असम की खूबसूरत वादियों में बसे नायगांव में जन्मीं संजुक्ता दत्ता ने असम के मूगा सिल्क और मलबरी सिल्क को पूरे विश्व में इस तरह फैला दिया है कि आज हर जगह इन की धूम है. इस काम की प्रेरणा उन्हें कारीगरों की दयनीय हालत को देख कर मिली. आर्थिक तंगी से जूझ रहे ये कारीगर गांव छोड़ कर शहर की ओर जाने पर मजबूर थे. ऐसे में संजुक्ता ने उन का साथ दिया और उन की कला को पेशे में बदलने में सहायता की. हैंडलूम के इस काम के लिए उन्हें साल 2017 में ग्लोबल इंडिया आइकौन अवार्ड मिल चुका है. इतना ही नहीं वे इस साल ‘कांस फैस्टिवल’ में हौलीवुड की कुछ ऐक्ट्रैसेस के लिए ड्रैस डिजाइन करने वाली हैं.

कारीगर बने प्ररेणा

संजुक्ता बताती हैं कि मैं एक सिविल इंजीनियर हूं और असम में सरकारी नौकरी में थी. मेरा काम गांव में जाना होता था. उस दौरान मैं कई बार इन कपड़े के कारीगरों से मिली और पाया कि इन का काम अच्छा होने के बावजूद ये काफी गरीब हैं, क्योंकि इन्हें मार्केटिंग करना नहीं आता था. इसलिए वे गांव छोड़ कर शहर की ओर पलायन कर रहे थे. ऐसे में मैं ने कुछ करने की सोची और अपना जौब छोड़ कर इस क्षेत्र में आ गई और इस तरह ‘संजुक्ता’ की शुरूआत हुई. पहले तो परिवार वालों ने जौब छोड़ने के लिए मना किया. पर मेरे पति भास्कर ज्योति बरुआ ने साथ दिया और मुझे साहस दिया.

पारंपरिक काम में नई सोच

संजुक्ता कहती हैं कि दरअसल असम सिल्क को बहुत कम लोग जानते हैं और यहां के कारीगरों द्वारा बनाई गई डिजाइन व मोटिफ्स काफी पुराने स्टाइल के हैं. इसलिए लोग इन्हें खरीदना नहीं चाहते. इसे मैं ने नया रूप दिया और कपड़ों की एक प्रदर्शनी गुवाहाटी में लगाई. वहां मेरे सौ से ज्यादा पीस आसानी से बिक गए. इस से मुझे और कारीगरों को बल मिला. संजुक्ता असम के पारंपरिक परिधान ‘मेखला चादर’ से काफी प्रभावित हैं. यह साड़ी का ही प्रतिरूप है. लेकिन इस में कढ़ाई और नई डिजाइन का प्रयोग लोगों को पसंद आ रहा है. इस काम में चुनौती कितनी है पूछने पर संजुक्ता कहती हैं कि पहले तो कारीगरों को इस ओर आकर्षित करना मुश्किल था, क्योंकि उन्हें लगता था कि इस व्यवसाय में ज्यादा कमाई नहीं है. लेकिन जब उन्हें सही मजदूरी मिलने लगी तो वे धीरेधीरे इस क्षेत्र में आने लगे. इस के अलावा कारीगरों को भोजन, मैडिकल और रहने की सुविधा भी मैं देती हूं ताकि वे मन लगा कर काम करें. पहले 10 कारीगरों के साथ मैं ने काम शुरू किया था. आज करीब 200 कारीगर और 130 लूम्स मेरे साथ हैं.

संजुक्ता हमेशा बेसिक मोटिफ्स को ले कर उन में अपनी क्रिएटिवटी को शामिल करती हैं. उन की डिजाइन की हुई ड्रैसेज सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी भेजी और पसंद की जाती हैं. संजुक्ता के लिए यह सब करना आसान नहीं था. कारीगरों को एकजुट करना, उन के अंदर काम के प्रति रुझान जगाना और इन सब के साथसाथ लोगों के सामने अपनी कला प्रदर्शित करने जैसी ढेरों चुनौतियां थीं. मगर अपनी पहचान बनाने का जनून उन पर कुछ इस कदर हावी था कि आज वे सफल हो कर अन्य महिलाओं के लिए मिसाल बन गई हैं.

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