Hindi Fiction Stories : आज वैसे भी मेरा मिजाज जरा उखड़ाउखड़ा था और जब मृदुला ने फोन पर बताया कि इस बार वह अपनी शादी की सालगिरह गोवा में सैलिब्रेट करेगी, तब तो मेरा मन और छोटा हो गया. लगा एक मैं हूं… बस इतना ही तो कहा था किशोर से कि ‘केसरी’ फिल्म देखने चलते हैं, क्योंकि मुझे अक्षय कुमार की फिल्में बहुत पसंद आती हैं. तब कहने लगे कि फालतू काम के लिए मेरे पास समय नहीं है. औफिस जाना पड़ेगा, क्लोजिंग चल रही है. और इधर देखो, छुट्टी ले कर राजन अपनी पत्नी को गोवा घुमाने ले जा रहे हैं. ईर्ष्या नहीं हो रही है.

बहन है वह मेरी, तो ईर्ष्या क्यों होगी? मगर मेरे हिस्से में यह सुख क्यों नहीं है? यह सोच कर मैं उदास हो गई, क्योंकि मैं भी तो उसी कोख से पैदा हुई थी, जिस से मृदुला. बस 1 मिनट की ही तो बड़ीछोटी हैं हम दोनों, फिर सुख में इतना अंतर क्यों?

‘‘क्या हुआ, कहां खो गई मंजरी?’’ जब मृदुला ने पूछा, तो मुझे ध्यान आया कि वह फोन पर ही है, ‘‘गोवा से क्या लाऊं तुम्हारे लिए बता? हां, वहां काजू बहुत अच्छे मिलते हैं. वही ले आऊंगी.’’

‘‘अरे, कुछ नहीं, बस तू घूम के आ अच्छी तरह… काजू तो यहां भी मिल जाते हैं. वहां से ढो कर क्यों लाएगी?’’ मैं ने कहा, पर वह जिद पर अड़ गई कि नहीं, मैं बताऊं कि मुझे क्या चाहिए.

‘‘अच्छा ठीक है, जो तुझे अच्छा लगे लेती आना,’’ कह कर मैं ने काम का बहाना बना कर फोन रख दिया, नहीं तो वह और न जाने क्याक्या बोल कर मेरा दिमाग खराब करती.

वह आएदिन मुझे फोन कर के कुछ न कुछ बताती रहती है. जैसेकि आज राजन उसे मौल में शौपिंग करवाने ले गया, आज अपने पति के साथ वह फिल्म देखने गई. मना करती रही, फिर भी राजन उसे होटल में खिलाने ले गया, आज राजन उस के लिए साड़ी ले कर आया, आज राजन उस के लिए झुमके ले कर आया. उफ, मेरे तो कान दुखने लगते हैं उस की बातें सुन कर. कभीकभी तो लगता है वह मुझे जलाने के लिए ऐसा करती है.

वैसे अपनी शादी की हर सालगिरह मृदुला ऐसे ही किसी अच्छी जगह सैलिब्रेट करती है. कभी शिमला, कभी दार्जिलिंग, कभी सिंगापुर और इस बार गोवा. पर किशोर को एक बार भी नहीं लगता है कि हमें भी कभी किसी अच्छी जगह अपनी सालगिरह सैलिब्रेट करनी चाहिए, बल्कि वे तो इन सब बातों को फुजूलखर्ची मानते हैं. कहते हैं कि ये सब ढकोसलेबाजी है. एकदम पुराने खयालात के इंसान हैं किशोर और वहीं मृदुला के पति राजन उतने ही नए और रोमांटिक विचारों वाले इंसान हैं एकदम मेरी तरह.

