अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…
सवाल
मैं एक युवक से 1 साल 4 महीने से प्यार करती हूं. 2 महीने बात करने के बाद मैंने 6 अप्रैल, 2014 को उस से शादी कर ली. यह बात हम दोनों के परिवार वाले नहीं जानते. हम ने कोर्टमैरिज नहीं की. मैं अपना घर छोड़ कर 5 महीने से दिल्ली में जौब करके अकेली रहती हूं. वह युवक आर्मी में है और मुझ से बात करता रहता है. मैं अब 2 माह से गर्भवती हूं. मैं अकेली क्या करूं? वह अप्रैल में मेरे पास आया था. ऐसे में मैं अपने घर भी नहीं जा सकती.
जवाब
आप अपने परिवार वालों से बात करें. अपनी वास्तविकता से उन्हें अवगत करवाना जरूरी है. आप अपने पति से कहें कि वे अपने परिवार वालों से बात करें. आप दोनों की शादी हुई है, इस का आप के पास कानूनी सुबूत क्या है? आप जिस स्थिति में हैं इस में आप को भावनात्मक रूप से पति की, परिवार वालों की खास जरूरत है. आप अपने पति से खुल कर बात करें कि वे कब आएंगे? उन की अनुपस्थिति में आप स्थिति संभाल पाएं इस के लिए उन्हें विशेष प्रबंध करना होगा. ये सब आप जितनी जल्दी करें, उतना ही बेहतर होगा.
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जिंदगी के प्रति आप के नजरिए को बदल देती है प्रैगनैंसी
गर्भावस्था महिलाओं के लिए वह समय होता है जब वे शिशु की सुरक्षा के लिए अपने खानेपीने और स्वास्थ्य का हर संभव ध्यान रखती हैं. गर्भवती महिलाएं हमेशा खुश रहने और अपना ज्यादा से ज्यादा ध्यान रखने की कोशिश करती हैं.
कुछ महिलाओं के लिए गर्भावस्था तकलीफदेह हो सकती है जैसे उन्हें मौर्निंग सिकनैस, पैरों में सूजन, चक्कर और मितली आना आदि परेशानियां हो सकती हैं. मगर आमतौर पर गर्भावस्था हमेशा महिलाओं में सकारात्मक बदलाव ले कर आती है. इस से उन के शरीर और दिमाग दोनों में संपूर्ण रूप से सकारात्मक बदलाव आते हैं.
शरीर पर गर्भावस्था के सकारात्मक प्रभाव
– गर्भावस्था का अर्थ है कम मासिकस्राव, जिस से ऐस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरौन हारमोन का संपर्क सीमित हो जाता है. ये हारमोंस स्तन कैंसर के खतरे को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होते हैं, क्योंकि ये कोशिकाओं की वृद्धि को प्रेरित करते हैं और महिलाओं के स्तन कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं. साथ ही गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान ब्रैस्ट सैल्स में जिस तरह के बदलाव होते हैं, वे उन्हें कैंसर कोशिकाओं में बदलने के प्रति अधिक प्रतिरोधक बना देते हैं.
– गर्भावस्था के दौरान पेल्विक क्षेत्र में रक्तसंचार बढ़ जाता है, प्रसव और डिलिवरी से गुजरने के बाद महिलाओं को खुद में एक नई ताकत महसूस होती है.
दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव
– बच्चा होने से औटोइम्यून डिसऔर्डस जैसे मल्टीपल स्केल्रोसिस के होने का खतरा कम हो जाता है.
– गर्भावस्था सकारात्मक व्यवहार ले कर आती है और महिला को मजबूत बनाती है. इस से जीवन में आने वाले बदलावों से लड़ने में आसानी हो जाती है, साथ ही नकारात्मक सोच व चिंता से भी बचाव होता है.
शिशु के जन्म के बाद सकारात्मक प्रभाव
– अधिकांश महिलाओं ने पाया है कि पहले बच्चे के जन्म के बाद उन की मासिकस्राव से जुड़ी तकलीफें काफी कम हो गई हैं.
– प्रसव के बाद अधिकांश महिलाओं के स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव आते हैं और वे शराब, धूम्रपान जैसी बुरी लतें छोड़ देती हैं.
– एक मां अपने आसपास खुशियों का खजाना देख कर खुशी और उत्साह से भर जाती है. जब भी मां अपने बच्चे को गोद में लेती या उसे स्तनपान कराती है तो औक्सीटोसिन हारमोन इस गहरे रिश्ते को जोड़ने में अहम भूमिका निभाता है. यह बहुत ही ताकतवर होता है, जिस की वजह से कोई भी कुछ घंटों के लिए और कई बार कुछ दिनों के लिए भी चिंता को भूल सकता है.
– शिशु के जन्म के बाद त्वचा चमकदार और बाल चमकीले हो जाते हैं, साथ ही कीलमुंहासों की समस्या से भी मुक्ति मिल जाती है.
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