बार बार बजती मोबाइल की घंटी से परेशान हो कर ममता ने स्कूटर रोक कर देखा. जैसा कि उसे अंदेशा था, दादी का ही फोन था. झुंझलाते हुए ममता ने फोन काट कर स्कूटर आगे बढ़ा दिया.

‘‘क्या घड़ीघड़ी फोन कर के परेशान करती रहतीं... आप तो सारा दिन खाली बैठी रहती हैं... लेकिन मुझे तो नौकरी करनी है न... बौस जब छोड़ेगा तभी आऊंगी... प्राइवेट जौब है... बाप की कंपनी नहीं कि मेरी मनमरजी चले...’’ आधे घंटे बाद दनदनाती हुई ममता घर में घुसी और घुसते ही अपनी दादी गायत्री पर बरस पड़ी.

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