Best Story : ‘‘जिंदगी का फलसफा भी कितना अजीब है, शामें कटती नहीं और साल गुजरते चले जा रहे है,’’ टेबल पर रखी पत्रिका के पहले पन्ने पर बोल्ड अक्षरों में लिखी हुई यह पंक्ति पढ़ कर प्रतिभा ने एक ठंडी सांस ली और बालकनी में आ गई. शायद उस के साथ भी कुछ ऐसा ही चल रहा था.
प्रतिभा आज थोड़ा जल्दी उठ गई थी. हलकी ठंड शुरू हो चुकी थी. अक्तूबर का महीना था और सुबह 6 बजे भी थोड़ा अंधेरा सा ही था. काफी देर तक बालकनी में खड़े रहने के बाद भी जब उस का दिल हलका नहीं हुआ तो वह नीचे उतरी और गेट खोल कर बाहर निकल आई. वह लोधी रोड के रिहायशी इलाके में एक बड़े से बंगले में रहती थी. यह दिल्ली का एक पौश इलाका है और यहां की सुबह बहुत खूबसूरत होती है. बस इसे ही महसूस करने के लिए वह बाहर निकल कर सड़क पर टहलने लगी. लोधी गार्डन भी पास ही था. कभीकभी वह गार्डन तक भी चली जाती है और अकेली वहां किसी कोने में बैठी कुछ सोचती रहती है.
आज वह केवल सड़क पर टहल कर ही लौट पड़ी. अब तक सुबह का उजाला हो चुका था. पक्षी अपने खाने की तलाश में निकल चुके थे. दूर कोने में नुक्कड़ पर बजाज भाई अपनी दुकान के बाहर सफाई कर रहे थे. उन की दूध, चाय और नमकीन की शौप थी. प्रतिभा के घर के पास ही रहने वाली प्रिया स्कूटी से कंप्यूटर क्लास के लिए निकल गई थी और प्रतिभा की पड़ोसिन नेहा भी सुबहसुबह औफिस जा रही थी.
सड़क पर और बहुत से लोग किसी न किसी काम के लिए निकले थे. प्रतिभा यह सोच कर मायूस हो गई कि उसे तो कुछ नहीं करना. कहीं नहीं जाना. जिंदगी में उस का अब कोई मकसद नहीं और कोई काम भी नहीं है. बेवजह गुजरते जिंदगी के लमहे और उस बेबसी में महसूस होती घुटन के साथ जीने की कोशिश में लगी रहती है. इस सोच ने उस के दिल को भारी कर दिया. धीमे कदमों से चलते हुए वह अपने घर के गेट तक आ पहुंची. सीढि़यां चढ़ती हुई अपने कमरे में आई और ठंडी सांस ले कर सोफे पर बैठ गई.
प्रतिभा को आया हुआ देख कर रसोइया उस के लिए चाय और नमकीन ले आया. उस ने चाय पी और टेबल पर रखा ताजा अखबार उठा लिया. आज के समय में कहां कोई अखबार पढ़ता है पर उसे बहुत शौक है. शौक क्या है कुछ करने के लिए है नहीं शायद इसलिए अखबार पलट लेती है. न्यूज तो पुराने ही होते हैं और इसी वजह से कई बार पहला पेज पढ़ कर रख देती है.
प्रतिभा ने अपनी कामवाली से पूछा, ‘‘नेहा कहां है?’’
‘‘बेबी चली गई औफिस.’’
‘‘और कौस्तुभ?’’
‘‘कौस्तुभ भैया के कालेज में आज फंक्शन है न सो वे तैयार हो रहे हैं और बस निकलने ही वाले है.’’
‘‘अब बचे मेरे हस्बैंडजी और आज उन का कोई टूर था तो वे कल रात आए ही नहीं. औफिस से ही निकल गए होंगे. है न?’’
‘‘हांजी दीदी आप भी तैयार हो जाओ. मैं कपड़े निकाल देती हूं. पानी हलका गरम कर के रख दिया है. आप के कपड़े भी वाशरूम में रख देती हूं. आप फ्रैश हो जाओ फिर मैं आप के लिए नाश्ता लगा देती हूं,’’ हाउस हैल्प ने चाय का कप उठाते हुए कहा.
