यदि आप फिल्म देखकर मनोरंजन पाने की बजाय विचलित यानी कि अपना मन अशांत करना चाहते हैं, तो आपको फिल्म ‘‘मिंसिंग’’ जरूर देखनी चाहिए. मनोरंजन, रहस्य व रोमांच विहीन फिल्म है ‘‘मिसिंग’’.

फिल्म ‘‘मिसिंग’’ की कहानी के केंद्र में सुशांत दुबे (मनोज बाजपेयी) और अपर्णा (तब्बू) हैं. सुशांत दुबे शादीशुदा हैं. उनका अपना चार साल का बेटा भी है. वह अपने ससुर की कंपनी में ही नौकरी करते हैं. सुशांत दुबे की पत्नी काम्या दुबे उन पर हमेशा शक करती रहती हैं. जब कंपनी के काम से सुशांत दुबे मारीशस जाने लगते हैं, तो काम्या उनके साथ चलने की जिद करती है, पर सुशांत कह देते हैं कि कंपनी के काम से जा रहे हैं, इसलिए वह उन्हे वहां समय नही दे पाएंगे.

सुशांत एक शिप से मारीशस के लिए रवाना होते हैं. शिप के अंदर उनकी मुलाकात अपर्णा  से होती है. अपर्णा बताती है कि उसका अपने पति विशाल से तलाक होने वाला है. विशाल उसे व उनकी बेटी तितली को नुकसान पहुंचना चाहते हैं, इसलिए वह अपनी तीन वर्ष की बेटी तितली के साथ मारीशस जा रही है. तितली बीमार है. सुशांत उसकी मदद करने के लिए अपर्णा को उनकी बेटी तितली के साथ अपने साथ उसी रिसोर्ट में लेकर आते हैं, जहां उनके लिए अपना कमरा बुक है. रात एक बजे रिसोर्ट पहुंचते हैं और पूरा सूट बुक कराते हैं.

सुशांत ने रिसोर्ट के रजिस्टर में श्री और श्रीमती दुबे लिखते हैं. रात में तितली अलग कमरे में सो रही होती है और सुशांत दुबे, अपर्णा के साथ रंगरलियां मनाते हैं. सुबह पता चलता है कि तितली गायब हो चुकी है. पहले सुशांत व अपर्णा पूरे रिर्सोट में ढूढ़ते हैं, फिर रिसोर्ट के कर्मचारी तितली को ढूंढ़ते हैं, पर तितली का कहीं पता नही चलता. सुशांत नही चाहता कि  पुलिस को सूचना दी जाए, क्योंकि उसे डर है कि सच उजागर होने पर उसकी पत्नी काम्या नाराज होगी. पर अपर्णा पुलिस में शिकायत दर्ज करा देती हैं.

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मारीशस पुलिस आफिसर नंदलाल बुद्धू (अन्नू कपूर) अपनी पूरी जांच टीम के साथ रिसोर्ट पहुंच जाते हैं. सुशांत व अपर्णा से सवाल जवाब होते हैं, पर पुलिस आफिसर उनके जवाब से संतुष्ट नहीं होता है. सुशांत कई तरह के झूठ पर झूठ बोलता है. अंत में सुशांत दुबे, पुलिस आफिसर को बताता है कि तितली गायब नहीं हुई है. क्योंकि उनकी तितली नामक बेटी है ही नहीं. अपर्णा तो मां ही नहीं बन सकती. पर उसे इसी बात का सदमा लगा है और वह मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार है. उसे हर दिन ढेर सारी दवाएं लेनी पड़ती हैं.

बेटी तितली को होना महज उसकी दिमागी उपज है. (फिल्म में इस दृश्य के वक्त यदि दर्शकों को फिल्म ‘बागी 2’ की याद आ जाए, तो कुछ भी गलत नहीं होगा. जिस तरह की बातें सुशांत, अपर्णा को लेकर पुलिस आफिसर से कहता है, उसी तरह की बातें फिल्म ‘बागी 2’ में शेखर अपनी पत्नी नेहा के बारे में रौनी से कहता है.) जबकि अपर्णा दावा करती है कि तितली है और बहुत बीमार है.

