एक के बाद एक लगातार मैसेज फोन पर फ्लैश हो रहे हैं, ‘‘पहुंच गई? जल्दी आना… वेटिंग फौर यू.’’
मैं जवाब नहीं देना चाहती या शायद मेरे पास जवाब है ही नहीं. कैब में बैठ आंखें बंद कर लीं. दिल्ली की सड़कें रोशनी से नहाई हैं लेकिन मेरे भीतर गहरा अंधेरा है, आंखों के खुलने या बंद होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. मुझे चारों तरफ अंधेरा ही नजर आ रहा है. एक बार फिर मैसेज की बीप, ‘‘लव यू जान.’’
एक गहरी सांस ले मैं ने फोन साइलैंट कर दिया. आधा घंटा कब बीत गया, पता ही नहीं चला. दरवाजे की घंटी बजाते हुए नजर नेमप्लेट पर ठहर गई. ‘दिशा कुटीर’ कितनी संपूर्णता थी इस एक शब्द में.
‘‘कब से फोन मिला रही हूं…’’ गले लगती दिशा ने शिकायत की तो ध्यान आया कि मेरा फोन अभी तक साइलैंट है.
‘‘फोन साइलेंट था,’’ मैं ने कहा.
‘‘चल कोई नहीं. जल्दी से फ्रैश हो जा…डिनर रैडी है. रोहन भी पहुंचने वाले हैं,’’
‘‘हम्म…’’
‘‘क्या बात है मेघा? अपसैट लग रही है, सब ठीक है न?’’ दिशा ने अपने हाथों से मेरी हथेली पकड़ ली. शायद मेरी आंखों को पढ़ चुकी थी.
‘‘अमोल के साथ ?ागड़ा हुआ है?’’
‘‘नहीं, कोई ?ागड़ा नहीं हुआ.’’
‘‘फिर? फिर क्या हुआ है?’’ मानो दिशा ने मेरी हथेली छू कर सब जान लिया था.
‘‘बताऊंगी…’’
रोहन के आने के बाद हम तीनों ने साथ डिनर किया. रोहन, अमोल के बारे में पूछता रहा और मैं हांहूं में जवाब देती रही. खाने के बाद मैं बालकनी में जा खड़ी हुई. दिसंबर के महीने में दिल्ली की हवाओं में सर्दी घुल जाती है यह बात मु?ो एअरपोर्ट पर ही याद आ गई थी. पिछले 4 सालों में बैंगलुरु से बाहर निकली ही कहां थी जो कहीं और का मौसम याद रहता.
कंधे पर गरमाई महसूस हुई तो पलट कर देखा. दिशा मु?ो शाल से ढक रही थी. वाकई में मुझे गरमाहट की जरूरत है. मैं ने हाथ से शाल को सहलाते हुए देखा, ‘‘बिलकुल ऐसी शाल तो मां के पास है… मेरा मतलब था. सर्दियों में शाल में लिपटी मां एक के बाद एक सारे काम यंत्रवत निबटाती रहती थीं.’’
‘‘मिलने का मन नहीं करता?’’
‘‘बहुत करता है. बहुत याद आती है लेकिन घर से निकलते वक्त जानती थी कि दोबारा इस दहलीज को नहीं देख पाऊंगी. वह घर नहीं था दिशा, जलकुंड था, जिस के दायरे सीमित थे. मैं ऐसे परिवार में पलीबढ़ी हूं जहां प्यारमुहब्बत सिर्फ किस्सेकहानियों और फिल्मों का हिस्सा थी. असल जिंदगी में प्रेमीप्रेमिका नहीं, पतिपत्नी होते थे. पति को सारे अधिकार मिलते और पत्नी को कर्तव्य. वह पत्नी मेरी दादी, मां, चाची और भाभी सब थीं. घर की चारदीवारी के अंदर सिमटे अपने छोटे से जलकुंड में तैरती मछली सी औरतें. बिना वजूद, बिना सपनों की औरतें. जिन की सिसकियां गूंगी थीं और आंसू उस जलकुंड का पानी बन जाते.