मैं भी तो जिंदगी जीने में विश्वास रखती हूं न कि झेलने में. अच्छेअच्छे कपड़े पहनना, होटलों में खाना, पार्टी करना, ढेर सारी शौपिंग करना मुझे कितना अच्छा लगता है. मगर मेरे कंजूस पति ये सब मुझे करने दें तब न. कभीकभी तो लगता है वही औरत सुखी है, जो कमाती है. अपने पर खुल कर खर्च तो कर सकती है. लेकिन मृदुला कौन सा कमाती है… फिर भी जिंदगी का पूरापूरा लुत्फ उठा रही है न. अब उस का पति ही इतना दिलदार…

मेरे पति तो बस साधा जीवन उच्च विचार वाले इंसान हैं. एकदम बोरिंग. सोचा नहीं था

कभी मेरा ऐसे इंसान से पाला पड़ेगा, जो एकदम नीरस होगा. बातबात पर पैसापैसा करते रहते हैं. अरे, पैसा ही सबकुछ है क्या? जीवन की खुशियां कुछ नहीं? लोग कमाते किसलिए हैं? खर्च करने के लिए ही न? मगर किशोर जैसे इंसान पैसे को अलमारी में सहेज कर उसे धूपदीप दिखाने में विश्वास रखते हैं ताकि वह और फूलताफलता रहे. मगर उन्हें नहीं पता कि रखेरखे पैसे में भी दीमक लग जाती है. इंसान को एक दिन मरना ही है, तो क्यों न सुखमौज कर के मरे? मगर यह बात उस मंदबुद्धि इंसान को कौन समझाए. अरे, सीखे कोई राजन जीजाजी से… कैसे वे खुद भी शान से जीते हैं और बीवीबच्चों को भी उसी प्रकार जिलाते हैं. कोई बात मृदुला के मुंह से निकली नहीं कि वह चीज ला कर रख देते हैं. यह बात मुझे मृदुला ने बताई थी कि जबतब राजन उस के लिए महंगीमहंगी साडि़यां, जेवर खरीद लाते हैं वह मना करती रह जाती है और एक मैं छोटीछोटी चीजों के लिए भी तरसती रहती हूं.

कितनी शान से कहती है मृदुला कि उस के पति का सारा वेतन उस के ही हाथों में आता है… और एक किशोर हैं गिनगिन कर मुझे घर चलाने के लिए पैसे देते हैं जैसे मैं उन के पैसे ले कर भाग जाऊंगी. आश्चर्य होता है… तड़कभड़क से दूर रहने वाली मृदुला की जिंदगी इतनी रंगीन बन गई और मुझे जो तड़कभड़क वाली जिंदगी अच्छी लगती थी, तो मेरा एक ऐसे इंसान से पाला पड़ा, जिसे ये सब ढकोसला लगता है. लगता है जोडि़यां ही गलत बन गईं हमारी.

आखिर क्यों, क्यों जो चीज जिसे मिलनी चाहिए उसे नहीं मिलती? इस

का उलटा ही होता है… हमें एक चीज दे दी जाती है और कहा जाता है इस के साथ तुम्हें जिंदगीभर निबाह करना होगा. चाहे हमें उस चीज से नफरत ही क्यों न हो. हां, कभीकभी मुझे किशोर के आचरण से नफरत होने लगती है. लगता है किस गंवार के पल्ले बांध दी गई मैं और वहां मृदुला रानी सा जीवन जी रही है.

सच, कभीकभी तो लगता है सबकुछ छोड़छाड़ कहीं भाग जाऊं, क्योंकि इस इंसान से निभाना मुश्किल लगने लगा है. लेकिन हम ऐसी जंजीरों में जकड़े हुए हैं कि उन से मरते दम तक आजाद नहीं हो सकते.

‘‘आज क्या बन रहा है खाने में? खुशबू तो बड़ी अच्छी आ रही है,’’ किचन में प्रवेश करते हुए किशोर ने पूछा.

मैं दूसरी तरफ ही मुंह किए बोली, ‘‘कुछ खास नहीं, रोटी व दाल,’’ मन हुआ किशोर को बताए कि देखो, कैसे राजन जीजाजी अपनी पत्नी को दुनिया की सैर करवा रहे हैं और एक तुम… बस चूल्हे में ही झोंकते रहो मुझे. पर क्या फायदा. मगर मुझ से रहा नहीं गया. बोल ही दिया.

किशोर कहने लगे, ‘‘तो तुम क्यों उदास हो रही हो? उन की जिंदगी है जैसे चाहें जीएं.’’

