Eating Etiquette  : सुनो बेटा, ‘‘जी आंटी बताइए.’’

‘‘बेटा एक प्लेट में थोड़ा सा खाना ला दो. ज्यादा मत लाना.’’

‘‘आप बैठो मैं ले कर आता हूं,’’ कह वह लड़का खाना लेने चला गया.

आंटी एक कुरसी पर बैठ गईं और बैंक्वेट हौल की सजावट निहारने लगीं.

थोड़ी ही देर में वह युवक खाने की प्लेट आंटी के सामने रख गया और कह गया कि कुछ और चाहिए हो तो आवाज लगा देना. मैं सामने ही हूं.

मगर आंटी प्लेट देखते ही परेशान हो गई. प्लेट पूरी भरी थी, ‘‘इतना खाना मैं कहां खाऊंगी. बेटा इस में से थोड़ा तुम ले लो.’’

‘‘नहीं आंटी मुझे नहीं चाहिए,’’ उस ने साफ मना कर दिया.

अब इतनी भरी हुई प्लेट न पूरी खाते बनती थी न छोड़ते. प्लेट का नाम ही ऐसा है कि एक बार खाना उस में आ गया तो फिर जूठा ही समझ जाता है, फिर चाहे उस खाने को किसी ने हाथ भी न लगाया हो. कितना अच्छा रहता अगर खाने को डोंगे में रखा होता. जिसे जितना चाहिए उतना ले ले और फिर मेज पर ही डोंगा दोबारा भर दिया जाता. न बारबार काउंटर तक जाने का झंझट न प्लेट में खाना बचाने का.

आंटी इस नए इंतजाम से असहज थीं. फिर भी उन्हें इतना ही सूझा कि उन्होंने एक बच्चे से एक खाली प्लेट मंगवा कर उस में अपनी जरूरत के लायक खाना निकाल लिया और खा लिया. हालांकि वे जानती थीं कि यह बची साफ प्लेट भी डस्टबिन में ही जाने वाली है और यही हुआ भी. खैर, आंटी खाना खा कर चलने को हुईं कि वह युवक दौड़ता हुआ आया और उन से पूछने लगा कि खाना ठीक से खा लिया?

आंटी का कहना था, ‘‘बेटा इतना सारा खाना क्यों लाए तुम?’’

‘‘वह ऐक्चुअली आंटी इतने सारी डिशेज थीं कि मुझे समझ ही नहीं आया कि आप के लिए कौन सी ले जाऊं इसलिए सारी वैरायटी ले आया. कोई नहीं आप को जो अच्छा लगे खा लेतीं बाकी छोड़ देतीं.’’

‘‘कोई बात नहीं बेटा,’’ कहती हुई वे आगे बढ़ गईं. मगर यह इकलौती ऐसी कहानी नहीं है. जरा दावतखाने की तरफ नजर दौड़ा कर देखें ऐसी कहानी आप को हर टेबल पर मिल जाएगी और मिल जाएगी उस लौन में रखे बड़ेबड़े टबों में, जिन में बचे खाने को प्लेटों के साथ लुढ़का दिया जाता है.

‘‘यहां खाना तो बेहिसाब होता है लेकिन खाना खाने का कोई हिसाब नहीं होता.’’

बेशुमार फूड आइटम्स से भरे काउंटर्स लेकिन चैन से बैठने के लिए कुछ गिनती की कुरसियां. बड़े से लौन में हाथ में प्लेट संभाले टहलते लोग. असुविधा को फैशन का नाम दे कर दिखावे को कोशिश. कुरसियों की कमी, जायकों की ज्यादती और खाने की बरबादी.

अगर कुरसी मिल जाए तो खाना लाने जाने पर कुरसी घिर जाने का खतरा. इस के चलते लोगों का एक ही बार में प्लेट को खूब भर लेना, नतीजा ढेरों अलगअलग डिशेज का प्लेट में मिक्स हो जाना फिर उस मिक्स्चर को न खा पाने की स्थिति में प्लेट को चुपचाप डस्टबिन के हवाले कर देना.

भारतीय परंपरा में सभी धर्मों में बैठ कर खानाखाने खिलाने का रिवाज है लेकिन आजकल यह रिवाज बदल गया है. अब हरेक पार्टी में खड़े हो कर ही खाना खाने का चलन पूरे शबाब पर है. इसे स्टैंडअप डिनर के नाम से जाना जाता है.