जब रिसोर्ट  की रिशेपसनिस्ट नैना दावा करती है कि उसने अपर्णा के हाथ में बीमार तितली को देखा था, तब सुशांत पुलिस आफिसर से सच बता देता है कि अपर्णा उसकी पत्नी नहीं है. उसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. सुशांत दुबे की सलाह पर सुशांत दुबे के साथ अपर्णा भी अपना सामान लेकर रिसोर्ट से भागते हैं. रास्ते में अपर्णा, सुशांत की हत्या कर देती है. इधर एक बुजुर्ग तितली की तलाश में आते हैं, तो पता चलता है कि 34 वर्ष की अपर्णा का ही नाम तितली है. वह दिमागी रूप से बीमार है और पिछले तीन वर्ष से एक पागल खाने में उसका इलाज चल रहा था, जहां से कल रात वह भागी है.

मनोवैज्ञानिक रहस्य व रोमांच प्रधान फिल्म के रूप में प्रचारित की गयी फिल्म ‘मिसिंग’ से रोमांच का दूर दूर तक कोई नाता नहीं है.

फिल्म के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि फिल्म को मारीशस के अति खूबसूरत हनीमून रिसोर्ट में फिल्माया गया है, जहां लोग हनीमून मनाने के लिए इकट्ठे होते हैं. ऐसी लोकेशन पर डरावने व रहस्य रोमांच प्रधान दृश्य उभर ही नहीं सकते. इसके अलावा बेटी तितली के गुम हो जाने पर जिस तरह के भाव सुशांत यानी कि मनोज बाजपेयी और अपर्णा यानी कि तब्बू के चेहरे पर आने चाहिएं, वह भी नहीं आते. उन्हे देखकर दर्शक के मन मे उकने प्रति सहानुभूति भी नहीं पैदा होती, बल्कि वह जिस तरह से खूबसूरत लोकेशन में बेटी की तलाश के लिए घूमते नजर आते हैं, उससे तो हंसी ही आती है.

कहानी व पटकथा के स्तर पर पूरी फिल्म निराश करती है. फिल्म जैसे जैसे आगे बढ़ती है, वैसे वैसे इसके पात्र, परिस्थितयां व कहानी का प्लाट घटिया होता जाता है. लेखक व निर्देशक दोनों ही रूप में मुकुल अभ्यंकर विफल हुए हैं. उनमें परिपक्वता ही नहीं हैं. उन्होंने एक सशक्त कहानी का बंटाधार कर दिया. अफसोस की बात यह है कि अति खूबसूरत लोकेशन व उत्कृष्ट कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद फिल्म देखने योग्य नहीं बनी.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मनोज बाजपेयी निराश ही करते हैं. उनका फलर्ट करने के दृश्य राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘कौन’ की याद दिलाते हैं. तब्बू के अभिनय की सराहना की जानी चाहिए. उन्होंने एक दुःखी मां के किरदार के साथ न्याय किया है, मगर परदे पर जो ऊर्जा नजर आनी चाहिए, वह उनमें भी नजर नहीं आती. इसकी वजह कमजोर पटकथा व निर्देशन हो सकता है. अन्नू कपूर भी निराश करते हैं. तितली के गुम हो जाने की तलाश में आए मौरीशस पुलिस अफसर के किरदार में अन्नू कपूर की कार्यशैली महज हंसाने के कुछ नहीं करती. वह कहीं से भी पुलिस जांच अधिकारी नहीं लगते. यह कहना ज्यादा सही होगा कि पुलिस अफसर के किरदार में अन्नू कपूर का चयन ही गलत है. र

फिल्म का संगीत भी घटिया है

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘मिंसिंग’’ का निर्माण शबाना रजा बाजपेयी, अधिकारी ब्रदर्स, आनंद पंडित, रूपा पंडित, शीतल भाटिया व  विक्रम मल्होत्रा ने किया है. लेखक व निर्देशक मुकुल अभ्यंकर, संगीतकार एम एम करीम, कैमरामैन सुदीप चटर्जी तथा कलाकार हैं – मनोज बाजपेयी, तब्बू, अन्नू कपूर व अन्य.

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