Daughter birth : डेनमार्क की प्रोफेसर नीना स्मिथ और रिसर्चर्स मैडलेना रोंकी और आरहूस यूनिवर्सिटी की इकोनॉमी डिपार्टमेंट ने मिलकर 1993 से 2017 तक पूरे 24 साल तक सरकारी डाटा खंगाला. उन्होंने छोटी कंपनियों को चुना क्योंकि छोटी कंपनी में बॉस का फैसला सीधा दिखता है. बड़ी कंपनी में एचआर, बोर्ड, पॉलिसी होती है. छोटी कंपनी में भर्ती, वेतन का फैसला अक्सर पुरुष मैनेजर के हाथ में होता है.
रिसर्च में उन्होंने दो तरह के बॉस की तुलना की – —
एक जिनकी पहली संतान बेटी थी.
दूसरे जिनकी पहली संतान बेटा था.
उन्होंने पहले और बाद की स्थिति भी देखी ताकि आपको ये पता चले कि ये बदलाव पिता बनने से पहले से तो नहीं था और नतीजे चौंकाने वाले थे.
जिन पुरुष प्रबंधकों के घर पहली बेटी ने जन्म लिया उन्होंने:
– ज्यादा शिक्षित महिलाओं को नौकरी पर रखा.
– उन्हें पार्ट टाइम नहीं बल्कि फुल टाइम और बेहतर वेतन वाले पदों पर रखा.
– उनकी कंपनियों में महिलाओं की औसत कमाई पुरुषों के मुकाबले 4.4% तक बढ़ गई.
– महिलाओं का रोजगार 2.9% बढ़ा.
– और सबसे बड़ी बात – ये असर बेटी के जन्म के 2-3 साल बाद तक नहीं बल्कि कई सालों तक बना रहा.
जबकि बेटा होने वाले बॉस में ऐसा कोई बदलाव नहीं दिखा.
ऐसा क्यों होता है- एक पिता के दिल की कहानी
प्रोफेसर नीना स्मिथ कहती हैं, “सोच बदली तो नियुक्तियों में दिखा असर.”
एक पुरुष जब बेटी का पिता बनता है तो वो पहली बार दुनिया को एक लड़की की आँख से देखना शुरू करता है. पहले उसके लिए महिला कर्मचारी शायद सिर्फ एक फाइल थी. अब वो सोचता है – मेरी बेटी 25 साल बाद जब किसी ऑफिस में जाएगी तो क्या उसे बराबर मौका मिलेगा? क्या उसे उसकी योग्यता पर आंका जाएगा या जेंडर पर? क्या उसे माँ बनने पर नौकरी से निकाल दिया जाएगा?
यही सहानुभूति, यही संवेदनशीलता उसके फैसलों में दिखती है.
कंपनी को नुकसान हुआ क्या?
हर बार जब महिलाओं को मौके की बात आती है तो एक डर दिखाया जाता है कि कंपनी का बिजनेस डूब जाएगा, प्रॉफिट कम हो जाएगा. इस स्टडी ने उस डर को भी तोड़ दिया.
रिपोर्ट साफ कहती है – सेल , प्रोडक्टिविटी और एवरेज लेबर कॉस्ट पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा. कंपनी की कमाई में कोई गिरावट दर्ज नहीं हुई. मतलब महिलाओं को मौका देने से कंपनी का बिजनेस कमजोर नहीं हुआ. उल्टा बेहतर वेतन पाने पर महिलाओं ने ज्यादा मन से काम किया.
एक और जरूरी बात – हर महिला की तनख्वाह नहीं बढ़ी. बल्कि अच्छी नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी. यानी बॉस ने दया नहीं की बल्कि योग्यता को जगह दी. उन पुरुषों को हटाया नहीं बल्कि उन पदों पर जहाँ पहले सिर्फ पुरुष थे अब योग्य महिलाओं को भी रखा जिन्हें पहले अनदेखा किया जाता था.
डेनमार्क भारत से बहुत दूर है पर यह कहानी हमारी भी है.
भारत में आज भी कई ऑफिस में महिलाओं को इंटरव्यू में पूछा जाता है – शादी कब करोगी? बच्चे कब करोगी? प्रेग्नेंट होने पर कई जगह आज भी नौकरी चली जाती है. अगर एक बेटी का पिता बनना एक पुरुष को ज्यादा बराबरी वाला बना सकता है तो सोचिए हमें अपनी परवरिश में क्या बदलना चाहिए?
हमें अपने बेटों को बेटी का पिता बनने तक इंतजार नहीं करवाना चाहिए. हमें उन्हें बचपन से ही सिखाना चाहिए कि लड़की की इज्जत क्या होती है, उसकी मेहनत का मतलब क्या होता है.
ऑफिस में बदलाव कैसे लाएं
1. कभी कभी अपनी बेटी को ऑफिस लाएं और उस को अपने काम की जगह दिखाएं. उसे भी और आपके सहकर्मियों को भी पता चलेगा कि भविष्य की बॉस कैसी दिखती है.
2. जो पिता अभी अभी बेटी के पिता बने हैं उनसे पूछें कि बेटी के आने के बाद उनकी सोच में क्या बदलाव आए हैं .
3. महिला कर्मचारी को कमजोर न समझें. उसकी स्किल बढ़ाएं और ऊँचे ओहदों के लिए भी उन के नाम आगे करें.
4. ऑफिस में एक ही काम के लिए महिला और पुरुष को बराबर पैसा मिलना जरूरी है. तभी अवसर की समानता बढ़ेगी और महिलाएं ज्यादा गंभीरता से करेंगी.
5. घर में अगर पति बर्तन धोता है, बच्चा संभालता है तो ऑफिस में वो महिला कर्मचारी की छुट्टी को भी समझेगा. बदलाव घर से शुरू होता है.
ये खबर सिर्फ आंकड़ों की खबर नहीं है. ये उम्मीद की खबर है. ये बताती है कि इंसान बदल सकता है. एक नन्ही सी बेटी जो बोल भी नहीं सकती वो एक बड़े ऑफिस के बॉस की सोच बदल सकती है. वो सैकड़ों महिलाओं के घर में ज्यादा राशन, ज्यादा सम्मान और ज्यादा आत्मविश्वास ला सकती है.
