न कोई रिश्ता, न खास जानपहचान. बस, नेकनीयत व अपनापन ज्योति को सुमित और उस के दोस्तों मनीष व रोहन के साथ धीरेधीरे ऐसे भावनात्मक एहसास से जोड़ते गए जो खून के रिश्ते से बढ़ कर था.

‘‘हां मां, खाना खा लिया था औफिस की कैंटीन में. तुम बेकार ही इतनी चिंता करती हो मेरी. मैं अपना खयाल रखता हूं,’’ एक हाथ से औफिस की मोटीमोटी फाइलें संभालते हुए और दूसरे हाथ में मोबाइल कान से लगाए सुमित मां को समझाने की कोशिश में जुटा हुआ था.

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