मुझे उन की बात पर बड़ा गुस्सा आया. बोली, ‘‘तो क्या हम उन की तरह नहीं जी सकते? क्या हम बूढे़ हो गए हैं? क्या कभी तुम्हारा मन नहीं करता कि हम भी ऐसे कहीं बाहर घूमने जाएं? अब कहोगे पैसे कहां हैं इतने, तो क्या मृदुला के पति से कम सैलरी मिलती है तुम्हें? कहो न कि मन ही नहीं करता तुम्हारा इन सब चीजों का. बोरिंग इंसान हो तुम बोरिंग.’’

गुस्से में आज मैं ने जम कर सब्जी में नमक डाल दिया. क्या करती? मेरी आदत है, जब तक मेरा गुस्सा नहीं उतरता, सिर भारीभारी सा लगता है. लेकिन सब्जी बिगाड़ देने के बाद भी मेरा पारा गरम ही था.

मगर स्वभाव से शांत किशोर कहने लगे, ‘‘बोरिंग इंसान नहीं हूं मैं मंजरी और न ही कंजूस. समझो तुम… बच्चे बड़े हो रहे हैं. उन की पढ़ाईलिखाई, शादीब्याह के बारे में भी तो सोचना होगा न अब हमें? दिनप्रतिदिन बच्चों की महंगी होती पढ़ाई ऊपर से घर, गाड़ी का लोन. ये सब मेरी कमाई से ही हो पा रहा है न? और तो कोई ऊपरी आमदनी है नहीं. समझो, अगर मैं आर्थिक रूप से कमजोर हो जाऊंगा, तो तुम भी हो जाओगी और मैं ऐसा नहीं चाहता. बताओ न, कौन है चार पैसे से हमारी मदद करने वाला? कहने को बड़ा परिवार है हमारा. मगर सब की अपनी डफली, अपना राग है. डेढ़दो लाख अगर घूमने में ही लगा देंगे, तो सारा बजट बिगड़ जाएगा. दूसरों को देख कर मत जीयो मंजरी, दुख ही होगा. हम जैसे हैं ठीक हैं. बस यह सोचो. खुश रहोगी,’’ किशोर ने अपनी तरफ से मुझे खूब समझाया

मगर मेरे दिमाग में किशोर की कही एक भी बात नहीं घुस रही थी. मैं तो बस इतना जान रही थी कि किशोर राजन की तरह नहीं हैं. इसलिए उन की हर छोटी बात पर भी मैं झल्ला उठती या उलाहने देने लगती और वे बेचारे चुपचाप मेरी झिड़की सुन लेते, क्योंकि वे जानते थे कि मैं लड़ाई के रास्ते ढूंढ़ रही हूं और वे घर में कलह नहीं चाहते थे. शाम को भी जब वे थकेहारे औफिस से घर आते, तो चुप ही रहते. जानबूझ कर खुद को किसी न किसी काम में उलझाए रखते ताकि किसी बात पर मुझ से बहस न हो जाए.

आज फिर मृदुला ने मुझे यह कह कर शौक दे दिया कि शादी की सालगिरह पर राजन ने उसे हीरे जड़ी अंगूठी दी. फिर बताने लगी कि वे कहांकहां घूमने गए, क्याक्या खरीदा, वगैरहवगैरह, जिसे सुनसुन कर किशोर के प्रति मेरा गुस्सा और बढ़ने लगा.

‘‘मैं तो मना कर रही थी पर ये हैं कि शौपिंग पर शौपिंग करवाए जा रहे हैं और जानती है मंजरी, राजन तो कह रहे थे कि अगर तुम और जीजाजी भी हमारे साथ गोवा आते तो और मजा आता. सच में, गोवा बहुत ही सुंदर जगह है. राजन ने तो मुझे जबरन छोटेछोटे कपड़े कैपरी, जींस, टीशर्ट आदि भी खरीदवा दिए और कहा कि यही पहनूं. जब तक गोवा में रहे पहनने पड़े. क्या करती.’’

मृदुला कहे जा रही थी और मेरे सीने में धुकधुक कर आग जल रही थी.