अपने ही घर में मेरा दम घुटता था. उन औरतों पर तरस आता लेकिन इतनी हिम्मत नहीं थी कि उन के लिए कुछ कर पाती. उस माहौल में रहते हुए मु?ो शादी शब्द से डर लगने लगा. मेरे लिए शादी का मतलब ही जलकुंड में कैद हो जाना था.
एक लंबी सांस ले मैं रुक गई. महसूस हुआ कि मेरा चेहरा आंसुओं से तर
हो चुका है. दिशा खामोश थी. शायद मु?ो सांत्वना देने के लिए शब्द ढूंढ रही थी या सोच रही थी कि 4 साल की गहरी दोस्ती के बावजूद मैं ने उसे ये सब क्यों नहीं बताया.
‘‘कौफी?’’
‘‘मैं बनाती हूं. अमोल कहता है कि…’’ मेरे शब्द वहीं रुक गए. मेरी हर बात में अमोल है. वह मेरी आदत बन चुका है.
‘‘क्या कहता है?’’
‘‘यही कि मैं बैस्ट कौफी बनाती हूं.’’
‘‘हां याद है, लेट नाइट कौफी हमेशा तू ही बनाती थी. क्या दिन थे यार… हर वीकैंड हम चारों घूमने निकल जाते. शौपिंग, मूवी, आउटिंग… ग्रेट डेज… 6 महीने हो गए हमें दिल्ली शिफ्ट हुए. तुम जैसे साथी नहीं मिले.’’
कौफी के मग हाथों में थामे हम दोनों फिर से बालकनी में आ बैठे. ठंडी हवा, गरम कौफी और दोस्त. इस से अच्छा क्या हो सकता है मन खोल कर रख देने के लिए.
‘‘तू सच में यहीं जौइन करने वाली है?’’
‘‘तुझे क्या लगा कि मैं इतनी दूर सिर्फ तुम दोनों से मिलने आई हूं?’’
‘‘अमोल तैयार है?’’
‘‘नहीं, और मैं तो यह भी नहीं जानती कि मैं खुद कितनी तैयार हूं. अच्छा औफर था, ऐक्सैप्ट कर लिया. जौइन करने के बाद देखूंगी क्या करना है.’’
‘‘यार मेघा, तुम दोनों कैसे मैनेज करोगे अपनी रिलेशनशिप इतनर दूर रह कर?’’
‘‘जानती है दिशा, घर की बेटी होने का इतना एडवांटेज जरूर मिला कि मैं कालेज जा सकी. वहीं मेरी मुलाकात अमोल से हुई. पता ही नहीं चला कब यह जानपहचान दोस्ती और दोस्ती प्यार में बदल गई.
अमोल के परिवार में उस के तलाकशुदा पिता थे. मां और पिता के अलगाव के बाद अमोल अपने पिता के साथ ही रहा. बचपन में कभीकभी मां से मिलने जाता था, फिर मां की दूसरी शादी हो गई और अमोल ने उन से मिलना बंद कर दिया. परिवार का साथ व सुख न मिलने के कारण अमोल का रिश्तों पर बिलकुल विश्वास नहीं था. उस के लिए शादी सिर्फ एक सामाजिक दिखावा थी.
मैं जानती थी कि मेरा परिवार किसी भी कीमत पर मेरे और अमोल के रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगा. यहां तक कि परिवार की औरतें भी नहीं. मैं वह कर बैठी थी जिस की उस परिवार में कल्पना करना तक गुनाह था.
मैं अमोल से बेहद प्यार करती थी और वह मुझ से. कालेज के बाद हम दोनों को बैंगलुरु में अच्छी जौब मिल गई. घर में जब मेरी नौकरी का पता लगा तो बवाल मच गया.
‘‘तुम्हारा पढ़ने का मन था… पढ़ा दिया. अब यह नौकरी की बात कहां से आ गई? हमारे घर में कौन सी कमी है जो तुम्हें नौकरी करनी पड़ रही है? जल्द ही अच्छा खानदान देख तुम्हारी शादी करा देंगे फिर तुम भी अपनी मां और भाभी की तरह राज करना.’’
