सुबह सुबह फिर से प्रीती और पारिजात सक्सेना में झगड़ा शुरू हो गया. पिछले 4 महीनों में इनके झगड़े इतने बढ़ गए हैं कि पांच साल का बेटा नचिकेता सहम कर दादा दादी से चिपका रहता. दादी बहू पर इल्जाम लगाती और दादा खामोश रहते लेकिन आज नचिकेता के दादा को इस झगड़े में घुसना ही पड़ा. उन्होंने अपने 38 साल के बेटे पारिजात को डपटते हुए कहा- तुम्हें बहू से उसके मम्मी पापा के दिए गहने और मुंबई वाला फ्लैट लेने का कोई अधिकार नहीं. वह पूरी तरह से प्रीती की संपत्ति है. पारिजात सक्सेना रियल एस्टेट ब्रोकर हैं लेकिन पिछले दो सालों से उसके हाथों से कोई भी बड़ी डील नहीं हुई. बैंकों में जमा पैसे खत्म होते जा रहे हैं. अब अपने 200 गज के फ्लैट की ईएमआई देने की चिंता सता रही है. क्रेडिट कार्ड बिल्स को चुकाने को लेकर भी बैंक से कई बार फोन आ चुके हैं. ऐसे में पारिजात को एक ही रास्ता नजर आया – पत्नी प्रीती के मायके से मिले गहने और मुंबई वाला फ्लैट बेचने का. लेकिन प्रीती इसे अपनी संपत्ति मानते हुए पारिजात को देना नहीं चाहती है, आज फादर इन लॉ भी उसका साथ दे रहे हैं. जबकि पारिजात और उसकी मां, प्रीती पर सेल्फिश होने का आरोप लगा रहे हैं.

स्वार्थी होने का आरोप भी लग सकता है-

शादी के बाद एक महिला को अपने मायके से संपत्ति में हिस्सा मिलता है. वह संपत्ति उसके पिता की जमीन हो सकती है, घर हो सकता है या विरासत में मिली कोई दूसरी संपत्ति जैसे पुश्तैनी गहने, सोने चांदी के बरतन वगैरह भी हो सकती है. अब सवाल उठता है कि क्या शादी के बाद उस संपत्ति को पति के साथ शेयर करना महिला की जिम्मेदारी है? और अगर वह ऐसा नहीं करना चाहती, तो क्या उसे स्वार्थी या परिवार से अलग सोचने वाली महिला का टैग दिया जाना चाहिए? जैसा कि प्रीती सक्सेना को दिया जा रहा है. Fair Share कैंपेन इसी सवाल को समझाने की कोशिश कर रहा है.

क्या उस संपत्ति पर पति का अधिकार होना चाहिए?

कानून ने बेटी को बराबरी दी है. 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम यानी Hindu Succession (Amendment) Act के बाद मिताक्षरा संयुक्त हिंदू परिवारों में बेटी को बेटे के समान सहदायिक का दर्जा मिला. सुप्रीम कोर्ट ने भी क्लियर किया है कि बेटी को बेटे की तरह जन्म से सहदायिक अधिकार मिलते हैं और इसलिए बेटी coparcenary property में अपने हिस्से की मांग कर सकती है. यानी बेटी का मायके की पैतृक संपत्ति में हिस्सा देना कोई एहसान करने जैसा नहीं है. यह कानूनी अधिकार है. महिला को चाहिए कि मायके से मिली संपत्ति को रखने के लिए अपना अलग बैंक अकाउंट खुलावाए. जरूरत पड़ने पर अपने हाथ से खर्च करें. ऐसी प्रोपर्टी को बेचे नहीं.

जमीन-मकान पर मालिकाना हक के मामले में अभी भी पुरुषों से पीछे कानून बदलने के लगभग दो दशक बाद भी जमीन और संपत्ति के वास्तविक मालिकाना हक में महिलाओं और पुरुषों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है. सरकार की ओर से जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे – 5 (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार, 15–49 वर्ष की महिलाओं में 31.7% के पास अकेले या संयुक्त रूप से जमीन थी, जबकि पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 42.3% था. यह आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं का संपत्ति पर मालिकाना हक पुरुषों से कम है.

ऑनरशिप और शेयरिंग के बीच फर्क समझें

अगर वाइफ अपनी मर्जी से अपनी संपत्ति पति के साथ साझा करना चाहती है, तो यह उसका फैसला है. अगर दोनों मिलकर तय करते हैं कि उस संपत्ति से घर खरीदा जाएगा, बच्चों की पढ़ाई होगी या कोई कारोबार शुरू किया जाएगा, तो यह भी आपसी निर्णय हो सकता है. लेकिन अगर पत्नी अपनी संपत्ति अपने नाम रखना चाहती है, तो केवल शादीशुदा होने के कारण उसे इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए.
इन बातों के बहकावे या प्रेशर में नहीं आना चाहिए जैसे –

“अब तुम शादीशुदा हो.”
“पति से क्या छिपाना?”
“पति-पत्नी की संपत्ति अलग कैसे हो सकती है?”
“आखिर संपत्ति परिवार के ही तो काम आएगी.”

