर्णय परिवर्तित करना पड़ा. उस का मन कह उठा, ‘नहीं…नहीं, वह इस सरल व भोली युवती को कभी धोखा नहीं दे सकता.’

‘‘अद्भुत, अवर्णनीय.’’

‘‘ऐं, क्या बोल रहे हैं आप?’’ मधुर स्मिति बिखेरते हुए यशोवती ने प्रश्न किया.

‘‘महादेवी, आप सचमुच किसी कवि की कविता जैसी निर्मल व पवित्र हैं. वास्तव में मुझे आप का प्रस्ताव स्वीकार है. यदि पहले ही मैं आप के संपर्क में आ जाता तो यह आंदोलन कभी  प्रारंभ न करता.’’

‘‘सोच लीजिए, अपने निर्णय पर कहीं आप को पश्चात्ताप न करना पड़े.’’

‘‘जी, नहीं. मैं ने यह अभियान प्रारंभ किया था अपने अस्तित्व को बचाने व अपने प्रभाव को अक्षुण्ण रखने के लिए. अब आप देखिएगा कि राजनीति का यह पंडित किस प्रकार आप को जनसहयोग दिलाता है.’’

‘‘क्षमा कीजिए, पुरोहितजी, पुरुषों पर मुझे तनिक भी विश्वास नहीं रह गया है. इस क्षण एक निर्णय ले कर दूसरे ही क्षण वे दूसरी विरोधी बात स्वीकार कर सकते हैं. आप तो मुझे लिख दीजिए कि आप मुझ से विवाह के लिए सहमत हैं तथा मेरे विरुद्ध प्रारंभ अभियान को आप वापस लेने को तैयार हैं. आप जानते ही हैं, यह मेरे जीवन का प्रश्न है. मैं सचमुच आप की दासी बन कर आप की सेवा करूंगी,’’ मुग्धा नायिका की भांति यशोवती ने ताड़ का पत्ता व सरिए की कलम आगे रख दी. उस ने एक तीखी चितवन कपिल पर डाली.

‘‘यशोवती, मेरी हृदयेश्वरी, तुम्हें, अभी तक मुझ पर विश्वास नहीं हुआ? लो, तुम जो चाहो लिख लो, मैं ने अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं.’’

‘‘दिव्या, तनिक अंगूर का रस लाना. मैं पुरोहितजी को अपने हाथों से पिलाऊंगी. आप ने ही तो अपने प्रवचन में कश्यपपुर की विशेषताओं में से एक अंगूर भी

बताई थी.’’

‘‘हां, मैं तो भूल ही गया था कि तुम मेरी शिष्या भी हो, पर अभीअभी मैं यहां की एक विशेषता और ढूंढ़ चुका हूं और वह है रानी यशोवती, मेरी हृदयेश्वरी, मेरी प्रियतमा…’’ कहतेकहते भावनाओं में बहते हुए कपिल ने यशोवती के गोरेगोरे श्वेत कबूतरों जैसे पैरों को चूम लिया.

उसी पल यशोवती के कक्ष का दरवाजा खुला. एकएक कर शंकराचार्य देवालय में यशोवती के विरुद्ध बढ़चढ़ कर बोलने वाले कपिल के भक्त आ खड़े हुए. उन्हें देख कर यशोवती अपने स्थान से उठ खड़ी हुई. उस ने अपने पैर के दोनों पंजे पीछे हटाने चाहे, पर कपिल उन से और चिपट गया.

‘‘थू है तुम पर, पुरोहित, हमें तुम से ऐसी आशा न थी. जिस के विरुद्ध तुम ने कश्यपपुर की जनता को भड़काया उसी के पैरों में पड़ कर तुम उस से प्रेम जता रहे हो? धिक्कार है तुम्हें,’’ जयेंद्र क्रोध से बोला.

‘‘कश्यपपुर के निवासियो, अपने पुरोहित की एक और करतूत देखिए. इस दुष्ट ने यशोवती से विवाह रचाने और अपना आंदोलन वापस लेने का भी वचन दिया है, देखिए,’’ यशोवती की परिचारिका दिव्या ने कपिल की हस्ताक्षरयुक्त घोषणा सामने रख दी.

‘‘ओह, यह नराधम इतनी नीचता पर उतर आया. आप इसे हमें सौंप दीजिए. हम इस की बोटीबोटी अलग कर देंगे. महादेवी, हम आप को कश्यपपुर की शासिका स्वीकार करते हैं.’’

सब के चले जाने पर यशोवती मुसकराई. वह बोली, ‘‘पुरोहित, तुम इतने मूढ़ होगे, मुझे आशा न थी. शत्रु के घर में पदार्पण से पूर्व कुछ सावधानी तो तुम्हें रखनी चाहिए थी. अपने गर्व, दर्प व ज्ञानी बन जाने के झूठे विश्वास ने तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ा.

‘‘मेरे विवाह प्रस्ताव पर तेरी बाछें खिल गईं. मूर्ख, पूरे कश्यपपुर में क्या तू ही बचा था जिस से मैं पुनर्विवाह रचाती? अपने एक साधारण जन से विवाह कर क्या मुझे अपने पद व गौरव की हंसी उड़वानी थी?

‘‘तुम्हारे पतन पर मुझे खेद है, पर मैं ने तुम से ही सीखा राजनीति का अस्त्र प्रयुक्त किया है. तुम ने ही तो एक बार कहा था, ‘शत्रु को शत्रु के हथियार से ही मारना चाहिए.’ ले जाओ इस सांप को और बाहर छोड़ आओ. मैं ने इस के विषैले दांत तोड़ डाले हैं.’’

वास्तव में कपिल उसी रात्रि को कश्यपपुर से गायब हो गया. विधवा यशोवती पूरे 15 वर्ष तक कश्यपपुर पर एकछत्र राज्य करती रही.

संपेरन- भाग 1: क्या था विधवा शासिका यशोवती का वार

‘‘तुम्हारी सूचना विश्वसनीय तो है?’’ शंकराचार्य मंदिर के मुख्यद्वार पर पुरोहित के पांव सहसा रुक गए.

‘‘स्वामी जयेंद्र ने आज तक आप को अविश्वसनीय सूचना नहीं दी है.

1-2 बार नहीं, जितनी बार भी आप पूछेंगे, मेरी सूचना अपरिवर्तित रहेगी कि विधवा यशोवती कश्यपपुर (कश्मीर) की शासिका मनोनीत की गई हैं.’’

‘‘तो क्या राज्य के पंडितों, ज्ञानीध्यानी व्यक्तियों और शिक्षाविदों को एक विधवा की अधीनता स्वीकार करनी होगी? यह बात क्या नीति, वेद, उपनिषद, धार्मिक शिक्षाओं व शालीनता के विपरीत नहीं होगी? प्रात: जीवनचर्या प्रारंभ करने से पूर्व राज्य निवासियों द्वारा ईश्वर के साथ ऐसी स्त्री का  नाम उच्चारित करना क्या पापाचार नहीं होगा?’’ कपिल का स्वर आक्रोशपूर्ण हो गया.

‘‘विप्रश्रेष्ठ, इस से तो भारत व अन्य पड़ोसी  राज्यों में भी हमारी हेठी होगी. सब लोग हमारी बुद्धि व मानसिक संतुलन पर तरस खाएंगे,’’ पुरोहित के साथ चलती भीड़ में से कोई बोल उठा.