जिस तरह का खाना यहां सर्व होता है उसे खड़े हो कर खाना बहुत मुश्किल है फिर भी इस ओर किसी का ध्यान नहीं. एक समतल प्लेट में चावल, रोटी, दही, पापड़, ग्रेवी, वैज, नौनवैज सबकुछ रख लेना फिर खाना, वह भी खाली बचे एक हाथ से. कहींकहीं 1-1 कुरसी पर 2-2 लोग किसी तरह टिक कर खाने को गले से नीचे उतारने की मशक्कत कर रहे होते हैं मानो खाना न हो कोई प्रतियोगिता हो गई.

पार्टियों में लंबेचौड़े खर्चे करने वाले और खाने में ढेरों वैरायटी सर्व करने वाले लोग भी खाने के लिए बैठने का पूरा इंतजाम करने पर ध्यान नहीं देते.

अगर इन पार्टियों में अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो देखेंगे कि कितने ही लोग हाथ में प्लेट पकड़े एक कुरसी की तलाश करते नजर आएंगे. बुजुर्गों को कोई रहम खा कर बैठने की जगह दे भी दे तो जवानों की दिक्कत भी कम नहीं और अगर औरतों की बात करें तो देखेंगे कि कैसे वे भारी लहंगे, दुपट्टे, हाई हील्स, झुमकों से लदी हुई हाथ में प्लेट संभाले खाने का स्ट्रगल कर रही होती हैं. ऊपर से फैशन के नाम पर क्लच जोकि हाथ में ही पकड़ा जाता है को कैसे बगल में दबा कर खाना खाती हैं.

क्या है स्टैंडअप डिनर की खासीयत

स्टैंडअप डिनर में अमूमन खाना खड़े हो कर टहलते हुए खाया जाता है की एक खासीयत तो यही है कि इस में मेन्यू में बहुत वैरायटी होती है.

वैरायटी क्रियात्मकता को बढ़ावा देती है यानी ऐसा खाना बनाने और परोसने वालों को अपनी रचनात्मकता को विस्तार देने का अवसर मिलता है.

पार्टियों में नाते रिश्तेदार अलग अलग वर्गों से आते हैं ऐसे में ये सभी लोग नए नए फूड आईटम्स का लुत्फ ले पाते हैं जोकि रोजाना की जिंदगी में मुमकिन नहीं होता.

क्या हैं नुकसान

सब से बड़ा नुकसान इस सिस्टम का यही है कि इस में सब से ज्यादा खाने की बरबादी होती है.

भारत में हर साल लगभग 1 करोड़ शादियां होती हैं. इन शादियों में करीब 10 से 20त्न खाना बरबाद हो जाता है. आसान भाषा में कहा जाए तो मोटे तौर पर एक शादी में करीब 30 किलोग्राम से 800 किलोग्राम तक खाना फेंक दिया जाता है. यानी इतने खाने में लगभग 100 लोगों से ले कर 2 हजार लोगों तक का पेट भरा जा सकता है. हैरानी होगी यह सुन कर कि इस बरबाद हुए खाने से देश को 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान होता है.

द्य हमारे सही प्रकार से न खा पाने का असर हमारी आहार नली पर पड़ता है. नली यदि ब्लौक हो जाती है तो भोजन अटकने और ठसका लगने की समस्या होती है और यदि नली क्षतिग्रस्त हो जाती है तो खाना पेट तक नहीं पहुंच पाता और यह नली में ही सड़ने लगता है जिस से गैस बनने लगती है.

इस आयोजन में सब से अधिक दिक्कत बुजुर्गों को होती है कि उन्हें खाना लाने के लिए वहां टहलते किसी व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़ता है.

वहीं दूसरी ओर अकसर इस तरह से खाने में लोग खाने का स्वाद ही नहीं ले पाते यानी जिस स्वाद के लिए इतना इंतजाम किया वही नहीं मिला.

ऐसी पार्टियों में अमूमन समधी पक्ष के कुछ खास लोगों को बाकायदा कुरसियों पर बैठा कर खाना सर्व किया जाता है. इस से मेहमानों में असमानता का एहसास पैदा होता है कि यों तो सभी को बैठा कर खाना सर्व किया जा सकता था.