शादी बराबरी का रिश्ता है, संपत्ति का विलय नहीं

पति-पत्नी का रिश्ता साझेदारी का रिश्ता है. दोनों एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ होते हैं. बच्चों को स्कूल छोड़ने से लेकर नई प्रोपर्टी खरीदने तक दोनों साथ मिलकर फैसले लेते हैं, एक साथ बुढ़े होते मांपापा की सेवा करते हैं. लेकिन इसके बावजूद इस साझेदारी का अर्थ यह नहीं कि शादी के बाद दोनों की हर व्यक्तिगत संपत्ति अपने-आप साझा संपत्ति बन जाए. अगर पति को अपने माता-पिता से विरासत में संपत्ति मिलती है, तो पत्नी केवल उससे शादी होने के कारण उस संपत्ति की खुदबखुद मालिक नहीं बन जाती, तो फिर पत्नी को अपने माता-पिता से मिली संपत्ति के मामले में यही सिद्धांत क्यों नहीं फॉलो किया जाना चाहिए चाहिए? बराबरी का मतलब है कि एक ही नियम दोनों पर लागू हो.

“पति से शेयर नहीं करेगी” मतलब पति से प्यार नहीं? धारणा बदलना जरूरी

एक महिला अपनी संपत्ति अपने नाम रखती है तो इसके यह मायने नहीं निकाले जाने चाहिए कि उसे हसबैंड पर भरोसा नहीं. कई बार महिला की जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जब ऐसी संपत्ति उसकी सुरक्षा कवच बन सकती है जैसे पति की अचानक मौत के बाद ससुरालवालों की उपेक्षा का शिकार होने पर, अपना कोई बिजनेस शुरू करने की चाहत होने पर, अपने बच्चों के लिए गहने बनवाने की इच्छा महसूस होने पर. इसके अलावा ऐसी संपत्ति उसके लिए भविष्य की आर्थिक सुरक्षा हो सकती है. बुढ़ापे में पति के नहीं रहने पर, जवान बच्चों की ओर से देखभाल नहीं किए जाने पर या किसी दूसरी बुरी परिस्थिति जैसे गंभीर बीमारी में मायके की संपत्ति उसे आर्थिक सुरक्षा दे सकती है.

नौकरी करती है, तब भी उसकी अपनी संपत्ति हो सकती है

महिला के नाम की संपत्ति उसे निर्णय लेने की छूट देती है. इसलिए महिला का अपनी संपत्ति के बारे में फैसला लेना स्वार्थ नहीं कहलाएगा, यह आर्थिक आजादी भी हो सकता है. पति-पत्नी को आर्थिक मामलों में पारदर्शी होने की जरूरत है. विवाह को सही तरीके से चलाने के लिए फाइनेंस के मामलों पर बातचीत होनी चाहिए. पति और पत्नी को अपनी बड़ी आर्थिक जिम्मेदारियों, निवेश और भविष्य की योजनाओं पर बात करनी चाहिए. लेकिन बात करना और अधिकार जताना एक बात नहीं है. पत्नी अपने पति को बता सकती है कि उसे मायके से क्या मिला है. दोनों उस संपत्ति के भविष्य पर चर्चा कर सकते हैं. लेकिन अंतिम फैसला किसका होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस संपत्ति किसका कानूनी अधिकार पर है. सिर्फ यह मान लेना कि महिला शादीशुदा है, इसलिए उसकी व्यक्तिगत संपत्ति, पति को खुद ही मालिकाना हक देती है, यह गलत है.

Fair Share का मतलब सिर्फ हिस्सा पाना नहीं

Fair Share का सवाल केवल इतना नहीं है कि “बेटी को हिस्सा मिला या नहीं?. “हिस्सा मिलने के बाद क्या उसे अपने हक पर फैसला लेने की आजादी मिली?” क्योंकि बराबरी सिर्फ संपत्ति में हिस्सा मिलने से पूरी नहीं होती. बराबरी तब पूरी होती है, जब अपने हिस्से पर फैसला लेने का अधिकार भी हो. इसलिए इस अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी है कि अपनी संपत्ति को वह किस तरह से खर्च करे यह निर्णय केवल और केवल उस महिला का होना चाहिए.

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