‘‘निश्चय ही राज्य की सधवाएं इस प्रस्ताव का घोर विरोध करेंगी,’’ मुख में तांबूल दबाए, चंचल नयनों में काजल व होंठों पर लाल मिस्सी सज्जित युवती का स्वर सुन कर कपिल मन ही मन हर्षित हो उठा.

‘‘एक तो नारी,

ऊपर से विधवा? शिव…शिव…ऐसी शासिका के राज्य में रहने की अपेक्षा आत्महत्या कर लेना या राज्य से कहीं अन्यत्र पलायन कर लेना ही हमारे लिए उचित रहेगा,’’ एक अन्य पुरुष स्वर ने भी कपिल का समर्थन किया.

‘‘यदि आप सब लोगों की सहमति है तो मैं रानी यशोवती के सिंहासनारोहण के विरुद्ध अपने आत्मदाह की घोषणा करता हूं.’’

पुरोहित कपिल की घोषणा का भीड़ ने तुमुल हर्ष व तालियों से स्वागत किया.

‘‘जयेंद्र, तुम कश्यपपुर के प्रत्येक स्त्रीपुरुष तक मेरा यह  प्रण पहुंचा दो कि यदि विधवा यशोवती को राज्य की गद्दी पर बैठाया गया तो राज्यारोहण के दिन ही कोंसरनाग से उत्पन्न वितस्ता (झेलम) की लहरों में डूब कर मैं

अपने प्राण दे दूंगा.’’

‘‘महाज्ञानी, अपने प्रण के साथ हमारे इस निर्णय को भी जोड़ लें कि आप के बाद भी कश्यपपुर का पुरुष समुदाय प्रतिदिन इसी प्रकार अपने प्राण देता रहेगा, जब तक वह दुष्टा राज्य की गद्दी से स्वयं विमुख नहीं हो जाती अथवा उसे सिंहासन से हटा नहीं दिया जाता.’’

शंकराचार्य मंदिर में एक निश्चित समय पर संध्या काल में कपिल द्वारा प्रतिदिन 1-2 घंटे तक पारलौकिक ज्ञान व दर्शन जैसे विषयों पर प्रवचन दिया जाता था. उस के शब्दों में चमत्कार था. उस की वाणी ओजस्वी थी. देवा-लय के निकट

के स्त्रीपुरुष बड़ी संख्या में इन प्रवचनों को सुनने के लिए एकत्रित होते थे.

धर्म व दर्शन के साथसाथ कपिल नीति व कूटनीति का भी पंडित था. अपने गहन अध्ययन के बल पर उस ने चाणक्यनीति का एकएक शब्द कंठस्थ कर लिया था. इन्हीं सब बातों के आधार पर राज्य की नीतियों में उस का अत्यधिक हस्तक्षेप था.

कश्यपपुर के शासकों का पुरोहित कपिल के बढ़ते प्रभाव पर चिंतित होना स्वाभाविक था, पर साथ ही यह भी एक तथ्य था कि उस के सहयोग से शासकों को सफलता भी प्राप्त हो जाती थी. अत: ब्राह्मणवाद के बढ़ते प्रभाव के साथ शासकों की सफलता निश्चित होती जाती थी.

संक्षेप में, शासकों व पुरोहित दोनों ने ही एकदूसरे के अस्तित्व को स्वाभाविक रूप में स्वीकार कर लिया था, पर यशोवती के शासिका बन जाने से कपिल को अपना प्रभाव समाप्त होता दिखाई दिया. वह पुरुषोचित अहं व दंभ के कारण एक नारी का आधिपत्य कैसे सहन कर सकता था.

कपिल के साथ कश्यपपुर की जनता ने यशोवती के राज्यारोहण को अस्वीकार कर दिया था. पुरोहित के मस्तिष्क में इस के लिए कुछ कुतर्क थे, पर भीड़ ने तो केवल अंधानुभक्ति के वशीभूत हो कर ही यह निर्णय लिया था. परिणामस्वरूप यशोवती के विरुद्ध गालियों व कटु वचनों का प्रयोग किया गया. उस की हंसी उड़ाई गई. उस के संबंध में निम्नस्तरीय बातें कही गईं.

शंकराचार्य मंदिर में जमा भीड़ में नारियों की भी अच्छीखासी संख्या थी, पर उन में से अधिकतर का उद्देश्य केवल कपिल के प्रवचनों को सुनना तथा घर के उबाऊ वातावरण से थोड़ी देर के लिए मुक्ति प्राप्त करना था. अत: कपिल बिना किसी औपचारिकता के उन के रूखेसूखे जीवन का एक मनोरम व अविभाज्य अंग बन चुका था. प्रत्येक मूल्य पर वे आनंद के इस साधन को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहती थीं. इसीलिए पुरुषों के साथ स्वर मिला कर नारियों ने भी यशोवती को वारांगना सिद्ध कर दिया.

देवालय की भीड़ में एक युवती बिलकुल मौन थी. कपिल उस की सहमति प्राप्त करने के लिए, यशोवती के विरुद्ध विषवमन करते हुए बारबार उस की ओर निहार रहा था. उसे मौन देख कर वह दूसरी ओर दृष्टि मोड़ लेता था. अपनी चालढाल व वेशभूषा से वह कुलीनवर्गीय लग रही थी.

अपने लंबे चोगे के साथ उस ने अपने मुख, नाक तथा होंठों को एक पारदर्शक रेशमी घूंघट से ढक रखा था. घूंघट के बीच टुकुरटुकुर ताकती उस की आंखों में एक अनोखा आकर्षण था. उन में सागर की गहराई थी. कई सुरापात्रों की लालिमा जैसे उन में सिकुड़सिमट गई थी. अपने निकट खड़ी परिचारिका के कानों में वह कुछ फुसफुसाई.

‘‘महोदय,’’ कपिल को संबोधित करते हुए परिचारिका बोली, ‘‘आप में से किसी ने कभी रानी यशोवती से भेंट भी की है?’’

‘‘नहीं तो,’’ सकुचा कर कपिल ने प्रत्युत्तर दिया.

‘‘क्यों न अपना अभियान प्रारंभ करने से पूर्व आप एक बार उन से भेंट कर लें.’’

‘‘महादेवी, रथ स्वयं कभी संचालित नहीं होता, बैल या घोड़े उसे चलाते हैं. अत: रथ तो अपने स्थान पर मौन खड़ा रहता है. वह पुकारपुकार कर अपने संचालनकर्ता को नहीं बुलाएगा. यशोवती व मुझ में आप को कौन क्या प्रतीत होता है, यह मैं आप पर ही छोड़ता हूं. मेरा निश्चय अटल है. वितस्ता की जलराशि जल्दी ही मेरा समाधिस्थल बनेगी.’’

घूंघट ओढ़े युवती फिर भी मौन खड़ी रही.

पुरोहितवाद का विषैला जादू शीघ्र कश्यपपुर की जनता के सिर चढ़ कर बोला. रानी यशोवती के विरुद्ध अचानक ही नगर के चतुर्मार्गों व राजपथों पर जनता का आक्रोश फूट पड़ा, प्रतिदिन नए जुलूसों, भाषणों व गोष्ठियों द्वारा यशोवती को शासिका बनाए जाने के विरुद्ध तीव्र लोकमत प्रकट किया गया.