प्रतिभा नहाने चली गई. नहा कर निकली तो उस के लिए नाश्ता तैयार था. नाश्ता कर के उस ने टीवी खोल लिया मगर टीवी में वही सब देख कर उस का दिल नहीं लगा. उस ने टीवी बंद कर दिया. थोड़ी देर मोबाइल निकाल कर सोशल मीडिया के चक्कर लगाए. मगर वहां भी वही सब बातें, वही दिमाग पकाने वाली चीजें. उस ने मोबाइल भी रख दिया. फिर दिल में आया चलो किसी से फोन पर बात कर के मन लगाया जाए.
मगर किस से दिमाग में यह सवाल कौंध गया. उस ने फिर से फोन किनारे रख दिया. उस का आजकल किसी से बात करने का भी दिल नहीं करता. बात करे भी तो क्या?
फिर उस ने सोचा चलो आज किसी पुरानी सहेली को फोन लगाया जाए. पर ऐसा करने को भी उस का मन तैयार नहीं हुआ. जिस से भी बात करो कुछ न कुछ ऐसा बोल देती है कि मन ही खराब हो जाता है और बात भी क्या की जाए. वही बोरिंग बातें होती हैं.
प्र्तिभा की सब से गहरी दोस्त अंकिता है. मगर उस से बात कर के कभी प्रतिभा को खुशी नहीं मिलती क्योंकि अंकिता की जिंदगी काफी सैटल है और वह इस का ढिंढोरा पीटती रहती है. अंकिता जब बात करती है तो अपने पति की तारीफों के पुल बांधे जाती है. मसलन, ‘मेरा पति मुझे इतने सरप्राइज देता है,’ ‘मुझे बहुत प्यार करता है,’ ‘मेरे लिए खाना बनाता है,’ ‘हर संडे हम लोग बाहर डिनर करने जाते हैं,’ ‘वह मेरे लिए जान भी दे सकता है’ वगैरहवगैरह.
अंकिता बोलती रहती है और प्रतिभा सुनती रहती है क्योंकि उस के पास इस विषय में कहने को कुछ नहीं होता. वह क्या कहे उस का पति तो सुबह चला जाता है और रात ढले घर लौटता है. ठीक से उस की तरफ देखता भी नहीं. आते ही अगले दिन की तैयारी में लग जाता है या फोन और कंप्यूटर के आगे बैठा रहता है. पता नहीं मोबाइल पर किस से घंटों बातें करता रहता है. फिर सुबहसुबह निकल जाता है. ऐसा लगता है जैसे उसे घर काटने को दौड़ता है या फिर खुद को हमेशा व्यस्त दिखाता है.
एक सैटरडे और संडे ही है जिन का प्रतिभा बेसब्री से इंतजार करती है क्योंकि ये 2 दिन उस के हस्बैंड और बच्चों की छुट्टी रहती है. मगर इन 2 दिनों में भी उस का हस्बैंड कोई न कोई मीटिंग या टूर और्गेनाइज कर लेता है और प्रतिभा बेचारी फिर अगले सैटरडे का इंतजार करने लग जाती है.
प्रतिभा ने अपना माथा झटका. फिर सोचा शालू से बहुत दिनों से बात नहीं हुई है. मगर शालू का नंबर डायल करतेकरते वह रुक गई. उसे याद आया पिछली दफा शालू से बात करने के बाद वह 1 घंटा डिप्रैशन में रही थी क्योंकि शालू ने उस की कमजोर नस को पकड़ा था और टोंट मारा था, ‘‘क्या यार इतने रुपए होने के बावजूद तेरे जीवन में कोई खुशी नहीं, कोई उत्साह कोई उमंग नहीं. कैसे जी लेती है?’’
‘‘तो क्या करूं जिंदगी को खत्म कर दूं?’’ प्रतिभा ने चिढ़ कर उलटा सवाल किया था.