पापा की बात सुनती मैं उन ‘राज’ करने वाली औरतों को देख रही थी जिन के कपड़े महंगे थे और वजूद सस्ता. मन कर रहा था चीख कर कह दूं कि नहीं करना मुझे ऐसा राज. मुझे किसी दूसरे की शर्तों पर नहीं जीना. मुझे अथाह समंदर चाहिए जलकुंड नहीं लेकिन होंठ फड़फड़ा कर रह गए.
उस रात मां के पास लेटी मैं उन्हें अमोल के बारे में बता रही थी. यह भी बता रही थी कि कल मैं पापा को बिना बताए अमोल के साथ बैंगलुरु जा रही हूं. हम दोनों बिना शादी किए एकसाथ रहेंगे. वे चुपचाप सुनती रहीं. हम दोनों की आंखों से आंसू बहते रहे. उन्होंने मुझे कस कर खुद से लिपटा लिया. वे हमेशा की तरह चुप थीं. बस उस रात के हमारे आखिरी साथ को महसूस कर रही थीं.
अगले दिन मैं अमोल के साथ बैंगलुरु आ गई अपनी नई दुनिया शुरू करने. हम दोनों ने आपसी सहमति से लिव इन में रहने का निर्णय लिया था. हम खुश थे… बहुत खुश. अच्छा कमा रहे थे. हर पल को जी रहे थे. एकदूसरे की मुहब्बत में पूरी तरह डूबे हम 7वें आसमान पर थे. हालांकि समाज हमारे रिश्ते को सम्मान की नजर से नहीं देखता, इस बात की हम ने कभी परवाह नहीं की. अमोल का साथ मुझे पूर्णता दे रहा था. हमारे रिश्ते में कोई बंधन, अधिकार, कर्तव्य कुछ भी नहीं था. था तो बस प्यार… एकदूसरे का साथ. अमोल मुझ पर जान छिड़कता था. आज भी छिड़कता है. मेरे फोन में उस का ‘लव यू जान.’ मैसेज हर दिन आता है. आज शाम भी आया है.
बताते वक्त न जाने कब मेरी आवाज भर्रा गई.
‘‘मेघा, मैं बस इतना चाहती हूं कि तुम दोनों जैसे अब तक साथ रह रहे थे वैसे ही रहते रहो. कितने परफैक्ट लगते हो तुम दोनों साथ में. अमोल तो तुम्हें बेपनाह मुहब्बत करता है न, फिर तुम ने दिल्ली आने का फैसला क्यों लिया?’’
‘‘दिशा तूने मुझे कभी ब्लैक ड्रैस में देखा? नहीं देखा होगा क्योंकि अमोल को ब्लैक कपड़े पसंद नहीं. उस ने मुझे कभी नहीं पहनने दिए. एक बार किसी पार्टी में जाते समय मैं ने अपनी पसंद से खरीदी बहुत खूबसूरत सी ब्लैक ड्रैस पहन ली थी. जानती हो, अमोल बहुत चिल्लाया था. उस के बाद वह ड्रैस कहां गई, मुझे नहीं पता. मुझे चाइनीज का बेहद शौक था. लास्ट 4 साल पहले खाया था क्योंकि अमोल को नहीं पसंद. अमोल को महत्त्व देतेदेते कब मैं खुद को इग्नोर करने लगी पता ही नहीं चला.’’
‘‘होता है ऐसा मेघा. रिलेशनशिप में हम औरतें पार्टनर को खुद से पहले रखने लगती हैं. इस का मतलब यह तो नहीं कि पार्टनर से दूर हो जाएं.’’
