उस ने मुझे अब भी नहीं बताया कि वह किस के साथ भागने की सोच रही थी. मैं उसे हैरानी से देख रही थी. सोच रही थी कि क्या यह संभव है कि मैं उसे जानती हूं. मैं ने उस वक्त महसूस किया कि मैं किसी मुसलमान इंसान को नहीं जानती, सिर्फ...

अचानक मन में चौंका देने वाला विचार उठा. इस से पहले कि मैं कुछ कह पाती, वह बोली, ‘‘हम दोनों बहनें जैसी हैं, मुनमुन. जानती हो, मुझे तुम पर हमेशा से कितना गर्व है. गर्व है अपनी दोस्ती पर भी. और तुम्हारा वह प्रशंसनीय आत्मविश्वास, उसे मैं कभी टूटते हुए नहीं देख सकती. स्कूल में कितनी बार सोचा कि तुम्हें बताऊं...’’

मुझ से और रहा नहीं गया. मैं ने उसे टोक कर पूछा, ‘‘क्या वह जुल्फिकार है?’’

उस ने जवाब नहीं दिया. उलटे 2 मोटीमोटी आंसू की रेखाएं उस के गालों पर लुढ़कने लगीं...तो वह जुल्फिकार ही था.

मैं अपना स्वाभिमान पी कर बोली, ‘‘पागल हो गई हो क्या?’’

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वह चुप रही तो मैं ने थोड़ा और बोल दिया, ‘‘भागने की सोच रही हो? वह भी ऐसे आवारा, निकम्मे लड़के के साथ जिस का कोई भविष्य ही नहीं है. वैसे महाशय कर क्या रहे हैं आजकल? न, ऐसा हर्गिज मत करना. पछताओगी.’’

वह चुपचाप जमीन पर आंखें गड़ाए सुनती जा रही थी और मैं भी बोलती चली जा रही थी, जैसा कि हमेशा होता था. ‘‘मेरी बात सुनो रत्ना, उस का तो कोई फ्यूचर है नहीं. खुद गिरेगा, तुम्हें भी साथ ले जाएगा. अभी तुम 18 साल की ही तो हो. चलो, कालेज खत्म कर लो पहले फिर यह भागनेवागने के बारे में सोचना.’’

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