शालू व्यंग्य से मुसकराती हुई बोली, ‘‘यह सब तेरे हाथ में थोड़े ही है. जिंदगी तो जीनी ही पड़ेगी तुझे. मुझे देख मैं ने शादी नहीं की. बंगलागाड़ी भी नहीं मगर मैं तो खुश हूं. मुझे किसी से कोई अपेक्षा नहीं है. अपनी मस्ती में जीती हूं. दोस्तों के साथ जब दिल करे कौफी पीती हूं. जहां और जब दिल करे घूमती हूं. कोई लफड़ा नहीं, कोई टैंशन नहीं. घर वालों की परवाह नहीं है. रात में औफिस से आती हूं फिर बिस्तर पर पैर पसार कर सो जाती हूं. किसी से रुपए नहीं मांगने पड़ते. खुद कमाती हूं और खुद खर्च करती हूं. मगर तेरी जैसी हाउसवाइफ तो बस पति के आसरे रहती है. पति कहे तो उठो पति कहे तो सोओ. पति जहां कहे वहां जाओ, वह जो कहे वही करो और मना करे तो मत करो. उफ, कैसे जीते हो तुम लोग?’’
शालू की सोच के आगे प्रतिभा को कुछ समझ नहीं आया था. खुशी क्या शादी करने या न करने की मुहताज है? ठीक है शालू अकेली है, इंडिपैंडैंट है पर प्रतिभा का सपना तो एक खुशहाल परिवार का था न. उसे तो पति चाहिए था. बच्चे चाहिए थे, जिन के साथ मस्ती से अपनी जिंदगी खुशी से बिताए. मगर क्या सचमुच ऐसा हुआ? कहने को उस का बेटा भी है, पति भी है और बेटी भी है, सासससुर सब हैं पर उस के पास कौन है? कोई भी नहीं. सासससुर दूसरे शहर में रहते हैं. बच्चे अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं. बेटा कालेज जाता है. बेटी जौब ट्रेनिंग के लिए चली जाती है. पति औफिस चले जाते हैं. वह रह जाती है पूरे घर में अकेली. पर ठीक है न. उस के पास सब है. सारी सुविधाएं हैं. नौकरचाकर है. बंगलागाड़ी है. वह चाहे तो अभी गाड़ी उठा कर कहीं दूर चली जाए घूमने. पर अकेले घूमने में आनंद कहां आता है.
किसी सहेली को ले कर जाए तो क्या मजा आएगा? उसे याद आया पिछली दफा क्या हुआ था. कालेज टाइम की चारों सहेलियां ने प्लान बनाया कि चलो हम मिल कर कहीं पार्टी करते हैं. पार्टी क्या थी चारों अपनेअपने फोन में लगे रहे थे. नेहा के पास फोन में बिजी होने की बात नहीं थी तो उस के पास बोलने के लिए भी कुछ नहीं था.
प्रीति के पास एक ही बात थी और वह थी अपनी तारीफ करना, ‘‘यार यह देख मेरी साड़ी कितनी प्रिटी है न और ये सैंडल मैं ने साउथएक्स से लिए हैं. यह ड्रैस जबरदस्त है न बट यार थोड़ी सी बौडी और स्लिम होती तो मजा आ जाता. सच कहूं तो मेरे जैसी कोई है नहीं इस दुनिया में.’’
यह सब सुनना प्रतिभा को पसंद नहीं आ रहा था. नीता और निभा फोन में लगी रहीं. वह वहां से उठ कर जा भी नहीं सकती थी. बहुत देर तक सभी सहेलियां साथ बैठी रहीं. प्रतिभा को सम?ा ही नहीं आ रहा था कि वह यहां आई क्यों थी. वही रैस्टोरैंट, वही खानापीना, वही सहेलियां तभी तो उस का बिलकुल मन नहीं करता सहेलियों के साथ कहीं बाहर जाने का.
प्रतिभा ने घड़ी की तरफ देखा. अभी 11 बज रहे थे. तारीख और दिन देखा. आज थर्सडे ही था. अभी तो 2 दिन और थे बीच में. आज का पूरा दिन और फिर फ्राइडे का पूरा दिन. इस के बाद आएगा सैटरडे. शायद बेटी घर में रहे वरना वह कई बार सैटरडे को अपनी सहेलियों के साथ निकल जाती है. बेटे की तो दुनिया ही अलग है. वह छुट्टी के दिन अपने कमरे में कैद रहता है फोन और लैपटौप के साथ. हस्बैंड से थोड़ी उम्मीद रहती है पर वे भी खुद को काम में बिजी दिखाते हैं. बस सैटरडे को एक आस भर रहती है कि शायद घर वालों का साथ मिल जाए.