आंदोलनकर्ता मुख्य रूप से ‘विधवा रानी नाक कटानी, ‘एक ध्येय, उद्देश्य बनाओ, यशोवती से देश ब

चाओ’ अथवा ‘जब तक है सांसों में सांस, नहीं चलेगा विधवा राज’ जैसे नारों से कश्यपपुर को गुंजाते रहे.

आंदोलनकर्ताओं पर जब कुछ अत्याचार किए गए तो आंदोलन और भी अधिक भड़क उठा. लगता था कि कपिल की सफलता असंदिग्ध है.

एक रात्रि को दूसरे प्रहर में कपिल शंकराचार्य मंदिर में निद्रा में लीन था. दिन भर यशोवती विरोधी अभियान के कारण वह थक गया था. उस के अन्य साथी भी निद्रा में मग्न थे. अचानक किसी ने उसे झिंझोड़ कर जगा दिया. पूरी तरह नींद खुलने पर उस ने दीपक के प्रकाश में 4 राज्य सैनिकों को अस्त्रशस्त्रों से सुसज्जित देखा.

‘‘कहिए, क्या बात है?’’

‘‘तुम्हें इसी पल हमारे साथ चलना है.’’

‘‘पर कहां व क्यों?’’

‘‘जनसाधारण के प्रश्नों के उत्तर देना शासनाधिकारियों के लिए आवश्यक नहीं है. हमें केवल इतना ज्ञात है कि आनाकानी करने पर हम तुम्हें जबरदस्ती ले जाएंगे. ऐसा ही हमें आदेश है. आदेशकर्ता का नाम भी हम नहीं बताएंगे.’’

‘‘उस का नाम तो मैं ज्ञात कर लूंगा, पर क्या तुम मेरे प्राणों की सुरक्षा का वचन देते हो?’’

‘‘वचन? शासन के वचन का क्या तुम कोई मूल्य समझते हो? हम तो प्रतिपल वचन दे कर उसी क्षण उसे तोड़ भी डालते हैं. फिर भी हम तुम्हें आश्वस्त कर सकते हैं कि अभी तुम्हारे प्राण लेने की कोई योजना नहीं है. वैसे भी तुम ने राजनीतिक आंदोलन प्रारंभ करने से पूर्व क्या शासन को कोई सूचना दी थी या उस की अनुमति मांगी थी? यदि नहीं तो तुम्हें अपने प्राणों की आशा तो उसी पल छोड़ देनी चाहिए थी. चलो, उठ कर खड़े हो जाओ.’’

‘‘मैं एक बार अपने विश्वस्त मित्रों व साथियों से तो बात कर लूं.’’

‘‘मित्र व साथी?’’ एक सैनिक अट्टहास कर उठा, ‘‘इन्हीं के बल पर क्या तुम ने राज्य क्रांति का बीड़ा उठाया है? तुम्हारे ‘साथी व मित्र’ हमारे आगमन का समाचार सुनते ही नौ दो ग्यारह हो गए हैं. विश्वास न हो तो चारों ओर दृष्टि डाल कर देख लो. वास्तव में एक क्षुद्र भुनगा होते हुए, कश्यपपुर साम्राज्य रूपी पर्वतमाला को चूरचूर करने का निर्णय ले कर तुम ने अपनेआप को सब की हंसी का पात्र बना लिया है. चलो, शीघ्रता करो.’’

‘‘पर यदि मेरे प्राण ले लिए जाएं तो यह तथ्य मेरे सगेसंबंधियों तक तो पहुंचा दिया जाए.’’

‘‘प्राणों की चिंता में घुलने वाले कापुरुष, तुम्हें अपने प्राण इतने ही प्यारे थे तो जनता का नेतृत्व क्यों संभाला था? क्यों उसे भ्रमित किया? मैं विश्वास दिलाता हूं कि तुम्हारे प्राण लिए जाएंगे तो कश्यपपुर की जनता ही नहीं, पड़ोसी देशों तक इस की सूचना पहुंचेगी. अभी तुम इतने महान नहीं बने हो कि तुम से भयभीत हो कर शासन तुम्हें गुप्त रूप से प्राणदंड दे दे. सैनिको, इसे उठा कर बाहर पालकी में ले जा कर डाल दो.’’

आग और धुआं- भाग 2: क्या दूर हो पाई प्रिया की गलतफहमी

उस पल मुझे निशा को अपने पति को छूना अच्छा नहीं लगा. सच तो यह है कि मुझे निशा ही अच्छी लगना बंद हो गई. पार्टी में मेरा उस से कई बार आमनासामना हुआ, पर मैं उस से सहज और सामान्य हो कर बातें नहीं कर पाई.

निशा को ले कर मेरे मन में पैदा हुआ मैल अमित की नजरों से ज्यादा दिन नहीं छिपा रहा. इस विषय पर एक शाम उन्होंने चर्चा छेड़ी, तो मैं ने कई दिनों से अपने मन में इकट्ठा हो रहे गुस्से व शिकायतों का जहर उगल दिया.

‘‘शादी हो जाने के बाद समझदार इनसान अपनी पुरानी सहेलियों से किनारा कर लेते हैं. अब आफिस में अलग से इश्क लड़ाने का चक्कर तुम खत्म करो, नहीं तो ठीक नहीं होगा,’’ मुझे बहुत गुस्सा आ गया था.

‘‘तुम मुझ पर शक कर रही हो,’’ अमित ने जबरदस्त सदमा लगने का नाटक किया.

‘‘मैं ही नहीं, इस बात का सच तुम्हारा पूरा आफिस जानता है.’’

‘‘प्रिया, तुम लोगों की बकवास पर ध्यान दे कर अपना और मेरा दिमाग खराब मत करो.’’

‘‘मेरे मन की सुखशांति के लिए तुम्हें निशा से किसी भी तरह का संबंध नहीं

रखना होगा.’’

‘‘तुम्हारे आधारहीन शक के कारण मैं अपने ढंग से जीने की अपनी स्वतंत्रता को खोने के लिए तैयार नहीं हूं.’’

‘‘निशा का आज से मेरे घर में घुसना बंद है और अगर तुम ने कभी उस के फ्लैट में कदम रखा, तो मैं यहां नहीं रहूंगी.’’

‘‘मुझे बेकार की धमकी मत दो, प्रिया. अगर तुम ने निशा के साथ कभी भी जरा सी बदतमीजी की तो मुझ से बुरा कोई न होगा.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि तुम्हें निशा की ज्यादा और मेरी भावनाओं की चिंता कम है.’’

‘‘तुम यों आंसू बहा कर मुझे ब्लैकमेल नहीं कर सकती हो. इस विषय पर और आगे बहस नहीं होगी हमारे बीच. मैं तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा हूं.’’

‘‘मुझे अपने दिल की रानी मानते हो तो निशा से संबध तोड़ लो.’’

‘‘तुम्हारे जैसी बेवकूफ औरत से कौन मगज मारे,’’ गुस्से से आगबबूला हो कर अमित घर से बाहर चले गए.

मेरी इच्छा व भावना की कद्र करते हुए मेरे एक बार कहने पर अमित फौरन निशा से दूर हो जाएंगे, मेरी इस सोच को उन्होंने उस दिन गलत साबित किया. उन की जिंदगी में कोई दूसरी लड़की हो, यह बात मेरे लिए असहनीय थी. उन के दिल पर सिर्फ मेरा हक था. निशा के साथ संबंध समाप्त करने से इनकार कर के उन्होंने मुझे जबरदस्त झटका दिया था.

