Daughter property rights : विनिता जोशी की बड़ी बेटी समायरा ने जब नीट क्वालिफाई किया, तो विनिता ने हर रिश्तेदार को फोन पर यह खुशखबरी दी. दो बेटियों की इस मां को हर वो लम्हा याद आया, जब जेठानी, बड़ी ननद, सास और पड़ोसन, सगी भाभियों ने किसी न किसी बहाने इस बात का ताना मारा था कि बेचारी के तकदीर में दो बेटियां ही है. छोटी बेटी महिका जोशी ने भी बोर्ड में स्कूल में टौप किया था. विनिता के लिए हर ताना एक गहरे घाव की तरह था. जिस पर सालों बाद बेटियों के रिजल्ट्स एक ठंडे मल्हम की तरह काम कर रहे थे. लेकिन अब एक नई चुनौती थी महिका को चेन्नई का मेडिकल कौलेज मिला था. पढ़ाई, हौस्टल, टीनएजर बेटी की दूसरी जरूरतों के लिए उसे मोटे पैसे की जरूरत थी, जो उसके बैंक अकाउंट पूरा नहीं कर सकते थे. फिर दो साल बाद छोटी बेटी भी किसी कौम्पीटिशन को क्वालिफाई करेगी, तो उसके एडमीशन में भी मोटा खर्च होगा, आखिर वह इतना पैसा कहां से लाएगी?
तब उसे यह ख्याल आया कि क्यों न मायके की प्रोपर्टी में अपना हिस्सा मांगा जाए लेकिन मन में रह रह कर यह ख्याल आ रहा था कि लोग क्या कहेंगे ? तो क्या शादी के बाद बेटी का अपने मायके की संपत्ति पर अधिकार कम हो जाता है? क्या उसे यह सोचकर चुप रहना चाहिए कि “माता-पिता ने पढ़ाया-लिखाया, शादी कर दी, अब संपत्ति मांगना ठीक नहीं होगा”? या फिर उसे अपने भाई की तरह अपने अधिकार के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए?
ये सवाल सिर्फ संपत्ति के नहीं हैं. ये सवाल परिवार में बराबरी, सोच और बेटी की पहचान से जुड़े हैं.
आज कानून बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देता है लेकिन कानून का अधिकार और परिवार में उस अधिकार का इस्तेमाल दो अलग बातें हैं. कई परिवारों में आज भी बेटियों को संपत्ति का हिस्सा मांगने में संकोच होता है. उन्हें डर रहता है कि माता-पिता नाराज हो जाएंगे, भाई से रिश्ता खराब हो जाएगा या समाज उन्हें लालची कहेगा.
लेकिन सवाल यह है कि Fair Share की मांग आखिर किस उम्र में की जानी चाहिए?
क्या शादी से पहले?
अगर बेटी बालिग है और परिवार में संपत्ति को लेकर बातचीत हो रही है, तो उसे अपने अधिकार के बारे में जानना चाहिए. इसका मतलब यह नहीं कि हर बेटी तुरंत संपत्ति का बंटवारा मांगने लगे. बल्कि पहला कदम होगा कि वह अपने अधिकार को समझें.
अक्सर बेटियों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि “तुम्हें दूसरे घर जाना है.” दूसरी तरफ बेटे को परिवार की संपत्ति का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. यहीं से असमानता की शुरु होती है. सही उम्र वह है जब बेटी इतनी समझदार हो जाए कि अपने कानूनी और आर्थिक अधिकारों को समझ सके.
क्या शादी के बाद हिस्सा मांगना गलत है?
शादी के बाद बेटी अक्सर अपने मायके से संपत्ति का हिस्सा मांगने में और ज्यादा झिझकती है. उसे लगता है कि अब उसका अपना परिवार है, पति है, ससुराल है और मायके की संपत्ति मांगना अच्छा नहीं लगेगा.
कई बार मायकेवाले भी यही कहते हैं कि “तुम्हारी तो शादी हो गई, अब तुम्हें इसकी क्या जरूरत है?”
लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि जरूरत और अधिकार दो अलग अलग चीजें हैं.
