दुबई में मायक्रोसाफ्ट कंपनी की नौकरी छोड़कर मुंबई आकर बौलीवुड से जुड़ने वाली कुबरा सैट ने लंबा संघर्ष किया है. ‘रेडी’, ‘जोड़ी ब्रेकर्स’, ‘आई लव एन वाय’, ‘सुल्तान’ सहित कुछ फिल्मों में छोटे छोटे किरदार निभाते आ रही अभिनेत्री कुबरा सैट अचानक सुर्खियों में हैं और इसका श्रेय जाता है ‘नेटफिल्क्स’ पर प्रसारित वेब सीरीज ‘‘सेक्रेड गेम्स’’ को,जिसमें कुबरा सैट ने एक ट्रांसजेंडर बार डांसर कुकू का किरदार निभाते हुए फ्रंट न्यूडिटी का सीन कर हंगामा मचा दिया. यह वेब सीरीज विक्रम चंद्रा की 2006 की इसी नाम की किताब पर आधारित है.

प्रस्तुत है कुबरा सैट के घर पर हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश.

दुबई में मायक्रोसाफ्ट कंपनी की अच्छी नौकरी छोड़कर अभिनय की तरफ मुड़ने के पीछे कोई खास वजह रही?

मायक्रोसाफ्ट कंपनी में नौकरी करते हुए भी मैं रेडियो पर शो कर रही थी. सरल शब्दों में कहूं तो मुझे अभिनय का शौक बचपन से था. जब मेरी छुट्टियां चल रही थीं, तब मुझे एक ‘ब्यूटी पीजेंट’ का हिस्सा बनने का अवसर मिला. उसके बाद मुझे एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म में सिर्फ कैमरे के सामने से गुजरने का सीन करने को मिला, तो मैंने कर लिया. फिर मैंने सोचा कि इस संकोच के साथ नौकरी क्यों की जाए कि पता नहीं अभिनय में मजा आएगा या नहीं? अतः मैंने नौकरी छोड़कर अभिनय में किस्मत आजमाने की सोच ली.

मैंने सोचा कि यदि अभिनय के क्षेत्र में सफलता नहीं मिली, तो  दोबारा नौकरी कर लेंगे. नौकरी करते हुए मुझे मजा नही आ रहा था. मैं अपनी पूरी जिंदगी 10 से 5 नौकरी करते हुए नहीं बिताना चाहती थी. इसलिए दुबई छोड़कर मैं मुंबई आ गयी. वैसे भी मेरा मानना है कि जिस काम को करते हुए आप खुश ना हों, वह काम ना करें. सच कहूं तो मैं बैंगलोर से दुबई जाने से पहले मुंबई आना चाहती थी. पर उस वक्त मेरी मम्मी ने मना किया था. मैंने उनकी बात मान ली थी. तब तक हमारे परिवार का कोई सदस्य मुंबई आया नहीं था. मुंबई के लिए मम्मी के दिमाग में बहुत से गलत ख्यालात थे. मेरी मम्मी की नजर में मुंबई सुरक्षित जगह नहीं थी. इसलिए चुपचाप उनकी बात मानकर मैं दुबई चली गयी थी.

मैंने दुबई में भी शून्य से शुरुआत की थी. पांच साल तक वहां काम किया. फिर मुंबई में मैंने शून्य से शुरुआत की. मेरी मम्मी ने मुझे सिखाया है कि जब आप मछली पकड़ना सीख लेते हैं, तब आप भूखे नहीं मरते हैं.

जब बचपन से ही अभिनय का कीड़ा था. तो फिर मायक्रोसाफ्ट की नौकरी की ही क्यों? कहीं पैसे की जरूरत की वजह से तो नौकरी शुरू नहीं की थी?