निशा का हमारे घर आना जारी रहा. मैं उस की उपस्थिति में नाराजगी भरा मौन साध लेती. उन का आपस में हंसनाबोलना असहनीय हो जाता तो सिरदर्द का बहना बना कर अपने शयनकक्ष में जा लेटती.

निशा का मेरे घर में अब स्वागत नहीं है, यह बात अपने हावभाव से स्पष्ट करने में मैं ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

निशा पर तो मेरे इस मौन विरोध का खास प्रभाव नहीं पड़ा, पर अमित बुरी तरह से तिलमिला गए. निशा को ले कर हमारे बीच रोज लड़ाईझगड़ा होने लगा.

मुझे इस बात का सख्त अफसोस था कि इन झगड़ों से या मेरे आंसू बहा कर रोने से अमित अप्रभावित रहे. उन का अडि़यल रुख मेरी दृष्टि में उन के मन में चोर होने का सुबूत था. क्रोध और ईर्ष्या की आग में सुलगते हुए मैं रातदिन अपना खून जलाने लगी.

हमारे बीच जबरदस्त टकराव का यह खराब दौर करीब 2 महीनों तक चला. फिर अचानक मेरे मन को उदासी और निराशा के कोहरे ने घेर लिया.

मैं अपनेआप में सिमट कर जीने लगी. मशीनी अंदाज में घर का काम करती. अमित कुछ समझाने की कोशिश करते, तो मेरी समझ में कुछ न आता. तब या तो मैं थकेहारे से अंदाज में उठ कर घर के किसी अन्य हिस्से में चली जाती या मेरी आंखों से टपटप आंसू गिरने लगते. वे कभीकभी मुझे डांटते भी, पर मैं किसी भी तरह की प्रतिक्रिया दर्शाने की शक्ति अपने अंदर महसूस नहीं करती. सच तो यह है कि अमित का सान्निध्य ही मुझे अच्छा नहीं लगता.

मेरा स्वास्थ्य निरंतर गिरता देख मेरे मायके व ससुराल वाले बहुत चिंतित हो उठे. हमारे दांपत्य संबंध किसी निशा नाम की लड़की के कारण बिगड़े हुए हैं, इस तथ्य से वे पहले ही परिचित थे.

जब अमित को वे सब निशा से बिलकुल कट जाने की बात डांटफटकार के साथ समझाते तो मुझे बड़ा सुकून व सहारा मिलता.

मेरे ‘डिप्रैशन’ ने सब को हिला कर रख दिया. अमित पर निशा से दूर हो जाने के लिए जबदस्त दबाव बना. पहले की तरह वे किसी से बहस या झगड़े में तो नहीं उलझे, पर उन्होंने अपने को बेकुसूर कहना जारी रखा. निशा से वे सब संबंध समाप्त कर लेंगे, ऐसा आश्वासन भी कोई उन के मुंह से नहीं निकाल सका. उदासी के कोहरे को चीर कर यह तथ्य मेरे दिलोदिमाग में कांटे की तरह अकसर चुभता.

‘‘प्रिया को कुछ दिन के लिए हम घर ले जा रहे हैं,’’ मेरे मातापिता के इस प्रस्ताव का अमित ने एक बार भी विरोध नहीं किया.

‘‘मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा खराब वक्त कभी हमारे वैवाहिक जीवन में आएगा, प्रिया. तुम वह लड़की नहीं रहीं जिसे मैं ने हमेशा दिलोजान से ज्यादा चाहा. अपने मन में बैठे शक के बीज को जब तुम सदा के लिए जला कर राख करने को तैयार हो जाओ, तब मैं तुम्हें लेने चला आऊंगा. अपना ध्यान रखना,’’ विदा करते वक्त अमित की आंखों में मैं ने आंसू तो देखे, पर उन्होंने निशा से दूर होने का वादा मुंह से नहीं निकाला.

शादी के सिर्फ 4 महीने बाद मैं निराशा, दुखी और उदास हाल में अमित से दूर मायके रहने आ गई. मेरे घर वालों के साथसाथ जो भी मुझे से मिलने आता अमित को बुरा कहता. उन सब के सहानुभूति भरे शब्द मुझे बारबार रुलाते. यह भी सच है कि मेरी समस्या को हल करने का सार्थक सुझाव किसी के भी पास नहीं था.

अमित फोन पर मेरा हालचाल लगभग रोज ही पूछते. मैं अधिकतर खामोश रह कर उन की बातें सुनती. उन्होंने निशा के मामले में अपने को बेकुसूर कहना जारी रखा. उस से संबंध तोड़ने को वे अभी भी तैयार नहीं थे. ऐसी स्थिति में उन्हें समझाने के सारे प्रयास निरर्थक साबित होने ही थे.

मेरा डिप्रैशन धीरेधीरे दूर होने लगा. भूख खुली और नींद ठीक हुई, तो स्वास्थ्य भी सुधरा. मेरी संवेदनशीलता लौटी तो निशा को ले कर मन फिर से टैंशन का शिकार हो गया.

अंतिम प्रहार- भाग 1: क्या शिवानी के जीवन में आया प्यार

उस की सहकर्मी दीप्ति के शब्द उस के कानों में अभी तक गूंज रहे थे, ‘अब क्या करेगी यह शादी? सिर के बाल चांदी होने लगे. 30 को पार कर गई. यह शादी की उम्र थोड़ी है.’

लंच का समय था. स्कूल की सभी अध्यापिकाएं साथ में बैठ कर खाना खा रही थीं. सब एकदोचार के गु्रप में बंटी हुई थीं. शिवानी अपनी 3 सहेलियों के साथ एक गु्रप में थी. औरतों की जैसी आदत होती है, खाते समय भी चुप नहीं रह सकतीं. सभी बातें कर रही थीं. अपनी क्लास के बच्चों से ले कर पिं्रसिपल व सहकर्मी अध्यापिकाओं तक की, घर से ले कर पति, बच्चों और सास तक की बातें कर रही थीं. अंत में हमेशा की तरह बात घूम कर शिवानी के ऊपर आ कर टिक गई.

निकिता ने कहा, ‘‘शिवानी, तू कुछ नहीं बोल रही है?’’‘‘क्या बोले बेचारी? शादी तो की नहीं. न बच्चा, न पति, न सासननद. किस की बुराई करे बेचारी. पता नहीं कब करेगी शादी? उम्र तो निकली जा रही है,’’ संजना ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा.

तभी दीप्ति ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा था, ‘अब क्या करेगी यह शादी…’ उस के ये वाक्य शिवानी के कानों में गरम लोहे की तरह घुसते चले गए थे. पहले ही कम बोलती थी. दीप्ति के वाक्यों ने तो उस के हृदय पर पत्थर रख कर मुंह पर ताला जड़ दिया था. उस के मुख पर हजार रेगिस्तानों की सी वीरानी और गरम धूल की परतें जम गई थीं. आंखें जड़ हो कर बस खाने की प्लेट पर जड़ हो गई थीं. दीप्ति की बात पर निकिता और संजना भी हैरान रह गई थीं. उसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए थी. शिवानी की अभी तक शादी नहीं हुई थी, तो उस में उस का क्या दोष था. सब की अपनीअपनी मजबूरियां होती हैं, शिवानी की भी थी. तभी तो अब तक उस की शादी नहीं हो पाई थी.