‘‘अच्छा ठीक है मृदुला अब मैं फोन रखती हूं. खाना बनाना है न. किशोर औफिस से आते ही होंगे,’’ और बात न करने के खयाल से मैं बोली, तो वह फिर कहने लगी, ‘‘अरे, सुन न मंजरी, मैं तो बताना ही भूल गई. वे तुम्हारे जीजाजी अपनी पसंद से तुम्हारे लिए साड़ी खरीद लाए हैं. कह रहे थे नीला रंग, गोरी मंजरी पर खूब फबेगा. सही कह रहे थे. वैसे उन्होंने मेरे लिए भी उसी रंग की साड़ी खरीदी. कहने लगे कि भले तुम सांवली हो, पर मेरे लिए दुनिया की सब से खूबसूरत औरत हो. अच्छा, चल मैं किसी रोज आती हूं तुम्हारा उपहार ले कर.’’

समझ में नहीं आया कि मंजरी क्या बके जा रही है. लगा, बोलना कुछ और चाह रही थी, बोल कुछ और रही है.

‘‘ठीक है मृदुला,’’ कह कर मैं ने फोन रख दिया और बेमन से खाना बनाने लगी. न तो आज मेरा खाना बनाने का मन था और न ही कोई और काम करने का. मूड एकदम औफ हो गया था.

तभी किशोर का फोन आया. कहने लगे कि आज उन का औफिस में ही खाना है, तो मैं खा लूं उन की राह न देखूं. अच्छा है, वैसे भी मेरा खाना बनाने का मन नहीं था. अत: बच्चों को मैगी बना कर खिला दी और खुद टीवी खोल कर बैठ गई. लेकिन आज मुझे वह भी अच्छा नहीं लग रहा था. लगा, आज मृदुला की जगह मैं हो सकती थी. मगर मां ने ऐसा नहीं होने दिया.

याद है जब लड़के वाले मृदुला को देखने आने वाले थे तब मां ने मुझे पड़ोसी के घर भेज दिया ताकि पिछली बार की तरह इस बार भी लड़के वाले मुझे ही न पसंद कर लें. चूंकि मृदुला मुझ से 1 मिनट बड़ी है, इसलिए ब्याह भी पहले उस का ही हुआ था. मगर एक साधारण नैननक्श और सांवली लड़की को इतना अच्छा पति मिल सकता है, यह किसी ने नहीं सोचा था.

मुझे लगा था, जब मृदुला को इतना सुंदर राजकुमार जैसा पति मिल सकता है, तो

फिर मुझे क्यों नहीं, क्योंकि मैं तो उस से लाख गुना सुंदर हूं. लेकिन मेरा सपना तब ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर बिखर गया, जब पहली बार मैं ने किशोर को देखा. जैसा नाम वैसा रूप. एकदम कालाकलूटा. लेकिन अब तो शादी हो चुकी थी.

याद है मुझे, मृदुला को देख कर महल्ले की औरतें कहती थीं कि मंजरी के ब्याह में तो कोई दिक्कत नहीं होगी, पर इस कलूटी को कौन पसंद करेगा? खान से निकले, हीरे और कोयले से लोग हमारी तुलना करते थे, जाहिर था मैं हीरा थी और वह कोयला.

जैसेजैसे हम बड़ी होती गईं, यह भावना भी मेरे अंदर पनपती गई कि मैं मृदुला से सुंदर हूं. मेरी बातों से वह आहत भी हो जाती कभीकभी, पर फिर सबकुछ भुला कर एक बड़ी बहन की तरह मुझे प्यार करने लगती.

एक बात थी, छलप्रपंच और ईर्ष्या नाम की चीज नहीं थी उस में. एकदम दिल की साफ थी वह. जहां मैं छोटीछोटी बातों का बतंगड़ बना कर मां को सुनाती, वहीं वह बड़ी बात भी मां से छिपा जाती ताकि उन्हें दुख न हो. शायद इसीलिए उसे इतना कुछ मिला जीवन में. शादी के बाद जहां वह जीवन के सब रस चख रही थी, वहीं मैं हर चीज के लिए तरस रही थी.

