Fair Share : जितना चाहा उतना पढ़ाया, लाखों रुपए खर्च कर शादी की, पसंद की कार में विदाई हुई, फिर भी मायके की प्रोपर्टी में हिस्सा लेने आ गई… शादी के बाद मायके आकर प्रोपर्टी में अपना शेयर मांगने वाली लड़कियों को अकसर यह सुनना पड़ता है और शायद यही वजह है कि बेटियां संपत्ति में अपना अधिकार मांगने से बचती हैं. गृहशोभा ने जब लोगों से पूछा “क्या बेटियां प्रोपर्टी में हिस्सा मांगने से हिचकती हैं,” तो 86 प्रतिशत लोगों ने ‘हां’ में जवाब दिया जबकि 100 में से 14 इससे असहमत थे. इसका मतलब है कि बेटियों के मन में यह बात गहरी जड़े जमा चुकी है कि मायके की संपत्ति में हिस्सा लेना भाई के हक में कोती मारना है. लड़कियों का यह माइंडसेट तैयार होने में सदियों लगे हैं क्योंकि जन्म से ही उन्हें यह कहा जाता है कि शादी के बाद का घर ही उनका अपना घर है, जहां उनका जन्म हुआ वह भाई का घर है.

सोशल मीडिया के जमाने में भी जानकारियों से दूर है महिलाएं

कानून ने महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार दिए हैं लेकिन क्या सभी भारतीय महिलाओं को अपने इन अधिकारों के बारे में पता है? इस मामले में गृहशोभा ने महिलाओं और पुरुषों से प्रश्न पूछा गया, तो 50 प्रतिशत का जवाब हां और 50 प्रतिशत का जवाब नहीं था. ऐसे में यह सोचना भी लाज़मी है कि जब 100 में 50 महिलाओं को यह पता ही नहीं कि उनके अधिकारों के लिए कानून बनाया गया है, तो वह अपने हक का इस्तेमाल कैसे करेगी यानी सोशल मीडिया के जमाने में भी महिलाएं, अपने अधिकार और फायदे से जुड़े कानूनी जानकारी से अनजान हैं. इतना ही नहीं, आप यह भी जान कर चौंक जाएंगे कि 68 प्रतिशत लोगों को यह पता ही नहीं है कि ‘हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अनुसार बेटी, पिता की संपत्ति की कानूनी वारिस होती हैं यानी जानकारी के अभाव की वजह से महिलाएं अपने इस कानूनी हक का लाभ नहीं ले पाती है.

संपत्ति से जुड़े कानून जो हर महिला को जानना चाहिए

साल 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम यानी Hindu Succession (Amendment) Act के बाद मिताक्षरा संयुक्त हिंदू परिवारों में घर की बेटी को बेटे के समान ही सहदायिक का दर्जा दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बेटी को बेटे की तरह जन्म से सहदायिक अधिकार मिलते हैं और इसलिए बेटी, पैतृक संपत्ति (coparcenary property) में अपने हिस्से की मांग कर सकती है. यानी हर महिला अपने मायके की संपत्ति में हिस्सा मांग सकती है, जो उसका कानूनी हक है, परिवार इसे देकर उस पर कोई अहसान नहीं करता है. विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा के फैसले में स्पष्ट किया गया कि पैतृक संपत्ति में बेटी का अधिकार जन्म से है

बदलाव की उम्मीद यहां से शुरू होती है…

जब केवल महिलाओं से पूछा गया कि क्या आप जानती हैं कि शादी के बाद भी आपको पैतृक संयुक्त संपत्ति में भाई के बराबर हिस्सा मिल सकता है, तो 49 प्रतिशत का जवाब हां में था. लेकिन फिर भी बहुत कम संख्या में महिलाओं को हिस्सा मांगते देखा गया है इसलिए कहा जा सकता है कि पापा या भाई से अपने हिस्से की बात करने में उन्हें संकोच महसूस होता है. मौर्डन भारत के ज्यादातर भारतीय घरों में एक बड़ा चेंज यह आया है कि घर की बेटियों को बेटों के बराबर पढ़ाया जाने लगा है. गांव कस्बों और छोटे शहरों की सामान्य घरों की लड़कियां भी अब शहरों में पढ़ रही है. इसके साथ ही घर की बेटियों को लेकर पुराना पैटर्न भी काम कर रहा है जिसमें बेटियों की शादी में लेनदेन, पहनावेओढ़ावे, दिखावे की वजह से लाखों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, इस खर्च को सोशल स्टेट्स की तरह देखा जाता है. यह दो जरूरी वजहें, जानेअनजाने बेटियों के मन में इस तरह लाद दी जाती है कि इससे बोझिल होकर वह शादी के बाद पैतृक संपत्ति को भाई का हिस्सा समझ उसमें अपने हिस्से की मांग नहीं कर पाती है.

शायद यही वजह है कि परिवार को बेटियों को लेकर सोच बदलने की जरूरत है. जिस तरह वह गर्ल्स एजुकेशन को लेकर नए ढंग से सोचने लगे हैं उसी तरह से बच्चों के बचपन से ही प्रोपर्टी में बेटेबेटी के फेयर शेयर को लेकर बात करनी होगी, सही रास्ता तैयार करना होगा. मातापिता को अपने विचारों में खुद ही बदलाव लाना होगा वरना वह इस बात का दंभ भरना छोड़ दे कि – हम तो बेटेबेटी में फर्क ही नहीं करते हैं.

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