वे चारों हमउम्र थीं, सहकर्मी थीं. परंतु उन में अकेली शिवानी ही अविवाहिता थी. बाकी तीनों न केवल शादीशुदा थीं बल्कि तीनों के बच्चे भी थे. उन के बीच घरपरिवार और शादी को ले कर बातें होती ही रहती थीं. सभी शिवानी को शादी करने की सलाह देती रहती थीं परंतु इतनी तल्ख बात आज से पहले कभी किसी ने नहीं कही थी.

शिवानी अंतर्मुखी स्वभाव की थी. कम बोलती थी. अपना दुखदर्द भी किसी से नहीं बांटती थी. उस दिन भी दीप्ति की तल्ख बात का उस ने कोई जवाब नहीं दिया. परंतु उस का दिमाग सनसना गया था. क्या अब उस की शादी नहीं होगी? क्या वह बूढ़ी हो गई थी? बाल पकना क्या बुढ़ापे की निशानी है?

आज तक उस ने किसी लड़के से दोस्ती नहीं की, प्रेम करना तो बहुत दूर की बात थी. पारिवारिक संस्कारों और अंतर्मुखी स्वभाव के कारण वह लड़कों से खुल कर बात नहीं कर पाई. वह सुंदर थी. कई लड़के उस के जीवन में आए, उस से प्रेम निवेदन भी किया, उस ने उन का प्यार स्वीकार भी किया, परंतु जब लड़के एक सीमा से आगे बढ़ कर उसे बिस्तर पर लिटाना चाहते, वह भाग खड़ी होती. ‘यह सब शादी के बाद,’ वह कहती, तो लड़के उसे घमंडी, दकियानूसी और बेवकूफ लड़की समझ कर छोड़ देते.

लिहाजा, 30 वर्ष की उम्र तक उस का कोई स्थायी बौयफ्रैंड न बन सका, जिस के साथ वह घर बसाने की बात सोच सकती. अब तो कमउम्र के लड़के उस से दूर भागने लगे थे और उस की उम्र के दायरे वाले आदमी शादीशुदा थे. मां भी उस की शादी के बारे में नहीं सोचती थी. इस में मां का दोष नहीं था. वह डरती थी कि शादी के बाद शिवानी जब अपने घर चली जाएगी तो वह किस के सहारे जीवन व्यतीत करेगी. उन की जीविका का कोई साधन नहीं था. जबकि उन का लड़का था और उस की पत्नी थी. दोनों मां के साथ पुश्तैनी घर में रहते थे. उस के भाई को पिता की जगह पर अनुकंपा के आधार पर नौकरी भी मिली हुई थी. पिता के घर में मां के साथ रहता था परंतु अपनी तनख्वाह का एक पैसा भी मां को नहीं देता था. मां का गुजारा उन की पैंशन और शिवानी की कमाई से चलता था. एक ही घर में 2 परिवार रहते थे. मांबेटी और बेटाबहू. कैसी विडंबना थी?

मां किस तरह बेटी के साथ भेद करती है और बेटे को महत्त्व देती है, यह पहली बार शिवानी को तब पता चला जब उस के पिता की मृत्यु हुई. वह सरकारी सेवा में गु्रप बी औफिसर थे और सेवानिवृत्ति के पहले ही उन की मृत्यु हो गई थी. ग्रैच्युटी,  इंश्योरैंस, जीपीएफ आदि का कुल 20 लाख के लगभग मिला था. सारा पैसा मां ने एमआईएस (मंथली इंकम स्कीम) में डाल दिया था. 20 हजार के लगभग मां की पैंशन बंधी थी. कम नहीं थे.

बाप की जगह पर जब अनुकंपा के आधार पर नौकरी की बात आई, तो सब ने यही सलाह दी कि बेटी शिवानी यह नौकरी कर लेगी. वह 22 साल की थी और ग्रेजुएट थी. आसानी से उसे गु्रप ‘सी’ की नौकरी मिल जाती और उस का भविष्य संवर जाता. भाई छोटा था और उस का ग्रेजुएशन भी पूरा होने में एक साल बाकी था. ग्रेजुएशन के बाद भविष्य में वह कोई अच्छी नौकरी पा सकता था.

सब की बातें सुनने के बाद मां ने अपना निर्णय सुनाया, ‘‘बेटी बाप की जगह नौकरी करेगी तो हमें क्या मिलेगा? एक दिन वह शादी कर के ससुराल चली जाएगी. उस की तनख्वाह ससुराल वालों को जाएगी. बेटे को पढ़लिख कर भी नौकरी नहीं मिली तो उस का क्या होगा? सो, नौकरी बेटा ही करेगा, चाहे जो हो जाए.’’

लोगों ने बहुत समझया परंतु मां अपने निर्णय से नहीं डिगी. विभाग में आवेदन किया तो उन्होंने बेटे की कम उम्र और शिक्षा को ले कर प्रश्न खड़े कर दिए. मां ने बड़े अधिकारी से मिल कर बात की, तो उन्होंने रास्ता सुझया कि वे बेटे के ग्रेजुएशन तक इंतजार कर सकते थे. लिहाजा, मामला एक साल तक अधर में लटका रहा. जब गौरव का ग्रेजुएशन हो गया और वह 21 साल का हो गया, तो उसे पिता के स्थान पर नौकरी मिल गई.

सबकुछ व्यस्थित हो गया तो एक पारिवारिक महिला शुभचिंतका ने शिवानी की मम्मी सुषमा को सलाह दी, ‘‘सुषमा बहन, बेटे को नौकरी मिल गई है. आप को पैंशन मिल रही है. बेटी ग्रेजुएशन कर के घर में बैठी है. अब उस की शादी कर दो.’’

सुषमा को शुभचिंतका की बात नागवार गुजरी, गहरी उसांस ले कर कहा, ‘‘अभी कहां से कर दें. बेटे की अभीअभी नौकरी लगी है. कुछ जमापूंजी हो तो करें.’’शुभचिंतिका ने हैरानी से कहा, ‘‘क्या बात करती हो बहन. पति का पैसा कहां चला गया?’’

‘‘उस को बेटी की शादी में खर्च कर देंगे तो बुढ़ापे में मुझे कौन पूछेगा. बेटा और बेटी दोनों की शादी करनी है परंतु बेटा कुछ कमा कर जोड़ ले तो सोचूंगी. तब तक बेटी भी कोई न कोई नौकरी कर लेगी. आज के जमाने में एक आदमी की कमाई से घर कहां चलता है.’’

‘‘बात तो ठीक है परंतु जवान बेटी समय पर घर से विदा हो जाए तो मां की सारी चिंताएं खत्म हो जाती हैं. वरना हर समय लांछन का दाग लगने का भय सताता रहता है.’’

सच के फूल- भाग 1: क्या हुआ था सुधा के साथ

सुधा भागती चली जा रही थी, भागते हुए उसे पता नहीं चला कि वह कितनी दूर आ गई है. दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया हो. उसे जल्दी से जल्दी इस शहर से भाग जाना है. उसे सम झ में आ गया था वह अच्छे से बेवकूफ बनी है. घर से भाग कर उस ने भारी भूल कर दी. विकी ने उसे धोखा दिया है. अगर वह आज भागने में कामयाब हो गई  तभी वह बच पाएगी.  दिल्ली शहर उस के लिए एकदम नया है. वह स्टेशन जाएगी और किसी तरह…

तभी किसी ने उसे पकड़ कर खींचा, ‘‘अरे दीदी देख कर चलो न अभी मोटर के नीचे आ जाती.’’