अगर किसी बेटे को संपत्ति इसलिए दी जा रही है क्योंकि वह परिवार का बेटा है, तो बेटी को सिर्फ इसलिए उससे वंचित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उसकी शादी हो चुकी है.संपत्ति का अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि बेटी को पैसों की जरूरत है या नहीं.
30, 40 या 50 की उम्र में प्रोपर्टी में हिस्सा मांगना देर कहलाएगा?
किसी महिला की उम्र 25 हो, 35 हो, 45 हो या फिर 60 हो, सिर्फ उम्र बढ़ने से उसका अधिकार खत्म नहीं हो जाता. हालांकि किसी विशेष संपत्ति और उत्तराधिकार के मामले में लागू कानून, संपत्ति की प्रकृति और दस्तावेजों के आधार पर स्थिति अलग हो सकती है. इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “कितनी उम्र में मांगना चाहिए?”
यहां सवाल यह होना चाहिए कि “क्या मुझे अपने अधिकार पता है और क्या मेरी फैमिली में बेटियों और बेटों के साथ बराबरी हो रही है?”
कई लड़किया जीवन के शुरुआती सालों में अपने अधिकार की बात नहीं कर पातीं हैं. वे माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करते हुए चुप रहती हैं. फिर बच्चे बड़े हो जाते हैं, आर्थिक जिम्मेदारियां बढ़ती हैं और उन्हें एहसास होता है कि अपनी संपत्ति और आर्थिक सुरक्षा के बारे में पहले सोचना चाहिए था. इसलिए जितनी जल्दी अधिकार की जानकारी हो, उतना बेहतर है जैसा कि विनिता जोशी के मामले में हुआ.
हक की बात है शर्मिंदगी की नहीं
“मुझे तो सब कुछ शादी में मिल गया था” या “शादी में इतना खर्च किया था.” यह सोच कर बेवजह शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है. अगर बेटे की शादी में भी परिवार खर्च करता है, तो क्या उसका संपत्ति में हिस्सा खत्म हो जाता है? अगर नहीं तो, फिर बेटी के मामले में यह हिसाब क्यों?
बेटी की शादी पर किया गया खर्च उसके हिस्से की कीमत तय करने का आधार नहीं होना चाहिए.शादी कोई संपत्ति का सेटलमेंट नहीं है. Fair Share की मांग सिर्फ पैसे की मांग नहीं है, इसे समझना बहुत जरूरी है. जब बेटी अपने हिस्से की बात करती है तो इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि उसे तुरंत घर, जमीन या पैसा चाहिए. कई बार वह सिर्फ यह चाहती है कि परिवार उसे बेटे के बराबर समझे. लेकिन जिस तरह से बेटे की कई जरूरतें होती है उसी तरह बेटियों की भी होती है, ऐसे में उन्हें पूरा करने के लिए अपना हक मांगना गलत नहीं है. इसलिए विनिता जोशी को बेझिझक अपने हक की बात करनी चाहिए.
तीन मौके जब बेटी को इस विषय पर बात करनी चाहिए.
1. जब परिवार संपत्ति का बंटवारा या ट्रांसफर करने की योजना बना रहा हो.
2. जब माता-पिता अपनी संपत्ति किसी एक बच्चे के नाम करने की बात कर रहे हों.
3. जब बेटी को महसूस हो कि परिवार में बेटा और बेटी के साथ संपत्ति के मामले में अलग व्यवहार किया जा रहा है.
हर घर की बेटी जानें –
• बराबरी का मतलब यह भी है कि परिवार संपत्ति को लेकर निर्णय लेते समय बेटी को जानकारी दे.
• कौन-सी संपत्ति किसके नाम है, यह भी जानकारी बेटी को होनी चाहिए.
• परिवार की जमीन, घर, निवेश या दूसरी बड़ी संपत्तियों के बारे में उसे भी जानकारी होनी चाहिए. आर्थिक जानकारी भी आर्थिक स्वतंत्रता का ही हिस्सा है.
• माता-पिता को भी आगे आकर बताना चाहिए कि बेटी का हिस्सा कितना है?
ऐसे समय पर भावनाओं में बहने के बजाय शांत बातचीत जरूरी है. प्रोपर्टी के डौक्यूमेंट्स को समझना, परिवार की स्थिति जानना और जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लेना बेहतर रास्ता है.
