कोर्ट मैरिज के लिए हमें क्या करना होगा?

सवाल-

मैं कुछ दिन पहले ही 18 वर्ष की हुई हूं. मैं जानना चाहती हूं कि क्या अब मैं कोर्ट मैरिज कर सकती हूं? यह भी बताएं कि इस के लिए हमें क्या करना होगा?

जवाब-

कोर्ट मैरिज करने के लिए आप को वकील के पास जाना होगा. वह कागज बना कर मैरिज रजिस्ट्रार के सामने रखेगा. फिर वही पूरी बात बताएगा. यह मामला जीवन का है पर गुप्त नहीं रह पाता, यह ध्यान रखें.

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प्यार करने वालों को अक्सर घरवालों के विरोध का सामना करना पड़ता है. यह ऐतराज कई बार औनर किलिंग जैसी हैवानियत की वजह भी बन जाता है जो प्यार करने वालों के सपनों को तहस नहस कर देता है. इस समस्या से निबटने का एक आसान रास्ता है , कोर्ट मैरिज.

इस संदर्भ में 2 अलग धर्म के बौलिवुड सितारे सैफ और करीना की शादी का उदाहरण लिया जा सकता है जिन्होंने शादी के लिए कानूनी रास्ता अख्तियार किया. बांद्रा स्थित रजिस्ट्रार औफिस जा कर उन्होंने शादी से सम्बंधित जरूरी कागजात जमा किए और आवेदन के 30 दिनों के भीतर कोर्ट मैरिज कर ली.

स्पेशल मैरिज एक्ट 1945 के अंतर्गत होने वाले विवाह को कोर्ट मैरिज कहते हैं. कोर्ट मैरिज में 2 लोगों के धर्म ,जाति या उम्र को नहीं देखा जाता बल्कि उन की सहमति और पात्रता देखी जाती है .

पात्रता

युवक-युवती दिमागी तौर स्वस्थ हों. संतानोत्पति में समर्थ हों.

लड़के की उम्र काम से काम 21 वर्ष और लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए. दोनों ने अपनी इच्छा से पूरे होशोहवाश में शादी की सहमति दी हो. विवाह में कोई क़ानूनी अड़चन न हो.

कोर्ट मैरिज करने के लिए युवक और युवती को इस बाबत एक फौर्म भर कर लिखित सूचना अपने क्षेत्र के जिला विवाह अधिकारी को देनी होती है. फिर नोटिस जारी करने का शुल्क जमा करना होता है जो काफी कम होता है. इस आवेदन के साथ युवकयुवती को फोटो पहचान पत्र, और एड्रैस प्रूफ भी प्रस्तुत करना होता है. उस के बाद विवाह अधिकारी द्वारा 30 दिन का नोटिस जारी किया जाता है. इस नोटिस को कार्यालय के नोटिस बोर्ड और किसी सार्वजनिक जगह पर चिपकाया जाता है. ताकि किसी को आपत्ति हो तो वह अपना पक्ष रख सके.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- जब कोर्ट मैरिज हो जरूरी

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

तौबा

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डेजर्ट में परोसें मूंग सेंवई पुडिंग

आपने मार्केट और रेस्टोरेंट में कई तरह की पुडिंग खाई होगी. लेकिन क्या आपने इंडियन स्टाइल में मूंग सेवई पुडिंग ट्राय की है.

सामग्री

1/4 कप मूंग दाल धुली

1/2 कप सेंवइयां भुनी

1 लिटर फुलक्रीम मिल्क

1/4 कप खजूर गुड़ कद्दूकस किया

1/4 छोटा चम्मच छोटी इलायची चूर्ण

10-12 काजू के टुकड़े

1 बड़ा चम्मच पिस्ता व बादाम कतरा

चीनी स्वादानुसार

3 छोटे चम्मच देशी घी.

विधि

दाल को पानी से अच्छी तरह धो कर छलनी में रखें. एक प्रैशरपैन में 2 चम्मच घी गरम कर के काजू भून कर निकाल लें. बचे घी में दाल को हलका भूरा होने तक धीमी आंच पर भूनें. फिर उस में 1/2 कप पानी डाल कर ढक्कन लगाएं और 3 सीटियां आने तक पकाएं. एक अलग भारी तले की नौनस्टिक कड़ाही में बचा घी गरम कर के भुनी सेंवइयों को सौते करें और उस में दूध डाल कर पकने रखें. 1/2 कप कुनकुने पानी में गुड़ को भिगो दें. प्रैशरपैन का ढक्कन खोलें. दाल को आलू मैशर से मैश करें व उबलते दूध में डाल दें. दोनों चीजों को खूब गाढ़ा होने तक पकाएं. गुड़ को छान कर पुडिंग में डालें. चीनी डालनी हो तो डाल दें. जब पुडिंग गाढ़ी हो जाए तो उस में इलायची चूर्ण व काजू डाल दें. ठंडा कर के या गरम ही सर्विंग बाउल में डालें और बादाम व पिस्ता से सजा कर सर्व करें.

प्यूबर्टी के दौरान होने वाले भावनात्मक बदलाव

प्यूबर्टी (यौवनारम्‍भ) के दौरान आपके बच्चे की भावनाएं ज्यादा मजबूत और तीव्र हो सकती हैं. उनमें बार-बार, बिना वजह और अचानक ही मूड स्विंग्स हो सकते हैं. पहली बार में आपके बच्चे को बहुत ही मजबूत भावनाएं महसूस हो सकती हैं. यह सामान्य बात है कि उन्हें अनजान दुविधा, डर और गुस्सा महसूस हो. इसके साथ ही हो सकता है, वे सामान्य से ज्यादा संवेनदनशील और चिड़चिड़े हो जाएं. इस बारे में बता रही हैं- डॉ. मंजू गुप्ता, सीनियर कंसल्‍टेंट, प्रसूति एवं स्त्रीरोग विशेषज्ञ, मदरहुड हॉस्पिटल, नोएडा.

आपके बच्चे का दिमाग इन नए हॉर्मोन्‍स के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रहा होता है, वहीं उनका शरीर भी यही काम कर रहा होता है. उनके दिमाग के हिस्से जो उन्हें मजबूत, जटिल भावनाओं का अनुभव करने में सक्षम बनाते हैं, प्यूबर्टी के दौरान मजबूत होने लगते हैं. हालांकि, मस्तिष्क का वह क्षेत्र जो भावनाओं, गहन विचार, तर्क और निर्णय लेने को नियंत्रित करता है, अक्सर अंत में विकसित होता है. आपका बच्चा ऐसा महसूस कर सकता है कि जैसे उनकी भावनाएं नियंत्रण से बाहर हो गई हैं.

यहां कुछ ऐसे भावनात्मक बदलावों के बारे में बताया गया है जोकि प्यूबर्टी के दौरान होते हैं

1. अत्यधिक संवेदनशीलता-

चूंकि, प्यूबर्टी के दौरान आपके शरीर में काफी सारे बदलाव होते हैं, इसलिए उन्हें खुद को लेकर असहजता महसूस हो सकती है और अपने लुक को लेकर ज्यादा सतर्क हो सकते हैं. इसकी वजह से आप जल्द चिड़चिड़े हो सकते हैं, लोगों पर भड़क सकते हैं या फिर डिप्रेशन महसूस हो सकता है. इसलिए यह जानना फायदेमंद होगा कि आप किन व्यावहारात्मक बदलावों से होकर गुजर रहे हैं और उनके बारे में आत्मविश्वास से बात कर पाएं.

2. अपनी पहचान ढूंढने की कोशिश कर रहे होते हैं-

चूंकि, आप वयस्क होने की तरफ बढ़ रहे होते हैं, हो सकता है आप यह जानने के लिये बाध्य हो जाएं कि आपको क्या चीज खास बनाती है. इसके साथ ही, आमतौर पर अपने परिवार से ज्यादा अपने दोस्तों से जुड़ने की प्रवृत्ति हो जाती है. यह बात शायद इस मनोविज्ञान से जुड़ी है कि आप और आपके दोस्त एक ही पड़ाव से होकर गुजर रहे हैं. आप शायद यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि आप औरों से किस तरह अलग हैं और दुनिया में आपकी क्या जगह है. इसकी वजह से हो सकता है कि आप खुद को अपने माता-पिता और परिवार के बाकी सदस्यों से दूर कर लें.

3. हिचकिचाहट आ सकती है-

प्यूबर्टी के परिणामस्वरूप समय अनिश्चित हो जाता है, क्योंकि आप ना तो पूरी तरह से वयस्क होते हैं और ना ही बच्चे. आप बदलाव के इस पड़ाव के दौरान जीवन के अनजाने पहलुओं जैसे कॅरियर, कमाई और शादी के बारे में जानकर और समझकर हैरान हो जाते हैं. जब आप इस तरह से सोचना शुरू करते हैं तो हर चीज नई और अनजानी लगती है, तो आपको भविष्य को लेकर अनिश्चितता महसूस हो सकती है.

जब आपसे जुड़े आपके करीबियों की अपेक्षाएं भी बदल जाती हैं तो यह दुविधा होना और भी लाजिमी है. एक बच्चे के रूप में आपसे जिन दायित्वों की अपेक्षा की जाती थी, अब वह अपेक्षाएं बदल गई हैं. इस स्थिति में आपकी प्रतिक्रिया यह निर्धारित करेगी कि आप अपनी नई भूमिकाओं के लिये कितनी जल्दी या धीरे-धीरे ढलते हैं और आपको खुद पर कितना यकीन है.