सुधा कांपने लगी. उसे लगा जैसे विकी ने उसे पकड़ लिया. ये स्कूल से लौटते छोटे बच्चे थे बच्चे आगे बढ़ गए. उस ने औटो को रोका, ‘‘मैडम आप अकेली जाएंगी या मैं और सवारी बैठा लूं.’’

‘नहींनहीं हम को स्टेशन जाना है… ट्रेन पकड़नी है… जल्दी है.’’

‘‘एक सवारी का ज्यादा लगेगा.’’

‘‘ठीक है चलो.’’

संयत हो बोली, ‘‘आप बिहार से है.’’

सुधा घबडाई हुई थी उसे गुस्सा आ गया ‘‘काहे बिहारी को नहीं बैठाते हो उतर जायें.’’

‘‘ अरे नहीं नहीं मैडम इहां का लोग तनी ‘मैं’ ‘मैं’ करके बतियाता है इसी कारण.’’

सुधा को अगर विकी पर शक नहीं होता तब वह भाग भी नहीं पाती. कितना कमीना है विकी उसे बरबाद करना चाहता था. कैसे चालाकी से वह भागी है. वह होटल में घुसी तभी उसे संदेह हो गया था. कितना गंदा लग रहा था वह होटल और वह बूढ़ा रिसैप्शिनष्ट… मोटे चश्में के अंदर से  कितनी गंदी तरह से घूर रहा था. वह बारबार विकी को उस के मामा के यहां चलने के लिए बोल रही थी पर वह सुन नहीं रहा था. फिर भी वह आश्वस्त थी. उस ने घर से भागकर कोई गलती नहीं की है. वह विकी से प्यार करती है. वह जानती है पापा कभी तैयार नहीं होंगे क्योंकि दोनों की जाति अलगअलग है.

जब सुधा वाशरूम गई तो उस ने अपने कानों से सुन लिया, ‘‘हां यार मेरे साथ भाग कर आई है.’’

‘‘शादी करने?’’

‘‘अरे नहीं यार ऐसे सब से शादी करता रहूंगा… तब तो अब तक मेरी 7-8 शादियां हो गई होतीं.’’

अगर सुधा उस का फोन नहीं सुन पाती तब आज उस की इज्जत तारतार हो चुकी होती सोच कर वह अंदर तक कांप गई. वह अभी तक की घटनाओं को याद करने लगी. अभी कल की ही बात है. वह ट्यूशन के बहाने विकी के साथ निकली थी. विकी ने उस से कुछ पैसे लाने को कहा था. मां के बटुए से 17 हजार नकद और मां के कुछ गहने भी ले लिए थे. उस ने सारे पैसे विकी को दे दिए थे.

‘‘बस इतने ही?’’ विकी ने कहा.

‘‘और है देती हूं वाशरूम से आ कर,’’ वाशरूम में जाते उसे सारा मामला सम झ आ गया.

जब उस ने देर लगाई तब विकी ने पुकारा, ‘‘सुधा सब ठीक है न?’’

‘‘हां सब ठीक है आ रही हूं.’’

आ कर उस ने विकी से कहा, ‘‘विकी डियर देखो न बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई है.’’

‘‘क्या हुआ?’’ विकी अधीर होने लगा.

‘‘कैसे बताऊं मु झे शर्म आ रही है,’’ सुधा  िझ झकने लगी.

‘‘अरे यार बताओ न अब हम से शर्म कैसी… बताओ जल्दी.’’

‘‘विकी वह बात है कि…’’ वह रुक गई विकी घबरा गया. बोला, ‘‘जल्दी बताओ न सुधा.’’

‘‘मु झे पीरियड आ गया है तुरंत पैड चाहिए.’’

‘‘ले कर नहीं आई हो?’’ वह  झल्ला कर बोला.

‘‘पागल हो किसी तरह भाग कर आई हूं तुम ला दो न.’’

‘‘मैं कैसे लाऊं तुम खुद जा कर ले आओ.’’

‘‘दुकान कहां है… मैं कैसे…’’

‘‘होटल से बाहर जा कर बाएं जाना वहां मैडिकल स्टोर है.’’

‘‘पैसा दो,’’ वह बोली.

‘‘जेवर लाई हो न… हम बोले थे न…’’

‘‘नहीं ला पाई बैंक में हैं,’’ उस ने  झूठ बोला.

‘‘कितने का मिलता है पैड.’’

‘‘मुझे क्या पता मां लाती है.’’

‘‘लो बस वही लेना और खर्च मत करना… बगल में है दुकान पैदल जाना… पैसे बचाने हैं.’’

‘‘हां मैं अभी ले कर आती हूं.’’

बस फिर वह भाग निकली. अगर वह भाग नहीं पाती तब? उस की आंखों में आंसू आ गए. तभी ड्राइवर क मोबाइल बजा तो उसे याद आया उस का मोबाइल तो वहीं छूट गया चार्ज में लगा रह गया. अच्छा हुआ अब वह मेरी लोकेशन पता नहीं लगा पाएगा. अब तक तो उसे पता चल गया होगा कि मैं उस के चंगुल से भाग चुकी हूं.

स्टेशन उतर कर सुधा तेजी से वेटिंगरूम की ओर बढ़ गई. उस ने वाशरूम में जा कर कुरते के अंदर छिपाया हुआ छोटा बटुआ निकाला जिस के बारे में उस ने विकी को नहीं बताया था. उस में मां के कुछ जेवरों के साथ 13 सौ रुपए थे.

कितनी गंदी औलाद है वह… अपने मांबाप की इज्जत की थोड़ी भी परवाह नहीं की. क्या हाल हो रहा होगा उन लोगों का. पापा और मां का सोच वह फूटफूट कर रोने लगी. जब मन शांत हो गया तब सोचने लगी कि कहीं विकी उसे स्टेशन ढूंढ़ने न चला आए पर कैसे बाहर निकले. बाहर अभी भी खतरा है. टिकट तो लेना है कैसे लूं.

तभी पास में 2 औरतें आ कर बैठ गईं, ‘‘दीदी मैं टिकट ले कर आ रही हूं, तुम यहीं बैठो. आप जरा मेरी दीदी को देखेंगी इस की तबीयत ठीक नहीं है,’’ सुधा को देख कर एक औरत बोली,

‘‘पर मु झे भी टिकट लेना है,’’ सुधा बोली.

‘‘मैं जा रही हूं. आप बता दीजिए.’’

‘‘मेरा टिकट पटना के गरीब रथ में चेयर कार का ले लीजिएगा,’’ उस ने पर्स से पैसे निकाल कर दे दिए. दोनों बहनें टिकट ले कर चली गईं.

ट्रेन समय पर थी. सुधा ने चुन्नी से अपने पूरे मुंह को कवर कर लिया कि कहीं कोई पहचान वाला न मिल जाए. बैठने के बाद उसे घर की यादें सताने लगीं. जब वह घर जाएगी तो क्या होगा? अगर मांपापा ने घर के अंदर घुसने नहीं दिया तब?

