Stories :  टिकटिक  करती नीले रंग की दीवार घड़ी बता रही थी कि शाम के 4 बजने वाले हैं. यह छोटा सा कमरा जो सफेद रंग में रंगा था, इस में बड़ीबड़ी 2 खिड़कियां थीं, एक बालकनी और 2 दरवाजे. एक दरवाजा घर के दूसरे भागों से जोड़ता था और दूसरा बालकनी में खुलता था. सुहाना अपनी आरामकुरसी पर बैठ कर पंखे को निहार रही थी. गरमियां अपनी चरम पर थी और पंखे से आती हवा बस खानापूर्ति सा व्यवहार कर रही थी.

अपने माथे से टपकती पसीने की बूंदों की अपने ही दुपट्टे से पोंछती हुई सुहाना ने एक लंबी सांस ली और आंखें बंद करने की कोशिश की. पर अभी कुछ पल ही बीते थे कि झटके से उस की आंखें खुलीं और वह चौंक कर कुरसी से उठी. सामने किसी ने दवाजे पर दस्तक दी थी. उस ने कुछ पल इंतजार किया कि कहीं उसे नींद में भ्रम तो नहीं हुआ, पर एक बार और दस्तक की आवाज आई तो वह लपक कर गई और दरवाजा खोला.

सामने मां खड़ी थीं. हाथों में चाय की ट्रे लिए और होंठों पर मुसकान. दरवाजा खुलते ही मां ने अंदर कदम बढ़ाए और ट्रे को मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘सारा दिन बस कामकाम और बस काम. मु?ो तो कभीकभी लगता है कि इस बड़े से घर में बस मैं ही अकेले रहती हूं.’’

सुहाना मां के सामने वाली कुरसी पर बैठते हुए बोली, ‘‘आप की भी शिकायतें न मां कभी खत्म ही नहीं होतीं. पहले जब बाबा थे तो उन से शिकायतें, फिर जब मैं औफिस में काम करती थी तो उस की शिकायतें और अब इस नए वर्क फ्रौम होम के दौर में काम की शिकायतें.’’

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