4. साथियों का प्रभाव-

जैसे ही प्यूबर्टी आती है आपका अपने दोस्तों के साथ संवाद बढ़ जाता है. लोकप्रिय माध्यमों में आप अपने आस-पास जो देखते हैं और उनके माध्यम से जिस संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसका आप पर और साथी समूह पर प्रभाव पड़ने की संभावना है. आप जो देखते हैं उसके आधार पर, आपके बोलने, आपके कपड़े पहनने का तौर-तरीका और आप कैसे व्यवहार करते हैं, उसका सामान्य तौर पर चुनाव करते हैं.

कई बार यह असहज हो सकता है और हो सकता है कई बार आपकी पसंद बदल जाए. साथ ही यह उन तरीकों में से एक है, जिससे आपको अपने साथियों से घुलने-मिलने में परेशानी हो सकती है.

5. विचारों में टकराव-

आपको ऐसा लग सकता है कि जब आप बच्चे थे और अब जब आप एक वयस्क बनना चाहते हैं, उन दोनों के बीच फंस गए हैं, क्योंकि जब आप एक टीनएजर के रूप में प्यूबर्टी के दौर से गुजर रहे हैं, आप बदलाव के पड़ाव पर हैं. जैसे, आप ज्यादा आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं, वहीं आप पेरेंट्स का साथ भी चाहते हैं. एक दूसरा उदाहरण यह हो सकता है कि आप अपने दोस्तों के बीच घुलने-मिलने के लिये बचपन की रूचियों को छोड़ देना चाहें. आपको दुविधा महसूस हो सकती है और आप इसका स्पष्टीकरण मांग सकते हैं.

6. मूड में बदलाव-

आपको अक्सर और कभी-कभी अचानक ही अपने मूड में बदलाव महसूस हो सकता है और इसके साथ ही आपको अनिश्चिता और परस्पर-विरोधी ख्याल भी आ सकते हैं. जैसे, कई बार आपका मूड एकदम से बदल जाएगा, आप आश्वस्त और आनंदित से चिड़चिड़े और उदास हो जाएं. आप कैसा महसूस करते हैं, ये मूड स्विंग उसके अनुसार बदलता रहता है. यह आपके शरीर में होने वाले हॉर्मोन के स्तर के बदलाव के कारण हो सकता है या फिर प्यूबर्टी से जुड़े बदलावों के कारण.

7. संकोची महसूस करना-

हर इंसान अलग-अलग समय में प्यूबर्टी का अनुभव करता है. इसकी वजह से आपके दोस्त से आपका विकास अलग हो सकता है. आप अपने शरीर के बारे में और इसके परिणामस्वरूप आप जिस तरह से विकसित हो रहे हैं, उसके बारे में अधिक जागरूक हो सकते हैं.

चूंकि, लड़कियां, लड़कों की तुलना में पहले और जल्दी परिपक्व हो जाती हैं तो ये अनुभव उनमें ज्यादा स्पष्ट होते हैं. इसके साथ ही, उनमें शारीरक बदलाव जैसे नितंबों का आकार बड़ा होना और उनके ब्रेस्ट का विकसित होना- बहुत ही स्वाभाविक है. उनके साथियों के बीच, जोकि एक ही आयु वर्ग के हैं, उन्हें अपने अपीयरेंस को लेकर संकोची बना सकते हैं.

8. यौन इच्छा महसूस होना-

साथ ही, यौन परिपक्वता, प्यूबर्टी के बाद विकसित होती है. जब आप यौन परिपक्वता तक पहुंचते हैं तो आप परिवार शुरू करने के बारे में सोचने लगते हैं. सेक्स को लेकर और जिनके प्रति आप आकर्षित हैं उनकी ओर शारीरिक आकर्षण होना, यौन परिपक्वता का एक लक्षण है. एक लड़के या लड़की के लिये उन लोगों के प्रति यौन आकर्षण का अनुभव करना आम है, जो प्यूबर्टी के आने से “सिर्फ दोस्त” से अधिक बनना चाहते हैं.

सुरक्षित सेक्स के बारे में जानकारी-

नियमित दैनिक गतिविधियां जैसे रोमांटिक उपन्यास पढ़ना या टेलीविजन पर रोमांटिक दृश्य देखना भी आपके बच्चे की कामोत्तेजना को जगा सकता है. इन भावनाओं के लिये दोषी महसूस करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि वे सामान्य हैं. सेक्स को लेकर आपके मन में कई तरह के सवाल हो सकते हैं. एक परिपक्व वयस्क जिसके साथ आप सेक्स पर चर्चा करने में सहज महसूस करते हैं (जैसे, आपकी मां, डॉक्टर, या परामर्शदाता) उसके साथ बात करना एक अच्छा विकल्प है. आपको अपने सवालों के जवाब मिलने चाहिए और सुरक्षित सेक्स के बारे में जानकारी होनी चाहिए.

यदि आपका बच्चा लगातार उदास रहता है, तो कोई और समस्या हो सकती है. यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अत्यधिक और लंबे समय तक मूड स्विंग, डिप्रेशन या अन्य मानसिक समस्या का संकेत हो सकता है.

आम और अधिक गंभीर मूड स्विंग के बीच अंतर करने में मदद के लिये, यहां तीन बातें बताई गई हैं:-

1-दो हफ्ते से ज्यादा वक्त तक मूड वैसा ही रहे.

2-व्यवहार, भावनाओं और विचारों में अत्यधिक बदलाव को गंभीर माना जाता है.

3-जीवन के कई पहलुओं पर प्रभाव पड़ रहा हो (घर, स्कूल और दोस्ती)

अपने बच्चे से बात करना और यदि इस तरह के लक्षण उनमें नजर आ रहे हैं तो डॉक्टर से मदद लेना जरूरी है.

11 Tips: वार्डरोब रखें व्यवस्थित ऐसे

मैं क्या पहनूं कुछ मिल ही नहीं रहा पहनने को… मेरी वह वाली ड्रैस कहां गई?

क्या वार्डरोब के आगे खड़ी हो कर आप भी अकसर यह सवाल खुद से करती हैं? यदि हां, तो आप को जरूरत है अपने वार्डरोब को मैनेज करने की. वैसे तो आप हर महीने यह काम करती ही होंगी, लेकिन यदि वार्डरोब को सलीके से मैनेज किया जाए तो चीजें आसानी से और जल्दी मिल जाती हैं. आइए, हम आप को वार्डरोब मैनेजमैंट से जुड़े कुछ टिप्स बताते हैं:

1.  सब से पहले वार्डरोब में रखा सारा सामान बाहर निकालें. फिर वार्डरोब को अच्छी तरह साफ करें. उस के बाद हर कपड़े को अच्छी तरह तह लगा कर वार्डरोब में रखें. यदि कपड़ों के अलावा भी दूसरा सामान वार्डरोब में रखती हैं, तो उसे भी साफ कर के ही रखें.

2. कपड़ों को वार्डरोब में ठूंसें नहीं. यह आप को भी पता होगा कि आप के वार्डरोब में कितनी स्पेस है? स्पेस के हिसाब से ही वार्डरोब में कपड़े रखें. कपड़ों की अच्छी तरह तह लगा कर एक के ऊपर एक रखें. लेकिन यह ध्यान रहे कि कपड़ों का ढेर ज्यादा न हो. इस के लिए थोड़ीथोड़ी दूरी पर कपड़ों की गड्डी बना कर रखें.

3. जरूरी नहीं कि हर कपड़े को तह लगा कर वार्डरोब में रखा जाए. कुछ कपड़ों को हैंगर में भी टांगा जा सकता है. खासतौर पर कोट, ब्लेजर, साडि़यां, ईवनिंग ड्रैसेज आदि को हैंगर में ही टांगें, क्योंकि इन्हें तह लगा कर रखने पर इन में क्रीज बन जाती हैं. हैंगर में टांगने पर ऐसा नहीं होता.

4. बाजार में वुडन, स्टील, प्लास्टिक आदि के अलगअलग कपड़ों के लिए अलगअलग हैंगर उपलब्ध हैं. मसलन, कोट को टांगने के लिए चौड़े हैंगर मिलते हैं, तो साड़ी टांगने के हैंगर पतले होते हैं. शर्ट और ट्राउजर्स के लिए क्लिप वाले हैंगर बाजार में उपलब्ध हैं.

5. यदि आप किसी ड्रैस को लंबे समय से नहीं पहन रहीं या फिर अब उसे आप कभी नहीं पहनना चाहतीं, तो ऐसे कपड़ों को वार्डरोब में रख कर उसे भरें नहीं, बल्कि उन्हें हटा दें ताकि नए कपड़ों के लिए वार्डरोब में जगह बन सके.

6. यदि आप के वार्डरोब में कपड़ों के साथ ही जूते रखने की भी जगह है, तो जूतों को खुला न रखें. उन्हें कैनवास के डब्बे के अंदर रखें. इस से कपड़ों से जूतों की गंध नहीं आएगी.

7. यदि कपड़ों को तह लगा कर सैल्फ में रखना है, तो एकजैसे कपड़ों को एकसाथ रखें यानी बौटम के साथ बौटम और टौप के साथ टौप रखें. इस से कपड़ों को खोजने में आसानी होगी.