रोचक सवाल…देखिए, हम कई बार वही काम करते हैं, जो दुनिया कहती है. मेरी मां व मेरे आसपास के लोग चाहते थे कि मैं नौकरी करके पैसे कमाउं. मैंने वही किया. नौकरी अच्छी थी, सैलरी बहुत अच्छी थी. दुबई में घर व गाड़ी थी. पूरी स्वतंत्रता थी. मैं आत्मनिर्भर थी. अब मैंने अभिनय को महज ज्यादा पैसे कमाने के लिए नहीं चुना है और ना ही नाम और शोहरत के लिए अभिनय को चुना है. जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि मायक्रोसाफ्ट की नौकरी करते हुए मुझे मजा नहीं आ रहा था. तो मैंने सोचा कि अभिनय के क्षेत्र को चुना जाए, जिसमें मेरी रूचि भी है. लेकिन मुझे लगता है कि पांच साल मायक्रोसाफ्ट की नौकरी करना मेरे लिए फायदे का सौदा रहा.

मैंने जिंदगी को लेकर बहुत कुछ सीखा. मुझे कारपोरेट तरीके से ईमेल लिखना आता है. अब मैं किसी के साथ जब बैठक करती हूं तो पूरा कारपोरेट अंदाज में रहता है. मुझे लगता है कि मेरी तकदीर में मायक्रोसाफ्ट की नौकरी करनी भी लिखी हुई थी. इससे हमने कुछ सीखा. हम जिंदगी के हर पड़ाव से कुछ न कुछ सीखते हैं, यदि हमने सीखा नहीं, तो जिंदगी जिया नहीं.

नौकरी करते हुए जो सीख मिली, वह अभिनय में कहां काम आ रही है?

बहुत काम आ रही है. मैं भी इस बात को जानती थी. पर जब एक दिन सीन के लिए इंतजार करते हुए लंबा समय बीत गया, तो मैने नवाजुद्दीन से पूछा कि आपके अंदर इतना धैर्य कहां से आता है? आप एक सीन के लिए कितना इंतजार करते हुए शांत बने रहते हैं? तो उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘अरे! यह तो चंद मिनटों का इंतजार है. मैं तो पिछले 25 वर्षों से किसी मुकाम पर पहुंचने का इंतजार करता रहा हूं. पूरे 25 साल तक इंतजार करने के बाद मुझे यह मिला है. इन 25 वर्षों तक मैंने सिर्फ आब्जर्व किया.

जब मैं वाचमैन की नौकरी कर रहा था, तब भी मैं आब्जर्व कर रहा था. खेत पर काम करते हुए भी मैंने लोगों को आब्जर्व किया. मेरा वही आब्जर्वेशन मेरे काम आ रहा है. देखिए,कहानी आप चाहे जितनी काल्पनिक लिख लीजिए, पर उसके जो किरदार हैं, उनमें कहीं न कहीं रियालिटी होनी चाहिए. कहानी बदलती रहेगी. पर किरदार के इमोशंस और इंसानी फितरत नहीं बदलेगी. यदि आपने अपने संघर्ष के दिनों को भरपूर जिया है, तो आप सफल कलाकार बन सकते हैं.

आपने अपनी मां के कहने पर नौकरी शुरू की थी. पर जब आपने नौकरी छोड़ने की बात मां से की होगी, तो मां ने क्या कहा?

हम दोनों ने आमने सामने बैठकर यह निर्णय लिया था. 2009 की बात है. दुबई के एक रेस्टारेंट में हम दोनों बैठकर नाश्ता कर रहे थे. आर्डर लेने वाले वेटर से कागज लेकर मैंने अपनी बात उस कागज पर लिखी थी. उस कागज पर मैंने अपनी ताकत अपनी कमजोरी सब कुछ लिखी थी. अब मैं क्या करना चाहती हूं, कैसे करूंगी. वह भी लिखा था. मेरी मां सब पढ़ती जा रही थी. यह कागज आज भी किसी न किसी किताब में मेरे पास सुरक्षित है. मैंने लिखा था कि मैं एंकरिंग अच्छी कर सकती हूं, इसलिए सबसे पहले एंकरिंग में अपना नाम बनाउंगी. तो मैं योजना बनाकर यहां आयी. जब आपकी योजना सही हो और आपके साथ आपकी मां और बुजुर्गों का आशीर्वाद हो, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता.bollywood nudity is not a road block for me kubra sait

2009 में जिन कमजोरियों का जिक्र आपने कागज पर किया था, उनमें से कितनी कमजोरी अब खत्म हो गयी?