‘‘4 साल में इतना समझ सकी हूं कि अमोल कुंठाग्रस्त है. उसे लगता है कि अगर उस के पापा ने मम्मी को ठीक से कंट्रोल किया होता तो उस का बचपन एक स्वस्थ परिवार में बीतता. उस की मम्मी उस से दूर नहीं जातीं. इसी कुंठा के चलते वह न जाने कब में मुझे कंट्रोल करने लगा और वक्त के साथ ये कंट्रोल बढ़ने लगा है. नो डाउट वह मुझे बहुत चाहता है लेकिन उस की कुंठा मेरे वजूद को निगलने लगी है.’’
‘‘कभी अमोल ने तुम पर हाथ उठाया है?’’
‘‘नहीं.’’
‘‘धोखा दिया है?’’
‘‘नहीं.’’
‘‘फिर भी तुम दिल्ली आ रही हो. शादीशुदा जोड़ा अगर दूर भी रहे तब भी उस के पास रिश्ता निभाने के लिए बंधन और कारण दोनों होते हैं. तुम दोनों तो वैसे भी लिवइन में हो. समाज के, परिवार के खिलाफ जा कर तुम ने एकदूसरे को अपनाया है. ऐसे में रिश्ते से वापसी क्या आसान होगी? अमोल के अलावा तुम्हारे पास है ही कौन?’’
सिर बहुत भारी हो रहा था. अचानक अपने बदन पर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ… सांप? नहीं यह सांप नहीं है. बारीक रस्सी जैसा कुछ है. एक नहीं, बहुत सारी रस्सियों से बना जाल जो मुझे जकड़ता जा रहा है. जकड़न बढ़ने के साथ मेरे शरीर पर रस्सियों का दबाव भी बढ़ रहा है. लगातार कोशिश कर रही हूं आजाद होने की लेकिन मेरा शरीर बिलकुल साथ नहीं दे रहा. जख्मी हो रही हूं. खून रिसने लगा और धीरेधीरे फर्श पर फैल गया. कमरा खून के तालाब में बदल गया. जाल की चुभन, जकड़न महसूस कर पा रही हूं. कमरे में अंधेरा है लेकिन फिर भी मैं देख पा रही हूं, मेरा शरीर मछली के शरीर में तबदील हो गया और वह मु?ो जाल के साथ खींच कर ले जा रहा है. मैं लहूलुहान तड़पती चली जा रही हूं. मेरे चारों तरफ वही मछली सी औरतें तैर रही हैं, जिन के जैसा बनना मु?ो मंजूर नहीं था. सांसें रुकने से पहले एक बार उसे देखना चाहती हूं जो मेरी यह गत कर रहा है.
तभी जाल की जकड़ ढीली हो गई. किसी की हथेली ने मेरे बालों को पकड़ मुट्ठी में भींच खींच लिया. मैं कराह रही थी.
अब उस का चेहरा मेरे चेहरे के ठीक सामने था. मेरी पलकों पर खून ठहरा हुआ था… ठीक से कुछ दिख नहीं रहा. वह हंसा. मैं उस की हंसी पहचानती थी. एक आवाज गूंजती है,
‘‘लव यू जान.’’
‘‘अमोल? तुम अमोल हो?’’ और मेरी पलकों पर जमा खून पिघल गया. साफ दिख रहा था कि वह मु?ो जलकुंड की ओर खींच कर ले जा रहा है.
हड़बड़ा कर आंखें खुल गईं. धड़कनें बेकाबू हो गईं और शरीर खून की जगह पसीने से लथपथ हो गया. कमरे में अब भी अंधेरा था.
किसी तरह हिम्मत बटोर खड़ी तो हो गई हूं. मगर 2 कदम चलते ही डगमगाती मैं खुद को बेहद असहाय महसूस करने लगी. उंगली के दबाव से लाइट का स्विच औन होते ही पूरा कमरा रोशनी से भर गया. बहुत हद तक मेरे भीतर का अंधेरा भी छंटने लगा. अब सब साफसाफ देख पा रही थी.
‘‘मैं वापस नहीं आ रही,’’ टाइप करती मेरी उंगलियां कांप नहीं रहीं. अमोल को अपने फोन और जिंदगी से ब्लौक कर एक आखिरी काम निबटा दिया.
