Gen Z Protest : जंतर मंतर पर हुए नीट पेपर मामले को ले कर जो प्रोटेस्ट हुआ उस को ले कर बहुत सी बातें की जा रही हैं. जेन जी को बहुत भलाबुरा कहा जा रहा है खासतौर पर लड़कियों को भरभर कर नसीहतें दी जा रही हैं. साथ ही सरकार इन पर इतनी भड़की हुई है कि ढूंढ़ढूंढ़ कर ऐसे लोगों का पता लगाया जा रहा है जिन्होंने गालियां वगैरह दीं.

दरअसल, जो लोग वहां जमा हुए या फिर जिन्होंने सिर्फ सोशल मीडिया पर कमेंट्स किए, रील्स डाली हैं, इन सब ने बहुत बड़ा जोखिम लिया है. आज की डेट में सरकार के पास सर्विलांस के इतने सरल तरीके हैं कि आप का 4 साल पहले का बना हुआ वीडियो भी ढूंढ़ कर निकाल लेंगे और जिस दिन आप पासपोर्ट  मांगने जाओगे उस दिन ये आप को पकड़ कर बैठा लेंगे.

डिजिटल फुटप्रिंट और डेटा मैपिंग की जा सकती है

आज के दौर में सोशल मीडिया पोस्ट, लाइक्स, शेयर, कमैंट्स और यहां तक कि लोकेशन डेटा भी सर्विलांस के दायरे में आते हैं। दरअसल, जब भी आप इंटरनेट, स्मार्टफोन या किसी डिजिटल सेवा का उपयोग करते हैं, तो आप के द्वारा छोड़े गए निशानों या रिकौर्ड्स के समूह को डिजिटल फुटप्रिंट कहते हैं। साथ ही डेटा मैपिंग वह प्रक्रिया है जिस में किसी संगठन या व्यक्ति के डेटा का प्रवाह ट्रैक किया जाता है। इस में यह पता लगाया जाता है कि डेटा कहां से आ रहा है, कहां स्टोर हो रहा है और किसे शेयर किया जा रहा है।

फेशियल रिकौग्निशन (CCTV/AI)

विरोध स्थलों पर लगे कैमरों और ड्रोन के जरीए चेहरे पहचानने वाली तकनीक (Facial Recognition Technology) से प्रदर्शनकारियों की पहचान करना बहुत आसान हो गया है।

सीसीटीवी नेटवर्क और ड्रोन के संयोजन ने विरोध प्रदर्शनों की निगरानी और प्रदर्शनकारियों की पहचान को बेहद तेज और सटीक बना दिया है। इस का नुकसान आंदोलन कर रहे छात्रों को हो सकता है।

संस्थान (कालेज/यूनिवर्सिटी) फुटेज के आधार पर छात्रों की पहचान कर के उन्हें बिना किसी नोटिस के कारण बताओ नोटिस, निलंबन या निष्कासन का सामना करने पर मजबूर कर सकते हैं।

साथ ही यदि AI मैपिंग के जरीए पुलिस रिकौर्ड्स में नाम दर्ज हो जाता है, तो भविष्य में प्राइवेट कंपनियों या सरकारी नौकरियों में पुलिस वेरीफिकेशन (सीसीटीवी/एफआईआर डेटाबेस की जांच) के दौरान चयन रुक सकता है।

अकसर फुटेज के आधार पर सामूहिक एफआईआर दर्ज कर ली जाती है, जिस से छात्रों को कोर्टकचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

डिजिटल सर्विलांस के तहत दर्ज किया गया डेटा वर्षों तक रिकौर्ड में रह सकता है। भविष्य में पासपोर्ट वेरिफिकेशन, सरकारी नौकरियों की क्लीयरेंस या वीजा प्रक्रियाओं के दौरान यह डेटा नागरिकों के लिए कानूनी या प्रशासनिक रुकावट बन सकता है।

पारिवारिक और सामाजिक दबाव

जब इस तरह के प्रोटेस्ट होते हैं तो इस का सीधा असर प्रोटेस्ट खत्म होने के बाद वहां मौजूद लोगों पर होता है. प्रोटेस्ट के बाद सरकार के द्वारा ऐसे लोगों की पहचान की जाती है जिन्होंने कुछ भी गलत किया हो, भले ही गुस्से में आ कर उन्होंने सरकार को गाली ही क्यों न दी हो लेकिन बाद में उन के वही वीडियो निकाल कर पुलिस या प्रशासन द्वारा उन के घर पर नोटिस भेजा जाता है जिससे परिवारों में तनाव पैदा होता है, जिस से कई बार छात्र अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने या अलगथलग पड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।