प्रतिभा थोड़ी देर के लिए लेट गई. नींद आंखों में है कहां? पूरी रात तो
सोती है. सुबह 6 बजे उठती है. उस के बाद
और कितना सोए. बस करवट बदलती रही. विचारों की शृंखलाएं दिमाग में घूमती रहीं. फिर उठ कर गार्डन में आ गई. फूलों की तरफ देखने लगी. ये फूल कितने खुश हैं. मस्ती से ठंडी हवाओं से लिपट रहे हैं. उस ने अपने गार्डन में हरसिंगार के पेड़ लगाए हैं. उसे हरसिंगार के फूल बहुत पसंद हैं. बचपन में उस के दादू गार्डनिंग करते थे और उन्होंने हरसिंगार के बहुत से पेड़ लगाए थे.
एक दिन प्रतिभा ने पूछा, ‘‘दादू, इन फूलों की खासीयत क्या है? ये कितने सुंदर हैं. इस पेड़ का क्या नाम है?
तब दादू ने उसे सम?ाया, ‘‘ये हरसिंगार के पौधे हैं और इन की पहचान इन के सफेद फूलों से होती है. इन सफेद फूलों के बीच में नारंगी रंग की डिजाइनें बनी होती हैं. अपनी खुरदरी, दांतेदार और लंबी पत्तियों तथा रात में खिलने और सुबह गिरने वाले फूलों की वजह से भी ये पौधे दूसरों से अलग नजर आते हैं. यह पौधा 2 से 10 मीटर तक ऊंचा हो सकता है और इस के फूलों की सुगंध बहुत मनमोहक होती है. इसे पारिजात, शैफाली या नाइट जैस्मिन के नाम से भी जाना जाता है. इस के फूलों से प्राकृतिक रंग निकाला जाता है जिसे कपड़ों और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. एक खास बात और बताऊं?’’ दादाजी ने पूछा था, ‘‘बताओ न दादू,’’ प्रतिभा ने मचल कर पूछा.
‘‘पारिजात वृक्ष को कभीकभी ‘दुख का वृक्ष’ भी कहा जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस के फूल कभी जमीन को नहीं छूते. ये रात में खिलते हैं और सुबहसुबह गिर जाते हैं जिस से आंसुओं का आभास होता है.’’
यही वजह है कि प्रतिभा हरसिंगार के फूलों से एक कनैक्शन महसूस करती थी. उस के मन में भी दुख कहीं पसरा हुआ था. उस के सपने भी यथार्थ की धरती को नहीं छूते थे. उस ने उन फूलों को चूमा और हवा में बिखरी उन की खुशबू को बांहों में समेटने की कोशिश करने लगी. मगर ऐसा भी क्या कभी हो सकता है?
प्रतिभा बाहर सड़क की तरफ देखने लगी. जुनेजाजी का पूरा परिवार कहीं जा रहा था. जुनेजा की पत्नी उस की तरफ देख कर मुसकराती हुई निकल गई. प्रतिभा ने भी जवाब में मुसकरा दिया. फिर चुपचाप अपने कमरे में चली आई और दरवाजा बंद कर लिया. वह अपनी सोच को भी बंद करना चाहती थी. मगर एक के बाद एक विचार आते ही रहते.
आज प्रतिभा की वैडिंग ऐनिवर्सरी थी. उस के लिए खुशी का और यादगार दिन था. पर जरूरी तो नहीं कि उस के हस्बैंड या बच्चों के लिए भी इस दिन की कोई अहमियत हो.
