लेखिका- मीना गुप्ता

‘‘कहींदूर जब दिन ढल जाए सांझ की दुलहन बदन चुराए...’’ गाना गुनगुनाते हुए राज बाथरूम से निकला और फिर बोला, ‘‘भाभीजी, मेरा नाश्ता... आज मुझे जल्दी जाना है.’’

‘‘क्या बात है देवरजी बड़े खुश नजर आ रहे हैं? रोज सांझ की दुलहन को याद करते हैं?’’

‘‘कुछ नहीं भाभी रेडियो पर बज रहा था न, तो यों ही दिल किया गुनगुनाने का.’’

‘‘जब कोई गीत गुनगुनाने का दिल करे तो इस का क्या मतलब होता है जानते हैं?’’

‘‘नहीं जानता,’’ राजन ने लापरवाही से कहा.

‘‘मतलब इस गीत के लफ्ज अंदर कहीं जगह बना रहे हैं. वह हर गीत जो हमारी जबान पर बारबार आता है कहीं न कहीं हमारे जज्बातों से जुड़ कर आता है.’’

‘‘ओह भाभी, आप भी... कोई नहीं है... आप यों ही...’’

‘‘कोई औफिस में देख ली क्या? मुझे धीरे से बता दीजिए. मैं आप के भैया से कह कर सब बात तय कर लूंगी.’’

‘‘नहीं है भाभी. अगर होती तो जरूर बताता.’’

‘‘सच?’’

‘‘हां भाभी, बिलकुल,’’ कह राजन ने राधिका को थोड़ा मुसकरा कर देखा और फट से बोला, ‘‘एक बात कहूं?’’

‘‘कहिए.’’

‘‘मुझे तो सांझ की दुलहन ही चाहिए.’’

‘‘देवरजी वह कैसी होती है. हम ने तो ऐसी कोई दुलहन सुनी ही नहीं.’’

‘‘बस बहुत सुंदर... ढलती शाम की तरह शांत, अपने आगोश में सारे उजाले को समेटे हुए... 2 पर्वतों के बीच डूबते सुरमई सूरज की तरह... पेड़ों की शाखाओं से झांकती किरणों की तरह, शाम को घर लौटते परिंदों की तरह और तारों भरे झिलमिल करते अंबर की तरह, जागती आंखों में सपनों की तरह, बहुत सुंदर.’’

‘‘तो आप यह क्यों नहीं कहते कि आप को किसी कविता से शादी करनी है?’’

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