वह सोच में थी तभी बगल की सीट पर एक सज्जन आ कर बैठे. वे लगातार सुधा को देख रहे थे. सुधा की रोती आंखों को देख कर उन को कुछ शंका हो रही थी. सुधा कोशिश कर रही थी कि वह सामान्य रहे पर मन की चिंताएं, परेशानियां उसे सामान्य नहीं रहने दे रही थीं. घर से भागना मांबाप की बेइज्जती, विश्वास को ठेस पहुंचाना सब उसे और विह्ववल कर रहे थे.

उन सज्जन से नहीं रहा गया तो उन्होंने उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटी, तुम ने किसी को खो दिया है?’’

वह कुछ नहीं बोली पर रोना जारी था.

‘‘मु झे लगता है बेटा तुम से कोई बहुत बड़ी गलती हो गई है.’’

सुधा ने बडे़ अचरज से उन को देखा कि यह आदमी है या कोई देवदूत… मन की बात इन्हें कैसे पता चल गई.

‘‘देखो रोओ मत शांत हो कर मु झे बताओ शायद मैं मदद कर सकूं.’’

सुधा बो िझल बैठी थी उसे लगा सचमुच शायद मदद कर दें. उस ने धीरेधीरे सारी बातें बता दीं. उसे कैसे विकी ने  झूठे प्यार के जाल में फंसाया फिर घर से भागने को उकसाया… पैसे मंगवाना…

वे चुपचाप सुनते रहे फिर पूछा, ‘‘कहां रहती हो और कहां जा रही हो?’’

‘‘ मेरा घर पटना में है, लेकिन मैं गया अपनी सहेली के यहां जा रही हूं.’’

‘‘ घर क्यों नहीं?’’

‘‘किस मुंह से जाऊं टिकट पटना का है पर हिम्मत नहीं हो रही है,’’ और वह रोने लगी.

सच के फूल- भाग 2: क्या हुआ था सुधा के साथ

उन्होंने चुप रहने को कहा और बोले, ‘‘सुनो मांबाप से बढ़ कर माफ करने वाला कोई नहीं है. तुम सीधा अपने घर जाओ और सब सचसच बता दो. सचाई में बड़ी ताकत होती है. वे लोग तुम्हारे पछतावे को भी सम झेंगे और माफ भी करेंगे साथ ही सीने से लगाएंगे.’’

‘‘और मैं कैसे अपनेआप को माफ कर पाएंगी,’’ कह कर सुधा रोने लगी.

‘‘अपनेआप को सुधार कर एक अच्छी बेटी बन कर,’’ अंकल ने सम झाया, ‘‘देखो बेटी कुदरत ने सभी को सोचनेसम झने की बराबर शक्ति दी है. जो लोग इस का सही उपयोग करते हैं वे हमेशा विजयी होते हैं. हां हम सभी आखिर हैं तो मनुष्य ही न गलतियां भी हो जाती हैं. पर सही मनुष्य वही है जो अपनी गलतियों को सम झे, माने और उन से सबक ले, सचाई के साथ आगे बढ़े. हां एक बात और याद रखना सच नंगा होता है. उस को देखने और बोलने के लिए बड़ी हिम्मत की जरूरत होती है. यह भी सम झ लो तुम को अब हिम्मत से काम लेना होगा.’’

‘‘अगर मांपापा ने माफ नहीं किया और घर से निकाल दिया तब?’’ सुधा का मन शंकाओं से घिरा था.

‘‘तुम अभी बच्ची हो इसलिए अभी नहीं सम झोगी पर मेरा विश्वास करो वे तुम्हारे मातापिता हैं. तुम किस दर्द से गुजर रही हो तुम बताओ या न बताओ उन को सब पता होगा. अच्छा अब रोना बंद करो और कुछ अच्छी बात सोचो.’’

‘‘अंकल आप कहां जा रहे हैं?’’ सुधा थोड़ा सामान्य हो चली थी.

‘‘मैं भी पटना ही जा रहा हूं. वहीं रहता हूं. पटना में मैं फिजिक्स का प्रोफैसर हूं. दिल्ली में सेमिनार अटैंड करने आया था… लेकिन ट्रेन से उतरने के बाद मैं तुम को नहीं पहचानता.’’

सुधा उन की बात सुन कर हंसने लगी. ट्रेन से उतरने के बाद सुधा ने दोनों हाथ जोड़ कर उन को नमस्ते की. फिर दो कदम आगे बढ़ी और वापस आ कर उस ने अंकल के पैर छू लिए. दोनों की आंखें भर आईं. उन्होंने सुधा के सिर पर हाथ रख कर रुंधे गले से आशीर्वाद दिया, ‘‘कुदरत तुम्हें सही राह दिखाए,’’ और फिर बिना देखे आगे बढ़ गए.

सुधा उस देवपुरुष को भीगी आंखों से जाते देखती रही. अब असली परीक्षा थी… वह घर से संपर्क करे. पहले फोन पर बात कर ले या सीधे घर चली जाए. अगर उन लोगों ने उसे घर में घुसने न दिया तब? पहले बात करते हैं पता चल जाएगा वह घर जा सकती है या नहीं. वह मां को मोबाइल लगाने लगी. लंबी रिंग बजी पर किसी ने फोन नहीं उठाया. वैसे भी मां अपरिचित का फोन नहीं उठातीं. मां को लगातार फोन लगाएंगे तभी उन को शक होगा सोच वह लगातार फोन मिलाने लगी.

इस बार किसी ने उठाया. कहा, ‘‘हैलो.’’

वह कुछ बोल ही नहीं पाई.

‘‘इसीलिए हम अननोन नंबर नहीं उठाते है,’’ मां का गुस्से वाला स्वर था.

सुधा ने  झट से फोन बंद कर दिया.पर फोन काटने से काम नहीं चलेगा बात तो करनी ही पडे़गी. इस बार बात करनी ही है चाहे जो उठाए… उस ने फिर फोन लगाया, ‘‘हैलोहैलो,’’ सुधा सिसकने लगी.

‘‘सुधासुधा तुम हो… बोलो बेटा कहां से फोन कर रही हो. रोओ मत बेटा तुम ठीक हो न?’’

फोन पापा ने उठाया था. सुधा रोती जा रही थी. तभी मां की आवाज आई, ‘‘सुधा कैसी हो बेटी? कहां से बोल रही हो बताओ? हम सभी बहुत परेशान हैं. किसी मुश्किल में तो नहीं हो न बोलो न बेटी. तुम ठीक हो न…’’

सुधा को अपने लिए ‘बेटा’ या ‘बेटी’ शब्द की आशा नहीं थी. उन लोगों की विह्वलता देख उस का मन पीड़ा से भर गया. वह रोरो कर बोलने लगी, ‘‘मां मैं सुधा… पटना स्टेशन से बोल रही हूं…’’ आगे वह बोल नहीं पाई.

‘‘तुम स्टेशन पर रहो. वहीं पास में मंदिर है वहीं पर रुको हम लोग आ रहे हैं. वहीं रहना बेटा कहीं जाना मत. बस हम आ रहे हैं.’’

मां के भीगे स्वर सुधा के आहत मन को चीरते चले गए. वह मंदिर के पास चुपचाप बैठ गई. उस ने अपना मुंह ढक लिया था. शहर उस का था कोई भी पहचान सकता था. करीब 20 मिनट के भीतर उसे मां लीला देवी व पापा रमाकांत दिखे. दोनों के चेहरे का रंग गायब था. सुधा को अपनी गलती और अपने मातापिता की दशा देख कर फिर रोना आ गया वह मां से लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ी.

