लेखक- डा. रंजना जायसवाल

कोर्टरूम में सन्नाटा छाया हुआ था. सिर के ऊपर लगे एक पुराने पंखे और फाइलों के पन्नों के पलटने के अलावा कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी.

आज मुकदमे की आख्रिरी तारीख थी. पाखी सांस रोके फैसले के इंतजार में थी. उस ने दोनों बच्चों के हाथ कस कर पकड़ रखे थे. वकीलों की दलीलों के आगे वह हर बार टूटती, बिखरती और फिर अपनेआप को मजबूती से समेट हर तारीख पर अपनेआप को खड़ा कर देती. क्याक्या आरोप नहीं लगे थे इन बीते दिनों में. हर तारीख पर जलील और अपमानित होती थी पाखी. 8 साल की शादी. सबकुछ तो ठीक ही था.

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