उस कागज में एक कमजोरी यह लिखी थी कि मैं बहुत जल्दी लोगों से घुलमिल जाती हूं, जिसका लोग बेजा फायदा उठाते हैं. पर मैं अपनी इस कमजोरी से अब तक निकल नहीं पायी. आज भी मैं लोगों से बहुत जल्द घुलमिल जाती हूं. देखिए, इंसान की हर कमजोरी उसके दिमाग में होती है और उसकी कमजोरी ही उसकी ताकत भी होती है. कहते हैं कि जब घी सीधी उंगली से ना निकले, तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है. सीधी उंगली कमजोरी और टेढ़ी उंगली आपकी ताकत है. पर उंगली तो एक ही है. मेरी मम्मी ने हर कमजोरी को ताकत बनाने की कला मुझे सिखायी. मेरी मां सिंगल पैरेंट हैं. उन्होंने अपने बच्चों से कभी किसी चीज के लिए मना नही किया. मेरी मां ने जो पापड़ बेले हैं, जो तकलीफें उठायी हैं, जिस डिटरमिनेशन से काम किया है, वह हर किसी के बस की बात नहीं है.

मेरी मां ने काफी लंबे समय तक साड़ी पहने घर पर बैठ मेरे पिता का इंतजार करती रही कि वह आएंगे तो हम किराने की दुकान पर जाकर समान खरीदेंगे. पर ऐसा हुआ नहीं. कई वर्षो के बाद मेरी मां को अहसास हुआ कि वह गलत इंसान का इंतजार कर रही हैं. जब पति घर के प्रति अपना कोई फर्ज नही निभा रहा है, तो उसका इंतजार क्यों करे? और एक दिन खुद उन्होंने सारी जिम्मेदारी अपने उपर ओढ़ ली. उन्होंने अपने बल पर अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दी अच्छा इंसान बनाया है. सिंगल मदर के रूप में उनका मकसद अपने छोटे बच्चों को काबिल इंसान बनाना था, जिसमें वह सफल रहीं. मेरी मां ने दुनिया से बहुत कुछ सुना है. किसी ने कहा कि आप अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की बजाय अच्छे स्कूल क्यों भेजती है? पर मेरी मां की सोच थी कि शिक्षा को लेकर कोई कमी नहीं आने दूंगी. मेरी मां का मुझ पर बहुत प्रभाव है. वह आज भी मेरे साथ हैं.

मैं बहुत हंसमुख हूं. हर किसी से घुलमिल जाती हूं. मैं हमेशा ईमानदारी से किरदार निभाती हूं. मेरे लिए कोई भी किरदार छोटा या बड़ा नहीं होता है. दूसरों से इज्जत पाने से पहले जरूरी होता है कि आप अपने लिए अपनी आखों में इज्जत लेकर आएं. मैंने हमेशा उस चीज को संभाला. यदि आप हमेशा अपने आपको कमजोर समझती रहेंगी, एक कोने में बैठी रहेंगी, तो कोई आपको इज्जत नहीं देगा. आपकी तरफ कोई ध्यान नहीं देगा.

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आपकी हिंदी काफी अच्छी है. किसी किरदार को लेकर हम हिंदी व अंग्रेजी भाषाओं में सोचें, तो क्या फर्क पड़ता है?

