महाराष्ट्र का राजनीतिक तमाशा आमतौर पर रसोई, पति और बच्चों में बिजी औरतों के सिर से गुजर जाता है पर यह पक्का है कि दिल्ली के पौल्यूशन की तरह यह हरेक को बराबर परेशान करता है. औरतें सोचती रहें कि हमें इस गंदी राजनीति से क्या लेनादेना पर असली कीमत तो वही चुकाती हैं.

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई देश की व्यावसायिक प्रौसपैरिटी में नंबर एक है. न सिर्फ वहीं सब से ज्यादा पैसा है, वहीं से टीवी चैनल्स चलते हैं, वहीं से हिंदी फिल्मों की बाढ़ आती है और जो नाटक विधायक कर रहे हैं वह इन परदे की कथाओं में भी आता है, उस के टिकट के पैसे भी उन के पतियों और बेटेबेटियों की जेबों से जाते हैं.

जब भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना ने अलग पार्टियों की तरह विधान सभा का चुनाव लड़ा था तो शिव सेना को आजादी थी कि वह परिणामों के बाद अपनी मरजी की पार्टियों के साथ सरकार बनाए.

सास की तरह केंद्र सरकार की कठपुतली राज्यपाल को ननद की शक्ल में बेटेबहू में दरार डालने की कोशिश करने और झगड़ा कराने की जरूरत न थी. यहां तो ननद की शक्ल में राज्यपाल ने बच्चों में भी झगड़ा करा दिया.

यह साफ संदेश दे दिया गया है कि जब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राज्यपाल, पार्टियों के नंबर 2 नेता सारे वादे, कसमों को तोड़ कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए रोज पैतरे बदल सकते हैं तो घरों में सास, देवरानी, ननद, पड़ोसिनें और कामवालियां क्यों नहीं? किसी को अपने वादे पर टिकने की जरूरत नहीं. किसी पर भरोसा नहीं करा जा सकता.

अगर औरतों के पति घर में एक से दुलार करें और बाहर दूसरी से तो इस में हरज क्या है? जब संविधान को तोड़मरोड़ कर फेंका जा सकता है तो विवाह के वादों

या रेस्तरां में किए गए प्रोपोज को क्यों नहीं तोड़ा जा सकता? यह तो हमारे आका सिखा रहे हैं. ऐसे आका जो कहते हैं कि वे धर्मपुराणों से सीख कर ही काम करते हैं.

जय यह व जय वह के साथ जय बेईमानी, जय धोखा, जय फरेब भी आप की जम कर परोसा जा रहा है.

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