आसान है बेहतरी की राह

देखा जाए तो थोड़ी सी कोशिश से हम इसी सिस्टम को बेहतर बना सकते हैं जैसे:

मेहमानों की संख्या के हिसाब से फूड सैक्शन एरिया बड़ा हो और पूरी कुरसियां और मेजें लगी हों.

स्टाल्स पर खाना सर्व करने के स्पून बहुत बड़े न हों ताकि प्लेट को लिमिट में ही भरा जाए.

अनलिमिटेड यानी हद से ज्यादा डिशेज न रखी जाएं बल्कि खाने की क्वालिटी और टेस्ट पर ज्यादा जोर दिया जाए.

क्वालिटी का ध्यान जरूर रखें चाहे कुछ डिशेज कम कर लें क्योंकि जो क्वालिटी खाना आप दे रहे हैं लौट फिर खाना आप को भी वही है.

कैसा हो इंतजाम

अब कुछ लोगों को लग सकता है कि ज्यादा बड़ी महफिल में तो इस तरह इतनी फूड आइटम्स के साथ सब के लिए बैठने की व्यवस्था करना प्रैक्टिकल नहीं है.

तो यकीन मानें ऐसा नहीं है. आप थोड़ी सी कोशिश से सब के लिए बैठने की व्यवस्था कर सकते हैं. इस के लिए आप अच्छे सर्विस प्रोवाइडर की मदद ले सकते हैं या फिर अपने परिवार के कुछ लोगों को खाना खिलाने की जिम्मेदारी दे सकते हैं और यह सोचना कि लोग चेयर छोड़ कर जाएंगे ही नहीं तो ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं जो खाना खा कर खुद ही हट जाना पसंद करते हैं. देर तक बैठे रहने वाले थोड़ी संख्या में हो सकते हैं तो उन की वजह से सभी को परेशान न करें.

अब बात खाने की बरबादी रोकने की करें तो आजकल फूड मैनेजिंग ग्रुप्स बहुत अच्छा औप्शन हैं. ये लोग बचे हुए खाने को खराब होने से पहले जरूरतमंदों तक पहुंचा देते हैं. कोल्ड स्टोरेज का सही इंतजाम कर के भी आप खाने को खराब होने से बचा सकते हैं.

जरूरी है कि यह शुरुआत आप खुद करें. जब आप के मेहमान सहूलियत के साथ खाने का मजा ले पाएंगे तो यकीन मानिए आपके इतंजाम की तारीफ ही करेंगे क्योंकि आप की कोशिश बदलाव की बयार लाएगी. आप बदलेंगे तो सब बदलेंगे.

समय के साथ बदलाव

एक दौर था जब किसी भी कार्यक्रम में मेहमानों को बाकायदा बैठा कर खाना खिलाया जाता था. इस के लिए पंगत में पत्तल की व्यवस्था होती थी और कहींकहीं दरी पर दस्तरख्वान बिछा कर लोगों को बैठा दिया जाता था और परिवार के लोग मेहमानों को सभी पकवान परोसते थे. धीरेधीरे दरीचादर की जगह मेजकुरसियों ने ले ली पर व्यवस्था वही रही कि खाने को लोगों के पास पहुंचाया जाए. फिर समय के साथ खाने में नई फूड आइटम्स शामिल हो गईं. चाउमीन, फू्रट चाट, फ्रैंच फ्राइज, चीज बौल्स, गोलगप्पे, टिक्की, डोसा, मोमोज इन आइटम्स को खड़े हो कर खाना ही चलन बन गया. अब एक हाथ से खाए जाने वाली आइटम्स तक तो चल गया लेकिन मुख्य भोजन की बारी आई तो एक हाथ में प्लेट पकड़ कर बचे हुए दूसरे हाथ से रोटी का निवाला तोड़ना और उसे ग्रेवी में डुबो कर मुंह तक ले जाना कठिन काम बन गया और इस कठिन काम से हमारा आज का समाज गुजर रहा है. इस कठिनाई के बीच जो समस्या खाने की बरबादी के रूप में पैदा हुई है वह नजरअंदाज नहीं की जा सकती.

-सबा नूरी

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