आपके बोलने में फर्क आ जाता है. आप हिंदी में प्यार को जितने तहजीब से बोल सकते हैं, उतनी तहजीब के साथ अंग्रेजी में नहीं बोल सकते. हिंदी में आप किसी बात जितनी नम्रता व प्यार से बोल सकते हैं, अंग्रेजी में संभव ही नहीं है.

जब आप छोटे किरदार निभा रहीं थीं, उस वक्त लोगों की तरफ से किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिल रही थी? लोग आपके टैलेंट को लेकर क्या कह रहे थे?

कोई कुछ कह ही नहीं रहा था. आप नजर में ही नहीं आते थे. जब मैंने फिल्म ‘रेडी’ की, तो भी खुश थी. जबकि लोगों ने मुझसे कहा था कि यह गलत कदम है. आप टाइप कास्ट हो जाएंगी. पर मैं आत्मविश्वास से भरी हुई थी कि मैंने सही कदम उठाया है. अगर आप दुनिया की सुनकर अपनी जिंदगी के निर्णय लेने लगें, तो फिर आप अपनी जिंदगी में क्या कर लोगो? मुझमें घमंड या एरोंगेस नहीं है, मगर एक आत्म स्वाभिमान है. मैं अति आत्मविश्वासी नहीं हूं. मुझमें ओवरकंफीडेंस नहीं है. मगर यकीन है कि मैं यहां गिरी, तो उठकर खड़ी हो सकती हूं. मेरे अंदर संभलने की क्षमता है. मैं अपने हर निर्णय पर सोचती भी हूं. बहुत विचार किया है.

मगर बौलीवुड के सभी फिल्म निर्देशकों का दावा होता है कि वह कलाकार को देखते ही उसके अंदर की प्रतिभा भांप लेते हैं?

गलत..हमारे निर्देशक सिर्फ वह देखते हैं, जो वह देखना चाहते हैं. पर उन्हे मैं पूरी तरह से दोषी भी नहीं ठहरा सकती. क्योंकि वह अपने काम में इस कदर मशगूल रहते हैं कि हर किसी से मिल पाना, उनके लिए संभव नहीं होता. हम सोचते हैं कि जब मेरा मौका आएगा, तो वह मेरी तरफ ध्यान देंगे. पर ऐसा भी हो सकता है कि जब आपका मौका आया,उस वक्त वह आपके बारे में, आपके व्यक्तित्व के बारे में नहीं सोच रहे थे. उस वक्त उनके दिमाग में दूसरे 36 काम चल रहे थे. या हो सकता है कि जब आपको अवसर मिला, तो आपने उस अवसर पर पानी फेर दिया.  

कहीं ऐसा तो नही कि गैर फिल्मी परिवार से होने के चलते लोग आपकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे थे?

मैं ऐसा नही मानती. यहां सबके लिए काम है. एक कलाकार हैं राजेष शर्मा, जो कि कलकत्ता में रहते हैं. जब उनकी जरुरत होती है, लोग उन्हे बुलाते हैं. लोग उन्हे फिल्म इंडस्ट्रीवाला ही मानते हैं. इसलिए मैं हर कलाकार से कहती हूं कि आप अपने काम को इतनी शिद्दत से करें कि जब किसी किरदार के लिए आप फिट हों, तो लोग झक मार कर आपको खोजकर बुलाएं.

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पर सात वर्षों में आपने कोई बहुत ज्यादा काम नहीं किया है?

हां!! मैंने ‘रेडी’, ‘सुल्तान’, ‘क्वीट कमीना’, ‘जोड़ी ब्रेकर’ जैसी कुछ फिल्में की हैं. इन फिल्मों में जो मैंने छोटे छोटे किरदार निभाए, उन्हें पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है. मैंने हमेशा यही सोच कर छोटे किरदार निभाए कि यह मेरा अगला दांव है. मैं इस किरदार को इतने बेहतरीन तरीके से निभाउंगी कि मेरा करियर बदल जाएगा. मुझे किसी भी फिल्म या किरदार को करने का कोई गम नहीं है. कोई अफसोस नहीं है.