इसलिए आप प्रोटेस्ट के दौरान जिस भी तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं उस पर ध्यान दें क्योंकि आजकल सोशल मीडिया का जमाना है और कोई तीसरी आंख है जो आप को हर वक्त कैप्चर कर रही है. ऐसा न हो बाद में आप अपने ही कहे शब्दों पर पछताएं।

डिजिटल फुटप्रिंट

आज के समय में सोशल मीडिया और डिजिटल सर्विलांस के कारण किसी भी व्यक्ति की औनलाइन गतिविधियां लंबे समय तक रिकौर्ड्स में रहती हैं। इसलिए कानून के दायरे में रह कर अपनी बात कहना नागरिक के अपने कानूनी हितों और भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित होता है।

अगर आप को लगता है कि आंदोलन के दौरान जो कर रहे हैं उसे लोग कुछ दिन बाद भूल जाएंगे, तो आज सोशल मीडिया के दौर में यह संभव नहीं है. प्रदर्शन के दौरान एकत्र किया गया बायोमीट्रिक डेटा (फेशियल मैप) केवल उस दिन तक सीमित नहीं रहता। यह भविष्य के लिए भी डेटाबेस में सेव हो जाता है, जिस से आगे चल कर किसी भी नए मुद्दे पर आवाज उठाने पर छात्र तुरंत रडार पर आ जाते हैं।

इंटरनेट कुछ नहीं भूलता

इंटरनेट कुछ नहीं भूलता है. जब ये बच्चे कालेज के बाद नौकरी के लिए जाएंगे या पासस्पोर्ट के लिए जाएंगे, किसी देश में पढ़ाई के लिए वीजा लेने जाएंगे या किसी बैंक में बिजनैस लोन लेने जाएंगे तो हर जगह बैकग्राउंड चैक होता है. हो सकता है कि आप का प्रोटेस्ट वाला गालियों से भरा वीडियो सामने आ जाएं तो नौकरी आदि मिलने में मुश्किल तो होगी ही शादी आदि में भी लोग बैकग्राउंड चैक करेंगे, तो उन्हें लग सकता है जब कोई बच्चा सार्वजानिक रूप से भी अपनी भाषा पर नियंत्रण नहीं रख सकता तो वह अपने निजी जीवन में क्या करेंगे?

हालांकि यह भाषा जेन जी को हमारी ही दी हुई है। आज ओटीटी पर भी इसी तरह की भाषा है। इसलिए इस पीढ़ी ने ये भाषा हम से ही सिखी है फिर इस पर बवाल क्यों करना? लेकिन फिर भी चाहे कुछ भी तर्क दें लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वह सार्वजानिक मंच था, अपने से बड़ों के लिए इतनी अभद्र भाषा इस्तेमाल करना आज के सोशल मीडिया के दौर में उचित नहीं है.

कौकरोच जनता पार्टी को मरने न देना ही विकल्प है अब

देश की जनता के हर आदमी के हित में है कि कभी भी कौकरोच जनता पार्टी को मरने न दें. यह मूवमेंट मरी तो लाखों लोगों ने इस दौरान सरकार के खिलाफ जो कुछ भी बोला है वे नुकसान में रहेंगे और फंस जाएंगे। इस मूवमेंट को कभी भी मरने न दें क्योंकि यह आप की प्रोटैक्शन की गारंटी है.

हो सकता है कि आप को प्रोटैक्शन न मिल पाएं क्योंकि हर किसी को तो प्रोटैक्शन नहीं मिल सकता। लेकिन जब तक भाजपा जिंदा है भाजपा के खिलाफ, मोदी के खिलाफ जितने लोगों ने जो कुछ बोला है वे तब तक सुरक्षित हैं जब तक यह कौकरोच जनता पार्टी है। यह आप की सुरक्षा की गारंटी है.

जो देश जो समाज इस तरह के कदम नहीं उठता वह सड़ जाता है. नदी तभी सही होती है जब वह रोज नईनई धाराएं बनाती है, इसलिए अब युवाओं को चाहिए कि इस पार्टी को जिंदा रखने के लिए जो कर सकते हैं करें।

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