8. जिस ड्रैस या आइटम का आप सब से अधिक इस्तेमाल करती हैं उसे वार्डरोब में ऐसी जगह रखें जहां से आसानी से निकाल सकें यानी उसे निकालते समय अन्य सामान डिस्टर्ब न हो.

9. यदि आप के वार्डरोब में ड्रैसेज और जूतों के अलावा बैडलाइन और तौलिए भी रखें हैं, तो उन्हें तह लगा कर रखें. इस से उन में सिलवटें नहीं पड़ेंगी और जगह की भी बचत होगी.

10. यदि आप के वार्डरोब में लाइट की व्यवस्था हो सके तो अच्छा होगा, क्योंकि रोशनी होने से आप को सामान आसानी से मिल जाएगा और दूसरा सामान डिस्टर्ब भी नहीं होगा.

11. यदि आप के वार्डरोब में बहुत स्पेस नहीं है, तो आप उस में हुक्स अटैच करवा सकती हैं. इस से कुछ कपड़ों को, जिन में सिलवटें नहीं पड़तीं उन्हें उन पर टांग सकती हैं. 

स्वयंसिद्धा- भाग 3: जब स्मिता के पैरों तले खिसकी जमीन

जब उस ने कालेज में प्रिंसिपल को अपना त्यागपत्र सौंपा, तो उस को यात्रा की शुभकामनाएं देने के साथ ही वे यह कहे बिना न रह सके, ‘‘मिसेज राणा, आप जैसे टीचर्स की हमें सदैव जरूरत रहती है. यदि कभी भी वापस आएं तो आप का यहां स्वागत ही होगा.’’

अपनों व परिचितों की ढेरों शुभकामनाएं लिए व सुखद भविष्य की कामना करती स्मिता हिम्मत कर के पलक के साथ अमेरिका के लिए रवाना हो गई. दिल में कहीं पति से मिलने की उमंग थी, तो थोड़ा अबूझा सा डर भी. पर साथ ही स्वयं पर हर स्थिति से निबटने का विश्वास भी था. इसी के सहारे वह इस अनजाने सफर पर निकल पड़ी थी. अचानक उसे आया देख आशुतोष कितना चौंक उठेंगे… क्या प्रतिक्रिया होगी उन की? इन्हीं विचारों में उलझी स्मिता ने 16-17 घंटे का लंबा सफर तय कर जब अमेरिका की धरती पर कदम रखा, तो उस की हवाएं उसे बेहद अपनी सी लगीं क्योंकि आशुतोष भी तो वहीं था.

एक प्रीपेड टैक्सी ले कर, उसे पता बता, वह बेटी के साथ अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली. आधे घंटे के बाद एक छोटे सुंदर से घर के सामने जा कर टैक्सी रुक गई. स्मिता ने नेमप्लेट चैक की. वह सही पते पर पहुंची थी. उसे उतार कर टैक्सी लौट गई और स्मिता ने कालबैल का बटन दबाया, तो एक 15-16 वर्षीय लड़की दरवाजा खोल प्रश्नवाचक नजरों से उसे देखने लगी. पर स्मिता द्वारा अपना परिचय देने पर वह दरवाजा पूरा खोल, एक तरफ हट गई. पर उस की निगाहों में छिपा असमंजस स्मिता से छिप न सका था.

अंदर आते हुए स्मिता ने पूछा, ‘‘डा. राणा नहीं हैं घर पर?’’

‘‘वे और रिया मैडम 1 घंटे में आ जाएंगे,’’ उस का सामान अंदर रखती वह युवती बोली.

‘‘तुम्हारा क्या नाम है? सारा दिन यहीं रहती हो क्या?’’

‘‘जी चीना…’’ कुछ सकुचाते हुए वह बोली, ‘‘मैडम और साहब के आने पर चली जाती हूं. उन के आने तक घर की देखभाल व अन्य काम खत्म हो जाते हैं. मैडम, आप दोनों फ्रैश हो लीजिए, तब तक मैं कुछ नाश्ता वगैरह लाती हूं.’’ तत्परता से उस का सामान एक कमरे में रख वह चली गई.

स्मिता एक नजर साफसुथरे, सुसज्जित कमरे पर डाल कर अटैची खोलने लगी. कमरा गैस्टरूम ही लग रहा था, क्योंकि किसी पर्सनल यूज की कोई चीज वहां नजर नहीं आ रही थी. जब वे दोनों तैयार हो कर आईं तो चीना कौफी व नाश्ता ट्रौली पर सजा कर ड्राइंगरूम में ले आई. नाश्ता कर के स्मिता एक मैगजीन के पन्ने पलटने लगी. आशुतोष के आने में अभी 15-20 मिनट बाकी थे. पलक वहीं पास में खेल रही थी. काम खत्म कर के चीना अपना बैग उठा कर जाने लगी, तभी आशुतोष व रिया एकदूसरे के हाथ में हाथ डाले बातें करते हुए अंदर आए. स्मिता को सामने बैठा देख आशुतोष बुरी तरह चौंक गया, उस के चेहरे का रंग उड़ गया. सकपका कर उस ने रिया का हाथ छोड़ दिया. रिया उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देख रही थी, तभी पलक दौड़ती हुई आ कर आशुतोष से, ‘पापा…पापा…’ कहती हुई लिपट गई. पापा…? रिया ने हैरानी से उसे देखा. फिर पूछा, ‘‘क्या यह तुम्हारी डौटर है?’’

‘‘ओह नो… ये मेरी रिलेटिव हैं और यह इन्हीं की बच्ची है. इस के पापा दुबई गए हुए हैं, इसलिए यह शुरू से मुझे ही पापा कह कर बुलाती है,’’ स्मिता की तरफ इशारा कर उस से नजरें चुराता आशुतोष साफ झूठ बोल गया.

सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि स्मिता को कुछ कहनेसुनने का अवसर ही नहीं मिला. एक क्षण में वह बिलकुल बेगानी बना दी गई. ऐसी परिस्थिति की तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. अभी इस आघात से वह उबर भी न पाई थी कि रिया ने उसे अभिवादन किया और ‘यहां अपने घर जैसा फील करें,’ कह कर अंदर की तरफ बढ़ गई.

तभी उसे आशुतोष का स्वर सुनाई दिया, ‘‘अरे स्मिताजी, आप अचानक यहां? कम से कम खबर तो कर दी होती आने की…’’ कहतेकहते आवाज में नाराजगी स्पष्ट झलक उठी थी.

रिया के आंखों से ओझल होते ही वह रोष भरे स्वर में बोला, ‘‘तुम से मैं ने अभी आने को मना किया था न… इतनी जल्दी क्या थी… आने से पहले कम से कम एक फोन तो कर दिया होता.’’

‘‘कैसे करती फोन… न आप का मोबाइल मिलता था, न आप ने ही महीने भर से फोन किया. घर में सब कितने परेशान थे और यह क्या तमाशा है? अब मैं एक रिलेटिव हो गई हूं, बस? और पलक… पलक आप की बेटी नहीं है?’’ कहतेकहते अपमान व पीड़ा से स्मिता की आंखें भर आईं. विदेशी धरती पर वह कितनी अकेली हो गई थी.

एकाएक आशुतोष का स्वर कुछ नर्म पड़ा, ‘‘मेरा मोबाइल कुछ खराब हो गया था. और देखो स्मिता, विस्तार में मैं तुम्हें बाद में बताऊंगा. आज की हकीकत यह है कि रिया से चर्च में मेरी शादी हो चुकी है. वह मुझे बैचलर समझती थी. मेरा प्लान था कि बाद में मैं उसे किसी तरह समझा कर मना लूंगा. वह मुझे बहुत चाहती है, मेरी खुशी के लिए वह मान भी जाती. तब मैं तुम दोनों को भी यहीं बुला लेता. पर तुम ने इस तरह आ कर मेरा सारा प्लान चौपट कर दिया.’’

‘‘और आप ने जो मेरी जिंदगी चौपट कर डाली है उस का क्या? ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई थी, जो आप ने यह सब किया? आप ने यह सोच भी कैसे लिया कि इस योजना में मैं भी सहभागी बनूंगी? मुझे इस तरह धोखा दे कर आप ने अच्छा नहीं किया. हम सब की छोड़ो, पलक तक का ध्यान नहीं आया आप को?’’ बेबसी में उस की आंखें भर आई थीं.

‘‘देखो, मैं जानता हूं मैं गलत कर रहा हूं. पर रिया से संबंध बना कर यहां की हाई सोसाइटी में मेरी अच्छी पैठ हो गई है. इस के पिता काफी ऊंची पोस्ट पर हैं. उन्होंने मुझे कई तरह के बेहतर अवसर दिलाए हैं. आज की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में कितनों को ऐसे मौके मिलते हैं. तुम थोड़ा इंतजार करो बस, रिया को मैं जल्द ही मना लूंगा. फिर तुम दोनों भी यहीं आ जाना.’’

3 दिन बाद आशुतोष इंडिया जाने के लिए निकल पड़ा. एक लंबे अरसे के बाद अपने देश की मिट्टी की गंध महसूस कर उसे रोमांच हो आया. एक होटल में ठहरने का बंदोबस्त कर के वह एक टैक्सी कर रोनित से लिए पते पर जा पहुंचा.