जब मैंने सलमान खान के साथ फिल्म ‘रेडी’ की, तब किसी ने मेरे काम की चर्चा नहीं की. पर अब नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ वेब सीरीज ‘‘सेक्रेड गेम्स’ की, तो हर तरफ मेरे काम की चर्चा हो रही है. लोग कह रहे हैं कि कमाल है, तुमने तो नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ बहुत बड़ा काम किया है. सेक्रेड गेम्स देखते समय नजरें नवाज की बजाय तुम्हारे उपर ही टिकी रही. लेकिन यदि मैंने सलमान खान के साथ पहले काम न किया होता, तो मैं नवाज के सामने हिल जाती.

जब आपको ‘सेक्रेड गेम्स’ का आफर मिला, तब आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

मुझे लगा कि इसे किया जाना चाहिए. अब तक मैं वही काम कर रही थी, जो मेरी तरफ आ रहा था. शायद अब मेरे करियर में इसकी वजह से यह बदलाव आ गया है कि मैं किसी के पास जाकर कह सकती हूं कि मेरे काम का स्तर, मेरे अभिनय का स्तर यह है. प्लीज, मेरे स्तर का काम दीजिए. मुझे पूरे सात वर्ष लगे यह कहने में कि मै एक बेहतरीन अदाकारा हूं. जब मैने ‘सेक्रेड गेम्स’ के लिए पहली बार आडीशन दिया था, तो मुझे लगा था कि मैंने पानी फेर दिया. मगर अनुराग कश्यप का मानना है कि यह किरदार मेरी वजह से ही बना. उनके अनुसार यदि मैं उन्हे प्रयोग/ एक्सपरीमेंट करने नहीं देती, तो वह एक्सपरीमेंट कैसे करते?

‘‘सेक्रेड गेम्स’’ के किरदार कुकू को आप कैसे डिफाइन करेंगी?

बहुत ही सहानुभूति वाला किरदार है. इन दिनों एक ऐसा दौर चल रहा है, जहां हम सभी सेक्शन 377 की बात कर रहे हैं. हम पूरे विश्व में बदलाव की बात कर रहे हैं. हम चाहते हैं कि हर इंसान को इज्जत मिले. प्यार मिलना चाहिए. आप जैसे भी हैं, आपको होने का हक है. आप जिस तरह से भी प्यार बांटना चाहते हैं, वह आपका हक है. उसी दौर में‘सेक्रेड गेम्स’ में मेरा कुकू का किरदार आया है. कुकू को अपने शरीर पर, अपने ट्रांसजेंडर होने पर इतना कंफीडेंस है कि कोई भी इंसान उसके कंफीडेंस पर ही प्यार करने लगे.

उसे इस बात का अहसास है कि वह किसी से भी प्यार कर सकती है और उसे अपनी उंगलियों पर नचा सकती है. यह बहुत बड़ी बात है. यही कंफीडेंस मेरे अंदर भी है. कुकू और मुझमें फर्क यह है कि जब कुकू को लगता है कि उसका जादू खत्म हो गया है, तो वह अपना अंत कर लेती है, पर शायद मैं अपना अंत न करती. मैं गिरने के बाद भी उठने की कोशिश करुंगी. वर्ना कुकू में जो शरारत है, जो खुशी है, जो बात करने का लहजा है, वह बहुत साधारण व प्यारा है.

देखिए हमारी फिल्मों में अब तक ट्रांसजेंडर किरदारों को बड़ी विभत्सता या कैरी केचर के साथ पेश किया जाता रहा है. ‘तमन्ना’ या ‘संघर्ष’ जैसी फिल्में हों. इन फिल्मों में इन किरदारों को बहुत ही ज्यादा हिंसात्मक रूप में ही पेश किया गया. जबकि कुकू का किरदार बहुत प्यारा है. लोग इसके दीवाने हो गए हैं.

