Gender Inequality : सुबह के 5 बजते ही रसोई में बरतनों की खनक शुरू हो जाती है. बच्चों का लंच बनाना, उन्हें स्कूल के लिए तैयार करना, घर का झाड़ूपोंछा करना, पूरे परिवार के लिए खाना बनाना, यह तो बस दिन की शुरुआत है. इस के बाद वह अपने परिवार की मिठाई और नाश्ते की दुकान पर पहुंचती है. समोसे बनाने से ले कर लड्डू, पेड़े, छैना, गुलाबजामुन जैसी मिठाई को ए
शेप देने तक वह रात के 2 बजे तक हर काम में मिल कर हाथ बंटाती है. दुकान की कमाई में उस की दिनरात की मेहनत शामिल है, उस की अपनी जिंदगी में सुकून का एक पल भी नहीं है.
दिनभर घर और दुकान का सारा काम निबटाने के बाद रात को उसे सराहना नहीं बल्कि अपने पति की मारपीट और गालीगलौज मिलती है. एक तरफ वह परिवार की आर्थिक और घरेलू नींव संभाल रही है और दूसरी तरफ उसी घर में हिंसा का शिकार होती है. यह सब बहुत टौक्सिक होता है. एक छोटे कसबे में साधारण पढ़ीलिखी लड़की, साधारण परिवार में बड़ी हुई और उम्र आते ही विवाह कर दिया और फिर पति ने पहले बच्चों में उलझा दिया फिर जब बच्चों से जरा सी फुरसत हुई तो घर की किचन और अन्य कामों में धकेल दिया.
जिम्मेदारी केवल महिला की ही क्यों
हर मामले में पिता जब चाहे अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेता है, युवा पत्नी को भी यह कह दिया जाता है कि वह तो मर्द है, बच्चे को संभालने, खिलाने और संस्कार देने का बो झ केवल मां के सिर पर ही डाल दिया जाता है अगर महिला इन कामों से 1 में पूरी न पड़े तो उसे तुम तो मां हो कह कर कोषा जाता है, उसे अपराधबोध में डाल दिया जाता है, ऊपर से हर रात पति की सैक्स की भूख को पूरा करना होता है. बदबूदार पति चाहे दिनों तक उस से प्यार का एक शब्द न बोले, रात को नोचने, टांगें खोलने में तेज और अपनी इच्छा पूरी होने तक पूरी तरह आजाद. अत्याचार, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना के बाद भी वह महिला उस घर को छोड़ कर क्यों नहीं जा पा रही? इस का जवाब केवल उस महिला के डर में नहीं बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे और पौराणिक मान्यताओं के गहरे जाल में छिपा है.
त्याग की देवी बना दिया जाता है
हमारे समाज में पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्याताओं का सहारा ले कर महिलाओं के त्याग का उदारीकरण किया गया है.
पुराणों में महिलाओं को ‘देवी’ और ‘अन्नपूर्णा’ का दर्जा दिया गया, यही कहानियां सुनासुना कर उन से असीमित त्याग की उम्मीद की जाती है. यदि कोई महिला सहती रहे तो उसे ‘पतिव्रता’ और ‘सती’ कहा जाता है.
धार्मिक ग्रंथों में अहिल्या जैसी कथाएं हैं, जहां कमजोर या ऊंचे दर्जे के पति के श्राप से स्त्री को पत्थर बन कर तपस्या करनी पड़ी.
गांधारी गांधार देश के राजा सुबल की पुत्री और शकुनि की बहन थीं. वे परम शिवभक्त और धर्मनिष्ठ स्त्री थीं. उन का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्ट्र से तय हुआ जो जन्म से अंधे थे. जब गांधारी को पता चला कि उन के पति दृष्टिहीन हैं तो उन्होंने अपने पति का दुख बांटने और उन के प्रति निष्ठा जताने के लिए जीवनभर अपनी आंखों पर पट्टी बांधने का संकल्प लिया. गांधारी का जीवन असीम त्याग, पतिव्रत का प्रतीक कहा जाता है. एक औरत प्रकृति की देन का आनंद सिर्फ इसलिए क्यों न ले क्योंकि पति को नहीं मिल सकता?
त्यागभरा जीवन ही क्यों
मद्र देश की राजकुमारी सावित्री ने जंगलों में निर्वासित जीवन जी रहे सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना. सत्यवान की मृत्यु हो जाने पर सावित्री यमराज के पीछेपीछे चलने लगी. जब यमराज ने उसे लौटने को कहा, तो सावित्री ने कहा कि जहां मेरे पति जाएंगे, वहीं जाना मेरा धर्म है. पतिव्रता नारी को अपने पति के साथ चलने से कोई नहीं रोक सकता.
यमराज ने प्रसन्न हो कर सत्यवान के प्राणों के अलावा 3 वरदान दिए. सासससुर की आंखों की रोशनी वापस मिलना, उन का खोया हुआ राज्य वापस मिलना और सावित्री को सत्यवान से 100 पुत्रों की प्राप्ति होना.
जब यमराज ने 100 पुत्रों का वरदान दिया तो सावित्री ने याद दिलाया कि पति के बिना यह संभव नहीं है. अपनी बात में बंधे यमराज को सत्यवान को पुन: जीवित करना पड़ा.
आज भी भारतीय महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और रक्षा के लिए बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और ‘वट सावित्री व्रत’ रखती हैं.
यह सब कहानियां सुना कर महिलाओं को सिखाया जाता है कि सहन करना ही उन का धर्म है और पति का घर ही उन की अंतिम मंजिल.