थोड़ी देर पहले ही घर लौटी स्मिता कौफी का सिप लेती हुई ड्राइंगरूम में आ कर बैठी ही थी कि कालबैल बजी. स्मिता ने दरवाजा खोला तो सामने आगंतुक को देख चौंक उठी.

‘‘आप… आज अचानक यहां कैसे?’’

‘‘क्या अंदर आने के लिए नहीं कहोगी?’’

‘‘ओह… आइए…,’’ हिचकिचाहटपूर्वक एक तरफ हटती स्मिता ने व्यंग्य से कहा, ‘‘हम तो ठेठ भारतीय ही हैं, घर आए मेहमान को बैठने को तो कहते ही हैं. घर का पता कहां से मिला?’’

‘‘रोनित से. मैं आज सुबह ही यहां पहुंचा हूं और एक होटल में ठहरा हूं.’’

‘‘मेरे लिए इतनी तकलीफ उठाने की वजह?’’ स्मिता ने उपेक्षा से पूछा. वह चाह कर भी पति के आने पर स्वयं को खुश नहीं पा रही थी. मन का आक्रोश उस के कहे वाक्यों में झलक ही उठा था.

‘‘स्मिता मैं जानता हूं मैं ने जो कुछ तुम सब के साथ किया, अक्षम्य है. पर मैं तुम से अपनी हर गलती की क्षमा मांगने आया हूं. मेरा अपराध माफी के लायक तो नहीं, पर क्या तुम मुझे माफ कर सकोगी…?’’

बीच में ही उस की बात काटती स्मिता बोली, ‘‘रिया नहीं आई आप के साथ?’’

‘‘नहीं, वह अब इस हालत में नहीं है कि सफर कर सके. मन तो उस का भी बहुत था, पर कैंसर की वजह से बहुत कमजोर हो गई है.’’

‘‘ओह… आई एम सौरी,’’ सपाट से स्वर में स्मिता की आवाज उभरी.

‘‘तुम्हारी तबीयत खराब होने की खबर सुन कर मैं स्वयं को रोक नहीं पाया. अब कैसी हो?’’

‘‘ठीक हूं… जिंदा हूं. आप को क्षमा देने वाले तो अब इस दुनिया में रहे नहीं. रही मेरी व पलक की बात, तो पलक की तो मैं नहीं जानती, हां, अपनी बता सकती हूं. आप के कारण विश्वास टूटने पर प्यार नफरत में बदल गया था. पर नफरत के साथ जी कर जिंदगी तो नहीं गुजारी जा सकती, इसलिए मैं ने आप से नफरत करनी भी छोड़ दी. तब मुझे अपनी बच्ची के साथ जीवनसंग्राम में जूझने का हौसला मिला. आज मैं आप के प्रति उतनी ही तटस्थ हो चुकी हूं, जितनी किसी भी अन्य अजनबी के लिए हो सकती हूं. अब आप हमें शांति से रहने दें और कृपया यहां दोबारा न आएं.’’

‘‘ऐसे न कहो स्मिता… मैं एक बार अपनी बेटी से मिलना चाहता हूं, वह क्या कर रही है आजकल?’’ आशुतोष बेहद भावुक हो उठा था.

‘‘पलक अपनी फ्रैंड के साथ बाहर गई हुई है. काफी देर बाद लौटेगी. आजकल वह इंटर्नशिप के साथ ही एमएस की तैयारी भी कर रही है.’’

‘‘और अभिजीत कैसा है? कौनकौन हैं परिवार में?’’ बात करने के लिए उसे और कुछ समझ में नहीं आ रहा था.

‘‘अभिजीत के 2 बेटे हैं. बड़ा रोनित डाक्टर है, जो कनाडा में आप से मिला था और छोटा अभी इंटर में है,’’ कहते हुए स्मिता उठ कर खड़ी हो गई. परोक्ष रूप से जाने का संकेत पा कर आशुतोष भी उठ खड़ा हुआ.

उस के जाने के बाद स्मिता जीवन में अचानक आए इस मोड़ से थोड़ी विचलित हो उठी. क्या वास्तव में वह कभी उसे भूल पाई थी? कितनी ही रातें उस ने अकेले करवटें बदलते, रोते काटी थीं. क्या उन का कोई हिसाब था? उस का दर्द कौन जान सका था? पति की बेवफाई का जहर पी कर भी वह नीलकंठ सी मुसकराती रही, पलक की खुशी के लिए. पर कहीं अंदर से पति के प्रति उस की समस्त संवेदनाएं मरती चली गई थीं.

तभी फोन की घंटी घनघना उठी और उस ने रिसीवर उठा लिया, ‘‘हैलो कौन?’’

‘‘भाभी, मैं अभिजीत बोल रहा हूं, नमस्ते.’’

‘‘ओह अभि भैया, कहिए कैसे हैं आप सब? फोन कैसे किया?’’

‘‘भाभी, बेटी के डाक्टर बनने की मुबारकबाद देना चाहता हूं. सच कहूं तो यह आप की कड़ी तपस्या का ही फल है. बधाई हो.’’

‘‘आप सब को भी बधाई हो. आप सब के सहयोग के बिना तो मैं बिलकुल अकेली थी. इस दिन के लिए आप सब की भी तहे दिल से आभारी हूं. अब तो बस पलक को अच्छा घर और वर मिल जाए तो आखिरी जिम्मेदारी भी पूरी हो जाए.’’

‘‘इसीलिए तो आप को फोन किया है, भाभी… मेरे एक परिचित हैं, मिस्टर तनवीर. वे इनकम टैक्स औफिसर हैं. उन के घर के सब लोग बहुत ही मिलनसार व भले स्वभाव के हैं. उन का बेटा विवेक डाक्टरी पास कर के स्कौलरशिप पर रिसर्च करने कनाडा गया हुआ है. वहां वह रोनित का दोस्त है. रोनित ने विवेक को हर तरह से समझापरखा है. उस की बहुत तारीफ कर रहा था. विवेक अगले हफ्ते 10-15 दिनों के लिए भारत आ रहा है. आप कहें तो मैं पलक के लिए वहां बात चलाऊं?’’ अभिजीत ने कहा.

‘‘यदि आप ठीक समझते हैं, तो जरूर बात कर के देखिए, बल्कि मेरी तरफ से आप उन लोगों को यहां आने के लिए निमंत्रण दे दीजिए.’’

इस के बाद स्मिता ने आशुतोष के आने की जानकारी अभिजीत को फोन पर ही दे दी.

दीप दीवाली के- भाग 3: जब बहू ने दिखाएं अपने रंग-ढंग

इतने में एक नर्स रितु को इंजैक्शन लगाने आ गई. उस औरत की बेटी ने शायद पानी मांगा और उसे वह पानी पिलाने चली गई. रितु सोचने लगी कि उस की मम्मी भी एक औरत हैं और उस की सास भी, पर दोनों में कितना फर्क है. एक केवल शासन करना चाहती है, दूसरी नम्रतापूर्वक अनुसरण. एक किसी के घर को तोड़ना चाहती है, तो एक घर को बचाने के लिए स्वयं तकलीफ उठाती है. एक में दिखावा है, अभिमान है तो दूसरी में गंभीरता एवं सहजता है. पहली नारी है इसलिए सम्माननीय है, दूसरी सम्मान के साथसाथ श्रद्धा व प्रेम की पात्र भी है. एक केवल जननी है तो दूसरी मां. रितु की आंखें छलक रही थीं.

‘‘बेटा, चाय पी लो,’’ रामअवतार की आवाज से रितु का ध्यान भंग हो गया. रितु ने बड़े ध्यान से अपने ससुर की ओर देखा और सोचने लगी इस व्यक्ति ने आज तक मुझे बेटा के सिवा और किसी नाम से बात नहीं की और न ही कठोर शब्द बोले. इन लोगों के साथ गलत व्यवहार कर के मैं ने बहुत बड़ा अपराध किया है. फिर रितु का ध्यान भंग हुआ क्योंकि रामअवतारजी बगल वाली स्त्री से कह रहे थे :

‘‘बहनजी, आप को एक कष्ट दे रहा हूं. आप मेरी बहू को हाथ लगा कर उठा दें, ताकि वह चाय पी ले.’’

वह औरत उठी और रितु को उठा कर चाय पिलाने लगी तो रामअवतारजी वार्ड से बाहर चले गए. करीब 10 बजे सुनयना खिचड़ी और कुछ साफसुथरे कपड़े ले कर आ गईं और रितु को धीरे से बैठा कर चम्मच से अपने हाथ से खिलाने लगीं. आज उसे यह खिचड़ी मोहनभोग के समान लग रही थी.

शाम को करीब 4 बजे रितु के पापा गिरधारी प्रसाद और उस की मम्मी रजनी ने एकसाथ वार्ड में प्रवेश किया. उस समय सास सुनयना रितु के बालों में कंघी कर रही थीं. बैड की दूसरी तरफ एक खाली बैंच पर वे दोनों बैठ गए. दोनों का यहां आना ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी पार्टी में आए हों. गिरधारी प्रसाद बारबार अपनी टाई को ठीक कर रहे थे और रजनी का तो कहना ही क्या था. दोनों के कपड़ों से महंगे परफ्यूम की खुशबू आ रही थी. पूरा जच्चाबच्चा वार्ड उस खुशबू से महक रहा था. दोनों ने औपचारिकता- वश हाथ जोड़ कर सुनयना को नमस्कार किया पर फिर उन  से कोई बात नहीं की.