कुकू का किरदार बोल्ड है. फ्रंट न्यूडिटी भी है. पटकथा पढ़ते समय क्या कोई हिचकिचाहट हुई थी?

इस किरदार को निभाने का निर्णय मैंने खुद लिया. मैंने किसी से भी सलाह नहीं ली. पर मैंने अपनी मां से कहा था कि आपने अब तक मेरा हर तरह के काम को पसंद किया, पर इस बार शायद भूकंप आ सकता है.

मेरी मां से मैंने कह तो दिया, पर मुझे नहीं पता था कि लोग इसे इतना पसंद करेंगे. न्यूडिटी या बोल्ड किरदार हो, यह सब मेरे काम का हिस्सा है. यदि आपको कंटेट नहीं चाहिए,तो आप पार्न वेबसाइट पर जाकर पार्न फिल्में देखे. जिन्हें सिर्फ न्यूडिटी देखनी है, उनके लिए पार्न वेब साइट जिंदाबाद. पर यदि आप यह देखना चाहते हैं कि एक किरदार की यात्रा के चलते क्या कुछ हुआ, तो फिर वहां आपके दिमाग में फ्रंट न्यूडिटी वाली बात नहीं आनी चाहिए. आप ‘सेक्रेड गेम्स’ को इस नजरिए से क्यों देखते हैं कि इसमें ‘फ्रंट न्यूडिटी’है. मैं इस सीन को फ्रंट न्यूडिटी वाला सीन मानती ही नहीं हूं. क्योंकि यह तो रिवोल्यूशनरी मसला है. कुकू, डान गायतोंडे से कहती है, कि ‘मैं गे हूं. तू मेरे साथ क्या कर लेगा?’वह कपडे़ उतारकर साफ साफ कहती है, कि ‘देख ले मैं क्या हूं. मैं तुझे बच्चे नहीं दे सकती.’ जब आप इस परिपेक्ष्य में इस सीन को देखेंगे तो आपको कुकू की मजबूरी, उसका दर्द समझ में आएगा.

कुकू ने गायतोंडे से प्यार किया है और अब उसे लग रहा है कि वह किसी भी मोड़ पर उसे छोड़ कर चला जाएगा, तब वह अपनी आत्मा उसके सामने खोलकर रखती है. उस वक्त कुकू के तौर पर मैंने अपना शरीर नहीं दिखाया है, बल्कि अपनी आत्मा उसके सामने रखी है. कुकू, गायतोंडे से कहती है कि, ‘तू मुझे छोड़ दे. किसी न किसी बहाने तू मुझे छोड़ने वाला है.’ तो यह जो कमजोरी है, वह कहीं अंदर से आती है, शरीर के उपरी भाग से नहीं.

इस सीन को देखकर आपकी मम्मी व आपके भाई ने क्या कहा?

मेरी मां खुश हैं. उन्हें गर्व है कि मैंने इस तरह के किरदार को इतनी डिग्निटी के साथ परदे पर पेश किया. मुझे इससे ज्यादा चाहिए भी नहीं. मेरी जिंदगी में मेरे भाई व मां इन दो की राय अहमियत रखती है. यदि यह खुश हैं, तो मैंने सही काम किया है. मुझे किसी को कोई जवाब नहीं देना है.

न्यूडिटी को लेकर आपकी अपनी सोच क्या है?

