देश में औरतों की हालत आज भी कोई अच्छी नहीं है. शहरों में ऊंचे, खातेपीते घरों से आने वाली लड़कियां चाहे पढ़लिख कर बराबरी का सी जगह पा लें पर सरकारी ढांचा आज भी मेल डौमिनेटेड है. 1951 से 2020 तक अवेलेबल डाटा के अनुसार आईएएस में 11,569 की अपौइंटमैंट हुई और फीमेल परसैंट सिर्फ 13% यानी 1,529 था.
जब सरकार को अपनी मुट्ठी में बांध कर चलाने वाली स्टील फ्रेम आईएएस का यह हाल है तो औरों को क्या कहें. औरतों के बारे में फैसले तो ये ही लेते हैं न. मेल डौमिनेटेड आईएएस कभी न चाहेंगी कि उन को लड़कियों के मुकाबले में खड़ा होना पड़ेगा. यह उन के मेल ईगो को हर्ट करना है और वे ऐसे ही फैसले लेते हैं जिन में औरतें बुरी तरह सैकंडरी स्टेज पर रहें.
जो लड़कियां सिर्फ पढ़ाई के बल पर आज आईएएस बन जाती हैं उन्हें घर, ट्रांसफरों या तो बहुत मुश्किलों या बेहद टोकन वाली पोस्टिंग दे दी जाती है क्योंकि फैसले तो आज भी वह कमेटी ही करती है जिस में मेल डौमिनेशन है. इंदिरा गांधी 1966 से 1977 और 1980 से 1984 तक प्रधानमंत्री रहीं और इमरजैंसी तक लगवा पाईं पर वे आईएएस की कमर नहीं तोड़ पाईं.
जयललिता ने तमिलनाडु में बरसों अपने बलबूते राज किया, ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में किया पर अफसरशाही में वे बैलेंस नहीं बैठा पाईं. वैसे राज्यों में अपौइंटमैंट सैंट्रल गवर्नमैंट ही करती है पर स्टेट पब्लिक कमीशनों का भी यही हाल रहा है. उन दोनों ने औरतों को ज्यादा जगह दिलवाई और जयललिता ने विशेष रिजर्वेशन भी लागू किया जिस से स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन को 30 से 36% अपौइंटमैंट लड़कियों की करनी पड़ी. तमिलनाडु में लड़कियों की पढ़ाई वैसे भी ज्यादा रही है और वे आम जीवन में भी उत्तर के मुकाबले ज्यादा बोल्ड व इक्वल रही हैं.
यही हाल पश्चिम बंगाल का है जहां मातृभूमि की पूजा हिंदू धर्म के आने से पहले होती रही है. जब से हिंदुओं ने वहां पैर फैलाए हैं तब से औरतों की दुर्दशा हुई है पर ममता बनर्जी ने इसे रोकने में सफलता पाई थी. उन्होंने ज्यादा विधायक, ज्यादा सांसद फीमेल भेजे पर मेल डौमिनेशन चलता ही रहा.
जब तक औरतों के हाथों में सरकार की कमान न होगी, यह भूल जाएं कि औरतों को कभी कुछ मिलेगा. अगर एक राह पर चलती को 5-7 लड़के मिल कर एक लड़की का रेप कर सकते हैं, अगर किसी पत्नी को दहेज के चक्कर में मारा जा सकता है तो सिर्फ इसलिए मेल डोमिनेटेड सरकारी ढांचा उन्हें केवल सैक्स और सर्विस का औब्जैक्ट मानता है.
क्या आम औरतें अपने में घुटन महसूस करती हैं कि उन्हें मेल थंब के नीचे जीना पड़ रहा है? तो जवाब एक ही है कि हर ऐसा काम करना बंद करें जो औरतों के लिए पुरुषों ने तय कर दिया है. सब से बड़ी बात है कि धर्म का पल्ला छोड़ें क्योंकि सब से ज्यादा बकवास पंडे, पुजारी, मुल्ले, पादरी करते हैं कि औरतों को काबू में रखो. पौराणिक ग्रंथ, बाइबल, कुरान, ग्रंथ साहिब उन बातों से भरे हैं जहां औरतों को सैकंडरी रोल दिया गया है.
दूसरा है कि वोट का हक केवल औरतों को चुनने में लगाएं चाहे वे किसी भी पार्टी की, किसी भी धर्म की, किसी भी कास्ट की हों. जब पावर औरतों के हाथ में होगी तब सड़क पर चलती लड़की सेफ होगी.
