मजदूर सारा सामान उतार कर जा चुके थे. बिखरा सामान रेलवे प्लेटफार्म का सा दृश्य पेश कर रहा था. अब शुरू कहां से करूं, यही समझ नहीं पा रही थी मैं. बच्चे साथ होते तो काफी बोझ अब तक घट भी गया होता. पूरी उम्र जो काम आसान लगता रहा था, अब वही पहाड़ जैसा भारीभरकम और मुश्किल लगने लगा है. 50 के आसपास पहुंचा मेरा शरीर अब भला 30-35 की चुस्ती कहां से ले आता. अपनी हालत पर रोनी सूरत बन चुकी थी मेरी.

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