आप मेरे घर के अंदर बैठे हुए हैं. आप देख रहे हैं कि कितनी बड़ी बड़ी खिड़कियां हैं. मैंने किसी भी खिड़की पर कोई परदा नहीं लगाया है. देखिए, यह मेरा अपना शरीर है. यहीशरीर आपके पास है. तो आप क्या देख लोगे? मैं तो कहती हूं कि जिन्हें न्यूडिटी देखने की लत लगी हो, उन्हें पार्न साइट पर जाना चाहिए. देखिए, हर चीज के लिए एक माहौल होता है. यदि मैं समुद्री बीच पर जाउंगी, तो वहां बिकनी पहनने मे सहज महसूस करुंगी, तो मैं बिकनी ही पहनूंगी. मुझे बिकनी पहनने से कोई रोक नहीं सकता. हां! जिन्हें बिकनी पहनना सहज नहीं लगता, वह ना पहने. मेरे लिए न्यूडिटी रोड ब्लाक नहीं है. पर इसके यह मायने भी नही हैं कि मैं हर फिल्म में न्यूडिटी वाले सीन करूंगी.

पर यदि यही सीन किसी फिल्म में होता, तो सेंसर बोर्ड पारित करता?

देखिए, आथारिटी गाइड लाइन्स पर काम करती है, जो कि गलत है. जिन चीजों को दर्शक नेटफ्लिक्स पर देख रहा है, इंटरनेट पर देख रहा है, उसे आप फिल्म में देखने से कैसे रोक सकते हैं? हौट स्टार पर सब कुछ दिखाया जा रहा है. पूरी दुनिया देख रही है. पर हमारा भारतीय सेंसर बोर्ड नहीं देखने देगा. हां! आप फिल्म की शुरुआत में डिस्केलमर दे दें कि परीक्षण समिति ने यह यह चीजें पायी हैं. इस उम्र के बाद आप इसे देख सकते हैं.

‘सेक्रेड गेम्स’ में कुछ तो है, जो लोगों को पसंद आया. एक बेहतरीन कहानी है. कंटेंट है. इसमें बुरे में अच्छा और अच्छे में बुरा सब कुछ है. जब कासेकर की मौत हुई, तो दर्शकों का दिल टूटा. बंटी की मौत पर लोगों ने दुःख मनाया. यानी कि इस कहानी में दम है. तो फिर फ्रंट न्यूडिटी कैसे याद रही? यदि हम किसी किरदार की यात्रा के साथ चलने को तैयार नहीं हैं, तो यह गलत है. मुख्य मुद्दा यह है कि यदि आप किसी अच्छी कहानी को देखते हैं, तो आप किस तरह का अनुभव पाते हैं.

सेंसर बोर्ड को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कहानी व किरदार की मांग क्या है? आप लिख दीजिए कि इस फिल्म में सेक्स, न्यूडिटी, हिंसा, खून खराबा है, इसे इसे आप इतनी उम्र के बाद ही देखें. देखिए, हम अपनी कहानियों में वही बता रहे हैं, जो समाज में हो रहा है. आप इस सच को कब तक छुपाएंगें?

पर सेक्स औंर फ्रंट न्यूडिटी को भारतीय सभ्यता संस्कृति में गलत माना जाता है. क्या यह संस्कृति की कमी है?

आप रूल बुक की बात कर रहे हैं. देखिए, भारतीय संस्कृति भी रूल बुक है. आप अजंता एलोरा या एलिफेंटा की गुफाओं में या खजुराहो जाकर क्या देखते हैं? वहां तो जाने के लिए उम्र की बंदिश नहीं है. कामसूत्र भी भारत में लिखा गया. पर आवाम ने आज तक कामसूत्र नहीं पढ़ी है. हमारी भारतीय सभ्यता संस्कृति में सब कुछ सदियों से है. पर हमारा समाज उस पर पाबंदी लगाता है. हमारा समाज और हमारी संस्कृति दोनों अलग अलग धाराएं हो गयी हैं. हमारे यहां सब कुछ मसला ताकत व सामर्थ्य का है.

कुछ लोगों का कहना है कि ट्रांस जेंडर कुकू के किरदार के लिए ट्रांस जेंडर कलाकार को लिया जाना चाहिए था?