एक थैले में कुछ सामान रख कर सुनयना ने उठते हुए कहा, ‘‘रितु, जितना मुझ से बन सका मैं ने कर दिया. अब तुम्हारे मम्मीपापा आ गए हैं, अब मैं अपने घर जा रही हूं. तुम भी एक सप्ताह बाद अपना टांका कटवा कर अपने घर चली जाओगी और हां, आज तक की दवाइयों का और अस्पताल के बिल का भुगतान मैं ने कर दिया है, जिस की सारी रसीदें तुम्हारे तकिए के नीचे रखी हैं. अखिलेश आएगा तो उसे मेरा आशीर्वाद कह देना.’’

इतना कह कर चलने के लिए जैसे ही उन्होंने कदम बढ़ाया, अचानक लगा कि उन का आंचल कहीं फंस गया है. उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा तो रितु उन का आंचल पकड़े हुए है और डबडबाई आंखों से उन्हें ही देखे जा रही है. सुनयना ने आंचल छुड़ाने का प्रयास किया तो रितु धीरे से बोली, ‘‘मम्मी, क्या अपनी इस मूर्ख बेटी को माफ नहीं करोगी?’’

सुनयना ने झट से रितु का सिर अपनी छाती से लगा लिया और उस समय उन की भी आंखें छलछला उठीं. उन्होंने उस के माथे को सहलाते हुए कहा, ‘‘पगली, कहीं मां भी अपनी बेटी से नाराज होती है, स्वयं को मूर्ख क्योें कहती है. अरे, सैकड़ों लड़कियों में से चुन कर तुझे मैं अपने घर लाई थी तो तू मूर्ख कैसे हो गई. तू मेरी बहू नहीं बेटी है और बेटी ही तुझे समझा है.’’

सुनयना रोती जा रही थीं और कहती जा रही थीं, ‘‘ज्यादा नहीं रोते बेटा. अभी तुम्हारा शरीर कमजोर है, टांके कच्चे हैं, रोने से उन पर जोर पड़ता है और टूटने का भय रहता है,’’ यह कहते हुए वे अपने आंचल से उस के आंसुओं को पोंछने लगीं.

अचानक सुनयना का ध्यान दूसरी तरफ बैठे गिरधारी प्रसाद और उन की पत्नी रजनी की ओर गया तो वे लोग कब के चले गए थे. शायद रजनी ने सोचा होगा कि यहां अब उन का कोई काम नहीं, क्योंकि उन की कोई भी विद्या अब रितु पर असर नहीं करने वाली.

एक सप्ताह बाद रितु के टांके कट चुके थे और उसे अस्पताल से छुट्टी की अनुमति मिल गई थी. अखिलेश भी टूर से वापस आ गया. जब वह अपने कमरे पर गया तो उसे वहां सारी बातों की जानकारी मिल गई. वह अपना सामान कमरे में रख कर सीधे ही अस्पताल चला गया. मां को रितु के पास देख कर पहले तो ग्लानि से अखिलेश के पांव ही आगे नहीं बढ़ पा रहे थे, लेकिन जब उस ने रितु और अपनी मम्मी को मुसकराते हुए देखा तो मम्मी के पास जा कर उन के चरण छू कर प्रणाम किया.

अस्पताल से जिस दिन रितु को छुट्टी मिली उस ने स्पष्ट कह दिया कि वह अब किराए के मकान में न जा कर मम्मी के साथ सीधे अपने घर जाएगी. इसलिए उसे ले कर सुनयना घर आ गई थीं. अब उस घर में खुशियां ही खुशियां थीं. सभी के चेहरे मुसकराते रहते थे. नन्ही सी जान सब के लिए खिलौना बनी हुई थी.

रितु पर अभी बहुत प्रतिबंध था इसलिए वह केवल अपने कमरे में लेटी रहती थी. घर का सारा काम सुनयना ही करती थीं.

सुनयना ने रितु के पास आ कर कहा, ‘‘बेटी, मैं जरा बाजार जा रही हूं और बाहर से ताला लगा देती हूं ताकि तुझे बारबार उठना न पड़े,’’ और वे बाहर से ताला लगा कर चली गईं. रितु अपने कमरे में आ कर बेटी को दूध पिलाते हुए सो गई. अचानक उस की आंख खुली तो देखा कि कमरे में ट्यूबलाइट जल रही है. वह धीरे से अपने कमरे से बाहर निकली तो देखा कि आंगन में चावल के घोल का अल्पना बना हुआ था और वहां पर बहुत से दीपक रखे हुए हैं जिन्हें मम्मीजी बैठ कर जला रही हैं.

दीवाली बीतने के बाद मम्मीजी दीपक जला रही हैं. यह रहस्य उस की समझ में नहीं आ रहा था. वह धीरे से अपनी सास के पास गई. रितु की पायल की आवाज से सुनयना का ध्यान दरवाजे की ओर गया तो उन्होंने देखा कि दरवाजे पर रितु खड़ी है.

रितु ने आश्चर्यचकित स्वर में पूछा, ‘‘मम्मी, दीवाली तो कब की बीत गई… फिर ये सब आज क्यों?’’

सुनयना मुसकराते हुए रितु की ठोड़ी को ऊपर उठाते हुए बोलीं, ‘‘मेरे घर वर्षों बाद मेरे बच्चे आए हैं तो दीवाली तो अभी ही मनाऊंगी. मेरी बेटी दीवाली के बाद गई थी और दीवाली के बाद अपने साथ मेरी पोती भी ले कर आई है. इस खुशी में मैं ने आज दीवाली मनाई है. जाओ, तुम भी अच्छी सी साड़ी पहन लो और नूपुर को नए कपड़े पहना दो. मैं ने तुम दोनों के लिए नए कपड़े अलमारी में रख दिए हैं, फिर हमसब साथ मिल कर दीपक जलाएंगे.’’

रितु का हृदय गद्गद हो गया. वह अलमारी से कपड़े ले कर बाथरूम में बदलने चली गई. रितु ने झुक कर पहले सुनयना के पैर छू कर प्रणाम किया, फिर उस ने कहा कि मम्मी, नूपुर को आज यही आशीर्वाद दें कि इस में आप के जैसे गुण आ जाएं और वह जिस घर में जाए उस घर को स्वर्ग बना दे.

आंगन में रखी परात में जो 11 दीपक जल रहे थे, आज उन की लौ रितु को बड़ी ही सुंदर लग रही थी. वह अपलक केवल जलते दीपकों को ही देखे जा रही थी और वे जलते हुए दीपक उसे यों लग रहे थे मानो उन दीपकों की लौ से उस का जीवन ही जगमगा गया.

दीप दीवाली के- भाग 2: जब बहू ने दिखाएं अपने रंग-ढंग

दीवाली का त्योहार आया तो हर घर में धूमधाम से तैयारी शुरू हो गई, घरों में दीप जलाए जा रहे थे, पर सुनयना और रामअवतार दोनों उदास बैठे अतीत की यादों में खोए रहे. उन में त्योहार को ले कर न कोई उत्साह था न कोई उमंग. शाम को सुनयना केवल एक दीपक जला कर आंगन में रख आईं.

दीवाली के 2 दिन बाद रामअवतार को आफिस भेज कर सुनयना बच्चों को पढ़ाने चली गईं और जब वे शाम को लौट रही थीं तो रास्ते में उन की मुलाकात एक अनजान औरत से हो गई, जो उन्हें जानती थी पर सुनयना उसे नहीं जानती थीं.

पहले तो उस स्त्री ने सुनयना को नमस्ते की, फिर बताया कि रितु व अखिलेश उस के मकान के पास ही रहते हैं. आज रितु की तबीयत ज्यादा खराब थी और उसे उस के मकानमालिक आटोरिकशा से अस्तपाल ले गए हैं, क्योंकि अखिलेश यहां है नहीं और रितु की डिलीवरी होने वाली है.

सुनयना ने जब उस औरत से यह पूछा कि रितु के मकानमालिक उसे ले कर किस अस्पताल गए हैं, तो उस ने वर्मा नर्सिंग होम का नाम बता दिया.

सुनयना जल्दी से घर आईं और एक थैले में कुछ आवश्यक सामान रखा. अलमारी में जो पैसा रखा था उसे लिया और घर को ताला लगा कर आटो से वर्मा नर्सिंग होम चली गईं. वहां जा कर जब रितु के बारे में पता किया तो पता चला कि बच्चा नार्मल नहीं हो सकता इसलिए डाक्टर रितु को आपरेशन थिएटर में ले गए हैं. तभी एक नर्स ने आ कर आवाज लगाई कि रितु के साथ कौन है? डाक्टर एक फार्म पर साइन करने और आपरेशन फीस जमा कराने के लिए बुला रहे हैं.

सुनयना नर्स से जब रितु के बारे में पूछ रही थी तब वहीं पर रितु के मकान मालिक भी खड़े थे. वे समझ गए कि यह स्त्री शायद अखिलेश की मां हैं तभी इतनी बेचैनी से पूछ रही हैं. उन्होंने हाथ जोड़ कर सुनयना को नमस्ते किया और फिर सारी बातें उन्हें बता दीं. सुनयना ने भी उन्हें बता दिया कि रितु उन की बहू है.