शुरूशुरू में तो किशोर का व्यवहार मुझे समझ नहीं आता, लेकिन धीरेधीरे समझ में आने लगा कि सिर्फ रूपरंग से ही नहीं, बल्कि चालव्यवहार से भी उदासीन इंसान हैं ये.

क्या यही मेरे हिस्से में लिखा था? कभी तो मन होता, मां से खूब लड़ूं. पूछूं कि क्यों, क्यों उन्होंने मेरे साथ ऐसा किया? क्या जांचपरख कर शादी नहीं कर सकते थे मेरी? जो मिला पकड़ा दिया? मांबाप हैं या दुश्मन? एक बार लड़ भी ली थी, उस बात पर. लेकिन मुझे समझाते हुए मां कहने लगीं कि लड़के का रूप नहीं गुण देखा जाता है मंजरी. जाने कौन सा बढि़या गुण दिख गया उन्हें किशोर में, जो मेरा हाथ पकड़ा दिया. यही सब बातें कहकह कर, सोचसोच कर कब तक और कितना कुढ़तीमरती मैं. सो उसी को अपना हिस्सा मान कर संतोष कर लिया.

हम मध्यवर्गीय समाज में एक बार जिस का हाथ पकड़ लिया, मरते दम तक निभाना पड़ता है, सो कोई चारा नहीं था, इसलिए मैं ने अपने ढीले मन को खूब कस कर बांध लिया

और बंद कर लिया उस संकीर्ण चारदीवारी में खुद को, क्योंकि अब बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था. लेकिन बारबार मृदुला का सुखी वैवाहिक जीवन देख कर कुढ़न तो होती ही थी न. न चाहते हुए भी फिर वही सब बातें दिमाग में शोर मचाने लगतीं कि वह मुझ से ज्यादा सुखी क्यों है?

उस रोज सुबहसुबह ही मां का फोन आया. घबराते हुए बोलीं, ‘‘तुम्हारी मृदुला से कोई बात हुई है? फोन आया था उस का क्या?’’

‘‘नहीं तो मां, पर क्या हुआ, सब ठीक तो है?’’ मैं ने पूछा तो मां भर्राए कंठ से कहने लगीं, ‘‘कल से मैं मृदुला को फोन लगा रहीं, पर बंद ही आ रहा है.’’

‘‘अरे, तो जीजाजी को लगा लो.’’

‘‘वे भी फोन नहीं उठा रहे हैं.’’

‘‘हो सकता है फिर दोनों कहीं घूमने निकल गए होंगे. जाते तो रहते हैं हमेशा,’’ यह बात मैं ने ईर्ष्या से भर कर कही, ‘‘अच्छा आप चिंता मत करो, मैं देखती हूं फोन लगा कर.’’

सच में मृदुला का फोन बंद आ रहा था और राजन का भी. कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं? मां की घबराहट देख कर मैं ने उस के घर जाने का मन बना लिया, ‘‘मां, मैं उस के घर जा कर देखती हूं, आप चिंता मत करो.’’

लेकिन अब मुझे भी घबराहट होने लगी थी, क्योंकि फिर मैं ने उसे कई बार फोन लगाया, पर बंद ही मिलता. किशोर को जब मैं ने सारी बात बताई, तो कहने लगे कि मैं चिंता न करूं. चल कर देखते हैं.

‘‘पर आप का औफिस?’’ जब मैं ने पूछा, तो किशोर बोले कि वे मुझे मृदुला के घर छोड़ कर उधर से ही औफिस निकल जाएंगे और आते वक्त लेते आएंगे.

‘‘हां, यह सही रहेगा,’’ मैं बोली.

वहां पहुंचने पर जो मैं ने देखा, उसे देख स्तब्ध रह गई. मृदुला बिस्तर पर पड़ी कराह रही थी और उस के शरीर पर जगहजगह चोट के निशान थे. चेहरा भी नीला पड़ गया था.