सच कहूं तो यदि दर्शक की हैसियत से मुझे भी इस बात की खुशी होती यदि इस किरदार को किसी ट्रांस जेंडर ने निभाया होता. मुझे लगता कि समाज में बदलाव आया है. पर मुझे एक ट्रांसजेंडर कलाकार का नाम बताइए, जो अभिनय करने को तैयार हो. दूसरी बात हमारे समाज में इतनी बाधाएं हैं, इतनी रुकावटें हैं कि कोई सामने आकर कुछ कहना नहीं चाहता. लोग तो यह स्वीकार करने तैयार नहीं है कि वह ट्रांस जेंडर हैं. तीसरी बात मैं कलाकार हूं. बचपन में जब मैं थिएटर करती थी, तब मुझसे कहा जाता था कि झाड़ बन जाओ, तो मैं झाड़ बन जाती थी. निर्देशक के कहने पर मैं बादल बनी. तो फिर मैं ट्रांसजेंडर क्यों नही बन सकती. हर तरह का किरदार निभाना मेरा काम है.

सेक्रेड गेम्स’ से जो शोहरत मिली उसका आपके करियर पर क्या असर हो रहा है?

देखिए, यह रैम्प था. एक बार रैम्प पर चढ़ गए, तो मोमेंटम मिल ही जाएगा. इसी मोमेंटम के लिए मैंने आठ साल काम किया. सेक्रेड गेम्स की रिलीज से पहले मैं बहुत नर्वस थी. सोच रही थी कि पता नहीं पासा सही पडे़गा या नहीं? लेकिन रिलीज के बाद मैं बहुत शांत हूं. क्योंकि सभी ने तारीफ की है. मैंने लोगों के दिलों को अपने अभिनय से छुआ है. फिर चाहे वह ट्रांस जेंडर हो या गे हो या बायसेक्सुअल हो, चाहे जो हो. उन सभी को अहसास हुआ कि मैंने इंसान के तौर पर उन्हें एक पहचान दी. यह बहुत बडा बदलाव है. अब मुझे यकीन है कि मेरा करियर अच्छा बन जाएगा. अब तक मेरे पास औफर आते थे, मैं सिर्फ हां बोलती थी. पर अब मैं ना बोलने की स्थिति में आ गयी हूं. हो सकता है कि अब कई फिल्मकार मेरे लिए खास तौर पर किरदार लिखवाएं.

आने वाली दूसरी फिल्म कौन सी है?

रणवीर सिंह और आलिया भट्ट के साथ जोया अख्तर के निर्देशन में फिल्म ‘गली ब्वाय’ कर रही हूं. रणवीर सिंह के साथ काम करते हुए मैंने काफी इंज्वाय किया. उनके अंदर जबरदस्त एनर्जी है. इसके अलावा एक और वेब सीरीज करने वाली हूं. मैं अभिनय की क्लासेस भी शुरू करने वाली हूं. यहां कलाकार के तौर पर हर दिन खुद की खोज करते रहना चाहिए.

लिखने का शौक?

स्वांतः सुखाय कभी कभार कहानी लिख लेती हूं. हां! पत्र लिखने का मुझे बहुत षौक है.

आपको पढ़ना पसंद है या नहीं?

मैं फिक्शन नहीं पढ़ती. इन दिनों एक जापानी किताब पढ़ रही हूं. यह किताब बताती है कि आपकी जिंदगी किस किस भाग में बंटी हुई है. यह किताब बताती है कि आप अपनी आत्मा को कैसे अच्छा कर सकते हैं? और किस तरह से एक भरपूर जिंदगी जी सकते है.

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग को लेकर क्या कहेंगी?

मैं अनदेखा करती हूं. क्योंकि इन ट्रोलर्स के पास ना तो कोई राजनीतिक सोच है, ना सामाजिक सोच है. मैं लोगों से कहती हूं कि अपने काम को ईमानदारी से कीजिए. समाज बदल जाएगा, मैं किसी को बदलने की इच्छा नहीं रखती मैं अपनी तरफ से किसी को अपमानित करने की कोशिश नहीं करती.

 

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