सुनयना उस नर्स के साथ डाक्टर के कक्ष में चली गईं और डा. विमला भाटिया को नमस्ते कर उन्हें अपना परिचय दिया कि रितु उन की बहू है और वे आपरेशन की फीस जमा कराने आई हैं. पहले तो डाक्टर ने उन से एक फार्म पर हस्ताक्षर करवाए और फिर आपरेशन के लिए 25 हजार रुपए जमा कराने को कहा.

‘‘डाक्टर साहब, अभी तो आप 10 हजार रुपए जमा कर लें. बाकी पैसा मैं अपने पति से फोन कर के मंगवा लेती हूं, जब तक आप उस का आपरेशन करें. मुझे किसी भी हालत में जच्चा व बच्चा स्वस्थ चाहिए.’’

‘‘ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है. सब ठीक होगा. हां, आप यह पैसा काउंटर पर जा कर जमा करा दें और रसीद प्राप्त कर लें. वहीं से आप अपने पति को फोन भी कर दें.’’

डाक्टर के पास से आ कर सुनयना ने काउंटर पर जा कर पैसा जमा कर दिया और रसीद ले कर वहीं से रामअवतारजी को फोन कर के सारी बातें बता दीं. साथ ही यह भी कह दिया कि जल्दी से 15 हजार रुपए ले कर वर्मा नर्सिंग होम में आ जाएं.

करीब डेढ़ घंटे बाद रामअवतारजी वहां पर पैसा ले कर पहुंच गए लेकिन रितु के मम्मीपापा अभी तक नहीं आए थे. वे आपरेशन रूम के पास एक बैंच पर सुनयना के साथ बैठ कर इंतजार करने लगे. थोड़ी देर बाद एक नर्स सुनयना के पास आ कर पूछने लगी कि रितु के साथ कौन आया है.

सुनयना ने कहा, ‘‘मैं हूं.’’

‘‘बधाई हो, लड़की हुई है,’’ नर्स ने कहा, ‘‘बच्ची और उस की मां दोनों स्वस्थ हैं,’’ फिर थोड़ी देर बाद एक नर्स ने लड़की को ला कर सुनयना को दिखाया जिसे बड़े प्यार से उन्होंने पहले तो देखा फिर उस का माथा चूम अपने पति से कुछ इशारा किया. रामअवतारजी ने 500 रुपए का नोट निकाल कर नर्स को देते हुए कहा कि यह मेरी तरफ से आप सब लोगों को मिठाई खाने के लिए है.

थोड़ी देर बाद रितु को एक स्ट्रैचर पर लिटा कर वार्ड में लाया गया. उस समय वह बेहोश थी. वार्ड में एक बिस्तर पर लिटा कर उस के पास के पालने में बच्ची को भी लिटा दिया गया. सुनयना वहीं एक बैंच पर बैठ कर कभी बच्चे को तो कभी रितु को देखती रहीं और पति को घर भेज दिया.

करीब साढ़े 4 घंटे बाद रितु को होश आया. उस ने आंखें खोलीं तो देखा उस की सास सुनयना उस के पास बैठी हैं और उस की गोद में एक बच्चा है.

‘‘लक्ष्मी आई है, ठीक तुम्हारी तरह. तुम भी शायद जब पैदा हुई होगी तो ऐसी ही होगी,’’ सुनयना ने मुसकराते हुए कहा और रितु के माथे पर हाथ फेरने लगीं. रितु को बड़ा अच्छा लग रहा था. तभी उस के मकानमालिक भी वहां आ गए और बोले, ‘‘रितु, जब तुझे ले कर यहां आ रहा था तब मेरी पत्नी की तुम्हारी मम्मी से बातें हुई थीं और उन्होंने कहा था कि वे जल्द ही अस्पताल पहुंच रही हैं, पर अभी तक न खुद आईं और न तुम्हारे पापा आए हैं.’’

शाम हो गई थी, अभी तक सुनयना ने कुछ नहीं खाया था, बल्कि चाय तक भी नहीं पी थी. रात भर वह बैड के पास स्टूल पर बैठी कभी रितु का सिर दबातीं तो कभी बच्ची के रोने पर उसे उठा कर घुमातीं. इस तरह जिम्मेदारी को ढोते उन की रात आंखोंआंखों में कट गई.

सुबह रामअवतार थर्मस में चाय ले कर आए और दोनों को कपों में डाल कर चाय दी, फिर पत्नी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम अब घर जाओ. मैं यहां बैठता हूं. कल से तुम ने खाना भी नहीं खाया है. तुम्हारा खाना किचन में कल से ज्यों का त्यों बना हुआ रखा है. घर जाओ और रितु के लिए खिचड़ी बना कर लेती आना. तब तक मैं यहां पर बैठता हूं. आज मैं ने आफिस से छुट्टी ले रखी है.’’

सुनयना दोनों को बहुत सी हिदायतें दे कर चली गईं. रामअवतार वहीं बैंच पर बैठ गए. करीब 1 घंटे बाद कुछ सोच कर रितु से उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, मैं जरा बाहर बैठता हूं, कोई चीज चाहिए तो नर्स से कहलवा देना,’’ और वार्ड से बाहर निकल गए.

रितु के बगल वाले बैड पर भी एक स्त्री को आपरेशन से बच्चा हुआ था. उस की देखभाल के लिए उस की मां वहीं पर बैठी हुई थीं. जब रामअवतार वार्ड से बाहर चले गए तब वह औरत अपनी जगह से उठ कर रितु के बैड के पास आ गई और पूछने लगी, ‘‘तुम्हारे मम्मीपापा अच्छे स्वभाव के मालूम पड़ते हैं. खासकर तुम्हारी मम्मी तो बहुत ही अच्छी हैं. बेचारी रातभर तुम्हारी सेवा करती रही हैं.’’

‘‘ये दोनों मेरे मम्मीपापा नहीं, सासससुर हैं.’’

‘‘क्या?’’ वह औरत आश्चर्य से रितु का मुंह देखने लगी. फिर उस ने कहा, ‘‘क्या दुनिया में ऐसी भी सास होती है, जो कल से बिना खाएपिए अपनी बहू की सेवा कर रही है. बेटी, तुम बहुत खुशनसीब हो जो तुम्हें ऐसे सासससुर मिले हैं. पूरा वार्ड अब तक यही समझ रहा था कि ये तुम्हारे मम्मीपापा हैं. कोई सास अपनी बहू के लिए इतना कर सकती है यह मैं ने पहली बार देखा है. अगर हर सास तुम्हारी सास जैसी हो जाए तो कोई बहू जल कर नहीं मरेगी, कोई बहू गले में फंदा लगा कर नहीं मरेगी. कोई बहू जहर खा कर या गाड़ी के नीचे आ कर अपनी जान नहीं देगी.

‘‘मैं तो तुम्हें यही कहूंगी कि कभी अपनी सास को तकलीफ मत देना, कभी उन से कठोर बातें मत बोलना और बेटी, सच्चे मन से उन की बुढ़ापे में सेवा करोगी तो इस बुढि़या की आत्मा तुम्हें आशीर्वाद ही देगी.’’

स्वयंसिद्धा- भाग 7: जब स्मिता के पैरों तले खिसकी जमीन

हर कक्षा अव्वल नंबरों से उत्तीर्ण करती हुई पलक अब आकर्षक, बुद्धिमान एवं आधुनिक तरुणी बन चुकी थी. पारिवारिक संस्कार एवं आधुनिकता के अद्भुत संगम वाले व्यक्तित्व की स्वामिनी पलक आधुनिक पीढ़ी की सोच के अनुरूप ही हर बात तार्किक ढंग से सोचनेसमझने में विश्वास रखती थी.

प्रथम श्रेणी में इंटर करने के साथ ही उस का मैडिकल की हर प्रतियोगी परीक्षा में चयन होने से घर में खुशी की लहर दौड़ गई थी. एक लंबे अंतराल के पश्चात स्मिता ने सुख व चैन की सांस ली. बेटी के जीवन की एक दिशा तय होने के सुकून के साथ ही अपनी जिम्मेदारियों का सही निर्वाह कर पाने का संतोष भी था. मैडिकल कालेज में दाखिला होते ही पलक भी दूसरे शहर चली गई. उस के बाद के 5-6 वर्ष तो जैसे महीनों में बंट कर रह गए. हर वर्ष छुट्टियों में पलक के आने पर स्मिता के लिए तो घर में त्योहार जैसा माहौल हो जाता था. जितनी बेकरारी से वह बेटी के आने का इंतजार करती थी, उस के जाने के बाद उतनी ही बेचैन हो जाती. पर उस बेचैनी में भी कहीं गहरा आत्मसंतोष होता था. बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए सभी मांबाप कभी न कभी इस दौर से गुजरते ही हैं. आज बेटी को डाक्टर बन कर अपनी डिगरी प्राप्त करते देख उस के पूरे जीवन की तपस्या मानो सार्थक हो उठी थी.

पुरानी यादों में खोई स्मिता को समय बीतने का कुछ पता ही न चला था. उस ने घड़ी पर निगाह डाली. उसे आए घंटा भर से कुछ ज्यादा ही हो चुका था. पलक के आने का समय हो रहा था. आज पलक की पसंद का पूरा डिनर बनाने वह किचन की तरफ बढ़ गई.