बहन को इस हालत में देख कर मेरी आंखें भर आईं, ‘‘मृदुला, ये सब क्या हुआ? ये चोटें कैसे और राजन जीजाजी कहां हैं?’’ मैं ने पूछा.

वह रो पड़ी. फिर जो बताया उसे सुन कर मुझे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था.

उस ने रोतेरोते बताया, ‘‘अगर मेरा पति बदसूरत होता, गरीब होता, लेकिन अगर वह मुझे प्यार करता, तो मैं खुद को दुनिया की सब से खुशहाल औरत समझती. मगर राजन का सुंदर होना मेरे लिए अभिशाप बन गया…

‘‘रोज नईनई लड़कियों के साथ रातें बीतती हैं. उन पर दिल खोल कर पैसे लुटाते

हैं. कभीकभी तो लड़की को घर भी ले आते हैं और जब मैं कुछ बोलती हूं तो उस के सामने ही मुझ पर थप्पड़ बरसाने लगते हैं. वह तो अच्छा है कि बच्चे होस्टल में रहते हैं, नहीं तो उन पर क्या असर पड़ता राजन की हरकतों का? जब से ब्याह हुआ है, एक दिन भी ऐसा नहीं गया, जब राजन ने मेरे रूपरंग को ले कर ताने न कसे हों.

‘‘कहते हैं कि उन्हें तो गोरी लड़की चाहिए थी… कैसे कालीकलूटी उन के मत्थे मढ़ दी गई… जानती है मंजरी, हमारा फोटो देख कर राजन को लगा था, उन की शादी तुम्हारे साथ होने वाली है, इसलिए उन्होंने शादी के लिए हां बोल दी थी. लेकिन जब पत्नी के रूप में मुझे देखा, तो आगबबूला हो गए. पतिपत्नी के बीच की बात है, यह सोच कर अब परिवार वालों ने भी मेरा पक्ष लेना छोड़ दिया. लेकिन समाज में अपनी इज्जत के डर के कारण वे मुझे ढो रहे हैं. कहने को तो मैं उन के साथ गोवा, मलयेशिया घूमती हूं, पर वहां होती तो उन के साथ उन की मासूका ही. मैं तो बस पिछली सीट पर बैठे तमाशा देखती हूं.’’

राजन के जो सारे दोष आज तक दबेढके थे उन सभी को मृदुला 1-1 कर मेरे सामने खोलने लगी. आज तक मैं किशोर को संकीर्ण विचारों वाला और खराब इंसान समझती थी, लेकिन आज मुझे पता चला कि किशोर कितने अच्छे और सच्चे इंसान हैं.

एक लंबी सांस छोड़ते हुए फिर मृदुला कहने लगी, ‘‘जरा भी चिंता नहीं है उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की. मौजमस्ती में सारे पैसे लुटा रहे हैं. 2 महीनों से मकान का किराया बाकी है. मकानमालिक झिड़क जाता है. कहता है कि आप का मुंह देख कर चुप रह जाता हूं. बहन मानता है वह मुझे. लेकिन घोड़ा कब तक घास से दोस्ती कर सकता है मंजरी? अगर मकानमालिक ने निकाल दिया तो हम कहां जाएंगे? सही कहती हूं, तुम्हारे पति के पैर के धोवन भी नहीं हैं राजन. वे तुम सब के लिए कितना सोचते हैं, देखती नहीं क्या मैं. एकदम सीधेसच्चे इंसान.’’

विश्वास नहीं हो रहा था कि मृदुला जो कह रही है वह सच है. जिस इंसान के लिए मेरे दिल में ढेरों सम्मान था, वह एक पल में खत्म हो गया. कितना अच्छा इंसान समझती थी मैं राजन को. सोचने लगी थी कि काश, इस से मेरा ब्याह हो गया होता तो मैं कितनी सुखी होती. लेकिन मैं कितनी गलत थी. खुद को कोसती रहती थी यह कह कर कि क्यों मेरा किशोर जैसे इंसान से पाला पड़ा. मगर आज उसी किशोर पर मुझे नाज हो रहा है. दिखाते नहीं, पर मुझे प्यार बहुत करते हैं. यह मुझे अब समझ आया.

