गृहशोभा विशेष

मां बनना महिला के जीवन का सब से खूबसूरत पल होता है. लेकिन कई बार कुछ कारणों के चलते कोई महिला मां नहीं बन पाती है. ऐसी स्थिति में निराश होना स्वाभाविक है. मगर कई मामलों में कुछ बातों का ध्यान रख कर और डाक्टरी सलाह ले कर कमियों को दूर कर मां बनने का सुख हासिल किया जा सकता है.

जानतें हैं, प्रैगनैंसी के लिए किनकिन खास बातों का ध्यान रखना जरूरी है. साथ ही, प्रैगनैंसी प्रोसेस और उस से जुड़े कौंप्लिकेशंस पर भी एक नजर:

जरूरी सावधानियां

– 32 साल के बाद महिलाओं की गर्भधारण करने की क्षमता कम होने लगती है. इसलिए अगर किसी महिला की उम्र 32 साल हो गई है, तो उसे गर्भधारण में देर नहीं करनी चाहिए. अगर प्राकृतिक तौर पर वह गर्भवती नहीं हो पा रही है तो उसे तुरंत किसी विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए.

– धूम्रपान करने से भी मां बनने की क्षमता प्रभावित होती है. इतना ही नहीं, इस से गर्भपात का भी खतरा बना रहता है, इसलिए महिलाओं को धूम्रपान नहीं करना चाहिए.

– बहुत ज्यादा वजन होना भी मां बनने में बाधक होता है. अगर आप मोटी हैं और आप को गर्भधारण में परेशानी आ रही है, तो आप अपना वजन कम करें.

– जो महिलाएं शाकाहारी होती हैं, उन्हें अपनी डाइट में पर्याप्त मात्रा में फौलिक ऐसिड, जिंक और विटामिन बी12 लेने की जरूरत होती है. शरीर में इन पोषक तत्त्वों की कमी भी गर्भधारण में रुकावट पैदा करती है.

– अगर आप 1 सप्ताह में 7 घंटे से ज्यादा ऐक्सरसाइज करती हैं, तो इसे कम करने

की जरूरत है. जरूरत से ज्यादा ऐक्सरसाइज के कारण ओव्युलेशन प्रौब्लम हो जाती है, जिस से गर्भधारण करने में परेशानी आती है.

– फिजिकल इनऐक्टिविटी भी कई बार गर्भधारण करने में बाधा उत्पन्न करती है. अगर आप बहुत ज्यादा सुस्त रहती हैं, फिजिकली इनऐक्टिव रहती हैं, तो आप को ऐक्टिव होना होगा.

– एसटीआई यानी सैक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज के कारण भी गर्भधारण करने की क्षमता प्रभावित होती है. अगर आप को ऐसी किसी भी तरह की परेशानी है, तो तुरंत उस का इलाज करवाएं.

– पेस्टिसाइड्स, हर्बिसाइड्स, मैटल जैसे लेड सहित कुछ रासायनिक तत्त्व ऐसे होते हैं, जिन के संपर्क में आने से गर्भधारण की क्षमता प्रभावित होती है. इसलिए जहां तक हो सके इन के सीधे संपर्क में आने से बचें.

– मानसिक तनाव भी गर्भधारण की क्षमता को प्रभावित करता है. इसलिए अगर आप बहुत ज्यादा स्ट्रैस लेती हैं, तो उस से बचें.

कैसे होता है गर्भधारण

एक महिला जिसे हर महीने मासिक चक्र होता है, वही गर्भधारण कर सकती है. असल में 2 मैंस्ट्रुअल साइकिल के बीच ओव्युलेशन पीरियड होता है. यह वह पीरियड होता है जब ओवरी से एग रिलीज होते हैं यानी अंडे निकलते हैं. सामान्य अवस्था में एक महिला में ओव्युलेशन की प्रक्रिया अगले मैंस्ट्रुअल साइकिल के 2 सप्ताह पहले शुरू हो जाती है. ओव्युलेशन के दौरान रिलीज होने वाले एग 24 घंटे तक जीवित रहते हैं, उस के बाद मर जाते हैं. ओव्युलेशन के दौरान जब पतिपत्नी के बीच शारीरिक संबंध बनता है, तो एग और स्पर्म एकदूसरे के संपर्क में आते हैं. इसी समय स्पर्म द्वारा एग को फर्टिलाइज्ड यानी निशेचित करने से एक महिला गर्भधारण करती है.

गर्भधारण का सर्वोत्तम समय

गर्भधारण करने का सब से सही समय ओव्युलेशन के समय शारीरिक संबंध बनाना होता है. एक सामान्य महिला में ओव्युलेशन की अवधि 6 दिनों की होती है. ओव्युलेशन के बाद जहां एग्स मात्र 1 दिन ही जीवित रह पाते हैं, वहीं स्पर्म 1 सप्ताह तक जीवित रहते हैं. इस प्रकार ओव्युलेशन के बाद के 5 दिन गर्भधारण के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ओव्युलेशन के 1-2 दिन पहले शारीरिक संबंध बनाया जाए तो गर्भधारण की क्षमता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि इस से स्पर्म को एग के संपर्क में रहने का ज्यादा समय मिलता है.

गर्भधारण के समय होने वाली परेशानी

गर्भधारण के बाद महिला को काफी सावधानी बरतनी होती है. ऐसा न करने पर उसे कई समस्याएं हो सकती हैं.

हाई ब्लडप्रैशर: कई महिलाओं में प्रैगनैंसी के दौरान हाई बीपी की शिकायत देखी जाती है. ऐसे में नियमित जांच कराते रहना चाहिए.

ऐनीमिया: जब एक गर्भवती महिला पर्याप्त मात्रा में आयरन का सेवन नहीं करती है, तो उस के शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है. इस स्थिति में लापरवाही बरतने पर मां और बच्चा दोनों की जान जा सकती है.

संक्रमण: एक गर्भवती महिला को संक्रमण से होने वाली बीमारियां जैसे, इन्फ्लुएंजा, हैपेटाइटिस ई, हर्पिस सिंपलैक्स, मलेरिया आदि से ग्रस्त होने का ज्यादा खतरा रहता है. इन बीमारियों का समय पर इलाज बहुत जरूरी है वरना मां और बच्चा दोनों की मृत्यु हो सकती है.

यूरिनरी इनकौंटिनैंस: गर्भावस्था के दौरान यूरिनरी इनकौंटिनैंस यानी मूत्र संबंधी विकार के मामले भी काफी देखने को मिलते हैं. इस प्रौब्लम के होने पर डाक्टर से सलाह लेना आवश्यक है.

स्ट्रैस: गर्भावस्था के दौरान और उस के बाद कई महिलाएं बेहद मानसिक तनाव में आ जाती हैं. इस तनाव का असर मां और बच्चे दोनों पर पड़ता है. इसलिए जितना जल्दी हो सके इस से बाहर निकलने की कोशिश करनी चाहिए.

– डा. साधना सिंघल, गायनेकोलौजिस्ट, श्री बालाजी ऐक्शन मैडिकल इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली   

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