आशुतोष ने स्मिता व पलक को आननफानन वापस तो लौटा दिया था पर रिया के सम्मुख भला बना रह कर भी वह अपनी नजरों में गिर गया था. जहां एक तरफ उसे अपना झूठ न पकड़े जाने का संतोष था, वहीं दिल के किसी कोने में उन दोनों के साथ किए गए अन्याय का अपराधबोध भी.

घर व परिजनों से दूर, बेइंतहा कमाई, कोई रोकनेटोकने वाला नहीं, ऐसे में माहौल के खुलेपन व समय के खालीपन को भरता रिया जैसी अत्याधुनिक विचारों वाली युवती का संग. वह भूल ही गया कि उस की पत्नी दूर भारत में कहीं उस के आने का इंतजार कर रही है. छोटी सी बेटी बाट जोह रही है. रिया के डैडी के उच्च सामाजिक रुतबे व रिया द्वारा किए गए प्रेम निवेदन की पहल ने उसे अपने विगत को बिसरा एक नए जीवन की शुरुआत करने के लिए उकसाने में अहम भूमिका निभाई थी. जल्द से जल्द समाज में ऊंचा रुतबा हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में शामिल हो कर, अपना जमीर मार कर उस ने पैसा तो बहुत कमाया, परंतु दिल का एक कोना सदैव खाली रहा. पैसे से सुविधाएं ही तो खरीदी जा सकती हैं, संतोष नहीं. वह चाह कर भी कभी रिया को अपने अतीत के बारे में नहीं बता पाया.

विवाह के कुछ ही वर्षों बाद दोनों में अकसर छोटीछोटी बातों पर विवाद हो जाता. पश्चिमी संस्कृति में पलीबढ़ी रिया पति की हर बात तोलपरख कर मानती. रिया का शक्की एवं झगड़ालू स्वभाव अकसर उसे स्मिता की याद दिला जाता. तब पछताने के अलावा वह कुछ न कर पाता. उसे हैरानी भी होती थी कि रिया के स्वभाव का यह शक्कीपन वह पहले क्यों नहीं महसूस कर पाया? मातापिता के न रहने का दुखद समाचार पा कर भी, कुछ तो रिया की गिरती सेहत व कुछ अपने काम के बोझ तले दबा वह भारत जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया.

रिया के स्वास्थ्य संबंधी टैस्टों की रिपोर्ट देख कर तो उस के पैरों तले जमीन ही खिसक गई थी. कैंसर के बेरहम पंजों में दबी वह धीरेधीरे मौत के मुंह में जा रही थी. आशुतोष ने उस के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी. महंगी से महंगी दवाओं तथा अत्याधुनिक तकनीकों के सहारे उसे जिंदगी के कुछ वर्ष और मिल गए. उन्हीं दिनों अचानक आशुतोष से मिलने एक आकर्षक नवयुवक उस के घर पहुंचा. अपने भतीजे को पहचानने में उसे अधिक देर नहीं लगी. उसे देखते ही आशुतोष ने उसे गले लगा लिया. बिलकुल उस के छोटे भाई का ही तो प्रतिरूप था रोनित, जिसे सामने देख न जाने कितनी भूलीबिसरी यादें ताजा हो आई थीं.

बचपन से अपने पिता के मुंह से उन के बड़े भाई की बातें गाहेबगाहे सुनते बड़ा हुआ रोनित कनाडा में स्कौलरशिप पर जब पढ़ने पहुंचा, तो बरसों से घर से बिछुड़े सदस्य से मिलने की तीव्र इच्छा दबा न सका और पिता से उन का पता ले कर ढूंढ़ता हुआ पहुंच ही गया. रिया ने भी उस का परिचय जान कर उस की मेहमाननवाजी में कोई कमी नहीं छोड़ी थी. बचपन से सब को रिया के खिलाफ बोलते सुनते आए रोनित के मन में रिया की बहुत ही खराब छवि बनी हुई थी पर यहां तो बिलकुल उलटा ही मिला था. देर तक अपना दुखसुख सुनाने के बाद जब आशुतोष को पता चला कि इधर स्मिता की तबीयत हाई ब्लडप्रैशर व कुछ अन्य कारणों से अकसर खराब रहती है तथा कुछ दिन पहले अपैंडिक्स का औपरेशन भी हो चुका है, तो उसे झटका सा लगा था. चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं. रिया के सामने स्मिता के जिक्र से आशुतोष थोड़ा सकपकाया पर रिया अचंभित हुए बिना चुपचाप उन की बातें सुनती रही. आशुतोष ने रोनित से सब के पते ले लिए थे.

रोनित के जाने के बाद आशुतोष व रिया के बीच एक बोझिल सा मौन पसर गया. आशुतोष को हैरानी हो रही थी कि रिया ने उस के अतीत की सचाई जानने के बाद भी उस से कोई प्रश्न क्यों नहीं किया? अनुत्तरित प्रश्नों के भंवर से घिरे आशुतोष ने आखिर इस सन्नाटे को तोड़ते हुए कुछ कहना शुरू किया ही था कि रिया ने अपने निर्बल हाथ से उस की कलाई पकड़ कर उसे रोकने का उपक्रम किया तो वह चौंक गया. उसे रिया की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘आशु तुम हैरान होगे कि मैं ने तुम्हारे अतीत के बारे में जान कर भी तुम से कोई प्रश्न क्यों नहीं किया?’’

‘‘दरअसल, मैं खुद तुम्हें बताना चाहता था पर…’’

‘‘बस, अब कुछ नहीं बोलो मेरी सुनो. सच तो यह है कि शादी के कुछ वर्षों बाद ही मैं तुम्हारी पहली शादी के बारे में जान गई थी. जब स्मिताजी यहां आई थीं तब तो मैं उन्हें नहीं जानती थी. पर काफी दिन बाद हमारी मेड सर्वेंट चीना ने मुझे उन के बारे में बताया था. उस दिन उसी ने उन को अटैंड किया था अत: बातोंबातों में वह उन का परिचय जान गई थी. तुम्हें खो देने के डर से न चाहते हुए भी मैं तुम से कुछ पूछ नहीं पाई. सोचा, जैसे चल रहा है चलने दूं. उन का ध्यान आने पर कहीं तुम वापस न चले जाओ. पर तुम्हारे अतीत की जानकारी ने मुझे तुम्हारे प्रति शक्की बना दिया था. तुम्हें प्यार करते हुए भी, तुम पर मैं विश्वास न कर सकी. साथ ही, चाहते हुए भी स्मिता दीदी से कभी माफी न मांग पाई. तुम इंडिया जा कर मेरी तरफ से उन से क्षमा जरूर मांग लेना. अनजाने में ही सही, मैं उन की गुनहगार तो हूं ही.’’

आशुतोष केवल इतना ही कह सका, ‘‘तुम्हें मुझे बताना तो चाहिए था.’’

‘‘तो क्या तुम्हें नहीं बताना चाहिए था? उस समय शायद हम दोनों ही अपनेअपने स्वार्थ में अंधे हो गए थे. तुम्हें खो देने के डर से मेरे होंठ सिले रहे, पर आज जब जिंदगी मुझ से दामन छुड़ाने लगी है, मुझे एहसास हो रहा है कि हम ने स्मिता के साथ कितना बड़ा अन्याय किया है. हमारा रिश्ता ही दुरावछिपाव की बुनियाद पर रखा गया था, तो सुख कहां से मिलता? आज रोनित के मुंह से उन की अस्वस्थता का समाचार सुन कर तुम्हारी आंखों में उभर आई चिंता देख मुझे अपना अपराध और भी खल रहा है. पता नहीं क्यों, मैं तुम दोनों के बीच आ गई,’’ कहतेकहते रिया का स्वर भर्रा उठा.

‘‘मैं सोच रहा हूं एक बार इंडिया जाऊं, सब से मिलूं, पर तुम तो कमजोरी के कारण सफर कर नहीं पाओगी और यहां तुम्हें अकेला…’’

‘‘ओह, तुम मेरी चिंता न करो… मैं यहां मां को बुला लूंगी और नर्स तो 24 घंटे रहती ही है. मैं तो यों भी कुछ ही दिनों की मेहमान हूं, जाने से पहले तुम्हारे जीवन में सब ठीक से व्यवस्थित होता देख लूं तो चैन से मर सकूंगी. तुम जाओ मेरी तरफ से माफी जरूर मांगना,’’ कहतेकहते वह आशुतोष के सीने में मुंह छिपा कर फफक पड़ी. दिल पर रखा बोझ हटते ही आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा था.

स्वयंसिद्धा- भाग 6: जब स्मिता के पैरों तले खिसकी जमीन

स्मिता हलके से मुसकराई फिर बोली, ‘‘रुकिए… दूसरों से हम जितनी अपेक्षाएं रखते हैं, यदि उस की आधी भी दूसरों के प्रति पूरी करें तो शायद जिंदगी ज्यादा खुशहाल हो जाए. आज आप ने ईमानदारी से उत्तर दिया तो खुशी हुई कि आप को अपने किए का एहसास है. समस्याएं तो हम सब के जीवन में आती हैं. यह हम पर है कि हम उस समस्या को खींच कर बड़ा बना देते हैं या उस का समाधान ढूंढ़ कर उसे हल करते हैं. कोई भी समस्या इंसान से बड़ी नहीं होती. हम सब इंसान ही हैं, हम से गलतियां भी हो जाती हैं पर कहते हैं, प्रायश्चित्त के आंसू गुनाह धो देते हैं और माफ करने वाला छोटा नहीं हो जाता… ऐसा किसी ने मुझे समझाया है,’’ कहते हुए उस ने कविता की तरफ देखा जिस की आंखों में खुशी के आंसू झिलमिला उठे थे.

