लेखिका- शक्ति पैन्यूली

‘‘तुम चिल्लाते क्यों हो जी. कुरतापाजामा वहीं खूंटी पर तो टंगा है. लेकिन ठहरो, अभी तुम कपड़े मत बदलना...’’ संतोष ने भीतर से आते हुए कहा.

‘‘क्यों...?’’ ताराचंद ने पूछा.

संतोष मुसकरा कर बोली, ‘‘क्योंकि तुम्हारी इच्छा चाय पीने की होगी. ऐसा करो तुम दुर्गा ताई के घर हो आओ. ताऊ को कल शाम से बुखार है. वहां चाय के साथ नमकीन भी मिल जाएगी...’’ थोड़ा रुक कर वह फिर बोली, ‘‘कल हम दोनों ही वहां जा कर सुबह की चाय पी लेंगे. आज दिनभर वहां बैठेबैठे मैं तो 2 बार की चाय पी आई थी. लौटते समय 6 संतरे भी साथ ले आई थी.’’

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