‘‘लेकिन तुम ये सब क्यों सहती रही अकेली? बताया क्यों नहीं हमें?’’ मैं ने पूछा.

‘‘तो क्या करती और क्या बताती तुम सब से? क्या हालत बदल देते तुम सब? तुम्हें हमेशा लगता था न मंजरी कि मैं बहुत सुखी हूं, तेरे इसी भ्रम को मैं जिंदा रखना चाहती थी. दिखाना चाहती थी उन लोगों को, जो कहते थे, इस कलूटी को कौन पूछेगा. झूठा ही सही, पर लोग तो सही मान रहे हैं न कि मैं बहुत सुखी हूं और मेरे पति मुझे बहुत प्यार करते हैं. मांपापा भी खुश हैं, तो रहने दो. मैं अपना दुख सुन कर उन्हें जीतेजी मौत के मुंह में नहीं धकेलना चाहती. इसलिए जो जैसा चल रहा चलने दे… तू यह बात कभी अपने मुंह से मत निकालना वरना तू मेरा मरा मुंह देखेगी.’’

अब जब उस ने इतनी बड़ी धमकी दे दी, तो फिर कैसे किसी से मैं कुछ कहती. लेकिन लगा, क्या सोचती रही थी मैं मृदुला के बारे में और क्या निकला. शाम को किशोर आ कर मुझे ले गए. रातभर मैं मृदुला के बारे में ही सोचसोच कर रोती रही. मेरा सूजा चेहरा देख कर किशोर को यही लगा कि मैं मृदुला की तबीयत को ले कर परेशान हूं, पर बात तो उस से भी बढ़ कर थी, पर बता नहीं सकती थी किसी को.

सुबह उठ कर रोज की तरह मैं ने एक तरफ चाय और दूसरी तरफ सब्जी बनाने

को कड़ाही चढ़ाई ही था कि पीछे से किशोर ने मुझे अपनी बांहों में घेर लिया और पूछा, ‘‘क्या बना रही हो?’’

‘‘नाश्ता और क्या,’’ मैं ने कहा.

‘‘मत बनाओ.’’

‘‘पर क्यों, मैं ने प्रश्नवाचक नजरों से देखा.’’

ये कहने लगे, ‘‘आज छुट्टी ली है ‘केसरी’ फिल्म देखने चलेंगे.’’

‘‘ज्यादा बातें न बनाओ. कल तक तो तुम्हें फिल्में अच्छी नहीं लगती थीं, फिर आज कैसे…’’

वे मेरे मुंह पर हाथ रख कर बोले, ‘‘तुम्हें अच्छी लगती हैं न अक्षय कुमार की फिल्में? और मुझे तुम,’’ मुसकराते हुए किशोर बोले.

मगर मैं मुंह बनाते हुए बोली, ‘‘अगर छुट्टी ले रखी थी, तो पहले बता देते, जरा देर और सो लेती. बेकार में जल्दी उठना पड़ा.’’

‘‘अच्छा, छोड़ो ये सब. यह बताओ, हमारी शादी की सालगिरह आने वाली है. कहां चलना है सैलिब्रेट करने? किशोर ने पूछा.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब कि गोवा चलें?’’ मेरे गाल पर चुंबन देते हुए किशोर बोले, तो मेरा मन गुदगुदा गया, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं फुजूलखर्ची करने की. गांव चलेंगे मांपिता का आशीर्वाद भी मिल जाएगा,’’ कह कर मैं अपनी भी चाय ले कर बालकनी में आ गई और चुसकियां लेने लगी.

पहले कभी सुबह इतनी सुहानी नहीं लगी थी जितनी आज लग रही थी. सोचने लगी, सबकुछ तो है मेरे पास. प्यार करने वाला पति, 2 प्यारेप्यारे बच्चे, अपना घर, जरूरत के सारे सुख. तो फिर किस मृगतृष्णा के पीछे भाग रही थी मैं? देखा, तो किशोर मुझे ही निहार रहे थे. जब मेरी नजरें उन से मिलीं, तो वे मुसकरा पड़े और मैं भी.

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