सुधा के मातापिता ने उसे संभालते हुए गाड़ी में बैठाया. एक ओर मां दृढ़ता के साथ हाथ पकड़ कर बैठी दूसरी ओर पापा ने उस के हाथ को बड़ी कठोरता से पकड़ रखा था जैसे कहना चाहते हो कि हम हमेशा तुम्हारे साथ हैं… तुम को प्यार करते हैं. कभी भी चाहे जो भी परिस्थिति हो साथ नहीं छोड़ सकते. तुम को अकेले नहीं छोड़ सकते हैं. मां कभी आंसू पोछती, कभी चुन्नी संभालती तो कभी बड़े प्यार से हवा से  झूलते बालों को चेहरे से हटा रही थी. दोनों के बीच में बैठी सुधा किसी डरीसहमी हुई बच्ची की तरह रोतीसिसकती चली जा रही थी. घर पहुंच कर सुधा सीधे अपने कमरे में जा कर दीवार से लग कर दहाड़ मार रोने लगी. मां चुप कराने को आगे बढ़ने लगी.

तब रमाकांत ने कहा, ‘‘उसे रो लेने दो.’’

सुधा का इस तरह रोना लीला देवी के कलेजे को चीर रहा था. जब बरदाश्त नहीं हुआ तब वह सुधा को चुप कराने लगी.

घर में सब लोग सामान्य होने की कोशिश कर रहे थे. सुधा के लिए यह बड़ा मुश्किल लग रहा था पर घर वालों का साहस उस का हौसला बढ़ा रहा था. सुधा वक्त की मारी खुद को कैसे इतनी जल्दी माफ कर दे. इतने भोलेभाले मातापिता के साथ उसे अपनेआप को सही लड़की और अच्छी बेटी बन कर दिखाना है और वह बन कर दिखाएगी, फिर से मांपापा का खोया विश्वास हासिल करेगी. अभी तक किसी ने भी यहां तक कि उस के छोटे भाई दीपू ने भी नहीं पूछा शायद पापा की हिदायत होगी. खाना खाते वक्त उस ने मां से अपने पास सोने का आग्रह किया.

तब उन्होंने कहा, ‘‘हां बेटा वैसे भी मैं तुम्हारे साथ ही सोने वाली थी.’’

सुधा सम झ गई आज मां उस से सारी बातें जानना चाहती हैं.ठीक है वह सब सचसच बता देगी कुछ भी नहीं छिपाएगी.

मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मां चुपचाप सो गई जैसे कुछ हुआ ही नहीं. सुधा के लिए ये सब असहनीय हो रहा था. सब लोग उसे एक बार भी डांट क्यों नहीं रहे हैं न फटकार लगा रहे हैं. ऐसे मातापिता के लिए उस ने कितनी घृणित बात सोची कैसे कि ‘घर में घुसने नहीं देंगे.

सुधा की नींद उड़ गई थी. वह सारी बातें बता कर अपना मन हलका करना चाहती थी. सब की खामोशी उस के मन को जला रही थी. उस के पास तो  अब नाराजगी या रूठने का हक भी नहीं रहा. मन को चैन नहीं आ रहा था. उस ने सोच लिया यदि मां उस से कुछ भी जानना चाहेगी तब तो ठीक है वरना वह स्वयं ही उन्हें सबकुछ बता देगी. सोचतेसोचते सुधा कब सो गई उसे भी पता नहीं चला.

Winter Special: फैमिली के लिए नाश्ते में बनाएं सुरती लोचा

प्रत्येक सुबह नाश्ते की समस्या से हर गृहिणी को दो चार होना ही  पड़ता है. त्यौहारी सीजन भी समाप्त हो चुका है. जिंदगी अब पुनः पुराने ढर्रे पर लौट चली है. त्योहारों के समय चिकने और मिर्च मसालेदार हैवी नाश्ता और भोजन की अपेक्षा अब  सादा और हैल्दी भोजन और नाश्ता खाने का मन करने लगता है. आज हम आपको ऐसे ही एक हैल्दी नाश्ते को बनाना बता रहे हैं जिसे आप घर की उपलब्ध सामग्री से ही बड़ी आसानी से बना सकते हैं साथ ही इसे बच्चों के टेस्ट के अनुसार ट्विस्ट करके आप उन्हें भी खाने को दे सकते हैं. यही नहीं अपने स्वादानुसार आप विभिन्न तरीकों से इसे सर्व भी कर सकतीं हैं तो आइए देखते हैं कि इसे कैसे बनाया जाता है-

कितने लोगों के लिए              8

बनने में लगने वाला समय        30 मिनट

मील टाइप                            वेज

सामग्री

चना दाल                     1 कप

धुली उडद दाल             1 टेबलस्पून

चावल                          1 टेबलस्पून

पोहा                            1 टेबलस्पून

ताजा दही                     1 टेबलस्पून

बेसन                            1 टेबलस्पून

अदरक  पेस्ट                   1 टीस्पून

हरी मिर्च पेस्ट                  1 टीस्पून

हींग                               1/4 टीस्पून

नमक                              1 टीस्पून

ईनो फ्रूट साल्ट                 1 सैशे

मूंगफली तेल                    1 टीस्पून

विधि

उडद, चना दाल और चावल को दो तीन बार अच्छी तरह धोकर रात भर के लिए भिगोकर रख दें. सुबह इनका पानी अलग कर दें. इन्हें पीसने से आधे घण्टे पहले पोहे को भी भिगो दें. अब दाल और चावल को दरदरा मिक्सी में पीस लें. जब यह लगभग दरदरा सा हो जाये तो बेसन, पोहा और दही डालकर पीस लें. अब इसे एक एयरटाइट कंटेनर में रखकर 8-9 घण्टे के लिए फर्मेंट होने के लिए रख दें.जब मिश्रण में खमीर उठ जाए तो इसमें अदरक, हरी मिर्च पेस्ट, हींग, तेल, 1कप पानी और नमक डालकर अच्छी तरह चलायें. ध्यान रखें कि मिश्रण न बहुत गाढ़ा और न ही बहुत अधिक पतला हो.  2 थालियों में चिकनाई लगाकर तैयार मिश्रण को डाल दें. अब एक कढ़ाई या भगौने में पानी गर्म होने रखें और उसके ऊपर थाली रखकर लोचा को भाप में 10 से 15मिनट तक पकाएं. ठंडा होने पर आप इसे निम्न तरीकों से सर्व कर सकतीं हैं-

-राई,  जीरा, कढ़ी पत्ता,हरी मिर्च और कश्मीरी लाल मिर्च को गर्म तेल में डालकर तड़का लगाएं और तैयार लोचा के ऊपर डालकर सर्व करें.

-गर्म गर्म लोचे के ऊपर चीज किसें और ऊपर से चिली फ्लैक्स और मिक्स हर्ब्स डालकर बच्चों को खाने को दें.

-लोचे के ऊपर खट्टी मीठी चटनी, दही, बारीक सेव, अनार के दाने और कटा प्याज डालकर सर्व कीजिये चाट के स्वाद वाला यह लोचा सभी को बहुत पसंद आएगा.

-लोचे के ऊपर पेरी पेरी मसाला और 1 चम्मच ताजा दही डालकर सर्व करें.

दूध के दांत: क्या सही साबित हुई रोहित की तरकीब

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