Civic sense : ‘‘आपलाइन से बाहर जारही हैं.’’ ‘‘तुम चुप करो.’’ ‘‘भला यह क्या तमीज हुई?’’
‘‘तमीज, पहले अपना स्टैंडर्ड देखो. मेरे पर्स की कीमत तुम्हारी सैलरी से कहीं ज्यादा होगी तो तमीज की बात तो मुझ से मत ही करना.’’
ऐसी बहसबाजी सार्वजनिक परिवहन, स्थानों और जनसमूहों में आम सुनाई देती है, जहां हर अगला इंसान चाहे वह पुरुष हो या महिला खुद को प्रधान दिखाना चाहता है और समझता भी हैं.
सुबह आंख खुलने से ही आगे निकलने की यह रेस शुरू हो जाती. कहीं मैं पीछे न रह जाऊं की होढ़ में मैं बहुतों को धक्का देते निकल जाऊं यह सही है, का थीम चल रहा है और यह थीम बस की लाइन से मैट्रो, एअरपोर्ट, मंदिर, सिनेमा हर उस जगह है, जहां आप के आगे कोई खड़ा हो या आप के पीछे कोई खड़ा हो.
यह पीछे न रह जाऊं वाला थीम आगे निकल जाने के बाद भी शांत नहीं होती.
वह कैसे?
ऐसे कि पहले आप को मैट्रो में चढ़ने की जल्दी होती है और कुछ देर बाद उस से जल्दी उतरने की. इसलिए यह थीम तो कभी औफहोता ही नहीं. मंदिर में हाथ सब से ऊपर उठते हैं कि प्रसाद पहले मिल जाए, तो भगवान की कृपा ज्यादा होगी, प्लेन के लैंड होतेहोते बैग ले दरवाजे की ओर यों भागते हैं कि सब से पहले हम उतर जाएं जैसे कोई सुंदर युवती वरमाला लिए प्लेन के बाहर खड़ी है जो सब से पहले उतरे माला उसी को डालेंगी.
जब एक तरफ हम मंदिर बनाबना कर यह राग अलापते रहते हैं कि बहुत कल्चर्ड लोग हैं जो अपनी संस्कृति से जुड़े रहते है तो हम दूसरी तरफ यह क्यों नहीं बोलते या इस बात पर गौर क्यों नहीं करते कि हम में कोई सिविक सैंस नहीं.
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