‘‘अपने परिवार की खुशी ही सदैव मेरी प्राथमिकता रही है… अगर सब यही चाहते हैं तो…’’ आगे कुछ कहते सहसा वह रुक गई.

उस की बातों का अर्थ समझते ही अभिजीत खुशी से भर उठा, ‘‘मुझे आप से यही उम्मीद थी भाभी…’’ और दौड़ कर आशुतोष को खींच कर स्मिता के बगल में खड़ा कर दिया. मौसी भी खुश हो कर दोनों को ढेरों शुभकामनाएं देने लगीं.

पलक तनिक हैरानी से मां को देखते फुसफुसा कर बोली, ‘‘मां आप के स्वाभिमान को यह गंवारा होगा?’’

‘‘बेटा… मेरा स्वाभिमान तो आज भी अपनी जगह है. पर पति हर स्त्री का अभिमान होता है, उसे कैसे वापस कर दूं?’’

पलक दौड़ कर अपनी मां के गले से लिपट गई. स्वयंसिद्धा के मान ने सब को जीवन की नई खुशियों से भर दिया था.

‘‘हरगिज नहीं… मैं रिया को अभी सब कुछ बता दूंगी. वह भले ही तैयार हो जाए पर मैं तैयार नहीं हूं ऐसी जिंदगी के लिए.’’

आशुतोष ने बिफरते हुए एकाएक स्मिता को चांटा मारने के लिए हाथ उठा लिया तो स्मिता चौंक गई. आशुतोष उसे धमकाते हुए बोला, ‘‘खबरदार जो इस विषय में तुम ने रिया से कोई बात की. तुम्हारे लिए अंजाम अच्छा न होगा, मैं कुछ भी कर सकता हूं.’’

उस का यह रूप देख कर स्मिता में न जाने कहां से हिम्मत आ गई. क्रोध से उस की आंखें लाल हो उठीं, ‘‘मारना चाहते हो? यह शौक भी पूरा कर लो. पैसे की हवस ने तुम्हें अंधा बना दिया है. मुझे यह सोच कर शर्म आती है कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं. बस आज के बाद से हमारा कोई संबंध नहीं है.’’

उसी क्षण स्मिता ने अपना सामान समेटा व सहमी हुई पलक का हाथ थामे वापस एअरपोर्ट की तरफ निकल गई. रिया तब तक बाहर नहीं आई थी. आशुतोष ने उसे रोकने की कोई चेष्टा नहीं की. चुपचाप उसे जाते देखता रहा.

आते समय स्मिता के मन में जितनी उमंग व उत्साह था, वापसी का सफर उतना ही कष्टप्रद था. सारी घटनाएं एक के बाद एक इतनी तेजी से घटती चली गईं कि कहीं कुछ सोचनेसमझने की गुंजाइश ही नहीं थी. पर अब अकेले सफर में उस के सामने भविष्य की अनेकानेक समस्याएं सिर उठाए खड़ी थीं. पूरा जीवन उसे इसी छले गए विश्वास के दंश के साथ ही बिताना था. नन्ही पलक का क्या गुनाह था जो उसे पिता के प्यार से वंचित रहना पड़ेगा? क्या उसे आशुतोष के साथ उन्हीं परिस्थितियों में समझौता कर के जिंदगी गुजारनी चाहिए थी? तुरंत उस के दिल से आवाज आई, ‘हरगिज नहीं. नारी सब कुछ बरदाश्त कर सकती है पर सौत नहीं.’

बेहद तनाव भरे अगले कुछ घंटे गुजारने के पश्चात घर वापस पहुंच कर स्मिता को कुछ राहत मिली. अप्रत्याशित रूप से तीसरे ही दिन बहू को वापस आया देख मां व बाबूजी हतप्रभ रह गए. पर सहमी, चुप खड़ी पलक एवं स्मिता की उदास व सूजी आंखों से उन्होंने घट चुकी अनहोनी का अंदाजा लगा लिया था. मां को सामने पा कर स्मिता स्वयं को रोक न सकी और उन के गले लग फूटफूट कर रो पड़ी. जब दिल का गुबार कुछ हलका हुआ, तो उस ने उन्हें वहां का पूरा हाल कह सुनाया. सारी बात सुन कर बेटे की नालायकी से मांबाप को गहरा आघात पहुंचा था, पर अपनी पीड़ा भूल कर उन्होंने स्मिता को सांत्वना देते हुए कहा कि वे सब ठीक करने की कोशिश करेंगे.

‘‘अब क्या ठीक होगा मां… बचा ही क्या है? मैं उन पर जबरन कोई रिश्ता थोपना नहीं चाहती. वे यदि इसी में खुश हैं तो यही सही,’’ कह कर स्मिता अंदर चली गई.

स्मिता के पहुंचने के अगले ही दिन आशुतोष का फोन आया. रिसीवर उस के पिता ने ही उठाया था. पिता द्वारा समझाए जाने पर जब उस ने खुद को सही ठहराने का प्रयास किया और सालडेढ़ साल बाद उन्हें अपने पास बुला लेने के लिए कहा, तो उन्होंने उसे कड़ी फटकार लगाते हुए यहां तक कह दिया कि आज से वे सोच लेंगे कि उन का एक ही बेटा है और स्मिता भी अब उन की बहू नहीं, बल्कि बेटी है. वे स्वयं उस की दूसरी शादी करवाएंगे.

पर स्मिता ने दृढ़ स्वर में इसे नकार दिया, ‘‘नहीं बाबूजी… मुझे नहीं करनी है दूसरी शादी. एक गलती उन्होंने की है, अब मैं दूसरी नहीं करना चाहती. बस आप लोगों की छत्रछाया बनी रहे. मेरी जिंदगी का लक्ष्य अब केवल मेरी बेटी का भविष्य होगा. मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

जिंदगी फिर इतनी आसान नहीं रह गई थी. कालेज की लैक्चररशिप तो उस ने तुरंत ही जौइन कर ली थी. नौकरी अब उस के लिए शौक नहीं वरन एक जरूरत बन गई थी. मुश्किलों के इस दौर में भी उस ने हिम्मत नहीं हारी और वक्त के इम्तिहान में हर चुनौती का सामना पूरे आत्मविश्वास के साथ किया. उस के साथ घटी बात की जानकारी केवल उस के चंद मित्रों व परिवार तक ही सीमित थी. अंजलि ने इस कठिन वक्त में स्मिता को एक सच्चे दोस्त की तरह मानसिक संबल दिया.

कालेज में सब की अपेक्षाओं पर खरी उतरती स्मिता ने घर में भी सारी जिम्मेदारियां बिना कहे ही संभाल ली थीं. मांबाबूजी के मार्गदर्शन में अभिजीत का विवाह एक सुशिक्षित एवं सुशील युवती कविता से तय कर के, बड़ी धूमधाम के साथ संपन्न कराया. मांबाबूजी दोनों बहुओं की तारीफ करते नहीं थकते थे.

कतराकतरा होती जिंदगी सप्रयत्न सहेज स्मिता सारा दिन स्वयं को अनेकानेक जिम्मेदारियों के निर्वाह में व्यस्त रखती, परंतु कभीकभी नन्ही पलक जब अपने पापा की याद में हुड़कती, तो उस पल को झेलना उसे सर्वाधिक दुष्कर लगता. ऐसे में उसे परिवार वालों का भरपूर सहयोग मिलता. कभी उस के चाचाचाची, जिन्हें पलक छोटे पापा व छोटी मां कहती थी, तो कभी उस के दादादादी, जिन्हें वह बड़े पापा व बड़ी मां कहती थी, अपनीअपनी तरह से उसे बहलाने का प्रयत्न करते थे. स्मिता भी अपनी तरफ से उसे मांबाप दोनों का प्यार देने का पूरा प्रयास करती थी. धीरेधीरे समय अपनी रफ्तार से गुजरता रहा. अभिजीत का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया. दिन महीनों में व महीने सालों में बदलते रहे. वसंत व पतझड़ एक के बाद एक आते रहे.

लंबी बीमारी के बाद ससुर का निधन होने पर घर में सब दुख से भर उठे. आशुतोष ने खबर पहुंचने के बाद भी मात्र संवेदना कार्ड भेज कर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली. बेटे की हृदयविदारक उपेक्षा का दुख मां को गहरा आघात दे गया था, जिसे वे साल भर से ज्यादा नहीं झेल पाईं और चल बसीं. स्मिता एक तरह से बिलकुल अकेली रह गई थी. नातेरिश्तेदार भी संवेदना व्यक्त कर के अपनेअपने घर जा चुके थे. किशोर होती बेटी व बढ़ती जिम्मेदारियां… कभीकभी वह बेहद थक जाती थी पर फिर नए सिरे से जीवन समर में जूझने के लिए स्वयं को तैयार कर, सजग प्रहरी सी उठ खड़ी होती. उम्र के हर पड़ाव पर पलक को स्मिता का पूरा मार्गदर्शन मिला.

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