1 साल पहले वैडिंग ऐनिवर्सरी के दिन प्रतिभा उत्साहित थी क्योंकि उस दिन उस ने हस्बैंड के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बनाया था. प्रतिभा शाम से ही तैयार हो कर बैठी थी. उस ने अपने हसबैंड की गिफ्ट की गई पिंक साड़ी पहनी थी और बालों को खुला छोड़ दिया था. हलकी ज्वैलरी भी पहनी थी जो उस के हस्बैंड को पसंद थी. ज्यादा ज्वैलरी पहनने पर उस के हस्बैंड मुंह बनाते थे. गोल्डन वाच भी पहन रखी थी. प्रतिभा ने पति का पसंदीदा परफ्यूम भी लगाया था. बस उन के आने का इंतजार कर रही थी. तभी उस के हस्बैंड के साथ काम करने वाले सुमित खन्ना की पत्नी की कौल आई. पूछा, ‘‘आप हस्बैंड के साथ आज कनिका के सरप्राइज बर्थडे फीस्ट में जा रहे हो?’’
‘‘बर्थडे?’’ प्रतिभा ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘हां, तो क्या आप के हस्बैंड ने आप को यह बात बताई भी नहीं कि वे सब क्या प्लान कर रहे हैं?’’
‘‘नहीं तो…’ प्रतिभा कुछ कह नहीं सकी. आज सुबह ही तो उस ने हस्बैंड से कन्फर्म किया था कि ऐनिवर्सरी मनाने कहीं बाहर जाएंगे. घूमेंगे, खाएंगे, पीएंगे और फिर क्वालिटी टाइम संग बिताएंगे. तब भी उन्होंने कुछ नहीं कहा था. अब किसी गैर से सचाई सुनने को मिल रही है. उस का मन किया कि वह कौल कर के हस्बैंड से पूछे मगर फिर रुक गई और तय किया कि पहले हस्बैंड के आने का इंतजार करती है.
रात गहरी होती गई और फिर 12 भी बज गए. सोफे पर इंतजार करती प्रतिभा को कब
नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला. रात 2 बजे के करीब खटपट से उस की नींद खुली. हस्बैंड घर में दाखिल हो चुके थे. थोड़ा शराब का नशा और थोड़ा जश्न का खुमार उन के चेहरे से साफ ?ालक रहा था. प्रतिभा को सजधज कर इंतजार करते देख उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ.
‘‘हैप्पी ऐनिवर्सरी जान,’’ कह कर गले से लगाया और फिर कमरे में जाते हुए कहा, ‘‘यार आज काम बहुत था. फौरेन डैलीगेट्स की मीटिंग भी थी. निकल ही नहीं सका. किसी और दिन चले जाएंगे.’’
प्रतिभा के दिल का एक कोना फिर से टूट गया. उसे इस बात का ज्यादा गम नहीं था कि वे कहीं बाहर गए नहीं बल्कि इस बात का गम ज्यादा था कि उस के पति ने उस से ?ाठ कहा.
प्रतिभा अंदर से दुखी थी. फ्रेडरिक नीत्शे की यह पंक्ति उस के जेहन में घूम रही थी, ‘‘मैं इसलिए दुखी नहीं हूं कि तुम ने मु?ा से ?ाठ बोला, मैं इसलिए दुखी हूं कि अब मैं तुम पर यकीन नहीं कर सकता.’’
उस दिन के बाद प्रतिभा को कभी अपने पति की बातों पर यकीन नहीं हुआ. आज भी उस की ऐनिवर्सरी थी मगर उस ने आज हस्बैंड को इस बात की याद ही नहीं दिलाई. उसे डर था कि हस्बैंड फिर उस का दिल तोड़ेंगे. इस डर का कोई इलाज नहीं था. डेल कार्नेगी के शब्दों में, ‘‘डर और कहीं नहीं बल्कि आप के दिमाग में होता है.’’
अब प्रतिभा ने हस्बैंड से कोई उम्मीद रखनी ही छोड़ दी थी. सिर्फ हस्बैंड से ही नहीं अपने बच्चों से भी उसे कोई उम्मीद नहीं थी. अपनी जिंदगी से भी कोई उम्मीद नहीं बची थी. अब दिल या दिमाग में कोई सपना, कोई तमन्ना, कोई आरजू नहीं थी. वह सिर्फ जी रही थी क्योंकि अपनी जिंदगी खत्म करने की भी उस में हिम्मत नहीं थी.
